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तुम जो आए जिंदगी में

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Ravina Sastiya

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कहानी शुरू होती है एक छोटे से शहर में, जहाँ ज़िन्दगी धीमी चलती है, पर दिलों की धड़कनें हमेशा तेज़ होती हैं। यहाँ की गलियाँ आम हैं, पर मोहब्बत के किस्से खास। इस शहर में रहती है निष्ठा शर्मा, जो एक शर्मीली, सीधी-सादी लड़की है। उसे किताबें पढ़ने का और अ...

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Page 1 of 1

  • 1. तुम जो आए जिंदगी में - Chapter 1

    Words: 1323

    Estimated Reading Time: 8 min

    कहानी शुरू होती है एक छोटे से शहर में, जहाँ ज़िन्दगी धीमी चलती है, पर दिलों की धड़कनें हमेशा तेज़ होती हैं। यहाँ की गलियाँ आम हैं, पर मोहब्बत के किस्से खास। इस शहर में रहती है निष्ठा शर्मा, जो एक शर्मीली, सीधी-सादी लड़की है। उसे किताबें पढ़ने का और अपने बगीचे में समय बिताने का शौक है। निष्ठा के सपनों में हमेशा से एक सच्चा प्यार था, लेकिन उसने कभी सोचा नहीं था कि वो असल ज़िन्दगी में कभी उसके पास आएगा।

    दूसरी तरफ है   आधय ठाकुर , एक फुर्तीला, शरारती और थोड़ा सा बागी लड़का। क्रिकेट खेलना  इसका पसंदीदा काम है। और उसकी साइकिल की रफ़्तार उसकी ज़िन्दगी की तरह ही तेज़ है, और उसका दिल उतना ही बेपरवाह है। लेकिन आधय का अंदाज कुछ ऐसा है कि लड़कियां उसकी तरफ खिंचती चली जाती हैं। उसकी बातों में एक जादू है, लेकिन वह कभी गंभीर नहीं होता।

    कहानी तब शुरू होती है जब निष्ठा और आधय की पहली मुलाकात होती है।


    निष्ठा अपने घर के अंदर पोछा लगा रही थी। एक सामान्य दिन था, लेकिन उस दिन की गर्मी ने काम को और भी कठिन बना दिया था। वह तेजी से फर्श पर पोंछा लगाते हुए सोच रही थी कि घर में साफ-सफाई के अलावा भी कितनी जिम्मेदारियाँ हैं। उसकी आँखें दरवाजे के पास खड़े बच्चों पर पड़ीं, जो उसकी हर हरकत को बड़े ध्यान से टुकुर टुकुर देख रहे थे।

    “देखो, तुम में से कोई भी अभी अंदर नहीं आएगा जब तक ये सारा पोछा सुख न जाए। नहीं तो तुम तीनों से सारा घर धुलवाऊंगी!” निष्ठा ने गुस्से से कहा, उसकी आवाज़ में एक गंभीरता थी।
    बच्चों ने उसके शब्दों को सुनकर तुरंत अपनी जगह पर ठिठक गए।
    गोलू, जो सबसे छोटा था, उसने अपनी तोतली आवाज में कहा, “अले दीदी, हमको भोत जोल से भूख लगी है... आप दल्दी दल्दी से लगावो न ओच्छा!” उसके मासूम शब्द सुनकर निष्ठा का गुस्सा थोड़ी देर के लिए कम हो गया, लेकिन उसने फिर भी अपनी बात को बनाए रखा।

    तभी रिया, जो थोड़ी बड़ी और तेज़-तर्रार थी, उसने गोलू के सिर पर हल्के से चपत मारी और कहा, “अरे गोलू, ओच्छा नहीं, पोंछा बोलते हैं उसे!” रिया की इस बात ने सबको हंसी में डाल दिया।

    गोलू ने फिर अपनी तोतली आवाज मे कहा,"लिया दीदी! भुक्ख लगी है जोलो जोलो की। "

    "अरे गोलू तू निष्ठा दीदी को गुस्सा दिला रहा है। सुना नही उन्होंने क्या कहा ...अगर हमने ये गीले फर्श पर पैर रखा तो दीदी हमसे पूरा घर धुलवाएगी। ",लेकिन इस बार पास खड़ा आरव झट से बोल पड़ा।

