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तेरे जाने का ग़म

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rimjhim Sharma

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अद्विका रजावत की जिंदगी में पांच साल पहले एक ऐसा तुफान आया जिसने उससे उसका सरनेम , उसका प्यार सबकुछ छिन लिया । पांच साल बाद वो इंडिया की एक क्रुर और निर्दयी बिजनेस वूमन बन गयी जिसे किसी से फर्क नहीं पड़ता लेकिन एक दिन अचानक वो किसी से टकरा गयी और उस...

Total Chapters (45)

Page 1 of 3

  • 1. तेरे जाने का ग़म - Chapter 1

    Words: 1293

    Estimated Reading Time: 8 min

    पार्ट-01

    हर किसी की जिंदगी में एक ऐसा वक्त आता है जब उसे हालातों से मजबूर होकर कुछ ऐसा करना पड़ता है जो वो नहीं करना चाहता है।

    अगर हालात उसे बार-बार मजबूर करें तो?

    वक्त की मार सब कुछ सिखा देती है, हर किसी से लड़ना, हर किसी के सामने मजबूत होकर खड़े रहना, चाहे स्थिति कैसी भी हो।

    अगर हमारे सामने हमारे अपने हों तो?

    कोई भी इंसान हर दर्द से लड़ लेता है ताकि उसके अपनों को दर्द न सहना पड़े।

    लेकिन वही दर्द हमारे अपने दें तो?

    शायद यही जीवन का परम सत्य है, जो हमारे दिल के बेहद करीब हैं, वही हमें सबसे ज्यादा तकलीफ देते हैं। इसलिए नहीं कि वो हमें तकलीफ देते हैं बल्कि इसलिए कि हमें उनकी हर बात से फर्क पड़ता है, चाहे वह और किसी की नजर में इतनी तकलीफ देने वाली न हो।

    इसलिए खुश रहना है तो बस किसी के साथ अपने एहसास मत जुड़ने दो, क्यों?

    शायद इसलिए कि अगर किसी से एहसास जुड़ेंगे तो उसके साथ हमारी उम्मीदें जुड़ेंगी और वह हमारी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा तो तकलीफ हमें ही सहनी पड़ेगी।

    एक लड़की जिसके चेहरे पर मासूमियत साफ देखी जा सकती है, लेकिन चेहरे पर सख्ती लिए अभी वह अपने 20 मंजिला इमारत के ऑफिस केबिन में बैठी लगातार इन्हीं बातों के बारे में सोच रही थी। उसने सोचा भी नहीं था कि वह कभी जिंदगी के इस मोड़ पर खड़ी होगी जहां उसमें सही तरीके से सोचने समझने की शक्ति भी कम होने लगेगी। दर्द से तड़प इतनी होगी कि उस बेचैनी को दिल से शांत कर पाना उसके बस में न होगा।

    दर्द से लिपटा उसका चेहरा बिल्कुल लाल हो चुका था। खूबसूरत तो बहुत थी वह लेकिन कभी उसने इन सब पर ध्यान ही नहीं दिया। शायद इतना वक्त ही नहीं मिला उसे कि वह इन सब चीजों के बारे में सोच सके। उसकी गहरी काली आंखों में पानी के मोती चमक रहे थे। अभी इस तरह उसे देखना हर किसी को हैरत में डाल देता क्योंकि उसने पिछले कुछ सालों में अपनी जिस तरह की छवि बनायी थी। उस कारण वह सभी की नजरों में एक घमंडी और अकड़ू लड़की थी जिसे किसी के इमोशन्स की कोई कद्र नहीं थी। उसके बारे में जानना हर किसी के लिए इतना भी आसान नहीं था। अपने अतीत को वह पांच साल पहले ही पूरी तरह छोड़ चुकी थी लेकिन... क्या सब कुछ छोड़ना इतना आसान होता है... और अगर आसान होता तो... वह अपने ग़म में आंसू नहीं बहा रही होती... लेकिन यह आंसू भी तो उसने खुद ने ही तो चुने थे। इसलिए अब इन सब के साथ जीना ही उसकी असल जिंदगी थी जिसे अब जिंदगी भर जीना था।

    यह लड़की थी अद्विका राजावत, जिसकी उम्र लगभग अट्ठाईस साल होगी। सब इसे एआर के नाम से ही जानते हैं और इसे किसी पर कोई दया नहीं आती और किसी के लिए टाइम वेस्ट करना इसे पसंद नहीं। कम बोलना और गुस्सा करना इसके फेवरेट काम हैं। अपनी मेहनत के बलबूते पर इसने रजावत ग्रुप को पांच सालों में बहुत आगे पहुंचा दिया। हमेशा अखबार की सुर्खियों में छाया रहने वाली एआर का चेहरा आज तक किसी ने नहीं देखा।

    फिलहाल इसकी जिंदगी में दुख और तकलीफों के सिवा कुछ भी नहीं। जो भी चाहा उसे हासिल करना इसका जुनून है और कुछ ऐसा भी है जिसे हासिल ना कर पाने का इसे आज भी पछतावा है।

    बट अभी वह अपने केबिन में टेबल के सामने रखी एक ब्लैक रोलिंग चेयर पर बैठी भावनाओं में कैद होकर आंसू बहा रही है। ऐसा नहीं है कि भावनाओं पर उसका कंट्रोल नहीं है लेकिन फिर भी आज के दिन उसने अपना सबसे अनमोल इंसान खो दिया। ना चाहकर भी उसने उसे हमेशा के लिए अपने से दूर कर दिया और यही बात उसे लगातार बेचैन कर रही थी। अगर वह खुद चाहती तो अपनी खुशियां पा सकती थी लेकिन उसने अपने हाथों से सब कुछ उजाड़ दिया और अब इस बात का अफसोस भी वह नहीं कर सकती थी।

    ज्यादा सोचना उसके लिए हमेशा से खतरनाक साबित होता था और अब उसका दिमाग सून होने लगा था। उसकी बेचैनी और तड़प लगातार बढ़ती जा रही थी। अब वह सांस लेने में भी तकलीफ महसूस करने लगी थी, आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा था। उसे अपना शरीर लड़खड़ाता महसूस हो रहा था। वह लगातार खुद को स्थिर रखने का प्रयास कर रही थी। किसी तरह वह टेबल का सहारा लेने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाती है, इस बीच वह लम्बी लम्बी सांसें ले रही थी। वह टेबल को पकड़ नहीं पाती और लड़खड़ाकर गिर जाती है। बस उसे अपना सिर गोल गोल फिरता महसूस होता है। वह अपने मुंह से आवाज निकालने का प्रयास कर रही थी लेकिन उसे अपने शरीर में इतनी भी शक्ति महसूस नहीं हो रही थी और अंत में वो बेहोश हो जाती है लेकिन तब तक वह अपनी वॉच में लगा एक स्विच दबा देती है जिससे उसकी असिस्टेंट को ऑटोमेटिकली एक वॉइस मैसेज सेंड हो जाता है...... "कॉल द माई डॉक्टर एंड कम फ़ास्ट इन माई केबिन।"

    उसकी असिस्टेंट समायरा सिंह, जिसे पूरा ऑफिस सैमी के नाम से जानता है, एक पच्चीस साल की लड़की, जो शक्ल से ही तेज मालूम पड़ती है। हर समय बस बोलती रहती है। वह वॉइस नोट को पढ़कर भागते हुए सीईओ केबिन की तरफ चल देती है जो बीसवें माले पर था और वो अभी तीसरे माले पर एचआर डिपार्टमेंट के हेड से कुछ इम्पोर्टेंट इंटरव्यूज के बारे में बात कर रही थी।

    कुछ देर बाद वह सीईओ केबिन के बाहर थी। उसने अपने फिंगरप्रिंट से पासवर्ड लॉक खोला और अन्दर चली जाती है और जैसे ही सामने अद्विका को बेहोश पड़े देखती है उसकी सांसें मध्यम पड़ने लगती हैं। किसी तरह होश में आकर वह उसे उठाकर सोफे पर लेटा देती है।

    जारी है.....

    क्या कारण है जो अद्विका इस तरह बेहोश हो गयी?

    क्या अद्विका की बेचैनी खत्म होगी?

    जानने के लिए पढ़ते रहिये - तेरे जाने का गम

  • 2. तेरे जाने का ग़म - Chapter 2

    Words: 1200

    Estimated Reading Time: 8 min

    वह अभी बेहोशी की हालत में सोफे पर लेटी थी और डॉक्टर की एक टीम उसका चेकअप कर रही थी। सैमी वहीं खड़ी लगातार भगवान से उसके ठीक होने की प्रार्थना कर रही थी। ऐसा नहीं था कि अद्विका का उसके साथ बर्ताव अच्छा था। वह उसके साथ भी बिल्कुल कोल्ड हार्टेड थी लेकिन पिछले 3 साल से उसके साथ काम करते हुए वह उसके बारे में इतना तो जान ही गयी थी कि उसके ऐसे बर्ताव के पीछे उसका अकेलापन है, वो अपनी अच्छाइयों को अपने अकड़ूपन में दबाकर रखती है।

    खैर, उसको पूरी तरह एग्जामिन करने के बाद उन सब के हेड डॉक्टर मित्तल, अद्विका को कुछ दवाइयां और इंजेक्शन देते हैं और सैमी की तरफ मुखातिब होते हुए, "जी आप..."

    सैमी जो लगातार अद्विका की तरफ ही देख रही थी, डॉक्टर के अचानक पुकारने पर हड़बड़ा सी जाती है लेकिन कुछ हद तक खुद को संभाल कर बोली, "जी डॉक्टर, मैं इनकी असिस्टेंट हूं।"

    डॉक्टर: "आप अपनी बॉस से कहिए कि अपना ध्यान रखें। खैर मैं दवाई लिख रहा हूं, आप किसी से कहकर मंगवा दीजिएगा।"

    सैमी जबरदस्ती मुस्कराते हुए अपने चश्मे को नाक पर सही करते हुए बोली, "ठीक है डॉक्टर। इन्हें होश कब तक आएगा?"

    डॉक्टर: "इंजेक्शन दिया है इसलिए बेहोश हैं, आधे घंटे बाद होश आ जाएगा।"

    खैर अब तक सैमी की सांसें जो अटकी हुई थी उसे तसल्ली सी मिली।

    उसने एक स्टाफ से दवाई लाने के लिए रिसिप्ट के साथ मैसेज कर दिया और खुद डॉक्टर को छोड़ने के लिए नीचे चली गयी। कुछ वक्त बाद वह अद्विका के केबिन में बेचैनी से लगातार चक्कर काटे जा रही थी, "अब क्या करूं। मैम की ऐसी हालत नहीं है कि वह मीटिंग अटेंड कर सके और मिस्टर सिंघानिया इतने अकड़ बुड्ढे कि वो डायरेक्ट डील कैंसिल कर सकते हैं... अब क्या करूंगी मैं। हे भगवान इतनी सारी जिम्मेदारियां आप मेरे सिर पर ही क्यों डाल देते हैं। अब मैं नन्ही सी जान जरा सा स्ट्रेस नहीं झेल सकती हूं और आप मुझ पर इतनी बड़ी मुसीबत डालने से पहले एक बार सोच तो सकते थे... एटलिस्ट इतना तो सोच लेते कि मैं इतना बर्डन झेल पाऊंगी या नहीं..."

    "वैसे मुझे क्या करना चाहिए.. सोच सैमी सोच.. वरना यह जॉब तो गयी।" इस वक्त वह अपने मुंह में अपनी उंगलियों के नाखून चबाये जा रही थी।

    अद्विका जिसे थोड़ी देर पहले ही होश आ गया था, वह उसकी बकबक से लगातार इरिटेट हो रही थी। वह चाहकर भी अपने गुस्से को कंट्रोल नहीं कर पा रही थी। इसलिए अपनी सख्त आवाज मे बोली, "तुम्हें बस शांत रहना चाहिए ताकि मुझे कुछ शांति मिले और फिर क्या..."

    सैमी की तो जैसे सांसें ही रुक गयी। उसे अपनी सांसें धीमी पड़ती महसूस हो रही थी। उसकी इतनी सख्त आवाज और ठहराव, उसे डरने के लिए मजबूर कर रहा था।

    लेकिन अब तो उसने कांड कर ही दिया था तो डरने का कोई वजूद नहीं रह गया था।

    इसलिए वह डरते हुए पीछे मुड़कर सिर झुकाए बोली, "सॉरी बॉस, गलती हो गयी, आगे से ऐसी गलती नहीं होगी। गलती क्या मैं तो अब से चुप ही रहूंगी। मेरी मरी हुई बुआ की कसम, मैं आगे से कुछ नहीं बोलूंगी।"

    अद्विका उसे फिर लगातार बोलते देख सख्ती से बोली, "मि. सिंघानिया की फाइल लेकर आओ और फटाफट मीटिंग रूम रेडी करवाओ वरना... अपना रेजिग्नेशन लेटर तैयार रखना। मुझे काम में लापरवाही बिल्कुल पसंद नहीं है।"

    उसे फिर से अपने अकड़ू रूप में देखकर, सैमी फटाफट से बोली, "जी बॉस, सारी तैयारियां उनके आने से पहले हो जायेगी। आप ज्यादा स्ट्रेस मत लिया कीजिए। डॉक्टर ने मना किया है।" इतना कहकर वह फटाफट उसके केबिन से बाहर जा चुकी थी और अद्विका के पास बस अपना गुस्सा कन्ट्रोल करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था।

    वह कुछ देर पहले की अपनी हालत देख आंखे बंद किये सोफे से सिर टिका लेती है। कुछ तो चल रहा था उसके दिमाग में लेकिन उसके पूरा होने की उम्मीद उसे दूर दूर तक दिखाई नहीं दे रही थीं, "प्लीज लौट आओ। अब और नहीं सहा जा रहा है। ऐसा ना हो कि तुम्हारे इंतज़ार में मेरी सांसें ही रुक जाये।" यह अद्विका का ऐसा रूप था जो दुनिया की नजरों से छिपा था।

    कभी कभी मुस्कराते चेहरे अपने अंदर गहरा दर्द समेटे होते हैं। जो दर्द वो किसी को दिखाने मात्र के नाम से भी डरते हैं।

    कुछ देर बाद वह मीटिंग रूम में अपने उसी ऑरों में बैठी थी जिसको देखकर सामने वाले के शरीर में कंपकंपी आना लाजमी था, आखिर बिजनेस जगत की क्वीन थी। अपने एक छोटे मूवमेंट से ही वह किसी को भी फर्श से अर्श पर ले जाने की ताकत रखती थी।

    मि. सिंघानिया जो उसके आने वाले प्रोजेक्ट पर इन्वेस्ट करने वाले थे और उसी के सिलसिले में यह मीटिंग रखी गयी थी।

    एक अधेड़ उम्र का आदमी जिसने बिजनेस सूट पहना था वो अद्विका के सामने अपने असिस्टेंट के साथ बैठा जबरदस्ती बत्तीसी चमका रहा था, "देखिए मिस राजावत, मैं आपके प्रोजेक्ट पर इन्वेस्ट करने के लिए तैयार हूं, ऐसे में सारी शर्तें मेरी तरफ से होनी चाहिए ना कि आपकी तरफ से। अगर यह प्रोजेक्ट डूब गया था तो बर्बाद मैं होउंगा आप नहीं, पैसे सिर्फ मेरे डूबेंगे। अगर रिस्क मैं ले रहा हूं तो शर्तें भी मेरी होनी चाहिए और मुझे 30% नहीं पूरे 60% प्रॉफिट चाहिए। अगर मंजूर है तो ठीक वरना मेरे पास और भी ऑप्शन है।"

    किसी को अद्विका के सामने इतना बोलते देख, अद्विका के बगल में खड़ी सैमी के तो होश उड़ गये वह मन में बोली, "लगता है इस बुड्ढे को अपनी तरक्की कुछ रास नहीं आ रही है। भगवान इसे बॉस के रौद्र रूप को सहने की शक्ति देना।"

    डर तो मि. सिंघानिया के असिस्टेंट को भी लग रहा था, वो मन में बोला, "यह बॉस की बिना सोचे समझे बोलने की आदत एक दिन मुझे भी मरवाएगी यह तो मुझे हमेशा से पता था लेकिन यह नहीं पता था कि वह दिन इतनी जल्दी आ जायेगा। भगवान मुझे इतनी जल्दी नहीं मरना पर अब लग रहा है कि बॉस को खुद से ही अपनी कंपनी को बर्बाद करने का शॉक चढ़ा है। मानते है कि लंदन रिटर्न है तो इंडिया के बारे में नहीं जानते होंगे लेकिन अद्विका राजावत तो एक ब्रांड है। जिसके लिए इन्वेस्टर्स की कमी नहीं है पर ज्यादा बोलने की आदत...."

    मि. सिंघानिया बिना सोचे समझे बोलने जा रहे थे उन्हें तो यह भी पता नहीं चल रहा था कि वक्त के साथ वो अद्विका के गुस्से को बढ़ा रहे हैं। अद्विका का चेहरा गुस्से से लाल हो गया था और वह कभी भी आपे से बाहर हो सकती थी।

    सैमी जो बस अपनी नजरें उसके चेहरे पर आते जाते भावों पर जमाये हुए थी वो मन में बोली, "1, 2, 3.... बूम...."

    जारी है.....

  • 3. तेरे जाने का ग़म - Chapter 3

    Words: 1198

    Estimated Reading Time: 8 min

    तेरे जाने का गम - पार्ट 3

    आगे ......

    सैमी मन में - "एक..दो..तीन...और बूम..."

    अद्विका ने गुस्से से पेपरवेट टेबल पर मार दिया। उसके गुस्से से लाल चेहरे को देख मि. सिंघानिया के असिस्टेंट के तो पैर कांपने लगे थे।

    मि. सिंघानिया जो अब तक बिना सोचे समझे बोलने जा रहे थे, पेपरवेट की आवाज सुनकर उनकी नजर सीधे अद्विका की नजरों पर टिकी और इतनी सर्द आंखें देख उनका कलेजा मुंह में आ गया।

    अद्विका गुस्से से - "मि. सिंघानिया, आपको तो शुक्र मनाना चाहिए था कि मैंने आपके साथ काम करने के लिए हामी भरी। आप नहीं जानते होंगे लेकिन किसी से भी पूछ सकते हैं कि राजावत ग्रुप कभी किसी के पास इन्वेस्टमेंट मांगने नहीं गया। बड़े-बड़े इन्वेस्टर्स लाइन में खड़े होते हैं, बस इसलिए कि वो राजावत ग्रुप के साथ काम कर सकें।"

    "और अद्विका राजावत सिर्फ अपनी शर्तों पर काम करती है।"

    "हम यह डील यहीं कैंसिल करते हैं। मुझे अपने फैसलों में किसी का हस्तक्षेप पसंद नहीं है। आपकी वजह से मेरा इतना टाइम वेस्ट हुआ, इसका भुगतान तो आपको करना ही होगा।"

    इतना कहकर वो अपनी चेयर से खड़े होकर मीटिंग रूम से दनदनाते हुए बाहर निकल जाती है।

    सिंघानिया तो बस अभी भी सदमे से बाहर नहीं आया था।

    सैमी कड़क आवाज में - "आपके साथ अब बहुत बुरा होने वाला है मि. सिंघानिया... अब शायद ही भगवान आपको बचा सकते हैं।"

    "अब आप जा सकते हैं। राजावत ग्रुप को आपके रहम की जरूरत नहीं है।"

    मि. सिंघानिया जा चुके थे और सैमी अपना काम कर रही थी।

    ऑफिस में आज सब लोग शांति से अपना काम कर रहे थे, जबसे उन्हें पता चला था कि बॉस बहुत गुस्से में हैं।

    अद्विका अपने केबिन में बैठी किसी को कॉल लगाती है - सामने से कॉल उठाते ही वह अपनी सख्त आवाज में - "कुछ पता चला..."

    सामने से - "नहीं बॉस, हमने पूरा एरिया छान लिया।"

    अद्विका - "कुछ क्लू?"

    सामने से - "नो बॉस..."

    अद्विका सख्ती से - "तुम्हारे 'नो' को पिछले 5 साल से सुन रही हूं मैं... एडी... एक काम नहीं कर पाए तुम... मुझे इस काम के लिए तुम पर भरोसा नहीं करना चाहिए था।"

    एडी - "सॉरी, बॉस... पर वह बहुत शातिर हैं, अपने पीछे एक सुराग नहीं छोड़ते हैं, पर बॉस एक बात अजीब लगी इस बार..."

    अद्विका - "क्या..."

    एडी - "यही कि मैम जो कोई भी है इन सबके पीछे... वो आपको और आपके सोचने के तरीके से बहुत अच्छे तरीके से वाकिफ है बॉस... वरना वह हमसे एक कदम आगे नहीं रह सकता है। जहां हम पहुंचते हैं वहां से सब कुछ गायब।"

    अद्विका - "जब इतना समझ आ गया है तो... सॉल्यूशन..."

    एडी - "हमें अलग तरीके से सोचना होगा। कई बार चीजें बहुत आसान होती हैं लेकिन अपनी सोच से हम उन्हें और उलझा देते हैं। अब बस आसानी से शांत मन से सोचना होगा। कुछ दिनों के लिए शांत हो जाते हैं। सामने वाले को अपनी जीत की खुशी मनाने दीजिए।"

    अद्विका - "हम्म... वैसे तब तक के लिए मेरे पास तुम्हारे लिए एक काम है। मि. सुबोध सिंघानिया... मुझे अच्छी वाइब नहीं आई उससे... कुछ और मकसद है उसका राजावत ग्रुप में आने का... जरा इन्फॉर्मेशन निकलवाओ उसकी..."

    इतना कहकर वह बिना एंडी की बात सुने कॉल कट कर देती है।

    अद्विका अपनी रोलिंग चेयर पर घूमते हुए - "लगता है लोगों को शांति पसंद नहीं आ रही है तभी तो अद्विका राजावत के पुराने रूप को जगाने में लगे हैं पर बेचारे... उन्हें पता नहीं कि अगर मैं अशांत हुई तो उन्हें शांति नसीब नहीं होगी। बस एक बार मुझे वो मिल जाए... फिर आप सबको तड़पा-तड़पा कर नहीं मारा तो... मैं अद्विका राजावत नहीं... अभी के लिए खुश रहिए... आगे बहुत रोना लिखा है आप सबके नसीब में..." इस वक्त उसके चेहरे के एक्सप्रेशन बिल्कुल डार्क थे, जैसे सामने नर्क का देवता सभी को सजा देने के लिए तैयार खड़ा है।

    वक्त अपने साथ बहुत से सैलाब लाएगा जिसमें किसी का तो डूबना तय है। अब पता नहीं अद्विका के दिल में चल रहा तूफान कितनों को तबाह करेगा।

    अद्विका अपनी चेयर से खड़ी होकर केबिन से बाहर निकल जाती है। बाहर आकर वह बस एक बार "मिस सिंह" बोलती है और सामने सैमी हाजिर हो जाती है - "जी बॉस।"

    अद्विका - "मिस्टर भाटिया की फाइल लेकर आओ फटाफट..."

    सैमी फुर्ती से - "ठीक है बॉस।"

    इतना कहकर वह फटाफट अपने केबिन में जाती है वहां से फटाफट मिस्टर भाटिया की फाइल लेकर नीचे पार्किंग में आ जाती है जहां अद्विका कार में बैठी उसका ही इंतजार कर रही थी।

    सैमी फाइल हाथ में लिए कार की आगे की सीट पर ड्राइवर के बगल में बैठ जाती है। इसके बाद कार पार्किंग से बाहर निकल जाती है। उसके साथ ही सिक्योरिटी की 3 आगे और 3 पीछे गाड़ियां भी उनके साथ चल पड़ती हैं।

    कुछ देर बाद उनकी कार सड़क पर दौड़ रही थी। कुछ आगे जाकर ड्राइवर झटके से कार रोक देता है।

    अद्विका जो पीछे बैठी लैपटॉप पर अपना काम कर रही थी, वो गुस्से से - "एकदम से क्या हुआ?"

