ये कहानी है शिवांगी और अभिनव की। दो दिल... जो एक वक़्त पर एक-दूसरे के लिए धड़कते थे। दोस्ती से शुरू हुई उनकी कहानी कब गहराई से भरे प्यार में बदल गई, उन्हें खुद भी पता नहीं चला। लेकिन जैसे ही प्यार ने अपनी जड़ें मजबूत कीं, ज़िंदगी ने एक ऐसा मोड़ लि... ये कहानी है शिवांगी और अभिनव की। दो दिल... जो एक वक़्त पर एक-दूसरे के लिए धड़कते थे। दोस्ती से शुरू हुई उनकी कहानी कब गहराई से भरे प्यार में बदल गई, उन्हें खुद भी पता नहीं चला। लेकिन जैसे ही प्यार ने अपनी जड़ें मजबूत कीं, ज़िंदगी ने एक ऐसा मोड़ लिया कि उनकी राहें जुदा हो गईं। पर क्या दिल से निभाए गए रिश्ते इतनी आसानी से खत्म हो जाते हैं? वक़्त बीता, ज़ख्म भरने लगे... पर दिल के किसी कोने में वो अधूरा अहसास जिंदा रहा। और फिर... किस्मत ने उन्हें दोबारा आमने-सामने ला खड़ा किया। अब जब दिल फिर से धड़कने लगे हैं, और आँखों में वही पुराना प्यार झलकने लगा है... तो क्या ये मुलाक़ात एक दूसरा मौका है? क्या उनके बीच की खामोशी फिर से बातों में बदल सकेगी? क्या पुराने घाव भरकर एक नई शुरुआत मुमकिन है?
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उत्तराखंड, नैनीताल
"राय निवास" के साइन बोर्ड के पीछे ब्लैक गेट से दाखिल होते ही एक छोटा-सा गार्डन नज़र आया, जहाँ रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियाँ और झूला डाला एक पेड़ खड़ा था। सफेद मार्बल से बना एक मंजिला मकान अपनी सादगी में भी खासा आकर्षक लग रहा था। नवंबर की ठंड और कोहरे की चादर में लिपटा यह घर किसी पोस्टकार्ड की तरह दिखता था।
अंदर लिविंग रूम था—सोफा, काँच की टेबल, और दीवार पर टंगी फैमिली फोटो के साथ। बाईं ओर ओपन किचन और दाईं ओर तीन कमरे थे। पीछे एक छोटा लॉन था, जहाँ दो कुर्सियाँ और एक टेबल रखी थीं।
दाएँ कोने का कमरा हल्की रौशनी में डूबा हुआ था। सिंगल बेड, किताबों की रैक, लकड़ी की अलमारी और बालकनी से खुलता नज़ारा—सब कुछ सलीके से सजा था। स्टडी टेबल पर लैपटॉप और फाइलें थीं, जैसे वह कमरा वहाँ रहने वाले के शांत, व्यवस्थित स्वभाव का आईना हो।
बेड पर ब्लैंकेट से लिपटी एक लड़की औंधे मुँह पड़ी हुई थी। उसका चेहरा पूरी तरह से तकिये में छिपा हुआ था।
घड़ी ने सुबह के छह बजाए। इसके साथ ही उस लड़की के शरीर में हलचल हुई और कुछ पल बाद वह अपने चेहरे पर बिखरे बालों को अपनी हथेलियों से पीछे करते हुए उठकर बैठ गई। उसने अपनी आँखें खोलीं और सौम्य सी मुस्कान लबों पर बिखेरते हुए खुद से ही बोली,
"Good morning जानेमन"
सांवली रंगत, गोल चेहरा, प्यारी-प्यारी बड़ी-बड़ी कत्थई आँखें, खड़ी छोटी सी नाक और लाइट ब्राउनिश कलर के मध्यम आकार के होंठ। सफ़ेद मोतियों से चमकते दाँत और मुस्कुराने से उसके दाहिने गाल पर पड़ता डिंपल, जो उसके प्यारे से चेहरे की खूबसूरती बढ़ा रहा था। दोनों तरफ से निकलती लटें उसके गालों पर झूल रही थीं और पीठ पर कमर तक आती चोटी लहरा रही थी।
आकर्षक फिगर, 5'5 के करीब हाइट। काफी अच्छी पर्सनैलिटी थी उसकी। लूज़ टीशर्ट और ट्राउज़र पहने वह कॉलेज गोइंग गर्ल की तरह काफी क्यूट सी लग रही थी।
कुछ सेकंड बाद उसने निगाहें बेड के साइड वाले टेबल की तरफ घुमा दीं, शायद वहाँ रखी टेबल क्लॉक में टाइम देखना चाह रही थी, पर तभी उसकी निगाहें वहाँ रखे फोटो फ्रेम पर पड़ीं। उसकी मुस्कान कुछ फीकी सी पड़ गई। मुस्कुराती आँखों में अजीब सा खालीपन उतर आया। उसने आगे बढ़कर उस फोटो को टेबल पर लिटा दिया। अगले ही पल वह तेज आवाज़ में चीख पड़ी—
"काकी!"
उसके चिल्लाने के कुछ ही देर बाद एक अधेड़ उम्र की महिला तेज कदमों से चलते हुए वहाँ पहुँची और बदहवास सी बोली—
"हाँ बेटे, क्या हुआ? सुबह-सुबह ऐसे क्यों चीखी आप? हमारा कलेजा मुँह को आ गया था।"
वह आंटी काफी घबराई हुई सी लग रही थी। लड़की की नज़र जैसे ही उनके घबराए हुए चेहरे पर पड़ी, उसने खुद को थोड़ा शांत किया। फिर टेबल पर रखी उस तस्वीर को घूरते हुए बोली—
"काकी, मैंने आपको कितनी बार कहा है कि इस फोटो को यहाँ न रखा करे, फिर क्यों आप मेरी सुबह खराब कर देती हैं इस तस्वीर को दिखाकर?"
काकी, जिनका नाम रानो था, वह पहले उस लड़की (जिससे अभी-अभी आपका परिचय करवाया गया है) के घर पर काम करती थी और पिछले कुछ सालों से यहाँ इस लड़की के साथ रह रही थी। उन्हें उसके गुस्से की वजह समझ आई। उन्होंने गहरी साँस छोड़ी, फिर आकर उस फोटो को वापस सीधा करते हुए बोली—
"इतनी अच्छी तस्वीर है, कितने अच्छे लगते हैं आप दोनों साथ में, इसलिए हमने इस फोटो को यहाँ रख दिया। पर आप इतना नाराज़ क्यों होती हैं इस फोटो को देखकर?"
लड़की ने उनका सवाल सुना तो बेबसी से सर्द साँस छोड़ते हुए बोली—
"नाराज़ नहीं होती काकी। बस अतीत के उन पन्नों को खोलना नहीं चाहती जो लबों पर मुस्कान के साथ आँखों में आँसुओं की वजह बन जाएँ। किसी से कोई शिकायत नहीं मुझे, पर फिर से उस वक़्त को याद भी नहीं करना चाहती।
कुछ बातें हमारे दिल के किसी कोने में खूबसूरत याद बनकर रह जाती हैं, यही उनकी नियति होती है, उन्हें याद ही रहने देना चाहिए, बार-बार सामने लाने पर उनकी खूबसूरती कम हो जाती है और मैं नहीं चाहती कि उस वक़्त की यादों पर नफ़रत या कड़वाहट की चादर चढ़े।"
उसकी आँखों में दर्द उभर आया था जिससे वह सालों बाद भी उबर नहीं सकी थी। काकी अब उसके पास आकर बैठ गई और प्यार से उसके सर पर हाथ फेरते हुए बोली—
"आज भी आप उनसे इतना प्रेम करती हैं तो उनसे अलग क्यों हुईं बेटा?"
उनका सवाल सुनकर अब उस लड़की के लबों पर व्यंग्य भरी मुस्कान फैल गई। अगले ही पल उसने संजीदगी से जवाब दिया—
"काकी, जब दिलों में दूरियाँ आने लगे तो रिश्तों में दूरियों को जगह दे देनी चाहिए। जब किसी की नज़रों में आपकी अहमियत खत्म हो जाए तो उसके पीछे भागना बंद कर देने में ही समझदारी है।
हाँ, मैं शायद अब भी उसके लिए कुछ महसूस करती हूँ और शायद यह एहसास ज़िन्दगी भर मेरा साथ नहीं छोड़ेगा क्योंकि वह वक़्त जो मैंने उसके साथ बिताया वह मेरी ज़िंदगी के बेहतरीन वक़्त में से था जिसे मैं कभी भूल ही नहीं सकती, पर उस प्यार से बढ़कर मेरे लिए मेरी सेल्फ रिस्पेक्ट है।
जिसकी ज़िंदगी में मेरा कोई वजूद नहीं, मैं उसकी ज़िंदगी में कभी रहना नहीं चाहूँगी। मेरी सेल्फ रिस्पेक्ट मेरी पहली मोहब्बत है जिसके साथ न मैंने कभी समझौता किया है और न ही आगे करूँगी।"
"बेटा, आपकी ये गहरी-गहरी बातें हमारे समझ से बाहर हैं।"
काकी कुछ परेशान नज़र आने लगीं। लड़की ने सर घुमाकर उन्हें देखा और मुस्कुराकर बोली—
"आप बस इतना समझ लीजिए कि वह रिश्ता आपकी बेटी के पाँवों की बेड़ियाँ बन गया था इसलिए मैंने उन्हें तोड़कर खुद को आज़ाद कर दिया। वैसे भी आगे चलकर हम एक-दूसरे से लड़ते-झगड़ते, एक-दूसरे को कोसते, जो खूबसूरत यादें हमारे रिश्ते की पहचान थीं वह दर्द देने वाली यादें बनतीं और दिल में जो मोहब्बत थी वह नफ़रत में बदल जाती।
एक-दूसरे के लिए मन में कड़वाहट, नफ़रत और बैर लेकर रिश्ता तोड़ते, इससे बेहतर था कि वक़्त रहते आपसी सहमति से हम अलग हो गए। भले हम आज साथ नहीं, पर हमारा जो रिश्ता था, उसकी खूबसूरती आज भी बरकरार है और आगे भी रहेगी।"
काकी अब भी कुछ परेशान सी उसे देखे जा रही थीं, शायद उसकी उस मुस्कान के पीछे की उदासी देख पा रही थीं वह और देखती भी क्यों न? बचपन से उन्होंने ही तो उसे पाला था। उससे खून का रिश्ता नहीं था उनका, पर दर्जा माँ के बराबर ही मिला था उन्हें।
काकी को परेशान देखकर वह लड़की उनसे लिपट गई और सर उठाकर उन्हें देखते हुए मुस्कुराकर बोली—
"मेरी प्यारी काकी, इतना परेशान मत हुआ कीजिये, वरना आपके इस खूबसूरत से चेहरे पर झुर्रियाँ आ जाएँगी, फिर कोई लड़का आपको नहीं देखेगा।"
"धत्त पगली, कैसी बातें करती है अपनी काकी से।"
काकी ने झेंपते हुए उसके गाल पर चपत लगाई। लड़की तो शर्म से गुलाबी होते उनके गाल देखकर खिलखिलाकर हँस पड़ी—
"आए हाए, चेहरा तो देखो कैसे शर्म से गुलाबी हुआ जा रहा है... क्या बात है काकी, कहीं मेरे लिए कोई काका तो पसंद नहीं कर लिया आपने यहाँ?"
लड़की ने भौंह उचकाकर शरारती मुस्कान के साथ उन्हें देखा। छेड़ रही थी वह उन्हें। काकी ने गुस्से में उसके कान पकड़कर मरोड़ दिया—
"हमसे मशकरी करती है, बहुत शैतान होती जा रही है आप। सुधर जाइये, वरना हम आपकी शिकायत आपके पापा से कर देंगे।"
एक बार फिर लड़की के चेहरे पर उदासी के बादल घिर आए, उसने खोए हुए स्वर में कहा—
"उनके पास वक़्त ही कहाँ है मेरी शिकायतें सुनने का? न पहले था, न आज है और शायद कभी होगा भी नहीं।"
काकी ने उसके कान छोड़ दिए और उदास लहज़े में बोली—
"ऐसे नहीं कहते बच्चे, वो आपसे बहुत प्यार करते हैं।"
"वो कितना प्यार करते हैं यह तो आप भी जानती हैं काकी। उन्हें कभी से बेटी चाहिए ही नहीं थी, बेटा चाहते थे वे और हुई मैं... एक पल को बेटी तो फिर भी बर्दाश्त कर जाते, बशर्ते वह सुंदर होती, मेरी तरह साँवली न होती।"
लड़की के चेहरे पर गहरी उदासी छा गई। काकी भी कुछ पल मौन रह गईं, शायद वह समझ नहीं सकी थीं कि क्या जवाब दें? शब्दों के जाल में उलझकर रह गई थीं वे।
लड़की कुछ पल अतीत की यादों में खो गई, पर उसने जल्दी ही खुद को संभाला और काकी को देखकर बड़ी सी मुस्कान अपने होंठों पर सजा ली—
"काकी, कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि अगर आप न होतीं तो मेरा क्या होता? मैं तो वहाँ भी अकेली पड़ जाती और यहाँ तो अकेले मेरा गुजारा ही नहीं होता। अकेले रहने से खौफ आता है मुझे, अगर आपने मेरे साथ यहाँ आने के लिए हाँ न की होती तो मैं कैसे इस अनजान जगह पर अकेले रह पाती?"
"हम खुद नहीं आई थीं बेटा। आपके मम्मी-पापा ने हमें आपके साथ भेजा था क्योंकि उन्हें चिंता थी आपकी कि आप इतनी दूर अकेले कैसे रह सकेंगी? हम मानते हैं शायद उन्होंने पहले कई गलतियाँ की होंगी, पर वे आपसे प्यार भी बहुत करते हैं।
आप उनकी पहली औलाद हैं, वे कैसे नहीं चाहेंगे आपको? वहाँ सब आपसे बहुत प्यार करते हैं, पर आप यहाँ आ गईं उन सबसे दूर और कहीं न कहीं उनकी कमी को आप भी महसूस करती हैं, फिर क्यों आप उनसे इतने दूर रहकर उन्हें और खुद को तकलीफ दे रही हैं?"
"तकलीफ कहाँ दे रही हूँ काकी, बल्कि उन्हें और खुद को तकलीफ से बचाने की कोशिश कर रही हूँ। अगर उनके साथ रहती तो साथ होते हुए उनसे दूर हो जाती। मन में अभी भी कहीं जो उनके लिए थोड़ा प्यार और इज़्ज़त है वह भी खत्म हो जाता। पास रहकर रिश्तों में कड़वाहट घुलती, इससे बेहतर तो दूर रहकर रिश्तों की मिठास को बरकरार रखना हुआ न?"
"चलिए हम मानते हैं आपकी बात। ज़्यादा नहीं समझ पाते आपकी इन गहरी बातों को, फिर भी समझते हैं कि आप ठीक कह रही हैं। बस आपकी नाराज़गी आपके मम्मी-पापा से है न? फिर अपने भाई-बहन और दादा-दादी को किस बात की सज़ा दे रही हैं आप? वे तो आपको बहुत चाहते हैं।"
"हाँ, चाहते तो हैं। इस बात से तो मैंने कभी इनकार ही नहीं किया, पर जितना वे मुझे चाहते हैं उससे कहीं गुना ज़्यादा शिद्दत से वे मुझे उस घर से भगाना चाहते हैं, इसलिए मैं खुद ही भाग आई।"
उस लड़की के लबों पर मुस्कान खिल गई। काकी ने तुरंत ही उसे टोकते हुए कहा—
"उसे भगाना नहीं कहते बेटा। वे अपने जीते जी आपका घर बसते देखना चाहते हैं तो इसमें क्या गलत चाहते हैं वे?"
"वे गलत नहीं चाहते, बस गलत इंसान से उम्मीदें लगा ली हैं उन्होंने। मैं अपनी इस बेपरवाह ज़िंदगी से बहुत खुश हूँ, मुझे नहीं पड़ना शादी के झमेले में। कोई मुझे जबरदस्ती शादी के लिए फ़ोर्स न कर सके, इसलिए तो मैं जानबूझकर सबसे दूर आ गई। अब आप इस टॉपिक को यहीं छोड़ दीजिए और मेरे लिए गरमा-गरम चाय लेकर पीछे लॉन में आ जाइए, साथ में चाय पियेंगे, तब तक मैं फ़्रेश हो जाती हूँ।"
वह तुरंत ही बेड से नीचे उतर गई और बाथरूम की तरफ दौड़ गई। पीछे से काकी ने उसे रोकते हुए कहा—
"शिवांगी बेटा सुनो तो..."
वह आगे कुछ कहती, उससे पहले ही शिवांगी ने बाथरूम में घुसते हुए उनकी बात काटते हुए मुस्कुराकर कहा—
"टाइम्स अप काकी। अब इस बारे में कोई बात नहीं होगी।"
शिवांगी ने झट से दरवाज़ा बन्द कर लिया। काकी कुछ कहना चाहती थीं पर उनकी बात पूरी ही न हो सकी। वे कुछ पल खामोशी से बाथरूम के बन्द दरवाज़े को देखती रहीं, फिर टेबल पर रखी फोटो को देखते हुए बोलीं—
"अगर आप उनकी ज़िंदगी से न गए होते तो आज हमारी बच्ची यूँ तन्हा न होती।"
एक शिकायत थी उनकी आँखों में। उन्होंने उस फोटो को उठाकर टेबल के ड्रॉवर में डाल दिया और वहाँ से चली गईं।
शिवांगी ने झट से दरवाज़ा बंद कर लिया। काकी कुछ कहना चाहती थीं, पर उनकी बात पूरी नहीं हो सकी। वे कुछ पल खामोशी से बाथरूम के बंद दरवाज़े को देखती रहीं। फिर टेबल पर रखी फ़ोटो को देखते हुए बोलीं, "अगर आप उनकी ज़िंदगी से न गए होते, तो आज हमारी बच्ची यूँ तन्हा न होती।"
एक शिकायत थी उनकी आँखों में। उन्होंने उस फ़ोटो को उठाकर टेबल के दराज़ में डाल दिया और वहाँ से चली गईं।
कुछ देर बाद दोनों पीछे के लॉन में बैठी थीं, इस सर्द मौसम में गरम चाय का लुत्फ़ उठा रही थीं। काकी परेशान निगाहों से शिवांगी को देख रही थीं। शिवांगी लबों पर गहरी मुस्कान सजाए वहाँ खिले फूलों और आकाश में उड़ते पंछियों को देख रही थी; जिनकी चहचहाहट उस शांत वातावरण को और भी दिलकश बना रही थी।
चाय ख़त्म होने पर काकी कप लेकर अंदर चली गईं। शिवांगी कुछ देर वहीं टहलती रही, फिर अंदर चली आई। उसने अपना लैपटॉप उठाया और बिस्तर पर बैठकर उसके कीपैड पर तेज़ी से उंगलियाँ चलाने लगी। आज ऑफ़िस में उसकी बहुत इम्पॉर्टेन्ट मीटिंग थी; उसकी प्रेज़ेन्टेशन पर ही वह अभी काम कर रही थी।
अपनी ग्रेजुएशन कम्पलीट करने के कुछ वक़्त बाद ही उसे यह जॉब मिल गई थी, और अब वह मार्केटिंग डिपार्टमेंट में काफ़ी अच्छे पोस्ट पर काम कर रही थी। पिछले पाँच सालों से वह यहीं थी। हमेशा से उसे ऐसी ही शांत जगह आना था। नेचर के प्रति उसका गहरा लगाव था, और यह एक बहुत बड़ी वजह थी कि उसने यहाँ की मल्टीनेशनल कंपनी में जॉब के लिए अप्लाई किया था, जो उसे उसकी काबिलियत के बल पर मिल भी गई थी।
शिवांगी कुछ देर काम करती रही। फिर उसने लैपटॉप बंद करके साइड में रखा और अपनी उंगलियों को चटकाते हुए गहरी साँस छोड़ते हुए बोली, "Gosh! फ़ाइनली प्रेज़ेन्टेशन बन गई।"
वह अब बिस्तर से नीचे उतर गई और अलमारी से अपने कपड़े निकालकर बाथरूम में घुस गई।
करीब 8 बजे के आसपास वह रेडी होकर अपने रूम से बाहर निकली। प्रिंटेड लॉन्ग कुर्ता, उसके नीचे व्हाइट लेगी और साइड में फ़ोल्ड करके डाला गया दुपट्टा। पीठ पर नागिन की तरह लहराती चोटी, बड़ी-बड़ी काजल से सजी आँखें, गुलाबी रंग में रंगे लब, कानों में मल्टीकलर के झुमके, दाएँ हाथ में बढ़िया सी घड़ी और पैरों में हल्की हील वाली सैंडल।
कमाल लग रही थी वह। उसके साँवले रंग को जहाँ उसकी कमी समझा जाता था, वहीं उसका साँवला रंग उसके व्यक्तित्व को उभार कर सामने ला रहा था। फ़ेशियल फ़ीचर कमाल के थे उसके, और फ़ॉर्मल लुक में तो वह और भी गज़ब लग रही थी।
शिवांगी लिविंग रूम में पहुँची तो काकी सोफ़े के सामने रखे टेबल पर उसके खाने की प्लेट रख रही थीं। शिवांगी आकर वहीं बैठ गई। अपना फ़ोन चेक करते हुए उसने अभी दो-चार निवाले खाए ही थे कि काकी, जो तब से उसे ही देख रही थीं, उसके हाथ से फ़ोन छीनते हुए बोलीं,
"दो घड़ी तो चैन से बैठकर खाना खा लिया कीजिए।"
शिवांगी ने निगाहें उठाकर उन्हें देखा और अपनी बत्तीसी चमकाते हुए आराम से बैठकर खाना खाने लगी। खाना खाने के बाद उसने हाथ धोया और उसे पोंछने के बाद उनके आगे अपना हाथ बढ़ा दिया। उसका इशारा समझते हुए काकी ने फ़ोन उसकी हथेली पर रखते हुए कहा,
"अगर वक़्त मिले तो घर पर फ़ोन करके बात कर लीजिएगा। तीन दिन से लगातार आपसे बात करने के लिए फ़ोन कर रही है आपकी मम्मी।"
"ओह! कभी मैं भी यूँ ही इंतज़ार किया करती थी उनका कि उनके पास कुछ वक़्त हो तो मेरी बात सुने; वक़्त कितनी जल्दी बदल गया ना काकी?"
शिवांगी ने व्यंग्यात्मक लहज़े में कहा, पर उसकी बात में एक दर्द और एक तड़प छुपी थी, जिसे काकी महसूस कर गई थीं। उन्होंने प्यार से उसके गाल को छूकर उसे समझाते हुए कहा,
"बेटा, ऐसे नहीं करते… वो माँ है आपकी… आप तो हमारी समझदार बेटी हैं ना?"
"हँ, समझदार तो हूँ, और उसका सारा क्रेडिट भी उन्हीं दो लोगों को जाता है जिन्होंने मुझे इस दुनिया में लाकर मुझ पर इतना बड़ा एहसान किया है जिसे मैं कभी नहीं चुका सकती… उनके वजह से मुझे वक़्त से पहले ही समझदार बनना पड़ा… खैर, छोड़िए, कहाँ पुरानी बातों में लग गए। अब तो वो भी खुश है कि उनके सर से यह बोझ उतर गया, और मैं भी अपनी ज़िंदगी में बहुत खुश हूँ।"
शिवांगी ने मुस्कुराकर बात टाल दी, पर उसकी आँखों में एक खालीपन पसर गया था। कुछ देर काकी खामोशी से उसे देखती रहीं, फिर गंभीरता से बोलीं, "तो आप उनसे बात नहीं करेंगी?"
शिवांगी ने उन्हें गंभीरता से देखा, तो बेफ़िक्री से मुस्कुराते हुए बोली, "वक़्त मिलेगा तो कर लूँगी, आप परेशान मत होइए। अब मुझे जाना होगा, आप अपना ध्यान रखिएगा। सारा दिन घर में बंद मत रहिएगा, इतनी अच्छी जगह है, और अब तो आपकी इतनी सारी सहेलियाँ भी बन गई हैं यहाँ, तो उनके साथ ज़रा घूमने-फिरने जाया कीजिए; यही तो उम्र है ज़िंदगी जीने की, उसके बाद बैसाखी लेकर चलेंगी तब थोड़े ही जा सकेंगी कहीं घूमने, तब तो आपको इस घर की चारदीवारी में ही कैद होकर रहना पड़ेगा।"
शिवांगी ने फिर से उनके साथ मज़ाक किया, तो काकी उसे गुस्से से घूरते हुए बोलीं, "हमारी उम्र है अभी घूमने-फिरने की? यह सब तो आपको करना चाहिए, और आप हमें कह रही हैं?"
शिवांगी अब उनके गाल खींचते हुए मुस्कुराकर बोली, "ओफ्फो काकी! आप न बड़ी भोली हैं, कुछ समझती ही नहीं। मेरी उम्र तो अभी काम करने की है, जब मेरे बाल सफ़ेद हो जाएँगे, तब कहाँ कोई मुझे काम देगा; घूमने-फिरने की उम्र तो आपकी है। सारी ज़िंदगी आपने काम कर-करके बिता दी, अब निश्चिंत होकर ज़िंदगी एन्जॉय कीजिए; क्या पता ऐसा मौका दोबारा मिले न मिले।"
काकी ने अपने गाल पर से उसके हाथ को हटा दिया, "हमें ऐसा कोई मौका चाहिए भी नहीं। हमें जितनी ज़िंदगी जीनी थी हमने जी ली, अब तो बस हम आपको खुश देखना चाहते हैं।"
"मैं तो खुश हूँ," शिवांगी ने मुस्कुराकर जवाब दिया। काकी आगे कुछ कहने ही वाली थीं कि शिवांगी ने अपना पर्स और लैपटॉप वाला बैग उठाया और उनके गले से जा लगी।
"बाकी बातें लौटने के बाद करूँगी। अभी मुझे देर हो रही है… बाय! अपना ध्यान रखिएगा और मुझे ज़्यादा मिस मत कीजिएगा… Love you."
शिवांगी ने उनसे दूर हटकर जाते हुए हाथ हिलाकर उन्हें बाय किया, फिर फ़्लाइंग किस देते हुए घर से बाहर निकल गई। गार्डन में एक तरफ़ बने शेड के नीचे खड़ी अपनी बाइक स्टार्ट करके वह तेज़ी से वहाँ से निकल गई।
दिल्ली, सागरपुर
"चौधरी निवास"—50 गज़ में बना चार मंज़िला घर, जिसकी नेम प्लेट पर सुनहरे अक्षरों में लिखा नाम दूर से ही ध्यान खींच लेता था। गेट के अंदर कदम रखते ही एक बड़ा-सा आँगन सामने था; बीच में तुलसी का पौधा और उसके सामने खड़ी एक महिला, सादगी और गरिमा का मेल। सिंपल सी साड़ी, सोलह श्रृंगार और चेहरे पर हल्की मुस्कान—ये थीं संध्या चौधरी, इस घर की मालकिन।
दाईं तरफ बैठक, बाईं ओर डाइनिंग एरिया, और पर्दों से ढका ओपन किचन था। नीचे एक कमरा और पीछे बरामदा था। ऊपर की दो मंज़िलों पर चार कमरे थे, हर एक से जुड़ी बालकनी थी। सबसे ऊपर छत थी—गमलों और कुर्सियों से सजी हुई। वहीं एक कोने में चेयर पर बैठे थे सुरेश चौधरी—करीब 50 साल के, गंभीर चेहरे के साथ अख़बार में खोए हुए।
संध्या जी ने तुलसी की पूजा की और पूजा की थाल हॉल में ही बने मंदिर में रखने के बाद किचन में चली गईं।
अभी वे चाय बनाकर सबके लिए चाय छान ही रही थीं कि एक सख़्त आवाज़ उनके कानों तक पहुँची।
"संध्या जी, हमारी चाय कितनी देर में आएगी?"
आवाज़ सुनते ही संध्या जी ने तुरंत ही चाय के कप ट्रे में रखे और बाहर आते हुए बोलीं, "जी, बस अभी लाती हूँ।"
इतना कहकर वे हॉल से गुज़रते हुए सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ ही रही थीं कि घर के दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी। उन्होंने बेबसी से गेट की तरफ़ देखा, फिर ट्रे वहीं टेबल पर रखकर गेट खोलने चली गईं।
गेट खोलकर जैसे ही उन्होंने सामने खड़े लड़के को देखा, जिसकी उम्र लगभग 24-25 की लग रही थी, हाइट अच्छी थी, देखने में भी ठीक था, संध्या जी ने उस लड़के को देखा और मुस्कुराकर बोलीं, "अरे क्षितिज, बेटा, आज सुबह-सुबह यहाँ कैसे आना हुआ?"
"नमस्ते आंटी," क्षितिज ने बड़े ही अदब से हाथ जोड़कर उन्हें नमस्ते किया। बदले में संध्या जी ने भी प्यार से उसके सर पर हाथ फेर दिया।
क्षितिज की मुस्कान बड़ी हो गई। "आंटी, आज शाम को अभि चला जाएगा, मुझे दिन में उससे मिलने का मौका नहीं मिलता, इसलिए सुबह-सुबह ही चला आया।"
"अच्छा किया जो आ गए। जाओ, वो अभी अपने कमरे में ही है, उसे उठा देना, तब तक हम आप दोनों के लिए चाय बनाकर लेकर आते हैं।"
क्षितिज ने हामी भरी और मुस्कुराकर सीढ़ियों पर दौड़ते हुए ऊपर वाले फ़्लोर पर सबसे कोने में बने कमरे की तरफ़ चला गया।
संध्या जी चाय लेकर पहले नीचे बने कमरे में चली गईं। वहाँ कुर्सी पर एक बुज़ुर्ग औरत बैठी जाप कर रही थी। संध्या जी ने उन्हें डिस्टर्ब न करते हुए चाय का कप उनके सामने लगे टेबल पर रख दिया और रूम से बाहर निकल गईं।
ये श्रीमती कौशल चौधरी थीं, उनकी सास।
संध्या जी कमरे से बाहर आईं और सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ ही रही थीं कि सीढ़ियों से नीचे उतरती लड़की पर उनकी नज़र पड़ी।
लड़की ने उन्हें देखा और उनके पास आते हुए मुस्कुराकर बोली, "गुड मॉर्निंग, मम्मा।"
"गुड मॉर्निंग, बेटा। आज आपने आने में देर कर दी। आपके पापा कब से चाय का इंतज़ार कर रहे हैं।"
"सॉरी माँ, रात को देर तक पढ़ रही थी, तो नींद ही नहीं खुली।"
लड़की ने अपना सर झुकाते हुए सफ़ाई पेश की। उसकी बात सुनकर संध्या जी के लबों पर मुस्कान खेल गई। उन्होंने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा, "कोई बात नहीं, बेटा। अब आप आ गई हैं तो ये चाय अपने पापा को दे आइए, हम क्षितिज और अभि के लिए चाय बना देते हैं।"
उन्होंने चाय की ट्रे उस लड़की, मतलब मिस अंजली की तरफ़ बढ़ाते हुए अपनी बात पूरी की। उनकी बात ख़त्म होते ही अंजली ने चमकती आँखों से उन्हें देखा और चहकते हुए बोली, "माँ, क्षितिज भैया आए हैं?"
"हाँ, आए हैं, पर पहले आप अपने पापा को चाय देकर आइए, उसके बाद अपने क्षितिज भैया से मिल लीजिएगा।"
संध्या जी की बात सुनकर अंजली ने झट से हामी भरी और ट्रे लेकर सीढ़ियों से ऊपर भाग गई। संध्या जी ने जाती हुई अंजली को देखा और मुस्कुराकर बोलीं,
"बीस साल की हो गई है, पर बचपना अब भी नहीं गया इनका; अच्छा ही है, कम से कम इनकी चंचलता के वजह से घर में कुछ रौनक तो रहती है।"
वो मुस्कुराकर किचन में चली गईं। अंजली दौड़ते हुए छत पर पहुँची, पर जैसे ही उसकी नज़र सामने बैठे सुरेश जी पर पड़ी, उसके क़दम ठिठक गए। चेहरे पर से मुस्कान एक झटके में गायब हो गई। उसने अपना सर झुका लिया और धीमे क़दमों से उनके तरफ़ बढ़ गई।
"पापा, आपकी चाय," अंजली की आवाज़ सुनकर सुरेश जी ने निगाहें उठाकर पहले एक नज़र उसके गंभीर चेहरे को देखा, फिर चाय का कप लेते हुए बोला,
"जब यहाँ आई थी तो बहुत खुश थी, और हमारे सामने आते ही आपकी मुस्कराहट गायब हो गई, ऐसा क्यों, बेटा?"