    निष्ठा ने पोंछे वाली पानी से भरी बाल्टी उठाई और बोली," चलो तुम सब 10 मिनट तक बाहर और खेल खेलो।तब तक ये सुख भी जायेगा। "

    गोलू ने अपनी गोल गोल आंखे बड़ी बड़ी करके कहा," दीदी बस दो मिनिट मुजे अंदल जाने दो..इक बिचकिट लेके झट्ट से वापछ आ जावूंगा। "

    निष्ठा ने तब तक बाल्टी का पानी बाहर फेंक दिया था और वापस बच्चों की तरफ मुड़ गई...निष्ठा ने अपने हाथ कमर पर रखे और गोलू को घूरते हुए बोली ," गोलू बेटा बिचकिट बहुत मीठी होती है और मईया कहती है ना की मीठी चीज़ खाने से पेट में कीड़े पड़ जाते है। "

    निष्ठा ने गोलू को फुसलाने के लिए कहा।

    "आप मेरी भासा बोल लही हो। " गोलू ने कहा।

    लेकिन निष्ठा ने उसे घूर कर देखा।

    गोलू ने एक हाथ अपने मुंह पर रख लिया और दूसरे हाथ से निष्ठा के पीछे इशारा करते हुए बोला ," अले दीदी... ओ थारे पिच्छे कुत्ता खड़ा है। "

    निष्ठा एकदम से पलटी ...लेकिन वहा कुछ भी नही था।

    "क्या है कुछ भी तो नहीं है।"निष्ठा हैरानी से वापस मुड़ी तो देखा गोलू के साथ साथ रिया और आरव... वो तीनो के तीनो.. घर के अंदर घुस चुके थे।

    लेकिन निष्ठा कुछ बोल ही नहीं पाई क्युकी वो तीनो दौड़ कर अंदर तक पहुंच गए थे।

    निष्ठा ने फर्श पर देखा जहां उन तीनो के गंदे पैरो के निशान छप गए थे।

    निष्ठा ने अपना सिर हिलाया और खुद से ही बड़बड़ाई ," ये सब के सब शैतान ने मेरी नाक में दम मचा कर रख दिया है। अब फिर से पोछा लगाना पड़ेगा। "

    थोड़ी देर बाद निष्ठा ने वापस से पोंछा लगा दिया और फिर खुद से ही बड़बड़ाते हुए वो बाल्टी का गंदा पानी लेकर बाहर आंगन में आई और बिना सामने देखे बाल्टी का सारा गंदा पानी पूरे जोर से सामने फेंका और वापस बड़बड़ाते हुए अंदर चली गई।

    लेकिन अगर निष्ठा एक बार भी देख लेती की उसने फिलहाल क्या किया है तो शायद....तो शायद सामने से साइकिल लेकर आ रहे आधय पर पानी नहीं गिरता।

    अभी थोड़ी देर पहले ही आधय पूरी रफ्तार से साइकिल चलाते हुए आ रहा था की अचानक उसकी नजर सामने दरवाजे से निकलती हुई निष्ठा पर पड़ी.... आधय के दिल में निष्ठा को देखते ही गिटार बजना शुरू कर दिया लेकिन ये गिटार जल्द ही एक...एक ज़ोरदार शोर के साथ थम गया। पानी की बाल्टी से गिरते गंदे पानी की चपेट में आधय आ गया। उसकी साइकिल फिसली और वह झटकते हुए गिर पड़ा।

    लेकिन अफसोस इस बात का हुआ की निष्ठा को इस बात की भनक भी नहीं लगी। निष्ठा तो कबकी घर के अंदर घुस चुकी थी।

    और बचा था तो सिर्फ हमारा प्यारा... बेचारा आधय।

    अाधय जैसे तैसे उठा और खुद को झटकते हुए खुद को देखा, “अरे !” उसने खुद से कहा, लेकिन फिर एक नजर दरवाजे की तरफ देखा। “ये मेरे दिल की घंटी बजाने वाली हुस्न की शैतान कौन थी ?”