    ड्राइवर - "जी बॉस... वो आगे जाम लगा है, बहुत से लोग इकट्ठे हो रखे हैं लगता है किसी का झगड़ा हो गया।"

    अद्विका परेशानी से बाहर निकलते हुए - "मैं देखती हूं।"

    सैमी - "लेकिन बॉस..."

    अद्विका सख्ती - "डोंट से..."

    इतना कहकर वह बाहर निकल जाती है। आगे गाड़ियों की बहुत लंबी लाइन लगी थी जो लगातार हॉर्न बजा रहे थे जिससे शोर काफी हद तक बढ़ गया। किसी तरह वह गाड़ियों को पार कर वहां पहुंच जाती है, उसके पीछे-पीछे सैमी भी आ रही थी।

    वहां का नजारा कुछ और ही था। एक बुजुर्ग आदमी का ठेला टूटा हुआ था चारों तरफ सब्जियां बिखरी हुई थी, 4 बिगड़ैल से दिखने वाले लड़के एक लड़की को घेरे खड़े थे और वह लड़की उनसे बहस कर रही थी, उसकी तेज आवाज से अंदाजा लगाया जा सकता था कि उसका चेहरा गुस्से से लाल हो रखा होगा। उसकी पीठ अद्विका की तरफ थी जिससे वो उसका चेहरा नहीं देख पाई। अद्विका अपनी नजर चारों तरफ घुमाती है तो सारी भीड़ तमाशा देखने में बिजी थी, कुछ लोग बातें बना रहे थे तो कुछ लोग वीडियो बना रहे थे। उसके होंठ अपने आप ही बुदबुदा उठते हैं - "डबल डीलिंग कैरेक्टर।" यही काफी था अद्विका के गुस्से को बढ़ाने के लिए। सुबह से वैसे ही उसके गुस्से का लेवल बार-बार बढ़ रहा था लेकिन किसी तरह उसने अपने आप पर कंट्रोल कर रखा था लेकिन अब उसे अपना गुस्सा आपे से बाहर होता नजर आ रहा था।

    जारी है .....

  • 4. तेरे जाने का ग़म - Chapter 4

    Words: 1377

    Estimated Reading Time: 9 min

    वहाँ का नज़ारा कुछ और ही था। एक बुजुर्ग आदमी का ठेला टूटा हुआ था, चारों तरफ़ सब्जियाँ बिखरी हुई थीं। 4 बिगड़ैल से दिखने वाले लड़के एक लड़की को घेरे खड़े थे और वह लड़की उनसे बहस कर रही थी। उसकी तेज़ आवाज़ से अंदाज़ा लगाया जा सकता था कि उसका चेहरा गुस्से से लाल हो रखा होगा। उसकी पीठ अद्विका की तरफ़ थी जिससे वो उसका चेहरा नहीं देख पायी। अद्विका अपनी नज़र चारों तरफ़ घुमाती है तो सारी भीड़ तमाशा देखने में बीजी थी, कुछ लोग बातें बना रहे थे तो कुछ लोग वीडियो बना रहे थे। उसके होंठ अपने आप ही बुदबुदा उठे- "डबल डीलिंग कैरेक्टर।"

    यही काफ़ी था अद्विका के गुस्से को बढ़ाने के लिए। सुबह से वैसे ही उसके गुस्से का लेवल बार-बार बढ़ रहा था लेकिन किसी तरह उसने अपने आप पर कंट्रोल कर रखा था, लेकिन अब उसे अपना गुस्सा आपे से बाहर होता नज़र आ रहा था।

    वह किसी भी तरह से अपने गुस्से को कंट्रोल करना चाहती थी। जैसे ही वह लड़की पीछे की तरफ़ मुड़ती है, उसका चेहरा देखकर अद्विका हैरान रह जाती है। वह ऐसे उसके सामने आएगी, उसने सोचा भी नहीं था। तभी वह देखती है कि उसके पीछे खड़ा एक लड़का उसके ऊपर अपने हाथ में पकड़ी रॉड से वार करने वाला था तो अद्विका की आँखों में खून उतर आया। उसने अपनी पॉकेट में रखी गन निकाल कर उसके हाथ पर निशाना साध दिया, गोली उस लड़के के हाथ को छूकर गुज़र गयी और खून का फव्वारा छूट गया। यह देख वहाँ खड़े लोग सदमे से अद्विका को देखने लगे। वैसे भी कोई उसे जानता नहीं था इसलिए किसी को महसूस तक नहीं हुआ कि उन सब के सामने द ग्रेट बिजनेस वुमन, अद्विका राजावत खड़ी हैं।

    वह लड़की भी सदमे से अद्विका को देख रही थी। खून देखकर उसकी हालत ख़राब हो गयी और वह बेहोश हो गयी। तब तक अद्विका के सिक्योरिटी गार्ड सारे एरिया को घेरे खड़े हो गये। जिस लड़के के हाथ में गोली लगी थी वह चिल्लाते हुए बोला- "तुम जानती नहीं हो कौन हूँ मैं... तुम्हारा नामोनिशान मिटा दूँगा इस धरती से। तुम्हारी इतनी हिम्मत जो तुमने सीएम भूपेंद्र सिंह के बेटे, परवीन सिंह पर गोली चलाने की हिम्मत करी।"

    अद्विका के सारे गार्ड उस पर गन तान देते हैं, आखिर उनके बॉस को धमकी देने की हिम्मत की थी उस पिद्दी भर के लड़के ने।

    अद्विका की लाल आँखों में खून उतर आया और अब यह तो तय था कि बेटा खुद बाप की बर्बादी लिख रहा था। अद्विका अपने डार्क ओरो के साथ आगे बढ़ते हुए, परवीन के पास जाकर बैठ जाती हैं। वह अपने दोनों हाथों से उसकी कॉलर ठीक करते हुए गुस्से से एक-एक शब्द चबाकर बोली- "बात ऐसी है कि जंगल में आकर कुत्ते, शेर से ज़बान लड़ाने की औक़ात नहीं रखते हैं और जिस खेल की तुम बात कर रहे हो ना उस खेल की मास्टर माइंड हूँ मैं... चाहूँ तो एक मिनट... और सब बर्बाद... समझे नहीं क्या..."

    अपने होंठों का पाउट बनाते हुए बोली- "चूं... चूं... बेचारा बच्चा... दूध पीने की उम्र में माँ से ज़बान लगाओगे तो सिर्फ़ डंडे मिलेंगे लेकिन एआर से ज़बान लड़ाओगे तो डंडे मारने के लिए चमड़ी भी नहीं बचेगी। तुम्हारे बाप ने तुम्हें सब कुछ सिखाया... लेकिन औरतों की इज़्ज़त करना बिल्कुल नहीं और इसकी सज़ा तो भुगतनी ही होगी।"

    "वैल खड़े होकर" वह तेज आवाज में बोली- "जॉन कम फास्ट इस गंदगी को हॉस्पिटल पहुँचाओ और यहाँ किसी का मुँह नहीं खुलना चाहिए।"

    और एक बुजुर्ग आदमी को जो अपनी सब्जियों के ख़राब होने का रोना रो रहा था उसे देखकर समायरा से बोली- "मिस सिंह, इनका जो भी नुकसान हुआ है उसकी भरपाई कीजिए। मि. भाटिया से आज की मीटिंग कैंसल करने के लिए मेल भेज दीजिए, आगे... पता होगा।"

    इतना कहकर वह उस लड़की को जो दिखने से अठारह साल की लग रही थी उसे गोद में लेकर चली गयी।

    कुछ देर बाद वो सिटी हॉस्पिटल में थी जहाँ की फैसिलिटी अफॉर्ड करना हर किसी के बस की बात नहीं...

    वह वहाँ एक चेयर पर बैठी बस डॉक्टर के बाहर आने का इंतज़ार कर रही थी। इन 5 सालों में यह पहली बार था कि वह किसी का इंतज़ार कर रही हो... शायद वह शख्स उसके लिए इतना इम्पोर्टेंट होगा।

    खैर, कुछ वक़्त बाद

    डॉक्टर की एक टीम बाहर आकर बोली- "डोंट वरी मिस राजावत, वह बिल्कुल ठीक हैं शायद खून देखकर बेहोश हो गयी थी। कुछ देर बाद होश आ जायेगा। आप उनसे मिल सकती हो।"

    डॉक्टर की बात सुनकर अद्विका अपना सिर हाँ में हिला देती हैं।

    इसके बाद वह नॉर्मल वार्ड में चली जाती हैं जहाँ वह लड़की अपने चेहरे पर दुनिया जहाँ कि मासूमियत समेटे लेटी थी। उसकी बंद आँखों पर छायी बड़ी-बड़ी पलकें उसकी आँखों को खूबसूरत बना रही थी और यह पलकें उसे किसी की शिद्दत से याद दिला रही थी।

    अद्विका उस लड़की के पास बैठकर बोली- "कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढा तुम्हें... एक बच्चे की तरह थी तुम मेरे लिए। तुम मेरे लिए कितनी अज़ीज़ हो... यह भी तुमसे दूर जाने के बाद पता चला। आज मैं अपनी बेटू से और अपने आप से वादा करती हूँ कि कुछ भी हो जाये आज के बाद ना तो तुम्हें अपने आप से दूर जाने दूँगी और ना ही कभी कोई तकलीफ़ तुम्हें छू भी सकेगी। आई मिस यू सो मच। हमेशा एक ही गिल्ट खाये रहता कि उसकी सबसे कीमती चीज को भी मैं नहीं संभाल पायी। एक गिल्ट का बोझ आदमी को किस हद तक खोखला कर देता है यह मुझसे बेहतर कोई नहीं जान पायेगा।"

    "काश वो हादसा हमारी जिंदगी में होता ही नहीं तो बहुत खुश रहते हम लोग। पता नहीं आगे क्या होगा? कभी नहीं समझा पाऊँगी तुम्हें कि कभी-कभी कुछ चीजों को संभालने के लिए उन्हें खुद से दूर करना पड़ता है पर शायद... तुम्हें तो पा लिया मैंने... चाहे उसके लिए बहुत लम्बा इंतज़ार सहा हो लेकिन क्या कभी उसे पा सकूँगी क्योंकि उसके हिस्से तो अपने हाथों से दर्द लिखा था मैंने..."

    उसके चेहरे पर दर्द साफ दिखाई दे रहा था। सांसें रुकती सी महसूस हो रही थी और एक अरसे बाद उसकी आँखों से टपका वह एक आँसू गालों से होते हुए नीचे फर्श पर बिखर चुका था जैसे वो बिखरी हुई थी बहुत से टुकड़ों में एक लम्बे अरसे से.... और खुद को समेटने की कोशिश भी करना उसकी चाहत नहीं थी या शायद खुद को समेटना तो उसे आता ही नहीं था।

    कभी-कभी कुछ फैसले हम एकतरफ़ा सोच के आधार पर ले लेते हैं। हमें लगता है कि हमारा फैसला सामने वाले के लिए सही है लेकिन सामने वाले, इसे किस तरह से लेता है या हमारा लिया फैसला सामने वाले को अन्दर तक किस हद तक तोड़ देता है। यह हम नहीं समझ पाते हैं। हम बस, उस पर अपने फैसले थोपते चले जाते हैं। और वह हमारे हर फैसले को सिर झुकाकर मान लेता है क्योंकि हमारी रुसवाई उसके सहन करने की सीमा के बाहर है और इस तरह सामने वाले के पास घुटन भरी जिंदगी के अलावा कुछ नहीं बचता है हम उसके हिस्से तड़प, दर्द, बेचैनी लिख रहे हैं जब इस बात का अहसास होता है तब तक वक़्त निकल चुका होता है और फिर हमारे पास अफ़सोस करने के अलावा या गिल्ट के अलावा कुछ नहीं बचता है। नीचे गिरे सिक्के का एक हिस्सा दबा होता है और एक दिख रहा होता है। दिख नहीं रहा है इसका मतलब यह नहीं कि उस हिस्से का कोई वजूद नहीं।

    और अद्विका के साथ भी यहीं हो रहा है, वो कहते हैं ना अब पछताए क्या होत जब चिड़िया चुग गयी खेत।

  • 5. तेरे जाने का ग़म - Chapter 5

    Words: 1301

    Estimated Reading Time: 8 min

    वक्त अक्सर लाइलाज गम दे ही जाता है। खामोश व्यक्तित्व अक्सर इसके ही उदाहरण होते हैं। दुनिया के सामने खुद को पत्थर दिखाने वाले भी अक्सर किसी खास के सामने टूटकर बिखर जाते हैं।

    अद्विका काफी देर से खामोशी का चादर ओढ़े उस लड़की का हाथ थामे एकटक निहार रही थी। कुछ खोजने की कोशिश में वह विचारों की गहराई में उतर कर बस खुद से ही सवाल जवाब कर रही थी।

    कुछ देर बाद उस लड़की की पलकें धीरे-धीरे हिलने लगी थीं, जिससे अद्विका सचेत हुई, बस खामोश एकटक उसे देखने लगी। वह बेसब्री से उसकी अगली प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगी।

    उसकी आंखें बार-बार हिलकर कुछ वक्त बाद स्थिर हो चुकी थीं। लगातार धुंधली दिखती सारी तस्वीरें अब साफ हो चुकी थीं। वह लगातार अपनी उन टिमटिमाती हरी आंखों से अद्विका को ही निहारने में लगी थी। अद्विका ने उसका हाथ पकड़ने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया ही था कि वह डरकर उससे दूर हटकर अपने आपको उसके छूने से बचाने के लिए एकदम से बोली, "नहीं मुझे छूना मत..."

    उसके ऐसा कहने और उसके चेहरे पर डर के भाव देखकर एक बार फिर उसका चेहरा गिल्ट में डूब गया। वह किसी तरह हिम्मत जुटाकर कुछ बोलने की कोशिश कर रही थी लेकिन उसको अपनी हर कोशिश लगातार विफल होती नजर आ रही थी। किसी भी परिस्थिति में अपनों भावों को स्थिर रखने वाली अद्विका आज खुद को डरा हुआ महसूस कर रही थी। किसी को भी अपने आगे झुकाने की ताकत रखने वाली वो आज एक छोटे और मासूम से वजूद के सामने घुटने टेकने के लिए तैयार थी। वह हर कोशिश करने के लिए तैयार थी जो सामने बैठे उस वजूद को खुशी दे सके।

    पर फिलहाल उसे अपनी खामोशी तोड़नी थी जिसे उसने एक लम्बे अरसे से अपने पत्थर दिल वजूद के पीछे कहीं छिपा रखा था जो बस कुछ खास लोगों के लिए ही थी जिनमें वह नन्हा वजूद भी शामिल था।

    अद्विका अपने शब्दों में मिठास घोलने की पुरजोर कोशिश करते हुए बोली, "क्या हुआ बेटू आप इस तरह डर क्यों रही हैं।" फिर भी उसकी आवाज में कड़कपन था लेकिन....

    वह लड़की हैरानी से उसे देखने लगी और फिर खुश होकर ताली बजाते हुए बोली, "हे! आप तो आज बोल भी रही हैं।"

    अद्विका हैरानी से बोली, "मतलब?"

    वो लड़की मासूमियत से बोली, "मैं जानती हूं आप एक सपना हैं और हमेशा की तरह आप, आज फिर गायब हो जायेगी जैसे ही मैं आपको छूने की कोशिश करुंगी। इसलिए मैं आपको आज छुउंगी ही नहीं फिर देखती हूं कि आप गायब कैसे होती हैं?"

    अद्विका को हैरानी हो रही थी उसके डरने की वजह जानकर। वह आज खुद को बहुत छोटा महसूस कर रही थी। उसने वह फैसला लिया ही क्यों और जिस फैसले की वो मन ही मन हमेशा अपने तर्क देकर सही साबित करने की कोशिश में लगी रहती... आज उसकी जिंदगी में अपनी अहमियत देखकर वह ग़लत साबित हो गयी थी और इस अपराधबोध से निकलना शायद ही उसके बस में होगा।

    पर कहते हैं ना वक्त हर घाव भर देता है बस देखना तो यह है कि घाव कितना भरता है या नासूर बन जाता है।

    अद्विका अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए प्यार से बोली, "छुकर देख लो। आई प्रॉमिस बेटू इस बार यह हकीकत है जो गायब नहीं होगा।"

    वह लड़की खुशी से बोली, "सच कहीं आप मुझे बहलाने के लिए झूठ तो नहीं बोल रही हैं।"

    अद्विका अपनी गर्दन हिलाते हुए बोली, "नहीं बिल्कुल नहीं।"

    "अच्छा," इतना कहकर वह डरते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाकर अद्विका का हाथ छूने की कोशिश करती है। जब वह गायब नहीं होती तो वह उसके चेहरे पर हाथ फेरने लगती है और अचानक ही अद्विका की नाक को जोर से खिंचकर हंसने लगती है और खुश होते हुए कहती है, "सच में आप तो गायब नहीं हुई..." अद्विका अपने मन में सोचती है अब भी इसकी हरकतें नहीं बदली।

    वह लड़की अचानक ही अपने शब्दों पर गौर करती है फिर शौक होकर अद्विका को देखने लगती है और लड़खड़ाती आवाज में बोली, "मतलब सच में... कहीं यह सपना... आह... आप सच में... मतलब... आप लौट आयी। यानी आप लौट आयी.....पर मैं आप से नाराज हूं।"

    अद्विका बोली, "मैं मना लुंगी।"

    वह हंसते हुए बोली, "आप और मनाना... मैं जानती हूं आप नहीं मना पायेगी।"

    अद्विका बोली, "पर कोशिश तो कर ही सकती हूं।"

    वो लड़की बोली, "मान ली आपकी बात...."

    अद्विका हैरानी से बोली, "तुम मुझसे नाराज़ नहीं हो?"

    वो लड़की बोली, "आप शायद भूल रही हैं कि कभी आप ने ही कहां था कि नाराज रहकर हम अक्सर खुशी के पलों को बर्बाद कर देते हैं और फिर वक्त गुजर जाता हैं और उन पलों से हम मुखातिब ही नहीं हो पाते क्योंकि उन पलों को कभी हम ही सहेजने के बजाय नाराजगी में बर्बाद कर रहे थे।"

    "इसलिए मैं आपसे कभी नाराजगी में भी रूड या फिर मिसबिहेव नहीं कर सकती हूं क्योंकि आप की जिंदगी में अपनी जगह जानती हूं मैं..."

    "और इतना तो जानती हूं कि आप जानबुझ कर कभी मुझे दुःख पहुचा ही नहीं सकती हैं और मुझसे दूर रहकर खुश तो आप भी नहीं रही होगी।"

    अद्विका सोचती है, 'इतना भरोसा...' इस वक्त उसकी आंखों से आंसू बाहर निकलने के लिए तैयार थे। अब तक वह दिल में जितना डर महसूस कर रही थी वह डर अब कहीं दूर जाता नजर आ रहा था।

    वह लड़की बोली, "ऐसा तो कह सकती हैं आप... आप पर मेरा भरोसा कोई नहीं हिला सकता हैं खुद भगवान भी नहीं। चाहे आप खुदको कितना ही बुरा दिखा सकती हैं लेकिन मैं आपसे झुठे दिखावे के लिए भी नाराज़ नहीं रह सकती हूं।"

    अद्विका की झुकी नजरें देख वह कहती है, "आप इसे ताना मत समझिए बस मैं आपको बताना चाहती हूं कि हर मुश्किल आसान लगती हैं जब अपने साथ हो लेकिन सामने मुश्किल हो और आपके अपनों को नुकसान ना पहुंचे इसलिए उन्हें खुद से दूर कर देना समस्या का समाधान तो नहीं हो सकता हैं।"

    अद्विका हैरानी से बोली, "इतनी समझदारी..."

    वो 'ना' में गर्दन हिलाते हुए बोली, "नहीं बिल्कुल नहीं... मैं तो आपको किसी और का ज्ञान बंट रही थी और मैं बस बच्ची ही ठीक हैं क्योंकि बड़े होकर मुझे तकलीफें नहीं उठानी आपकी और उन लोगों की तरह जो जिम्मेदारी निभाने के चक्कर में खुदके वजूद को ही भूल जाते हैं।"

    अद्विका मन में सोचती है, 'सही तो कहां था उसने पर शायद में तब नहीं समझ पायी पर आज सब कुछ आयने की तरह साफ हैं। बड़ा होना कितना तकलीफ भरा होता हैं जिम्मेदारी, कभी कभी किसी जिम्मेदारी को निभाकर हमें खुशी मिलती हैं तो कभी कभी जिम्मेदारी हमें नर्क के समान जिंदगी का भी अनुभव करवा देती हैं। कभी उस पिता से पूछना उसका दर्द, जब वह अपने अभी अभी जन्मे बच्चे के साथ खेलने के लिए भी वक्त नहीं निकाल सकता हैं क्योंकि पिता बनने के साथ एक जिम्मेदारी भी उसके हिस्से आती हैं - अपने बच्चे के लिए बेहतर जीवन... और जो वक्त उसे अपने बच्चे के करीब रहकर गुजारना चाहिए वह वक्त अपनी जिम्मेदारी को निभाने में गुजारता हैं और जब बड़ा होने के बाद अपने बच्चे के मुंह से सुनता हैं ना कि ऐसा क्या कर दिया उन्होंने उसके लिए। यह तो हर पिता का फर्ज होता हैं और यहीं बात दिल में दर्द की लहर ले आती हैं और उस पिता की खामोश सिसकी बस फिजाओं में दबकर रह जाती हैं।'

    जारी है...

  • 6. तेरे जाने का ग़म - Chapter 6

    Words: 1178

    Estimated Reading Time: 8 min

    "अद्विका मुस्कराते हुए - तो तैयार हैं आप रिहाना राजावत, अपने घर चलने के लिए।"

    रिहाना - "आपको मुझसे और कुछ नहीं पूछना..."

    अद्विका - "पूछना तो बहुत कुछ है लेकिन अभी तुम्हारा ठीक होना ज्यादा जरूरी है।"

    रिहाना - "पर..."

    अद्विका उठते हुए - "तुम बिल्कुल ठीक हो जाओ फिर तुम्हें मेरे हर सवाल का जवाब देना है।"

    कुछ देर बाद रिहाना, अद्विका के साथ एक बड़े से महल जैसे घर के दरवाजे पर खड़ी थी और एक सर्वेंट, रिहाना की आरती उतार रही थी अद्विका के कहने पर और सभी सर्वेंट हैरानी से मुंह खोले अद्विका को ही देख रहे थे जो रिहाना का हाथ पकड़कर, उसे संभाले खड़ी थी।

    यह नजारा हर किसी को हैरान कर देने के लिए काफी था क्योंकि किसी को संभालना हो और वो भी अद्विका राजावत, जिसे खुद के अलावा इस पूरी दुनिया में किसी से कोई मतलब नहीं था, बिल्कुल नामुमकिन सा था।

    खैर, वक्त अब बदलने के लिए तैयार था जो अद्विका को मोम की तरह पिघला दे।

    कुछ सर्वेंट आपस में घूर-पुसर करने लगे थे।

    एक सर्वेंट - "आज सब कुछ कितना अजीब है! आज तक मैम के अलावा इस घर में किसी ने कदम नहीं रखा तो यह लड़की कौन है? और हमें तो यही पता था कि मैम के परिवार में कोई नहीं है, फिर यह कौन है?"