सुरेश जी की बात सुनकर अंजली ने तुरंत ही सर उठाकर उन्हें देखते हुए कहा, "नहीं पापा, वो आज मुझे देर हो गई ना, तो मुझे लगा कि आप नाराज़ होंगे। बस इसलिए…"
बोलते-बोलते वो चुप हो गई, शायद समझ नहीं सकी कि आगे क्या कहे। सुरेश जी ने भी कुछ ख़ास प्रतिक्रिया नहीं दी और चाय पीने लगे। अंजली वहीं ट्रे पकड़े खड़ी रही, पर मन ही मन वो जल्दी से यहाँ से जाना चाहती थी। उसकी बेचैनी समझते हुए कुछ देर बाद सुरेश जी ने निगाहें उठाकर उसे देखते हुए कहा,
"अगर आपको कहीं जाना है तो जा सकती है।"
अंजली ने तुरंत ही इनकार में सर हिलाया, "नहीं पापा, कहीं जाना नहीं है। वो क्षितिज भैया आए हैं ना, बस उनसे मिलना है, बाद में मिल लूँगी।"
"क्षितिज आया है?"
"जी," अंजली ने तुरंत ही हामी भर दी। आगे ना ही सुरेश जी ने कुछ कहा और ना ही अंजली ने ही कुछ कहा। उनकी चाय ख़त्म हुई तो अंजली खाली कप वापस ट्रे में रखकर नीचे चली गई।
इतने में संध्या जी ने दोबारा चाय बना ली थी। उन्होंने दो कप चाय और एक प्लेट में स्नैक्स डालकर उसको अपने बेटे अभि के कमरे में भेज दिया, जहाँ इस वक़्त क्षितिज भी था।
क्षितिज धीरे से कमरे में दाखिल हुआ। कमरा अंधेरे में डूबा था, जैसे हर दीवार चुपचाप कुछ कह रही हो। उसने स्विच ऑन किया—हल्की पीली रौशनी पूरे कमरे में फैल गई।
कमरा बड़ा और सलीके से सजा था। दीवार से सटा डबल बेड था, उसके पीछे कुछ फैमिली फ़्रेम्स और एक लड़के की तन्हा तस्वीरें लगी थीं। वही चेहरा इस वक़्त उसी बेड पर औंधे मुँह पड़ा था—अभिनव।
गोरा, तीखे नैन-नक्श, हल्की बिखरी हुई सिल्की बालों की लटें उसके माथे पर थीं। चेहरे पर गहरी नींद थी, लेकिन उसके शांत लुक में भी एक अजीब सी थकावट और बेचैनी छिपी थी, जैसे कुछ टूटा हुआ अब भी अंदर जिंदा हो।
बेड के दोनों तरफ़ टेबल्स थीं—एक पर टेबल लैम्प, दूसरे पर बिखरे पेपर्स। सामने की ओर ड्रेसिंग टेबल, अलमारी और एक आरामदेह काउच था। बालकनी से आती ठंडी हवा खामोशी को और गहरा बना रही थी।
क्षितिज बेड की तरफ़ बढ़ गया और अभिनव को हिलाते हुए बोला,
"अभि, उठ जा यार, कितना सोएगा? … अभि, wake up यार… यहाँ मैं सुबह-सुबह उठकर तुझसे मिलने आया हूँ, और तू घोड़े बेचकर सोने में लगा है… ये कोई बात होती है भला?… उठ जा यार…"
क्षितिज अभिनव को उठाने में लगा था, और अभिनव, जो गहरी नींद में सोया हुआ था, उसके उठाने पर नींद में ही चिल्लाने लगा,
"क्या है यार, सोने दे ना?… खुद तो सोता नहीं, और यहाँ मेरी नींद भी बर्बाद करने चला आया… जा यार, अभी मुझे नहीं मिलना किसी से… सोने दे मुझे।"
अभिनव की बात सुनकर क्षितिज चिढ़ गया और उसे झाँकझोरते हुए बोला,
"कमीने, तुझे बस सोने की पड़ी है… तू आज चला जाएगा; मुझे सारे दिन वक़्त नहीं मिल सकेगा, इसलिए मैं तुझसे मिलने आया हूँ, पर तू अपने यार के लिए एक दिन अपनी नींद को नहीं छोड़ सकता?"
क्षितिज मानने को तैयार नहीं था और उसके पीछे ही पड़ गया था। आखिर में अभिनव ने हार मान ली और उठकर बैठ गया,
"बहुत बुरा है यार। एक तो आधी रात के बाद नींद आई, उस पर भी तू सुबह-सुबह मेरी नींद बर्बाद करने चला आया।"
"अच्छा, आधी रात तक जागकर क्या कर रहा था तू जो आधी रात के बाद सोया? किसके ख़यालों में खोया हुआ था?"
क्षितिज दाई आँख दबाते हुए शरारत से मुस्कुरा उठा। वह अभिनव को टीज़ कर रहा था। उसका सवाल सुनकर अभिनव सच में अपने ख़यालों में खोने लगा था, पर जल्दी ही उसने खुद को संभाला और क्षितिज को घूरते हुए बोला,
"बकवास मत कर, मैं किसके ख़यालों में खोऊँगा जब मेरी ज़िंदगी में कोई है ही नहीं? मुझे बस ऐसे ही नींद नहीं आ रही थी।"
"अच्छा, ठीक है यार, मैं तो बस मज़ाक कर रहा था; इसमें इतना भड़काने वाली कौन सी बात है? तू तो मुझे ऐसे घूर रहा है जैसे कच्चा ही चबा जाएगा। दोबारा नहीं करूँगा ऐसा मज़ाक, अब घूरना तो बंद कर मुझे।"
अभिनव की घूरती काली-काली डरावनी आँखें देखकर क्षितिज ने डरने का नाटक किया। अभिनव ने उसकी नौटंकी देखकर खीझते हुए खुश, उस पर से अपनी निगाहें हटा लीं और साइड टेबल पर बिखरे पेपर्स को समेटने लगा।
क्षितिज ने तुरंत ही उसके हाथ से पेपर ले लिए और मुस्कुराकर बोला,
"ओह! तो हमारे मिर्ज़ा ग़ालिब साहब फिर से रात को कुछ लिखने की कोशिश कर रहे थे, तभी देर से सोए?"
उसने जैसे ही पेपर पढ़ने के लिए उन्हें देखा, तो सब खाली पेपर्स को देखकर हैरानी भरी निगाहें अभिनव की तरफ़ घुमा लीं, जो हाथ बाँधे उसे ही घूर रहा था।
"हो गया तेरा? पढ़ लिया? मिल गया सुकून तो अब मेरे पेपर्स मुझे वापस कर।"
अभिनव आँखें चढ़ाकर उसे घूरने लगा और अपना हाथ आगे बढ़ा दिया। क्षितिज ने उन खाली पेपर्स को वापस उसकी हथेली पर पटक दिया और मुँह फुलाकर बोला,
"कितना ख़डूस है तू… तभी तेरे कोई दोस्त नहीं हैं… मेरे अलावा तो तुझे कोई झेल ही नहीं सकता…"
अभिनव ने उसकी बातों पर पहले तो ध्यान नहीं दिया और उन खाली पेपर्स को टेबल पर ही रखे पैकेट में डालने लगा, पर जैसे ही क्षितिज के कहे आखिरी के शब्द उसके कानों में पड़े, उसके हाथ रुक गए, और कानों में किसी की मीठी सी आवाज़ गूंज उठी,
"मैं कह रही हूँ, जितने ख़डूस तुम हो ना, तुम्हें मेरे अलावा कोई झेल ही नहीं सकता। न तो कुछ बोलते हो और न ही हँसते-मुस्कुराते हो, एकदम किसी ख़डूस पुतले की तरह हर वक़्त मुँह फुलाए और आँखें चढ़ाए बैठे रहते हो… तुम्हारा ये रूड बिहेवियर देखकर ही कोई तुमसे दोस्ती नहीं करता। इस पत्थर दिल से दोस्ती करके तो मैं भी पछता रही हूँ।"
"अच्छा, तो क्यों हो मेरे साथ? छोड़ दो मुझे।"
"जिस दिन मैंने तुम्हें छोड़ दिया ना बेटा, उस दिन तुम्हें मेरी क़द्र पता लगेगी। बिल्कुल अकेले हो जाओगे तुम। याद रखना मेरी बात।"
"याद है मुझे आज भी तुम्हारी हर बात," अभिनव के मुँह से अचानक निकले शब्द सुनकर क्षितिज एकदम से चौंक गया। अभिनव तो शायद अतीत की यादों में खोया हुआ था; उसे एहसास ही नहीं हुआ कि वर्तमान अतीत से इतर है।
अभिनव ने, खोए हुए अभिनव को आँखें बड़ी-बड़ी करके देखते हुए, हैरानी से पूछा,
"क्या याद है तुझे? और ये अकेले-अकेले किससे बातें कर रहा है तू?"
क्षितिज की आवाज़ अभिनव के कानों में पड़ी तो वह एकदम से चौंकते हुए अपने ख़यालों से बाहर आया और खुद को संभालते हुए इनकार में सर हिला दिया।
"किसी से नहीं, तुझसे ही कह रहा हूँ कि इन पाँच सालों में तू जाने कितनी ही बार ये बात बोल चुका है। अब तो मुझे तेरी लाइनें भी याद हो गई हैं, और मैं जानता हूँ कि तेरे अलावा मुझे कोई और नहीं झेल सकता, इसलिए बार-बार एक ही बात मत दोहराया कर।"
अभिनव ने बड़ी ही आसानी से बात को संभाल लिया। क्षितिज ने मुँह बनाते हुए हामी भर दी और फिर उन खाली पेपर्स को देखते हुए बोला,
"ओये! एक बात तो बता, अगर तू रात को लिख नहीं रहा था, तो क्या कर रहा था?"
"कुछ ख़ास नहीं। लिखने की कोशिश कर रहा था, पर लिख नहीं सका।"
अभिनव ने पेपर्स के पैकेट को ड्रॉअर में डाल दिए और बेड से नीचे उतरते हुए बोला,
"तू रुक, मैं ज़रा फ़्रेश होकर आता हूँ।"
क्षितिज ने हाँ में सर हिला दिया तो अभिनव बाथरूम में चला गया।
जैसे ही अभिनव ने बाथरूम का दरवाज़ा बंद किया, कमरे का दरवाज़ा खुला और चहकती हुई अंजली ने कमरे में क़दम रखा। क्षितिज ने सर घुमाकर उसे देखा तो अंजली ने तुरंत ही मुस्कुराकर कहा,
"नमस्ते भैया।"
"नमस्ते… कैसी है तू? और पढ़ाई-वढ़ाई कैसी चल रही है?"
अंजली अब तक उसके पास आ गई थी। उसने एक ट्रे उसके सामने रखी और मुस्कुराकर उसके सवाल का जवाब दिया,
"मैं तो बहुत अच्छी हूँ, और पढ़ाई भी अच्छी चल रही है।"
"इस साल तुम्हारा पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा हो जाएगा ना?"
"जी।"
"तो आगे क्या सोचा है? और पढ़ना है? जॉब करना है या फिर शादी करके सेटल होना है?"
अंजली जो मुस्कुरा रही थी, शादी का नाम सुनते हुए उसका मुँह बन गया। उसने तुरंत ही इनकार में सर हिला दिया,
"मुझे कोई शादी-वादी नहीं करनी है भैया, मुझे तो प्रोफ़ेसर बनना है। वैसे भी अभी तक तो भैया की ही शादी नहीं हुई है, इतनी जल्दी मैं कहीं नहीं जाने वाली इस घर को छोड़कर।"
उसका चिढ़ा हुआ चेहरा देखकर क्षितिज ने प्यार से उसके गाल को छूकर कहा,
"अरे, नाराज़ क्यों हो गई? मैं कौन सा कल ही तुझे शादी करने को कह रहा हूँ। मैंने तो बस पूछा है तेरे फ़्यूचर प्लान के बारे में। अच्छा, चल ये बता कि शादी के नाम से चिढ़ने की कोई ख़ानदानी बीमारी है क्या तुम्हारे परिवार में सबको?"
"क्या मतलब? मैं कुछ समझी नहीं," अंजली असमंजस भरी निगाहों से उसे देखने लगी, क्योंकि क्षितिज का सवाल उसके सर के ऊपर से चला गया था।
क्षितिज ने बाथरूम के बंद दरवाज़े को देखा, फिर अंजली को देखकर धीमी आवाज़ में बोला,
"अरे, मैं ये पूछ रहा हूँ कि आखिर प्रॉब्लम क्या है तुम्हारे घर में सबको? तुझसे शादी का ज़िक्र किया तो तू चिढ़ गई, और अभि के सामने कभी गलती से शादी का ज़िक्र कर दो तो वो अलग ही भड़क जाता है। आखिर तुम सबको शादी से प्रॉब्लम क्या है?"
"भैया का तो मुझे नहीं पता कि शादी का ज़िक्र होते ही वो भड़क क्यों जाते हैं, आपके साथ ही नहीं, घर में सबके साथ भी उनका यही रवैया रहता है। जैसे ही उनकी शादी का ज़िक्र होता है, वो सब पर चिल्लाते हुए वहाँ से चले जाते हैं, हर बार यही कहते हैं कि उन्हें नहीं करनी शादी। पर मैं मेरा ज़रूर बता सकती हूँ।
मुझे ना भैया या पापा जैसा पति नहीं चाहिए। वो दोनों बुरे नहीं हैं, पर बहुत ख़डूस हैं, और मैं डरती हूँ कि कहीं मुझे ऐसा ही ख़डूस पति मिल गया तो मेरी ज़िंदगी भी माँ की तरह हो जाएगी। बस पति के गुस्से को संभालते रहो, और कहीं आगे चलकर बच्चा भैया जैसा हो गया तो दोनों ख़डूस आदमियों के बीच मैं तो बुरी तरह पिस जाऊँगी।
जैसे माँ बस पापा और भैया के बीच तालमेल ही बिठाती रहती है, वैसे ही मेरी सारी ज़िंदगी भी ऐसे ही गुज़र जाएगी, पर मुझे ऐसी ज़िंदगी नहीं चाहिए। मैं तो हमेशा ऐसी ही रहना चाहती हूँ। इसलिए मुझे शादी नहीं करनी।"
अंजली काफ़ी सीरियस लग रही थी। क्षितिज भी गंभीरता से उसकी बात सुन रहा था, पर जैसे ही अंजली ने अपनी बात कही, क्षितिज एकदम से पेट पकड़कर हँसने लगा।
पहले तो अंजली आँखें बड़ी-बड़ी करके हैरानी से उसे देखने लगी, फिर मुँह फुलाकर नाराज़गी से बोली,
"भैया, मैं आपको इतनी सीरियस बात बता रही हूँ और आप हँस रहे हैं।"
अंजली के फुले गाल देखकर क्षितिज ने अपनी हँसी को कंट्रोल किया और कान पकड़ते हुए बोला,
"अच्छा, सॉरी। जैसे तू अपने भाई और पापा की बात कर रही थी, मैं खुद को रोक नहीं पाया, पर तेरी इस प्रॉब्लम का एक ज़बरदस्त सोल्यूशन है मेरे पास। एक काम करेंगे, जब तेरे लिए लड़का देखेंगे तो मैं तेरे लिए लड़का पसंद करूँगा, क्योंकि अगर अंकल या अभि ने पसंद किया तो वो अपने जैसा ही लड़का ढूँढ़ेंगे तेरे लिए, इसलिए मैं अभि के साथ जाऊँगा और जैसा लड़का तुझे चाहिए, बिल्कुल वैसा ही लड़का ढूँढ़ूँगा तेरे लिए। अब तो तू खुश है?"
"येस, आई लव यू भैया… आप न बहुत-बहुत-बहुत अच्छे हैं… मैं आपको बहुत मिस करती हूँ। अभि भैया तो कभी मुझसे ठीक से बात ही नहीं करते, पर आप मुझे बहुत अच्छे लगते हैं, इसलिए थोड़ा जल्दी-जल्दी आया कीजिए मुझसे मिलने।"
"हम्म, कोशिश करूँगा।"
क्षितिज ने मुस्कुराकर हामी भर दी। जैसे ही वह चुप हुआ, वहाँ एक सख़्त आवाज़ गूंज उठी,
"आने की क्या ज़रूरत है? एक काम कर, तू यहीं रह जा; वैसे भी मुझसे ज़्यादा तो यहाँ के लोग तुझसे प्यार करते हैं। एक्चुअली तुझे ही यहाँ होना चाहिए, मैं इस घर के काबिल नहीं। यहाँ तेरी ही ज़रूरत है।"
अचानक आई ये आवाज़ सुनकर अंजली और क्षितिज दोनों ही चौंक गए। उन्होंने आवाज़ की तरफ़ निगाहें घुमाईं तो अभिनव बाथरूम के गेट पर खड़ा था, और शायद वह उनकी सारी बातें सुन चुका था।
अंजली ने तुरंत ही डर के अपना सर झुका लिया, वहीं क्षितिज ने हैरानी से बोला,
"ये क्या बोल रहा है तू? हम तो बस यूँ ही बात कर रहे थे; लगता है तूने गलत समझ लिया। हमारा ऐसा कोई मतलब नहीं था।"
अभिनव की बात सुनकर क्षितिज कुछ परेशान हो गया था। अभिनव ने उसके परेशान चेहरे को देखा, फिर उसके तरफ़ बढ़ते हुए आराम से बोला,
"तू इतना परेशान क्यों हो रहा है? मैं कोई ताने नहीं मार रहा और न ही नाराज़ हूँ, इसलिए ऐसा कह रहा हूँ। मैं जेन्युइनली कह रहा हूँ कि अगर तू इस घर का बेटा होता तो यहाँ से लोग ज़्यादा खुश होते।"
"पर हक़ीक़त ये है कि इस घर का बेटा तू है। इसलिए दोबारा अगर तूने ऐसी बकवास की तो मैं यहाँ आना बंद कर दूँगा।"
Coming soon…
"पर हकीकत ये है कि इस घर का बेटा तू है। इसलिए, दोबारा अगर तूने ऐसी बकवास की तो मैं यहां आना बंद कर दूंगा।"
क्षितिज ने हल्के गुस्से से अपनी बात कही थी। शायद अभिनव की बात से वह नाराज था। अभिनव उसे देखकर हौले से मुस्कुरा दिया था, पर कुछ नहीं कहा था। उसकी यह खामोशी क्षितिज को अजीब लगी थी, पर वह समझ नहीं सका था कि क्या कहे।
वहाँ अजीब सी खामोशी छा गई थी। जिसे अंजली ने तोड़ा था। वह बेड पर से उठकर खड़ी हो गई थी और अभिनव को देखकर सर झुकाते हुए बोली थी-
"सॉरी भैया।"
"सॉरी की ज़रूरत नहीं।" अभिनव ने उसके आगे कुछ कहने से पहले ही उसे रोक दिया था। अंजली अब कुछ कहने की हिम्मत नहीं कर सकी थी। कुछ सेकंड की खामोशी के बाद उसने निगाहें उठाकर उसे देखते हुए कहा था-
"भैया, माँ ने आपके और क्षितिज भैया के लिए चाय भेजी है। पी लीजिएगा।"
"मुझे नहीं पीनी, वापस ले जा।"
अभिनव के मना करने पर अंजली एक कप लेकर जाने लगी थी, पर क्षितिज ने उससे कप वापस ले लिया था और उसे जाने को कह दिया था। अंजली झट से वहाँ से भाग गई थी।
अंजली के वहाँ से जाते ही क्षितिज ने अभिनव का रुख करते हुए गुस्से से कहा था-
"चाहता क्या है तू? क्यों चौबीसों घंटे मुँह सड़ाए घूमता रहता है? ऐसी-ऐसी बातें करके क्यों दूसरों को तकलीफ पहुँचाता है? इतनी प्यारी बहन मिली है तुझे, थोड़ा प्यार से पेश नहीं आ सकता उसके साथ? आज तुझे अपने परिवार की कदर नहीं है, ना? देखियो, यहां से जाने के बाद तुझे इनकी अहमियत समझ आएगी। यहां सब तुझसे इतना प्यार करते हैं, पर तू अपनी अकड़ को साइड रखकर उनसे दो बोल प्यार से नहीं बोलता। पर जिस दिन तुझे ये लोग नहीं मिलेंगे, उस वक़्त तू तरसेगा उनके लिए, पर तब ये लोग नहीं होंगे तेरे पास।"
अभिनव ने उसकी बात पर कोई जवाब नहीं दिया था, पर आँखों में अजीब सा खालीपन नज़र आने लगा था। चेहरे पर अजीब सा दर्द और तड़प झलकने लगी थी। किसी बहुत खास को खोने का दर्द और तड़प।
अभिनव की खामोशी क्षितिज के गुस्से को बढ़ा रही थी, पर जब उसने उसके चेहरे और नम आँखों को देखा तो अपना सारा गुस्सा एक झटके में भूल गया था और चिंता भरे स्वर में बोला था-
"अभिनव, तू ऐसा क्यों है? कोई बात है ना जो तू मुझसे छुपा रहा है? अगर कोई प्रॉब्लम है तो तू मुझसे शेयर कर सकता है।"
"कोई प्रॉब्लम नहीं, तू ज़्यादा सोच रहा है। मैं बचपन से ऐसा ही हूँ। रिश्तों के काबिल नहीं, मैं। इसलिए तो रिश्ते छीन जाते हैं मुझसे। खैर, तू ये सब बातें छोड़ और चाय पी, ठंडी हो रही है।"
अभिनव ने बात का रुख ही बदल दिया था। क्षितिज समझ गया था कि अभिनव उस बात को अवॉइड कर रहा है, मतलब वह बात नहीं करना चाहता था, इसलिए उसने भी बात को वहीं छोड़ दिया था और टॉपिक बदलते हुए बोला था-
"शाम की फ़्लाइट है तेरी ना?"
"Hmm।"
"जॉइनिंग कब से है?"
"परसों से।"
"जाते ही जॉइन कर लेगा?" क्षितिज ने कुछ हैरानी से सवाल किया था, जिस पर अभिनव ने बिना किसी भाव के हामी भरते हुए कहा था- "हाँ, तो काम के लिए ही जा रहा हूँ तो छुट्टी मनाने का क्या मतलब?"
"तू और तेरी बातें! तू ना एक काम कर, अपने काम से ही शादी कर ले। तू भी सुखी रहेगा और तेरा काम भी तुझसे खुश रहेगा।"
क्षितिज ने उस पर तंज कसा था, पर अभिनव ने तो उलटा उसकी बात पर सहमति जताते हुए कहा था- "मैं तो कर लूँ, पर मेरे घर वाले मानें तब ना। मुझे तो कोई प्रॉब्लम नहीं है, वही ऐतराज़ जताएँगे।"
अभिनव का जवाब सुनकर क्षितिज ने बेबसी से अपना सर हिला दिया था, "तेरा कुछ नहीं हो सकता।"
अभिनव ने कुछ नहीं कहा था। क्षितिज ने चाय का कप उसे थमा दिया था। अभिनव ने बेमन से कुछ घूँट भरे थे और कप वापस ट्रे में रख दिया था।
"तू भी अपना ट्रांसफर वहीं करवा ले ना, साथ में रहेंगे, साथ में काम करेंगे।"
"Hmm, कोशिश करूँगा। अभी तो तू जा, फिर देखते हैं आगे क्या होता है। वैसे तेरी शाम की फ़्लाइट है तो सामान पैक कर लिया तूने?"
"नहीं, दोपहर में करूँगा।"
दोनों यूँ ही कुछ-कुछ बातें कर रहे थे, तभी बाहर से संध्या जी की आवाज़ आई थी- "बेटा, बातें बाद में कर लीजिएगा। अभी नहाकर नीचे आ जाइए। अगर वक़्त पर ब्रेकफ़ास्ट के लिए नहीं आए तो आपके पापा नाराज़ होंगे।"
आवाज़ सुनकर दोनों ने सर घुमाकर देखा था तो दरवाज़े पर ही संध्या जी खड़ी थीं। शायद उन्हें बुलाने ही आई थीं।
क्षितिज ने तो उनकी बात सुनकर हामी भर दी थी, पर अभिनव ने तुरंत ही उनकी बात का प्रतिउत्तर दिया था-
"वो कब मुझसे नाराज़ नहीं रहते माँ? मैं कुछ भी क्यों ना कर लूँ, पर कभी उनकी नाराज़गी दूर नहीं कर सकता। मेरी हर बात, मेरी हर आदत, मेरा हर काम, सब उन्हें गलत लगता है।"
अभिनव का जवाब सुनकर क्षितिज बेचारा बस उसे देखता ही रह गया था। उसकी आवाज़ में रोष के साथ-साथ दर्द और नाराज़गी भी थी। संध्या जी ने उसकी बात सुनी तो उसे समझाते हुए बोली थीं-
"बेटा, ऐसा नहीं है। वो पिता हैं आपके, जो करते हैं आपके लिए ही करते हैं, वो आपकी भलाई ही चाहते हैं बेटा।"
"ओह, प्लीज़ माँ, रहने दीजिए। मुझे ऐसी भलाई नहीं चाहिए जो मुझे घुट-घुटकर जीने पर मजबूर कर दे। मैं जब भी उनके लिए कुछ कहता हूँ आप हमेशा मुझे चुप करवा देती हैं। मुझे समझाने लगती हैं और बस उनकी तरफ़दारी करती रहती हैं, कभी मुझे भी समझने की कोशिश किया कीजिए। अगर वो पति हैं आपके तो मैं भी आपका ही बेटा हूँ। पर नहीं, आपको सिर्फ़ आपके पति दिखते हैं।"
उसकी बात सुनकर संध्या जी खामोश हो गई थीं। अभिनव ने जैसे ही अपनी बात खत्म की थी, एक सख्त रौबदार आवाज़ वहाँ गूंज उठी थी- "तमीज़ से बात कीजिए उनसे, भूलिए मत कि वो माँ है आपकी।"
आवाज़ सुनकर संध्या जी के चेहरे पर चिंता के भाव उभर आए थे। उन्होंने पलटकर देखा था तो सुरेश जी ठीक उनके पीछे ही खड़े थे। उन्हें देखते ही अभिनव के भाव एकदम सख्त हो गए थे। उसने अपने गुस्से को दबाते हुए सख्त लहजे में बोला था-
"आपको मुझे ये याद दिलाने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि मुझे बहुत अच्छे से पता है कि मेरा किससे क्या रिश्ता है और किससे मुझे किस लहजे में बात करनी है। वैसे भी मैं अपनी माँ से बात कर रहा हूँ तो आपको बीच में कुछ भी कहने का कोई अधिकार नहीं है, मेरी बात में तो बिल्कुल भी नहीं।"
सुरेश जी कुछ कहने ही वाले थे कि संध्या जी ने घबराकर उनके हाथ को पकड़ लिया था। सुरेश जी की गुस्से भरी निगाहें अब संध्या जी के तरफ़ घूम गई थीं। संध्या जी ने इंकार में सर हिला दिया था तो सुरेश जी ने एक नज़र अंदर खड़े अभिनव को देखा था, फिर संध्या जी को देखकर बोले थे-
"आपके लाड़ साहब दिन ब दिन और ज़्यादा बिगड़ते जा रहे हैं। इससे पहले कि वो पूरी तरह से हाथ से निकल जाते हैं, कोई अच्छी सी लड़की देखकर इनकी शादी करवा दीजिए ताकि वो आकर इन्हें संभाल लें।"
"जी, मैं उससे बात करूँगी।"
संध्या जी ने तुरंत ही हामी भर दी थी। सुरेश जी ने जैसे ही जाने के लिए कदम बढ़ाया था, उनके कानों में अभिनव की गुस्से भरी आवाज़ पड़ी थी-
"मैं नहीं करूँगा शादी।"
सुरेश जी ने उसकी बात सुनी थी, पर बिना कुछ रिएक्ट किए वहाँ से चले गए थे।
बेचारा क्षितिज तो बस आँखें बड़ी-बड़ी करके वहाँ क्या हो रहा है यह देखता ही रह गया था। संध्या जी अब अभिनव के पास चली आई थीं और प्यार से उसके गाल को छूकर बोली थीं-
"क्यों इतना गुस्सा करते हो बेटा? यह कौन सा लहजा था अपने पिता से बात करने का? कितना बुरा लगता होगा उन्हें कि हर जगह उनकी इज़्ज़त है, पर उनका अपना बेटा उनकी इज़्ज़त नहीं करता।"
"इज़्ज़त कमाई पड़ती है माँ, और मेरे हिसाब से उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया कि मैं उनकी इज़्ज़त करूँ। वो पापा नहीं हैं मेरे। तानाशाह की तरह बस वो मुझ पर अपना हुक्म चलाना चाहते हैं। बचपन से मेरी ज़िन्दगी को जैसे अपने हिसाब से चलाते आए हैं, वैसे ही अब भी मुझे और मेरी ज़िन्दगी को कंट्रोल करना चाहते हैं, पर अब मैं बच्चा नहीं हूँ।"
"सही कहा आपने, बहुत बड़े हो गए हैं आप। इतने बड़े हो गए हैं कि अब न तो आपके नज़रों में उस पिता की कोई इज़्ज़त है जिन्होंने अपनी सारी ज़िन्दगी आपका भविष्य बनाने में लगा दी, और न ही उस माँ की बातों का कोई महत्व है जिन्होंने असहनीय पीड़ा सहकर आपको जन्म दिया।"
संध्या जी की आँखों में नमी तैर गई थी। उनकी नम आँखें देखते ही अभिनव का सारा गुस्सा एकदम से शांत हो गया था। उसने उनके आँसू साफ़ करने के लिए हाथ बढ़ाया था, पर संध्या जी ने उसके हाथ को झटक दिया था।
"माँ…" अभिनव ने तड़पते हुए कहा था, पर वह आगे कुछ कह पाता उससे पहले ही संध्या जी की दर्द और रोष भरी आवाज़ उसके कानों में पड़ी थी.....
"मत कहिए आप हमें माँ... सही कहा था आपने, हमारे लिए हमारे पति आपसे ज़्यादा अहमियत रखते हैं क्योंकि वो हमें ब्याह कर इस घर में लाए थे। अग्नि के फेरे लेते हुए हमने हर परिस्थिति में उनका साथ निभाने का वचन लिया था। उनके वजह से आप और अंजली हमारी ज़िंदगी में आए।"
"आज हमारे पास जो है, सब उनकी वजह से है। वो हमारे पति हैं और उनका अपमान करने का हक हमने किसी को नहीं दिया... आपको भी नहीं... पर वो हमारे पति हैं सिर्फ़ इसलिए हम उनका साथ नहीं देते, बल्कि हमारी नज़रों में वो सही हैं। पर अभी आप उन्हें नहीं समझ सकेंगे। जिस दिन आप बाप बनेंगे, उस दिन आपको समझ आएगा कि उन्होंने आपके लिए क्या किया है। और तब आपको पछतावा होगा अपने व्यवहार पर।"
"हमारी ये बात हमेशा याद रखिएगा बेटा कि दुनिया में कोई भी माँ-बाप कभी अपने बच्चे का बुरा नहीं चाहते, वो दुश्मन नहीं होते उनके... भले ही उनका तरीका गलत हो सकता है, पर वो हमेशा अपने बच्चे की खुशियाँ ही चाहते हैं... हाँ, कभी-कभी उनसे भी गलती हो सकती है, पर क्या आपसे कभी कोई गलती नहीं हुई? क्या उन्होंने आपकी गलतियों को माफ़ नहीं किया? जब वो आपको हज़ार गलतियों को माफ़ कर सकते हैं तो आप क्यों उनकी एक गलती को माफ़ नहीं कर सकते?"