    वो अपनी साइकिल को उठाते हुए सोचने लगा, “बिलकुल धोबी का कुत्ता बन गया हूं आज तो मैं, ना घर का ना घाट का हो गया हूं !” वह खुद से बड़बड़ाया।


    फिर  वह साइकिल चलाने लगा वापस उतनी ही तेज रफ्तार में ..उसने थोड़ा ऊपर आसमान में देखा और बोला, " सिर्फ मेरी ही  किस्मत में बवाल लिखा है आपने! एक तो वो  चोर लड़की पता नही कहा से प्रकट हुई और  पल भर मैने पलके क्या झपकाई वो तो गायब  ही हो गई। अरे गायब हुई वो तो ठीक था ...लेकिन वो तो मेरा दिल ...मेरा चैन वैन  सब चुरा कर ले गई।”

    "हाश्श ये कैसे कैसे चोर आ गए है इस धरती पर !"आधय खुद से ही बड़बड़ाया।


    आधय जैसे ही साइकिल चलाता हुआ आगे बढ़ा, उसकी मन की बेचैनी  ने उसे पूरी तरह घेर लिया था। उसने फिर से सोचा, "कितनी अजीब बात है, दिल की घंटी बजाने वाली वो लड़की, जिनका नाम भी मुझे ठीक से नहीं पता, कब कहां गायब हो गई! और मैं सोच रहा हूं, वो मेरी हिम्मत थी या फिर मेरी तक़दीर की खोट, जो मेरा दिल और चैन चुराकर ले गई।"

    साइकिल की रफ्तार बढ़ाने के बावजूद, आधय के मन में निष्ठा की छवि बार-बार घूमने लगी। 


    जैसे ही आधय की साइकिल पुराने मोहल्ले की तंग गलियों से गुज़री, एक चाय की दुकान के बाहर रखे पुराने रेडियो से एक धीमी, मगर दिल छू लेने वाली धुन हवा में घुल गई—

    "पहली पहली बार मोहब्बत की है
    इश्क़ ने मेरी ऐसी हालत की है
    पहली पहली बार मोहब्बत की है..."

    आधय की साइकिल की रफ्तार थोड़ी धीमी हो गई... मानो उस गाने ने उसके दिल के दर्द को ज़ुबान दे दी हो। वो एक पल के लिए रुक गया।

    उसने साइकिल का स्टैंड मारा, और वहीं चाय की दुकान के सामने दीवार से टिक कर खड़ा हो गया। उसकी आँखें थोड़ी नम, होंठों पर एक अधूरी मुस्कान…

    “पहली पहली बार… हाँ यही तो हुआ है मेरे साथ,” उसने धीरे से खुद से कहा।
    उसके दिमाग में वही पल घूम गया, जब निष्ठा ने बाल्टी का पानी फेंका था। चेहरे पर चिपका कीचड़, और दिल में चिपकी उसकी तस्वीर।

    “कौन थी वो...?” आधय की आवाज़ में बेचैनी थी, पर दिल की धड़कनों में उस अनजान लड़की के लिए एक नर्म सा एहसास भी था।

    रेडियो अब भी बज रहा था...



    आगे क्या होगा जानने के लिए  अगले भाग का इंतजार करते  रहिए साथ ही समीक्षा भी करते रहिए।

  • 2. तुम जो आए जिंदगी में - Chapter 2

    Words: 1619

    Estimated Reading Time: 10 min

    निष्ठा ने झाड़ू ज़ोर से ज़मीन पर पटकी, “एक मिनट का सुकून नहीं है इस घर में!”

    बगल के कमरे से गोलू, रिया और आरव की मिलीजुली आवाज़ें आ रही थीं।

    “हट ना! तू आउट है!”
    “मैंने पहले मारा था यार!”
    “रिया चीटिंग कर रही है!”

    निष्ठा का सिर घूम गया।

    "बस!!" उसने चिल्लाते हुए कहा, "आरव! रिया! और... और ये छोटा सांड—गोलू!! सब बाहर निकलो!"

    तीनों झट से बाहर आए। गोलू की नाक बह रही थी, बाल उलझे हुए थे, और हाथ में आधा खाया बिस्कुट था।


    गोलू ने डरते-डरते उसकी चुन्नी पकड़ ली,
    "दीदी... मम्मा ने कहा था... आप बहुत मीठी हो... जैसे... जैसे चुचुचुला!"

    “चुचुचुला?” निष्ठा ने हैरानी से उसे देखा।

    “हां... वो जो गीले गीले होते हैं न... सफेद वाले... मुँह में रखते ही... फिस्स्स्स्स हो जाते हैं... वैसे आप हो!"