    दूसरी - "मुझे तो मैम का इस लड़की की आरती उतारने के लिए कहना भी अजीब लग रहा है, ईवन इस महल जैसे घर में तो मंदिर भी नहीं है।"

    तीसरी - "मुझे तो कुछ और ही लग रहा है। आज तक, हममें से किसी ने भी इन्हें मुस्कराते नहीं देखा लेकिन आज मुस्कान उनके चेहरे से जाने का नाम तक नहीं ले रही.... इससे साफ है कि सामने खड़ा यह मासूम वजूद मैम के लिए सबसे जरुरी है।"

    "...शायद, तुम सही कह रही हो।"

    वह सर्वेंट अपने बाल झटकते हुए - "मैं कभी गलत नहीं कहती हूं।"

    सभी को आपस में घूसर-फूसर करते देख उनके पास खड़ी एक सर्वेंट - "अगर तुम्हें यहां जॉब नहीं करनी तो बेशक तुम सब आपस में बातें कर सकती हो।"

    यह सुनना था कि सबको हकीकत का भान हुआ और वो सब चुपचाप सीधे खड़ी हो गयी।

    वैसे अद्विका राजावत के इस महल जैसे घर में सभी फीमेल स्टाफ ही थी और उनकी हेड थी मिसेज शकुंतला राठी, जिन्हें सब दाई मां कहकर बुलाते हैं जो अभी आरती का थाल लिए रिहाना के सामने खड़ी बस उसे देख रही थी।

    अद्विका - "दाई मां, आप जल्दी आरती उतारें। बेटू को दवाई भी लेनी है। वीकनेस की वजह से वह ज्यादा देर खड़े नहीं रह पायेगी।"

    दाई मां मुस्कराते हुए - "आज पहली बार खुशी हो रही है कि तुम किसी के साथ खुश रह सकती हैं। हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वह तुम दोनों को सदा ऐसे ही एक दुसरे के साथ रखें।"

    अद्विका के कहने पर रिहाना उनके पैर छू लेती है।

    रिहाना मुस्कराते हुए - "आप सच में बहुत अच्छी हैं दाईं मां पर बीएम से थोड़ा कम...."

    आरती उतारने के बाद अद्विका, रिहाना को लेकर अन्दर आ जाती है जहां वह बस खुश होते हुए गोल-गोल घूमकर बस सब ओर देखे जा रही थी।

    अद्विका परेशानी - "संभलकर, चोट लग सकती है...."

    रिहाना - "सब कुछ कितना खुबसूरत है ना बिल्कुल सपनों की तरह... थैंक्यू बीएम... आप सच में..." फिर खुश होते हुए - "आप सच में मुझसे बहुत प्यार करती हैं और फिर अपने दोनों हाथों को फैलाकर... मैं आपसे इतना ज्यादा प्यार करती हूं आप सोच भी नहीं सकती हों।"

    अद्विका मुस्कराते हुए उसकी सारी हरकतें देख रही थी, वह अपने मन में - "मैं जानती हूं अकेले रहकर मैच्योर हो चुकी हो। खुद को संभालना भी सीख चुकी हो। यह सब कुछ बस इसलिए कर रही हो... यह बचपना... यह खुदको नासमझ दिखाना.. इस तरह अपनी उदासी को छुपाकर बस मुस्कराना.. ऐसी तो नहीं थी तुम.. अरे हल्की सी सुई चुभने पर कितना चिल्लाने लगती थी और जब तक मैं पुरा दिन तुम्हारे पास नहीं रहती तो बस बेमतलब रोती रहती थी और आज बस इसलिए मुस्करा रही हो कि मैं उदास ना होऊं.. तुम शायद नहीं जान पायी, बस कहने के लिए बेटी नहीं माना है... तुमसे तो रुह तक का रिश्ता जुड़ा है... तुम सोच भी कैसे सकती हो कि तुम अपने चेहरे पर हंसी रख अपनी उदासी को छुपाओगी और मैं समझ भी नहीं पाउंगी।" और उसे इस तरह अपने भावों को छुपाते देख अद्विका को अपने दिल में गहरी उदासी हुई....और जहन में एक याद कौंध गई - "ऐसा मत करीये इका, आप बस एकतरफा सोच रही हो। मुश्किल सामने हो तो रिश्तों को या परिवार को नहीं छोड़ा जाता है। अगर आपने अभी अपना फैसला नहीं बदला तो बाद में पछतावे के अलावा कुछ नहीं बचेगा। देखना आपका यह फैसला सबकी जिंदगी और जज्बात बदल कर रख देगा और आपको यह एहसास हर पल कचोटेगा कि आपका फैसला कितना गलत था।"

    "एक बार फिर सोच लीजिए इका... प्लीज..."

    "सही थे आप... हर पल कचोटेगा मुझे यह फैसला और हर पल ऐहसास होगा कि मैं कितना गलत थी और अंत में मेरे पास सिर्फ अफसोस बचा है। मेरी जान... बेटू... मुझसे अपनी तकलीफ छुपा रही है। आपको हमेशा के लिए खो दिया... अब बचा है तो अफसोस... और इसके साथ ही जिंदगी गुजारनी है। अब तो सुकून महसूस ही नहीं होता.. शायद यह पछतावा कुछ कम हो जब रिहाना को मैं एक बेहतर जिंदगी दूं और उसे ताकतवर बनाउ.. जिससे टकराने की कोई हिम्मत भी ना कर पाये।"

    जिंदगी हमें बहुत से रंग दिखाती है - सुख, दुःख, दर्द, नफ़रत, घृणा, प्यार, इश्क, मोहब्बत, धोखा, भरोसा और भी बहुत कुछ। बस कभी दिल में गिल्ट नहीं पालना मेरे दोस्त वरना जिंदगी से बड़ा बोझ और कुछ नहीं रह जायेगा। अगर हम कभी गलत फैसले ले लेते हैं तो सब कुछ भुलने की कोशिश कर अब आगे वही गलती न दोहराने की कसम खानी चाहिए क्योंकि जिंदगी आगे बढ़ते रहने का नाम है एक जगह ठहरने का नहीं पर क्या हो जब दिल हल्का भी करना है और अपनी गलती का एहसास भी है पर माफी मांगने में वक्त बहुत लगा दिया... और अब कभी वो शख्श हमारे सामने ना होगा... बिन पानी की तड़पती मछली सी छटपटाहट होती है दिल में और इंसान धीरे-धीरे कठोर बनता जाता है। जिंदगी का हर पल मौत सी तकलीफ़ महसूस करवाता है और मौत की चाहत के साथ जीना बहुत मुश्किल होता है मेरे यार!

    जारी है......

  • 7. तेरे जाने का ग़म - Chapter 7

    Words: 1058

    Estimated Reading Time: 7 min

    वक्त किसी का इंतजार नहीं करता...

    रात हो चुकी थी। चारों तरफ फैला अंधेरा कुछ अलग ही जज़्बात समेटे था और इस अंधेरे में अपनी बालकनी में झूले पर बैठी वह लगातार अपनी सोच में गुम थी - "5 साल.... कम समय नहीं है एक बिना मंजिल के रास्ते पर चलना पर शायद उसकी सजा यही थी जो उसने अतीत में किया वो भी तो सही नहीं था।" सभी के सामने कठोर बनकर रहने वाली अद्विका, अन्दर से कितनी टूटी हुई थी इसका अंदाजा लगाना भी हर किसी के लिए नामुमकिन था।

    कुछ जज़्बात अधूरे रह जाते हैं बिना साथी के
    कुछ सफर अधूरे रह जाते हैं बिना मंजिल के
    वक्त के साथ सब छूट जाता है
    अधूरे ख्वाब हो या ख्वाहिशें
    बस अफसोस रह जाता है बिना जिंदगी के

    ख्यालों में जीना उसे पसंद नहीं था और हकीकत से सामना करना भी बहुत तकलीफदेह था और इसके लिए उसने बीच का रास्ता निकाल लिया था। गुस्सा करना और कठोर बने रहना... बहुत कुछ था जो उसने अपने सीने में दफन कर रखा था जो कभी बाहर आया तो हर किसी को तोड़ कर रख देगा। बहुत मुश्किल होता है किसी ऐसे के बिना जिंदगी गुजरना जो आपकी जिंदगी हो जिसके सिवा कोई दरिया नहीं है आपके पास जिंदगी गुजारने का...

    इतना सोचते हुए वह अपने अतीत में जा चुकी थी...

    फ्लैशबैक

    8 साल पहले

    इंडिया, मुम्बई रात 8 बजे

    चारों तरफ अफरा-तफरी मची थी। एक 80 साल के बुजुर्ग को आनन-फानन में एम्बुलेंस से उतारकर शहर के सबसे बड़े हॉस्पिटल में भर्ती करवा दिया गया था। बेहोशी में भी उसके मुंह पर एक ही नाम था, "बिट्टो..." पूरी फैमिली परेशानी से वहां बैठी थी। एक 50 के लगभग का आदमी परेशानी से किसी को कॉल कर रहा था लेकिन मजाल हो जो हमने से फोन उठाया गया।

    एक औरत परेशानी से बोली, "फोन उठाया...?"

    वह आदमी परेशानी से गर्दन हिलाते हुए बोला, "नहीं..."

    यहां से दूर अमेरिका में,

    एक लड़की ब्लैक ओवरकोट पहने अपनी बाल्कनी में बैठी गिटार बजा रही थी। सूरज की रोशनी में उसकी गोरी रंगत सोने की तरह दमक रही थी लेकिन वह अपने ही ख्यालों में गुम लगातार गिटार बजा रही थी। उसके चेहरे के भाव लगातार बदल रहे थे जिसके साथ ही उसके हाथों की गति गिटार पर बढ़ने लगी थी। अपने ख्यालों में गुम उसे इस बात का अहसास तक ना था कि उसका फोन बार-बार बजकर बंद हो गया है।

    कुछ देर बाद जब उसे अपने अंदर थकान महसूस होती है तो वह गिटार को साइड में रखते हुए वहीं बालकनी में ही आंखें बंद कर लेट जाती है।

    उसकी पढ़ाई खत्म हुए 6 महीने हो गये थे लेकिन वह वापिस अपने देश नहीं लौटना चाहती थी। उसे अब अपनी जिंदगी में सुकून चाहिए था जो उसे वहां तो नहीं मिलने वाला था। इतने लोगों के बीच रहकर उसे बस घूटन महसूस होती थी। जहां अपने कहने को तो बहुत से लोग थे लेकिन सब उससे जुड़कर बस अपने स्वार्थ पूरे करने में लगे हुए थे और यही उसके तकलीफ की वजह थी इतने बड़े संसार में कोई भी नहीं था जिसे वह अपना कह सके.. और इन सबके कारण उसने फैसला कर लिया था कभी इंडिया ना जाने का.. अब देखते हैं वह कब तक अपने फैसले पर अडिग रहती है।

    वह अपना गुजारा करने के लिए वेबसाइटस बनाती थी और उन्हें बेचती थी।

    इंडिया

    "कुछ तो करना पड़ेगा वरना कुछ हाथ नहीं लगेगा।"

    "लेकिन आप तो जानती हैं ना उसे इंडिया बुलाना नामुमकिन है।"

    "तो क्या हाथ पर हाथ रखे बैठे रहे और पापा अपनी सारी प्रोपर्टी उस बत्तमिज के नाम कर दे। ऐसा तो मैं होने नहीं दूंगी चाहे इसके लिए मुझे लाशें ही क्यों ना बिछानी पड़े।"

    तभी एक आदमी काला कोट पेंट पहने अपने हाथ में एक फाइल लिए आता है।

    उसे देख कर सब लोग झगड़ना बंद कर रोने का नाटक करने लगते हैं जिसे वह आदमी समझ भी रहा था। वह अपनी गर्दन हिलाते हुए अंदर वार्ड में चला जाता है।

    अन्दर वार्ड में एक 80 साल का बुजर्ग लेटे हुए उसी के आने का इंतजार कर रहा था।

    उसके आते ही वह परेशानी से बोला, "कुछ पता चला.. उन दोनों का...?"

    वह आदमी मुस्कराते हुए बोला, "तुम इतना परेशान मत हो दिग्विजय.. और उन दोनों का पता चल गया है और कल में उन्हें ले भी आऊंगा लेकिन क्या तुम उसे बुला पाओगे। उसकी जीद्द तोड़ना इतना भी आसान नहीं होगा।"

    "जानता हूं लेकिन उसे बुलाने है पहले उन दोनों से बात करनी होगी।"

    "वो में कर लूंगा.. तुम बस अपनी सेहत पर ध्यान दो। इतना सब करने के लिए तुम्हारा ठीक होना जरूरी है। वरना.. तुम्हारे बच्चों ने तो नफ़रत दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।"

    वह बुजुर्ग आदमी हॉस्पिटल बेड पर लेटे-लेटे ही उदासी से बोला, "सही कह रहे हो तुम.. मेरा खुदका सिक्का ही खोटा निकला.. नहीं तो उसके पास भी एक हंसता मुस्कुराता दिल होता।"

    वह आदमी बोला, "अब में चलता हूं और टेंशन मत लो उस तक तुम्हारे बीमार होने की खबर पहुंचाना मेरा काम है और मैं इसे बखूबी करुंगा।"

    वह उदासी से बोला, "अब एक तुम्हारा ही तो सहारा है और मुझे विश्वास है तुम पर..."

    अमेरिका

    वह चाय पीते हुए वही का लोकल न्यूज पेपर पढ़ रही थी लेकिन उसे अपने दिल में एक अजीब सी घबराहट महसूस हो रही थी जो उसे समझ भी नहीं आ रही थी। वह अपने हाथ से सिने को सहलाते हुए बोली, "तुम भी आज मेरी तरह इतने बेचैन क्यों हो रहे हो।"

    तभी सामने टीवी पर एक न्यूज चल रही थी जिस पर उसका ध्यान जाता है और उसके हाथ से चाय का कप छूटकर नीचे गिर जाता है। उसकी आंखों से बहुत अरसे बाद आंसू आने लगते हैं...

    जारी है...

  • 8. तेरे जाने का ग़म - Chapter 8

    Words: 1108

    Estimated Reading Time: 7 min

    आगे...

    वक्त और हालात अक्सर हमारे फैसले बदल देते हैं और यह अद्विका को समझ आ गया था। वह अमेरिका में अपने फ्लैट में बैठी लगातार आंसू बहा रही थी। जी हां, सही समझे आप, वह लड़की अद्विका सिंघानिया ही थी।

    इंडिया में:

    हॉस्पिटल बेड पर लेटे वह बुजुर्ग आदमी अद्विका के दादाजी, महेंद्र सिंघानिया थे, जो उदासी से अपने मन में कुछ सोच रहे थे - कहते हैं ना इंसान शरीर का दर्द तो सह लेता है, लेकिन जब दर्द भावनाओं से जुड़ा हो तो सहन करने की सीमा ही खत्म हो जाती है, दिल हजार टुकड़ों में बंट जाता है, ना सोचने की शक्ति होती है, ना जीने की तमन्ना... होती है तो बस घुटन... जो धीरे-धीरे आदमी को अंदर से मार देती है और इंसान अपने दुखों के बोझ तले इस हद तक दब जाता है कि वह मरने के अलावा कुछ और सोच ही नहीं पाता... पर शायद हर किसी को अपनी जिंदगी जीनी ही पड़ती है... चाहे इंतजार मौत का ही हो लेकिन उसके लिए भी जिंदगी का हर पल गुजारना ही पड़ता है।

    वह अपने दिल की तकलीफ किसी से बांट नहीं पा रहे थे। दिल कुछ इस तरह विचलित था कि दिमाग में बस अतीत की स्मृतियां ही चल रही थीं और बोझ इस बात का था कि वो खुद चाहते तो सब कुछ बदल सकते थे लेकिन अब वक्त निकल चुका था। अपनी पोती अद्विका, जिसके मां बाप से वादा किया था उन्होंने हमेशा उसका ख्याल रखने का... इस वादे को पूरा नहीं कर पाने के बोझ से उभरे भी नहीं थे कि अद्विका का इंडिया वापिस न लौटने का फैसला उनको अन्दर से तोड़ गया और उसके भविष्य की चिंता और उसके इंडिया ना लौटने के फैसले का बोझ उन्हें अन्दर तक महसूस होता था। उनकी बस अब एक ही ख्वाहिश बची थी मरने से पहले एक बार उसके अक्स को अपनी उन बुढ़ी आंखों में बसा लेना। इस उम्र में इतनी चिंता उनको अंदर से खायें जा रही थी और इस वजह से वो अक्सर ही बीमार रहने लगे थे और अब तो डॉक्टर ने भी हाथ खड़े कर दिये - मरने से पहले वो अपनी पोती से मिलना चाहते थे जिसे वो कभी कोई खुशी नहीं दे पाये। एक आखिरी बार उसका चेहरा उन बुढ़ी आंखों में बसाना चाहते थे।

    अद्विका बस एकटक उस न्यूज को देख रही थी, उसकी आंखों के स्थिर भाव भी उसके दिल में मची ऊथल पुथल को छुपाने में असमर्थ थे। इंडिया ना लौटने का फैसला आखिर लिया ही क्यों था उसने... ऐसा चाहना तो दूर की बात सोच भी नहीं सकती थी वो... क्या कुछ नहीं किया उसके दादाजी ने उसके लिए... उसकी परवरिश के लिए सबसे लड़े और आखिर में उसके लिए उसे खुद से ही दूर कर दिया। जिसके लिए हर दर्द सहा जिसकी मुस्कराहट में ही अपनी दूनिया देखी... कितना दर्द होता है जब उसके भले के लिए उसे ही खुद से दूर करना पड़े लेकिन जब अपने दादाजी के लिए वह खुद उनसे दूर रह रही है तो उनकी तड़प का अंदाजा लगाना उसके लिए मुश्किल नहीं था।

    अक्सर दूसरों को जज करने वाले हम उन्हीं हालातों से गुजरते हैं तो हम सामने वाली की स्थिति आसानी से समझने लगते है।

    सब कुछ था उनके पास लेकिन वो नहीं था जिसकी उन्हें हमेशा से चाह थी जिनकी अच्छी परवरिश के लिए उन्होंने खुद की जिंदगी में अकेलापन लिख दिया आज कितना तड़पते हैं वो जब उनकी आंखों में अपने लिए सम्मान का एक कतरा भी महसूस नहीं करते... जीते जी नर्क देखा है उन्होंने...

    अद्विका सोच रही थी कि उसकी और उसके दादाजी की किस्मत ईश्वर ने एक ही कलम से तो लिखी है। सारी जिंदगी उन्होंने उन लोगों के लिए सब कुछ किया लेकिन आखिर में भी नफ़रत और जिल्लत के सिवा उन दोनों को कुछ नहीं मिला... बस एक आस थी कि कभी तो वो भी पिघलेंगे... लेकिन वो कभी नहीं पिघलेंगे... इस हकीकत को वो अपना चुकी थी और अब उसे कुछ फर्क नहीं पड़ता लेकिन कैसे उसने इतना ग़लत फैसला ले लिया इसके लिए उसे दर्द हो रहा था। जिन्होंने उसे सीने से लगा कर रखा उन्हें इतनी तकलीफ़ दे दी कि वो मौत के मुंह में खड़े हैं। अपने ग़म और परेशानीयो में उनके गम और परेशानियां तो पूरी तरह भूल चुकी थी वह... किसी के स्नेह भरे स्पर्श के लिए वह हमेशा तरसी तो क्या इसका बदला उसे अपने दादाजी से लेना चाहिए था जिन्होंने उसे अपने सीने से लगाये रखा... उन्होंने अपना हर फर्ज पूरा किया... फिर वह कैसे चुकी गयी, उनके प्रति अपने फर्ज और जिम्मेदारी से... इतना स्वार्थ तो नहीं था उसमें... तो क्या यह ग़लत नहीं कि उसने उनकी जिंदगी में इंतजार लिख दिया... जिनकी आंखे सदा उसको चारों तरफ ढूंढते हुए तड़पती हैं। उसने ऐसा पाप कर दिया कि वह इससे पूरी जिंदगी भी नहीं उभर पायेगी।

    आंखों से लगातार आंसु टपक रहे थे लेकिन उन आंसुओं को पोंछने वाला कोई नहीं था। कोई ऐसा नहीं था उसकी जिंदगी में जिसके कंधे पर सिर रखकर वह अपने दिल का सारा दर्द निकाल दे। सही में उसने इतनी सी जिंदगी में जितना सहा कोई और शायद ही सही पाता है। दिल में दर्द हो रहा था लेकिन हाथों से अपने होंठों को बींचे वह चीख चीखकर रो रही थी पर कोई नहीं था उसकी उन दर्द भरी चीखों को सुनने वाला... दिल का दर्द आज आंसुओं के जरीए निकलने को तैयार था उसका वह करूणा हर किसी की आंखों को नम करने के लिए तैयार था। कोई कह ही नहीं सकता कि जिसके आंखों में या चेहरे पर कोई भाव नहीं रहता है शांत रहने वाली अद्विका हर किसी की नजरों में घमंडी, अकड़ू कोल्डहार्टेड के अलावा कुछ नहीं थी वो इस तरह चीख चीखकर रो भी सकती है।

    पर कहते हैं ना सारे दर्द, दुःख, तकलीफों भी अक्सर उन्हीं के सामने जाहिर होती हैं जिनमें उन सभी तकलीफों को बीना अहसास कराये खामोशी से अपने अंक में समेटने का जज्बा होता है। हम ऐसे ही तो अपने दुःख और ख्वाहिशें हर किसी के सामने जाहिर नहीं कर देते हैं।

    फिलहाल तो कोई नहीं ऐसा जो उसे अपने हिसार मे समेट ले... हमेशा अपनी जिंदगी में बस दर्द सहने वाली अद्विका को होगी कभी खुशियां नसीब... जानने के लिए आगे पढ़िये 'तेरे जाने का गम'।

    जारी है...

  • 9. तेरे जाने का ग़म - Chapter 9

    Words: 1116

    Estimated Reading Time: 7 min

    वक्त के साथ हम हालातों से समझौता कर अपनी बिखरी हुई जिंदगी को समेटने की कोशिश करने लगते हैं।

    दर्द आंसुओं के ज़रिये बह गया था और अब वह सुर्ख लाल आंखें खामोशी से आसमान को ताक रही थीं। दिल में भावनाओं का सागर जो थोड़ी देर पहले हिलोरें मार रहा था, अब वह शांत सा कहीं दफन हो गया था, पर कहते हैं ना भावनाएं इंसान को कमजोर बनाती हैं तो मजबूत भी कर देती हैं।

    थोड़ी देर पहले जो उस पल में कमजोर पड़ गयी अपनी भावनाओं के चलते... अब वही भावनाएं उसे दोगुनी ताकत से खड़ा होने लिए मजबूर कर रही थीं।

    बचपन से अपने आप को अकेले संभालते संभालते वह अपनी भावनाओं को इस हद तक कंट्रोल करना सिख चुकी थी कि कोई उसके चेहरे को देखकर उसके दिल के भाव नहीं पढ़ सकता था और हमेशा उसके चेहरे पर एक से भाव ही दिखते हैं।

    लेकिन वह अब फैसला ले चुकी थी वापिस इंडिया जाने का और उसके मन में अपने दादाजी की एक ही बात चल रही थी - "हम अपने फैसलों के लिए कितने भी कठोर हों आदि, लेकिन वक्त और हालात की मार ऐसी होती हैं कि फैसले बदलते वक्त नहीं लगता हैं।"

    तब उन्हें बहुत गुस्सा आया था उन पर कि इतना प्यार करने के बावजूद भी उसके दादाजी उसे अपने से दूर क्यों कर रहे हैं, लेकिन आज उन्हें उनके हालात आज समझ आ रहे थे। वक्त और हालात के सामने हर फैसला बदल जाता हैं। सच ही तो हैं कि वक्त सब कुछ पलट देता हैं। राजा को रंक और रंक को राजा बनते देर नहीं लगती हैं।

    आज सुबह से उसने जो कुछ झेला था वह अब थक चुकी थी। पलकें नींद से बोझिल हो रही थीं लेकिन उन नजरों को भी खुला रहना था... पता नहीं इन सुर्ख आंखों को अब और क्या-क्या देखना लिखा था।

    अपना फोन निकाल कर वह अपनी फ्लाइट बुक कर चुकी थी जोकि शाम 6 बजे की थी। अब दिल में कुछ सुकून था कि इतने दिनों बाद उसे मौका मिलेगा उस वजूद को आंखों में भरने का जिन्होंने उसको खुशियों भरी जिंदगी देने की कोशिश में खुद की जिंदगी में जिल्लत और दर्द के नगमे लिख दिए।

    इंडिया

    हाॅस्पीटल में महेन्द्र जी उदासी से बेड़ पर लेटे थे और उनके चारों तरफ उनका परिवार बैठा था। बेटा - रमेश, बहू - शमिता, उनके दोनों बच्चे - प्रीत और समय, उनकी बेटी - हेमलता प्रताप, हेमलता के पति - विजय प्रताप और उन दोनों का इकलौता बेटा - ऋषभ।

    वो सब रोने धोने का नाटक कर रहे थे लेकिन महेन्द जी जानते थे कि सच्चाई क्या हैं - यह सब उनकी अरबों की प्राॅप्रटी के लिए किया जा रहा है, लेकिन उस प्राॅप्रटी की असली हकदार तो अद्विका थी, जिसे कभी वह इन सब लोगों के हाथ में नहीं जाने देंगे और चाहे इसके लिए उन्हें कुछ भी करना पड़े। वैसे भी वह अब तक बहुत झेल चुकी हैं। फैसला तो उन्होंने ले लिया था बस एक बार अद्विका आ जाये तो उन्हें सुकून की नींद नसीब हो जाये। उनकी बस एक ही इच्छा थी कि एक बार अद्विका को देख ले और उसे सुरक्षित हाथों में पहुंचा दे तो उन्हें भी इस बोझ भरी जिंदगी से छुटकारा मिल जाये और अद्विका को इंडिया बुलाने के लिए एक चिंगारी तो उन्होंने लगा ही दी थी अब बस आग लगने का इंतजार था।

    इधर एक अधेड़ उम्र का आदमी पसीने से भीगा हुआ एक घर के सामने खड़ा लगातार दरवाजा खटखटा रहा था लेकिन अभी तक दरवाजा खुला नहीं था। कुछ देर बाद दरवाजा खुलने की आवाज आती हैं तो उसकी सांस में सांस आती हैं।

    दरवाजा खुलते ही एक तीस वर्ष के लगभग औरत दरवाजा खोलते हुए बोली - "जी आप कौन..."