"आपको क्या लगता है कि हम नहीं जानते कि क्यों अचानक आपके मन में उनके लिए इतनी कड़वाहट भर गई? जानते हैं हम सब... शायद तब आपके पिता गलत रहे हों, पर जो उन्होंने किया उसके पीछे उनकी अपनी वजह थी जो हम आपको नहीं बता सकते। बस इतना समझ लीजिये कि वो दुश्मन नहीं हैं आपके... उन्होंने जो किया आपके लिए ही किया... उनका तरीका और फैसला भले ही गलत हो सकता है, पर उनका इरादा गलत नहीं था और एक न एक दिन आप भी ये बात समझ जाएँगे... हम तो बस भगवान से प्रार्थना करेंगे कि जब आपको अपनी गलती का एहसास हो तब आप अपने पिता और परिवार से इतने दूर ना निकल गए हों कि वापसी संभव ना हो सके।"
संध्या जी अपनी बात कहकर पलट गईं और जाने के लिए कदम बढ़ा लिए। अभिनव बस उन्हें देखता ही रह गया।
"हम आपको पहली और आखिरी बार कह रहे हैं। जिस भी लड़की से आप मिलते और बात करते हैं, उनसे दूरी बना लीजिए। अगर हमें पता चला कि हमारे मना करने के बाद भी आप उनसे बात कर रहे हैं और उनसे मिल रहे हैं तो इस बार तो हम आपको समझा रहे हैं, अगली बार हम सीधे जाकर उस लड़की के माँ-बाप से बात करेंगे और बताएँगे उन्हें कि उनके पीठ पीछे उनकी बेटी क्या कर रही है? उसके बाद उनके साथ जो होगा उसके जिम्मेदार आप होंगे और इतना ही नहीं, अगर आप हमारे फैसले के खिलाफ़ गए तो हम आपको भी यहाँ से दूर भेज देंगे..."
"अब आप सोच लीजिये कि एक लड़की के वजह से आप अपने परिवार से दूर होना चाहते हैं या परिवार के लिए कल की आई उस लड़की से दूरी बनाएँगे और उनसे जो भी आपका रिश्ता है उसे यहीं ख़त्म करेंगे। याद रखिएगा कि आपके लिए फैसले का असर सिर्फ़ आप पर ही नहीं पड़ेगा, बल्कि उसका परिणाम उस लड़की को भी भुगतना होगा।"
अभिनव के कानों में सख्त आवाज़ गूंज रही थी। वे शब्द जो एक वक़्त पर सुरेश जी ने उससे कहे थे। अभिनव अतीत के उस वक़्त में खोने लगा था, तभी उसके कानों में संध्या जी की आवाज़ पड़ी।
"नहाकर नीचे आ जाओ, और हो सके तो हमारे लिए अपने पिता से अपने व्यवहार के लिए माफ़ी मांग लीजिएगा। कम से कम जाने से पहले उनसे दो बोल प्यार से बोल लीजिएगा... आपकी कितनी ही नाराज़गी, ये सच नहीं बदल सकती कि वो पिता हैं आपके। उम्मीद करते हैं कि आगे से आप उनसे बात करते हुए ये सच नहीं भूलेंगे।"
संध्या जी अपनी बात कहकर वहाँ से चली गईं। अभिनव अब भी उसी दिशा में देखे जा रहा था। अपनी माँ से वो बहुत प्यार करता था और आज उसके वजह से उनकी आँखों में नमी थी, ये बात उसके मन को कचोट गई थी।
क्षितिज जो तब से बस सबकी बातें सुनकर वहाँ की स्थिति को समझने की कोशिश कर रहा था, उसने जब अभिनव को यूँ खड़े देखा तो उसके पास आकर उसके कंधों पर हाथ रखते हुए बोला- "अभि, तू ठीक है?"
"Hmm।" अभिनव ने अपनी भावनाओं को संभालते हुए बस इतना ही कहा। क्षितिज कुछ पल सोचने के बाद फिर से बोला-
"अभि, तेरे और अंकल के बीच क्या प्रॉब्लम है? जब से मैंने तुझे जाना है, मैंने भी ये बात नोटिस की है कि उनके प्रति तेरे मन में बहुत कड़वाहट भरी हुई है। अगर तू बता सके तो मैं जानना चाहूँगा कि उनके और तेरे बीच ऐसा क्या हुआ है कि तू उनसे इतनी बदतमीज़ी से बात करता है, जबकि तेरा नेचर ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।"
अभिनव खामोशी से उसकी बात सुनता रहा, फिर गहरी साँस छोड़ते हुए उसके तरफ़ सर घुमाकर बोला- "कुछ खास बात नहीं... उन्होंने भी वही किया था जो शायद हर पिता करता है, पर मुझे ही उनके फैसले से ऐतराज़ रहा... अगर देखा जाए तो जितनी गलती उनकी थी, उससे ज़्यादा बड़ी गलती तो मैंने ही की है।"
"ऐसा कौन सी बात है? और तूने क्या गलत किया है?" क्षितिज उसकी बातों में कुछ उलझ सा गया था। अभिनव ने बात को टालते हुए कहा-
"अभी रहने दे, मूड नहीं मेरा उन बातों को याद करने का। कभी और फ़ुरसत में बात करेंगे मेरे बारे में। अभी तू नीचे जा, मैं नहाकर आता हूँ।"
क्षितिज कुछ कह नहीं सका। अभिनव ने अपने हाथ में पहने बैंड को उतारकर ड्रेसिंग टेबल पर रख दिया और अपने कपड़े निकालने लगा, तभी उसके कानों में क्षितिज की आवाज़ पड़ी-
"वो बात नहीं बताता तो कोई बात नहीं, पर ये तो बता दे कि इस बैंड में ऐसी क्या खास बात है जो तू तुझे खुद से जरा सी देर के लिए भी अलग नहीं करता। पिछले पाँच सालों से जब से मैं तेरे साथ हूँ, तब से देख रहा हूँ कि चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाए, चाहे तू ज़रूरी से ज़रूरी चीज़ भूल जाए, पर ये बैंड कभी नहीं भूलता। ये हमेशा तेरी कलाई पर ही नज़र आता है। कुछ खास है क्या इस बैंड में जो तू इसे इतना संभालकर और हमेशा अपने पास रखता है?"
अभिनव उसका सवाल सुनकर कपड़े निकालते-निकालते रुक गया और क्षितिज के तरफ़ पलटकर देखा तो वो उसके ब्रेसलेट को पकड़े खड़ा था और उसे ही देख रहा था।
अभिनव ने वापस निगाहें अलमारी की तरफ़ घुमाते हुए कहा- "खास तो है। मेरे नहाकर वापस आने तक का वक़्त है तुम्हारे पास, अगर ढूँढ सके तो ढूँढ ले कि क्या खास है उसमें।"
अभिनव ने अपने कपड़े लिए और उसे देखते हुए बाथरूम में घुस गया। क्षितिज पहले तो हैरानी से उसे देखता रहा, फिर उसने अपने हाथ में पकड़े ब्रेसलेट को देखा।
रुद्राक्ष के मोतियों के उस ब्रेसलेट में उसको कुछ अलग या खास नज़र ही नहीं आया।
कुछ देर बाद अभिनव नहाकर बाथरूम से बाहर आया, पर भी क्षितिज परेशान सा उस ब्रेसलेट को ही देखे जा रहा था।
"क्या हुआ? नहीं मिला कुछ खास?"
क्षितिज ने अभिनव के तरफ़ निगाहें घुमाईं और मुँह बनाते हुए बोला- "तू मुझे बेवकूफ़ बना रहा है ना? ये तो नॉर्मल सा ब्रेसलेट है, मुझे तो इसमें कुछ खास, कुछ अलग भी नज़र नहीं आया।"
"बेकार की कोशिश करना छोड़ दे, क्योंकि इसमें क्या खास है ये या तो मैं समझ सकता हूँ या वो जिसने ये दिया है।"
क्षितिज ने अभिनव की तरफ़ निगाहें घुमाईं और मुँह बनाते हुए बोला, "तू मुझे बेवकूफ बना रहा है ना? ये तो नॉर्मल सा ब्रेसलेट है, मुझे तो इसमें कुछ खास, कुछ अलग भी नज़र नहीं आया।"
"बेकार की कोशिश करना छोड़ दे, क्योंकि इसमें क्या खास है ये या तो मैं समझ सकता हूँ या वो जिसने ये दिया है।"
ये कहते हुए अभिनव के भाव कुछ कोमल हो गए थे। क्षितिज बड़े ध्यान से उसे देख रहा था। अभिनव की बात सुनकर उसने शक भरी नज़रों से उसे देखते हुए पूछा,
"किसने दिया है तुझे ये ब्रेसलेट?"
"दिया है किसी ने जिसे तू नहीं जानता। जब जान जाएगा तो बता दूँगा। अब तू मेरे ब्रेसलेट के पीछे पड़ना छोड़ और नीचे जा, मैं आता हूँ दो मिनट में तैयार होकर।"
अभिनव ने उसके हाथ से ब्रेसलेट छीन लिया और उसे धकेलते हुए रूम से बाहर कर दिया और दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। क्षितिज ने मुँह बनाकर बंद दरवाज़े को देखा और वहाँ से चला गया।
अभिनव ने अब उस ब्रेसलेट को देखा और उसके लबों पर हल्की सी मुस्कान की रेखा खिंच गई। उसने उसे वापस पहन लिया और बेड के तरफ़ बढ़ गया। साइड टेबल के सबसे नीचे वाले दराज़ को खोलकर वह उसमें कुछ ढूँढने लगा। कुछ पल ढूँढने के बाद उसने सबसे नीचे दबाकर रखी एक फ़ोटो निकाली और बड़े प्यार से उसे देखने लगा।
यह फ़ोटो बिल्कुल वैसी ही थी जैसी फ़ोटो शिवांगी के पास थी, बस फ़र्क इतना था कि उस फ़ोटो में शिवांगी अभिनव के गाल खींच रही थी और खिलखिला रही थी और जो फ़ोटो अभिनव के पास थी उसमें अभिनव शिवांगी को प्यार से निहार रहा था जबकि शिवांगी ने अपने मुँह को फुलाया हुआ था। शायद वह अभिनव को कुछ करने को कह रही थी, पर उसने वह नहीं किया था।
तस्वीर देखते हुए अभिनव के कानों में एक बार फिर एक मीठी सी आवाज़ गूंजने लगी,
"मैं अब नाराज़ हूँ तुमसे… देखा तुम्हारे वजह से मेरी फ़ोटो खराब हो गई, अब मैं नहीं रखूँगी इसे।"
"तुम बेवजह इतना नाराज़ हो रही हो, देखो तो सही कितनी प्यारी और क्यूट लग रही हो तुम इसमें। मुझे तो यह वाली फ़ोटो पहले वाली से भी ज़्यादा अच्छी लग रही है।"
"अच्छी बात है तो उसे तुम ही रखो और इसे हमेशा संभालकर रखना। एक मैं अपने पास रखूँगी, दूसरी तुम रखना और जब हम शादी कर लेंगे तो हम इन दोनों फ़ोटो को एक साथ अपने रूम में लगाएँगे।"
अभिनव के चेहरे पर अजीब सी उदासी छा गई। उसने फ़ोटो वापस दराज़ में रख दी और तैयार होकर नीचे चला आया।
उसने दादी को देखा तो उनके पास आ गया और मुस्कुराकर बोला, "Good morning दादी।"
"जीते रहो बेटा।" उन्होंने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरा। अंजली तो आँखें बड़ी-बड़ी करके उन दोनों को देखे जा रही थी। दादी के सामने अभिनव कोई और ही अभिनव लग रहा था। पर अगले ही पल वह सामान्य हो गई क्योंकि यह कोई पहली बार तो नहीं था।
अभिनव का दादी से ऐसा ही रिश्ता तो था, पर वह दादी के साथ इतना सहज और शांत और बाकी सबके लिए इतना रूड क्यों था, यह सवाल आज भी अंजली के लिए एक पहेली ही बना हुआ था।
वहीं संध्या जी ने जब अभिनव को मुस्कुराते देखा तो उनके परेशान चेहरे पर सुकून के भाव उभर आए। सुरेश जी भी वहीं थे, पर उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे।
अभिनव ने संध्या जी की तरफ़ निगाहें घुमाईं। संध्या जी ने नाराज़गी से उस पर से निगाहें फेर लीं और सुरेश जी को खाना सर्व करने लगीं।
अभिनव के चेहरे पर अजीब सी उदासी फैल गई। सुरेश जी से उसकी नाराज़गी जाने किस वजह से इतनी बढ़ चुकी थी कि अब चाहकर भी वह उनसे सीधे मुँह बात नहीं कर पाता था। जब मन में कड़वाहट हो तो मुँह से मीठे बोल निकले भी तो कैसे? पर संध्या जी से वह बहुत प्यार करता था। उनकी नाराज़गी सहन नहीं हो रही थी उसे और अपनी माँ के लिए उसे सुरेश जी के सामने झुकना था, जो उसके लिए एक बहुत ही मुश्किल-तरिन काम था।
कुछ देर तक वह अभिनव कभी संध्या जी तो कभी सुरेश जी को देखता ही रहा, फिर उसने अपनी मुट्ठियों को कस लिया, बहुत मजबूर किया खुद को और सुरेश जी को देखकर बोला,
"कुछ बात करनी थी मुझे आपसे।"
सुरेश जी के साथ-साथ बाकी सबकी निगाहें भी अभिनव की तरफ़ घूम गईं, क्योंकि उसने नाम नहीं लिया था कि किससे बात कर रहा है, पर निगाहें सुरेश जी पर ही टिकी थीं।
सुरेश जी के भाव एकदम से बदल गए, फिर दोबारा वही भावहीन चेहरा सबके सामने दिखा, जिसे देखकर यह समझ पाना नामुमकिन था कि आखिर उनके दिलों-दिमाग में चल क्या रहा है?
अभिनव शब्दों को जोड़ने की जद्दोजहद में लगा था, जिसे संध्या जी बखूबी समझ रही थीं। कुछ देर अभिनव सुरेश जी को देखता रहा, फिर बिना किसी भाव के बोला,
"सॉरी… ऊपर आपसे बदतमीज़ी से बात की… पर चिंता मत कीजिए, आज चला जाऊँगा तो कोई नहीं आएगा आपसे बदतमीज़ी करने।"
इतना कहकर अभिनव चुपचाप क्षितिज के बगल वाली चेयर पर जाकर बैठ गया। अंजली जो काफ़ी वक़्त से अपने भाई और पापा के रिश्ते के बीच के तनाव को देख रही थी, उसको कुछ खास फ़र्क नहीं पड़ा। संध्या जी के चेहरे पर गहरी उदासी छा गई। इतना समझाया उन्होंने अभिनव को, पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ। वह अभिनव की बात पर उसे टोकने जा ही रही थी कि सुरेश जी ने आँखों से कुछ कहने से इंकार कर दिया।
संध्या जी चुप तो रह गईं, पर उनके चेहरे पर चिंता साफ़ झलक रही थी। सुरेश जी के चेहरे के भाव अब भी नहीं बदले थे। उन्होंने एक नज़र अभिनव को देखा, फिर वापस खाने पर ध्यान लगा दिया। संध्या जी ने सबको खाना सर्व किया, पर खुद नहीं बैठी, तो अभिनव ने आकर उन्हें बिठाया, फिर उनका खाना निकालते हुए धीमी आवाज़ में बोला,
"सिर्फ़ आपकी खुशी के लिए उनसे माफ़ी माँगी है मैंने। इससे ज़्यादा की उम्मीद मत रखिए मुझसे और नाराज़ मत होइए, क्योंकि आपको नाराज़ करके मैं नहीं जा सकूँगा यहाँ से।"
संध्या जी भीगी निगाहों से उसे देखती रहीं, पर अभिनव ने एक बार भी नज़र उठाकर उन्हें नहीं देखा। उनका खाना निकालने के बाद उन्हें खाने को कहा और अपनी चेयर पर आकर बैठ गया। अजीब सा माहौल बन गया था वहाँ का। किसी तरह उन्होंने नाश्ता किया, फिर सुरेश जी अपने ऑफ़िस के लिए निकल गए। क्षितिज को भी बैंक जाना था। अभिनव के साथ-साथ उसका भी मैनेजर के पोस्ट पर प्रमोशन हुआ था, पर सिर्फ़ अभिनव का ट्रांसफ़र हुआ था नैनीताल के ब्रांच में। क्षितिज को अपने पहले वाली बैंक में ही काम करना था, इसलिए वह भी चला गया।
अंजली कॉलेज के लिए निकलने लगी तो अभिनव अपनी बाइक की चाबी लेकर बाहर चला गया। जैसे ही अंजली ऑटो रोकने के लिए आगे बढ़ी, पीछे से अभिनव ने उसे आवाज़ लगाई,
"ए छुटकी चल, आज मैं तुझे कॉलेज छोड़ देता हूँ।"
पहले तो अंजली अभिनव की आवाज़ सुनकर चौंक गई, फिर उसके मुँह से 'छुटकी' सुनकर तो उसकी आँखें हैरानी से फैल गईं और जब उसने उसे कॉलेज छोड़ने की बात की तो अभिनव की हैरानी की जैसे कोई सीमा ही नहीं रह गई थी।
वह अभिनव की तरफ़ पलट गई और आँखें फाड़े उसे देखते हुए हतप्रभ सी बोली, "आपने… आपने मुझे छुटकी कहा?"
"क्यों नहीं कह सकता? भूल गई? मैंने ही तेरा यह नाम रखा था क्योंकि तू चुहिया जितनी छोटी सी थी और आज भी तेरी उम्र बढ़ गई, पर हाइट तो बित्ते भर की है, तो छुटकी ही हुई ना तू।"
अभिनव ने बेफ़िक्री से जवाब दिया। अंजली जो शायद उसके मुँह से अपने लिए 'छुटकी' सुनकर हैरान के साथ-साथ भावुक भी हो गई थी क्योंकि उसे भी याद नहीं था अभिनव ने आखिरी बार उसे कब इस प्यार भरे नाम से पुकारा था, जिस नाम से बुलाने का हक़ हमेशा से सिर्फ़ उसका ही रहा था।
पर जैसे ही उसने अभिनव की पूरी बात सुनी, उसके चेहरे के भाव एकदम से बदल गए। बड़ी-बड़ी आँखें एकदम से छोटी-छोटी हो गईं और उसने उसे घूरते हुए गुस्से से पूछा,
"मैं बित्ते भर की हूँ?"
"बिल्कुल। आजा, नापकर देख ले कि कौन बड़ा है?"
"मैं बित्ते भर की हूँ?"
"बिल्कुल। आजा, नापकर देख लें कि कौन बड़ा है?"
अभिनव उसके पास आकर खड़ा हो गया था। वह छः फुट का था और बेचारी अंजली पाँच फुट तक भी बड़ी मुश्किल से पहुँची थी। अभिनव का शरीर भरा-भरा था, उसने अच्छी खासी बॉडी बनाई हुई थी, वह एकदम फिट था। वहीं अंजली थोड़ी पतली थी।
अभिनव के सामने वह सच में छोटी सी बच्ची ही लग रही थी, पर अब बात नाक की थी तो वह कैसे खुद को उससे कम मान लेती?
वह झट से अभिनव से दूर हट गई और मुँह बनाते हुए बोली, "अब आप खंभे जैसे लंबे हो गए हैं तो इसमें मेरी क्या गलती है? मेरी हाइट तो बिल्कुल ठीक है, आप ही जिराफ़ बने हुए हैं तो सारी गलती आपकी है।"
"कुछ भी कहो, पर तू मेरे सामने है तो छोटी ही, इसलिए मैं तुझे छुटकी ही बुलाऊँगा और अगर अब तूने ज़्यादा नखरे दिखाए तो चुहिया नाम रख दूँगा तेरा।"
अभिनव ने उसे वॉन किया था। उसकी बात सुनकर अंजली का मुँह बिगड़ गया था, पर वह कुछ बोलने का रिस्क भी नहीं ले सकती थी, इसलिए उसने आगे कुछ नहीं कहा।
अभिनव ने उसे वहीं रुकने को कहा था और कुछ देर बाद अपनी बाइक लेकर वहाँ आ गया था। उसने अंजली को पीछे बैठने को कहा था, पर अंजली नहीं बैठी थी, यूँ ही खड़ी रही। अभिनव ने अब हेलमेट के शीशे को ऊपर किया और सर घुमाकर उसे देखते हुए बोला,
"क्या हुआ? बैठ ना, यूँ ही खड़े-खड़े कॉलेज नहीं पहुँचेगी।"
"आप सच में मुझे कॉलेज छोड़ने जाएँगे?" अंजली को शायद अब भी विश्वास नहीं हो रहा था कि अभिनव सच में उसके साथ जा रहा है।
अभिनव ने उसका सवाल सुना तो आँखें छोटी-छोटी करके उसे घूरते हुए बोला, "मैं क्या इतनी देर से फ़्रेंच में बोल रहा हूँ? अब क्या लिखकर दूँगा तब चलेगी तू मेरे साथ?"
"नहीं, वो आप मुझे छोड़ने जाएँगे, मतलब आप पहले कभी गए नहीं मुझे छोड़ने, फिर आज अचानक क्यों जाना चाहते हैं?"
अंजली बुरी तरह उलझ चुकी थी। अब भी अभिनव की कही बात पर वह विश्वास नहीं कर पा रही थी। अभिनव उसकी हैरानी की वजह बखूबी समझ रहा था। उसने होंठ गोल करते हुए गहरी साँस छोड़ी थी, फिर कुछ देर ठहरने के बाद धीमी सी आवाज़ में बोला,
"Come on अंजू........... तू लेट हो जाएगी, चल ना मैं तुझे छोड़ देता हूँ। सही-सलामत तुझे कॉलेज पहुँचा दूँगा।"
हमेशा की तरह अब भी अभिनव भावनाओं को शब्दों में व्यक्त नहीं कर सका था। उसका नेचर ही कड़क था और अब उसकी आवाज़ में वही चिढ़ झलकने लगी थी।
अंजली ने उसका जवाब सुना तो इंकार में सर हिलाते हुए बोली, "नहीं, आप पहले कभी तो नहीं गए मुझे छोड़ने, फिर आज क्यों जाना चाहते हैं? जब तक आप जवाब नहीं देंगे मैं नहीं जाऊँगी आपके साथ कहीं भी और आप मुझ पर गुस्सा करने की कोशिश भी मत कीजियेगा, वरना मैं माँ को बता दूँगी कि आपको कुछ हो गया है, आप अजीब-अजीब बिहेव कर रहे हैं, आप जबकि आप ऐसे हैं नहीं।"
अंजली की बात सुनकर अभिनव के चेहरे पर उदासी झलकने लगी थी। अजीब बात ही तो थी, आज वह अपनी बहन से थोड़ा प्यार से बात कर रहा था, उसकी परवाह जो वह हमेशा से करता था उसे ज़ाहिर कर रहा था। उसके लिए कुछ करने की कोशिश कर रहा था, उसके साथ वक़्त बिताने की कोशिश कर रहा था तो उसकी बहन उसे शक भरी नज़रों से देख रही है।
अभिनव कुछ पल खामोश सा उसे देखता रहा, फिर बड़ी ही मुश्किल के बाद उसने हिम्मत करके कहना शुरू किया,
"कुछ नहीं हुआ है मुझे......... बिल्कुल ठीक हूँ मैं......... आई जस्ट वांट कि जो भी मेरी ज़िंदगी में चल रहा है उसका इफ़ेक्ट हमारे रिश्ते पर ना पड़े, जो काफ़ी हद तक हमारे रिश्ते को पहले ही बिगाड़ चुका है और अब मैं बस बिगड़ी चीज़ को ठीक करने की कोशिश कर रहा हूँ।.................... जाने से पहले मैं हमारे बीच के बिगड़े रिश्ते को ठीक करना चाहता हूँ।
मेरे रहते मेरी बहन को भाई की कमी महसूस होती है, वह मेरे ही दोस्त से कहती है कि मुझसे ज़्यादा कम्फर्टेबल और खुश वह उसके साथ फ़ील करती है, वह उसके जैसा भाई चाहती है। इससे ज़्यादा तकलीफ़ मुझे और किस बात से होगी कि मेरी अपनी बहन अपने भाई से डरती है, नहीं चाहती कि उसका लाइफ पार्टनर उसके भाई जैसा हो, मुझसे ज़्यादा वह मेरे दोस्त के सामने खुलकर रहती है..............
आई नो कि ये सब मेरी रूडनेस के वजह से हुआ है। सॉरी, पापा का गुस्सा और फ़्रस्ट्रेशन तुझ पर निकाल दिया। उनसे दूरी बनाते-बनाते तुझसे भी दूर हो गया। इतना सख्त बन गया कि अपनी ही बहन के लिए पत्थर दिल बन गया। आई एम सॉरी........ But I love you यार........ You are my only cute little sister........ I love you a lot........... "
शायद इतने सालों में पहली बार अभिनव ने इतने प्यार से अंजली से बात की थी। अपने दिल की बात हमेशा अपने दिल में रखने वाला लड़का, जो अपने एक्शन से हमेशा यही दिखाता था कि उसे किसी से कोई फ़र्क नहीं पड़ता, वह सबके बिना बहुत आराम से रह सकता है। आज वही लड़का अपनी बहन की कही बातों से हर्ट होकर अपनी फीलिंग्स को ज़ाहिर कर रहा था।
जो इंसान हमेशा अपनी फ़ीलिंग्स को छुपाता आया हो ताकि उसकी फ़ीलिंग्स उसकी कमज़ोरी ना बन जाए, आज उसको ये सब कहने के लिए खुद से कितना स्ट्रगल करना पड़ा होगा इसका अंदाज़ा लगा पाना भी मुश्किल था।
अंजली, जिसने जब से होश संभाला था, सख्त अभिनव को ही देखा था, उसके लिए अभिनव के इस रूप को देखना किसी चमत्कार या शॉक से कम नहीं था। हमेशा से अभिनव की आँखों में वह अपने लिए जिस प्यार को ढूँढा करती थी वह आज उसे साफ़-साफ़ नज़र आ रहा था।
यही तो चाहती थी वह कि और भाइयों की तरह उसका भाई भी उसकी केयर करे, प्यार करे उससे, वह उससे खुलकर बातें कर सके, पर अभिनव के रूड बिहेवियर को देखते हुए उसने कभी उससे बात करने की कोशिश ही नहीं की थी।
अपने पापा और भाई के बीच के झगड़ों का उस पर गहरा प्रभाव पड़ा था। कोई देख नहीं सका था, पर उसके कोमल से दिल में दोनों के प्रति डर बैठ गया था, इसलिए वह उनसे दूर ही रहती थी। तरसती तो थी अपने भाई और पापा के साथ बैठकर बात करने के लिए, पर कभी हिम्मत ना कर सकी।
उसको उम्मीद नहीं थी कि अभिनव के मुँह से कभी उसे अपने लिए ऐसी बातें सुनने को मिलेंगी, इसलिए वह थोड़ा शॉक्ड थी, पर उसकी आँखों में अपने लिए प्यार देखकर वह भावुक भी हो गई थी। उसकी बातों से वह समझ गई थी कि आज जो बातें उसने क्षितिज से कही थी उसका अभिनव को काफ़ी बुरा लगा था और लगना लाज़मी भी था।
अंजली की आँखों में नमी उतर आई और उसने भारी गले से कहा, "सॉरी भैया..... हमारा वो मतलब नहीं था...... वो तो हमने यूँ ही कह दिया था....... हमें आप नापसंद नहीं है, बस आपके साथ बैठकर कभी खुलकर बात नहीं कर सके क्योंकि आप तो हमेशा गुस्से में ही रहते हैं, पर क्षितिज भैया हँसमुख है, फ़्रेंडली है तो उनके सामने बेझिझक कुछ भी बोल जाते हैं, बोलने से पहले ये नहीं सोचना पड़ता कि अगर हमारे मुँह से कुछ गलत निकल गया तो हमें उनके गुस्से को झेलना पड़ेगा, बस इसलिए हम उनके साथ खुलकर बात कर पाते हैं और इसलिए ही हमने वो सब कहा था। हमारा मकसद आपको दुःख पहुँचाने का नहीं था भैया.........."
अभिनव ने उसकी नम होती आँखें देखी तो अपनी उंगली से उन आँसुओं को पोंछते हुए बड़े ही प्यार से बोला,
"मैं जानता हूँ कि मैं एक अच्छा भाई नहीं बन सका। अपने गुस्से के वजह से मैंने तुझे खुद से दूर कर दिया, इसलिए तुझे सफ़ाई देने या माफ़ी माँगने की कोई ज़रूरत नहीं है........ गलती मेरी थी, मैं ही कभी खुद से जुड़े रिश्तों को संभालना नहीं सीख सका। ........ पर अब मैं अपनी हर गलती सुधारना चाहता हूँ।
जो बीत गया उसे तो नहीं बदल सकता मैं, पर अब मैं अपने गुस्से के वजह से किसी रिश्ते को बिखरने नहीं दूँगा........ जानता हूँ जैसा भाई तुझे चाहिए था वैसा भाई नहीं बन सका मैं, पर अब तुझे मेरे तरफ़ से कोई कमी नहीं दिखेगी। तू पहले भी बेझिझक अपने भाई से कुछ भी कह सकती थी क्योंकि मैं कभी तुझ पर गुस्सा करता ही नहीं, पर फिर भी अब कह रहा हूँ कि तुझे मुझसे या मेरे गुस्से से डरने की बिल्कुल भी ज़रूरत नहीं है।
तेरे दिल में जो भी बात हो वो बेझिझक अपने इस भाई को बता सकती है। मैं कोशिश करूँगा कि जैसा भाई तू चाहती थी वैसा भाई बन सकूँ, हमारा रिश्ता सुधार सकूँ, पर ये मैं अकेले नहीं कर सकता.... मुझे अपनी छुटकी के साथ ही ज़रूरत है। ......... इससे ज़्यादा शब्द नहीं मेरे पास अपनी बात बयाँ करने के लिए। बस इतना कहूँगा, जब तेरा जन्म भी नहीं हुआ था तब से मैं तुझसे खुद से भी ज़्यादा प्यार करता हूँ।
हाँ, वक़्त के साथ मेरे नफ़रत और गुस्से की दीवार हमारे बीच आ गई है, पर मेरा प्यार अब भी वैसा का वैसा ही है तेरे लिए। और मैं कोशिश करूँगा कि अब उस प्यार और परवाह को ज़ाहिर कर सकूँ ताकि तू मुझसे यूँ दूर-दूर ना रहे।"
अभिनव अब खामोश हो गया था। उसके नेचर के हिसाब से उसने इतना कह दिया था ये भी बहुत था, पर अब इससे ज़्यादा वह कह नहीं सका और चुप होकर उम्मीद भरी निगाहों से अंजली को देखने लगा।
अभिनव की बातें आज अंजली के दिल तक पहुँच रही थीं और उसके मन में अभिनव के गुस्से को लेकर जो डर बैठा हुआ था वह धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खोता जा रहा था।
अभिनव की बातों से अंजली के मन को सुकून सा मिल रहा था। उसको जो भाई चाहिए था उसकी झलक आज अभिनव के अंदर नज़र आ रही थी। वह तो उसके सीने से लगना चाहती थी, कितना तरसी थी वह अपने भाई से दो प्यार के बोल सुनने के लिए, उसके सीने से लगने की कितने बार इच्छा हुई थी उसकी, पर अभिनव का कोल्ड ऑरा उसे उसके पास जाने से भी रोक देता था, पर आज अभिनव कोई और ही अभिनव बना हुआ था और उसकी बातें सुनने के बाद अभिनव के सीने से लगने की तीव्र इच्छा जागी थी उसके मन में, पर डर अब भी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ था और उसी डर ने आज फिर अभिनव के तरफ़ उसके बढ़ते कदमों को रोक दिया था।
लेकिन शायद आज अभिनव उसके दिल की इच्छा को समझ गया था। अंजली तो उसके तरफ़ ना बढ़ सकी, पर अपने सख्त नेचर को साइड रखते हुए आज अभिनव ने उसके तरफ़ कदम बढ़ाया और उसको अपने सीने से लगा लिया।
अंजली की आँखें छलक आईं और रुँधे गले से बस ये चंद शब्द निकले, "आई...... आई मिस्ड यू भैया........... "
अभिनव के लबों पर हल्की सी मुस्कान उभर आई और साथ ही आँखों में नमी छलकने लगी। वह अपनी बहन के साथ था, फिर भी आज उसकी बहन उससे कह रही थी कि उसने उसे मिस किया, मतलब वह उसके पास होकर भी उसके साथ नहीं था और एक भाई के रूप में ये उसकी हार थी जिसे अब वह जीत में बदलना चाहता था। अपनी बहन को अपने गुस्से के वजह से खुद से दूर कर दिया था उसने और अब उसे इस बिगड़ते रिश्ते को सुधारना था जिसकी शुरुआत वह आज कर चुका था।
अभिनव ने अंजली को अपने सीने से लगाए हुए ही मन ही मन कहा, "आज मैं एक वादा खुद से करता हूँ.... जिन्हें खो चुका हूँ उन्हें तो वापिस अपनी ज़िंदगी में नहीं ला सकता, पर जो रिश्ते मेरे पास हैं उन्हें अब मैं किसी भी कीमत पर खुद से दूर नहीं जाने दूँगा........... मेरे और पापा के बीच की कड़वाहट अब और किसी रिश्ते में घुलकर उसे खराब नहीं करेगी......... अपने गुस्से और इस रखे व्यवहार के वजह से पहले ही अपनी ज़िंदगी के एक बेहद ख़ास इंसान को खो चुका हूँ, पर अब जो लोग मेरे पास हैं उन्हें मैं कभी खुद से दूर नहीं जाने दूँगा.......... नहीं आता मुझे रिश्तों को निभाना, पर अब सीखूँगा और हर रिश्ते को पूरे दिल से निभाऊँगा................"