    गोलू के शब्दों पर रिया और आरव हँसी रोक नहीं पाए। लेकिन निष्ठा की आँखें भर आईं।

    उसकी आँखों में आँसू थे—गुस्से के नहीं, थकान के... और उस मासूमियत से टकरा जाने के जो उसे अंदर तक हिला गई।

    "गोलू... मैं रसगुल्ला नहीं हूँ... मैं लड़की हूँ," वो धीमे से बोली।

    "तो क्या हुआ दीदी?" गोलू ने फिर कहा, "लड़की भी मिठ्ठ्ठी हो सकती है न... थोड़ी झगड़ालू मिठ्ठ्ठी!"

    निष्ठा मुस्कुरा दी... उसकी आँख से एक आँसू गाल पर फिसल गया।

    “चल हट, झगड़ालू मिठ्ठी कह रहा है मुझे...” उसने धीरे से गोलू की नाक दबाई, “बिस्कुट खा-खा के सारा मुँह चिपचिपा कर दिया तूने!”

    गोलू ने मुस्कुराते हुए उसकी गोद में सर रख दिया,
    “तो आप गुस्सा मत करो न... हम सब झाड़ू लगादेगें... ठीक है?”

    निष्ठा उसे ताकती रही... और पहली बार लगा कि शायद ये बच्चे सिर्फ शोर नहीं, उसका सुकून भी बन सकते हैं।

    ---

    रात के आठ बजे थे। रसोई में प्रेशर कुकर की सीटी, सब्ज़ियों की महक और चूल्हे की आँच के बीच निष्ठा चुपचाप रोटियाँ बेल रही थी। भाभी आलू की सब्ज़ी में तड़का लगा रही थीं।

    गोलू पास की चौकी पर बैठा हुआ था, और चुपके से सब्ज़ी में उंगली डालने की कोशिश कर रहा था।

    "गोलू! हाथ जला लेगा!" निष्ठा ने उसे डांटने की बजाय कान खींच कर मुस्कुराते हुए कहा।

    गोलू ने तोतली आवाज़ में कहा,
    "दीद्दी... मैं तो चख रहा था !"

    रसोई में हल्की हँसी गूंज गई।

    लेकिन निष्ठा की आँखें फिर बुझ सी गईं। उसने भाभी की तरफ देखते हुए धीमे से कहा,
    "भाभी... मैं कुछ कहूँ तो मानेंगी?"

    भाभी ने हल्का मुस्कान देते हुए कहा,
    "पहले बता तो सही, फिर देखूँगी मानूँ या डाँट दूँ।"

    निष्ठा की आवाज़ धीमी हो गई।
    "भाभी... मुझे कॉलेज जाना है..."

    भाभी की मुस्कान वहीं रुक गई। उन्होंने घबराकर दरवाज़े की तरफ देखा और तुरंत गैस धीमी कर दी।

    "चुप हो जा! अगर पापा जी ने सुन लिया न, तो तू जानती है क्या होगा!"

    "लेकिन भाभी... आप ही तो कहती हैं कि लड़की को पढ़ाई नहीं छोड़नी चाहिए… और मेरा तो फॉर्म भी भर गया था... हॉस्टल में मैं अच्छे से पढ़ती थी..."

    "जानती हूँ निष्ठा... पर तेरी शादी  की बात हो रही  है। अब तुझे पढ़ाई नहीं, घर सँभालना है... ये तुझे अभी नहीं, बाद में समझ आएगा।"

    निष्ठा की उंगलियाँ आटे में धँसी रहीं, पर उसकी आँखें कहीं और देख रही थीं। 

    “भाभी...  अभी तो मैं बच्ची ही हु....मुझे वो सब नहीं चाहिए... ना बड़ी नौकरी... ना मोटी तनख्वाह... बस... दो साल और पढ़ लूँ... प्लीज़...”

    भाभी का दिल पसीज गया।

    उन्होंने एक पल निष्ठा को देखा—सिर झुकाए, उंगलियों से आटे में गोल गोल घेरा बनाती हुई। वो वही लड़की थी जो कभी पूरे मोहल्ले में "होशियार बिटिया" कहलाई जाती थी, जो हर प्रतियोगिता में पहला स्थान लाती थी। और अब... रोटियाँ बेल रही थी, सपनों को भी आटे की तरह मसलकर गोल बना रही थी।

    भाभी ने धीरे से उसके पास आकर उसका हाथ थामा।

    "निष्ठा… तू सही कह रही है। और अगर तुझमें अब भी इतनी हिम्मत बची है… तो मैं तेरे साथ हूँ।"

    निष्ठा ने चौंक कर उन्हें देखा। भाभी की आँखों में पानी था।

    "लेकिन भाभी... पापा जी?"