    वह आदमी बोला - "मुझे सर्वज्ञ राठौड़ से मिलना हैं।"

    वह औरत बोली - "जी, अन्दर आइए, साहब अभी अन्दर ही हैं आप उनसे मिल लिजिए।" इतना कहकर वह अंदर चली जाती हैं और वह आदमी, उसके पीछे पीछे चलने लगता हैं।

    अंदर आने पर वह देखता हैं कि एक लड़का हाॅल में बैठा मुस्कराते हुए एक 12-13 साल के लगभग लड़की की चोटी बना रहा था और वह लड़की मुस्कराते हुए उससे बात कर रही थी।

    अपने सामने किसी अंजान आदमी को देखकर, वह उस लड़की को उस औरत जिसका नाम सरला था उसके साथ भेज देता हैं और बैठकर उस आदमी से बात करने लगता हैं। वह आदमी सर्वज्ञ के साथ एक घंटे तक बात करने के बाद चला जाता हैं और सर्वज्ञ के चेहरे पर असमंजस के भाव छोड़ गया... उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब उसे क्या करना चाहिए।

    सुबह के 5 बजे....

    मुम्बई

    एक ऐसा शहर जहां दिन और रात एक जैसे होते हैं। दिन में जितनी अफरा तफरी... रात को भी उतनी ही अफरा तफरी... एक बात तो सही ही हैं कि मुम्बई कभी सोती नहीं है। चारों तरफ बड़ी-बड़ी चमचमाती बिल्डिंग्स... और उस चहल पहल भरी सड़क पर एक स्कार्पियो तेजी से दौड़ रही थी और उसमें बैठी थी अद्विका सिंघानिया ब्लैक बिजनेस सूट में आंखों पर ब्लैक गाॅगल लगाये। उसकी वह रश ड्राइविग, उसके गुस्से के लेवल को बताने के लिए काफी था।

    कुछ देर बाद उसकी गाड़ी... फुल सिक्योरिटी के साथ शहर के सबसे बड़े हाॅस्पीटल के सामने रूकती हैं। झटके से ब्रेक लगाने के कारण, कार के टायर बहुत दूर तक घिसते हुए गये थे जिसके निशान उस सड़क पर साफ दिखायी दे रहे थे।

    वह किसी तरह खुदके गुस्से को शांत रखकर स्थिर भाव के साथ कार से बाहर निकलकर अंदर की तरफ चली जाती हैं।

    हवाओ का रुख बदलने वाला हैं और अब फिर वह शहर सजग था अद्विका सिंघानिया के भौकाल को सहने के लिए। पता नहीं कितनों के सपने टूटकर चकनाचूर होने वाले थे। कितने ही नये दुश्मन बनने वाले थे तो कितने ही उसके गुस्से की चपेट में आकर बर्बाद होने वाले थे क्योंकि भले ही जब उसने इंडिया छोड़ा था तब कमजोर थी लेकिन अब वह अपने अन्दर दुगनी ताकत समेटे वापिस लौटी थी।

    वक्त हर किसी का आता हैं। दुःख के बाद सुख तो दर्द के बाद सुकून भी मिलता हैं।

    अब देखना यह हैं कि अद्विका के हिस्से का सुकून उसे कब मिलेगा।

    जारी हैं...

  • 10. तेरे जाने का ग़म - Chapter 10

    Words: 1553

    Estimated Reading Time: 10 min

    वह किसी तरह खुद के गुस्से को शांत रखकर स्थिर भाव के साथ कार से बाहर निकलकर अंदर की तरफ चली जाती है।

    हवाओं का रुख बदलने वाला है और अब फिर वह शहर सजग था अद्विका सिंघानिया के भौकाल को सहने के लिए। पता नहीं कितनों के सपने टूटकर चकनाचूर होने वाले थे, कितने ही नए दुश्मन बनने वाले थे तो कितने ही उसके गुस्से की चपेट में आकर बर्बाद होने वाले थे क्योंकि भले ही जब उसने इंडिया छोड़ा था तब कमजोर थी लेकिन अब वह अपने अंदर दुगनी ताकत समेटे वापिस लौटी थी।

    आगे ......

    वह अपने नए अंदाज के साथ आगे बढ़ रही थी। अस्पताल के लंबे गलियारे से होकर अद्विका अपने दादाजी, महेन्द्र जी के कमरे की ओर बढ़ रही थी। उसके कदम मजबूत थे, चेहरा कठोर और आँखों में वो ठंडापन, जो किसी भी साधारण इंसान को सहमा दे। लेकिन दिल के किसी कोने में डर और बेचैनी की एक हल्की सी परछाई भी थी, जो उसे अपने दादाजी की हालत को लेकर परेशान कर रही थी। जब वह वार्ड के बाहर रुकती है जहाँ पूरी फैमेली बैठी लगातार आपस में फुसर-फुसर कर रही थी।

    जैसे हेमलता जी की नजर उस पर पड़ती है वह गुस्से से आग बबूला होकर खड़ी हो जाती हैं, वह चीखकर बोली, "तुम्हारी इतनी हिम्मत कि तुम वापस लौट आयी। जाते वक्त तो बड़ा कह रही थी कि मुड़कर इंडिया की तरफ भी नहीं देखोगी।"

    अद्विका अपने हाथ से अपनी जाॅ लाइन घिसते हुए कहती है, "सोचा तो यही था लेकिन आपकी याद्दाश्त जरा कमजोर हैं, मैंने आगे भी कुछ कहां था।" फिर सभी की तरफ देखते हुए कहती है, "कोई बात नहीं आप सब को याद नहीं होगा। मैं याद दिलवा देती हूं कि मै मुड़कर इंडिया की तरफ नहीं देखुंगी बस शर्त हैं कि दादाजी को तकलीफ नहीं होनी चाहिए।"

    फिर सबकी तरफ सख्त नजर से देखते हुए कहती है, "आप सब को यहां देख खुशी हुई कि आप किसी के साथ तो रिश्ता निभाने की कोशिश कर रहे हैं चाहे लालच में ही सही पर इस जन्म में तो मुझे आप सब से यह उम्मीद नहीं थी।"

    रमेश जी गुस्से से बौखलाते हुए कहते हैं, "ऐ लड़की! तमीज से बात करो।"

    अद्विका शैतानी मुस्कराहट के साथ कहती है, "अब इसमें में क्या कर सकती हूं क्योंकि यह तमीज आप से ही तो सिखी हैं।"

    अद्विका की बात सुनकर वहां खड़े सभी लोग चौंक गए। उसके चेहरे पर एक तीखी मुस्कान और आँखों में ठंडा गुस्सा था। उसके शब्दों में ऐसा धारदार व्यंग्य था कि हेमलता, रमेश और बाकी सबके चेहरों पर असहजता साफ दिखाई दे रही थी।

    हेमलता ने गुस्से में कहा, “तो तुम यहां हमें ताना मारने आई हो? जब तक तुम्हें पैसों की जरूरत थी, तुम यहां रही और जब पैसों की जरूरत खत्म सब कुछ छोड़कर भाग गयी।"

    अद्विका बिना किसी भाव के कहती है, "अच्छा तो आप नाराज़ हैं कि मैं सब कुछ छोड़ कर क्यों गयी। यह पैसा, प्राॅप्रटी, एशो-आराम सब कुछ मेरा ही तो था लेकिन फिर भी मैंने छोड़ दिया।" फिर वह हेमलता जी की तरफ एक मुस्कराहट के साथ देखते हुए कहती है, "सच कहूं तो मुझे भी अफसोस होता हैं।" अद्विका अपने अंगुठे और अंगुली से गले को क्राॅस कर कहती है, "सच में बहुत दुःखी फिल होता था। विश्वास नहीं हो रहा हैं ना ---- मुझे भी नहीं हो रहा लेकिन क्या करूं आप मुझे इतनी शिद्दत से याद करतीं हैं ना कि मुझे आपका प्यार वापिस खिंच ही लाया। अब जो मेरा हक हैं वो किसी और के लिए थोड़ी ना छोड़ सकती हूं। अरे! भगवान खुद कहते हैं कि किसी का हक मारो मत और खुद का हक छोड़ो मत।"

    इसके बाद अद्विका गहरी सांस लेती है। सब लोग उसे ही हक्के बक्के होकर देख रहे थे लेकिन अद्विका के चेहरे पर अब तक जो मुस्कराहट थी वह मिट चुकी थी और उसका चेहरा बिल्कुल सपाट हो गया था।

    अद्विका ने बिना किसी भाव के जवाब दिया, “पैसों के लिए तो शायद आप सब यहां इकट्ठे हुए हैं, लेकिन मैं सिर्फ अपने दादाजी के लिए यहां हूँ। उनके लिए ही मैंने सब कुछ छोड़ा और अब मुझे इस घर और इसकी जिम्मेदारी में कोई दिलचस्पी नहीं है। लेकिन अगर कोई उनके साथ गलत करेगा, तो मैं चुप नहीं बैठूंगी।”

    रमेश ने फिर उग्र होकर कहा, “तू यहाँ क्या करने आई है, अद्विका? दादाजी की तबियत ठीक हो जाएगी। इस उम्र में होता रहता हैं लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि तुम वहां सब कुछ छोड़कर, यहां इंडिया आ जाये।"

    अद्विका ने रमेश की बात पर एक हल्की सी हंसी के साथ कहा, “शायद आप लोग मुझे गलत समझ रहे हैं। मैं यहाँ सिर्फ अपने दादाजी के लिए आई हूं। कड़वा लगेगा लेकिन उनके लिए में आप सब में से किसी पर भी रत्ती भर भरोसा नहीं कर सकती हूं और आपके जैसा परिवार हो ना तो इंसान का शरीर हर रोज ही मरता हैं और हर रोज ही बिमार पड़ता हैं तो इसमें कोई मुश्किल बात नहीं हैं।"

    हेमलता तिलमिला उठी और कड़े स्वर में बोली, “हम भी देखेंगे, अद्विका। यहाँ सिर्फ हमारी चलती है, तुम चाहे जो कर लो लेकिन हम, तुम्हें अपने मकसद में कामयाब नहीं होने देगे और अपने यह ड्रामें कहीं और करना। तुम्हारी रग रग से वाकिफ हैं हम लोग इसलिए यह तो भूल जाओ कि संपत्ति का एक हिस्सा भी तुम्हें मिलेगा!”

    अद्विका ने उसकी बात सुनी और एक पल के लिए उसकी ओर देखा। फिर शांत स्वर में बोली, “देख लीजिए, चाचीजी कोशिश करके देख लीजिए। लेकिन ध्यान रखिएगा, अगर अद्विका राजावत अपनी पर आयी तो आप कितनी भी कोशिश कर लिजिए, मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पायेगी। यह जो गेम आप मेरे साथ बचपन से खेलती आई रही हैं ना सब कुछ पता हैं मुझे तो जरा बचके क्योंकि मेरी नज़र आप पर ही रहेगी।"

    इतना कहकर अद्विका अपने दादाजी के कमरे की ओर बढ़ी, और बाकी लोग उसकी उस ठंडी और सख्त शख्सियत को देखकर सहमे हुए खड़े रह गए। अद्विका के इस नए रूप ने सबको साफ संकेत दे दिया कि अब वह किसी के सामने झुकेगी नहीं और अपनी बात मनवाने के लिए हर मुमकिन कदम उठाएगी।

    जैसे ही अद्विका अपने दादाजी के कमरे में दाखिल होती है, उसके कदम धीमे और सावधान हो जाते हैं। बाहर का सख्त और ठंडा रवैया अब भी उसके चेहरे पर बना हुआ है, लेकिन महेन्द्र जी पर नजर पड़ते ही उसकी आँखों में हल्का सा दर्द और चिंता झलकने लगती है। उनके कमजोर और थके हुए शरीर को देखकर, अद्विका की नज़रों में एक नर्माहट और अपनेपन की छाया दिखती है, जिसे उसने बाहर सबके सामने पूरी तरह से छिपा लिया था।

    कमरे में घुसते ही अद्विका ने एक गहरी सांस ली और अपनी आवाज़ को शांत रखते हुए धीरे-धीरे उनके पास पहुंची। उसका सख्त और निडर चेहरा भी थोड़ा नरम पड़ता है, लेकिन बाहरी लोगों के लिए वह अब भी एक चट्टान की तरह ठोस दिखाई देती है। जैसे ही उसने दादाजी के बगल में बैठकर उनका हाथ पकड़ा, उसके मन में उमड़ रहे भावों का एक सागर था, लेकिन चेहरे पर वही संयम और ठहराव बनाए रखा।

    कमरे के बाहर हेमलता, रमेश और बाकी सभी लोग अब भी अद्विका के इस नए रूप से हैरान खड़े थे। उनकी आंखों में हल्की झुंझलाहट और घबराहट थी, मानो अद्विका की सख्त निगाहें अभी भी उन पर टिकी हों। हेमलता के चेहरे पर अधूरा गुस्सा और असुरक्षा का भाव स्पष्ट दिख रहा था, जबकि रमेश बार-बार अपने गले को साफ करते हुए खुद को संयत करने की कोशिश कर रहे थे। बाकी रिश्तेदार, जो अब तक परिवार की आड़ में अद्विका को कमजोर समझते रहे थे, अब उससे कतराने लगे थे।

    अद्विका का इतना बदल जाना, उसका आत्मविश्वास और अधिकार जताने का अंदाज सभी को अंदर ही अंदर बेचैन कर रहा था। सबके चेहरे के भाव उसकी बातों के सटीक वार से आहत और असहज थे। अद्विका ने सबको एहसास करा दिया था कि अब कोई भी उसे हल्के में नहीं ले सकता, और वह अपने दादाजी की सुरक्षा और सम्मान के लिए हर कदम उठाने को तैयार है।

    दादाजी के हाथ को हल्के से दबाते हुए अद्विका ने धीरे से कहा, "दादाजी, अब मैं आ गई हूं। अब आपको कुछ भी नहीं होने दूंगी।" उसके शब्दों में एक निश्चय और ममता का मेल था, जो उसके कठोर चेहरे और सख्त लहजे के बावजूद, दिल की गहराइयों में छिपी भावनाओं का एहसास करा रहे थे।

    परिवार साथ हो तो सब कुछ आसान लगता हैं और परिवार खिलाफ हो तो हर पल जिन्दगी के साथ मौत के करीब जाने की लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती हैं। परिवार का साथ अमृत ही होता हैं जो सुकून से जिंदगी गुजरती हैं वरना तो हर पल सिर्फ मौत की चाहत में काटनी पड़ती हैं। बहुत मुश्किल होता हैं वो दर्द सहना, जो अपनों से मिला हो। अपनों से मिले घाव तो जिंदगी भर कुरेदे जाते हैं। कभी लाइन में अपने खड़े होते हैं तो कभी पराये पर सच कहें - नमक छिड़कने में माहिर होते हैं।

    दर्द को उस इंतहा तक सहना हैं, जब जिंदगी की डोर खत्म हो।

    जारी हैं .......

  • 11. तेरे जाने का ग़म - Chapter 11

    Words: 1303

    Estimated Reading Time: 8 min

    आगे...

    दो दिन बाद, इन दो दिनों में बहुत कुछ बदल गया। दिग्विजय जी के कहने पर सर्वज्ञ महेन्द्र जी से मिलने आया था और अब वह उनके फैसले पर सहमत लग रहा था। खैर, दिग्विजय जी ने अद्विका को शादी के लिए मना लिया था और इसकी बदौलत अभी अद्विका और सर्वज्ञ एक ओपन रेस्टोरेंट में आमने-सामने बैठे थे।

    अद्विका ने इस वक्त सादा सा सूट पहन रखा था, बाल खुले और थोड़े रूखे से लग रहे थे और उसके सामने बैठे सर्वज्ञ ने भी साधारण से पेंट शर्ट पहन रखे थे।

    उन दोनों के बीच इस वक्त एक अनकही सी झिझक थी जिसे वो दोनों ही जाहिर नहीं करना चाहते थे।

    सर्वज्ञ ने ही किसी तरह हिम्मत करके पहल की, "आपके लिए यह रिश्ता मायने तो रखता है ना?"

    जिस पर अद्विका ने उसको घूरकर देखा और इसलिए उसने बात बदलते हुए कहा, "मतलब वो नहीं था मेरा, मतलब मेरी नजर में रिश्ते उम्र भर के लिए होते हैं और उन्हें आसानी से तोड़ा नहीं जा सकता है और आजकल डिवोर्स तो एक ट्रेंड बन गया है और अगर आज आप मुझसे शादी के लिए हामी भर दें और कल आप मुझसे डिवोर्स की बात करें तो..."

    जिस पर अद्विका ने अपनी आंखों पर लगा चश्मा निकालकर सामने टेबल पर रखा और फिर बोली, "तो क्या कह रहे हैं आप मिस्टर वाॅटएवर, खैर फाॅर योवर काइंड इन्फोर्मेशन, मैं यहां अपने दादू के कहने पर आयी हूं क्योंकि वो चाहते हैं कि अब मेरी उम्र शादी के लायक हो गई है तो मुझे शादी कर लेनी चाहिए। लव मैरिज लायक आज तक मुझे कोई बंदा मिला नहीं तो मैंने सोचा क्यों ना दादू के कहने पर अरेंज मैरिज कर लूं और फिर शादी की उम्र निकल गयी तो मुझसे कौन शादी करेगा।"

    उसके इतने स्ट्रेट फाॅरवर्ड आंसर को सुनकर तो सर्वज्ञ हैरान रह गया। जो आज तक सबकी बोलती बंद करता था आज उसकी खुद की बोलती बंद हो गई। वह मन में सोचने लगा, "इसके साथ लगता है जिंदगी बहुत एडवेंचर भरी होगी और अगर यह अमीर दादू की बिगडेल पोती निकली तो..." इतना सोचते ही तो उसकी सांसे ही रुक गयी और वो खांसने लगा। खांसने से उसका पूरा चेहरा लाल हो गया था। जिस पर अद्विका ने उसकी तरफ पानी का गिलास बढा दिया। पानी पीकर वो किसी तरह शांत हो पाया था।

    उसको कुछ शांत देखकर अद्विका ने कहा, "ऐसा क्या सोच रहे थे जो चेहरे पर इतनी घबराहट दिख रही है। कुछ उटपटांग तो नहीं सोच रहे थे?"

    जिस पर सर्वज्ञ अपनी बिगड़ी सांसे संभालते हुए बोला, "नहीं, मैं बस यह सोच रहा था कि अगर आज हम शादी का फैसला लेते हैं तो हमारा कल कैसा होगा।"

    जिस पर अद्विका ने कहा, "देखो! ख्यालों से बाहर आ जाओ। मुझे कोई खाना बनाना नहीं आता है तो प्लीज यह तो सोचना ही मत कि मैं किचन में काम करने लगूंगी और तुम बाहर काम करोगे। हां, मैं सीख सकती हूं लेकिन हेल्प तुम्हें भी करनी होगी। वैसे तुम खाना बना लेते हो ना?"

    जिस पर सर्वज्ञ बोला, "आप बहुत आगे का सोच लेती हैं और यह तो मेरे ख्यालों में भी नहीं आया है और लगता है मुझसे मिलने आने से पहले तुमने मेरे बारे में इन्फोर्मेशन नहीं निकलवायी ना या आपके दादू ने आपको कुछ नहीं बताया।"

    जिस पर अद्विका ने कहा, "हम्म, दादू ने बताया तो था कि मैने तुम्हारे लिए एक बहुत अच्छा लडका चुना है। वह बहुत शांत और डिसेंट है लेकिन अब तक मुझे आपमें यह क्वालिटी दिखी नहीं है। आप इतनी देर से सवाल पर सवाल पूछे जा रहे हैं।"

    जिस पर सर्वज्ञ हैरानी से बोला, "लेकिन मैने अभी तक सिर्फ 1 सवाल पूछा है आगे तो आप सिर्फ सवाल एज्यूम करके आंसर दे रही हैं। खैर आई एम सर्वज्ञ राठौड़," फिर कुछ रुककर बोला, "आईपीएस आॅफिसर सर्वज्ञ राठौड़।"

    जिस पर अद्विका खुदसे बोली, "यह तो पुलिस वाला निकला पर मुझे क्या फर्क पडता है।" फिर खुदको संभालकर बोली, "आई एम अद्विका सिंघानिया," फिर कुछ रुककर बोली, "आई एम ए वेब डवलपर।"

    सर्वज्ञ बोला, "अब तक हम कुछ भी बात कर रहे थे लेकिन अब सिरयसली बात करते हैं। मेरे मम्मा पापा की डेथ आज से 8 साल पहले हो गयी थी तब मेरी बहन 4 साल की थी और बहुत मुश्किल से इस मुकाम पर पहुंचा हूं मैं, ऐसा कुछ नहीं है क्योंकि मेरे पापा हमारे लिए बहुत कुछ छोडकर गये थे लेकिन उस वक्त मेरे लिए सबसे मुश्किल काम था अपनी बहन का ध्यान रखना, उसकी देखभाल करना लेकिन मैने उसे अपने बच्चे की तरह पाला है और शादी का यह निर्णय मैने उसके लिए भी किया है। सी वांटस ए मदर। एक एज के बाद लड़किया अपनी परेशानी और थाॅट्स किसी फिमेल के साथ बांटने में कम्फ़र्टेबल होती हैं। वह उसकी मां, भाभी, बडी बहिन, दोस्त कोई भी हो सकती हैं। बेसिकली, यह हमारी अरैंज मैरिज हैं। ऐसे में अभी के लिए मैं यह तो बिल्कुल नहीं कह सकता कि मुझे तुमसे प्यार है और मैं तुमसे शादी करना चाहता हूं और ना कोई टिएन एज में कि मैं ऐसा कहूं कि तुम बहुत खुबसूरत हो और मैं तुम्हारे लिए चांद तारे तोडकर ला सकता हूं और ना ही यह कि..." वो आगे कुछ बोलता तब तक अद्विका उसे रोकते हुए बोली, "नहीं बस बस अभी के लिए काफी है आगे मैं समझ गयी कि हमारी अरैंज मैरिज है और अभी के लिए मैं तुमसे उम्मीद ना रखु।"

    जिस पर सर्वज्ञ सामने रखी काॅल्ड काॅफी का सीप लेते हुए बोला, "मुझे आप इतनी स्मार्ट लगी नहीं थी।"

    जिस पर अद्विका ने कहा, "खैर मुझे भी आपसे कोई उम्मीद नहीं हैं। वैल आप इतना घूमना-फिराकर बात कर रहे हैं। आप सीधे मुद्दे पर आ सकते हैं।"

    जिस पर सर्वज्ञ मन में सोचता है, "लगता है मन की बाते भी समझ लेती है।"

    फिर सकपकाते हुए बोला, "साॅरी, मैं सीधे मुद्दे पर आता हूं। मैं चाहता हूं कि अगर हम शादी करते हैं तो यह शादी हमेशा के लिए हो क्योंकि मुझे रिश्ते तोडना पसंद नहीं है। मुझसे आपको हमेशा रिस्पेक्ट और इक्विलिटी मिलेगी लेकिन आपको प्राॅमिस करना होगा कि आप हमेशा मेरी बहिन का ख्याल रखेगी। आज तक उसकी खुशियों का ख्याल मैं रखता था और अब आगे आपकी खुशीयों का भी ख्याल रखुगा लेकिन मेरे अलावा आप इकलौती होगी जो मेरी बहिन की अपनी होगी ऐसे में मैं चाहता हूं कि आपका और उसका रिश्ता हमेशा मजबूत रहे।"

    अद्विका एकटक उसको ही देख रही थी। वह खुद से बोली, "यू आर बेस्ट फाॅर मी, अपनी बहिन का इतना ख्याल रखते हो यानी रिश्तों की अहमियत समझते हो और उनको निभाना भी जानते हो। चेहरे से बनावटी नहीं लगते हो। जो भी दिल में है वो मुंह पर है। दिखावे में विश्वास नहीं रखते हो और हर किसी को रिस्पेक्ट भी देते हो। आई होप की तुम मेरे लिए एक अच्छे लाइफ पार्टनर साबित हो।"

    सर्वज्ञ थोडी तेज आवाज में बोला, "कहां खो गयी आप?"

