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Marriage with Beast

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Description

अरुणिमा को लगता था कि उसका होने वाला पति एक नेकदिल इंसान होगा, जो उसके टूटे दिल को संभाल लेगा। लेकिन शादी के बाद जो सच सामने आया, उसने उस की दुनिया हिला दी। जिस इंसान को उसने अपना जीवनसाथी माना, वह दरअसल एक बेरहम माफिया डॉन, आस्तिक रायचंद था। यह शादी...

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Aastik and arunima

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आस्तिक रायचंद

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Total Chapters (174)

Page 1 of 9

  • 1. Marriage with Beast

    Words: 1217

    Estimated Reading Time: 8 min

    मैं अरुणिमा रायचंद और यह मेरी कहानी है। मेरी शादी को एक साल हो चुका था, और मैं किसी की हो चुकी थी। "जब तक मौत हमें अलग न कर दे," मेरी पूरी ज़िंदगी किसी की हो गई थी। अब यही मेरी सच्चाई थी। मैं अब किसी की पत्नी थी। यह मेरा धर्म था, जिसे मुझे निभाना था। लेकिन क्या मैं खुश थी? नहीं, मैं खुश नहीं थी। मेरे पास और कोई रास्ता भी नहीं था। मेरे माता-पिता यही चाहते थे कि देव और मैं अलग हो जाएँ, और हम दोनों एक होने से पहले ही एक-दूसरे से बिछड़ गए थे। मैं भले ही देव से दूर हो गई थी, लेकिन मेरा दिल कभी भी उससे दूर नहीं हुआ था। आपको लगेगा कि मैं पागल हो गई हूँ, लेकिन मेरा दिल कभी देव से दूर नहीं गया। हालाँकि मुझे पता था कि उसने कभी भी मेरे लिए कोई भावना महसूस नहीं की थी। वह अपनी पत्नी मीरा और बच्चों के साथ खुशी-खुशी शादीशुदा ज़िंदगी जी रहा था। मैंने यह भी सुना था कि उनके परिवार में सिर्फ़ इन दो सालों में दो और बच्चे हो गए थे। मैं उसके लिए खुश थी, लेकिन मेरा दिल भी टूटता था कि देव मेरा नहीं हो सका। आप सबको पता है कि मैं देव से प्यार क्यों करती हूँ? क्योंकि वह प्यार करना जानता था। वह जानता था कि प्यार का क्या मतलब होता है और इसे कैसे निभाना चाहिए। पर अफ़सोस, उसकी भावनाएँ मेरे लिए नहीं थीं। एक साल देव से दूरी और एक साल की शादी। दो साल बीत चुके थे। लेकिन मैं किसी और से प्यार कर ही नहीं सकी। मेरा दिल आज भी उसी के लिए धड़कता है। हालाँकि मैं जानती हूँ कि मैं बेवकूफ़ी कर रही हूँ। वह एक शादीशुदा इंसान है, और मेरी भी शादी हो चुकी है। ऐसे में उसके बारे में सोचना भी मेरे लिए पाप है। वैसे, मेरी शादी मेरी मर्ज़ी से नहीं हुई थी। पर मेरे पास और कोई रास्ता भी नहीं था। अपने परिवार के लिए मैंने इस शादी को स्वीकार ज़रूर कर लिया था, लेकिन देव को अपने दिल से निकाल नहीं पाई थी। यह जानते हुए भी कि वह शादी करके अपनी बीवी के साथ बैंगलुरु में रह रहा है। मैंने आखिरी बार उससे फ़ोन पर बात की और...... खैर, छोड़ो। आगे बात करते हैं... एक रात में ही मेरी पूरी ज़िंदगी बदल गई थी, क्योंकि मैं एक समझौते की शादी में थी। मेरा दिल इस कड़वाहट से भर गया था कि मेरे अपने परिवार ने मुझे एक सौदे की तरह इस्तेमाल किया था। मैं देव के साथ अपनी यादों से उबर भी नहीं पाई थी कि मेरे परिवार ने यह कहा कि उन्होंने मेरी शादी तय कर दी है। मैं उस आदमी को जानती तक नहीं थी, लेकिन उन्होंने कहा कि उस इंसान ने मेरे परिवार के लिए बहुत कुछ किया है और हमारे ऊपर उसके कई एहसान हैं। वैसे, एहसान तो मेरे माता-पिता के भी मुझ पर थे। उन्होंने मुझे अनाथ आश्रम से गोद लिया था। हालाँकि उन्होंने मुझे इस बारे में कभी बताया नहीं था, लेकिन पापा की लाइब्रेरी में एक बार मुझे एडॉप्शन के दस्तावेज़ मिल गए थे। उन्हें पढ़कर ही मुझे पता चला था कि मैं उनकी गोद ली हुई बेटी हूँ। मुझे लगा, अपने