अभिनव को अपनी गलती का एहसास हो गया था कि रिश्तों को निभाने में उससे बहुत बड़ी चूक हो गई है जिसे अब वह सुधारना चाहता था और ठीक भी था, आखिर इंसान अपनी गलतियों से ही तो सीखता है।
अंजली कुछ देर अभिनव के गले लगी रही। उसे याद ही नहीं था कि आखिरी बार वह कब यूँ अपने भाई के सीने से लगी थी। आज अभिनव के सीने से लगकर उसे जो सुकून मिल रहा था, वह उसे अपने दिल की गहराई तक बसा लेना चाहती थी। ना चाहते हुए भी उसकी आँखों से आँसू बहने लगे थे।
जो हमारे पास कोई चीज़, रिश्ता या इंसान नहीं होता, उसकी उतनी कमी महसूस नहीं होती जितनी उसके होते हुए भी न होने पर होती है। जब कोई हमारे पास होकर भी हमसे दूर होता है, तब उसकी कमी ज़्यादा खलती है। ऐसा ही अंजली के साथ था। भाई था उसका, पर उसके प्यार के लिए वह हमेशा तरसती आई थी। इसलिए आज जब उसे अपने भाई का प्यार मिल रहा था, तो वह खुद को रोक नहीं पाई और आँखों से अश्रुधारा बहने लगी।
कुछ देर तक अभिनव खामोशी से उसकी पीठ सहलाता रहा। वह समझ रहा था कि उसकी छुटकी अभी कितनी इमोशनल है। इसलिए उसने कुछ नहीं कहा और न ही उसे रोकने की कोशिश की। पर जब कुछ देर बाद भी अंजली का रोना कम नहीं हुआ, तो अभिनव ने अपने नेचर के हिसाब से रिएक्ट किया।
"बस कर, चुहिया! अब क्या छिपकली की तरह मुझसे चिपकी ही रहेगी? और ये क्या रोना-धोना लगाया हुआ है? मैं बहुत अच्छे से जानता हूँ, जब तू रोती है तो तेरी नाक बहने लगती है, तभी तू मुझसे चिपकी हुई है। सब समझ रहा हूँ मैं। मेरे गले से लगना तो बस बहाना है, असल में तो तू अपने आँसुओं से मेरी शर्ट भिगोना चाहती है और अपनी बहती नाक मेरी शर्ट में साफ़ करके मेरी इतनी अच्छी शर्ट को गंदी करना चाहती है, पर मैं तुझे ऐसा बिल्कुल नहीं करने दूँगा..... चल हट अब, छोड़ मुझे, वरना तू अपने आँसुओं से साफ़-साफ़ अपनी नाक भी मेरी शर्ट में साफ़ करके उसे गंदी कर देगी.........."
अभिनव की बात सुनकर अंजली उसके सीने से सर निकालकर हैरानी से उसे देखने लगी। सच में उसकी छोटी सी नाक टमाटर जैसे लाल हो गई थी।
अभिनव ने उसके कंधे को पकड़ते हुए उसे खुद से दूर किया और बुरा सा मुँह बनाते हुए उसे देखने लगा। पहले तो अंजली आँसुओं से भीगी आँखों को बड़ा-बड़ा किए हुए उसे हैरान-परेशान सी देखती रही। पर जैसे ही उसे अभिनव की बातों का मतलब आया, उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया।
"आप...... आप बहुत बुरे हैं....... मेरी नाक बहती है ना तो देखिए, अब तो मैं सच में आपकी शर्ट गंदी कर दूँगी........"
अंजली ने गुस्से में उसे घूरते हुए कहा और झट से उसकी तरफ़ बढ़ी। पर अभिनव ने तुरंत ही अपने हाथ से उसके छोटे से चेहरे को पकड़कर उसे खुद से दूर करते हुए कहा,
"मज़ाक कर रहा था यार, तू चुप होने का नाम ही नहीं ले रही थी तो और क्या करता?"
"तो प्यार से चुप करवाते ना......... अब मैं इतने सालों बाद अपने भाई के गले लगी तो मुझे रोना नहीं आएगा क्या?...... आप ना बिल्कुल पत्थर दिल हैं, आपके अंदर फ़ीलिंग्स ही नहीं......... बहन रो रही है और आप उसे प्यार से चुप करवाने के बजाय उसका मज़ाक उड़ा रहे हैं......... ऐसे चुप करवाते हैं क्या किसी को?............ मुझे ना आपसे बात ही नहीं करनी.......... बहुत बुरे हैं आप......... एकदम दस सिर वाले रावण जैसे............."
अंजली उससे काफ़ी नाराज़ लग रही थी। उसने अभिनव के हाथ को झटक दिया और मुँह फुलाए दूसरे तरफ़ घूम गई। अभिनव खामोशी से उसकी सारी बातें सुन रहा था और हौले-हौले मुस्कुरा रहा था।
अंजली मुँह फुलाकर दूसरी तरफ़ घूम गई तो अभिनव ने गंभीरता से कहा, "मैं दस सिर वाला रावण कैसे हो सकता हूँ? मेरा तो एक ही सिर है।"
"बाकी के नौ दिखते नहीं, पर आप दस सिर वाले रावण ही हैं।" अंजली ने तुरंत ही तुनकते हुए जवाब दिया। उसकी बात सुनकर अभिनव के लबों पर रहस्यमयी मुस्कान फैल गई। उसने उसे अपनी तरफ़ घुमाते हुए मुस्कुराकर कहा,
"अच्छा, तो अगर मैं रावण हूँ, फिर तो तू सुप्रणखा हुई ना, क्योंकि रावण की बहन तो वही थी, पर उसकी तो नाक कटी हुई थी, लेकिन तेरी छोटी सी नाक तो बिल्कुल ठीक है।"
अभिनव ने उसकी नाक को पकड़कर खींचा और मुस्कुरा दिया। अंजली जो पहले से चिढ़ी हुई थी, अब तो और ज़्यादा भड़क उठी। उसने उसके हाथ को अपनी नाक पर से हटाते हुए बोला,
"आप बात मत कीजिए मुझसे, वरना मैं आपको अब मार दूँगी।"
अभिनव के भाव एकदम से बदल गए। उसने आँखें छोटी-छोटी करके अंजली को घूरा और भौंह उठाकर बोला, "अच्छा, तो तू अपने बड़े भाई को मारने वाली है?"
अंजली उसके सख्त भाव देखकर एकदम शांत हो गई और मुँह बनाकर बोली, "आप जानबूझकर मुझे परेशान कर रहे हैं ना? मैं अब आपसे बात ही नहीं करूँगी।"
अंजली ने एक बार फिर मुँह फुलाया। अभिनव ने उसकी बाँह पकड़कर उसे अपने पास खींच लिया। फिर अपनी उंगलियों से उसके आँसुओं को साफ़ करते हुए बोला, "नाराज़ हो ले, पर अब और मत रोइयो, मुझे लोगों को चुप करवाना नहीं आता, फिर कोई बुरा सा जोक मारना पड़ेगा और तू और नाराज़ हो जाएगी। और मैं तुझे नाराज़ करना नहीं चाहता।"
अभिनव काफ़ी शांत नज़र आ रहा था। उसकी आँखों में अंजली के लिए प्यार और परवाह झलक रही थी। अंजली कुछ पल खामोशी से उसे देखती रही, फिर मुँह फुलाकर बोली,
"पर मैं अब भी आपसे नाराज़ हूँ। आपने मुझे चुहिया कहा, छिपकली भी कहा और कहा कि मेरी नाक भी बहती है।"
"वो तो बहती ही है, इसमें झूठ क्या था?" अभिनव के बेफ़िक्री भरे जवाब सुनकर पहले तो अंजली उसे गुस्से से घूरती रही, फिर उससे दूर हटते हुए बोली,
"मेरी नाक बहती है ना तो अब दूर रहिए मुझसे, वरना आपके कपड़ों में ही नाक साफ़ करूँगी, फिर मत कहिएगा कि मैंने आपके कपड़े गंदे कर दिए।"
"कर लो साफ़, उसके बाद धुलवाऊँगा भी तुझसे ही।"
अभिनव अपनी बात बोलकर बाइक पर बैठ गया। वहीं उसकी बात सुनकर अंजली मुँह बनाकर उसे देख रही थी।
अभिनव ने हैंडल पर रखा हेलमेट उठाया और लगाते हुए बोला, "चल अब जल्दी बैठ, तुझे छोड़ने के बाद और भी काम निपटाने हैं मुझे।"
अंजली जो पहले ही मुँह फुलाए खड़ी थी, उसने अभिनव की बात सुनी तो तुनकते हुए बोली, "तो जाइए ना जाकर अपने बाकी के काम कीजिए, मैं कॉलेज खुद चली जाऊँगी, आपको परेशानी उठाने की कोई ज़रूरत नहीं है।"
अभिनव के सामने अंजली अपना एटीट्यूड दिखा रही थी। उसने सर घुमाकर अंजली को देखा और आँखें दिखाते हुए बोला, "ज़्यादा नाटक नहीं...... जितना बोला है उतना सुन और चुपचाप पीछे बैठ जा। मैं चल रहा हूँ आज तुझे छोड़ने, बस बात यहीं ख़त्म हुई। वैसे भी मेरे बाइक के पीछे बैठने का मौका बार-बार नहीं मिलता, इसलिए ज़्यादा नखरे दिखाने की ज़रूरत नहीं है।"
उसकी आँखों से डरकर अंजली मुँह बनाते हुए पीछे बैठ गई, पर अपनी नाराज़गी दिखाते हुए उसने उसे पकड़ा नहीं। अभिनव ने मिरर में उसे देखा, फिर बाइक स्टार्ट करते हुए बोला,
"ठीक से पकड़कर बैठ, वरना मैं तो आगे निकल जाऊँगा और तू हवा में लहराते हुए धरती माता की गोद में समा जाएगी।"
बाइक झटके से आगे बढ़ी जिससे सच में अंजली पीछे गिरने लगी। तो उसने झट से अभिनव के कंधे को कस के पकड़ लिया और उसकी बात का मतलब समझते हुए चिढ़ते हुए बोली,
"आप कभी कोई बात प्यार से नहीं कह सकते हैं? हर बात में अपना सड़ा हुआ एटीट्यूड दिखाना ज़रूरी होता है आपके लिए।"
"लातों के भूत बातों से नहीं मानते और प्यार से तो बिल्कुल भी नहीं सुनते, उन्हें यही ज़ुबान समझ आती है।"
अभिनव ने टेढ़ा जवाब दिया और उसका मतलब समझते हुए अंजली ने बुरा सा मुँह बना लिया। कुछ पल वह पीछे बैठी अभिनव की पीठ को घूरती रही, फिर धीरे से आगे खिसकते हुए उसने उसकी पीठ पर अपना सर लगा दिया और अपनी आँखों को मूँदकर बैठ गई।
सच में उसके बाइक के पीछे बैठने पर अलग ही सुकून का एहसास हो रहा था उसे। और वह तो पहली बार उसकी बाइक के पीछे बैठी थी, या शायद उसे पहले की बात याद नहीं थी, इसलिए उसके लिए यह एकदम नया एक्सपीरियंस था जिसका वह दिल खोलकर मज़ा ले रही थी।
अभिनव के लबों पर भी सुकून भरी मुस्कान उभर आई थी। सालों पहले ऐसा कुछ हुआ था जिससे वह सबके पास होते हुए भी सबसे दूर होने लगा था। रिश्ते धीरे-धीरे बिखरने लगे थे जिसका एहसास उसे आज हुआ था और अपने जाने से पहले वह इन बिगड़ते रिश्तों को ठीक कर देना चाहता था।
अभिनव ने अंजली को उसके कॉलेज छोड़ा तो वह उसे बाय कहकर अंदर चली गई। अभिनव ने उसे फ़्री होने पर बताने को कह दिया था कि वह उसे लेने आ जाएगा, जिस पर अंजली ने मुस्कुराकर हामी भर दी थी।
उसके कॉलेज से निकलकर अभिनव वापिस घर के लिए निकल गया।
दूसरे तरफ़ संध्या जी, जिन्होंने अभिनव और अंजली की सारी बातें सुनी थीं, उन्हें दोनों भाई-बहन के रिश्ते को ठीक होते देखकर कुछ सुकून का एहसास हुआ था। वहीं अभिनव के नेचर की वजह से वह गहरी चिंता में डूब गई थीं।
संध्या जी ने अभिनव और अंजली की सारी बातें सुनी थीं। दोनों भाई-बहन के रिश्ते को ठीक होते देख उन्हें कुछ सुकून मिला था, पर अभिनव के स्वभाव के कारण वे गहरी चिंता में डूब गई थीं।
दोनों के जाने के बाद वे अंदर चली आईं। आँगन में दादी सोफ़े पर बैठी हुई थीं। संध्या जी उनके पास आकर बैठ गईं।
"माँजी, मुझे समझ नहीं आता कि मैं इस लड़के का क्या करूँ?"
"अब क्या किया मेरे पोते ने?" दादी के कान खड़े हो गए उनकी बात सुनकर।
संध्या जी ने उन्हें देखा और परेशान सी बोलीं, "आप मुझसे क्यों पूछ रही हैं कि अब अभि ने क्या किया है? आप खुद उसका रवैया नहीं देख रही? दिन-ब-दिन और ज़्यादा बदतमीज़ होता जा रहा है। अपने गुस्से के आगे तो उसे कुछ दिखाई ही नहीं देता।"
"Hmm, बात तो तूने बिल्कुल ठीक कही। गुस्से में तो वो अपने बाप और दादा से भी आगे है, पर परेशानी की कोई बात नहीं। वक़्त के साथ जैसे तेरे पापा जी और सुरेश ने अपने गुस्से को काबू करना सीख लिया था, वैसे ही अभि भी सीख लेगा। बस जैसे सुरेश की ज़िंदगी में हम तुझे लेकर आए और तूने उसे संभाल लिया, वैसे ही हमें अभि के लिए एक शांत-सुशील, सुंदर और गुणी लड़की ढूँढनी है जो उसे और उसके गुस्से को संभाल सके। फिर अभि की उनसे शादी करवा देंगे और उसके बाद बहू आकर सब संभाल लेगी।"
"पर माँजी, शादी तो उसकी तब होगी ना जब वो शादी के लिए हाँ कहेगा? उससे शादी की बात करो तो वो एकदम से भड़क जाता है। कुछ सुनने या समझने को तैयार ही नहीं होता। अब आप ही बताइए कि जब तक वो शादी के लिए हाँ नहीं कहता, हम उसके लिए लड़की देखना कैसे शुरू कर सकते हैं? और अब तो वो यहाँ से चले भी जाएगा........... "
संध्या जी को अभिनव की सुबह की बात याद आ गई थी और वे और ज़्यादा परेशान हो गई थीं। अबकी बार दादी भी कुछ परेशान लगने लगी थीं। उन्होंने चिंता भरे स्वर में कहा,
"मेरे पोते की यह दशा सुरेश के कारण है। अभि के जन्म से ही उसका उनके प्रति यही सख्त रवैया रहा है और इसी वजह से हमारा बच्चा आज ऐसा हो गया है। कितना समझाया था उस वक़्त हमने उन्हें कि दुनिया में सब एक से नहीं होते। ज़रूरी नहीं कि जो मुकेश के साथ हुआ वही अभि के साथ भी हो, पर उन्होंने कभी हमारी नहीं सुनी और वही किया जो उनका मन किया। और आज उनकी सख़्तियों के कारण हमारा पोता हमारे साथ रहकर भी हमसे इतना दूर हो गया है।"
"मैं आपकी बात समझती हूँ, माँजी, पर उन्होंने भी तो जो किया वो अभि के लिए ही किया। मुकेश के जाने का उन्हें गहरा सदमा लगा था। पर उन्होंने अपना दुःख ज़ाहिर नहीं किया। गुस्से वाले तो पहले से ही थे और उसके जाने के बाद तो उन्होंने खुद को पूरी तरह से सख्त कर लिया।
अभि स्वभाव में मुकेश की ही परछाईं था, इसलिए वो उसे लेकर ज़्यादा प्रोटेक्टिव रहे और जो मुकेश के साथ हुआ वो अभि के साथ ना हो, इसलिए उनके प्रति हमेशा सख़्ती दिखाई। और उनकी बेवजह की सख़्ती के कारण हमारा बेटा यूँ खामोश हो गया।
दोनों ही अपने स्थान पर ठीक हैं। एक तरफ़ मेरे पति हैं तो दूसरे मेरा बेटा। मैं तो किसी को दोष नहीं दे सकती। अब आप ही बताइए मैं क्या करूँ, माँजी? इन बाप-बेटे के बीच मैं पिस जाती हूँ। कितना समझाती हूँ मैं अभि को, पर वो बिल्कुल अपने पापा के ही तरह ज़िद्दी है। उन दोनों की लड़ाई में बाकी रिश्ते बिखरते जा रहे हैं। अभि सिर्फ़ उनसे ही नहीं, हम सब से भी दूर होता जा रहा है। उसके मन में रिश्तों के प्रति कड़वाहट भरती जा रही है और हम चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे।"
अभि और सुरेश जी की सालों से चली आ रही इस लड़ाई में संध्या जी हमेशा से पिसती आ रही थीं और इतनी मजबूर थीं कि चाहकर भी कुछ कर नहीं पा रही थीं।
दादी ने उन्हें इस क़दर परेशान और दुखी देखा तो प्यार से उनके सर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, "आप इतना सोचकर खुद को परेशान मत कीजिए, बेटा। जो हमारे हाथ में नहीं होता उसे हमें वक़्त पर छोड़ देना चाहिए। जिसे हम नहीं सुधार पाते उसे वक़्त ठीक कर देता है। अभि और सुरेश के रिश्ते को आप ठीक नहीं कर सकतीं, वह तभी ठीक होगा जब वे दोनों उसे सुधारने की कोशिश करेंगे। अभी दोनों ही एक-दूसरे को समझने की कोशिश नहीं कर रहे, पर जल्दी ही वे एक-दूसरे की परिस्थितियों को समझेंगे और अपने बिगड़ते रिश्ते को संभालेंगे भी।"
"कैसे, माँजी?........ आज अभि यहाँ से जाने वाला है। जो रिश्ता यहाँ साथ रहने पर नहीं सुधरा वो दूर जाने पर तो और बिगड़ जाएगा।"
"गलत कहा आपने, बहु। हर बार दूरियों से रिश्ते बिगड़ते नहीं हैं। कई बार पास रहने पर जिन रिश्तों में दूरियाँ आ जाया करती हैं, दूर जाने पर वे रिश्ते सुधर जाते हैं........... ये तो आप भी जानती होंगी कि जब तक कोई इंसान हमारे पास रहता है हमें उसकी अहमियत का एहसास नहीं होता, पर जब वही इंसान हमसे दूर चला जाता है तब हमें उसकी कमी और महत्व का एहसास होता है। ................ वैसे ही अभी अभि और सुरेश दोनों ही कुछ समझने को तैयार नहीं हैं, पर वे एक-दूसरे से दूर हो जाएँगे, तब शायद उन्हें एहसास हो कि वे क्या खोने जा रहे हैं और तब उनके रिश्ते और दिलों में आई दूरियाँ कुछ कम हो जाएँ।
आप बस अच्छा सोचिए और बाकी सब भगवान पर छोड़ दीजिए। देखिएगा, आगे सब अच्छा ही होगा।"
दादी के समझाने पर संध्या जी कुछ शांत हुईं और काम निपटाने किचन में चली गईं।
कुछ देर बाद अभि वापिस घर आया और आकर दादी के पास बैठ गया।
"सब सामान रख लिया, बेटा?"
दादी ने बात की शुरुआत की। जिस पर अभि ने उनकी गोद में सर रखकर लेटते हुए इंकार में सर हिला दिया। दादी के लबों पर गहरी मुस्कान फैल गई। बचपन से जब भी अभि परेशान होता या किसी दुविधा में होता तो यूँ ही उनकी गोद में सर रखकर लेट जाता और उसकी यह आदत आज भी नहीं बदली थी। अंतर्मुखी था वह, तो जल्दी से अपने दिल की बात किसी को बताता नहीं था, सब अपने दिल में ही रखता था।
आज भी वह ऐसा ही था। पर अब सुरेश जी की बात का खुलकर विरोध करना सीख गया था वह, तभी तो वे उसे बागी कहने लगे थे क्योंकि अभि उनकी हर बात का विरोध करता था। शायद यह बचपन से उसके मन में दबा गुस्सा और नाराज़गी ही थी जो अब बाहर आ रही थी। और उसका यही रवैया सुरेश जी को नहीं पसंद था और दोनों बाप-बेटे के बीच हमेशा युद्ध छिड़ा रहता था।
दादी ने अभि के बालों पर हाथ फेरते हुए बड़े प्यार से पूछा, "क्या हुआ, आज हमारा बच्चा किस बात को लेकर परेशान है कि उसे अपनी दादी की गोद की याद आ गई?"
अभि ने अपनी आँखें खोलकर उन्हें देखा और बिना किसी भाव के बोला, "कुछ नहीं, दादी, बस यूँ ही मन किया तो आ गया........... फिर शाम को चला जाऊँगा तो आपकी गोद में दोबारा सर रखने का मौका पता नहीं दोबारा कब मिले, इसलिए सोचा कि जाने से पहले इस सुकून को महसूस कर लूँ।"
"जब दादी से इतना ही प्यार है तो क्यों इस उम्र में इस बूढ़ी को छोड़कर इतनी दूर जा रहा है? यहाँ तो तुम आँखों के सामने रहते थे तो मन को सुकून रहता था कि तुम ठीक हो, अब इतनी दूर चले जाओगे तो हर पल तुम्हारी चिंता लगी रहेगी।"
दादी के चेहरे पर उदासी छा गई। अभि से वे सुरेश जी से भी ज़्यादा प्यार करती थीं। बचपन से अभि उनका लाडला रहा था और सबसे ज़्यादा उनके पास रहता था। दादी की तो सुबह भी उसी से होती थी और रात भी उसका चेहरा देखकर ही होती थी। उन्होंने कभी अभि को खुद से दूर नहीं किया था, पर अब वह उन्हें छोड़कर जाने वाला था इसलिए वे थोड़ी दुखी थीं।
अभि ने उनका उदास-परेशान चेहरा देखा तो उठकर बैठ गया। और उनकी दोनों हथेलियों को थामते हुए बड़े प्यार से बोला, "मेरा जाना ज़रूरी है, दादी, और ठीक ही है कि मैं चला जाऊँ। कम से कम मेरे जाने के बाद घर में शांति तो बनी रहेगी। अगर मैं यहाँ रहा तो रोज़ किसी न किसी बात पर पापा से मेरी बहस होगी, जिससे घर का माहौल बिगड़ेगा, माँ और आप दोनों परेशान होंगी। तो अच्छा ही है कि मैं जा रहा हूँ और आप चिंता मत कीजिए, मैं वहाँ अपना पूरा ध्यान रखूँगा और आपसे रोज़ बात करूँगा।
फिर कुछ दिन बाद जब मैं अपना रहने का इंतज़ाम कर लूँगा तो आप वहीं आ जाइएगा मेरे पास। कुछ दिन मेरे साथ बिताकर वापिस यहाँ आ जाइएगा और टाइम मिलने पर मैं भी यहाँ आ जाया करूँगा। ..... चिंता मत कीजिए, घर से दूर ज़रूर जा रहा हूँ पर अपने परिवार से कभी दूर नहीं होऊँगा।"
"अच्छा, बेटा, ज़रा यह तो बता कि तू शादी कब करेगा?"
"अच्छा, बेटा, ज़रा ये तो बता कि तू शादी कब करेगा?"
दादी का अचानक से पूछा सवाल सुनकर अभि हैरान हो गया और आँखें बड़ी-बड़ी करके उन्हें देखते हुए बोला, "दादी, ये अचानक से शादी की बात बीच में कहाँ से आ गई?"
"अभी तूने ही तो कहा कि मैं तेरी चिंता ना करूँ, इसलिए पूछ रही हूँ कि कब कर रहा है शादी? जब तू शादी कर लेगा तो तेरा ख्याल रखने वाली आ जाएगी, तब मुझे तेरी चिंता नहीं रहेगी। चल अब बता कि कब कर रहा है शादी और कब मुझे अपनी चिंता से मुक्त करने वाला है? अगर तुझे पहले से कोई पसंद है तो बता दे, वरना मैं ही अपने लिए बहू ढूँढना शुरू करती हूँ।"
अभि कुछ पल खामोशी से उन्हें देखता रहा। दादी जानती थीं कि अभि उनकी बात नहीं काटेगा, या कम से कम उन पर तो गुस्सा नहीं करेगा, इसलिए जानबूझकर उन्होंने यह बात छेड़ी थी। जिसे सुनकर अभि काफ़ी परेशान नज़र आने लगा।
कुछ पल अभि परेशान सा उन्हें देखता रहा। फिर उठकर खड़े होते हुए बोला, "दादी, मैं अपना ख्याल खुद रख सकता हूँ, उसके लिए मुझे शादी करके किसी को अपनी ज़िंदगी में शामिल करने की कोई ज़रूरत नहीं है। फिर भी आपने पूछा है तो मैं बता देता हूँ कि न तो मुझे कोई लड़की पसंद है और न ही पसंद आएगी क्योंकि न तो मुझे शादी में ही कोई दिलचस्पी है और न ही किसी लड़की में। इसलिए दोबारा ये बातें मत कीजिएगा मेरे सामने।"
इतना कहकर अभि तेज़ कदमों से सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ गया।
उसके वहाँ से जाते ही संध्या जी दादी के पास आ गईं और जाते हुए अभि को परेशान निगाहों से देखते हुए बोलीं, "देखा आपने, ये शादी के नाम से ही चिढ़ जाता है। ऐसे में तो ये कभी शादी ही नहीं करेंगे और तन्हा ही सारी ज़िंदगी काटनी पड़ेगी उन्हें।"
दादी ने अब निगाहें संध्या जी की तरफ़ घुमाईं और शांत लहज़े में बोलीं, "तुम क्यों हर छोटी-छोटी बात पर इतना परेशान हो जाती हो? उसके कहने-ना-कहने से क्या होता है? जब भगवान चाहेंगे तो उनके लाख मना करने के बाद भी उनकी शादी हो ही जाएगी, बस देर है तो उनकी ज़िंदगी में उस लड़की के आने का जो उनकी इस ज़िद को तोड़ सके। और हमारा मन कहता है कि बहुत जल्द अभि की ज़िंदगी में वो लड़की आएगी जो सिर्फ़ उसके लिए बनी होगी, जो हमारे अभि को संभाल लेगी और जिनसे मिलने के बाद अभि खुद अपने ही फ़ैसले के ख़िलाफ़ जाकर अपनी मर्ज़ी से उनसे शादी करेंगे।"
संध्या जी बस दुआ ही कर सकती थीं, उसके अलावा तो सब भगवान की इच्छा थी। वे अभी दादी के पास ही खड़ी थीं कि ऊपर से अभि की आवाज़ आई,
"माँ, ऊपर आइए, मुझे काम है आपसे।"
"अभी आई, बेटा।" संध्या जी ने तुरंत ही जवाब दिया और सीढ़ियों की तरफ़ चल पड़ीं। सुरेश जी और अभि की यह आदत भी बिल्कुल एक सी थी कि दोनों ही कहीं भी क्यों ना हों, पर ज़रूरत पड़ने पर यूँ ही संध्या जी को आवाज़ लगाते थे और वे दौड़ी-दौड़ी उनके पास पहुँच जाती थीं।
दोनों बाप-बेटे के बीच अपनी बहू को पिसते देख दादी ने बेबसी से अपना सर हिला दिया।
संध्या जी अभि के कमरे के बाहर पहुँचीं। फिर अंदर आते हुए बोलीं, "हाँ, बेटा, बोलो क्या काम है?"
अभि जो अलमारी के सामने खड़ा था, उसने घूमकर उन्हें देखा, फिर परेशान सा बोला, "मेरा सामान पैक कर दीजिए, माँ।"
संध्या जी ने उसका उतरा हुआ चेहरा देखा तो अलमारी की तरफ़ बढ़ते हुए मुस्कुराकर बोलीं, "आपको अपने हर काम के लिए अपनी माँ की ज़रूरत पड़ती है, वहाँ कैसे रहेंगे आप हमारे बिना?"
"रह लूँगा, माँ, पहले प्रॉब्लम होगी, पर फिर आदत हो जाएगी। बस आप यहाँ अपना और बाकी सबका ध्यान रखिएगा।"
"वो तो हमें रखना ही होगा, पर आपकी चिंता लगी रहेगी हमें।"
"मैं भी ध्यान रखूँगा अपना, आप परेशान मत होइए।"
संध्या जी ने हामी भर दी और एक-एक करके उसके नॉर्मल और सर्दी के कपड़े पैक करने लगीं। अभि अपनी ज़रूरत का बाकी सामान पीछे टाँगने वाले बैग में रखने लगा। कपड़े वगैरह पैक करने के बाद संध्या जी ने उसके खाने के लिए कुछ घर की बनाई चीज़ें भी पैक कर दीं। अभि ने मना तो किया, पर वे मानी नहींं। अभि का सारा सामान पैक करने के बाद संध्या जी ने अभि को बेड पर बिठाया और खुद उसके सामने बैठ गईं।
"बेटा, वहाँ मैं नहीं रहूँगी तो अपना ध्यान रखना। बाहर की चीज़ें ज़्यादा मत खाना और काम करने के लिए एक नौकर रख लेना ताकि आपका काम और खाने-पीने का सब वो संभाल ले। दिन-रात काम में डूबे मत रहिएगा, थोड़ा आराम भी कर लीजिएगा और वक़्त मिले तो फ़ोन कर लीजिएगा।"
संध्या जी को उसकी चिंता हो रही थी, इसलिए वे उसे समझा रही थीं।
अभि ने उनकी बात सुनी, फिर उनके हाथ को थामकर मुस्कुराकर बोला, "जी, माँ, आप चिंता मत कीजिए। मैं अपना पूरा ध्यान रखूँगा।"
"ऐसे कैसे चिंता ना करे, बेटा? पहली बार आपको खुद से इतना दूर भेज रहे हैं, माँ हैं, आपकी चिंता तो होगी ही हमें।"
संध्या जी की आँखें भर आईं। अभि ने उन्हें साइड से अपने गले से लगाते हुए आराम से कहा, "आप रोइए मत, माँ, मैं रोज़ आपसे बात करूँगा। अपना ध्यान भी रखूँगा और आपसे मिलने भी आऊँगा। बस आप शांत हो जाइए।"
"हम ठीक हैं, बेटा।" संध्या जी ने अपने आँसुओं को पोंछते हुए कहा और एक बार फिर उसके सामान को चेक करने लगीं। अभि लबों पर मुस्कान सजाए उन्हें देखता रहा।
कुछ वक़्त उसने अपनी माँ और दादी के साथ बिताया। उसके बाद 4 बजते-बजते अंजली का मैसेज आ गया तो अभि उसे लेने चला गया। करीब आधे घंटे में वह अंजली के कॉलेज के बाहर पहुँच गया और कॉलेज के गेट के ऑपोज़िट साइड अपनी बाइक लगाकर खड़ा हो गया।
वह अपनी बाइक से टेक लगाए खड़ा था और अंजली का इंतज़ार कर रहा था। निगाहें कॉलेज के गेट पर टिकी थीं, जहाँ से स्टूडेंट लगातार बाहर आ रहे थे। गेट के पास ही कुछ मनचले खड़े थे जो आती-जाती लड़कियों को देखकर गंदे-गंदे कॉमेंट कर रहे थे। पहले तो अभि ने उन पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया क्योंकि वह बेवजह किसी बहस में नहीं पड़ना चाहता था।
उसका ध्यान तो अंजली पर था। कुछ देर बाद अपनी फ़्रेंड्स के साथ अंजली कॉलेज से बाहर आती नज़र आई। वे मनचले उसे देखकर भी गंदे-गंदे कॉमेंट करने लगे, पर अंजली उन्हें नज़रअंदाज़ करते हुए आगे बढ़ने लगी।
अभि जो सब देख रहा था, जब उसने उन्हें अंजली पर कॉमेंट करते देखा तो उसकी आँखें गुस्से से जल उठीं और मुट्ठियाँ कस कर वह बेहद गुस्से में उन लड़कों को घूरने लगा।
अंजली को शायद इन सबकी आदत थी, इसलिए वह रोज़ की ही तरह उन्हें इग्नोर करके आगे बढ़ गई। पर अचानक ही उनमें से एक लड़के ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया।
अंजली की फ़्रेंड्स पहले ही दूसरे तरफ़ मुड़ चुकी थीं और अंजली सामने खड़े अभि के पास आने के लिए आगे बढ़ी थी, पर किसी ने उसका हाथ पकड़कर उसे रोका तो उसके भाव एकदम से सख्त हो गए। शांत रहती थी, पर उसके अंदर खून तो सुरेश जी का ही था, बस क्योंकि नेचर संध्या जी पर गया था, इसलिए जल्दी से वह गुस्सा नहीं करती थी, पर आज उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया।
वह गुस्से में उस लड़के के तरफ़ पलट गई, पर वह कुछ कह पाती उससे पहले ही उसके कानों में अभि की गुस्से भरी आवाज़ पड़ी, "हाथ छोड़ उसका!"