    जिस पर अद्विका का ध्यान हल्का सा टूटता है और कुछ देख अचानक उसकी चीख निकल जाती है। घबराहट से उसका पूरा चेहरा लाल हो जाता है और हाथ कांपने लगते हैं और उसके मुंह से बस एक ही वर्ड ही निकलता है, "नहीं।"

    जारी हैं...

  • 12. तेरे जाने का ग़म - Chapter 12

    Words: 1168

    Estimated Reading Time: 8 min

    हाॅस्पीटल

    अद्विका, रेस्टोरेंट में ही बेहोश हो गयी थी। उसे अचानक से बेहोश देख, सर्वज्ञ के तो हाथ पैर फूल गये थे। उसने पानी छिड़क कर उसे उठाने की कोशिश की लेकिन उसे होश आया ही नहीं और इस वजह से वह उसे गोद में उठाये तेजी से कार में बैठा और स्पीड से गाडी पास के ही हाॅस्पीटल की तरफ दौड़ा दी।

    आज पहली बार किसी के लिए उसने ट्रैफिक रूल्स की भी धज्जियां उड़ा दी थी। उसको अपनी सांसे रुकती सी महसूस हो रही थी और किसी तरह वह हाॅस्पीटल पहुंचा था। इस वक्त अद्विका इमरजेंसी वार्ड में थी और वह बाहर बैठा अपनी अस्त व्यस्त होती सांसों को संभालने की कोशिश कर रहा था।

    वह बेंच पर बैठा सिर पकड़े बस यही सोच रहा था कि अद्विका के अचानक बेहोश होने का कारण क्या हो सकता है। "क्या मुझे बाबा से पूछना चाहिए? लेकिन उन्हें तनाव देना सही होगा या फिर अद्विका से पूछना चाहिए? लेकिन एक मुलाकात में ही वह अपने बारे में कैसे सब बतायेगी और उसे मुझ पर विश्वास होगा।" सवाल बहुत थे सर्वज्ञ के पास लेकिन जवाब नहीं और जवाब होते भी कैसे, उस इंसान से वह पहली बार ही तो मिला था।

    खैर वह अपने सवालों से जूझता रहता अगर डॉक्टर, उस इमरजेंसी वार्ड से बाहर नहीं आये होते तो।

    जैसे ही सर्वज्ञ ने डाॅक्टर को बाहर निकलते देखा, वो दौड़कर उनके पास गया। उसके चेहरे पर इस वक्त सवालों की झड़ी थी लेकिन उसके मुंह से सवालों के बजाय अद्विका के लिए फिक्र ही निकली थी, "डाॅक्टर वो ठीक हैं ना और ज्यादा कुछ सिरियस तो नहीं?"

    डॉ. के चेहरे पर कुछ चिंता की लकीरें थी जो इस वक्त उसे डरा रही थी, "सी इज नॉट ओके मि. राठौड, आपकी वाइफ एक गहरे ट्रामा से गुजर रही हैं। अभी उन्हें पैनिक अटैक आया था और यह इतना जानलेवा था कि वक्त पर ईलाज ना मिलने पर उनकी डेथ भी हो सकती थी।"

    सर्वज्ञ के पैर इतना सुनते ही लड़खड़ा गये और वह पीछे बेंच से टकरा गया। उसकी सांसे बिल्कुल उखड़ चुकी थी। जो लडकी थोड़ी देर पहले उससे बहुत नाॅर्मली बात कर रही थी और जो उसके सामने फुल एट्यिट्यूड से बैठी थी वह इतनी खतरनाक बिमारी से जुझ रही है, वो तो सोच भी नहीं सकता था। खैर वह खुदको संभालकर बोला, "लेकिन डॉक्टर वो बिल्कुल नाॅर्मल बिहेव कर रही थी जैसे कुछ हुआ ही नहीं और फिर वह घबराते हुए चीखकर बेहोश हो गयी।"

    जिस पर डाॅक्टर बोले, "मि. राठौड़ अधिकतर इस तरह के पेशेंट खुदको नाॅर्मल ही दिखाते हैं और इसके लिए वो उटपटांग हरकते भी करते हैं। हमने उनके टेस्ट किये थे और उनके ब्लड में कुछ इस तरह के सिम्टम्स मिले हैं कि उन्होंने लम्बे वक्त तक डिप्रेशन की गोलियां ली हैं। हमें ज्यादा कुछ तो पता नहीं चला लेकिन पास्ट में जो डाॅक्टर उनका इलाज कर रहे थे वो इस बारे में बता सकते हैं। हो सकता हैं उन्हें कोई गहरा सदमा लगा या फिर उनके साथ कुछ बुरा हुआ हो या फिर किसी ने लम्बे वक्त तक उन्हें मेंटली टाॅर्चर किया हो। इस बारे में हम कह नहीं सकते हैं लेकिन ऐसी कंडिशन में पेशेंट को एक्स्ट्रा कैयर की जरुरत होती हैं। उन्हें यह विश्वास दिलवाना जरुरी होता हैं कि उनकी देखभाल करने के लिए और हर समय उनके साथ खड़े रहने के लिए कोई हैं। आप उनकी हर इच्छा पूरी करने की कोशिश किजिए या फिर उनका एनवायरमेंट थोड़ा चेंज कीजिए। वैसे आपकी वाइफ हैं बहुत हिम्मती वरना लोग तो सुसाइड करने की भी कोशिश करते हैं या फिर दूसरों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं लेकिन आपकी वाइफ इतने लम्बे समय से सर्वाइव करने की कोशिश कर रही हैं। वैल आपकी वाइफ को थोड़ी देर में होश आ जायेगा।"

    इतना कहकर डॉक्टर जा चुके थे लेकिन सर्वज्ञ गहरे सदमे में था। वह सोच ही नहीं पा रहा था कि कोई इस कदर जिंदगी से परेशान रह सकता है। फिर वह खुद से बोला, "मुझे नहीं लगता कि अद्विका मुझे सच बतायेगी लेकिन बाबा, वो बता सकते हैं और मुझे पहले उनसे सारा सच जानना होगा।"

    इतना सोचते हुए वह वार्ड के अंदर चला गया जहां अद्विका की हालत देखकर उसकी आंखों से एक बुंद आंसु टपक गया। अपनी आंखों को हाथे से छूते हुए वह हंस दिया और खुद से ही बोला, "देखो तुम्हारे लिए तो आंखों से आंसु भी निकलने लगे हैं। पहली बार मम्मा पापा की डेथ पर रोया था और आज दूसरी बार तुम्हारे लिए यह आंसु अपने आप निकल रहे हैं। पास्ट में, मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता था लेकिन अब तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा। यह दिल पहली बार किसी के लिए धड़क रहा हैं और इसकी धड़कन छिनने का अधिकार तो अब मैं, तुम्हें भी नहीं दे सकता हूं। मैं नहीं जानता कि एक मुलाकात में ही तुमसे इतना लगाव कैसे हो सकता हैं जैसे तुम तो हमेशा से मेरी थी। पता नहीं यह क्या हैं लेकिन अब तुम और तुम्हारी सारी तकलीफे मेरी हैं और जो मेरा हैं उसे मैं किसी को नहीं दे सकता हूं।" इतना कहते हुए वह जाकर उसके बेड के पास रखी चेयर पर बैठ जाता हैं और एकटक उसे निहारने लगता है। उसकी नजरें एकटक उसके चेहरे पर टिकी थी जिस पर हवा की वजह से उसके बाल उड़ उड़कर फैल रहे थे। बंद पलकों में एक अनकही सी मासुमियत समायी हुई थी और चेहरा अभी भी बैचेनी से भरा था। वह धीरे धीरे अपने हाथ से उसके बालों को उसके चेहरे से हटाने लगता हैं। साथ ही उसका हाथ उसके सिर को भी सहला रहा था।

    .....

    एक जगह घनघोर अंधेरा छाया था। जिसमें बस कुछ लोगों के जूतों की आवाजे आ रही थी। वह आदमी अपने साथ खड़ी महिला का मुंह दबाये बैठा था जिसकी गोद में एक लडकी सो रही थी। कुछ देर बाद, वह आवाज उनके पास से ही आने लगी। जिससे उन सबकी सांसे रुक सी गयी और अब वह जूतों की आवाजे उनकी तरफ ही बढ़ रही थी। जिससे वह शख्स एकदम से उठकर टेबल के नीचे से बाहर निकल गया ताकि उन सबका ध्यान भटका सके और वह उसमें कामयाब भी हो गया और एकदम से गोली की आवाज से उस छोटी सी बच्ची की आंखे खुली लेकिन उसके पास कोई नहीं था। जैसे ही उसने टेबल के नीचे से बाहर देखने की कोशिश की वहां कुछ लोग खड़े हंस रहे थे और उनके सामने एक आदमी खून से लथपथ तड़प रहा था और एक औरत उन से जान की भीख मांग रही थी और एकाएक एक चीख सी गुंजी, "आआआआआ.......!"

    जारी हैं ....

  • 13. तेरे जाने का ग़म - Chapter 13

    Words: 1415

    Estimated Reading Time: 9 min

    अचानक से उसकी चीख गूंज उठी, "आआआआ..."

    वह अचानक से उठकर बेड पर बैठ गई। सर्वज्ञ कुर्सी से उठकर उसके पास ही खड़ा हो गया। उसने एक बार को उसको संभालने के लिए अपने हाथ आगे बढ़ाए लेकिन फिर रुक गया। उसके पास अभी हक जो नहीं था।

    इधर अद्विका डर से बड़बड़ा रही थी, "नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। वो उनको कैसे मार सकते हैं। नहीं नहीं... मैं उनको कुछ नहीं होने दूंगी।" अचानक ही उसके कानों में फिर गोली की आवाज गूंजी और फिर वह चीख पड़ी, "आआआआ....." उसकी हालत बिल्कुल कटे हुए सांप की तरह हो गयी थी। आंखों में डर की बड़ी-बड़ी लकीरें खिंची थीं। वह पागलों की तरह इधर-उधर देख रही थी और चीख रही थी। सर्वज्ञ बस उसके चेहरे पर आते-जाते भावों को देखने की कोशिश कर रहा था। अद्विका अचानक से पैनिक करने लगी। वह पागलों की तरह चीख और चिल्ला रही थी। अपने हाथों से खुद को ही नोच रही थी। जिंदगी ने अद्विका के साथ इतने हादसे किए थे कि यह उसका ही परिणाम था जो वह आज खुद से भी लड़ रही थी। बहुत सी अनसुलझी कहानियां थीं लेकिन उनका कोई छोर नहीं था और सर्वज्ञ के लिए परेशानी और बढ़ गई जब अद्विका हर सामान उठाकर इधर-उधर फेंकने लगी और मजबूरन सर्वज्ञ को डॉक्टर को बुलाना पड़ा क्योंकि उसे यह तो समझ आ गया था कि इस वक्त उसे शांत करना जरूरी था। डॉ. ने अद्विका को बहुत मुश्किल से नींद का इंजेक्शन लगाया था पर इतने वक्त में सर्वज्ञ एक बार भी अद्विका के करीब नहीं गया क्योंकि वो खुद को अभी तक भी उसके लिए अजनबी ही मान रहा था। खैर, जिनका मिलना लिखा होता हैं, वो मिल ही जाते हैं।

    सर्वज्ञ और अद्विका का आने वाला सफर कठिन होने वाला था।

    कुछ ही देर में अद्विका गहरी नींद में चली गई और सर्वज्ञ बाहर बेंच पर आकर बैठ गया और खुद से ही आत्ममंथन करने लगा।

    कुछ सोचकर उसने किसी को कॉल लगा दिया। सामने से भारी सी आवाज गूंजी, "कैसे हो बरखुरदार, वैसे अपनी होने वाली पत्नी से मिले?"

    जिस पर सर्वज्ञ चिढ़ते हुए बोला, "बाबा, वह आपकी भी पोती हैं।"

    जिस पर सामने से महेन्द्र जी हंसते हुए बोले, "जानता हूं कि मेरी पोती हैं और थोड़ी टेढ़ी भी हैं लेकिन अब तुम्हारी हैं।"

    जिस पर सर्वज्ञ बोला, "बाबा, प्लीज अभी मजाक नहीं और आपकी हमारी डेट शुरू होते ही खत्म हो गई और वो इस वक्त हॉस्पिटल बेड पर है और मैं बाहर बेंच पर बैठा हूं।"

    जिस पर सामने से सिर्फ घबराहट से भरी आवाज ही आई, "क्या, पर वो तो तुमसे मिलने गई थी और तब तक तो ठीक थी।"

    जिस पर सर्वज्ञ गहरी थकान भरी आवाज में बोला, "बाबा, घबराइए मत, वो तो अब भी ठीक हैं।"

    "पर तुमने तो कहा ना कि वो हॉस्पिटल बेड पर है।"

    "बाबा, आप भी कमाल करते हो, सी इज फाइन लेकिन उसे पैनिक अटैक आया था और अभी वह शांत हैं और स्टेबल हैं। बट मुझे आपसे कुछ जानना है।"

    "यही ना कि उसे पैनिक अटैक क्यों और कब से आ रहे हैं?"

    जिस पर सर्वज्ञ कुछ देर शांत रहा। वो समझ नहीं पा रहा था कि वो उसे सब बताएंगे या फिर नहीं लेकिन फिर आखिर में उसके मुंह से निकल ही गया, "हम्म।"

    "अगर ऐसा हैं तो मैं तुम्हें सब बता दूंगा लेकिन कभी भी यह सच आदी को पता नहीं चलना चाहिए। अगर तुम मुझसे वादा करते हो तो क्योंकि मैं नहीं चाहता कि आगे चलकर अतीत का सच उससे, उसका वजूद ना छीन ले।"

    "आपको क्या लगता है बाबा, वैसे एक वादा मैं कर सकता हूं कि आपकी पोती अब चाहकर भी मुझसे पीछा नहीं छुड़ा पाएगी।"

    "मतलब मेरी पोती की मासूमियत में तुम भी फंस ही गए?"

    "ना ना बाबा, मासूमियत आपकी पोती में रत्ती भर नहीं है। हां, लेकिन एटिट्यूड कूट-कूट कर भरा है।"

    "तो शाम को मिलो फिर चाय पर और बातें भी हो जाएंगी।"

    "ठीक हैं बाबा," इतना कहकर सर्वज्ञ ने कॉल कट कर दिया और इसके बाद फिर वह अपनी सोच में गुम हो गया। वह खुद से ही बोला, "बाबा ने अद्विका के पैनिक अटैक वाली बात को थोड़ा नॉर्मल ही लिया। इसका मतलब अद्विका को पैनिक अटैक लंबे समय से आ रहे है लेकिन मैं भी तो बाबा को अद्विका की रियल कंडीशन नहीं बता पाया। वह खुद बीमार है। खैर, अब अद्विका को खुद से संभालना होगा।"

    बाकी कुछ सोच पता था तब तक नर्स उसके पास आकर बोली, "सर, आपकी वाइफ को होश आ गया है।"

    इतना सुनते ही सर्वज्ञ झटके से उठकर इमरजेंसी वार्ड के अंदर चला गया लेकिन इस बार वाला नजारा उसके लिए और भी हैरानीभरा था। वह नहीं समझ पा रहा कि सामने बैठी वो लड़की इस तरह रंग बदल रही थी कि हर पल उसके सामने उसका कोई और ही रूप आ रहा था।

    वह सर झटकाते हुए दरवाजे से अंदर जाकर चेयर पर बैठ गया।

    अद्विका इस वक्त आराम से बेड से टेक लगाए बैठी थी। इस वक्त, उसने अपना फोन ले रखा था और उसमें पता नहीं कौनसी लैंग्वेज में बात कर रही थी। सर्वज्ञ को उसकी लैंग्वेज समझ नहीं है इसलिए वह शांति से बैठा उसके चेहरे पर आते-जाते भाव को देखता रहा।

    फिर मन में सोचा शायद अपने किसी क्लाइंट से बात कर रही है।

    कुछ देर बाद जैसे अद्विका ने कॉल कट किया वह खुद को बोलने से नहीं रोक पाया, "आर यू ओके?"

    जिसका जवाब अद्विका ने खामोशी से सिर हिलाकर ही दिया। इसके बाद उसके पास बोलने के लिए कुछ था ही नहीं, इसलिए वह सिर्फ इतना कह कर उठ गया "मैं डिस्चार्ज पेपर्स रेडी करवाता हूं।" इसके बाद सर्वज्ञ इमरजेंसी वार्ड से बाहर निकल गया और अद्विका उसकी जाती हुई पीठ को पीछे से देखती रह गई।

    इधर सिंघानिया पैलेस में,

    महेंद्र जी परेशानी से इधर से उधर चक्कर काट रहे थे। पहले तो उन्होंने अपने रूम का दरवाजा अच्छे से लॉक किया फिर खिड़कियों को लॉक कर उन पर पर्दे डाल दिए और घबराकर किसी को कॉल लगाने लगे।

    "दिग्विजय, अद्विका को आज फिर पैनिक अटैक आया। कुछ समझ नहीं आ रहा है यह सब कब तक चलेगा। पता नहीं कब तक मेरी बच्ची अपनी खुशियों के लिए लड़ती रहेगी और सर्वज्ञ... उसे सब पता चल गया और अब वह सबकुछ जानना चाहता है।"

    "लेकिन तुम उसे सब बताओगे ही क्यों?"

    "तुम और मैं अच्छी तरीके से जानते हैं, अद्विका की जिंदगी इस वक्त खतरे में और वह सिर्फ और सिर्फ सर्वज्ञ के पास ही सुरक्षित है। ऐसे में सच न बताने पर उसने मेरी बच्ची का हाथ थामने से मना कर दिया तो। वो फिर अकेली हो जाएगी दिग्विजय।"

    "तो फिर उसे सच बता दो। वैसे भी सर्वज्ञ बहुत शातिर है जब तक वह बात की जड़ तक नहीं चला जाता तब तक पीछे नहीं हटता है। अगर उसे अतीत में घटा सब पता रहेगा तो उसके लिए अद्विका को संभालना आसान होगा और जब उसको अपनी बच्ची सौंप ही रहे हो तो झूठ की नींव पर रिश्ते नहीं बनते हैं महेन्द्र और जिस दिन उसे सच कहीं और से पता चला तो वो अद्विका को यहां से दूर ले जायेगा और शायद तुमसे भी दूर और फिर तुम तो जानते हो ना कि अद्विका और सर्वज्ञ का रिश्ता क्या है?"

    "जानता हूं तभी तो उसके सामने सच नहीं आने देना चाहता।"

    "तो फिर ऐसा करो कि उसे उतना ही बताओ जितना जरूरी हो और जिससे वह हमेशा के लिए शांत भी हो जाये।"

    "ठीक है।"

    फोन कट होते ही दिग्विजय खुद से बोला, "वक्त फिर खुद को दोहरा रहा है और यह दुनिया अनजान है। फिर खून की होली होगी लेकिन इस बार मौत का बदला मौत और खून का बदला खून होगा। कोई नहीं बचेगा, जब इंसाफ ईश्वर का होगा। बस यह कहानी जल्द ही शुरू हो, सर्वज्ञ और अद्विका का साथ ही इस बदले की कहानी को अंजाम तक पहुचायेगा और जल्द ही अतीत का हर पर्दा उजागर होगा।

    बस ईश्वर उन दोनों को सब सहने की शक्ति दे।"

    जारी हैं......