परिवार की मर्ज़ी से शादी करके मैं उनके इस एहसान का बदला चुका सकती हूँ। मेरी शादी उनके लिए एक फ़ायदे का सौदा भी थी। मैंने बचपन से ही अपने पिता को अंडरवर्ल्ड और माफ़िया के साथ ताल्लुक रखते हुए देखा था। मेरे पापा का माफ़िया और वहाँ से जुड़े हुए लोगों से अच्छे संबंध थे, ताकि लोग हमारे परिवार पर हमला न कर सकें। इसके अलावा, मेरे पापा का बिज़नेस भी बच रहा था। जिस परिवार में मेरी शादी हुई थी, उनकी सिर्फ़ एक ही इच्छा थी कि उनकी बहू एक सिंपल और साधारण सी लड़की हो, जो ज़्यादा नकली न दिखे और जिसकी ज़्यादा ख्वाहिशें न हों। जाहिर सी बात है, मैं उनकी इस विचार पर खरी उतरी थी। मुझे लगा था कि शादी करके मैं एक नई ज़िंदगी में कदम रखूँगी और अपने गुज़रे हुए कल को भूल जाऊँगी। जैसा कि मेरे परिवार ने बताया था, मेरा होने वाला पति एक अच्छा और नेकदिल इंसान है। उनके इसी भरोसे पर मैंने एक अनजान शख़्स से शादी कर ली। लेकिन शादी के बाद मुझे पता चला कि ये सारी बातें सिर्फ़ बातें ही थीं। एक अच्छा और नेकदिल इंसान तो दूर की बात है, मेरे पति को तो यह भी नहीं पता था कि किसी लड़की के साथ कैसे व्यवहार करना है। जो इंसान लड़कियों के साथ ठीक से पेश नहीं आ सकता, उससे प्यार की उम्मीद करना बेवकूफ़ी थी। मुझे भी एक समय पर लगा था कि मेरा यह कदम मुझे मेरे टूटे हुए दिल से बाहर निकाल देगा, क्योंकि मुझे विश्वास था कि मेरे पति एक दयालु और समझदार इंसान होंगे। लेकिन बाद में मुझे पता चला कि यह सच से बहुत दूर था। मेरे पति न नरम दिल थे, न दयालु, और न ही उन्हें पता था कि प्यार कैसे किया जाता है। मुझे लगा था कि शादी के लिए सहमति देने का मतलब है उन्हें स्वीकार करना। लेकिन धीरे-धीरे समझ आया कि वह एक स्वार्थी और ठंडे दिल का घमंडी इंसान है, जो सत्ता, पैसे और शारीरिक सुख के अलावा और कुछ जानते ही नहीं थे। और इस तरह, मेरा दिल फिर कभी प्यार में न पड़ने के लिए बंद हो गया। मुझे लगता था कि मैं प्यार के लिए बनी ही नहीं थी। मेरे पति ने हमेशा मुझे मेरी महत्व और उनकी ज़िंदगी में मेरी "वैल्यू" के बारे में साफ़ कह दिया था। मैं उनके लिए सिर्फ़ उनके दर्जे को बनाए रखने का सामान हूँ। मतलब मैं उनकी बीवी तो हूँ लेकिन एक शोपीस की तरह। हालाँकि, मेरे पति को प्यार करना नहीं आता था, लेकिन शरीर का इस्तेमाल करना बखूबी आता था। या यूँ कहें कि यह तो उनका शौक था। और उनका यह शौक मुझसे न सही तो किसी और से पूरा ज़रूर होता था। पहली बार दिल टूटने के बाद दोबारा प्यार करने की हिम्मत मुझमें नहीं थी। लेकिन अपने सामने यह सब देखकर मुझे अपनी किस्मत पर अफ़सोस होने लगा। शायद मेरी किस्मत में प्यार था ही नहीं। मैं उन सही लोगों में से थी जिनके लिए "प्यार" जैसा शब्द कभी बना ही नहीं था। मेरे पति ने हमेशा मुझे मेरी महत्ता और उनकी ज़िंदगी में मेरी "वैल्यू" के बारे में बताया। हाँ, उनकी लाइफ़ में मेरी वैल्यू थी, जब वे बहुत ज़्यादा तनाव में रहते थे। ऐसे वक़्त में उन्हें मेरी ज़रूरत पड़ती थी। मैं उनके लिए सिर्फ़ उनका तनाव दूर करने का ज़रिया थी। यही थी मेरी सच्चाई और मेरी शादीशुदा ज़िंदगी का कड़वा सच। एक साल में मुझे इन सबकी आदत भी हो गई थी। अब न तो मुझे किसी से कोई शिकायत थी और न ही किसी से कोई उम्मीद। मैं अरुणिमा रायचंद, अपनी डायरी का यह आखिरी पन्ना लिख रही हूँ। ये सारी बातें, जो मैं किसी और से नहीं कह सकती, इन्हें मैं इस कागज़ पर उतार देती हूँ ताकि अपने मन का कुछ बोझ हल्का कर सकूँ। रात के 12 बज चुके हैं और आज मेरी शादी की पहली सालगिरह है। लेकिन मुझे उम्मीद है कि कल का दिन भी मेरे लिए कुछ ख़ास नहीं होगा। हमेशा की तरह मेरा पति मुझे फिर वही एहसास दिलाएगा कि मैं उसकी ज़िंदगी में कोई वैल्यू नहीं रखती हूँ।