    भाभी की आँखों में एक पल को पुरानी परछाइयाँ उतर आईं। उन्होंने गैस बंद कर दी और थाली का ढक्कन रखते हुए निष्ठा की ओर देखा—जैसे वो एक बार फिर खुद को देख रही थीं, किसी और की आंखों में।

    “जानती हूँ... आज़ादी हमें भी कहाँ मिली थी, निष्ठा,” उन्होंने धीरे से कहा, “बस दूसरों की मर्ज़ी में अपनी ख्वाहिशें ढालनी आ गई थी हमें... पर तू... तू मेरी ननद नहीं, मेरी बहन है... मैं नहीं चाहती कि तू भी वही जिए जो मैंने जिया।”

    निष्ठा की आँखें भर आईं। वो धीरे से भाभी के गले लग गई।

    “तो आप बात करेंगी?” उसने काँपती आवाज़ में पूछा।

    भाभी ने उसका सिर सहलाया, “हाँ... मैं तेरे भैया से बात करूँगी। पर...”

    वो रुक गईं।

    “पर?” निष्ठा ने घबराकर पूछा।

    “मम्मी जी... वो नहीं मानेंगी इतनी आसानी से। उनके लिए लड़की की पढ़ाई नहीं, शादी पहले है। पर तू डर मत... अगर तेरे भैया मान गए, तो एक बार में नहीं... धीरे-धीरे ही सही, हम उन्हें भी मना लेंगे।”

    निष्ठा की उम्मीद जैसे ताज़ा हो गई। वो पहली बार रसोई में रोटियाँ बेलते हुए मुस्कुराई।



    रात का वक़्त था। घर की बत्तियाँ बुझ चुकी थीं। केवल भाभी-भैया के कमरे में हल्की सी लाइट जल रही थी।
    भैया बिस्तर पर लेटे मोबाइल देख रहे थे, जब भाभी ने धीरे से दरवाज़ा बंद किया और पास आकर बैठ गईं।

    “सुनिए…”

    केशव ने नज़र उठाई, “हम्म? क्या हुआ?”

    भाभी गौरी ने थोड़ा हिचकिचाकर कहा, “एक बात कहनी थी… निष्ठा को लेकर।”

    केशव ने मोबाइल नीचे रखा, “क्या किया उसने अब?”

    “कुछ नहीं... उल्टा कुछ अच्छा ही चाहती है... कॉलेज जाना चाहती है...”

    केशव थोड़ा सीधा होकर बैठ गया, “कॉलेज? अब? पापा जी तो उसकी शादी की बात कर रहे हैं। तू जानती है न?”

    गौरी ने गहरी साँस ली, “जानती हूँ। पर वो सिर्फ़ दो साल की पढ़ाई चाहती है... फॉर्म भी भर दिया था उसने हॉस्टल का… पढ़ाई में भी अच्छी है... और आप जानते हो न, उसमें काबिलियत है...”

    केशव कुछ पल चुप रहा, फिर बोला, “तेरा कहना सही है, पर मम्मी-पापा मानेंगे नहीं। तू जानती है उनके लिए लड़की की पढ़ाई से ज़्यादा ज़रूरी है घर की इज़्ज़त।”

    “और लड़की की मर्ज़ी? उसकी ख्वाहिशें?” गौरी ने शांत पर मजबूत स्वर में पूछा।

    केशव कुछ सोचने लगा। “तू चाहती है मैं मम्मी से बात करूँ?”