  • 14. तेरे जाने का ग़म - Chapter 14सर्वज्ञ की गोद में अद्विका

    Words: 1275

    Estimated Reading Time: 8 min

    हाॅस्पीटल के बाहर,

    सर्वज्ञ, अद्विका को गोद में उठाये चल रहा था और अद्विका उसे घूर रही थी, "माना कि मैं बहुत हैडसम हूं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दिन दहाड़े तुम इस तरह घूरो। अपने अरमानों को थोडा काबू में रखो, हम इस वक्त पब्लिक पैलेस में खडे हैं।"

    जिस पर अद्विका, उसकी गोद में मचलते हुए, "अच्छा, जो यह गंदी सोच पाल रखी हैं ना, इसे अपनी जेब में रखो और मुझे नीचे उतारों और एक बात मेरे अरमान तो काबू में ही हैं लेकिन तुम्हारे नहीं लग रहे हैं। इस तरह किसी भी लडकी को गोद में उठाकर घूम रहे हो वो भी बिना उसकी मर्जी के।"

    सर्वज्ञ ने एक पल के लिए उसे देखा और फिर मुस्कराते हुए, "अपने शब्दों को सुधारो, किसी भी लड़की नहीं अपनी होने वाली वाइफ को गोद में उठाया हैं मैने और इसे केयर करना कहते हैं जो हर हसबैंड अपनी वाइफ की करता हैं।"

    उसकी बात सुनकर अद्विका लगातार उसकी बाहों में मचलते हुए हाथ पैर चलाने लगती है। वह गुस्से से अपने चेहरे पर फैले बालों को हटाते हुए, "यू...।"

    जिस पर सर्वज्ञ, उसकी आंखों में देखते हुए, "यू नहीं वी और इस तरह ज्यादा मचलती रही ना तो नीचे गिर जाओगी और फिर हड्डी टूट गयी तो मुझे हमेशा के लिए तुमको गोद में उठाकर चलना पडेगा।"

    अद्विका इस पर गुस्से से, "तुम यह सही नहीं कर रहे हो।"

    सर्वज्ञ भी उसी टोन में, "हम्म लेकिन मैं सबकुछ सही ही करता हूं और इस बार सही यही हैं कि तुम कुछ वक्त के लिए शांत रहो और मेरी गोद में चुपचाप बैठी रहो। सब हमे ही देख रहे हैं और यह मेरे को शर्मीदा फील करवा रहा हैं।"

    जिस पर सर्वज्ञ के कुछ शब्द उसे शांत कर जाते हैं, "जिंदगी की इस कहानी में आप हर किसी के लिए हिरो नहीं बन सकती हैं। एक की कहानी में आप नायक हैं तो किसी दूसरे की कहानी में खलनायक जरुर होंगी। इसलिए बेहतर यह हैं कि आप अपनी खुशीयों के बारे में सोचें ना कि किसी और की लाइफ बेहतर बनाने में खुद को ही खो दे।"

    अद्विका की नजरे उसके चेहरे पर टिक जाती हैं उसकी खुबसूरती में खोयी।
    "अद्विका, और अगर आप हर किसी की कहानी में सिर्फ खलनायक हो तो।"

    "हम्म, तो फिर खुद की कहानी में नायक बनने की कोशिश कीजिए। एटलीस्ट आप खुद तो खुश रहेगी। यह दुनिया बहुत अजीब हैं, तुम कुछ अच्छा करोगे तो तुम्हारी तारीफ कर तुम्हारा हौसला कोई नहीं बढायेगा लेकिन तुमसे कुछ गलत हुआ तो हर कोई तुमपर उंगली उठाने से पहले एकबार नहीं सोचेगा। तुम्हारा एक बुरा काम, सौ अच्छे कामों पर भारी पड़ जायेगा। इसलिए बेहतर खुद के बारे में बेहतर सोचे क्योंकि हमारा बुरा सोचने के लिए तो हजारों लोग बैठे हैं।"

    अद्विका अब उसकी बातों को खामोशी से सुन रही थी। वह अब पहले से शांत भी लग रही थी।

    "तुम्हें नहीं लगता कि अभी हमारा रिश्ता जुड़ा नहीं हैं तो तुम इस तरह चिपक नहीं सकते हैं।"

    "मैडम हमारा रिश्ता आप से तुम तक आ चुका हैं वो भी कुछ घंटो में फिर भी तुमको लगता हैं कि रिश्ता जुड़ा नहीं हैं।"

    तब तक वो कार में बैठ चुके थे। अब अद्विका शांत सी थी और खिड़की से बाहर देख रही थी और कुछ ही देर में सर्वज्ञ उसे सिंघानिया हाउस छोड़कर जा चुका था।

    अद्विका बहुत देर तक उस रास्ते को देखती रही और खुद से, "होप सो गोड कि इस बार आपने मेरे किस्मत में कुछ अच्छा लिखा हो।"

    इतना कहकर वह सिंघानिया हाउस में चली गयी और इधर सर्वज्ञ कही और के लिए निकल गया। जाना तो वह सिंघानिया हाउस ही चाहता था लेकिन वह नहीं गया क्योंकि उसके पास महेंद्र जी का मैसेज आया था कि वह उससे दिग्विजय जी के घर पर मिलेगे।

    इधर सिंघानिया हाउस में

    जैसे ही अद्विका ने घर के अंदर कदम रखा वैसे ही सामने कोई पूरी तैयारी के साथ बैठा था - हेमलता, प्रताप और रमेश सिंघानिया।

    हेमलता जी, अपने नाखुन सहलाते हुए, "लगता हैं महारानी साहिबा आ गयी हैं। वैसे इस घर का कब पीछा छोडने वाली हो क्योंकि हमे अब और यहा तुम्हारी शक्ल बर्दाश्त नहीं होती हैं।"

    अद्विका अपना गुस्सा रोके खडी रहती हैं। वो अभी चाहकर भी कुछ नहीं बोल पा रही थी क्योंकि अपने दादू को वादा कर चुकी थी वो शादी तक शांत रहेगी।

    हेमलता जी बड़बड़ाती रहती हैं लेकिन अद्विका उन्हें इग्नोर कर निकल जाती हैं।

    शाम छः बजे

    दिग्विजय के घर का माहौल थोड़ा अजीब सा हो रहा था। सर्वज्ञ सामने बैठा था और दिग्विजय जी के साथ महेन्द्र जी भी बैठे थे लेकिन दूसरी तरफ इस शहर में कुछ अजीब ही घट रहा था।

    एक साया आंधी की तरह सात मंजिला इमारत में भाग रहा था। रूफ टॉप पर किसी का पेंटहाउस था जिसमें पार्टी चल रही थी। सिगार के कशो की धुंआ और महंगी ब्रांडेड शराब की बोतलों से सजा बार कांउटर उस पार्टी को रहिसो की पार्टी का लुक दे रहा था। वही एक आदमी हंसते हुए जिसका नाम राजमणि बुंदेला था। "आज सब जमकर पेग लगाओ, आखिर मेरी बेटी आने वाली हैं आस्ट्रेलिया से अपनी पढ़ाई पूरी कर कर और अब से मैं सोच रहा था कि अपनी कुर्सी किसी को सौप दूं तो क्या कहते हो भाई लोगो।"

    राजमणि बुंदेला, मुम्बई का एक बहुत बड़ा माफिया जिसके तार इंटरनेशनल मार्केट से जुड़े थे। कोई ऐसा काम नहीं था जो उसने नहीं किया। ड्रग्स सप्लाई से लेकर लड़कियों की सप्लाई तक, हर काम किया उसने और सबकुछ अपने लिगल बिजनेस की आड़ में छूपा लिया। पूरे मुम्बई की पाॅलिटिक्स उसके इशारे पर चलती थी और वहां की पुलिस, सिर्फ उसके लिए ही काम करती थी। सिक्योरिटी ऐसी कि कोई परिंदा भी उसके करीब नहीं आ सकता था।

    उसकी वजह से मुम्बई में आतंक बहुत बढ़ गया था और इसका अंजाम वहां की कच्ची बस्ती वाले भुगत रहे थे।

    महफ़िल अपने चरम पर थी कुछ लड़कियां छोटे और रिवीलिंग कपड़ों में नाच रही थी और सभी उनसे चिपकने की कोशिश कर रहे थे।

    वह साया बिल्कुल पेंट हाउस के करीब था। उसके कान में ब्लुटूथ लगा था उसने सिर्फ धीमी सी आवाज में इतना सा कहां, "हैक आॅल दा कैमरास एंड कट दा लाइट।"

    और सामने से बस इतना कहां गया, "ओके।"

    और कुछ पलों में वहां कि लाइट बिल्कुल गुम हो चुकी थी। उसने अपने हाथ में पकडी मैटल की बाॅल एक साइड फैंकी तो गार्ड्स का ध्यान उस तरफ चला गया। अंदर लाइट चले जाने से हंगामा मच चुका था और वह साया, गार्ड्स के वहां से हटने का फायदा उठाकर अंदर चला गया।

    राजमणि बुंदैला की लंका में कोई घुस आया था और उसे तो अहसास तक ना था।

    उस साये ने आंखों पर स्पेशल ग्लासेस पहन रखे थे तो उसे सब साफ दिख रहा था

    वह इस पार्टी में किसी शख्स की तरफ बढ रहा था। उसने अपने हाथ में साइलेंसर लगी गन पकड रखी थी। एक आदमी के सामने आते ही उसने गन से उसके माथे पर शूट किया और कुछ ही पलों में गायब हो गया और कुछ ही पलों में सब नाॅर्मल हो गया लेकिन लाइट आते ही पेग लेकर खड़े राजमणि की चीख निकल गयी।

    जारी हैं ....

  • 15. तेरे जाने का ग़म - Chapter 15

    Words: 1393

    Estimated Reading Time: 9 min

    लाइट आते ही राजमणि जी की चीख निकल गयी । पूरे पार्टी हाॅल में सन्नाटा पसरा था ‌। सभी सदमे में खडे थे ।

    सामने एक शख्स खून से लथपथ पड़ा था । वह आदमी और कोई नहीं राजमणि बुंदेला का खास आदमी शरीन मखीजा था , जिसे उसका दाहिना हाथ भी कह सकते हैं। जिस पर राजमणि आंख बंद करके विश्वास करता था और वह अपनी कुर्सी अब उसे ही सौंपने वाला था लेकिन इस तरह शरीन मखीजा का कत्ल वो भी इतनी हाई सिक्योरिटी के बीच , राजमणि का दिल दहल गया‌ था और वो अंदर तक कांप गया । कुछ ढूंढने के लिए जैसे ही उसने अपने पेंट की जेब में हाथ डाला , उसके हाथ में एक कागज आया । वह उसे फटाफट निकालकर पढ़ने के लिए खोलने लगा और खोलते ही वह लड़खड़ा सा गया , " डेविल इज बैक और साथ ही नीचे चेस के हाथी , वजीर और उनके बीच किंग का साइन बना था और उसे बहुत बेहतरीन तरीके से डिजाइन किया गया था । "

    वह फौरन चिल्लाया , " सिक्योरिटी " उसके इतना कहते ही सारी सिक्योरिटी वहां आ चुकी थी । पार्टी मे आये‌ सभी लोग डर तो नहीं रहे थे क्योंकि यह उनके लिए आम था लेकिन परेशानी से बातचीत जरुर कर रहे थे ।

    सभी सिक्योरिटी गार्ड्स हैरानी से देख रहे थे क्योंकि अंदर चल रही पार्टी में किसी का मर्डर हो गया और उन्हें फील तक ना हुआ ।

    राजमणि जी गुस्से से आकर , सिक्योरिटी हैड के काॅलर को गुस्से से पकड़कर," तुम सब लोग क्या कर रहे थे जब वो अन्दर आया । कोई मेरे ही घर में आकर मेरे ही आदमी को मार गया और तुम सब सो रहे थे क्या ? लगता हैं तुम लोग अब रिलेक्स हो गये हो या फिर अपना काम भूल गये हो कि तुम लोगों पर हर महिने मैं ना जाने कितने करोड़ रुपए खर्च करता हूं । " इस वक्त वह गुस्से से लाल हो रहा था। आंखों में उतरा खुन उसे राक्षस की तरह बना रहा था जो पागल हो गया था इस सोची समझी साजिश से । वह पागलों की तरह चिल्ला रहा था और सिक्योरिटी हेड के साथ सारे सिक्योरिटी गार्ड्स डर से कांप रहे थे । उनके चेहरे पर पसीना टपक रहा था लेकिन इन सब में कुछ अजीब सा हुआ । वह सब पर चिल्ला रहा था ।‌तभी पैंट हाउस के दरवाजे पर दस्तक हुई ।‌ सभी की नजरे दरवाजे पर टिकी थी कि इस वक्त कौन हो सकता था । राजमणि के इशारे पर एक सर्वेंट जाकर दरवाजा खोलता हैं और इसी के साथ सब हैरान हो जाते हैं और राजमणि तो थुक निगल लेता हैं ।

    इधर दिग्विजय जी के घर पर ही

    महेन्द्र जी‌ पुराने दिनों में खो जाते हैं और सर्वज्ञ को बताने लगते हैं । , आज से लगभग तेईस साल पहले

    मेरा छोटा सा बिजनेस था जो इस वक्त कुछ सही नहीं चलता था । मेरे दो बेटे थे रमेश और उससे बड़ा गौतम और एक बेटी , हेमलता ।

    हेमलता और रमेश की शादी मेरी मर्जी से हुई लेकिन गौतम ने अपनी पसंद से शादी की थी इसलिए उस वक्त गुस्से से मैंने उसे घर से बाहर निकाल दिया लेकिन बाद में मुझे अफसोस भी होता था लेकिन अब तीर कमान से निकल चुका था और उस बात को पांच साल निकल गये थे । मैं हर वक्त बिजनेस के साथ अपने बच्चे की टेंशन में भी रहता था । गौतम मेरा बड़ा बेटा था और मेरी पहली पत्नी का बच्चा लेकिन गौतम को जन्म देते वक्त वो चल बसी और उसके बाद मैंने सभी के कहने पर गौतम के लिए दूसरी शादी की , उस वक्त जया के खुदके दो छोटे बच्चे थे , रमेश और हेमलता। शादी के वक्त हमने वादा किया था कि अब कोई दूसरा बच्चा नहीं करेगे और तीनों को एक साथ मां और बाप का प्यार देंगे । वक्त निकलता रहा और दस साल बाद जया भी चल बसी ।

    तेईस साल पहले

    गौतम मेरे पास आया था अचानक से ही , उसके साथ‌उसकी पत्नी भी थी । शक्ल सूरत से ही बड़ी मासूम और संस्कारी लग रही थी और जब उसने मेरे पैर छूये तो और भी सुकून मिला कि मैंने इतनी अच्छी बहूं को ठुकराने की गलती की । उसके हाथ में एक रुई के फाहे सी गुड़िया थी और वो भी एक साल के लगभग और साथ ही कुछ प्रोपर्टी पैपर्स थे और साथ ही उसने कुछ पैसे भी दिये मुझे ताकि मैं बिजनेस चला सकूं । वो उस वक्त बहुत परेशान था और उसकी पत्नी भी डरी हुई थी । रमेश उस वक्त अपनी पत्नी के साथ उसके मायके गया था और हेमलता ससुराल में थी इसलिए उन्हें कुछ पता नहीं चला ।

    मैं सारे दिन उस बच्ची के साथ खेलता रहता था और इंतजार करता कि कब गौतम और मेरी बहूं स्नेहा आयेंगे और मैं कब उससे माफी मांगकर , उन्हें घर बुलाऊंगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ और एक महिना निकल गया ।

    फिर मैं ही उनके घर के पते पर पहुंच गया । रात के आठ बजे थे और जैसे ही मैने डोरबेल बजाने के लिए हाथ आगे बढाया , मुझे पास की खुली खिड़की में से गोली की आवाज आयी और मैं फटाफट उस तरफ भागा । जैसे ही अंदर देखा मेरे होश उड गये ।

    अन्दर दस बारह गुंडों के बीच दो लोग खड़े थे और एक के हाथ में गन थी और दूसरी कुर्सी पर राजा की तरह बैठा था पर चेहरे से मक्कारी छलक रही थी ।

    वह आदमी गुस्से से किसी बच्चे के बारे‌ में और प्रोपर्टी के बाररे में पूछ रहा था ज्यादा तो मुझे सुनाई नहीं दिया लेकिन इतना जरूर समझ आ गया कि मेरी गोद में उस वक्त जो बच्ची थी , वह मेरे बेटे की नहीं थी लेकिन उस बच्ची के लिए मेरे‌ बेटे और बहूं ने अपनी जान दे दी । मैं यह भी नहीं जानता था कि वह बच्ची फिर किसकी थी और उसका गौतम से क्या रिश्ता था लेकिन मेरे लिए मेरे बेटे की आखिरी निशानी थी वह , बीना पीछे मुड़े मैं उसे लेकर अपने घर के लिए निकल गया । मैं तो अपने बच्चे को भी मुखाग्नि नहीं दे सका । जिसका दर्द आज‌भी कसक बनकर उठता हैं । मेरे बच्चों को भी यही बताया कि वह गौतम की बेटी हैं और उसकी एक्सीडेंट में मौत हो गयी तो मैं उसे अपने साथ ले आया । जिंदगी पटरी पर चलने लगी थी लेकिन कुछ लोग , उस बच्ची को रात दिन एक करके ढूंढ रहे थे और इसलिए मुझे हमेशा के लिए राजस्थान छोडना पड़ा । आज जो कुछ भी मेरे पास हैं वह मेरी बच्ची अद्विका का‌ही हैं।

    जब अद्विका आठ साल की थी तब उसका एक्सीडेंट हुआ था और इस बात का सदमा उसे इस तरह लगा कि उसे पैनिक अटैक आने लगे । उसका बहुत जगह ट्रिटमेंट करवाया तब कही जाकर वह नाॅर्मल हुई लेकिन उसे अब भी पैनिक अटैक आते हैं इस बारे में मुझे तुमसे पता चला ।

    इतना कहकर महेन्द्र जी चुप हो गये । असल में अद्विका का दर्द इससे कही ज्यादा था लेकिन महेन्द्र जी ने सब कुछ ऊपर से ही बताया था ।

    दिग्विजय जी तो शांति से बैठे थे लेकिन सर्वज्ञ सैटिस्फाइड नहीं लग रहा था ।

    वह कुछ देर की चुप्पी के बाद ," आपको क्या लगता हैं । मुझे आप पर विश्वास होगा । "

    जिस पर महेंद्र जी , " हम्म‌, इतना समझ लो कि जो भी तुम्हें बताया वो सबकुछ सच हैं ‌लेकिन जो नहीं बताया वो इसलिए क्योंकि अद्विका नहीं चाहती हैं । अगर उसे पता चला तो उसका विश्वास तो टूटेगा ही पर उसे लगेगा कि तुम्हारी नज़रों में उसके लिए सिर्फ सिम्पैथी हैं और वो कभी तुम्हारी नज़रों में सिम्पैथी बर्दाश्त नहीं कर सकेगी इसलिए बेहतर होगा कि वो ही‌ तुम्हे सब कुछ ‌बताये ‌। "

    इधर‌ सर्वज्ञ आगे‌‌ कुछ बोल‌पाता तब तक उसके पास एक काॅल आया और वह हैरानी से वाॅट करते‌ हुए उठ खड़ा हुआ और जल्दबाजी में वहां से निकल गया ।

    उसके जाने के बाद , दिग्विजय जी , " तुमने उसे झूठ क्यूं कहां ?‌"

    जिस पर महेंद्र जी ," झूठ कुछ नहीं कहां बस पुरा‌सच नहीं बताया क्योंकि बेहतर होगा कि वह सच सही वक्त पर ही सामने आये । "

    जारी हैं ........
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  • 16. तेरे जाने का ग़म - Chapter 16

    Words: 1802

    Estimated Reading Time: 11 min

    आगे

    राजमणि के पेंटहाउस का गेट‌खुलते ही राजमणि जी ने थुक निगल लिया ।

    सामने पुलिस की वर्दी पहने , सर्वज्ञ राठौड़ खडा था और साथ ही कुछ और पुलिस ऑफिसर्स भी थे । सर्वज्ञ के कहने पर सभी आॅफिसर्स चारों तरफ इन्वेस्टीगेट करने लगे लेकिन राजमणि के हाथ पैर कांपने लगे थे । वह घबराहट से इधर उधर देखने लगा ‌।

    सर्वज्ञ के कहने पर पार्टी में आये सभी लोग एक साइड खडे हो गये थे और एक ऑफिसर उन सभी के नाम और एड्रेस लिख रहा था ।

    इधर सर्वज्ञ राजमणि के सामने खडे होकर अपने वर्दी के पेंट के पाॅकिट में दोनों हाथ डालकर खड़ा हो जाता हैं और बड़ी बारीकी से उसे ही देखने लगता हैं । जिस पर राजमणि तनकर खडे़ होते हुए , " इस तरह क्या घूर रहे हो । "

    जिस पर सर्वज्ञ गुस्से से , " मि. बुंदैला थोड़ी तमीज दिखाइए वरना ऐसा ना हो कि मुझे मजबूरन ऑन ड्यूटी ऑफिसर के साथ बत्तमिजी करने के आरोप में आपको जेल के अंदर डालना पड़े । "

    इस वक्त आग राजमणि बुंदैला की लंका में लगी थी । उसे इस मामले से पुलिस को दूर रखना था वरना बहुत से राज सामने‌आ सकते थे। वह मन में , इस पुलिस वाले को‌ किसने इन्फोर्मेशन दी वो इंसान तो मेरे‌हाथ कुत्ते की मौत मरेगा लेकिन अभी के लिए इससे निपटना होगा ।

    राजमणि अभी भी अपनी सोच में खोया था और उसे इस तरह कुछ सोचते देख सर्वज्ञ को उस पर शक तो हो गया था लेकिन फिलहाल के लिए वह , " मि. बुंदैला किस सोच में खो गये । "

    जिस पर राजमणि अपने होश में आते हुए , " सॉरी इंस्पेक्टर साहब वो मैं कुछ परेशान था बस इसलिए "

    जिस पर सर्वज्ञ चारों तरफ घूमते हुए , " हम्म अब परेशानी वाली बात तो हैं कि आप जैसी हस्ती के घर इतनी सिक्योरिटी के बीच किसी का मर्डर हो गया लेकिन वजह कुछ समझ नहीं आयी । क्या आपको किसी पर शक हैं मि. बुंदैला । "

    सर्वज्ञ के बढ़ते सवाल राजमणि के चेहरे पर घबराहट ला रहे थे लेकिन इतना माहिर तो वह भी था अपने खेल में , तभी तो आज तक कोई उस तक पहुंच नहीं पाया ।

    वह बात घूमाते हुए , " हमारे किसी बिजनेस राइवल का काम होगा और कौन हो सकता हैं ? "

    उसकी बात सुनते हुए सर्वज्ञ अब तक पेंट हाउस के उस आलिशान सोफे पर‌बैठ गया जिस पर सिर्फ राजमणि बैठता टटशल

    ।‌उस सोफे के सामने टेबल पर चेस की बिसात बिछी थी ।

    वहां खड़े सभी लोगों की सांसे अटक गयी कि अब तो सर्वज्ञ को राजमणि से कोई नहीं बचा सकता हैं क्योंकि इस वक्त वह राजमणि की जगह पर बैठा था और राजमणि उन लोगों को भी सौ मौत मारता था जिनके दिमागभर में उसकी जगह लेने भर का ख्याल आता था और सर्वज्ञ तो सीधा सिंहासन पर ही बैठ गया ।

    इधर गुस्सा‌ राजमणि को‌ भी आ रहा था उसकी मुठ्ठी कस चुकी थी वह मन में , " जानता‌‌ हूं कि तुम क्या करने‌ की कोशिश कर रहे हो लेकिन डोंट वरी मैं तुम्हारी चाल में नहीं फंसने वाला । "

    सर्वज्ञ सभी मोहरों को निहारते‌ हुए , " हम्म , मान सकते हैं पर फिर एक सवाल मेरे जहन में आ रहा हैं कि दुश्मन आपका था तो उसे गोली आप पर चलानी चाहिए थी और इस लाश की जगह आपको होना चाहिए था । "

    राजमणि गुस्से से चिल्लाते हुए ," इनफ , बहुत बोल रहे हो इंस्पेक्टर । "

    सर्वज्ञ सामने रखे चेस पर एक चाल चला देता हैं । अब वजीर और हाथी के बीच क्वीन तीनों एक साथ बराबर थे ।

    सर्वज्ञ मुस्कराते हुए , " मैंने अपना किंग बचा लिया पर अफसोस‌ आपका राजा तो मेरी एक चाल‌ में ‌चल बसा एनीवे इतना कहकर वह खड़ा होते हुए " मुझे आपको बार-बार याद दिलाने की जरूरत नहीं है मिस्टर बुंदैला , मैं यहां पर सिर्फ अपने काम के लिए हूं तो प्लीज मेरे काम में दखलंदाजी देने से बेहतर है आप कोपरेट करिए वरना आप तो जानते‌ही हैं मैं कितना अच्छा इंसान हूं । "

    इधर सभी लोग हैरानी‌से मुंह फांडकर सर्वज्ञ को ही देख रहे थे । सामने जो चेस की बिसात बिछी थी । वह राजमणि ने आज से 10 साल पहले से बिछायी थी जिसको आज तक कोई नहीं काट पाया और यहां सर्वज्ञ ने वही बिसात एक चाल‌‌ में ही ढहा दी ।

    आगे राजमणि और सर्वज्ञ के बीच कोई बात होती है उससे पहले एक ऑफिसर सर्वज्ञ के पास आकर ," सर हमने सारे खिड़की दरवाजे सब कुछ चेक कर लिया यहां तक की सीसीटीवी भी और उसमें कुछ भी नहीं मिला , जिस वक्त यह मर्डर हुआ उस वक्त की इस पूरे बिल्डिंग की सीसीटीवी फुटेज ही गायब हैं । मर्डर करने वाला सिर्फ सामने के मैन गेट‌ से‌ ही आ सकता हैं लेकिन इतनी हाई सिक्योरिटी के बीच आना इंपॉसिबल लगता है । हो सकता है मर्डर पार्टी में मौजूद किसी आदमी ने किया हो । "

    जिस परसर्वज्ञ ," पांडे साहब , इंपॉसिबल लगता है लेकिन नामुमकिन तो नहीं ना और खूनी यहां खड़े लोगों में से कोई नहीं हो सकता । इतना तो मुझे पता हैं । "

    इतना कहकर वह कुछ पल रुकने के बाद ," फॉरेंसिक रिपोर्ट आई । "

    नो सर उसको आने में अभी भी कुछ वक्त लगेगा ।

    ओके देन तुम हर चीज अच्छे से चेक करवाओ कुछ ना कुछ तो जरूरमिलेगा ।

    इतना कह कर सर्वज्ञ राजमणि के सामने आकर खड़ा हो जाता है ," मिस्टर बुंदेला मैं जानता हूं जिसने भी आपके राइट हैंड मिस्टर शरीन मखीजा का कत्ल किया है । उसका रिलेशन सीधा आपसे हैं । अभी के लिए हम मिस्टर मखीजा की डेड बॉडी लेकर जा रहे हैं । जब तक डिपार्टमेंट किसी नतीजे पर नहीं पहुंचता तब तक बॉडी पुलिस की निगरानी में ही रहेगी। और प्लीज आपसे एक रिक्वेस्ट हैं कि जब तक यह कैस सॉल्व नहीं हो जाता इस पार्टी में मौजूद एक भी आदमी शहर से बाहर नहीं जाना चाहिए वरना कार्यवाही आप पर भी हो सकती है । " इतना इतना कह कर सर्वज्ञ सभी ऑफिसर्स के साथ वहां निकल जाता है ।

    सिंघानिया हाउस शाम का वक्त

    अद्विका अभी अभी उठकर हाॅल में आयी थी । इस वक्त वह हाॅल में बैठी , किसी सर्वेंट से‌चाय लाने के लिए बोल रही थी । तभी महेंद्र जी बाहर से आते दिखे , वह परेशानी से , " दादू आप अभी कहां से आ रहे हैं ‌।‌कही बाहर गये थे क्या ? " इस वक्त उसकी जांचती नजरे महेन्द्र जी पर टिकी थी ।

    महेन्द जी हंसते हुए , " नहीं तो बच्चा , मैं और‌ बाहर । तुम्हें लगता‌ हैं कि इस हालत में , मैं बाहर जा सकता हूं । वो मैं बस गार्डन में घूम रहा था थोडी ताजा‌ हवा के लिए । "

    जिस पर अद्विका हां में गर्दन हिलाते हुए ," ओके , मैं बस पूछा था । "

    महेन्द्र जी बात बदलने के लिए उसके पास ही सोफे पर बैठते‌ हुए , " हम्म , वैसे मैं तुम्हारे रुम में ही आने वाला था । कुछ बात करनी थी । "

    "दादू, सब ठीक है ना?" अद्विका ने हल्की-सी मुस्कान के साथ पूछा।

    महेन्द्र जी ने उसके हाथ पर हाथ रखते हुए कहा, "हां बच्चा, सब ठीक है… बस तुझसे एक बात करनी थी।"

    अद्विका ने थोड़ा चौंककर कहा,

    "क्या बात है दादू?"