  • 2. Marriage with Beast कठपुतली

    Words: 2549

    Estimated Reading Time: 16 min

    Mem, बॉस का मैसेज आया है। आज रात की पार्टी के लिए उन्होंने आपको रेडी होने के लिए कहा है; वो आपको लेने के लिए आ रहे हैं। एक सर्वेंट अरुणिमा के पास आकर यह खबर देता है। अरुणिमा उस समय बगीचे में बैठी हुई थी, पर सर्वेंट की बात सुनकर उसे ज़्यादा हैरानी नहीं हुई। यह बात तो उसे पहले से ही पता थी। आज उसकी शादी की सालगिरह है। बाकी लड़कियों के लिए यह दिन खास होता होगा, लेकिन अरुणिमा के लिए आज का दिन कोई खास नहीं था। ना कोई खुशी, ना कोई एक्साइटमेंट। वह बस यही सोच रही थी कि उसे और कितना वक्त इस बेमतलब की शादी में रहना है। अरुणिमा ने सामने खिलते हुए फूलों को देखते हुए अपने मन में कहा, "आज मेरी और आस्तिक की शादी को पूरा 1 साल हो गया है। हर पत्नी के लिए यह दिन खास होता है, लेकिन मेरे लिए नहीं। यह शादी मेरे लिए बस एक समझौता था, जो दोनों परिवारों को खुश रखने के लिए मैं निभा रही हूँ। इस शादी में ना तो मैं रहना चाहती हूँ और आस्तिक... वह तो पहले दिन से ही इस शादी में नहीं रहना चाहते थे।" "मैडम..." पीछे खड़े नौकर ने अरुणिमा का ध्यान तोड़ा। अरुणिमा जल्दी से अपने ख्यालों से बाहर आती है और नौकर को हाथ के इशारे से जाने के लिए कहती है। नौकर वहाँ से चला जाता है। थोड़ी देर और गार्डन में टहलने के बाद अरुणिमा ने वहाँ लगे फूलों का एक खूबसूरत सा बंच तैयार किया और उसे लेकर कुछ देर और गार्डन में टहलने लगी। दोपहर की धूप में ठंडी-ठंडी हवाओं के बीच अरुणिमा काफी राहत महसूस कर रही थी। लेकिन इस वक्त भी उसके दिमाग में यही बातें चल रही थीं—1 साल उसने जहाँ गुजारे थे और जिन लोगों के बीच थी, उनके बारे में सोचते हुए वह कहती है, क्या किस्मत है मेरी! मैं इस शहर के सबसे बड़े अंडरवर्ल्ड परिवार की बहू हूँ। रायचंद फैमिली—जिनका नाम लेने से पहले भी लोग 100 बार सोचते हैं। मैं उस परिवार के बड़े बेटे की बीवी हूँ, आस्तिक रायचंद, जो पूरे देश में अपने परिवार और कंपनी के अलावा माफिया के काले कारोबार का इकलौता मालिक है। मैंने बचपन से ही अपने पापा को अंडरवर्ल्ड और माफिया के साथ मिलते हुए देखा था। और एक बार के लिए सोचा भी था कि इस दुनिया में आकर इसे करीब से जानूंगी। लेकिन यहाँ कदम रखने का सपना मैंने देव के साथ देखा था। आस्तिक तो मेरे सपनों की परछाई में भी नहीं थे। पर देखो मेरी किस्मत! आस्तिक माफिया का किंग है और मैं माफिया की लेडी क्वीन। लेकिन मुझे देखकर कोई नहीं कहेगा कि मैं इस जगह को डिजर्व भी करती हूँ या नहीं। 1 साल बीत गया और मेरी ज़िंदगी में कोई बदलाव नहीं आया। आस्तिक हमेशा की तरह मुझसे दूर हैं। और हमेशा की तरह मुझे पता है कि ना तो उन्हें शादी में कोई दिलचस्पी है और ना ही मुझमें। मतलब की शादी में तो मैं भी नहीं रहना चाहती थी। लेकिन फिर भी मैं आस्तिक से थोड़ी-सी इज्जत और सम्मान की उम्मीद तो कर सकती हूँ। पर उन्होंने मेरी इस उम्मीद पर शादी की पहली रात ही पानी फेर दिया था। वह याद करती है कि शादी की पहली रात आस्तिक ने उससे कहा था:"चाहे अच्छी हो या बुरी, तुम्हें मेरी हर बात माननी होगी।" और पिछले 1 साल से अरुणिमा उनकी हर बात मानती आ रही है, जैसे किसी कठपुतली की तरह। सोचा तो कई बार था कि आस्तिक से अलग हो जाऊँ, लेकिन मैंने अपने पापा से वादा किया था कि मैं इस शादी को निभाऊँगी। और उनके किए वादे के चलते मैं आज तक इस शादी को निभा रही हूँ। लेकिन दिल के किसी कोने में उम्मीद है कि अगर मैं इस शादी में नहीं रहना चाहती, तो आस्तिक भी तो जबरदस्ती ही इसे निभा रहे हैं। वह सामने से तलाक क्यों नहीं मांग