अंजली की आँखों की पुतलियाँ हैरानी से फैल गईं। उसने निगाहें घुमाकर देखा तो अभि उसके बगल में ही खड़ा था। अभि का गुस्से से तमतमाया चेहरा देखकर अंजली एकदम से घबरा गई।
जिस लड़के ने अंजली का हाथ पकड़ा हुआ था, उसने अभि की तरफ़ निगाहें घुमाईं और अकड़ते हुए बोला, "क्यों बे, तू यहाँ का प्रधान है जो तेरी बात मानूँ?"
"मैंने कहा, हाथ छोड़ लड़की का!"
अभि की आँखें आग उगल रही थीं और लहजा बेहद सख्त था। तब भी उस लड़के पर कोई असर नहीं हुआ। उसने सीना चौड़ा करते हुए कहा,
"नहीं छोड़ता, बोल क्या करेगा? और तू होता कौन है मुझे ये बताने वाला कि मुझे क्या करना है और क्या नहीं? मैं अपनी मर्ज़ी का मालिक हूँ.... मुझे लड़की पसंद आई तो पकड़ लिया उसका हाथ और अब अभी तो बस हाथ ही पकड़ा है, अभी तो और भी बहुत कुछ करूँगा मैं इस छमिया के साथ और तू मुझे उसे छोड़ने को कह रहा है, जा, नहीं छोड़ता, जो करना है कर ले।"
वह लड़का बेशर्मी से मुस्कुरा दिया और जैसे ही अंजली के नज़दीक जाने लगा, अभि ने उसके उस हाथ को पकड़ लिया जिससे उसने अंजली का हाथ पकड़ा हुआ था। अभि की पकड़ इतनी मजबूत थी कि उस लड़के की हालत खराब हो गई।
लड़के ने बेशर्मी से मुस्कुराया और जैसे ही अंजली के नज़दीक जाने लगा, अभि ने उसका हाथ पकड़ लिया जिससे उसने अंजली का हाथ पकड़ा हुआ था। अभि की पकड़ इतनी मजबूत थी कि लड़के की हालत खराब हो गई। अंजली के हाथ से उसकी पकड़ छूट गई; ऐसा लगा जैसे उसकी हाथ की हड्डी चटक गई हो। अभि ने उसका हाथ झटकते हुए, दाँत पीसते हुए गुस्से में कहा,
"आज छू लिया, दोबारा अगर इसके इर्द-गिर्द भी नज़र आया तो अभी तो बस हाथ की हड्डी ही चटकी है, अगली बार तेरा वो हाल करूँगा कि तेरे माँ-बाप भी तुझे पहचानने में धोखा खा जाएँगे।"
वह आवारा लड़का अब गुस्से से बिलबिला उठा। उसके साथी भी भड़क उठे। उनमें से एक अभि के सामने आकर खड़ा हो गया और चिल्लाते हुए बोला,
"क्या है, साले? बहुत हीरो बनने का शौक चढ़ा है? अगर अपनी भलाई चाहता है, तो चुपचाप यहाँ से निकल जा, वरना हमारे काम में बेवजह टाँग अड़ाने की कोशिश की तो तेरी ये हीरो जैसी शक्ल बिगाड़ने में हमें ज़्यादा वक़्त नहीं लगेगा।"
"अगर आती-जाती शरीफ़ लड़कियों को परेशान करना, उनके साथ बदतमीज़ी करना तुम्हारा काम है, तो मैं तुम्हें ये काम करने नहीं दूँगा। अगर तुम्हें लग रहा है कि तुम्हारी धमकी से डरकर मैं चला जाऊँगा और तुम जो मन आएगा वो कर लोगे, तो तुम बहुत गलत सोच रहे हो, क्योंकि अब मैं तुम्हें सबक सिखाए बिना यहाँ से बिल्कुल नहीं जाने वाला।"
अभि अपने स्वभाव के अनुसार व्यवहार कर रहा था और उन आवारा लड़कों के सामने अकड़कर खड़ा हो गया था।
उनका गुस्सा देखकर वे लड़के कुछ घबरा गए। पहला लड़का अब तक संभल चुका था; वह अभि के सामने आकर खड़ा हुआ और आराम से बोला,
"देख, भाई, हमारी तुझसे कोई दुश्मनी नहीं है। हमें बस ये लड़की चाहिए, इसलिए तू यहाँ से चला जा।"
उस लड़के ने अंजली की तरफ़ रुख़ मोड़ा। उसका इरादा समझते हुए अभि ने तुरंत ही अंजली को अपने पीछे कर लिया और उस लड़के को गुस्से से घूरते हुए गरजा, "अगर हिम्मत है तो हाथ लगाकर दिखा इसे! अगर तूने उसे दोबारा छू लिया तो माँ कसम, यहीं ज़िंदा गाड़ दूँगा तुझे!"
"अरे, यार, क्यों बेवजह हमसे उलझ रहा है? लगती क्या है ये लड़की तेरी जो इतना भड़क रहा है?"
जैसे ही उस लड़के ने यह सवाल किया, अभि की गुस्से भरी रौबदार आवाज़ वहाँ गूंज उठी, "बहन है वो मेरी!"
अभि की बात सुनकर एक पल के लिए सब लड़के हैरान हो गए; फिर उनमें से एक ने बेफ़िक्री से कहा, "बहन होगी तेरी तो हमें इससे क्या? हमारी तो बहन नहीं है वो, तो हम तो उसके साथ ऐश कर ही सकते हैं।"
उस लड़के ने अभि के बगल से झाँकती अंजली की कलाई पकड़कर उसे झटके से अपनी तरफ़ खींच लिया।
अभि का ध्यान उस पर नहीं था, पर जैसे ही उसने अंजली को अपनी तरफ़ खींचते देखा, उसने फुर्ती से उसकी दूसरी बाँह पकड़कर उसे झटके से अपनी तरफ़ खींच लिया और उस लड़के के मुँह पर जोरदार पंच जड़ते हुए चीखा,
"हरामज़ादे! तेरी हिम्मत भी कैसे हुई मेरी बहन को छूने की! कोई मेरी बहन की तरफ़ नज़र उठाकर उसे बुरी नज़र से देखे, यह मुझे बिल्कुल बर्दाश्त नहीं, फिर तूने तो उसे छूने का गुनाह किया है... अब तो तुझे मुझसे कोई नहीं बचा सकता!"
अपनी बात पूरी करते हुए अभि ने उसके पेट पर एक और पंच मार दिया जिससे उसकी पकड़ अंजली के हाथ से छूट गई।
अभि ने अंजली को पीछे कर दिया और खुद उस लड़के की तरफ़ बढ़ गया। अभि इस वक्त शाक्षात् महाकाल का रौद्र रूप लग रहा था, जिसके कोप से अब उस लड़के को कोई नहीं बचा सकता था।
अभि उस लड़के पर टूट पड़ा। अपने साथी को इस तरह बेरहमी से मारते देखकर बाकी लड़के भी लड़ाई में कूद पड़े। अभि के गुस्से की अब कोई सीमा नहीं थी। वे छह थे और अभि अकेला, फिर भी वह उन पर भारी पड़ रहा था। जो उसे रोकने की कोशिश करता, अभि उसकी हड्डियाँ तोड़ने लगता। पीछे खड़ी अंजली अभि के इस रूप को देखकर सहमी हुई सी खड़ी थी।
उन आवारा लड़कों और अभि के बीच भयंकर लड़ाई छिड़ गई थी। अचानक ही वहाँ पुलिस के सायरन की आवाज़ गूंज उठी। पुलिस के डर से वे आवारा लड़के भागने लगे, पर अभि और आस-पास मौजूद लोगों ने उन्हें पकड़ लिया।
वहाँ मौजूद लोगों में से किसी ने बात बिगड़ते देखकर पुलिस को फ़ोन कर बुलाया था। पुलिस ने आते ही उन लड़कों को पकड़कर अपनी जीप में डाल दिया। वहाँ मौजूद भीड़ ने पुलिस के सामने पूरा हाल सुनाया, जिसमें उन लड़कों की गलती साफ़ पता चल रही थी। कॉलेज का डीन भी सूचना मिलते ही वहाँ आ गया क्योंकि मामला उनके कॉलेज के बाहर हुआ था और कॉलेज की लड़कियों ने भी शिकायत की थी, इसलिए उनकी भी जवाबदेही बनती थी।
पुलिस ने सबकी गवाही के बाद अभि का रुख़ किया, जिसका चेहरा अब भी गुस्से से तमतमाया हुआ था। वह इतने गुस्से में था कि उसका शरीर काँप रहा था। उन सबसे लड़ते हुए कुछ चोटें उसे भी लगी थीं और उसके पास खड़ी अंजली परेशान सी उसे देख रही थी।
"मिस्टर, आपका पुलिस स्टेशन आना होगा। क्योंकि आपने भले ही गलत के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई हो, पर सरेआम इस तरह मारपीट करना और कानून को हाथ में लेना सरासर गलत था। हाँ, बात आपकी बहन की थी, इसलिए हम आज आपको बस वार्निंग देकर छोड़ देंगे, पर थाने तो आपको चलना ही होगा और आपकी बहन को भी FIR लिखवाने के लिए हमारे साथ चलना होगा।"
अभि एकटक ज़मीन को घूर रहा था। इंस्पेक्टर की बात सुनकर उसने निगाहें उठाकर उसे देखा; उसकी खूनी रंग में रंगी लाल आँखें देखकर बेचारा इंस्पेक्टर भी एक पल के लिए सहम गया।
"Hmm, ज़रूर आएंगे और मेरी बहन FIR भी ज़रूर लिखवाएगी, पर उसके बाद यह आपकी ज़िम्मेदारी होगी कि ये लड़के आसानी से छूट ना पाएँ क्योंकि आज तो मैंने बस उन्हें उनके गुनाहों की छोटी सी सज़ा दी है, अगर दोबारा ये मुझे मेरी बहन या इस कॉलेज के आस-पास भी नज़र आए तो इन्हें मुझसे कोई नहीं बचा सकेगा।"
"लगता है बहुत प्यार करते हैं अपनी बहन से। खैर, आप चिंता मत कीजिए, इतनी आसानी से ये बाहर नहीं आ पाएँगे। इन्हें इनके गुनाहों की ऐसी सज़ा दिलाऊँगा कि दोबारा किसी लड़की की तरफ़ आँख उठाकर भी नहीं देख सकेंगे।"
"आप इन्हें लेकर चलिए, मैं कुछ देर में थाने पहुँचता हूँ, उससे पहले ज़रा एक काम और निपटा लूँ।"
अभि ने अपनी बात कही और डीन की तरफ़ बढ़ गया। अंजली बेचारी सहमी हुई सी वहाँ खड़ी रही। उस इंस्पेक्टर ने एक नज़र उसे देखा, फिर अभि को देखने लगा जो अब डीन के एकदम सामने खड़ा था।
"ये लड़कियाँ आपके विश्वास पर यहाँ पढ़ने आती हैं... इनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी आपकी है और आपके ही कॉलेज के गेट पर इनके साथ दिन-दहाड़े बदतमीज़ी हो रही है और आपको इसकी खबर तक नहीं! ऐसे तो यहाँ से किसी दिन कोई किसी लड़की को उठाकर लेकर चला जाएगा और आपको पता तक नहीं चलेगा। यही व्यवस्था है आपकी? ऐसे सुरक्षा कर रहे हैं आप इनकी? अगर ज़िम्मेदारी संभालना नहीं आता तो उसे लिया भी ना करे, अगर अपने कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियों की सुरक्षा का ध्यान नहीं रख सकते तो बंद कर दीजिए इस कॉलेज को, क्योंकि इनके माँ-बाप यहाँ अपनी बच्चियों को पढ़ने के लिए आपके विश्वास पर भेजते हैं, अपनी बेटी की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने वाले कॉलेज में कोई अपनी बेटी को नहीं भेजेगा, तब आपका कॉलेज वैसे ही बंद हो जाएगा।"
अभि का लहजा रूखा था, पर क्योंकि लापरवाही उनकी तरफ़ से हुई थी, गलती उनकी थी, इसलिए डीन ने बात को ज़्यादा ना बढ़ाते हुए अपनी गलती मान ली और अभि को विश्वास दिलाते हुए बोला...
"अगर अपने कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियों की सुरक्षा का ध्यान नहीं रख सकते तो बंद कर दीजिए इस कॉलेज को, क्योंकि इनके माँ-बाप यहाँ अपनी बच्चियों को पढ़ने के लिए आपके विश्वास पर भेजते हैं। अपनी बेटी की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने वाले कॉलेज में कोई अपनी बेटी को नहीं भेजेगा, तब आपका कॉलेज वैसे ही बंद हो जाएगा।"
अभि का लहजा रूखा था। पर, क्योंकि लापरवाही उनकी तरफ़ से हुई थी, गलती उनकी थी, इसलिए डीन ने बात को ज़्यादा ना बढ़ाते हुए अपनी गलती मान ली। उन्होंने अभि को विश्वास दिलाते हुए कहा,
"देखिए, हम जानते हैं कि गलती हमारी तरफ़ से हुई है और हम बेहद शर्मिंदा हैं कि हमारे कॉलेज के बाहर ऐसी घटना हुई। हम आपके गुस्से को भी समझते हैं और आपको विश्वास दिलाते हैं कि आगे से ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी। इन बच्चियों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी हमारी है और हम अब उसमें किसी तरह की कोई चूक नहीं होने देंगे।"
"यही बेहतर होगा आपके लिए, क्योंकि अगर आपने अब कोई ठोस कदम नहीं उठाया और दोबारा यहाँ इस तरह की कोई घटना हुई तो मैं आपके कॉलेज पर केस कर दूँगा। और फिर आपके इस कॉलेज को बंद होने से कोई नहीं बचा सकेगा।"
अभि उन्हें भी धमकाने में नहीं चुके। उनके गुस्से भरी धमकी सुनकर बेचारे डीन के माथे पर पसीने की बूँदें छलक आईं। अंजली के पास खड़े इंस्पेक्टर ने अभि को देखते हुए कहा,
"इन्हें हमेशा ही इतना गुस्सा आता है या बात आपकी है इसलिए इतना हाइपर हो रहे हैं?"
इंस्पेक्टर ने जब दूसरी तरफ़ से कोई जवाब नहीं देखा, तो निगाहें अंजली की तरफ़ घुमाईं। वो आँखें छोटी-छोटी करके उसे ही घूर रही थी।
अंजली ने उस इंस्पेक्टर को घूरते हुए कहा, "अपने काम से काम रखिए, ज़्यादा चालाकी दिखाने की कोशिश की तो अगला नंबर आपका ही होगा।"
"बाप रे! इतनी छोटी सी नाक पर इतना गुस्सा!" अंजली ने आँखें तरेरकर उसे घूरा, फिर गुस्से में पैर पटकते हुए अभि के पास चली आई। इंस्पेक्टर ने जाती हुई अंजली को देखते हुए मन ही मन कहा,
"लगता है गुस्सा करने की बीमारी खानदानी ही है।"
उसने बेफ़िक्री से अपने कंधे उचका दिए और अंजली और अभि को देखने लगा।
अंजली अभि के पास चली आई और उसकी बाँह खींचते हुए बोली, "भैया, घर चलिए।"
अभि जो अब भी डीन को घूर रहा था, उसकी निगाहें अंजली की तरफ़ घूम गईं। उसका परेशान चेहरा देखकर अभि के भाव कुछ कोमल हो गए। उसने उसे अपने सीने से लगा लिया।
अंजली की आँखें छलक आईं। रोना तो बहुत आ रहा था, पर अभि के गुस्से को देखते हुए उसने खुद को संभाल लिया। वरना जाने अभि क्या करता उसके लिए, पर आज उसे इस हादसे से इतना तो पता चल गया कि अभि भले ही दिखाता नहीं है, पर बहुत प्यार करता है उससे और बहुत प्रोटेक्टिव है उसे लेकर।
कुछ देर में अभि अंजली के साथ थाने पहुँचा, जहाँ और भी लड़कियाँ मौजूद थीं और सब ने उन लड़कों के ख़िलाफ़ कंप्लेंट लिखवाई थी। वो सेल में बेहोश पड़े थे क्योंकि अभि ने उन्हें मारकर अधमरा कर दिया था।
अंजली ने भी FIR पर साइन किया, फिर अभि उसे लेकर घर के लिए निकल गया।
उन्हें घर पहुँचते-पहुँचते 5 बज गए थे। अभि शांत नज़र तो आ रहा था, पर उसकी खामोशी गवाह थी कि उसका गुस्सा अब भी शांत नहीं हुआ था। अंजली एक बार फिर उसका गुस्सा देखते हुए उससे कुछ बोलने की हिम्मत नहीं कर सकी, पर इस बार वो उससे डर नहीं रही थी।
बाइक घर के बाहर आकर रुकी। अभि ने बाइक पार्क की और अंजली का हाथ थामकर अंदर चला आया। आँगन में कदम रखते ही उनकी नज़र सामने गुस्से में यहाँ से वहाँ चक्कर काटते सुरेश जी पर पड़ी। उन्हें देखते ही अंजली के कदम ठिठक गए और चेहरे पर डर के भाव उभर आए।
अभि को तो उनसे कोई फ़र्क ही नहीं पड़ा। उसने मुड़कर अंजली को देखा, पर वो कुछ कहता उससे पहले ही सुरेश जी की नज़र उन दोनों पर पड़ गई। उन्होंने गुस्से में कहा,
"लीजिए, आ गए आपके शाहबज़ादे अपनी वीरता के झंडे गाड़कर!"
उनके पास खड़ी संध्या जी और दादी दोनों की निगाहें अब सामने खड़े अंजली और अभि की तरफ़ घूम गईं। उसके चेहरे पर लगे ज़ख़्म देखकर दोनों ही व्याकुल हो गए। संध्या जी तुरंत ही अभि की तरफ़ बढ़ गईं जो सुरेश जी की आवाज़ सुनकर अब उन्हें घूरने लगा था।
"बेटा, आप ठीक तो हैं? आप तो अंजली को लेने गए थे ना, फिर आपको इतनी चोट कैसे लग गई?"
संध्या जी ने प्यार से उसके चेहरे को छूते हुए सवाल किया। उनके चेहरे पर चिंता साफ़ झलक रही थी।
अभि ने निगाहें उनकी तरफ़ घुमाईं, पर वो कुछ कहता उससे पहले ही सुरेश जी ने उसे घूरते हुए कहा,
"हाँ-हाँ, पूछिए अपने लाडले से कि कहाँ से इतनी चोट लगवाकर आ रहे हैं। और अगर उन्हें बताने में शर्म आए तो हमसे पूछ लीजिएगा, वो बताए ना बताए, पर हम आपको आपके बेटे की करतूत ज़रूर बता देंगे।"
"सुरेश, क्यों बच्चे पर गुस्सा कर रहा है? दिख नहीं रहा तुझे कि पहले ही कितना परेशान लग रहा है वो?"
दादी ने तुरंत ही उन्हें टोका, पर उन पर कोई असर नहीं पड़ा। उन्होंने गुस्से में जवाब दिया,
"वो कोई परेशान नहीं है, माँ, वो तो हमें परेशानी में डालने का अच्छा-खासा इंतज़ाम करके आया है। अगर हमारी बातों पर विश्वास नहीं होता तो ज़रा पूछिए अपने लाडले से कि कहाँ से इतनी चोट लगवाकर आ रहा है? अंजली को लेने गया था ना तो पूछिए ज़रा कि उनके कॉलेज के बाहर गुंडागर्दी क्यों दिखा रहा था? आपके शहज़ादे की जिन चोटों को देखकर आप इतना परेशान हो रही हैं ना वो उन्हें कोई अच्छा काम करते हुए नहीं लगी हैं, बल्कि सड़क-छाप आवारा लड़कों के साथ मारपीट करके आ रहे हैं ये। और अगर हम गलत नहीं हैं तो अभी तो पुलिस स्टेशन से छूटकर यहाँ आए हैं।"
सुरेश जी की बात सुनकर संध्या जी और दादी दोनों ही हैरान-परेशान सी उन्हें देखने लगीं। सुरेश जी काफ़ी गुस्से में लग रहे थे।
संध्या जी ने अब अभि की तरफ़ निगाहें घुमाईं और चिंता भरे स्वर में बोलीं, "बेटा, आपके पापा ये क्या कह रहे हैं? आपने मारपीट की?"
"बिल्कुल मारपीट की इन्होंने। आज तक घर में अपनी माँ-बात के साथ बदतमीज़ी करते थे, अब बाहर जाकर मारपीट करना भी शुरू कर दिया है उन्होंने। अभी तक तो घर में ही बात सीमित रहती थी, पर अब उन्होंने बाहर भी हमारी इज़्ज़त का तमाशा बनाना शुरू कर दिया है। आज तक किसी की हिम्मत नहीं हुई कि हम पर उंगली तक उठा सके, पर इनके वजह से अब लोगों के बीच हमारी मान-सम्मान की धज्जियाँ उड़ रही हैं। लोग हमें फ़ोन करके इनके कारनामों का आँखों देखा हाल सुनाने लगे हैं, हमसे सवाल करने लगे हैं कि कैसे संस्कार दिए हैं हमने हमारे बेटे को कि वो सरेआम गुंडों की तरह मारपीट करता है। हमने कभी पुलिस स्टेशन देखा तक नहीं और आपके लाड साहब पुलिस स्टेशन का चक्कर काटकर आ रहे हैं। हमें तो उन्होंने किसी से नज़रें मिलाने के काबिल नहीं छोड़ा है। पर अगर हम उनसे कुछ कहेंगे तो आप सबको बहुत बुरा लगेगा, तो ज़रा खुद ही अपने बेटे से पूछिए कि ऐसी कौन सी आफ़त आ गई थी कि वो कॉलेज के बाहर, अपनी बहन के सामने गुंडों की तरह मारपीट कर रहे थे?"
यहाँ उन्होंने बात ख़त्म की। और अभि भी उसी लहजे में गुस्से से बोला, "हाँ, कर रहा था मैं मारपीट और अभी पुलिस स्टेशन से ही होकर आया हूँ, पर आपको वजह बताना मैं ज़रूरी नहीं समझता। जब आपने बिना पूरी बात जाने ही मुझे गुनाहगार ठहरा दिया है तो... हाँ, हूँ मैं गलत और अब मैं आपको सफ़ाई बिल्कुल नहीं दूँगा क्योंकि सफ़ाई वहाँ दी जाती है जहाँ सुनने वाला कोई हो, पर आपने तो बिना पूरी बात जाने ही मुझे गुनाहगार ठहरा दिया तो हूँ मैं गलत... आपकी बहुत पुरानी आदत है हमेशा मुझे गलत समझते की... मैं चाहे कुछ भी करूँ, आपको हमेशा मैं गलत ही लगा हूँ, आपने कभी ये जानने की कोशिश नहीं की कि मैंने जो किया वो क्यों किया, बस हमेशा मुझे गुनाहगार ठहराकर सज़ा सुना देते थे तो आज भी गलत हूँ मैं, कहिए क्या सज़ा देंगे आज आप मुझे? ... आप क्या मुझे सज़ा देंगे? सज़ा तो मैं खुद को दे चुका हूँ... मेरे वजह से आपकी इज़्ज़त पर दाग़ लग रहा है ना तो खुश हो जाइए क्योंकि जा रहा हूँ आज मैं यहाँ से और अब दोबारा कभी यहाँ नहीं आऊँगा... बहुत प्यार है ना आपकी अपनी इज़्ज़त से तो रखिए अपनी इज़्ज़त को संभालकर अपने पास, पर उस इज़्ज़त के बदले आप अपने बेटे को हमेशा-हमेशा के लिए खो चुके हैं... मुबारक हो, मिस्टर सुरेश चौधरी! अब से आपकी इज़्ज़त पर दाग़ लगाने वाला आपका ये नालायक बेटा कभी लौटकर वापिस नहीं आएगा... जश्न मनाइए आप कि अब आपकी इज़्ज़त पर दाग़ लगाने वाला जा रहा है यहाँ से हमेशा-हमेशा के लिए। मेरी परवरिश पर सवाल उठा रहे थे ना आप तो कान खोलकर सुन लीजिए कि मेरे अंदर मेरी माँ के दिए संस्कार हैं, आपका दिया तो सिर्फ़ ये गुस्सा और नफ़रत है जिसमें आज मैं खुद जल रहा हूँ और आपको मेरी माँ के दिए संस्कारों पर उंगली उठाने का कोई हक़ नहीं है... बहुत प्यार है ना आपको अपनी इज़्ज़त से, उसी इज़्ज़त के लिए आपने मेरी ज़िंदगी को नर्क बना दिया तो अब रहिए अपनी उस खोखली इज़्ज़त के साथ, पर अब मैं और एक पल इस जेल में नहीं रहूँगा जहाँ आपका गुंडाराज चलता है... जा रहा हूँ मैं, कभी ना लौटने के लिए... पर जाते-जाते भगवान से इतनी प्रार्थना करूँगा कि कभी गलती से भी आपको अपनी गलतियों का एहसास ना हो, क्योंकि जिस दिन ऐसा हो गया, आप खुद से नज़रें नहीं मिला सकेंगे... मुझ पर और मेरे फ़ैसलों पर तो कभी आपने विश्वास नहीं किया, पर जिस दिन आपके लिए गलत फ़ैसले आपके सामने आ गए, उस दिन आपका खुद पर से विश्वास उठ जाएगा और यकीन मानिए, जब इंसान का खुद पर से विश्वास उठ जाए तो ज़िंदगी जीना बहुत मुश्किल हो जाता है। मैं जी रहा हूँ ना इसलिए जानता हूँ और मैं कभी नहीं चाहूँगा कि आपको मेरी जैसी ज़िंदगी जीनी पड़े..."
अभि ने अपनी बात ख़त्म की और किसी के कुछ समझने से पहले ही गुस्से में दनादन सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ गया।
उसकी बातों से वहाँ खड़े सभी लोग सदमे में चले गए थे। अभि ने गुस्से में कुछ हद तक अपनी नाराज़गी ज़ाहिर कर दी थी। सब बुत बने खड़े ही रह गए थे।
कुछ ही मिनट बाद अभि अपने ट्रॉली बैग को घसीटते हुए वहाँ आया। एक बैग पीछे टाँगा हुआ था, मतलब वो जाने के लिए तैयार था। आज उसे जाना तो था ही, पर वो इस तरह से जाएगा इसकी कल्पना भी कभी किसी ने नहीं की थी। उस पर भी अभि ने कहा था कि गया तो कभी वापिस नहीं आएगा।
अभि ने ट्रॉली बैग साइड में खड़ा किया और दादी के पास चला आया। उसने उनके पैर छुए, तब जाकर दादी होश में लौटीं।
"बेटा..."
उन्होंने इतना ही कहा था कि अभि उठकर खड़ा हो गया और शांत लहज़े में बोला, "दादी, प्लीज़, आज आप या माँ कुछ नहीं कहेंगी मुझे। हमेशा मुझे ही समझाया जाता है, पर अब मुझे कुछ नहीं समझना। वैसे भी मैं जाने ही वाला था तो मुझे शांति से जाने दीजिए। चिंता मत कीजिए, मैं भले ही वापिस ना आऊँ, पर आप सबको बीच-बीच में वहाँ बुला लूँगा और बात भी करता रहूँगा तो आप परेशान मत होइए। बस आशीर्वाद दीजिए मुझे कि यहाँ से तो मैं सुकून से नहीं रह सका, कम से कम वहाँ तो मैं सुकून से जी सकूँ।"
०००००००००००
"दादी, प्लीज़, आज आप या माँ कुछ नहीं कहेंगी मुझे। हमेशा मुझे ही समझाया जाता है, पर अब मुझे कुछ नहीं समझना। वैसे भी मैं जाने ही वाला था, तो मुझे शांति से जाने दीजिए। चिंता मत कीजिए, मैं भले ही वापिस ना आऊँ, पर आप सबको बीच-बीच में वहाँ बुला लूँगा और बात भी करता रहूँगा, तो आप परेशान मत होइए। बस आशीर्वाद दीजिए मुझे कि यहाँ तो मैं सुकून से नहीं रह सका, कम से कम वहाँ तो मैं सुकून से जी सकूँ।"
अभिनव ने अपनी बात कही और एक बार फिर झुककर उनके पैर छू लिए। दादी मजबूर थीं। उन्होंने उसके सर पर हाथ रखकर उसे ढेरों आशीर्वाद दिए और जब वह उठकर खड़ा हुआ, तो प्यार से उसके चेहरे को चूम लिया। दादी की आँखें छलक आईं, पर उन्होंने अभिनव को रोकने के लिए एक शब्द तक नहीं कहा। बचपन से ही वह उसे घुट-घुटकर जीते देख रही थी; अब वह उसे कुछ पल सुकून से बिताने से रोक भी कैसे सकती थी?
अभिनव ने उनके आँसुओं को बड़े प्यार से साफ़ कर दिया और मुस्कुराने का इशारा किया। तो उन्होंने झूठी मुस्कान अपने लबों पर सजा ली।
अभिनव ने अब संध्या जी की तरफ़ कदम बढ़ा दिए।
"अपने और अपने पिता के बीच अपनी माँ को पिस रहे हो, बेटा। इस माँ की किस गुनाह की सज़ा दे रहे हो?"