    महेन्द्र जी ने धीरे-धीरे अपनी बात शुरू की , "देख बेटा, तू और सर्वज्ञ तो पहले ही एक-दूसरे से मिल चुके हो… बात भी हुई है… शादी को लेकर। मुझे बस ये जानना था कि तुझे सर्वज्ञ कैसा लगा? तुझें पसंद आया या नहीं? मैं चाहता हूं कि यह फैसला तुम्हारा खुदका हो । " इस वक्त महेंद्र जी की धड़कनें रुकी हुई सी थी कि अगर अद्विका ने मना कर दिया‌ तो पर वाकई उस वक्त उनकी तबीयत खराब थी इसलिए वो चाहते थे‌ कि अद्विका उनके बाद अकेली ना रहे लेकिन अब वो रिलाइज कर रहे थे कि वो इस तरह अपनी पोती पर फैसला नहीं थोप सकते हैं इसलिए इस वक्त उन्होंने यह सवाल कर लिया ।

    अद्विका थोड़ी रुकी , क्योंकि अचानक से इस तरह का सवाल उसने एकसेप्ट नहीं किया था‌।‌ " दादू , आपके अकार्डिग लाइफ पार्टनर कैसा होना चाहिए ? आप अपना एक्सपिरियंस बताइए ना । "

    जिस पर महेंद्र जी थोडा सुकून महसूस करते हुए , " हम्म , अगर हमसफर‌ हमे‌ समझे ,‌हमारा सपोर्ट करे , हमसे प्यार करे लेकिन हमारे गलत फैसलों में ‌हमें डांटे और‌ सही रास्ता दिखाए , हमारी इज्जत करे , हमारी केयर करे , हमारी हर बात सुने और समझे । हमें किसी के सामने डिसरिस्पेक्ट ना करे और सबसे जरुरी हमपर विश्वास करे तो समझो जिंदगी आसानी से खुशियों से भरी गुजरेगी जहां हमें मरने से भी डर लगे कि कहीं इतनी अच्छी जिंदगी हमारे‌हाथ से छूट ना जाये तो समझों वो हमारा लाइफ पार्टनर बनने के काबिल हैं ‌। "

    अद्विका , उनकी‌ बाते ध्यान से सुन रही थी और कुछ सोचने लगी , " रेस्टोरेंट में सर्वज्ञ ने उसकी हर उटपटांग बात बीना उस पर गुस्सा दिखाये सुनी थी और सबसे जरुरी , उसने हाॅस्पीटल में बीना डर के उसे संभाला , यह जानते हुए भी कि वह उसे भी नुकसान पहुंचा सकती थी और उसकी केयर करना । " वो सब वो इस वक्त शिद्दत से‌‌ महसूस कर रही थी ।

    महेन्द जी की बात सुनकर , उसके दिल को सुकून सा मिला था और चेहरे‌ पर कभी कभी दिखने वाली स्माइल उतर आयी ।

    वह खुद से , " लेकिन इतनी जल्दी भरोसा करना । क्या हो अगर सबकुछ एक छलावा‌ हो ? और अगर वो सच में इतना‌अच्छा हुआ तो क्या मुझे खुद को एक चांस देना चाहिए । वैसे भी एक दिन तो शादी करनी ही हैं । "

    अद्विका कुछ सोचकर , "दादू मैं पहले‌ उसे थोड़ा और जानना चाहती हूं फिर बताती हूं । "

    महेंद्र जी ने सुकून की सांस ली।

    "मतलब बेटा, अगर मैं कहूं कि मैं आज रात उसे डिनर पर बुला लूं, ताकि तुम दोनों आराम से एक-दूसरे को थोड़ा और समझ सको… तो तुम तैयार है?"

    अद्विका ने हल्का सिर झुका कर कहा,

    "जी दादू… ठीक है। बुला लीजिए।"

    महेंद्र जी ने खुशी-खुशी उसका माथा चूमा।

    "मेरी बच्ची हमेशा खुश रहे। मैं अभी सर्वज्ञ को फोन कर देता हूं। तुम भी थोड़ा रेडी हो जाना। आराम से डिनर करना, बातें करना। कोई जल्दबाज़ी नहीं। बस अच्छे से एक-दूसरे को जान लो।"

    अद्विका मुस्कुरा दी।

    "जी दादू।"

    इतना कहकर महेंद्र जी उठकर फोन करने चले गए और अद्विका वहीं बैठकर अपने दिल की धड़कनें गिनने लगी । पहली बार कुछ ऐसा हो रहा था उसके साथ कि धड़कने एक लय में धड़क रही थी ।

    जारी हैं ....
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  • 17. तेरे जाने का ग़म - Chapter 17

    Words: 1071

    Estimated Reading Time: 7 min

    आगे .....

    महेन्द्र जी के जाने के बाद , अद्विका के चेहरे पर से स्माइल चली गयी और उसकी धडकने एक लय में धड़क रही थी । वह कुछ सोचते हुए ‌उठकर‌अपने रुम में चली गयी , कुछ देर तक तो वह परेशानी से इधर उधर घूमती रही और फिर किसी को काॅल लगा दिया ।

    काॅल उठाते ही सामने से चहक भरी आवाज आयी , " हैलो ! जानेमन कैसी हो तुम ,‌अभी तक भी सिंगल हो या फिर किसी के साथ चोंच लड़ाने में लगी हो । वैसे इतने दिनों बाद तुझे मेरी याद कैसे आ गयी । "

    उसकी‌बाते सुनकर अद्विका सिर पीटने लगी थी , " रिचा , स्टाॅप दिस नाॅनसेंस । मुझे कुछ जरुरी काम था तुझसे और तुम इस तरह बकवास कर रही हो । "

    बस सामने से रोने की आवाज आने लगी थी भले ही आंसु एक ना टपका हो , वह जोर जोर से ," सुनो , सब लोग सुनो ! यह ज़ालिम अनारकली अपने सलीम पर‌ बडा़ अत्याचार करती‌ हैं ।‌एक तो इतने दिनों बाद काॅल किया और हालचाल भी नहीं पूछा और मैं पूछ रही हूं तो इस‌ तरह जहर उगल रही हैं और मिस अद्विका सिंघानिया , भूलों मत‌‌ कि मैं तुम्हारी इकलौती दोस्त हूं ‌। "

    हां मुझे याद हैं और सब याद हैं । तुमने रटा कर और बैठा कर रखा हैं मेरे माइंड में कि तुम मेरी इकलौती दोस्त हो । वैसे इस वक्त मैं तुम्हारी नौटंकी और नहीं झेल सकती हूं तो प्लीज सिरियस हो जा क्योंकि कुछ सिरियस बात करनी हैं ।

    अद्विका के शांत होते ही , रिचा जासूसी भरी आवाज में , " कैलिफोर्निया में अब किससे पंगा ले लिया तूने देख मैं बहुत ‌गरीब हूं तो इतनी‌ महंगी टिकट लेकर वहां तो बिल्कुल नहीं आ सकती हूं तो प्लीज ‌साॅरी लेकिन तुझे‌ ही निपटना होगा । "

    रिचा , अद्विका के गुस्से का भरपूर इम्तहान ले रही थी और‌अद्विका का गुस्सा फूट पड़ा , " तुम होश में तो हो ना और एक बार नम्बर चेक कर लेना और प्लीज उसके‌ बाद‌ मैसेज भी चैक कर लेना क्योंकि मैं अब और तुम्हें टाॅलरेट नहीं कर सकती । " इतना कहकर उसने‌ गुस्से से फोन‌ बेड पर‌ फेंका और फिर सिर पकड़ कर काउच पर बैठ गयी ‌। वह गुस्से से खुदमें ही बड़बड़ाने लगी थी , " यह सारे बेवकूफ मुझे ही मिलने थे । इधर फैमिली के तमाशे खत्म नहीं होते और भगवान ने दोस्त भी ऐसी दी । ओह गॉड ! एक दिन इन्हीं सब लोगों में फंस कर रह जाउंगी और ऊपर से वो मि. सर्वज्ञ , चिपक तो ऐसे रहा था जैसे शादी हो गयी हैं ऊपर खुदकी इतनी तारीफ कौन‌करता हैं ? हैंडसम माय फूट और मुझे खुद पर काबू नहीं और पब्लिक पैलेस में , मैं उसे ....छी "

    उसे खुद नहीं पता था कि वो‌ क्या क्या बोले जा रही थी ।‌बस अपने में ही थी ।

    इधर काॅल‌कट होते ही जैसे ही रिचा ने नम्बर देख वो कूद ही पड़ी , " ओ तेरी ! यह तो इंडिया का नम्बर में मतलब वो शाणी इंडिया आ गयी पर एक मीनट , उसने तो मुझे बताया नहीं कि वो इंडिया आ गयी पर‌‌ इसने मैसेज क्या किया हैं। "

    यह सोचकर वह मैसेज ओपन करने लगती हैं , " कल सुबह मुझसे पीआर कैफे में मिलों कुछ अर्जेंट बात करनी हैं । "

    इसको क्या अर्जेंट काम होगा , खैर यह तो मिल कर पता चलेगा । इतना सोचते हुए वह खुशी से उछल कूद करने लगी कि उसकी बेस्ट फ्रेंड अब इंडिया आ गयी हैं ।

    शाम का वक्त , शांति निवास

    एक छोटा , माॅर्डन और सुंदर सा घर जहां सर्वज्ञ तैयार होकर हाॅल में बैठा रिहाना के बाल बना रहा था।

    और रिहाना बैठे बैठे बस बोर हो रही थी । वह दुःख भरी आवाज में , " भाई , इतने बड़े बाल रखना जरुरी हैं ‌क्या ? इन्हें ‌कटा नहीं सकते हैं ‌। "

    सर्वज्ञ चिढ़ते हुए ," बाल नहीं कट सकते हैं बस , आगे से मत बोलना और बाल तो हमेशा मैं बनाता हूं तो आपको परेशानी क्या हैं । लो बस हो ही गया‌। " वह रिहाना के बाल बना चुका था ।

    जिस पर रिहाना खड़े होकर कमर पर हाथ रखे उसे ही घूरने लगती हैं जिससे सर्वज्ञ थूक निगलते हुए , " वाॅट "

    साइड में खड़ी सरला मुंह दबाये हंस रही थी ।

    रिहाना कमर पर हाथ रखे , " हम्म , देखीए अब तो ये भी हंस रही हैं और चोटी देखिए आपने बनाई हैं जो ..." इतना कहकर वह सर्वज्ञ को दिखाने लगती हैं ।

    रिहाना का इस वक्त मुंह बना‌ हुआ था और सर्वज्ञ ने उसकी दो चोटियां बनायी थी जिसमें एक तो बहुत टाइट और एक ढिली सी थी जिसमें भी एक में बहुत ज्यादा बाल थे और एक में कम और वो इस वक्त पूरी जोकर लग रही थी । जिस पर सर्वज्ञ को भी हंसी आ गयी । जिस पर रिहाना चिढ़ते हुए , " भाईसा..... "

    "हम्म ,ओके ! नहीं ‌हंस रहा पर अगर तुम्हें प्राॅबल्म हैं तो‌ मैं अकेले जाता हूं " इतना‌ कहकर सर्वज्ञ शांत हो जाता‌ हैं।

    जिस पर रिहाना पास में रखे सोफे पर से स्कार्फ लेकर उसे सिर पर‌ बांधते‌ हुए , " नेवर ! भाभीसा से तो मैं , मिलकर रहूंगी।‌"

    एक घंटे बाद

    सिंघानिया निवास में

    दाई मां जिन्होंने अद्विका को बचपन‌ से पाला था । वह सर्वज्ञ और रिहाना‌ की आरती उतार रही थी जो इस वक्त दरवाजे‌पर खड़े थे । रिहाना के सिर पर स्कार्फ लगा था जिसे सब असमंजस में देख रहे थे और रिहाना घर के अन्दर देखते‌ हुए अपनी भाभीसा को ढूंढने की कोशिश कर रही थी ।

    दाई मां आरती खत्म‌कर उनको टिका लगाती हैं और फिर आशीर्वाद देते हुए , " अब आप अंदर आ सकते हैं जमाई राजा । "

    जिस पर सर्वज्ञ उनके पैर छूते‌ हुए ," आप मुझे बेटा कहेगी तो और‌ भी अच्छा लगेगा । "

    उसकी देखादेखी में रिहाना भी उनके पैर छूती हैं जिस पर दाई मां उसे भी आशीर्वाद देते‌ हुए साइड में हट जाती हैं ।

    सभी आपस में बात करने लगे थे ।

    तभी सीढ़ियों पर खड़ी अद्विका की जोरदार चीख निकली । सभी हैरानी से उधर देखने लग गये और डर के मारे सर्वज्ञ की सांसे अटक गयी । वो घबराहट में एक जगह जम सा गया ।

    जारी हैं........
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  • 18. तेरे जाने का ग़म - Chapter 18

    Words: 1580

    Estimated Reading Time: 10 min

    सभी लोग आपस में बात कर रहे थे । किसी का भी ध्यान नहीं था‌कि अपने‌हाथ में डाॅल‌ पकडे़ रिहाना अंदर हाॅल की तरफ बढ़ गयी थी ।

    अद्विका सीढ़ियों से नीचे उतर रही थी । इस वक्त उसने‌ फ्लोरल प्रिंट का सुन्दर सा लांग सूट पहन रखा था । कंधे तक आते बाल , उसे खुबसूरत लुक दे रहे थे । जैसे ही उसका ध्यान सामने की तरफ गया , उसकी सांसे अटक सी गयी । वह चीखना चाहती थी लेकिन आवाज गले‌ में ही अटक गयी । वह जल्दबाजी में सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी । अन्त में आखिरी सीढ़ी उतरते हुए उसकी एक जोरदार चीख निकली , " हटो ! वहां से हटो "

    उसकी चीख सुनकर सबका ध्यान भी उसकी तरफ चला गया । अद्विका हाॅल के जिस साइड दौड़ रही थी । उस साइड जैसे ही सबका ध्यान गया उन सब की भी सांसे अटक गयी । सर्वज्ञ तो सदमे से अपनी जगह ही जम सा गया ।

    अद्विका का ध्यान उस छोटी सी बच्ची की तरफ ही था और साथ ही उसकी नजर ऊपर हिलते झूमर की तरफ था जिसकी रस्सी बस टूटने ही वाली थी । वह बार बार उसे वहां से हटने के लिए कह रही थी लेकिन रिहाना का ध्यान तो उनसबकी तरफ था ही नहीं ,

    अद्विका की सांसे फूल चुकी थी लेकिन वो हार नहीं मानना चाहती थी ।‌

    सभी लोग भी हाॅल की तरफ ही दौड़ रहे थे । एकदम से ऊपर हाॅल में लटका झूमर टूटकर नीचे गिर गया और छन्न की आवाज गूंज उठी ।

    सर्वज्ञ की एकदम से चीख निकल गयी और वह वही गिर पड़ा ।

    इधर अद्विका , रिहाना को लेकर साइड में हट गयी थी लेकिन इनसब में एक कांच उसके हाथ में चुभ गया । दर्द‌से उसने आंखें बंद कर ली लेकिन उसके दिल में एक सुकून सा था ।

    उसकी आंखें अभी भी बंद थी और रिहाना को वह अपनी बांहों में कसके सिमेटकर बैठी थी । रिहाना डर के मारे रोने लगी थी ।

    जैसे ही सभी को फील हुआ वो लोग वही उनके पास आने लगे । सर्वज्ञ ने जैसे ही सामने रिहाना और अद्विका को सही सलामत देखा उसकी सांस में सांस आ गयी और गहरी सांस छोड़ते हुए वह खुद से , आज तुमने , मुझे अपना कर्जदार बना दिया ।

    इधर अद्विका , रिहाना को संभालने की कोशिश‌कर रही थी । वह अपनी आवाज‌ में नर्मी लिये , " डोंट क्राई बेबी , आप बिल्कुल ठीक हैं । "

    इतना कहकर वह‌ उसके सिर पर बंधे स्कार्फ को‌ खोलने की कोशिश करती हैं लेकिन रोती हुई रिहाना स्कार्फ को कसकर पकड लेती हैं और ना में गर्दन हिलाने लगती हैं । रोने और डर से उसका पूरा चेहरा लाल हो गया था और आंखों में डला काजल पूरे चेहरे पर फैल गया था ‌ । सभी लोग वहां खड़े होकर खामोशी से उन्हें देख रहे थे और सर्वज्ञ , उसकी आंखों में आंसु झिलमिला रहे थे जिन्हें बड़ी मुश्किल से रोक कर रखा था उसने ।

    अद्विका अब भी घुटनों के बल फर्श पर बैठी थी। उसकी गोद में सहमी हुई रिहाना थी। छोटे-छोटे हाथों से उसने अपने स्कार्फ को इतना कसकर पकड़ रखा था, जैसे वो उसका आखिरी सहारा हो। अद्विका का खून सना हाथ कांपते हुए उसकी पीठ सहला रहा था।

    उसकी सांसें बेतरतीब थीं, आंखों से आंसू निकल कर गालों तक पहुंच चुके थे। पर वो मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी, बस उस मासूम सी बच्ची को थोड़ा सुकून देने के लिए लेकिन उसका दिल यही सोचकर डरा हुआ था कि अगर वह वक्त पर उसे लेकर साइड नहीं हटती तो क्या होता ?

    “श्श्श… बेबी… डोंट क्राई… मैं हूं ना… देखो, सब ठीक है। कुछ नहीं हुआ मेरी जान… कोई नहीं डांटेगा… मैं हूं ना तुम्हारे साथ…” उसकी खुदकी आवाज़ हल्की कांप रही थी ।

    रिहाना की छोटी-छोटी उंगलियां अब भी स्कार्फ पकड़े थीं। अद्विका ने धीरे से उसे हटाने की कोशिश की।

    “चलो… ये निकाल दें? कुछ नहीं हुआ… देखो तो ज़रा…”

    लेकिन बच्ची ने डर के मारे स्कार्फ और कस लिया। अद्विका ने मुस्कुराकर उसकी पीठ थपथपाई और उसे सिने से लगा लिया ।

    “ठीक है बेबी… जैसे आपकी मर्जी। जब मन करेगा, तब निकालेंगे… ओके?”

    इतना कहते हुए जैसे ही उसकी नजर सामने गयी तो उसे सर्वज्ञ घूटनो के बल बैठा दिखा ,जिसकी आंखों में आंसु थे । उसके होठ , अद्विका की नजरे खुद पर देख बुदबुदा उठे लेकिन अद्विका बहुत दूर होने के कारण सुन ही नहीं पाई ।

    “अद्विका… थैंक यू… अगर आज तुम न होती तो… मैं… मैं शायद…”

    सर्वज्ञ की आंखों में आंसु देख अद्विकि हैरानी से अपने हाथ से पहले उसकी तरफ इशारा कर रिहाना कि तरफ करने लगी । जिस पर सर्वज्ञ ने हा में गर्दन हिलाते हुए सिर झुका लिया । बस फिर क्या था अद्विका की आंखे हैरानी से फैल गयी कि वह छोटी बच्ची सर्वज्ञ की बहन थी जो उसके लिए उसका सबकुछ थी और अगर‌ आज ..... वह खुद डर से कांपने लगी लेकिन सर्वज्ञ के दूर से ही ना में गर्दन हिलाने और रिहाना‌ की तरफ ईशारा करने पर उसने बमुश्किल अपना सिर हिलाया और रिहाना को और जोर से कस कर अपने अंदर समेट लिया ।‌

    रिहाना ने अपनी बड़ी-बड़ी नम आंखें ऊपर उठाईं। उनमें अब भी डर था… पर अद्विका की आंखों में जो अपनापन, जो ममता थी, उसने उसके डर को थोड़ा कम कर दिया।

    अद्विका ने झट से उसके आंसू पोंछे।

    “बस… ऐसे ही… मेरी बहादुर गुड़िया। अब प्रॉमिस करो… कभी भी आप इस तरह रोकर हम सब को डरायेगी नहीं ?”