लेते? अगर उन्होंने तलाक माँगा, तो मैं खुशी-खुशी उनसे अलग हो जाऊँगी। इससे बड़ा तोहफा मेरे लिए और कुछ नहीं हो सकता। शुरुआत में लगा था कि आस्तिक जल्दी ही तलाक दे देंगे। लेकिन उनके इरादे कहीं से भी मुझे ऐसा नहीं लगते। मैं हमेशा सोचती हूँ कि जब वह मुझसे शादी करके खुश नहीं हैं, तो मुझे तलाक क्यों नहीं दे देते? लेकिन कभी यह सवाल उनसे पूछने की हिम्मत नहीं हुई। अपने ख्यालों में डूबी हुई अरुणिमा आखिरकार अपने हाथों से बनाए हुए फूलों के बंच को लेकर बंगले के अंदर आ जाती है। जैसे ही वह घर के अंदर दाखिल होती है, वहाँ दो नौकरानियां पहले से ही मौजूद थीं। ये अरुणिमा की पर्सनल नौकरानियां हैं—रोज़ी और जूली। जूली वही नौकरानी है, जो गार्डन में अरुणिमा को आस्तिक के मैसेज के बारे में बताने आई थी। और रोज़ी, अरुणिमा की हर ज़रूरत का ख्याल रखती है। जैसे ही अरुणिमा हवेली में पहुँचती है, वे दोनों नौकरानियां उसके पास सर झुकाए हुए खड़ी थीं। अरुणिमा को पता था कि आस्तिक का मैसेज मिलने के बाद वे दोनों यहाँ क्यों खड़ी हैं। दरअसल, वे दोनों अरुणिमा को तैयार करने के लिए वहाँ खड़ी थीं, ताकि शाम को अरुणिमा अपने ससुराल जा सके। शादी की पहली सालगिरह की पार्टी वहीं पर है। अरुणिमा ने अपने हाथों से बनाया हुआ फूलों का बंच एक फूलदान में लगाया और उसे प्यार से देखने लगी। घर की सजावट और डेकोरेशन के अलावा उसके पास और कोई काम ही नहीं था। जैसे-जैसे वह सीढ़ियों पर चढ़ रही थी, वैसे-वैसे ही नौकरानियाँ जूली और रोज़ी उसके पीछे-पीछे आ रही थीं। ऊपर की मंज़िल पर पहुँचकर अरुणिमा आस्तिक के कमरे के सामने से गुज़री। हाँ, यह आस्तिक का कमरा था। अरुणिमा और आस्तिक ने आज तक अपना कमरा शेयर नहीं किया था। पूरी हवेली में सिर्फ़ अरुणिमा का अपना कमरा ही था, जहाँ उसे सुकून मिलता था। बाकी पूरे घर पर सिर्फ़ आस्तिक की मर्ज़ी चलती थी। जैसे ही अरुणिमा अपने कमरे में पहुँची, उसने देखा कि उसके बेड पर एक बड़ा-सा गिफ्ट बॉक्स रखा हुआ है। रोज़ी, अरुणिमा के पास आते हुए बोली, "मैडम, मैं आपके नहाने के लिए बाथटब में पानी भर देती हूँ।" लेकिन अरुणिमा का पूरा ध्यान इस वक्त गिफ्ट बॉक्स पर था। उसने रोज़ी की बात सुनी भी नहीं। धीरे-धीरे वह बॉक्स के पास गई और उसे खोलने लगी। जैसे ही उसने बॉक्स खोला, उसकी आँखें हल्की-सी छोटी हो गईं। क्योंकि उसके अंदर ब्लैक कलर की डायमंड वर्क वाली शिफॉन साड़ी रखी हुई थी। जैसे ही अरुणिमा ने साड़ी को हाथ में उठाया, जूली जल्दी से बोल पड़ी, "मैडम, यह तो बहुत खूबसूरत साड़ी है। आप इसमें बहुत सुंदर लगेंगी।" साड़ी सच में बहुत खूबसूरत थी। उसमें किया गया डायमंड का काम असली डायमंड का था। पैसों के मामले में आस्तिक बहुत अमीर था, और उसका परिवार इस शहर का सबसे अमीर परिवार था। ऐसे में अपनी बीवी को डायमंड की साड़ी देना कोई बड़ी बात नहीं थी। अरुणिमा के पास ऐसे कई महँगे और डिज़ाइनर कपड़े थे। कुछ तो ऐसे थे जो उसने बिना पहने ही नौकरों को दे दिए थे। लेकिन साड़ी के बाद जब अरुणिमा ने ब्लाउज को हाथ में उठाया, तो उसकी आँखें बड़ी हो गईं और चेहरे पर हल्का गुस्सा आ गया। यह ब्लाउज इस साड़ी के साथ का था, लेकिन यह बैकलेस था। या यूँ कहें, कंधे पर बस डोरी बँधी हुई थी। और इसका गला इतना डीप था कि क्लीवेज अच्छे से एक्सपोज़ हो सकता था। अरुणिमा को गुस्सा आ रहा था, लेकिन उसने अपने गुस्से को संभाल लिया। हालाँकि, गुस्से की वजह से उसका शरीर काँप रहा था। रोज़ी भी तब तक वॉशरूम से बाहर आ गई थी और जूली के पास आकर खड़ी हो गई। अरुणिमा ने ब्लाउज को हाथ में कसते हुए कहा, "तुम दोनों कमरे से बाहर जाओ।" "लेकिन मैडम, हमें आपको