    “नहीं,” वो बोली, “फिलहाल नहीं। मैं बस इतना चाहती हूँ कि आप उसका साथ दो... ताकि जब मैं बात करूँ, तो मुझे लगे कि कोई है जो मेरी बात का वज़न बढ़ा रहा है।”

    केशव ने गौरी की आँखों में देखा—वो सिर्फ़ निष्ठा के लिए नहीं, अपने अधूरे सपनों के लिए लड़ रही थी।

    "ठीक है," केशव ने धीरे से कहा, "मैं तेरे साथ हूँ। तू बात कर, और जब ज़रूरत हो, मैं बोल दूँगा।"

    गौरी की आँखों में राहत थी।

    लेकिन उन्हें नहीं पता था कि दरवाज़े के बाहर कोई था—एक परछाई। पापा जी।

    वो पानी पीने उठी थे और गलती से उनकी बातों की झलक सुन ली थी।

    अगली सुबह।

    भोजनकक्ष में सब बैठे थे। नाश्ते की थाली में पराठे थे और हल्की चाय की खुशबू।
    निष्ठा थाली सजा रही थी कि पापा जी की कड़क आवाज़ गूंजी—

    “बहुत सपने आ रहे हैं इन दिनों... कॉलेज जाने के भी, और पढ़ने-लिखने के भी।”

    निष्ठा का हाथ रुक गया। उसके चेहरे पर डर साफ़ था।

    पापा जी ने सीधा गौरी की तरफ देखा, “बहू, यही सिखाया है तुमने उसे? कि घर के बड़े जो तय करें, उसके खिलाफ़ चलो?”

    गौरी कुछ कहने ही वाली थी कि केशव बोल पड़ा—

    “पापा, निष्ठा बस पढ़ाई करना चाहती है। कोई ग़लत बात तो नहीं माँग रही।”


    पापा जी की भौंहें तन गईं, “और घर की मर्यादा? रिश्तेदार क्या कहेंगे कि जवान लड़की को पढ़ाई के बहाने हॉस्टल भेज दिया?”

    अभी बहस गर्म ही हो रही थी कि मम्मी जी की आवाज़ भी गूंज पड़ी—

    “हॉस्टल?” उन्होंने चौंकते हुए कहा, “मतलब पहले से ही सब तय हो चुका है? हमसे छुपाकर?”

    उनकी आँखों में हैरानी नहीं, गुस्सा था। “गौरी, तूने ही भड़काया है न उसे? बहू बनकर घर आई है या क्रांति की मशाल लेकर?”

    गौरी चुपचाप सिर झुकाए खड़ी रही ।

    “और तुम,” मम्मी जी ने केशव की तरफ देखा, “तू भी अब अपनी बीवी के पीछे-पीछे चल रहा है? एक लड़की की पढ़ाई के लिए माँ-बाप की बात को यूँ रौंद देगा?”

    पापा जी फिर बोले, “इस घर में कभी कोई लड़की कॉलेज नहीं गई। हमारे उसूल नहीं बदलेंगे किसी की जिद पर।”

    कुछ पल तक सन्नाटा पसरा रहा। केवल निष्ठा की साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

    केशव ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, पर गौरी ने उसका हाथ पकड़कर इशारे से रोक दिया।

    मम्मी जी और पापा जी की आँखों में गुस्से की ज्वाला थी, और कोई भी जवाब अब उन्हें शांत नहीं कर सकता था।

    गौरी और केशव दोनों ने चुप्पी साध ली।

    और फिर...

    निष्ठा थाली वहीं छोड़कर तेज़ी से बाहर भागी।

    कपड़ों की सरसराहट, चूड़ियों की खनक, और पैरों की आवाज़ों के बीच वो सीढ़ियाँ चढ़ती गई... तेज़... बिना पीछे देखे।

    छत पर पहुँची तो फुसफुसाती हवा और सूरज की तपन ने उसका स्वागत किया।

    उसने छत के कोने में जाकर खुद को समेट लिया। आँखों से बहते आँसू अब रोकना मुश्किल था।

    उसके भीतर फिर से वही सवाल गूंजने लगे—

    “क्या पढ़ाई करना वाकई इतना बड़ा जुर्म है...?”

    “क्या मैं सिर्फ़ किसी की बहू बनने के लिए पैदा हुई हूँ…?”

    उसी वक़्त नीचे से भाभी की आवाज़ आई—

    “निष्ठा...! सुन... रुक ज़रा...!”

    लेकिन निष्ठा ने जवाब नहीं दिया।

    छत की एक कोने में बैठी वो आसमान की ओर देखती रही—उस खुले नीले आकाश की तरफ, जहां शायद उसका सपना अब भी आज़ाद उड़ रहा था… लेकिन परों में फिर से चोट लग चुकी थी।


    क्रमशः




    आगे क्या होगा, ये जानने के लिए बस पढ़ते रहिए.... और साथ ही समीक्षा भी करें।