संध्या जी के आँसुओं से भीगे शब्द अभिनव के कानों में पड़े, तो उसकी आँखों में भी नमी तैर गई। उसने नम आँखों से उन्हें देखते हुए कहा,
"आपको क्यों सज़ा दूँगा, माँ? आपने तो कभी कुछ गलत किया ही नहीं है। और आप रो क्यों रही हैं? आपको तो खुश होना चाहिए कि आपका यह नालायक बेटा हमेशा-हमेशा के लिए इस घर से जा रहा है; अब यहाँ ऐसा कोई नहीं होगा जो आपके पति के साथ बदतमीज़ी करे।
आपने ही कहा था ना कि आपके लिए पापा मुझसे ज़्यादा अहमियत रखते हैं, तो वे यहीं होंगे आपके साथ। फिर भला यह कैसी सज़ा हुई जो आप नहीं, मैं काटूँगा? यहाँ आपके साथ सब होंगे; अकेले तो मुझे रहना है, और यह मेरे गुनाह की सज़ा है कि मैंने इस घर में बेटा बनकर जन्म लिया।"
संध्या जी उसकी बातें सुनकर मुँह पर हाथ रखे रो पड़ीं। अभिनव की आँखों में आँसू भरे थे, पर उसने खुद को संभाल लिया और उन्हें सीने से लगाते हुए बोला,
"यहाँ से दूर जा रहा हूँ, पर आपसे अपना रिश्ता तोड़कर नहीं जा रहा। यहाँ नहीं आऊँगा, पर आप सबके साथ वहाँ मुझसे मिलने आ सकती हैं; फ़ोन पर बात भी होती रहेगी। नाराज़ नहीं हूँ आपसे, तो दुखी मत होइए, माँ।"
उसने बड़ी मुश्किल से संध्या जी को संभाला। वे कुछ शांत तो हुईं, पर आँसू अब भी थम-थम कर बह रहे थे। अभिनव अब अंजली के पास चला आया, जो सर झुकाए जाने कब से सिसक रही थी।
जैसे ही अभिनव ने उसके सर पर हाथ रखा, अंजली ने सर उठाकर भीगी आँखों से उसे देखते हुए कहा,
"सॉरी, भैया, सब हमारे वजह से हुआ है।"
अंजली की आँखों से आँसू बहने लगे। अभिनव ने उसके चेहरे को अपनी हथेलियों में भर लिया और बड़े ही प्यार से उसके आँसुओं को साफ़ करते हुए बोला,
"चल, पगली, तेरे वजह से कुछ भी नहीं हुआ है। मुझे तो वैसे भी आज जाना ही था। और जो हुआ उसमें तेरा कोई दोष नहीं, तो खुद को ब्लेम करना बंद कर। तू रो क्यों रही है? मैं इस घर से दूर जा रहा हूँ, तुझसे दूर थोड़े ना जा रहा हूँ? जहाँ भी रहूँगा, हमेशा तेरे साथ रहूँगा, बस तू एक बार आवाज़ दे देना; तेरा यह भाई दुनिया में कहीं भी क्यों ना रहे, तेरे पास पहुँच जाएगा। चल अब रोना बंद कर, रोते हुए अपनी भाई को भेजेगी?"
"भैया…" अंजली रुँधे गले से बस इतना ही कह सकी और रोते हुए अभिनव के गले से लग गई। अभिनव ने भी उसको अपने सीने से लगा लिया। मुश्किल तो उसके लिए भी बहुत था, पर उसने खुद को संभाला। एक बार फिर अपनी भावनाओं को अपने अंदर दबा लिया उसने और अंजली की पीठ सहलाते हुए बोला,
"अपना और बाकी सबका ख्याल रखना। ज़्यादा इधर-उधर की बातें सोचकर परेशान मत होना; अपना पूरा ध्यान अपनी पढ़ाई और अपने सपने पर केंद्रित करना। अगर कोई भी प्रॉब्लम हो तो बेझिझक मुझे फ़ोन कर लेना, याद रखना, तुम्हारा भाई भले ही तुमसे दूर हो, पर वह कभी तुमसे इतना दूर नहीं जाएगा कि तेरे बुलाने पर तेरे पास ना आ सके। अगर दोबारा कोई बदतमीज़ी करने की कोशिश करे तो चुप बिल्कुल मत रहना, सीधे मुझे बताना। और मेरे जाने के बाद मुझे याद करके आँसू मत बहाती रहना, वरना तेरी जो छोटी सी नाक है, तो फिर से बहने लगेगी।"
अभिनव ने मज़ाकिया लहज़े में कहा ताकि अंजली का मूड कुछ ठीक हो, पर इसका उल्टा ही असर हुआ। अंजली ने उसको कस के पकड़ लिया और फफक कर रोते हुए बोली, "मत जाइए ना, भैया…"
अभिनव की मुस्कान जाती रही और आँखों में नमी उतर आई। उसने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा, "जाना ज़रूरी है, बेटा। इस घर की सुख-शांति बनाए रखने के लिए भी और मेरे ज़िंदा रहने के लिए भी; अगर अभी नहीं गया तो कभी नहीं जा सकूँगा, और अब इस माहौल में रह पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं, जहाँ हर बात पर मुझे यह एहसास दिलाया जाता हो कि मैं गलत हूँ… तू छोटी तो नहीं, सब देखती है, समझ ना बच्चे… नहीं रह सकता मैं यहाँ…"
अभिनव का गला रुंध गया, तो वह खामोश हो गया। अंजली ने अब कुछ नहीं कहा। कुछ देर बाद उससे दूर हुई और अपने आँसुओं को पोंछते हुए बोली,
"ठीक है, मैं नहीं रोकूँगी आपको, पर अपना वादा याद रखिएगा, भैया; अगर मैंने बुलाया तो आपको वापिस आना होगा।"
"Hmm, पर बेवजह बुलाने पर नहीं आऊँगा।"
"Hmm, मैं बेवजह बुलाऊँगी ही नहीं।"
अभिनव ने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा, "मेरी बातें याद रखना और खुद को अकेला बिल्कुल मत समझना; तेरे एक बार आवाज़ देने पर, तेरा यह भाई तेरे पास आ जाएगा, यह बात हमेशा याद रखना।"
"Hmm।"
अंजली ने हाँ में सर हिला दिया, फिर कुछ सेकंड रुकने के बाद बोली, "आई लव यू, भैया, एंड आई विल मिस यू अ लॉट।"
"लव यू टू, माई छुटकी।"
कहते हुए अभिनव ने प्यार से उसके माथे को चूम लिया। अंजली की आँखें छलक आईं, पर लबों पर मुस्कान फैल गई। अभिनव ने मुड़कर एक बार भी किसी को नहीं देखा और न ही सुरेश जी से मिला ही। उसने उन्हें पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया और अपना बैग लेकर सीधे घर से बाहर चला गया।
उसके जाते ही अंजली रोते हुए संध्या जी से लिपट गई। रोना तो उन्हें भी आ रहा था, पर उन्होंने खुद को संभाला। भले ही अभिनव चला गया था, पर एक उम्मीद थी अब भी कि पास रहकर रिश्ते में जो दूरियाँ आई थीं, वे शायद इन दूरियों से नज़दीकियों में बदल जाएँ।
दादी अंजली के पास चली आईं और प्यार से उसके सर पर हाथ फेरते हुए बोलीं,
"बेटा, आपके कॉलेज में आज क्या हुआ था? हम जानते हैं कि अभि कभी बेवजह किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करता… बताइए हमें और बाकी सबको कि आपके कॉलेज में आज ऐसा क्या हुआ था कि अभि को लड़ाई करनी पड़ी?"
अंजली ने सर उठाकर दादी को देखा, तो उन्होंने उसे बताने को कहा। अंजली संध्या जी से दूर हो गई और उसने आज कॉलेज के बाहर जो भी हुआ, सब सच-सच उन्हें बता दिया। घर आने तक की सारी बात बताने के बाद अंजली सुरेश जी के सामने आकर खड़ी हो गई। वे अब भी पत्थर बने खड़े थे; चेहरे पर कोई भाव नहीं थे, इसलिए यह समझ पाना मुश्किल था कि आखिर उनके दिमाग में चल क्या रहा है?
अंजली ने अपने आँसुओं को अपनी हथेली से पोंछ लिया और रुँधे गले से बोली, "वे लड़के हमें रोज़ परेशान करते थे, पर हम उनकी बदतमीज़ियों को नज़रअंदाज़ कर देते थे क्योंकि हम बेवजह उनसे उलझना नहीं चाहते थे… जानते थे हम कि अगर हमने कुछ किया और बात बढ़ी तो उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा, पर अगर बात आप तक पहुँची तो आप हमारा कॉलेज जाना बंद करवा देंगे, इसलिए हम खामोशी से सब सहते रहे…
रोज़ वे बस दूर से वाहियात कॉमेंट पास करते थे, पर हमारी चुप्पी के वजह से उनकी हिम्मत इतनी बढ़ गई कि आज उन्होंने हमारा हाथ पकड़कर हमें रोक लिया… आज अगर भैया सही वक़्त पर नहीं आए होते तो हम अभी सही-सलामत आपके सामने नहीं खड़े होते…
भैया ने गुंडागर्दी नहीं की थी; उन्होंने उन बदमाशों को मारा था क्योंकि उन्होंने बदतमीज़ी की थी हमारे साथ, ऐसी बातें कही थीं कि भैया के जगह अगर हम भी होते तो हम भी वही करते… भैया ने पुलिस स्टेशन जाकर आपकी इज़्ज़त पर दाग़ नहीं लगाया है, बल्कि इस घर की इज़्ज़त पर दाग़ लगने से बचाया है। पुलिस ने तो उन्हें छुआ तक नहीं क्योंकि उन्होंने कुछ गलत किया ही नहीं था, पर आपने आज जो कहा वह गलत था, पापा…
सालों पहले जब ऐसी ही एक लड़ाई में भैया को चोट लगी थी और उसके बाद आपने उन्हें बहुत मारा था; उनका उनके दोस्तों से मिलना-जुलना, यहाँ तक कि बात तक करना बंद करवा दिया था, तब भी गलती भैया की नहीं थी… वे लड़कों ने हमें परेशान किया था; रोज़ स्कूल से आते-जाते वे हमें तंग करते थे, पर तब भी हमने किसी को कुछ नहीं बताया, लेकिन फिर भी भैया को पता चल गया और वह उन्हें समझाने गए थे, पर उन लड़कों ने ही लड़ाई शुरू की थी। पर तब भी आपने भैया से बिना पूरी बात पूछे उन्हें गलत ठहरा दिया था और तब हम आपके डर के वजह से कुछ कह नहीं सके थे, पर आज हम चुप नहीं रहेंगे…
आपने हमेशा से भैया के साथ ज्यादती की है; बिना किसी क़ुसूर के हमेशा उन्हें सज़ा देते आए हैं; आपके सख्त रवैये के वजह से भैया ऐसे बन गए और आज आपकी ही वजह से वे हम सबको छोड़कर हमेशा-हमेशा के लिए चले गए।"
अंजली ने पहली बार सुरेश जी के सामने इतना कुछ कहा था, पर वे अब भी यूँ ही खड़े थे। अंजली ने अपनी आँसू भरी निगाहों से उन्हें देखा, फिर रोते हुए वहाँ से भाग गई।
सारी सच्चाई सुनने के बाद संध्या जी की आँखें बहने लगीं। दादी की आँखों में आँसू थे, पर चेहरे पर क्रोध के भाव थे। अब वे सुरेश जी के सामने आकर खड़ी हो गई और रोष पूर्ण नज़रों से उन्हें देखते हुए बोली,
"जान गए ना अब आप सच्चाई? हमारे पोते ने कुछ गलत नहीं किया था, बल्कि गलत होने से बचाया था?… कैसे पिता हैं आप, सुरेश? आपने अपने बेटे पर कभी एतबार ही नहीं किया… इतने सख्त पत्थर दिल कैसे बन गए आप कि आज आपकी आँखों के सामने आपका जवान बेटा हमेशा-हमेशा के लिए घर छोड़कर चला गया और आपने एक बार उसे रोकने की कोशिश तक नहीं की…
आपको देखकर तो हमें लगता ही नहीं कि आपको उनके जाने से कोई फ़र्क भी पड़ा है… आपके लिए आज भी अपने बच्चे से ज़्यादा अहम अपनी इज़्ज़त है… आप यह कब समझेंगे कि इज़्ज़त किसी की जान या ज़िंदगी से बढ़कर नहीं होती? … कितनी बार हमने आपको समझाया था कि अभि आप पर ही गया है; उनके साथ इतनी सख्ती मत दिखाइए, पर आप उनके पिता बनने के जगह उनके भगवान बन गए और बचपन से लेकर आज तक उनकी ज़िंदगी को अपने हिसाब से चलाते रहे…
आपने कभी उनकी भावनाओं के बारे में नहीं सोचा… और आज आपके उसी ज़िद, गुस्से और सख्त रवैये के वजह से हमारा पोता हमसे दूर चला गया।… इसके लिए हम आपको कभी माफ़ नहीं करेंगे…"
दादी गुस्से से काँप रही थीं और आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। उन्होंने रोष पूर्ण दृष्टि सुरेश जी पर डाली, फिर थके कदमों से अपने कमरे की तरफ़ बढ़ गईं। आज उनके बूढ़े कदम उनका साथ नहीं दे रहे थे। उनके बुढ़ापे की लाठी, जिनके सहारे वे ज़िंदा थीं, आज वे उनसे दूर चली गई थी, जिसका गहरा आघात पहुँचा था उन्हें।
"आज आपके उसी ज़िद, गुस्से और सख्त रवैये के कारण हमारा पोता हमसे दूर चला गया। इसके लिए हम आपको कभी माफ़ नहीं करेंगे।"
दादी गुस्से से काँप रही थीं और आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। उन्होंने रोषपूर्ण दृष्टि सुरेश जी पर डाली, फिर थके कदमों से अपने कमरे की ओर बढ़ गईं। आज उनके बूढ़े कदम उनका साथ नहीं दे रहे थे। उनके बुढ़ापे की लाठी, जिनके सहारे वे जीवित थीं, आज उनसे दूर चली गई थी, जिसका गहरा आघात उन्हें पहुँचा था।
दादी के कदम लड़खड़ाए तो संध्या जी ने आगे बढ़कर उन्हें सहारा देना चाहा, पर दादी ने हाथ दिखाकर उन्हें रोकते हुए कहा, "रहने दे, बहू। जिसका सहारा था, मेरे बुढ़ापे की उस लाठी को आज तेरे पति ने मुझसे छीन लिया, अब खुद से संभलने की आदत डालने दे मुझे।"
उन्होंने सोफ़े का सहारा लिया और आगे बढ़ गईं। संध्या जी नम आँखों से उन्हें जाते हुए देखती रहीं। फिर उनके जाने के बाद उन्होंने सुरेश जी की ओर निगाहें घुमाईं, पर उनके कुछ बोलने से पहले ही वे बोल उठे,
"अगर आपको भी कुछ कहना है तो कह दीजिए। आप भी हमें हमारी गलतियाँ गिनवा दीजिए, आप भी हमें दोष दीजिए अभि के जाने का, आप भी हमसे मुँह मोड़ लीजिए, जो भी कहना है कह दीजिए, आज आपको भी चुप रहने की ज़रूरत नहीं है।"
संध्या जी कुछ पल खामोश सी उन्हें देखती रहीं। कितने ही भाव सुरेश जी के चेहरे पर अपना वजूद ज़ाहिर करने की जद्दोजहद में लगे थे, पर आज भी उन्होंने उन भावों को अपने चेहरे पर झलकने का अधिकार नहीं दिया था। हमेशा की तरह वही भावहीन चेहरा आज फिर उनके सामने था।
"आप ठीक हैं?" अचानक संध्या जी के इस सवाल को सुनकर सुरेश जी एकदम से चौंक गए और उनके भावहीन चेहरे पर हैरानी के भाव पैर पसारने लगे। संध्या जी ने अपनी भावनाओं को अपने अंदर दबा लिया और सुरेश जी को चिंता भरी नज़रों से देखते हुए बोलीं,
"अर्धांगिनी हूँ मैं आपकी, शादी के शुरुआती दिनों से ही आपके शब्दों के बजाय आपकी खामोशी और मौन बातों को सुनती आई हूँ। आपने कभी ज़ाहिर नहीं किया, फिर भी मैं आपकी उन भावनाओं को समझ जाती हूँ जिन्हें आप बाकी सबके साथ-साथ खुद से भी छुपा लेते हैं। सबने अभि के प्रति आपका सख्त रवैया देखा है और मैंने आपको हर पल उनकी चिंता में जलते देखा है।
जानते हैं आप, दिखा नहीं रहे, पर उनकी कही कड़वी बातों से जितनी तकलीफ़ हमें होती है, उससे कहीं गुना ज़्यादा तकलीफ़ आपको होती है। आप अपनी भावनाओं को छुपाने में माहिर हैं, इसलिए अभि कभी आपके गुस्से के पीछे छुपे आपके प्यार और परवाह को देख ही नहीं सका, पर मैंने देखा है उस प्यार और परवाह को।
उनके होने पर आपके चेहरे पर पहली बार सच्ची मुस्कान देखी थी मैंने, और उसी से ज़ाहिर होता है कि कितने अहम हैं वे आपके लिए। बचपन में उनके साथ मुझसे ज़्यादा आप रहे हैं। उन्हें कितना संजोकर रखते थे आप कि कहीं उन्हें एक खरोंच ना आ जाए, कभी उनकी तबियत ख़राब हो जाती तो मैं नहीं, आप उनकी चिंता में सारी-सारी रात जागकर काट देते थे। बदलने लगे थे आप उनके लिए, पर फिर एक तूफ़ान आया और अपने साथ हमारी सारी खुशियाँ उड़ाकर ले गया।
हमें नहीं पता कि क्यों बच्चों के बीच हुई एक छोटी सी लड़ाई के कारण आपका अभि के प्रति रवैया एकदम से बदल गया? क्यों आप उनके प्रति इतने स्ट्रिक्ट हो गए? सख्त तो आप पहले भी थे, पर इतने नहीं थे। आपके सख्त रवैये के कारण अभि धीरे-धीरे खामोश होता चला गया और साथ ही आप दोनों के रिश्ते के बीच दूरियाँ बढ़ती चली गईं। पर उस गुस्से और सख्त रवैये के पीछे भी मैंने अभि के लिए आपका प्यार और परवाह ही देखी है।
हम ये नहीं जानते कि क्यों आप उनके प्रति इतने स्ट्रिक्ट रहते हैं और न ही हम आप दोनों में से किसी को भी गलत ठहरा सकते हैं। सबने आपको दोष दिया, पर हमारी बेबसी देखिए कि हम ये भी नहीं कर सकते क्योंकि हम जानते हैं कि अगर अभि के जाने से हमें तकलीफ हुई है तो आपको हमसे भी ज़्यादा तकलीफ हुई होगी, पर हमेशा की तरह आपने अपने दर्द को अपने भावहीन चेहरे के पीछे छुपा लिया, जिसे कोई देख नहीं सका, पर मुझसे कुछ भी छुपा नहीं है।
इसलिए मैं आपको कुछ दोष नहीं दे सकती। पर इतना ज़रूर कहूँगी कि इससे पहले कि अभि आपसे और आपके साथ-साथ हम सब से पूरी तरह दूर चला जाए और आपका उनसे रिश्ता पूरी तरह से ख़त्म हो जाए, अभि और अपने रिश्ते में आई इन दरारों को भर लीजिये। उनके मन में जो कड़वाहट जन्म ले चुकी है, उसे वक़्त रहते मिटा दीजिए, वरना अगर बहुत देर हो गई तो आप और हम पछताने के सिवा कुछ नहीं कर सकेंगे।"
संध्या जी अपनी बात कहकर दादी के कमरे की ओर बढ़ गईं। सुरेश जी अब भी उसी जगह पत्थर बने खड़े थे। उनके दिलों-दिमाग़ में ख़्यालों का बवंडर उमड़ रहा था। अभि का रवैया उन्हें तकलीफ़ देता था और आज जिस तरह से वह अपनी शिकायत ज़ाहिर करके घर से गया था, सुरेश जी सोचने पर मजबूर हो गए थे कि आखिर उन्होंने कहाँ और क्या गलत किया था?
अभि गुस्से में घर से निकल गया था। पहले उसने डॉक्टर के पास जाकर अपनी मरहम-पट्टी करवाई, फिर सीधे एयरपोर्ट के लिए निकल गया। फ़्लाइट में अभी समय था तो वह वेटिंग एरिया में बैठकर इंतज़ार करने लगा। आज घर छोड़कर आ गया था वह जबकि उसने ऐसा सोचा नहीं था कभी, पर आज गुस्से में उसने इतना बड़ा स्टेप ले लिया था। हालाँकि उसे अफ़सोस घर छोड़ने का नहीं था, बस घर पर सबको दुखी करके आया था, यही सोचकर थोड़ा परेशान था वह।
यूँ ही सोचते-सोचते उसका ध्यान अपने कलाई पर पहने ब्रेसलेट पर चला गया। उसने ब्रेसलेट को देखते हुए मन ही मन कहा,
"गलत था मैं। कमी तुम में नहीं, मुझ में थी। तुमसे बेहतर तरीके से रिश्ते कोई निभा ही नहीं सकता। तुमने तो अकेले पाँच सालों तक हमारे रिश्ते को संभाला था, मेरा कंट्रीब्यूशन तो न के बराबर रहा था, जितने सेक्रिफ़ाइसेज़ किए तुमने, जितना एड्जस्टमेंट करना पड़ा वो तुमने किया, मेरे मूड स्विंग्स, मेरा गुस्सा, सब कुछ सहा पर कभी शिकायत तक नहीं की।
अपने पापा की तरह डोमिनेटिंग था मैं। जैसे उन्हें कभी मेरी क़द्र नहीं समझ आई, वैसे ही मैं भी कभी तुम्हारी अहमियत नहीं समझ पाया। ऐसा नहीं था कि मैं नहीं जानता था कि तुम क्या हो मेरे लिए, जानता था मैं, पर फिर भी मैं गलती पर गलती करता चला गया। रिश्ता बना तो लिया, पर उसे निभाना नहीं सीख सका मैं और जब तक अपनी गलतियों का एहसास हुआ, तुम मुझसे बहुत दूर जा चुकी थी।
तब भी चाहता था कि एक कोशिश करूँ अपनी सभी गलतियों को सुधारने की, पर पापा की बातों को याद करके मैंने अपने कदम पीछे खींच लिए। पहले ही तुम्हारी ज़िंदगी में इतनी प्रॉब्लम्स थीं, मैंने भी तुम्हें सिर्फ़ तकलीफ़ ही दी, अपने कारण तुम्हें मुश्किल में नहीं डालना चाहता था इसलिए हमारे रिश्ते को वहीं ख़त्म होने दिया।
अगर उस वक़्त मैं तुम्हारी नाराज़गी दूर कर भी लेता, तब भी पापा का तुम्हारे प्रति जो रवैया था, मैं जानता था कि आगे चलकर मजबूरी में तुमसे ब्रेकअप करना ही पड़ता और अगर ऐसा होता तो उससे तुम्हें ज़्यादा तकलीफ होती, उससे अच्छा तो यही था कि हम यूँ ही बिना किसी बात के अलग हो जाएँ। कम से कम तब तुम मुझे भुलाकर अपनी ज़िंदगी में आगे तो बढ़ सकती थी, पर अगर मैं तुम्हें अपनी मजबूरी बता देता तो तुम उसी मोड़ पर खड़ी होकर मेरा इंतज़ार करती रहती, जिस मोड़ पर आज तक मैं खड़ा हूँ।
हम साथ नहीं, पर मेरे दिल में आज भी सिर्फ़ तुम हो और मेरे आख़िरी साँस तक मैं सिर्फ़ तुमसे मोहब्बत करूँगा। पता है, अब मुझे लगता है कि अच्छा ही हुआ जो हम अलग हो गए क्योंकि तुम बहुत अच्छी हो और मैं तुम्हें बिल्कुल भी डिज़र्व नहीं करता। मैं तब भी तुम्हारे लायक नहीं था और आज भी मैं तुम्हारे काबिल नहीं हूँ। तुम मुझसे बेहतर लाइफ़ पार्टनर डिज़र्व करती हो।
कोई ऐसा जो तुम्हें मुझसे भी ज़्यादा प्यार करे, जो तुम्हारी क़द्र करे और प्यार के साथ-साथ तुम्हारी इज़्ज़त भी करे, जो तुम्हारे लिए लड़ सके और जो एक बार तुम्हारा हाथ थामे तो बीच रास्ते में तुम्हारा साथ ना छोड़कर जाए, उस रिश्ते को सारी ज़िंदगी निभाए, जो तुम्हारी ज़िंदगी को खुशियों से भर दे, जिसका साथ तुम्हारे लबों पर आई मुस्कान की वजह बने। और मैं वो नहीं हूँ। मैं तुम्हें डिज़र्व नहीं करता, पर तुम्हारी यादों पर सिर्फ़ मेरा अधिकार है और इन्हीं यादों के सहारे मैं अपनी पूरी ज़िंदगी बिता दूँगा।"
अभिनव ने झिलमिलाती आँखों से उस ब्रेसलेट को देखा और उसे अपने लबों से छू लिया। इतने में फ़्लाइट की अनाउंसमेंट हो गई और अभिनव अपना सामान लेकर चल पड़ा अपनी ज़िंदगी के इस नए शहर पर अपने प्यार की यादों के साथ।
लगभग चार घंटे बाद वह नैनीताल के एक बड़े से होटल के कमरे में बिस्तर पर पड़ा हुआ था। बंद आँखों में एक चेहरा तैर रहा था, जिसकी खिलखिलाती मुस्कान अभिनव के लबों पर आई मुस्कान की वजह बन चुकी थी।
एक ओर अभिनव अपनी ज़िंदगी के इस नए सफ़र पर निकल चुका था। अपने सभी रिश्तों को पीछे छोड़कर वह अकेला आगे बढ़ रहा था, अपने प्यार की यादों के साथ। दूसरी ओर उसके परिवार वाले अलग ही शोक में डूबे हुए थे।
अभिनव तो चला गया था, पर उसके जाते ही यह परिवार भी बिखर गया था। संध्या जी दादी को संभालने में लगी थीं, अंजली अलग अपने कमरे में बंद थी और सुरेश जी अपने कमरे में आराम कुर्सी पर बैठे गहरी चिंता में लीन थे।
रात कब गुज़री किसी को पता ही नहीं चला। अभिनव सारी रात नहीं सोया था। सुबह होते ही उसने फ़्रेश होकर कपड़े बदले और वक़्त पर अपने बैंक पहुँच गया, जहाँ आज से उसे मैनेजर की पोस्ट संभालनी थी। वहाँ उसका ग्रैंड वेलकम किया गया। सबसे उसका परिचय करवाया गया।
अभिनव आज फिर अपने कोल्ड अवतार में लौट चुका था, कल के निशान अब कुछ हल्के हो चुके थे, पर अब भी चेहरे पर कई जगह लाल निशान देखे जा सकते थे और उसके निशान देखकर बैंक के कर्मचारी आपस में बातें भी करने लगे थे, पर अभिनव के सख्त रवैये को देखकर किसी की हिम्मत नहीं हुई उससे कुछ भी पूछने की।
पहला दिन था आज अभिनव का वहाँ तो वह अपने केबिन में जाकर बैठ गया और पुराने सभी रिकॉर्ड्स चेक करने लगा। सारा दिन उसका काम में ही निकला। शाम होने पर अब उसे घर जाना था जो उसने अभी तक ढूँढा नहीं था। बैंक में ही कैशियर की पोस्ट पर काम करने वाले अंकल से उसने आस-पास घर के बारे में पूछा और फिर बैंक से फ़्री होने के बाद उनकी बताई जगह के लिए निकल गया।
दूसरी ओर शिवांगी की कल की मीटिंग, हेड मतलब CEO के ऑफ़िस में ना होने के कारण दो दिन के लिए टाल दी गई थी। रोज़ की तरह वह आज भी ऑफ़िस से घर लौटी और फिर फ़्रेश होने के लिए कमरे में चली गई।
आज वह ज़रा जल्दी आ गई थी क्योंकि सुबह से ही उसे अजीब सी बेचैनी हो रही थी। इसलिए अपना काम ख़त्म करके वह जल्दी घर आ गई थी। काकी ने उसके लिए कॉफ़ी बना दी। कुछ देर बाद शिवांगी लिविंग रूम में आई और काकी की दी कॉफ़ी का कप लेकर सोफ़े पर बैठकर इत्मीनान से कॉफ़ी पीने लगी।
अभी उसने एक ही घूँट ली ही थी कि डोरबेल की आवाज़ उसके कानों में पड़ी। शिवांगी के चेहरे पर कुछ हैरानी के भाव उभर आए। उसने घड़ी की ओर निगाहें घुमाईं तो सात बजने वाले थे। उसके काकी के अलावा घर पर किसी का आना-जाना नहीं था, इसलिए डोरबेल बजने पर वह कुछ हैरान हो गई थी।
शिवांगी लिविंग रूम में आई और काकी ने दी कॉफ़ी का कप लेकर सोफ़े पर बैठकर इत्मीनान से कॉफ़ी पीने लगी।
अभी उसने एक ही घूँट लिया था कि डोरबेल की आवाज़ उसके कानों में पड़ी। शिवांगी के चेहरे पर कुछ हैरानी के भाव उभर आए। उसने घड़ी की तरफ़ देखा तो सात बजने वाले थे। उसके काकी के अलावा घर पर किसी का आना-जाना नहीं था, इसलिए डोरबेल बजने पर वह कुछ हैरान हो गई थी।
वह अभी दरवाज़ा खोलने के लिए उठी ही थी कि काकी किचन से बाहर निकलते हुए तेज़ आवाज़ में बोलीं,
"आते हैं भई, थोड़ा सब्र कीजिए।"
काकी बोलते हुए दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गईं। शिवांगी वापिस सोफ़े पर बैठकर कॉफ़ी पीने लगी, पर अब उसका ध्यान दरवाज़े की तरफ़ ही था। जाने क्यों एक बार फिर से उसकी धड़कनें बेचैन हो गई थीं।
काकी ने दरवाज़ा खोला। जैसे ही सामने खड़े लड़के पर उनकी नज़र पड़ी, उनकी आँखें हैरानी से फैल गईं। वे आँखें फाड़े उस लड़के को देखती रहीं।
सामने खड़े लड़के को उनका यह रिएक्शन और यूँ एकटक घूरना कुछ ठीक नहीं लगा। उसने उनके आगे हाथ जोड़ते हुए कहा,
"नमस्ते।"
उसकी आवाज़ काकी के कानों में पड़ी तो जैसे वे गहरी नींद से जागीं और तुरंत ही उन्होंने हाथ जोड़ते हुए कहा,
"नमस्ते? आप यहाँ........"
काकी अब भी आँखें बड़ी-बड़ी करके उसे ही देखे जा रही थीं। शायद अपनी आँखों पर उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था। उस लड़के ने जब उनके अधूरे सवाल को सुना तो गहरी निगाहों से उन्हें देखने लगा, जैसे उन्हें पहचानने की कोशिश कर रहा हो। थोड़ा चौंकते हुए बोला,
"क्या हम एक-दूसरे को जानते हैं?....... आई मीन, मुझे याद नहीं आ रहा कि मैंने आपको पहले कभी देखा हो, पर जिस तरह से आप मुझे देख रही हैं और जो सवाल आपने किया, उसके बाद मुझे लग रहा है जैसे आप मुझे पहले से जानती हैं।"
लड़के के सवाल सुनकर काकी कुछ पल खामोशी से उसे देखती रहीं। फिर उन्होंने सवाल का जवाब देने के बजाय उल्टा उसी से सवाल कर दिया,
"आपके यहाँ आने की वजह?"
लड़का, जो अब भी उन्हें पहचानने की नाकाम कोशिश कर रहा था, उसका ध्यान एकदम से उस वजह की तरफ़ चला गया जिसके कारण वह यहाँ आया था। उसने तुरंत ही सहजता से जवाब दिया,
"जी, एक्चुअली, मैं यहाँ नया-नया आया हूँ। मुझे मिस्टर शर्मा से पता चला कि आप एक रूम को किराये पर लगाना चाहती हैं, बस इसलिए मैं यहाँ आया हूँ। मुझे अर्जेंटली रहने की जगह की ज़रूरत है, अकेला हूँ और पास ही बैंक में काम करता हूँ। आपका घर मेरे वर्कप्लेस के पास है तो आने-जाने में मुझे सहूलियत होगी, अगर आप वो रूम मुझे रेंट पर दे सकें तो मेरे लिए अच्छा हो जाएगा।"
काकी तो बस हैरान-परेशान सी उसे देखती ही रहीं। कुछ समझने तक का मौका नहीं मिला उन्हें। वे अभी लड़के की बात को समझ ही रही थीं कि पीछे से शिवांगी की आवाज़ आई,
"काकी, कौन आया है इस वक़्त हमारे घर, जिससे आप इतनी देर से गेट पर खड़े होकर बातें किए जा रही हैं?"