    उसने अपनी उंगली आगे बढ़ाई। रिहाना ने कांपते हुए अपनी छोटी उंगली उससे मिला दी।

    अद्विका मुस्कुरा दी। उसकी आंखें भीग गईं।

    “शाबाश मेरी जान… अब आपके भ‌ईया के पास चले ?” जिस पर रिहाना अपने आंसु पोंछते हुए हां में गर्दन‌ हिला देती हैं।

    जिस पर अद्विका उसके कान में फुसफुसाते हुए , " वैसे आज यहां क्यों आयी हैं आप ? "

    इस वक्त अद्विका की आंखों और बातों में नर्मी थी जिससे रिहाना का डर कुछ हद तक कम हो गया था । इसलिए उसने अद्विका के गले‌ में बांहे डालते हुए उसी तरह फुसफुसाते हुए," यहां तो मैं और भाईसा , भाभीसा से मिलने आये हैं । "

    जिस पर अद्विका , उसके कान में फुसफुसाते हुए," वैसे , मेरे पास आपके लिए एक टाॅप सीक्रेट हैं ।"

    जिस पर रिहाना सिर हिलाते हुए , " क्या?" उसकी मासुमियत ‌पर अद्विका को बड़ा ‌प्यार आ रहा था । इसलिए वह उसका‌‌ सिर चूमते हुए ," यही कि मैं ही आपकी भाभी सा हूं। "

    जिस पर रिहाना खुशी‌ से उसकी गोद में उछलते‌ हुए ," सच्ची "

    अद्विका अपनी नाक को‌उसकी नाक से टकराते हुए , " मुच्ची "‌पर मेरी एक शर्त हैं । तुम , मुझे भाभी सा नहीं मामा कहोगी तो बोलों, मंजूर।

    जिसपर रिहाना अपनी दो अंगुलियों को क्राॅस करते हुए , डिल डन ।

    अद्विका ने उसे कसकर अपनी गोद में भींच लिया। अंदर कहीं एक अजीब सा सुकून था… जैसे दिल का एक कोना उस मासूम बच्ची के लिए धड़कने लगा हो।

    ‌सभी लोग उन्हें इसतरह देख जलन से अजीब मुंह बना रहे थे लेकिन दाई मां, दादू बहुत ‌खुश दिख रहे थे ।

    सर्वज्ञ पीछे खड़ा ये सब देख रहा था। उसकी आंखें भी भीग चुकी थीं।

    “आज तुमने… मुझे अपने दोनों सबसे किमती शख्स लौटा दिये , अद्विका… मैं कभी नहीं भूलूंगा ये,” उसने हल्की सांस छोड़ते हुए खुद से कहा।

    अद्विका ने रिहाना के माथे पर हल्की सी किस की और फुसफुसाई,

    “तुम्हें कुछ हो जाता न, तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाती। अब मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगी… कभी भी नहीं।”

    इधर अंधेरे से भरी रात में,

    एक जगह जहां बहुत धूल मिट्टी हो रखी थी वहां कुर्सी पर बैठा एक आदमी किसी से बात कर रहा था ।

    बाॅस आगे क्या करना हैं ?

    तुम्हें किसी तरह राजमणि के मन में यह शक डालना हैं कि यह कत्ल , उसके ही खास आदमी रजत खन्ना ने करवाया हैं ।

    ओके बाॅस लेकिन पुलिस का क्या करना हैं ?

    पुलिस का क्या‌ करना हैं ‌? वो देखने‌के लिए मैं हूं ।‌तुम बस वो‌ करो जो‌ तुमसे कहां ‌गया हैं ‌।

    कुछ वक्त बाद अद्विका , रिहाना को सुलाकर आ गयी थी क्योंकि वह डर और रोने की वजह से थककर उसकी गोद में उस वक्त ही सो गयी थी । उसने अपना हुलिया भी सुधार लिया था ।

    बाहर सब लोग सर्वज्ञ के पास बैठे , उसे शांत करवा रहे थे और अब वह भी काफी हद तक संभल गया था ।

    अद्विका ने हाॅल में आते ही गुस्से से एक चेयर उठा‌कर फैंकी ‌और गुस्से से चिल्लाते हुए , " दाईं मां ‌, सभी सर्वेंट्स को फटाफट यहां बुलवाओ । पहले‌‌ मुझे उन लोगों से बात करनी हैं । "

    हर कोई कांप रहा था । यहां तक कि रमेश , हमेलता और उनके बच्चे भी क्योंकि अद्विका के गुस्से को वो‌भी‌बहुत अच्छे से जानते थे ।

    हेमलता जी अपने डर को काबू में लाते‌‌ हुए , " ए लडकी ! हमे अपने घर में तुम्हारा यह फालतु तमाशा बर्दाश्त नहीं करेंगे। "

    अद्विका ने गुस्से से अपनी‌ आंखे बंद करके खोली तो उसकी लाल आंखें उनको डराने के लिए काफी थी । वह गरजती हुई बोली " प्लीज , आप चुप रहेगी । वैसे अगला नम्बर आपका ही हैं तो अपनी जुबां फिर चलाइए वो भी अपने पक्ष में दलील रखने के लिए "

    जारी हैं .....

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  • 19. तेरे जाने का ग़म - Chapter 19

    Words: 1015

    Estimated Reading Time: 7 min

    आगे

    अद्विका गुस्से से लाल आंखे लिये सभी नौकरों को घूर रही थी । वह गुस्से से , " क्या आप सब लोग बता सकते हैं कि इतना सब होने की वजह क्या हैं ? अभी रेनोवेशन में करोड़ों रुपए खर्च हुए हैं ना फिर इस तरह की लापरवाही , अगर अभी कुछ हो जाता‌ तो ? "

    सभी सर्वेंट इसका जवाब देना चाहते थे लेकिन डर के मारे जवाब देने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे । इसलिए चुपचाप सुन रहे थे ।

    इधर सर्वज्ञ तो चुपचाप खड़ा बस उसकी गुस्से से लाल होती आंखें देख रहा था । उसने जैसे ही आगे बढ़ने की कोशिश कि दादू ने उसका हाथ पकड़ कर रोक लिया ।

    दादू वो , सर्वज्ञ ने कहने की कोशिश की लेकिन उन्होंने गर्दन हिलाते हुए उसे चुप करवा दिया , दादू - तुम उसके पास मत जाओ सर्वज्ञ । अद्विका का गुस्सा बहुत खराब हैं और वह और भी आउट ओफ कंट्रोल हो जाती हैं जब बात उसके किसी अपने की हो । अभी उसके गुस्से को दबाने की कोशिश करेगे तो वह उसे अंदर ही अंदर खायेगा क्योंकि उसका दर्द भी उसके गुस्से के रुप में ही बाहर निकलता हैं इसलिए उसे बह जाने दो ।

    जिस पर सर्वज्ञ चुप खड़ा रह गया । इधर अद्विका सभी नौकरों की क्लास लगा रही थी और अंत में जब उसका गुस्सा कुछ हल्का पड़ा तो उसने सबको वार्निंग देकर भेज दिया । इधर सबको जाते देख हेमलता जी भी अंदर अपने रुम की तरफ जाने लगी लेकिन अद्विका की गुस्से भरी आवाज गुंजी - आप कहां जा रही हैं ।

    जिस पर हेमलता जी मुडकर, अब क्या अपने रुम में भी तुमसे पूछकर जाना‌ पडे़गा ।

    अद्विका , मैंने यह तो कहां ही नहीं कि आप अपने रुम में नहीं जा सकती हैं ।‌खैर आप हमेशा उल्टा ही समझती हैं पर जाने से पहले मुझे अपने कुछ सवालों के जवाब चाहिए ।

    जिस पर हेमलता जी के साथ सबकी निगाहें अद्विका पर टिकी थी ।

    अद्विका ने अपने कुर्ते की बांहे चढ़ाई और फिर , मेंशन के रेनोवेशन के लिए आपने दादू से पचास करोड़ रुपए लिये थे तो मुझे जानना हैं कि आपने वो पैसे कहां खर्च किये क्योंकि मुझे कुछ भी रेनोवेट नहीं लग रहा हैं ।

    हेमलता जी , ऐ लड़की ! तुम ज्यादा बोल रही हो और हो कौन तुम जिसे में जवाब दूं ।

    और यह काफी था उसके गुस्से को बढाने के लिए , वह ताली बजाते हुए हंसने लगी और , बढ़िया बहुत बढ़िया ‌। आपने मुझे बेवकूफ समझ रखा हैं या फिर अपना गुलाम तो आप गलतफहमी में जी रही हैं मिसेज हेमलता प्रताप । इतना कहते हुए उसने गुस्से से चेयर उठाकर हाॅल के बीचोंबीच फेंक दि ।

    वह गुस्से से, आप जानना चाहती हैं ना कि मैं कौन हूं तो आई एम अद्विका सिंघानिया , दा वन एंड ओनली ओनर ऑफ दा सिंघानिया इंडस्ट्री और आप सिर्फ मेरे टुकड़ों पर पल रही‌‌ हैं तो अपनी काली जुबान थोड़ा काबू में रखिए । वो‌ क्या हैं ना मुझे आपकी जुबान खिंचने में वक्त नहीं लगेगा । आपने लालच की वजह से मेंशन का एक भी झूमर चेंज नहीं करवाया बस उनकी ऊपर से पाॅलिश करवादी । आज आपकी लापरवाही और लालच किसी की जान ले लेता लेकिन फिर भी रिग्रेट फील करने की बजाय सीना ताने खड़ी हैं सच में बडी ही लालची किस्म की औरत हैं आप , अरे इंसान दो घर छोड़कर डाका डालता हैं लेकिन आप तो अपने ही घर‌ में साजिशे रचने लगी हैं । इतनी नफरत लाती कहां ‌से आप अपने ही परिवार के लिए । यह आपके लिए आखिरी वार्निंग हैं वरना अगली बार

    इतना‌ कहकर वह‌ गुस्से से अपना‌ हाथ‌ टेबल पर मारकर ऊपर अपने रुम की तरफ चली जाती हैं । पहले ही कांच चुभने से खुन बह रहा था और अब फिर उसी हाथ को टेबल पर मारने से हाथ में खुन का फव्वारा छूट चुका था ।

    तमाशा खत्म होने के बाद सब एक एक कर हाॅल से अपने रुम में चले गये सर्वेट्स से अपना डिनर रुम में ही‌ पहुंचाने के लिए कहकर ।

    अब हाॅल‌ में दादू , दाई मां और सर्वज्ञ ही थे । दादू परेशानी से सोफे पर बैठते हुए , आज के दिन इस तरह तमाशा होगा सोचा नहीं था । अंशिका का गुस्सा आज इस तरह फुटेगा कभी सोचा नहीं था । पर उसके दर्द और गुस्से का कारण‌मेरी खुद की औलाद‌ हैं ।

    सर्वज्ञ, अद्विका का गुस्सा शुरु से इतना ही हैं क्या दादू ?

    दादू‌, मेरी‌ बच्ची‌‌ हमेशा से ही सोफ्ट हार्टेड थी ।‌‌गुस्सा‌‌ तो उसे आता ही नहीं था लेकिन मेरी खुदकी औलाद के बेगानेपन के कारण मैने उसे यहां से दूर भेज दिया और जब वहां से लौटी तो एक अलग ही अद्विका थी । जिसका गुस्सा‌हर पल नाक पर चढ़ा रहता हैं । पहले जितनी खामोश आज उतनी ही धारदार हो गयी हैं वो ।‌ आंखों में हर पल एक अलग ही ज्वाला धधकती हैं जैसे सबकुछ जलाकर राख कर देगी पर शुरु से ही उसे किसी से मतलब नहीं रहा । इतना कन्सर्न‌तो उसने कभी मेरे लिए भी नहीं दिखाया , जितना रिहाना के लिए उसकी आंखों में देखा आज ।

    जिस पर दाई मां , शायद यह इसलिए क्योंकि वह , रिहाना‌ में खुदकी छवि देख रही थी या उसमें खुद को ढूंढने की कोशिश‌ कर रही थी । आज जो उसकी नज़रों में था वह स्नेह नहीं ममता थी और ममता अंधी होती हैं बड़े साहब औल वही जुनून था आज अद्विका की नजरों में ।

    जिस पर दादू , शायद‌ तुम ‌ठीक कह रही हो बाईसा ।

    इधर सबकुछ नाॅर्मल‌चल रहा था लेकिन देखते‌ही देखते उस फैक्ट्री में आग की लपटे फैलने लगी जिसमें सबकुछ जलकर राख हो गया ।

    बाॅस , आपका काम‌हो गया अब सिंघानियास को बर्बाद होने‌से कोई नहीं रोक सकता हैं ।

    महेन्द्र सिंघानिया, अपनी उल्टी गिनती शुरु कर ले । तुझे क्या लगा कि भानुमति तुम्हारी जिंदगी से चली‌गयी लेकिन मैं अब वापिस लौट रही हूं मैं , वो भी‌ दूगनी ताकत के साथ

    जारी हैं ‌
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  • 20. तेरे जाने का ग़म - Chapter 20

    Words: 1385

    Estimated Reading Time: 9 min

    आगे ....

    एक अंधेरी जगह पर राजमणि राजा की तरह बैठा था और उसके चारों तरफ सिक्योरिटी गार्ड खडे थे और उसके सामने बैठे थे तीन लोग , खुखांर‌ चेहरा लिये ।

    राजमणि ,राॅय क्या तुम्हें पता लगा की किसने शरीन का मर्डर करवाया । वो जो कोई भी था वो मेरी लंका को भेदते हुए मेरी गर्दन तक पहुंच गया । जब तक उसके टुकड़े-टुकड़े नहीं कर देता तब तक मुझे चैन नहीं आयेगा।

    जिस पर राॅय जो बीच में बैठा था , बाॅस , उस साये ने कोई सुराग नहीं छोड़ा। पूरी बिल्डिंग चैक‌ कर चुके हैं लेकिन वो इंसान आंधी की तरह आया और मखिजा सर को मारकर तुफान की तरह चला गया । पूरी बिल्डिंग के किसी भी सीसीटीवी फुटेज में कुछ भी नहीं मिला । जिस तरह उसने सीसीटीवी कैमरा हैक किये और सारी बिल्डिंग की बिजली गायब करवायी और मखिजा सर का मर्डर कर कुछ ही पल में गायब हुआ , इससे यह तो साफ है कि उसे आपकी पेंट हाउस के बारे में सबकुछ पता था यहां तक किस तरह और कैसे आपकी सिक्योरिटी को भेदना हैं मतलब पेंटहाउस के सिक्योरिटी सिस्टम के बारे में वह सबकुछ जानता था । इतना‌सब जानने के लिए वह आपके पेंटहाउस किसी ना किसी बहाने से जरुर आया होगा । अगर मुझे आपके पेंटहाउस में पिछले दो महिनों में कौन कौन आया था उसकी लिस्ट मिल जाये तो उस आदमी तक पहुंचने में वक्त नहीं लगेगा ।

    राजमणि हंसते हुए - ऐसे ही तीन साल में ही तुम मेरे पसंदीदा नहीं बन गये । बड़ा तेज दिमाग पाया है तुमने ।

    राॅय - बस सब आपकी मेहरबानी हैं ।

    राजमणि - तुम्हें उन लोगों की लिस्ट मिलजाएगी । फिर राॅय की साइड में बैठे दोनों लोगों को देखते हुए , - वैसे यह दोनों कौन हैं ?

    जिस पर राॅय - मखीजा सर आपके खास आदमी थे बाॅस । ऐसे में किसी ने उनका मर्डर किया मतलब उसकी सीधी नजर आप पर हैं । ऐसे में मैं आपको लेकर रिश्क नहीं ले सकता इसीलिए अपने इन दोनों ट्रेंड बॉडीगार्ड्स को आपकी सिक्योरिटी के लिए लेकर आया हूं ताकि मैं बिना चिंता के अपना काम खत्म कर सकूं ।

    जिस पर राजमणि - मेरे बारे में बड़ा सोचते हो । ठीक हैं तुम्हारी टेंशन भी दूर कर देता हूं ।

    जिस पर राॅय , ठीक हैं बाॅस अब मैं चलता हूं ।

    इधर

    दादू , सर्वज्ञ तुम अद्विका के रुम में ही चले जाओ और रिहाना को देख लेना ।

    जिस पर सर्वज्ञ परेशानी से कुछ कहने की कोशिश करता हैं लेकिन फिर बीना कुछ कहे , अंशिका के कमरे की तरफ चला जाता हैं ।

    अंशिका‌ इस वक्त रिहाना का हाथ‌ पकड़े बेड पर बैठी थी और उसका सिर सहलाते हुए एकटक निहार रही थी ।

    अचानक बाहर से गेट नाॅक होने की आवाज‌ आती हैं तो उसका ध्यान उस पर हटकर दरवाजे पर जाता हैं - तुम अंदर आ सकते हो ।

    जिसपर सर्वज्ञ गेट खोलकर अन्दर आते हुए, तुम्हें कैसे पता चला‌ कि मैं हूं ।

    जिस पर अद्विका एक नजर सर्वज्ञ पर डालकर , हम्म दादू मेरे रुम में कभी भी नाॅक करके नहीं आते हैं और दाई मां इस वक्त नहीं आती और किसी को‌ इस रुम में आने की इजाजत नहीं है ऐसे में इस वक्त तुम्हारे अलावा कोई नहीं हो सकता था।

    तब तक सर्वज्ञ बेड के दूसरे साइड बैठ चुका था । वह अद्विका की तरफ देखकर उस रुम को देखने लगा था जो साइज में तो बहुत बड़ा था लेकिन बिल्कुल सिम्पल सा जिसकी बाल्कनी‌ का दरवाजा खुला था और उसमें से ठंडी हवा अंदर आ रही थी जिसमें अद्विका के बाल उड़ रहे थे ।

    सर्वज्ञ उसे ही निहारते हुए , क्या मैंने तुम्हें परेशान तो नहीं किया ?

    नहीं बिल्कुल नहीं और रिहाना तुम्हारी ही बहन हैं तो‌ मुझे कैसी परेशानी‌ होगी ।

    हम्म , आज तुमने मेरे ऊपर बहुत बड़ा अहसान कर दिया ,जिसे मैं शायद ही कभी चुका‌ पाउंगा , सर्वज्ञ ने‌ सिर झुकाते हुए कहां ।

    जिस पर अद्विका‌ , यह अहसान‌ मेरा खुद पर था ना कि तुम पर । रिहाना के पास सिर्फ तुम ‌हो और शायद तुम्हारे पास वो । मुझे बहुत अच्छे से मालुम हैं कि‌ बीना‌ माॅम डैड की जिंदगी कैसी होती हैं और मैं नहीं चाहती रिहाना को कभी ऐसा फील हो । मैं चाहती‌‌ ‌हूं कि अगर वह तुममे अपना डैड देखती‌‌ हैं तो मुझमे अपनी माॅम को देखे क्योंकि जो मैने फेस किया , मैं नहीं चाहती कि वो भी करे । इसलिए यह अहसान तुम‌पर नहीं था ।

    सर्वज्ञ , मतलब तुम शादी के लिए तैयार‌हो ।

    अद्विका , हम्म‌, मैने बहुत सोचा और अब लगता‌ हैं कि जितनी‌ तारीफ रिहाना ने कि उस हिसाब से तुम अच्छे इंसान हो और फिर किसी से तो शादी करनी ही हैं ।

    सर्वज्ञ, मतलब मैं तुम्हारे लिए ‌इस वक्त एक ऑप्शन हूं।

    जिस पर अद्विका - अपनी सोच पर काबू रखों । इतना काफी हैं कि मुझसे बीना मेरी मर्जी के कोई कुछ नहीं करवा सकता‌ हैं।

    सर्वज्ञ, मतलब‌‌ खुदकी‌ मर्जी शामिल‌‌ हैं ।

    अद्विका‌ , अब तक नहीं ‌थी लेकिन ‌रिहाना‌ के लिए हैं ‌क्योकि एक मुलाकात में प्यार होना और फिर शादी तक बेइंतहां प्यार‌ होना‌ , मुझे यह सब फिल्मी‌ससा लगता‌‌ हैं और ना‌ही‌ इनपर विश्वास ‌होता हैं । वैसे भी मैं रिश्तों में ईमानदारी और जिंदगी भर का साथ पसंद करती हूं और‌ मुझे लगता‌‌ हैं कि‌ शायद वो तुम हो या फिर दादू ने तुम्हें मेरे लिए चुना हैं ।

    सर्वज्ञ - और आप , पता हैं पहली नजर में ‌आप‌ मुझे खडूस और बेपरवाह या लापरवाह लगी थी जब पहली बार रेस्टोरेंट में मिले थे । दूसरी बार हाॅस्पीटल में आप मासुम और दर्द से जकड़ी हुई लगी । तीसरी बार जब आपने खुद को खतरे में डालकर रिहाना को‌बचाया तो ऐसा लगा आपका दिल सोने का हैं जिसमें किसी के लिए नफरत नहीं हैं । चौथी बार जब आप रिहाना को‌ संभाल रही थी तो ऐसा लगा कि अगर मैं कभी टूटा और तो आप हर पल मेरा सहारा बनकर खड़ी ‌रहेगी । पांचवी‌बार आप नौकरों को‌डांट रही थी मतलब आप मुझ पर रिहाना‌पर कोई तकलीफ़ नहीं आने देगी और अगली बार जब अपनी बुआ से बहस करते देख लगा आप हमारे लिए ‌किसी से भी लड़ जायेगी । मुझे आप अच्छी लगी मिस अद्विका सिंघानिया क्योंकि आप मेरे लिए परफेक्ट हैं । मुझे नहीं पता यह कैसी फीलिंग हैं क्योंकि पहली नजर के प्यार पर मैं ‌भरोसा नहीं करता हूं पर ऐसा लगने लगा हैं ‌कि‌ तुम मेरी आदत बन रही हो और साथ रहते शायद प्यार‌भी हो जाये लेकिन ‌मेरी तरफ से हमारे रिश्ते में ‌रिस्पेक्ट‌, ट्रस्ट , ओनेस्टी हमेशा रहेगी और मेरी मम्मा‌हमेशा कहती थी कि अगर यह तीन चीजे किसी रिश्ते में हो तो बीना‌प्यार के भी‌साथ निभ जाता‌‌ हैं और जिंदगी खुशहाल ‌भी‌ रहती हैं ।

    जिस पर अद्विका , शायद तुम ‌सही हो पर हर किसी के साथ ऐसा नहीं होता हैं । हालात इंसान को‌ खोखला‌ कर देते हैं । पूरी तरह बदल कर रख देते हैं । दर्द‌ में होता इज़ाफ़ा मौत की तरफ ले जाता हैं । खुद से पहले दूसरे की सहूलियत और खुशी देखनी पडती हैं ।‌इस वक्त अद्विका‌की आंखों में एक गहरा दर्द था जो उसकी जिंदगी के साथ‌‌ बड़ी गहराई ‌से जुडा था ।

    कभी कभी हालात हमारे खिलाफ होते हैं लेकिन ऐसा हर बार तो नहीं हो सकता हैं । अगर आप कोशिश करेगी तो जरुर कदम बढ़ा पायेगी । सब लोग क्या कहेंगे , इससे तुम्हें फर्क नहीं पड़ना चाहिए और जिस दिन रियल में तुमने इस मतलबी दुनिया में सिर्फ अपनी खुशी के बारे में सोचना शुरू किया । तुम खुद को अन्दर से खुश और हल्का फील करोगी और जिस दिन तुमने ऐसा कर लिया । तुम हकीकत में मेरी और सिर्फ मेरी अद्विका सर्वज्ञ राठौड़ जरुर बनोगी क्योंकि मुझे मेरी वाइफ के चेहरे पर हर वक्त सिर्फ स्माइल चाहिए - तो क्या तुम मेरे लिए खुद को हमेशा मजबूत और खुश रखोगी । इतना कहकर , सर्वज्ञ ने बेड पर बैठी अद्विका की मासुमियत भरी आंखों में झांकते हुए , थोड़ा झुककर उसका माथा चूम लिया और इसके साथ ही एक अलग अहसास से अद्विका की आंखें बंद हो गयी और एक मोती सा आंसू उसकी बंद आंख से टपक पड़ा ।

    जारी‌‌ हैं...
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