तैयार..." जूली ने इतना ही कहा था कि अरुणिमा ने ऊँची आवाज़ में चिल्लाते हुए कहा, "मैंने कहा ना, बाहर जाओ!" वे दोनों अपना चेहरा झुकाकर कमरे से बाहर चली गईं। अरुणिमा ने ब्लाउज को बहुत कसकर अपने हाथ में पकड़ा हुआ था। उसका बस चलता तो इस वक्त इस ब्लाउज के टुकड़े-टुकड़े कर देती। उसे ऐसा लग रहा था जैसे यह उसकी बेइज्जती है। उसकी पूरी ज़िंदगी को कंट्रोल किया गया है। उसे क्या पहनना है और कैसे पहनना है, यह तक उससे कभी पूछा नहीं गया। ना तो आस्तिक ने कभी उसका सम्मान किया और ना ही उसकी मर्ज़ी के बारे में जानने की कोशिश की। उसने तो हमेशा अरुणिमा पर अपना ऑर्डर ही चलाया। अरुणिमा का मन रोने का कर रहा था, पर वह रो नहीं सकती थी। क्योंकि इस वक्त उसे तैयार होना था। आस्तिक अगले आधे घंटे में घर पहुँचने वाला था, और उसके घर पहुँचने से पहले उसे तैयार होना था। आस्तिक ने पहले ही बता दिया था कि वह आ रहा है। ऐसे में अगर अरुणिमा तैयार नहीं होगी, तो आस्तिक बहुत नाराज़ हो जाएगा। इसी वजह से वह समय बर्बाद नहीं करना चाहती थी। उसने जल्दी से साड़ी और ब्लाउज उठाया और बाथरूम में चली गई। रोज़ी ने पहले से ही नहाने का सारा इंतज़ाम कर रखा था। इसीलिए अरुणिमा को ज़्यादा समय नहीं लगा। नहाकर जब अरुणिमा सिर्फ़ ब्लाउज और बॉडी शेपर में बाहर आई, तब तक रोज़ी और जूली भी कमरे में वापस आ गई थीं, ताकि वे अरुणिमा को आज रात की पार्टी के लिए तैयार कर सकें। धीरे-धीरे अरुणिमा ने साड़ी पहनी। रोज़ी उसके बाल बना रही थी और जूली उसकी साड़ी की प्लेट्स ठीक कर रही थी। सब कुछ तैयार होने के बाद, जूली ने बड़े बॉक्स के पास रखे एक छोटे बॉक्स से डायमंड का सेट निकाला। यह सेट अरुणिमा की साड़ी के साथ बिल्कुल मैच कर रहा था। जूली ने अरुणिमा की गले में डायमंड का हार पहना दिया, और रोज़ी ने उसके कानों में डायमंड की बालियाँ पहना दीं। इसके बाद अरुणिमा ने ड्रेसिंग टेबल से सिंदूर का डिब्बा उठाया। उसके हाथ काँप रहे थे, और नज़रें सिंदूर पर टिकी हुई थीं। हर बार जब वह अपनी मांग भरती थी, तो उसका दिल जोरों से धड़कने लगता था। हालाँकि, आस्तिक ने कभी उसके श्रृंगार पर ध्यान नहीं दिया। वह सिंदूर लगाए, मंगलसूत्र पहने या न पहने, चूड़ियाँ पहने या न पहने, आस्तिक ने उसे कभी गौर से नहीं देखा। लेकिन आज, जब उसे सबके सामने जाना था, तो यह करना ज़रूरी था। वरना अकेले में अरुणिमा कभी सिंदूर या सुहाग का कोई और सामान इस्तेमाल नहीं करती थी। काफी देर तक सोचने और खुद को हिम्मत देने के बाद, आखिरकार अरुणिमा ने एक चुटकी सिंदूर उठाया और अपनी मांग भर ली। ऐसा लग रहा था, जैसे उसका अधूरा श्रृंगार सिंदूर के साथ पूरा हो गया हो। वैसे तो अरुणिमा बेहद खूबसूरत थी, लेकिन एक चुटकी सिंदूर में उसकी खूबसूरती और भी ज़्यादा बढ़ गई थी। मगर वह इस खूबसूरती के पीछे की अधूरी सच्चाई को महसूस कर रही थी। जूली ने उसके बालों को प्रेसिंग मशीन से सीधा कर दिया, और रोज़ी उसके पैरों में हील्स पहनवा रही थी। अरुणिमा ने खुद को आइने में देखा। वह बिल्कुल परफेक्ट लग रही थी, बिल्कुल वैसी जैसी रायचंद खानदान की बहू को लगना चाहिए। अरुणिमा खुद को देखने में मग्न थी, तभी गाड़ी की आवाज उसके कानों में पड़ी। उसका पूरा शरीर तनाव में आ गया। उसे पता था कि गाड़ी किसकी है। बंगले के अंदर गाड़ी की तीन बार हॉर्न की आवाज सुनाई दी। यह पहली बार नहीं था। हर बार उसे इसी तरह सिग्नल मिलता था कि आस्तिक की गाड़ी आ गई है। आस्तिक की गाड़ी बंगले में इंटर कर चुकी थी। ड्राइवर तिवारी ने तीन बार हॉर्न बजाकर अरुणिमा को इशारा दिया था। तिवारी जी काफी बुज़ुर्ग थे और सालों से आस्तिक के लिए काम कर रहे थे। अरुणिमा