काकी जिनका ध्यान अब तक उनके सामने खड़े लड़के पर केंद्रित था, अब उनका ध्यान शिवांगी की तरफ़ चला गया। उनकी घबराहट भरी निगाहें लड़के की तरफ़ घूम गईं, जिसके चेहरे के भाव अब कुछ बदल से गए थे।
"ये घर हमारा नहीं है, आप यहीं रुकिए, हम अंदर बात करके आते हैं, उसके बाद आपको उनका फ़ैसला बताते हैं।"
काकी ने एक साँस में अपनी बात कही और दरवाज़ा हल्का खुला छोड़कर अंदर चली गईं। गेट पर खड़े लड़के के चेहरे पर शिवांगी की आवाज़ सुनकर उलझन भरे भाव आ गए थे, जैसे वह उस आवाज़ को पहचानने की कोशिश कर रहा हो या पहचान गया हो, पर उसका दिमाग़ उसके दिल की बात को मानने से इंकार कर रहा था।
काकी शिवांगी के पास आ गईं। उसने फिर से उनसे वही सवाल किया,
"काकी, कौन आया था गेट पर? जिससे आप गेट पर ही खड़ी होकर इतनी देर तक गप्पे मार रही थीं?"
शिवांगी ने आदतन शरारत से अपनी आँखें घुमाईं, पर काकी के भाव बेहद गंभीर थे। उन्होंने गंभीरता से कहा,
"एक लड़का आया है किराये के लिए बात करने।"
जैसे ही काकी ने यह कहा, शिवांगी की मुस्कान झट से गायब हो गई। उसकी आँखें हैरानी से फैल गईं और मुँह से एक ही शब्द निकला,
"व्हाट!"
कुछ सेकंड ठहरने के बाद उसने हैरानी से कहा,
"किराये के लिए बात करने आया है? का क्या मतलब? आपने घर किराये पर देने की बात की है क्या? पर फिर हम कहाँ रहेंगे?"
"हमने बात नहीं की थी। कल मिसेज़ शर्मा घर आई थीं तो तीसरा रूम जो बंद रहता है, उसे देखकर उन्होंने ही कहा कि क्यों बेवजह रूम बंद किया हुआ है? उसे किराये पर लगा दे, जिससे कुछ पैसे भी आ जाएँगे और कमरे की साफ़-सफ़ाई भी बराबर होती रहेगी, साथ ही हमें भी साथी मिल जाएगा। तो हमने बातों-बातों में उनकी बात पर सहमति जता दी।....... हमने तो बात टालने के लिए यूँ ही कह दिया था, पर शायद उन्होंने हमारी बात को गंभीरता से ले लिया और अब उनके पति ने ही किसी को किराये के लिए बात करने के लिए भेजा है।"
काकी ने सारी बात शिवांगी को बता दी। इसे सुनकर उसका सर, जो पहले से ही दर्द कर रहा था, अब और ज़्यादा दर्द करने लगा। उसने अपना सर पकड़ लिया और हल्के गुस्से से बोली,
"उस औरत को आखिर दिक्कत क्या है? जब देखो हमारे मामलों में घुसी चली आती है। हमें क्या करना है और क्या नहीं हम खुद देख लेंगे, उन्हें क्यों अपनी टाँग बीच में लाने की पड़ी रहती है?......... बड़ी आई हमें रूम किराये पर लगाने की सलाह देने वाली.......... और आपने हामी भरी ही क्यों? एक रूम है, कैसे लगेगा किराये पर? और अगर कोई आएगा तो मुझे डिस्टरबेंस होगी और यह मुझे बिल्कुल बर्दाश्त नहीं..............
मेरे पास पैसों की कोई कमी नहीं है। यह घर मैंने अपने लिए खरीदा था ताकि सुकून से रह सकूँ। किसी की रोक-टोक ना रहे, फ़्रीली रह सकूँ, कोई डिस्टर्ब ना करे मुझे, इसलिए मैं कोई रूम किराये पर नहीं लगाने वाली............. ऊपर से भेजा भी तो एक लड़के को, अब तो मैं किसी कीमत पर रूम रेंट पर नहीं लगाऊँगी, वो जो भी है उसे उल्टे पाँव वापिस जाने को कह दीजिए। हमें हमारा रूम बंद ही पसंद है, हमें नहीं रखना किसी किरायेदार को अपने घर में।"
शिवांगी का माथा गरम हो गया था। यह देखकर कि रेंट पर रहने के लिए भेजा भी तो एक लड़के को, वह भी यह जानने के बाद कि उस घर में सिर्फ़ दो लेडीज़ ही रहती हैं। उसने तो साफ़ तौर पर अपना फ़ैसला सुना दिया और उसका फ़ैसला अडिग था। काकी परेशान सी उसे देखने लगीं।
अभी शिवांगी ने अपनी बात पूरी ही की थी और काकी कुछ कहने जा ही रही थीं कि एक जानी-पहचानी सी आवाज़ शिवांगी के कानों से टकराई,
"एक्सक्यूज़ मी, मे आई........."
ये चंद शब्द शिवांगी को अतीत की यादों में ले गए।
फ़्लैशबैक
1 जुलाई
वही दिन जब पिछली क्लास पास करने और गर्मी की छुट्टियाँ बिताने के बाद बच्चे वापिस स्कूल आते हैं। पर ग्यारहवीं वालों का हाल कुछ जुदा होता है। उनका तो आज पहला दिन था उस क्लास में।
कॉमर्स की क्लास, जिसमें करीब बीस लड़कियाँ और गिनती के आठ-नौ लड़के नज़र आ रहे थे। पर सीट्स सभी फ़ुल थीं। कहीं कुछ स्टूडेंट्स अकेले बैठे थे तो कहीं पूरा ग्रुप बना हुआ था और बातें चालू थीं। अभी प्रेयर का टाइम नहीं हुआ था, स्टूडेंट्स अभी आ ही रहे थे।
क्लास में काफ़ी शोर हो रहा था। उसी शोर में सेकंड रो की सेकंड सीट पर एक लड़का खामोशी से हेड डाउन करके बैठा हुआ था। कुछ देर बाद क्लास में एक लड़की ने कदम रखा। उसने पूरे रूम में निगाहें घुमाईं, फिर उस लड़के की तरफ़ बढ़ गई।
"एक्सक्यूज़ मी, मे आई........"
लड़की की मीठी सी आवाज़ उस लड़के के कानों में पड़ी तो उसने सर उठाकर देखा..........
"एक्सक्यूज़ मी, मे आई कम इन..........."
शिवांगी अतीत की यादों में खोई हुई थी और उस लड़के का चेहरा देखने ही वाली थी कि अचानक एक बार फिर वही जानी-पहचानी सी आवाज़ उसके कानों से टकराई और वह अतीत की यादों से बाहर आ गई। हैरान-परेशान निगाहें आवाज़ की दिशा में घूम गईं और जब उसकी निगाहें दरवाज़े पर खड़े लड़के पर पड़ीं, उसकी आँखें अविश्वास से फैल गईं और थरथराते लबों से धीमी सी आवाज़ निकली,
"अभि!"
सामने और कोई नहीं, बल्कि अभिनव ही खड़ा था जिसकी निगाहें शिवांगी के चेहरे पर टिकी हुई थीं। सालों बीत गए थे उन्हें एक-दूसरे को देखे हुए और आज जब वे एक बार फिर एक-दूसरे के सामने थे तो उनकी निगाहें एक-दूसरे पर ऐसे ठहर गईं, मानो बरसों की प्यास इस एक पल में मिटाना चाहते हों।
कहने को शायद बहुत कुछ था उनके पास, पर लब एकदम खामोश थे, लेकिन धड़कनें शोर कर रही थीं। उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि उनकी किस्मत उन्हें एक दिन यूँ एक-दूसरे के सामने लाकर खड़ा कर देगी।
इतने वक़्त के बीतने के बाद तो उन्होंने उम्मीद भी छोड़ दी थी कि दोबारा कभी एक-दूसरे को देख भी सकेंगे, पर वे कहते हैं ना कि समय बड़ा बलवान होता है, कब कौन सा चमत्कार कर दे कोई नहीं समझ सकता। ऐसा ही कुछ आज उन दोनों के साथ हो रहा था।
दो इंसान जो सालों पहले एक-दूसरे से मुँह मोड़कर अलग-अलग रास्तों पर चल पड़े थे, आज फिर वे एक-दूसरे के सामने खड़े थे, पर अब वह पहली वाली बात नहीं थी उनके बीच।
जिसे देखकर एक वक़्त पर शिवांगी के लबों पर गहरी मुस्कान फैल जाती थी, आज उसके चेहरे पर अजीब सी उदासी और बेचैनी नज़र आ रही थी। दूसरी तरफ़ अभिनव के हमेशा भावहीन रहने वाले चेहरे पर अनेकों भाव एक साथ नज़र आने लगे थे।
जाने कितनी ही देर तक वे अपलक एक-दूसरे को देखते हुए अपने प्यार की छवि को अपनी आँखों के रास्ते अपने दिल की गहराइयों तक उतारते रहे, फिर धीरे-धीरे उनके दिल में सालों से दफ़्न भावनाएँ अपना अस्तित्व तलाशने लगीं और अपने प्यार से बिछड़ने और सालों बाद मिलने की तड़प और बेचैनी उनके आँखों में नमी बनकर उतर आई।
धीरे-धीरे सामने खड़े इंसान की छवि धुंधली होती चली गई और एक साथ ही दोनों ने अपना चेहरा फेरते हुए अपनी आँखों की नमी को साफ़ कर लिया।
अभिनव को तो आदत थी, तो एक बार फिर उसने अपने ज़ज़्बातों को अपने दिल की गहराइयों में दफ़्न कर दिया और वापिस शिवांगी की तरफ़ घूम गया।
शिवांगी अब भी उसकी तरफ़ पीठ किए खड़ी थी। आँखों से बहते आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। बहुत कुछ कहना चाहती थी वह, पर अब कुछ भी पहले जैसा नहीं था। सालों बाद आज अभिनव को देखकर उसकी खुशी कहो या सालों पहले बिछड़ने का दर्द जो आज फिर उसकी आँखों में झलकने लगा था, जो उसके आँसू नहीं रुक रहे थे।
सालों बीत गए थे उनके रिश्ते के टूटे हुए, पर आज भी वह मूव ऑन नहीं कर सकी थी। दिल के किसी कोने में अब भी वह एहसास ज़िंदा थे जो उसे अभिनव से जोड़ते थे। और आज उसके यूँ अचानक सामने आने पर दिल में दफ़्न वह प्यार एक बार फिर बाहर आने को मचलने लगा था।
वह अपनी भावनाओं को काबू करने की कोशिश ही कर रही थी कि अभिनव की ठहरी हुई शांत आवाज़ उसके कानों में पड़ी,
"हाय, शिवि।"
शिवांगी के लब बरबस ही मुस्कुरा उठे। कितने इंतज़ार के बाद आज उसने अपना यह नाम सुना था और आज भी उसी शख्स ने उसे इस नाम से पुकारा था जिसने उसे यह नाम दिया था। शिवांगी की सारी बेचैनी एक पल में ख़त्म हो गई। सुकून की एक लहर सी उसके चेहरे पर दौड़ गई। उसने अपनी भावनाओं को संभाला, फिर अपने आँसुओं को पोंछकर अभिनव की तरफ़ घूम गई और लबों पर हल्की मुस्कान सजाते हुए बोली...
०००००००००००
शिवांगी के होंठ बरबस ही मुस्कुरा उठे। कितने इंतज़ार के बाद आज उसने अपना यह नाम सुना था, और आज भी उसी शख्स ने उसे इस नाम से पुकारा था जिसने उसे यह नाम दिया था। शिवांगी की सारी बेचैनी एक पल में खत्म हो गई। सुकून की एक लहर सी उसके चेहरे पर दौड़ गई। उसने अपनी भावनाओं को संभाला, फिर अपने आँसुओं को पोंछकर अभिनव की तरफ़ घूम गई और लबों पर हल्की मुस्कान सजाते हुए बोली,
"हाय।"
उसके होंठ भले मुस्कुरा रहे थे, पर आँखों में अब भी नमी मौजूद थी।
कुछ पल अभिनव को देखने के बाद शिवांगी ने फिर से कहा, "लॉन्ग टाइम नो सी।"
अभिनव, जो उसकी नम आँखों को देख रहा था, ने उसकी बात सुनकर हामी भरते हुए झूठी मुस्कान के साथ कहा,
"Hmm, लॉन्ग टाइम नो सी....... हाउ आर यू?"
"आई एम परफेक्टली फ़ाइन, लाइक एज़ ऑलवेज़।"
"गुड।"
अभिनव इतना कहकर चुप हो गया। ये चंद बातें कितनी मुश्किल से की थीं उन्होंने, यह वही जानते थे। पर अब दोनों ही शब्दों को ढूँढ़ने की जद्दोजहद में लगे थे। साइड में खड़ी काकी उन दोनों को ही देख रही थी।
अभिनव का तो नेचर ही ऐसा था कि वह जल्दी से कुछ कहता नहीं था, इसलिए लाख सोचने के बाद भी वह समझ नहीं सका कि आगे क्या कहे, या शायद वह हिचकिचा रहा था उससे बात करने में।
कुछ देर की चुप्पी के बाद शिवांगी ने ही बात शुरू की,
"तुम कैसे हो?"
"तुम्हारे सामने ही हूँ, देख लो।"
अभिनव के सवाल सुनकर शिवांगी ने ऊपर से नीचे तक अभिनव को देखा, फिर फ़ीकी मुस्कान के साथ बोली,
"पहले से अलग लग रहे हो।"
"Hmm, वक़्त के साथ काफ़ी बदल गया हूँ।"
फिर उसने कुछ देर की खामोशी के बाद शिवांगी को देखते हुए कहा, "वैसे तुम भी काफ़ी बदल गई हो। काफ़ी मैच्योर लग रही हो।"
"थैंक्स, पर वक़्त और हालात मैच्योर बना ही देते हैं।"
"Hmm।"
एक बार फिर दोनों के बीच गहरी खामोशी छा गई और चेहरों पर अजीब सी उदासी नज़र आने लगी। शिवांगी अपनी उंगलियों को आपस में उलझाते हुए निगाहें घुमाने लगी, वहीं अभिनव की निगाहें शिवांगी के चेहरे पर टिकी थीं। इसका एहसास शिवांगी को भी था और यही वजह थी कि उसकी धड़कनें सामान्य से तेज़ चल रही थीं।
कुछ पल दोनों ही शब्दों की खोज में लगे रहे, फिर उन्होंने एक साथ ही पूछा, "तुम यहाँ............"
दोनों ने एक ही सवाल किया और जब एहसास हुआ तो एक साथ ही चुप हो गए। लबों पर अनायास ही हल्की मुस्कान उभर आई। अभिनव को खामोश देखकर शिवांगी ने मुस्कुराकर कहा,
"पहले मैंने सवाल किया था और लेडीज़ फ़र्स्ट होता है तो पहले तुम बताओ कि दिल्ली से सीधे नैनीताल कैसे आना हुआ?"
"बदकिस्मती से कुछ दिनों पहले ही मेरा प्रमोशन के साथ-साथ ट्रांसफ़र हुआ है। यहीं आधे किलोमीटर दूर के पीएनबी के ब्रांच में एज़ अ मैनेजर अपॉइंट हुआ हूँ। आज से ही ड्यूटी जॉइन की है।"
अभिनव ने सहजता से जवाब दिया। उसका जवाब सुनकर शिवांगी ने मुस्कुराकर अपने होंठों को गोल करते हुए कहा, "ओहो, नाइस! कांग्रैचुलेशन्स!"
"थैंक्स। कब तुम बताओ, यहाँ कैसे?"
"मैं तो पिछले कई सालों से यहाँ हूँ। एएसएन ब्यूटी कंपनी में एज़ अ मार्केटिंग मैनेजर काम करती हूँ मैं और यहीं रहती हूँ।"
"गुड।"
दोनों ही खुद को सामान्य दिखाने की जद्दोजहद में लगे थे, पर बेचैनी उनके चेहरे पर साफ़ नज़र आ रही थी। शब्दों का भारी अभाव महसूस कर रहे थे वे, या शायद क्या कहें और क्या नहीं, इसके बीच उलझे हुए थे।
अभिनव कुछ पल खामोशी से शिवांगी को देखता रहा, फिर घर में निगाहें घुमाते हुए बोला,
"तो ये तुम्हारा घर है?"
"Hmm।"
शिवांगी ने भी घर को देखते हुए छोटा सा जवाब दिया। उसके हामी भरने पर अभिनव ने आगे कहा,
"अच्छा है, वैसे तुम्हारा सपना आखिर तुमने पूरा कर ही लिया। ऐसी ही जगह सेटल होना चाहती थी ना तुम?"
अभिनव के सवाल सुनकर शिवांगी ने चौँकते हुए उसे देखा और हैरानी से बोली,
"तुम्हें अब तक याद था?"
"तुमसे जुड़ी कोई बात मैं कभी भूल ही नहीं सकता।"
अनायास ही अभिनव के लबों से ये शब्द निकले, जिसे सुनकर शिवांगी की आँखें हैरानी से फैल गईं और मुँह से हैरानी से निकला,
"क्या कहा तुमने?"
शिवांगी का रिएक्शन देखकर अभिनव को एहसास हुआ कि बेख़याली में वह शायद कुछ गलत कह गया था। उसने तुरंत ही अपनी गलती सुधारते हुए मुस्कुराकर कहा,
"वो मैं कह रहा था कि कुछ बातें याद रह जाया करती हैं।"
"Hmm, सही कहा तुमने, कुछ बातें लाख भुलाने की कोशिश करने पर भी याद रह जाया करती हैं।"
शिवांगी अपनी ही सोच में गुम हो गई। शायद कुछ चल रहा था उसके दिमाग़ में। अभिनव कुछ पल उसे देखते हुए उसके मन की बात समझने की नाकाम सी कोशिश करता रहा, फिर उसने गंभीरता से कहा,
"ये घर तुम्हारा है ना?"
उसने वही सवाल दोबारा किया। उसकी आवाज़ सुनकर शिवांगी अपनी सोच से बाहर आ चुकी थी। उसने असमंजस भरी निगाहें अभिनव पर डालीं तो उसने बात आगे कहना शुरू किया,
"वो मुझे पता चला था कि इस घर का ओनर पेन गेस्ट की तलाश में है। यहाँ से बैंक काफ़ी पास है तो अगर तुम्हें कोई प्रॉब्लम ना हो तो जो रूम रेंट पर लगाना चाहती थीं उसमें मुझे रहने की परमिशन दे दो। तुम जितना भी रेंट कहोगी मैं दे दूँगा।"
अभिनव ने अब सीधे से काम की बात कर दी, जो करते हुए उसे खुद को बहुत अजीब महसूस हो रहा था, पर फ़िलहाल उसे रहने के लिए घर की सख्त ज़रूरत थी और अभी यही एक ऑप्शन था उसके पास। इसलिए उसे शिवांगी से बात करनी ही पड़ी।
अभिनव की बात सुनकर शिवांगी पहले तो सोच में पड़ गई, फिर कुछ परेशान लहज़े में बोली,
"वो एक्चुअली, हमें रूम रेंट पर लगाना ही नहीं था....... सिंगल रूम है वो तो कोई भी वहाँ एडजस्ट नहीं कर सकेगा।"
"यू डोंट वरी अबाउट दैट....... आई विल मैनेज।"
अभिनव ने झट से जवाब दिया, जिसे सुनकर शिवांगी एक बार फिर परेशान सी कुछ सोचने लगी। अभिनव जब गेट पर खड़ा था तो उसने शिवांगी की बातें कुछ-कुछ सुनी थीं। जब उसने शिवांगी को परेशान देखा तो उसकी परेशानी का अंदाज़ा लगाते हुए बोला,
"तुम्हें परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। मेरे वजह से तुम्हें बिल्कुल भी डिस्टरबेंस नहीं होगी। मैं सारा दिन बाहर ही रहूँगा, बस रात गुज़ारने के लिए मुझे एक ठीक-ठाक सी जगह की तलाश थी। अगर फिर भी तुम्हें मेरे यहाँ रहने से प्रॉब्लम है तो कुछ दिनों के लिए रुकने दो, मैं अपने रहने के लिए कोई दूसरी जगह मिलते ही यहाँ से चला जाऊँगा।"
अभिनव की बात सुनकर शिवांगी उसे देखने लगी। अभिनव का वो मासूम सा चेहरा जिस पर पहले वो मरती थी, आज फिर उसके सामने था। शिवांगी को यह सोचकर ही अजीब लग रहा था कि वह अभिनव के साथ एक घर में, एक छत के नीचे रहेगी, शायद इसलिए वह कोई फ़ैसला नहीं ले पा रही थी। पर जब अभिनव ने उससे रिक्वेस्ट की तो वह इंकार नहीं कर सकी और हामी भरते हुए बोली,
"जाने की ज़रूरत नहीं। रूम वैसे भी खाली ही है, तुम जब तक चाहो बेझिझक यहाँ रह सकते हो। और खाने-पीने की च.........."
शिवांगी अभी अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी कि अभिनव ने उसकी बात काटते हुए कहा,
"आई विल मैनेज....... तुम्हें परेशान होने की ज़रूरत नहीं है, मैं बाहर ही खा लिया करूँगा।"
उसकी बात शायद शिवांगी को पसंद नहीं आई थी। पर अब उसे हक़ भी तो नहीं था उसे कुछ कहने का, इसलिए उसने उसकी बात पर सहमति ज़ाहिर करते हुए कहा,
"एज़ योर विश.... वैसे मैं तो यह कहने वाली थी कि क्योंकि किचन एक ही है तो तुम्हारा खाना-पीना भी हमारे साथ ही हो जाया करेगा। आगे जैसा तुम्हें ठीक लगे, मुझे तो लगा था कि अब भी तुम्हें बाहर का खाना ज़्यादा पसंद नहीं होगा तो बस इसलिए कह दिया, पर शायद वक़्त के साथ-साथ तुम्हारी आदतें भी बदल गई हैं।"
शिवांगी के चेहरे पर मायूसी साफ़ ज़ाहिर हो रही थी, जिसे वह छुपाने की पूरी कोशिश कर रही थी। अभिनव एक पल को शिवांगी को देखता ही रह गया, फिर उसने थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा,
"आदत नहीं बदली, वह मैं बस अपनी वजह से तुम्हें परेशान नहीं करना चाहता था। पर अगर तुम कह रही हो तो ठीक है, मेरे खाने-पीने का जितना भी होगा मेरे रेंट में ऐड कर लेना, मैं पे कर दूँगा।"
अभिनव ने तो फ़ॉर्मली कह दिया और अपनी जगह वह ठीक भी था। पहले की बात और थी, पर अब उनका कोई ख़ास रिश्ता नहीं था, इसलिए उसको यही ठीक लगा और उसने वही कह दिया, पर शिवांगी को उसका यह फ़ॉर्मल बर्ताव कुछ ठीक नहीं लगा। चेहरे पर नाख़ुशी के भाव उभर आए और उसने हल्के गुस्से और नाराज़गी से कहा,
"अगर इतने ही पैसे हैं तो जाकर होटल में रहो, मैंने यहाँ कोई होटल नहीं खोला हुआ है जो तुम्हारे खाने-पीने या रहने के पैसे लूँ तुमसे......... मेरे पास फ़िलहाल तो पैसों की कोई कमी नहीं है और न ही मुझे अपने घर में किसी पेइंग गेस्ट को रखना था और अगर तुम्हारे जगह कोई और होता तो मैं उसे बहुत पहले बाहर का रास्ता दिखा चुकी होती।
मैंने तुम्हें यहाँ रहने की परमिशन दी, उसकी वजह पैसे नहीं हैं..... मुझे तुम्हारे पैसों की कोई ज़रूरत नहीं है और न ही मैं वह रूम रेंट पर लगाने वाली हूँ। वह रूम खाली ही है और तुम्हें रहने के लिए जगह की ज़रूरत है, बस इसलिए मैंने तुम्हें रहने की परमिशन दी है। अगर तुम्हें ज़्यादा ही पैसे देने का मन है तो तुम्हारे लिए यहाँ कोई ज़रूरत नहीं है, दरवाज़ा खुला है, तुम यहाँ से जा सकते हो।
क्योंकि मुझे न तुम्हारे यहाँ रहने के लिए तुमसे पैसे लेने की ज़रूरत है और न ही मैं खाने का चार्ज लेने वाली हूँ। जैसे मैं यहाँ रहती हूँ, वैसे तुम भी रह सकते हो, काकी जैसे मेरे काम कर देती हैं, वह तुम्हारे लिए भी खाना बना दिया करेंगी, वह भी बिना पैसों के। अगर मंज़ूर हो तो ठीक है, वरना मेरा वक़्त बर्बाद करने की कोई ज़रूरत नहीं, दरवाज़ा खुला है, तुम जा सकते हो यहाँ से और जाकर अपने लिए कोई अच्छा सा होटल ढूँढ लो जहाँ रहने, खाने सबके पैसे लिए जाते हों।"
शिवांगी काफ़ी ख़फ़ा लग रही थी। अचानक ही उसका लहजा बदल गया था और अभिनव आँखें फाड़े हैरान-परेशान सा उसे देखता ही रह गया था।
शिवांगी अपनी बात कहकर खामोश हुई और गुस्से से उसे घूरने लगी। कुछ देर बाद अभिनव को उसके गुस्से की वजह समझ आई और इसके साथ ही उसके लब हल्के से खिंच गए,
"तुम आज भी नहीं बदली।"
"मैं कोई मौसम नहीं हूँ जो पल-पल बदलती रहूँ। इंसान हूँ और जैसी पाँच साल पहले थी, वैसी ही आज हूँ।"
शिवांगी के गुस्से भरे जवाब सुनकर अभिनव की मुस्कान बड़ी हो गई। उसने गुस्से से भरी शिवांगी को देखकर मुस्कुराकर कहा,
"Hmm, ठीक कहा तुमने। वैसे मुझे तुम्हारी कंडीशन मंज़ूर है। मैं यहाँ रहने और खाने के पैसे नहीं दूँगा, पर किचन का सामान लाने की इज़ाज़त दे देना मुझे....... जानता हूँ कि तुम्हें इसकी ज़रूरत नहीं, पर ऐसे यहाँ रहना मुझे अच्छा नहीं लगेगा, तो बस इसलिए कह रहा हूँ कि अगर घर में या रसोई में किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो मुझे बता देना, मैं ला दूँगा।"
अभिनव ने शिवांगी के कुछ उल्टा समझने से पहले ही अपनी बात साफ़ कर दी। शिवांगी कुछ पल सोचती रही, फिर उसने हामी भरते हुए कहा,
"ओके, तो तुम्हें यहाँ रहना ऑकवर्ड ना लगे, बस इसलिए घर और किचन में जितना भी ख़र्चा होगा उसका एक तिहाई हिस्सा तुम दे देना।"
"ओके, एंड थैंक्स।"
"योर मोस्ट वेलकम।"
शिवांगी ने बेमन से रिप्लाई किया, फिर आगे उसने कुछ ऐसा कहा जिसे सुनकर अभिनव चौंक गया।
०००००००००००
"ओके, तो तुम्हें यहाँ रहना ऑकवर्ड ना लगे, बस इसलिए घर और किचन में जितना भी ख़र्चा होगा उसका एक तिहाई हिस्सा तुम दे देना।"
शिवांगी की बात सुनकर अभिनव ने फ़ीकी मुस्कान के साथ कहा, "ओके, एंड थैंक्स।"
"योर मोस्ट वेलकम।" शिवांगी ने बेमन से रिप्लाई किया, फिर आगे बोली,
"आज रहने आए हो तुम या सिर्फ़ बात करने आए हो?"
"सोचा तो था कि अगर बात बन जाती है तो आज ही शिफ़्ट हो जाऊँगा।"
"तो ठीक है, हो जाओ शिफ़्ट। कहाँ है तुम्हारा सामान?"
"वो तो होटल रूम में है।"
"अच्छा...... चलो, तुम जाकर अपना सामान ले आओ। तब तक मैं तुम्हारे लिए रूम रेडी करवा देती हूँ। आकर फ़्रेश हो जाना, डिनर का वक़्त होने ही वाला है, हमारे साथ ही डिनर कर लेना।"
"Hmm।"
अभिनव ने हामी भरी, फिर कुछ पल ठहरने के बाद बोला, "बाय।"
"बाय।" शिवांगी ने थोड़ा हिचकने के बाद रिप्लाई किया और खामोश सी अभिनव को देखती रही। अभिनव भी कुछ पल उसे देखता रहा, फिर जाने के लिए मुड़ गया। शिवांगी के देखते ही देखते वह घर के गेट से बाहर निकल गया।
शिवांगी ने उसके जाने के बाद गहरी साँस छोड़ी, जैसे इतनी देर से अपनी साँसों को थामकर खड़ी हो। फिर उसने काकी की तरफ़ मुड़ते हुए कहा,
"काकी, रूम में बेड और गद्दा तो है ही। चादर वगैरह बदल दीजिए और देख लीजिएगा कि उसे यहाँ रहने में किसी किस्म की कोई दिक्कत ना हो।"
काकी उसको ही देख रही थीं, शायद उसके मन के भावों को समझने की कोशिश कर रही थीं। कुछ पल शिवांगी के चेहरे का गहराई से मुआयना करने के बाद उन्होंने चिंता भरे स्वर में कहा,
"बेटा, आपने अच्छे से सोच-समझकर ये फ़ैसला लिया है ना? ........ अपने अतीत को वर्तमान में शामिल करके आप कोई गलती तो नहीं कर रही?"
शिवांगी ने उनके चिंता भरे चेहरे को देखकर फ़ीकी मुस्कान के साथ कहा, "काकी, आप जिसकी बात कर रही हैं वो कभी अतीत बन ही नहीं सका और फिर मैं उसे वर्तमान में शामिल कहाँ कर रही हूँ? वो बस इस घर में रहेगा। अब आप मेरी चिंता मत कीजिए, मैं बिल्कुल ठीक हूँ और मैं जो भी कर रही हूँ सोच-समझकर कर रही हूँ, इसलिए आप निश्चिंत रहिए। चलिए, आप रूम सेट कर दीजिए, मैं अपने रूम में जा रही हूँ। डिनर में तो अभी वक़्त है तो थोड़ा काम ही कर लूँ।"
काकी इससे आगे कुछ कह नहीं सकीं और हामी भरते हुए खाली रूम की तरफ़ बढ़ गईं। शिवांगी भी अपने रूम की तरफ़ बढ़ गई।
अब तक किसी तरह से अपने ज़ज़्बातों को काबू किया हुआ था उसने, अभिनव को इतने वक़्त बाद अपने सामने देखने के बाद वह एक बार फिर उसी वक़्त में चली गई जब वह उससे बेपनाह मोहब्बत किया करती थी। उससे जुदाई का दर्द और तड़प आँसू बनकर उसकी आँखों में छलक आए थे। कितने मुश्किल से उसने खुद को संभाला था। पर एक बार फिर उसके ज़ज़्बात उसके काबू से बाहर होने लगे थे। आँखें आँसुओं से लबालब भर चुकी थीं और कमरे में कदम रखते ही उसकी आँखों में कैद आँसू उसके गालों पर लुढ़क गए।
अजीब सी भावनाओं से घिरा हुआ था उसका मन इस वक़्त, जिन्हें वह शब्दों में व्यक्त कर ही नहीं सकती थी। पर उसके आँखों से बहते आँसू उसका प्रेम, दर्द, तड़प सब ज़ाहिर कर रहे थे। जिसकी यादों से वह आज तक उबर नहीं पाई थी और न ही उसने कभी ऐसी कोई कोशिश ही की थी, आज वह अचानक उसके सामने आकर खड़ा हो गया था। उसके दिल में होती हलचल और मन में उमड़ती भावनाओं को वह व्यक्त नहीं कर सकती थी। वह बेड के पास ज़मीन पर ही बैठ गई। ड्रॉवर से उसने अपनी और अभिनव की फ़ोटो निकाली और उसे अपने सीने से लगाए फफक कर रो पड़ी।
उसकी ज़िंदगी ने उसे ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था जहाँ उसकी मोहब्बत उसके सामने खड़ी थी, पर वह अपना प्यार ज़ाहिर नहीं कर सकती थी। कितना कुछ था उसके मन में, कितना कुछ कहने को था उसके पास, पर उसकी मजबूरी थी कि वह उससे कुछ कह तक नहीं सकती थी। कितना सोचने के बाद तो उसने उससे ये चंद बातें की थीं, जिसमें एक हिचक साफ़ ज़ाहिर हो रही थी। कितना बदल गया था उनका रिश्ता, ये सब सोचते हुए शिवांगी फफक कर रो पड़ी।
कुछ देर तक वह यूँ ही रोती रही, फिर जब उसका मन हल्का हुआ तो उसने अपना दिल मज़बूत किया और अपनी हथेली से अपने आँसुओं को पोंछने के बाद उसने उस फ़ोटो को वापिस ड्रॉवर में रख दिया। वॉशरूम में जाकर अपना मुँह धोया, फिर अपना लैपटॉप लेकर बैठ गई।
कुछ पौने घंटे बाद सभी लिविंग रूम में बैठे थे। कुछ देर पहले ही अभिनव अपना सामान लेकर वहाँ आया था और फिर फ़्रेश होकर सब डिनर के लिए यहाँ इकट्ठे हुए थे।
पहले सिर्फ़ दो ही लोग थे, इसलिए शिवांगी को डाइनिंग टेबल की ज़रूरत महसूस नहीं हुई थी। वह हॉल के सोफ़े पर बैठकर ही खाना खा लेती थी, पर आज जब अभिनव यहाँ था तो उसे ये बात कुछ अजीब लग रही थी, पर अभिनव एकदम सहज था, जैसे उसे इस बात से फ़र्क़ ही नहीं पड़ता हो।
काकी ने खाना टेबल पर रखा, फिर शिवांगी के बाद अभिनव की प्लेट लगाने लगी। अभिनव ने रोकना चाहा, पर उनसे बहस नहीं कर सका। काकी ने प्लेट लगाई और खुद भी बैठ गई। वहाँ गहरी खामोशी छाई हुई थी। काकी खाते हुए शिवांगी और अभिनव को देख रही थी और शायद मन ही मन कुछ सोच भी रही थी, जबकि अभिनव और शिवांगी दोनों ही सर झुकाए अपना-अपना खाना खा रहे थे।
कुछ देर तो वहाँ खामोशी छाई रही, फिर उस ऑकवर्ड सी खामोशी को तोड़ते हुए शिवांगी ने ही बात शुरू की,
"तुम्हारे घर में सब कैसे हैं?"