का स्वभाव उनसे अलग था। जब उसने पहली बार तिवारी जी को ‘भैया’ कहा था, तो उन्हें लगा था कि वह बाकी अमीर लड़कियों से अलग है। शायद इसीलिए उन्होंने उसे सिग्नल देने के लिए गाड़ी का हॉर्न बजाना शुरू किया था। आस्तिक के घर आने के साथ ही पूरे बंगले का माहौल अचानक से तनावग्रस्त हो गया। अरुणिमा ने तुरंत जूली और रोज़ी को कमरे से बाहर भेज दिया। फिर उसने बिस्तर की चादर ठीक की और फूल सही किए। अपना फोन बैग में रखा और शीशे में खुद को एक बार फिर से देखा। जब उसे लगा कि वह बिल्कुल ठीक लग रही है, तो उसने इंतज़ार करना शुरू कर दिया। शाम हो चुकी थी। खिड़की से सूरज डूबता दिख रहा था, और रात धीरे-धीरे फैलने लगी थी। पिछले एक साल से उसका जीवन ऐसा ही था। अरुणिमा घबराते हुए बिस्तर के पास खड़ी थी, तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। उसने गहरी साँस ली। एक नौकर ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा, "मैडम, आपको नीचे बुलाया जा रहा है।" डरी हुई अरुणिमा ने खुद को संभालते हुए कदम बढ़ाए। उसने सोचा, "यह वही पल है जिसका मुझे इंतज़ार करना है।" आदर्श पत्नी की तरह उसने खुद को पेश किया और कमरे से बाहर निकली। सीढ़ियों के पास पहुँचकर अरुणिमा ने अपना चेहरा नीचे कर लिया। उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि हॉल की तरफ़ देखे। लेकिन जब उसने हल्का सा सिर उठाया, तो देखा आस्तिक सोफ़े के पास खड़ा था। वह वही आदमी था जिसने कभी अरुणिमा की परवाह नहीं की। अरुणिमा सोच रही थी, "इसने मुझसे शादी के लिए हाँ क्यों कहा था? मेरे पास इसके साथ शादी करने की वजह मेरे माता-पिता थे। पर इसके पास तो ऐसी कोई वजह नहीं थी। फिर भी, इसने मुझसे शादी क्यों की?" अरुणिमा धीरे-धीरे आस्तिक की तरफ़ बढ़ने लगी। आस्तिक ने ब्लैक कलर का बिज़नेस सूट पहना हुआ था। पीछे से ही उसकी पर्सनालिटी बेहद चार्मिंग लग रही थी। जैसे ही अरुणिमा उसके पास पहुँची, आस्तिक ने पलटकर उसकी तरफ़ देखा। उनकी नज़रें आपस में टकरा गईं। अरुणिमा का चेहरा खूबसूरत और चमक रहा था, लेकिन आस्तिक के चेहरे पर कोई मुस्कान या भाव नहीं था। हमेशा की तरह उसका चेहरा एक्सप्रेशनलेस था। अरुणिमा को याद आया कि उसने आस्तिक को बस एक बार मुस्कुराते हुए देखा था, वह भी शादी के दिन। तब भी, वह मुस्कान सिर्फ़ रिश्तेदारों और मीडिया के लिए थी। शादी के बाद, उसने कभी आस्तिक को मुस्कुराते नहीं देखा था। आस्तिक ने घड़ी में समय देखा और फिर अरुणिमा की तरफ़ देखा। उसकी भूरी आँखें अरुणिमा पर टिक गई थीं। ब्लैक सूट में वह किसी ब्लैक डेविल से कम नहीं लग रहा था। चौड़ी छाती, बाइसेप्स और परफेक्ट बॉडी के साथ, उसकी पर्सनालिटी बेहद आकर्षक थी। लेकिन अरुणिमा को उसकी यह परफेक्शन कभी अपनापन महसूस नहीं करवा पाई। जैसे ही आस्तिक ने अरुणिमा को देखा, उसके चेहरे पर ना तो मुस्कान आई और ना ही कोई रिएक्शन। उसका चेहरा बिल्कुल एक्सप्रेशनलेस था। वैसे हमेशा से उसका चेहरा ऐसा नहीं था। अरुणिमा ने आस्तिक को मुस्कुराते हुए देखा था, बस शादी वाले दिन। वह भी सिर्फ़ थोड़ा सा और अरुणिमा को लगता था कि वह मुस्कान सिर्फ़ रिश्तेदारों, फैमिली और मीडिया के लिए थी, ताकि सबको लगे कि वह शादी से खुश है। वरना उसके बाद से आज तक, मुस्कुराना तो छोड़ो, उसने गलती से भी अपने होठों के किनारे तक नहीं हिलाए। अरुणिमा ने उसे देखा तो वह पहले से तैयार होकर ही आया था। मतलब वह घर पर तैयार होने के लिए नहीं आया था। वैसे यह कोई नई बात नहीं थी। आस्तिक काम के लिए ही घर आता था, क्योंकि वह ज्यादातर अपने दूसरे घर में रहता था। लेकिन अरुणिमा जानती थी कि वह दूसरे घर में अकेला नहीं रहता है।

  • 3. kill the f****** bastard

    Words: 2014

    Estimated Reading Time: 13 min

    आस्तिक का दूसरा घर… अरुणिमा चाहे जितना नज़रअंदाज़ करने की कोशिश करे, लेकिन ये बात उसके दिल के एक कोने में परेशानी का कारण थी कि आस्तिक उसके साथ इस घर में नहीं रहता था। वह अपने दूसरे घर में रहता था… और वह भी किसी और के साथ। आस्तिक और अरुणिमा बंगले से बाहर आ गए थे और गाड़ी के पास पहुँच गए, जहाँ ड्राइवर पहले से ही उनका इंतज़ार कर रहा था। आस्तिक ने खुद अपनी तरफ़ का दरवाज़ा खोलकर अंदर बैठ गया और ड्राइवर से बोला, "चलो तिवारी, हमें लेट हो रहा है।" ड्राइवर तिवारी जी ने जल्दी से अपनी टोपी पहनी और "यस बॉस" कहते हुए गाड़ी की तरफ़ बढ़े। अरुणिमा के लिए तो ये बस एक सिग्नल जैसा था। वह चुपचाप उनके पीछे-पीछे चल रही थी। जैसे ही वह गाड़ी के पास पहुँची, तिवारी जी ने उसके लिए दूसरी तरफ़ का दरवाज़ा खोला। गाड़ी में बैठने से पहले उसने धीरे से "थैंक यू" कहा। जैसे ही अरुणिमा गाड़ी में बैठी, उसने देखा कि आस्तिक अपने फ़ोन में बिज़ी है। कॉल आने से पहले वह किसी से मैसेज पर बात कर रहा था। लेकिन जैसे ही फ़ोन की रिंग बजी, उसने कॉल उठाकर कान पर लगा लिया। दूसरी तरफ़ से कुछ कहा गया, जिसे सुनकर आस्तिक के माथे पर बल पड़ गए। "जान से मार दो उस रिपोर्टर को। वह मेरे काम में टांग अड़ाने की हिम्मत कैसे कर सकता है? क्या एक बार में तुम्हें मेरी बात समझ में नहीं आती या दोबारा समझाने की ज़रूरत है?" उसने गुस्से में कहा। "उस दो कौड़ी के रिपोर्टर की वजह से मैं अपने प्रोजेक्ट में नुकसान बर्दाश्त नहीं करूँगा। उसे रास्ते से हटा दो।" सामने से कुछ कहा गया, और आस्तिक गुस्से में जोर से चिल्लाया, "Kill the fa**ng bastard!" गुस्से में उसने फ़ोन गाड़ी के कोने में फेंक दिया, जो सीधा जाकर अरुणिमा के पैर से टकराया। अरुणिमा पहले ही आस्तिक के चिल्लाने से डरी हुई थी। जब फ़ोन उसके पैर पर लगा, तो उसने हल्के से दर्द को अपने होंठों तले दबा लिया। आस्तिक ने गुस्से में अरुणिमा की तरफ़ देखा, लेकिन अरुणिमा अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिली और ना ही उसने उसकी तरफ़ अपना चेहरा घुमाया। आस्तिक खिड़की से बाहर देखने लगा। वैसे भी अरुणिमा की चोट से उसे कोई मतलब नहीं था। अरुणिमा ने धीरे से अपना हाथ अपने पैरों के पास लाया और हल्के से अपनी एड़ी को रगड़ने लगी। उसने देखा कि आस्तिक का फ़ोन उसके पैरों के पास पड़ा हुआ है। धीरे से उसने फ़ोन उठाया और आस्तिक की तरफ़ बढ़ा दिया। आस्तिक ने तीखी नज़रों से अरुणिमा की तरफ़ देखा, लेकिन बिना कुछ कहे उसने फ़ोन को झटके से अरुणिमा के हाथ से छीन लिया। उसकी ठंडी निगाहें इतनी ख़तरनाक थीं कि अरुणिमा की रूह तक काँप गई। अरुणिमा इतनी डर गई थी कि उसे लगने लगा कि आस्तिक गुस्से में उसे नुकसान पहुँचा देगा। हालाँकि, उसने कभी अरुणिमा को चोट नहीं पहुँचाई थी, लेकिन जो पहले कभी नहीं हुआ, वह ज़रूरी नहीं कि आगे भी ना हो। हर चीज़ की शुरुआत कभी ना कभी तो होती ही है। फ़ोन फेंकने के बाद, आस्तिक ने गुस्से में सामने की सीट पर जोर से हाथ मारा, जिससे उसके हाथ पर हल्की खरोंच आ गई। अरुणिमा ने धीरे से अपने पर्स से फूलों के डिज़ाइन वाली रुमाल निकाली और आस्तिक की तरफ़ बढ़ा दी। आस्तिक ने अपनी ख़तरनाक निगाहें अरुणिमा पर गड़ा दीं। उसने अरुणिमा की कलाई पकड़ ली और गुस्से में घूरते हुए कहा, "तुम्हें समझ में नहीं आ रहा है क्या कि मैं गुस्से में हूँ? क्यों मुझसे उलझ रही हो? मुझे तुम्हारी मदद की ज़रूरत नहीं है।" "मैं… बस…" अरुणिमा अपनी लड़खड़ाती आवाज़ में कुछ कहने की कोशिश कर रही थी। लेकिन आस्तिक ने उसकी कलाई को झटक दिया और गुस्से से उसकी तरफ़ उंगली करते हुए बोला, "कुछ भी करने की कोशिश मत करना। समझीं? मेरे सामने ज़्यादा स्मार्ट बनने की ज़रूरत नहीं है। तुम मेरी बीवी सिर्फ़ दुनिया के लिए हो। मुझ पर हक़ जताने की कोशिश भी मत करना। हम दोनों जानते हैं कि यह शादी सिर्फ़ दिखावा है। ना मैं इस शादी में रहना चाहता हूँ और ना ही तुम। लेकिन हम दोनों ही इसे ख़त्म नहीं कर सकते।" आस्तिक के शब्दों ने अरुणिमा को पूरी तरह ख़ामोश कर दिया। उसकी बातों ने अरुणिमा को एहसास दिला दिया कि उसकी भावनाओं का कोई महत्व नहीं है। आज का दिन