अभिनव जो शायद खाते हुए किसी गहरी सोच में गुम था, वह पहले तो उसका सवाल सुनकर चौंक गया, फिर निगाहें उठाकर उसे देखा और आराम से बोला,
"सब ठीक हैं।"
"तुम्हारे पापा के साथ तुम्हारी प्रॉब्लम ठीक हो गई?"
शिवांगी के मुँह से अनायास ही ये सवाल निकल गया, जिसे सुनकर अभिनव के भाव कुछ गंभीर हो गए। पहले तो दोनों इतने क्लोज़ थे कि अपनी ज़िंदगी की हर बात एक-दूसरे को बता देते थे, पर वक़्त, हालात और उनका रिश्ता सब बदल गया था, जिसका एहसास होते ही शिवांगी ने तुरंत ही कहा,
"सॉरी, वो फ़्लो में निकल गया, तुम्हारा पर्सनल मैटर है, मुझे ऐसा सवाल नहीं करना चाहिए था। आई एम रियली वेरी वेरी सॉरी।"
"कुछ चीज़ें और रिश्ते कभी ठीक नहीं हुआ करते।" अचानक ही अभिनव की आवाज़ शिवांगी के कानों में पड़ी और वह आँखें बड़ी-बड़ी करके हैरानी से उसे देखने लगी। उम्मीद नहीं थी उसे कि अभिनव जो उससे बात करने में पहले भी हिचकिचाता था, वह इतनी आसानी से यह बात उसे बताएगा, वह भी तब जब उनका अब कोई रिश्ता ही नहीं था।
अभिनव काफ़ी गंभीर लग रहा था। अजीब सी उदासी छाई हुई थी उसके चेहरे पर। शिवांगी का ध्यान जब उसके भावों पर गया तो उसे समझने में देर नहीं लगी कि अभिनव आज भी उसके पापा के ज़िक्र से आहत हो जाता है। इसलिए उसने बात बदलते हुए कहा,
"अच्छा, ये बताओ, ये खातिरदारी कहाँ से करवाकर आए हो?"
अभिनव ने प्रश्नसूचक दृष्टि उसकी तरफ़ घुमाई तो शिवांगी ने आँखों से ही उसके चेहरे की तरफ़ इशारा कर दिया। उसका इशारा समझते ही अभिनव ने उसके सवाल का जवाब दिया,
"कुछ ख़ास नहीं, आने से पहले कुछ बदमाशों से हाथापाई हो गई थी।"
"तुमने लड़ाई-झगड़ा करना कब शुरू कर दिया?" शिवांगी की आँखें हैरानी से फैल गईं क्योंकि जब दोनों साथ थे तब तो अभिनव हमेशा शांत और खामोश ही रहता था। अगर उसका गुस्सा उतरता भी था तो उसके ऊपर उतरता था, उसने तो उसे किसी से बहस तक करते नहीं देखा था, मार-धाड़ तो बहुत दूर की बात थी।
शिवांगी के सवाल ने उसे सुरेश जी की बातें याद दिला दीं, चेहरे पर गहरी उदासी छा गई और उसने पलटकर कोई जवाब नहीं दिया।
भले ही उन्हें अलग हुए सालों बीत चुके थे, पर आज भी शिवांगी उसके भाव देखकर यह समझ गई थी कि उसका सवाल अभिनव को पसंद नहीं आया है। एक बार फिर वह हैरान थी क्योंकि अगर पहले वाला अभिनव होता तो अब तक उस पर चीख चुका होता, पर यह अभिनव एकदम खामोश बैठा था।
शिवांगी चुपचाप कुछ देर उसे देखती रही। इन बीते सालों में उसने खुद को कितना बदल लिया था। फिर अचानक ही उसके दिमाग़ में कुछ आया और उसके चेहरे के भाव बदल गए। अभिनव अपनी ही सोच में गुम था, तभी उसके कानों में शिवांगी की मीठी सी आवाज़ पड़ी,
"वैसे, इतने साल बीत गए। कोई लड़की-वड़की आई ज़िंदगी में? आई मीन, उम्र हो गई है तुम्हारी शादी की, तो कुछ हुआ या कोई गर्लफ़्रेंड है? उन्हें मींस अगर तुम्हारी होने वाली बीवी या गर्लफ़्रेंड को पता चला कि तुम अपनी एक्स के साथ एक ही घर में रह रहे हो तो उन्हें प्रॉब्लम नहीं होगी?"
शिवांगी ने जिज्ञासा वश सवाल पूछ तो लिया, पर अब उसके दिल में धड़कनें चालू हो चुकी थीं। उसकी बेचैन निगाहें अभिनव के जवाब के लिए उसके चेहरे पर टिकी हुई थीं।
शिवांगी से शायद इस सवाल की उम्मीद नहीं थी अभिनव को, इसलिए पहले तो वह हैरानी से उसे देखने लगा, फिर बिना किसी भाव के बोला,
"बुरा लगने के लिए उनका होना भी ज़रूरी है।"
"मतलब तुम अभी तक सिंगल हो?" शिवांगी की आँखों में चमक आ गई थी और उसकी खुशी, उसकी एक्साइटमेंट उसकी आवाज़ में झलकने लगी थी। उसके तेज़ आवाज़ में कही इस बात को सुनकर अभिनव और ज़्यादा हैरान हो गया। जब शिवांगी को अपनी गलती का एहसास हुआ तो उसने तुरंत उसे सुधारते हुए कहा,
"सॉरी, वो हैरानी में तेज़ आवाज़ में निकल गया। वैसे तुम अभी तक सिंगल क्यों हो?..... डोंट टेक इट पर्सनली, पर उम्र हो गई है तुम्हारी शादी की, अगर अभी नहीं की तो बुढ़ापे में कोई लड़की नहीं मिलेगी, फिर अकेले ही रह जाओगे सारी ज़िंदगी।"
"मैं कभी अकेला हो ही नहीं सकता। तुम मेरे पास हो या ना हो, पर हमेशा मेरे साथ रहती हो....... कैसे किसी रिश्ते के बारे में सोचूँ जब तुम्हारी मोहब्बत आज भी मेरे दिल की गहराइयों तक बसी हुई है?........... सिंगल नहीं हूँ मैं, तुम और तुमसे जुड़ी हर याद आज भी मेरे दिल में बसी है। तुम मेरा कल थीं, मेरा आज हो और मेरा आने वाला कल भी तुम्हारी यादों के ही सहारे बीतेगा। एक्स नहीं हो तुम मेरी, मेरी साँसों जितनी अहम हो तुम मेरे लिए। ........... किसी और की ज़रूरत ही नहीं मुझे।"
यह सब अभिनव ने अपने मन में कहा था और निगाहें शिवांगी पर टिकी हुई थीं। शिवांगी कुछ देर तक वह अभिनव के जवाब का इंतज़ार करती रही, फिर जब अभिनव खामोश ही रहा तो उसने उसे कहीं खोया देखकर उसका ध्यान अपनी तरफ़ खींचने के लिए उसके आगे चुटकी बजाते हुए कहा,
"ओह्ह, हैलो, मिस्टर अभिनव चौधरी....... यार, कुछ सवाल किया है मैंने? इतने हैंडसम हो, अब तो वेल सेटल्ड हो तो सिंगल क्यों हो?"
अभिनव शिवांगी को देखते हुए अपनी ही सोच में गुम था। अब उसका ध्यान उसके सवाल पर गया और उसने ठंडी आह्ह छोड़ते हुए जवाब दिया,
"एक वक़्त पर किसी ने कहा था कि उसके अलावा मुझे कोई बर्दाश्त नहीं कर सकता, पर एट द एंड वो भी मुझसे रिश्ता नहीं निभा सकी, जबकि उससे बेहतर मुझे कोई समझ ही नहीं सकता था तो जब उसके साथ रिश्ता नहीं निभा सका तो किसी और से रिश्ता जोड़कर और किसी को तकलीफ़ देने का मन नहीं किया मेरा। वैसे भी रिश्तों के मामले में मैं कैसा हूँ ये तो तुम भी जानती हो और मेरा गुस्सा और एरोगेंस देखते हुए तो मुझे लगता है कि मेरा सिंगल रहना ही बेहतर होगा।"
Coming soon.........
अभिनव ने सहजता से उसके सवाल का जवाब दे दिया, पर उसके जवाब से शिवांगी को अपना अतीत याद आ गया और वह एकदम खामोश हो गई।
ठीक ही तो कहा था अभिनव ने, उनका रिश्ता इतना गहरा था, फिर जब वह टूट गया तो कोई नया रिश्ता बनाने की हिम्मत कैसे करता वह? वह खुद भी तो आज तक आगे नहीं बढ़ सकी थी, फिर वह उससे यह उम्मीद कैसे कर सकती थी जबकि वह तो रिश्तों को निभाने के मामले में हमेशा से कच्चा ही था।
शिवांगी की आँखों में अनेकों भावनाएँ उमड़ने लगीं। मन में एक गिल्ट जन्म लेने लगा कि हमेशा साथ देने का वादा करके उसने उसे बीच रास्ते में छोड़ दिया था। इतने अच्छे से जानती थी उसे, फिर भी उस रिश्ते को बिखरने से नहीं बचा सकी।
माहौल एकदम संजीदा हो गया था। अभिनव और शिवांगी दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे और मन में बहुत सी भावनाएँ उफनने लगी थीं। कुछ वक़्त वहाँ ऑकवर्ड सा साइलेंस पसरा रहा, फिर अभिनव ने बात को बदलते हुए कहा,
"मेरा छोड़ो और तुम बताओ...... अब तक सिंगल हो या कोई बॉयफ़्रेंड वगैरह है? देखकर शादीशुदा तो नहीं लगती, सगाई वगैरह तो हो ही गई होगी तुम्हारी?"
अभिनव ही जानता था कि शिवांगी से यह सवाल करने के लिए उसको कितनी हिम्मत बटोरनी पड़ी थी। कितना मुश्किल था उसके लिए यह सवाल करना और उससे भी कहीं गुना ज़्यादा मुश्किल था शिवांगी का जवाब सुनना।
अबकी बार उसके दिल की धड़कनें बेचैनी से बढ़ी हुई थीं और व्याकुल निगाहें जवाब के इंतज़ार में शिवांगी पर ही टिकी हुई थीं।
शिवांगी के कानों में जैसे ही उसका सवाल पड़ा, उसके भाव एकदम बदल गए। उसने अभिनव को देखा और गंभीरता से बोली,
"एक रिलेशन के टूटने का एक्सपीरियंस मेरे साथ भी जुड़ा है, जिसके टूटने की उम्मीद नहीं थी मुझे, पर मैं उसे टूटने से नहीं बचा सकी और उसके बाद न ही दोबारा टूटकर बिखरने के बाद संभलने की हिम्मत बची और न ही किसी से फिर से दिल लगाने की चाहत।
अब तो बस अपने शर्तों पर अपनी ज़िंदगी जीनी है, हर बंधन से आज़ाद होकर अपने दिल की करनी है, प्यार या शादी जैसे झमेलों में पड़कर अपनी ज़िंदगी बर्बाद करने का अब कोई इरादा नहीं है मेरा, इसलिए सिंगल हूँ और आगे भी मिंगल होने का मेरा कोई इरादा नहीं है। आई एम वैरी हैप्पी विद माई लाइफ़, एंड नाउ आई डोंट वांट एनी काइंड ऑफ़ भसड़ इन माई लाइफ़ एट ऑल।"
"ओहो, तो गलत इंसान से दिल लगाने की सज़ा दे रही हो तुम खुद को, पर हर इंसान मेरे तरह नहीं होता और न ही हर रिश्ते का अंत वो होना ज़रूरी है जो हमारे रिश्ते का हुआ। अगर इस बार किसी सही लड़के पर विश्वास करो तो शायद तुम्हारे दिल में बसा वो डर निकल सके और तुम अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ सको।"
"आई हैव मूव्ड ऑन....... मैं किसी डर के वजह से ये सब नहीं कह रही। मेरा सामना रियलिटी से हो चुका है। जो खुशी और आज़ादी अकेले ज़िंदगी बिताने में है वो कभी किसी बंधन में बंधकर नहीं मिल सकती। रिलेशन चाहे कितना ही अच्छा हो, पर उसमें प्रॉब्लम आती ही है और फिर तकलीफ़ देती है तो उससे बेहतर है कि अकेले रहो और खुश रहो। वैसे भी अब मुझे अपनी ज़िंदगी में किसी की ज़रूरत नहीं। मैं ऐसे ही बहुत खुश हूँ।"
शिवांगी के स्पष्टीकरण के बाद अभिनव ने एक शब्द तक नहीं कहा, पर वह इतना समझ चुका था कि शिवांगी का प्यार और शादी जैसे रिश्ते को लेकर मन खट्टा हो चुका था, जिसका ज़िम्मेदार जाने-अनजाने वह ही था। इस अपराधबोध से उसका सर झुक गया। शिवांगी ने भी आगे कुछ नहीं कहा, शायद अब उसके पास कहने के लिए कुछ था ही नहीं।
अभिनव ज़्यादा देर तक उसके सामने बैठ भी नहीं सका और बेमन से अपनी प्लेट साफ़ करके उसे लेकर किचन में चला गया। शिवांगी ने जाते हुए अभिनव को देखा और मन ही मन बोली,
"किसी और की होने की तो मैं तब सोचूँगी ना जब खुद की रही होऊँ? मैं तो आज भी तुम्हारे प्यार से, तुम्हारी यादों से बाहर नहीं निकल सकी, तुम्हारे प्रेम का रंग मुझ पर इस क़दर चढ़ा कि मैं मेरी ही ना रह सकी?.......
हमें अलग हुए सालों बीत गए, फिर भी आज तुम्हारी मौजूदगी के एहसास मात्र से मेरी धड़कनों की रफ़्तार बढ़ गई थी, आँसू थे कि थमने का नाम नहीं ले रहे थे, कितने मुश्किल से मैंने खुद को संभाला है तो मैं ही जानती हूँ।
मुझे लगा था कि इतने वक़्त में मैं मूव ऑन कर चुकी हूँ। तुम्हारी यादें भले ही दिल में बसी हों, पर वह प्यार वक़्त के साथ ख़त्म हो चुका है, अब फ़र्क़ नहीं पड़ता मुझे तुम्हारे होने या ना होने से, पर आज तुम्हारे आने से मेरी सारी गलतफ़हमियाँ दूर हो गई हैं।
पता चल गया मुझे कि आज भी मेरे दिल के किसी कोने में तुम्हारा प्यार बसा है, आज भी मेरी धड़कनों को तुम्हारा इंतज़ार रहता है, आज भी मेरी निगाहें नज़र भर तुम्हें देखने को बेक़रार हो जाती हैं, आज भी मुझे तुमसे इतना फ़र्क़ पड़ता है जितना पहले कभी किसी से नहीं पड़ा......... मोहब्बत आज भी है मुझे तुमसे........ सालों बीत गए, पर मैं आज भी उसी मोड़ पर खड़ी हूँ जहाँ से हमारे रास्ते जुदा हुए थे और कहीं ना कहीं उस जुदाई की वजह मैं ही थी।
अब तुम ही बताओ कि जो पहले ही तुम्हारे रंग में रंगा हो, उस पर किसी और का रंग चढ़े भी तो कैसे? जिसके दिल में तुम बसे हो, वहाँ किसी और को जगह मिले भी तो कैसे? जो लड़की आज भी तुम्हारे प्यार में पागल हो, वह किसी और से मोहब्बत करे भी तो कैसे? जिसकी ज़िंदगी का तुम एक बेहद अहम हिस्सा रहे हो, वह अपनी ज़िंदगी में किसी और को शामिल करे भी कैसे?.....................
नहीं.............. मैं नहीं कर सकती ऐसा........... जानती हूँ हमारा रिश्ता सालों पहले ख़त्म हो चुका है और अब हम दोबारा कभी साथ नहीं हो सकते, पर फिर भी जो जगह तुम्हारी है उसे मैं किसी और को नहीं दे सकती। इसलिए मैं हमेशा यूँ ही रहूँगी तन्हा और अपनी सारी ज़िंदगी तुम्हारी यादों के सहारे बिता दूँगी।"
शिवांगी ने ठंडी आह्ह भरी और प्लेट आगे सरकाकर अपने कमरे की तरफ़ बढ़ गई। काकी गहराई से दोनों को ऑब्ज़र्व कर रही थीं। उन्होंने बर्तन समेटे और किचन में चली गईं। अभिनव अपने रूम में जा चुका था।
काकी किचन में काम कर रही थी, तभी शिवांगी वहाँ आई और अपने हाथ में पकड़े मेडिसिन और ऑइंटमेंट को स्लैब पर रखते हुए बोली,
"काकी, यह दवाई और हल्दी वाला दूध दे दीजिएगा उसे।"
"जी, बेटा जी, हम दे देंगे।"
काकी ने हामी भरी तो शिवांगी वहाँ से चली गई। आज भी अभिनव की इतनी फ़िक्र थी उसे, यह देखकर काकी भावुक हो गई और जाती हुई शिवांगी को देखते हुए बोली,
"जाने भगवान ने आपके नसीब में क्या लिखा है? इतनी प्यारी बच्ची और ज़िंदगी में इतने दुःख। बचपन से हमने आपको प्यार के लिए तरसते देखा है, अभिनव के आपके ज़िंदगी में आने के बाद हमें लगा कि अब आपकी ज़िंदगी की वह कमी पूरी हो जाएगी, पर वह खुशी भी चंद दिनों की मेहमान निकली और आपसे उनका प्यार भी छिन गया।
सालों पहले आपने कैसे खुद को संभाला था यह हम बखूबी जानते हैं और आज भी आप सिर्फ़ अभिनव से ही मोहब्बत करती हैं यह भी जानते हैं हम। हमने आपको उनकी याद में तड़पते देखा है, अपने दर्द को अपनी मुस्कान के पीछे छुपाते देखा है। हम जानते हैं कि अभिनव के प्यार के बिना आप कभी खुश नहीं रह सकतीं और यही वजह है कि हम पिछले पाँच सालों से भगवान से यही दुआ माँग रहे हैं कि वह अभिनव को वापिस आपकी ज़िंदगी में भेज दें और आपको आपका प्यार मिल जाए।
आज सालों बाद भगवान ने हमारी प्रार्थना सुनी है और अभिनव ने एक बार फिर आपकी ज़िंदगी में कदम रखा है। उनकी बातों से हम इतना जान चुके हैं कि जैसे आप उन्हें और उनसे जुड़े रिश्ते को भुला नहीं सकी हैं, वैसे ही वह भी अपनी ज़िंदगी में आगे नहीं बढ़े हैं। जिस तरह से वह आपको देख रहे थे उससे तो यही लगता है कि वह भी आपसे मोहब्बत करते हैं। अब तो भगवान से बस यही निवेदन है कि आप दोनों के बीच सब ठीक हो जाए। आप दोनों को अपना प्यार मिल जाए।"
काकी ने मन ही मन दोनों के लिए दुआ की। अब देखना यह था कि उनकी दुआ रंग लाती है या नहीं?
काकी अपना काम निपटाने लगी।
शिवांगी अपने रूम में अपने बेड पर लेटी अभिनव से अपनी आज की अचानक हुई इस मुलाक़ात के बारे में सोच रही थी और दूसरी तरफ़ अभिनव तो रूम में जाते ही औंधे मुँह बेड पर पड़ गया था और शिवांगी से हुई आज की इस मुलाक़ात के बारे में सोचते हुए वह उस वक़्त में चला गया था जब आज की ही तरह अचानक शिवांगी उसके सामने आकर खड़ी हो गई थी। उसकी वह मीठी सी आवाज़ एक बार फिर उसके कानों में घुलने लगी थी।
फ़्लैशबैक
"एक्सक्यूज़ मी, मे आई........"
लड़की की मीठी सी आवाज़ उस लड़के के कानों में पड़ी तो उसने सर उठाकर देखा। सामने एक प्यारी सी लड़की लबों पर सौम्य सी मुस्कान सजाए खड़ी थी, जिससे उसके दाएँ गाल पर डिंपल उभर आया था। साँवली सूरत, तीखे नयन-नक्ष, गहरी भूरी बड़ी-बड़ी चमकती आँखें। छोटी सी खड़ी नाक और वैसलीन से चमकते ब्राउनिश कलर के पतले-पतले लब जिन पर मुस्कान ठहरी हुई थी।
बालों को गुथकर दो चोटी में बाँधा हुआ था जिन्हें दोनों तरफ़ से आगे किया हुआ था। उसकी चोटियाँ उसके पेट से नीचे तक जा रही थीं। छोटे से निकलते छोटे-छोटे बाल उसके माथे पर फैले हुए थे, व्हाइट कलर का सलवार सूट और उसके ऊपर से दुपट्टा डाले, पीठ पर टाँगा बैग जिसकी पट्टी को उसने दोनों हथेलियों से पकड़ा हुआ था।
इतनी प्यारी लग रही थी वह लड़की कि एक पल को वह लड़का उसे देखता ही रह गया। लड़की का हाल भी कुछ ऐसा ही था। वह भी एकटक उस लड़के को देखने लगी थी।
दूध सा गोरा रंग, क्लीन शेव्ड क्यूट सा चेहरा जिस पर सख़्ती साफ़ झलक रही थी। गहरी काली नशीली आँखें जिनमें अगर कोई देखे तो उसमें डूबता ही चला जाए। खड़ी नाक जिस पर अकड़ सवार थी। गुलाबी लब जो आपस में भिंचे हुए थे। बालों को करीने से पीछे करके सेट किया हुआ था। व्हाइट शर्ट-पैंट और उस पर टाई, जेंटल और डीसेंट लुक में वह बेहद हैंडसम और चार्मिंग लग रहा था।
कुछ सेकंड के लिए वह लड़का उस लड़की को देखने में खो सा गया, फिर भौंह सिकोड़ते हुए बोला, "पहले कभी कोई लड़का नहीं देखा?"
उसका सवाल सुनकर लड़की चौंक गई और हड़बड़ाहट में उस पर से निगाहें हटाते हुए सकपकाते हुए बोली, "नहीं....... वो........ वो............"
लड़का जो पहले ही गुस्से में लग रहा था, उसने लड़की को यूँ हकलाते देखा और और ज़्यादा चिढ़ गया और खीझते हुए बोला, "अगर कुछ काम था तो कहिए, वरना यहाँ खड़े होकर मेरे गुस्से को बढ़ाने की कोई ज़रूरत नहीं है, जा सकती हैं आप यहाँ से।"
लड़के ने लड़की को घूरते हुए अपनी बात पूरी की और वापिस हेड डाउन करके बैठ गया। लड़के का यह एटीट्यूड देखकर लड़की का तो जैसे फ़्यूज़ ही उड़ गया। उसकी आँखें गुस्से से छोटी-छोटी हो गईं, मन किया कि इस अकड़ू लड़के का सर फोड़ दे, पर आज स्कूल का पहला दिन था और वह कोई बखेड़ा खड़ा करना नहीं चाहती थी, इसलिए उसने होंठों को गोल करते हुए गहरी साँस छोड़ी और खुद को शांत करने के बाद उसने डेस्क पर टैप करते हुए फिर से कहा,
"एक्सक्यूज़ मी।"
Coming soon..........
लड़के का यह एटीट्यूड देखकर लड़की का तो जैसे फ्यूज़ ही उड़ गया। उसकी आँखें गुस्से से छोटी-छोटी हो गईं। मन किया कि इस अकड़ू लड़के का सर फोड़ दे, पर आज स्कूल का पहला दिन था और वह कोई बखेड़ा खड़ा करना नहीं चाहती थी। इसलिए उसने होंठों को गोल करते हुए गहरी साँस छोड़ी और खुद को शांत करने के बाद डेस्क पर टैप करते हुए फिर से कहा,
"एक्सक्यूज़ मी।"
"येस, प्लीज़।" लड़के की चिढ़ी हुई सी आवाज़ आई। साथ में वह सर उठाकर आँखें छोटी-छोटी करके उस लड़की को घूरने लगा।
लड़की ने अपने गुस्से को काबू किया और आराम से बोली, "वो एक्चुअली, मुझे यहाँ बैठना था।"
"सॉरी, पर अब आप यहाँ नहीं बैठ सकतीं, तो कोई दूसरी सीट देख लीजिए।" लड़के ने उसी लहज़े में जवाब दिया। जिसे सुनकर लड़की का गुस्सा बाहर आ गया और उसने उस लड़के को घूरते हुए तेज आवाज़ में कहा,
"क्यों?..... कहीं और क्यों बैठूँ मैं?......... यहाँ क्या तुम्हारा नाम लिखा हुआ है या तुमने इस सीट को खरीद लिया है जो यहाँ कोई और नहीं बैठ सकता? मेरा आज तक का रिकॉर्ड है कि मैं हमेशा सेकंड सीट पर ही बैठती हूँ, इसलिए मैं आज भी यहीं बैठूँगी।"
लड़की ने उस लड़के को धक्का देकर दूसरे तरफ़ खिसका दिया और खुद उसकी जगह बैठ गई। लड़का पहले तो हैरान हो गया; इसकी उम्मीद तो नहीं थी उसे, पर फिर वह आँखें छोटी-छोटी करके गुस्से से लड़की को घूरने लगा, जबकि लड़की लबों पर विजयी मुस्कान सजाए उसे अपनी जीत पर चिढ़ा रही थी।
आस-पास मौजूद स्टूडेंट्स आँखें बड़ी-बड़ी करके उन्हें ही देख रहे थे। लड़का अभी कुछ कहने वाला था कि बेल बज गई, मतलब प्रेयर में जाने का वक़्त हो गया था।
धीरे-धीरे सभी स्टूडेंट्स वहाँ से चले गए। लड़का अब भी लड़की को घूर रहा था, जबकि लड़की आँखें मटकाकर उसे देख रही थी।
उस लड़के ने गहरी साँस छोड़ी, फिर उठकर खड़ा हो गया और कुछ पल उस लड़की को घूरने के बाद रूम से बाहर निकल गया। उसके जाते ही लड़की खिलखिलाकर हँस पड़ी और फिर मज़े में झूमते हुए बाहर चली गई।
प्रेयर के बाद सब वापिस रूम में आए। जब लड़की अपनी सीट पर आई तो वहाँ से उसका बैग ग़ायब था और लड़का मज़े से पूरे बेंच पर फैलकर बैठा हुआ था। लड़के ने उस लड़की को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया था। लड़की को समझने में वक़्त नहीं लगा कि उस लड़के ने ही उसके बैग को ग़ायब किया है। उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसने खा जाने वाली नज़रों से उसको घूरा, फिर अपने बैग को ढूँढ़ने लगी।
कुछ देर बाद उसे सबसे कोने वाली रो में सबसे पीछे के बेंच पर अपना बैग रखा मिला। अपना बैग लेकर वह एक बार फिर उस लड़के पर धावा बोलने के लिए बढ़ी ही थी कि क्लास में टीचर आ गईं।
सब स्टूडेंट्स ने उठकर उन्हें ग्रीट किया। फिर सबको बैठने को कहा गया। मजबूरी में लड़की को पास की सीट पर ही बैठना पड़ा।
टीचर ने अपनी फ़ाइल से एक लिस्ट निकालते हुए सब स्टूडेंट्स को देखते हुए कहा, "आप सभी उठकर एक तरफ़ खड़े हो जाइए और जिसका नाम मैं लूँ वो आगे आकर उस जगह बैठेगा जो मैं बताऊँगी।"
उनकी बात सुनकर स्टूडेंट्स ने बेबसी से सर हिला दिया। मतलब साफ़ था कि अब उन्हें रोल नंबर वाइज़ बैठना था, तो वे अपने दोस्तों से दूर हो जाएँगे। जो कोई नहीं चाहता था, पर टीचर की बात टाल भी नहीं सकते थे, तो सब उठकर गेट की तरफ़ खड़े हो गए। धीरे-धीरे टीचर के बताए अनुसार स्टूडेंट्स अपने-अपने फ़िक्स्ड बेंच पर बैठने लगे, जहाँ अब उन्हें पूरा साल बैठना था।
उस लड़के का नंबर आया और इत्तेफ़ाक़ से उसे वही सीट मिली जहाँ वह पहले बैठा था, पर अब उसके साथ वह लड़की भी बैठी थी जिससे कुछ देर पहले तक वह लड़ रहा था क्योंकि वह उसे वहाँ बैठने नहीं देना चाहता था।
जहाँ इस इत्तेफ़ाक़ को देखकर लड़की हैरान और खुश थी, वहीं लड़के के सख्त चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। सबको अपनी-अपनी सीट पर बिठाया गया, फिर सबका इंट्रो लिया गया। आज पहला ही दिन था, तो कुछ देर बाद टीचर चली गईं। टीचर के जाते ही लड़की लड़के की तरफ़ घूम गई और अपना हाथ उसकी तरफ़ बढ़ाते हुए बोली,
"हाय, आई एम शिवांगी...... शिवांगी राय।"
बिल्कुल ठीक सुना है आपने, वह लड़की कोई और नहीं बल्कि शिवांगी ही थी। और वह ख़ड़ूस लड़का अभिनव था जो फ़िलहाल बिना किसी भाव के शिवांगी को देखे जा रहा था।
अभिनव ने शिवांगी को देखा, उसके बढ़े हाथ को देखा, फिर वहाँ से उठकर लास्ट के खाली बेंच पर जाकर बैठ गया। शिवांगी कुछ हैरानी भरे भाव से उसे देखती रही, फिर उसने अपने कंधे उचका दिए और अपनी नोटबुक निकालकर उस पर कुछ लिखने लगी।
यूँ ही सारा दिन निकल गया। अभिनव टीचर के सामने अपनी सीट पर बैठता, फिर उठकर पीछे चला जाता। शिवांगी ने बहुत बार उससे बात करने की कोशिश भी की, पर अभिनव की तरफ़ से कोई रिस्पांस नहीं आया। शायद वह अकेला रहना चाहता था, यही सोचकर शिवांगी ने भी उसे परेशान करना छोड़ दिया।
पहला दिन गुज़रा और यूँ ही दिन गुज़रने लगे। शिवांगी उससे बात करने की कोशिश करती थी, पर अभिनव की तरफ़ से कोई कोशिश नहीं होती थी। वह ज़्यादा किसी से भी बात नहीं करता था। शांत सा बैठा या तो पढ़ता रहता या पीछे जाकर अकेले बैठ जाता। शिवांगी को उसका यह बिहेवियर कुछ ठीक नहीं लगता था। वह उससे बात करना चाहती थी, पर अभिनव के रवैये को देखकर शांत रह जाती थी। पता नहीं क्यों, पर अभिनव की यह खामोशी शिवांगी को इफ़ेक्ट करने लगी थी। शायद उनके बीच रिश्ता बनने लगा था जिसका पता दोनों को ही नहीं था।