अरुणिमा के लिए शायद सबसे कड़वा था। आस्तिक पहले भी एक राक्षस था और अब भी एक पशु है। आस्तिक गुस्से में भड़कते हुए बोला, "तुम दुनिया और मेरे परिवार के सामने मेरी बीवी हो, क्योंकि उन्हीं लोगों ने तुमसे मेरी शादी करवाई है। लेकिन मेरे लिए तुम सिर्फ़ मेरे घर में पड़ा हुआ एक फ़ालतू सामान हो। इससे ज़्यादा तुम मेरी लाइफ़ में कोई इम्पॉर्टेंस नहीं रखती, समझीं अरुणिमा?" आस्तिक की बातों ने उसे अंदर तक तोड़कर रख दिया। यह एहसास कि वह उसके लिए सिर्फ़ एक बोझ है, अरुणिमा को कचोट रहा था। लेकिन आस्तिक हर बार उसे इस बात का एहसास ज़रूर करवाता कि वह उसके घर का एक फ़ालतू सामान से ज़्यादा कुछ नहीं है। अरुणिमा का दिल भारी हो गया था और आँखों में आँसू आने लगे थे, जिन्हें उसने बहुत मुश्किल से रोकने की कोशिश की। वैसे तो उसने कई बार आस्तिक को गुस्से में चिल्लाते हुए देखा था। आस्तिक हमेशा कोशिश करता था कि वह जितना हो सके, अरुणिमा से दूर ही रहे। शादी के दूसरे दिन से ही आस्तिक ने अरुणिमा से कोई रिश्ता नहीं रखा था। अगर निगाहों से किसी को मारा जा सकता, तो शायद आस्तिक अब तक अरुणिमा को कई बार मार चुका होता। उसकी वह ख़तरनाक, नफ़रत से जलती निगाहें अरुणिमा को अंदर तक जला रही थीं। अरुणिमा का दिल चीखने को कर रहा था, लेकिन तभी उसे आस्तिक की माँ के कहे शब्द याद आ गए। जब उन्होंने मुँह दिखाई के समय उसके हाथों को अपने हाथ में लेकर कहा था कि क्यों उन्होंने अरुणिमा को आस्तिक के लिए चुना। उस वक़्त उन्होंने अरुणिमा से एक वादा लिया था। लेकिन आज अरुणिमा को लग रहा था कि वह अपना वादा कभी पूरा नहीं कर पाएगी, क्योंकि सामने खड़ा यह इंसान इंसान नहीं बल्कि एक पशु है। जिसे बदलना नामुमकिन है। शादी के पहले साल में अरुणिमा को आस्तिक के बारे में ज़्यादा कुछ मालूम नहीं हुआ। वह पूरे साल में मुश्किल से पाँच बार घर आया था। ज़्यादातर या तो ऑफ़िस में रहता, अपने अवैध कामों में व्यस्त रहता या फिर अपने दूसरे घर में समय बिताता। दोनों की दुनिया बिल्कुल अलग थी। वे दोनों कभी भी एक साथ बैठकर नॉर्मल कपल्स की तरह डिनर नहीं करते थे और ना ही किसी बात पर एक-दूसरे से सलाह लेते थे। अरुणिमा अभी भी यह सोचकर हैरान थी कि आस्तिक अब तक उसके साथ क्यों है। अपने ख़यालों में खोई अरुणिमा पर आस्तिक का गुस्सा अभी भी हावी था। वह भड़कते हुए बोला, "अपने छोटे से दिमाग में अच्छी तरह बैठा लो। जब मैं गुस्से में रहूँ, तो मेरे सामने आने की हिम्मत मत करना। पहले ही मैं अपने डील की वजह से परेशान हूँ, ऊपर से उस बेवकूफ़ रिपोर्टर ने मेरा दिमाग़ ख़राब कर दिया है। और तुम हो, जो मुझे परेशान करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ती। चुपचाप गाड़ी के उस कोने में पड़ी रहो। तुम्हारी मौजूदगी का एहसास भी मुझे ना हो। समझीं?" अरुणिमा ने डरते हुए हाँ में सिर हिलाया, तो आस्तिक ने उससे चेहरा फेर लिया और खिड़की की तरफ़ देखने लगा। गाड़ी की पिछली सीट पर गहरा सन्नाटा छा गया। रायचंद मेंशन पहुँचने में उन्हें करीब आधे घंटे का समय लगा। यह हवेली शहर के बाहरी इलाके में थी। अरुणिमा इस हवेली में शादी के बाद सिर्फ़ अपनी रिसेप्शन पार्टी के लिए आई थी। उसी दिन उसने अपने माता-पिता को आखिरी बार देखा था, क्योंकि उसके बाद वे बैंगलोर शिफ्ट हो गए थे। जैसे ही गाड़ी हवेली के गेट पर पहुँची, आस्तिक गाड़ी से उतरकर सीधे अंदर चला गया। उसने ना तो अरुणिमा के गाड़ी से उतरने का इंतज़ार किया और ना ही उसके साथ चलने की परवाह की। अरुणिमा ने गहरी साँस ली और धीरे से गाड़ी के पास खड़ी हो गई। यह सब उसके लिए बस एक औपचारिकता थी। सब कुछ हमेशा की तरह ही होने वाला था। बस कुछ घंटे इस पार्टी में एक-दूसरे को बर्दाश्त करना था। उसके बाद अरुणिमा वापस अपने बंगले चली जाएगी और आस्तिक अपने दूसरे घर। वे फिर कब मिलेंगे, यह शायद वे दोनों भी नहीं जानते थे। जैसा पिछले एक साल से चल रहा था, वैसा ही चलता रहेगा। अरुणिमा को जॉब करने की इजाज़त नहीं थी। यह इसलिए नहीं कि उसमें काबिलियत नहीं थी, बल्कि इसलिए क्योंकि किसी ने उसकी काबिलियत को समझा ही नहीं। आस्तिक ने उसे एक गोल्डन कार्ड दे रखा था। उसका मानना था कि लड़कियाँ काम करने के लिए नहीं होती हैं। अरुणिमा ने एक बार आस्तिक को अपनी फ़ाइल दिखाई थी, जिसमें उसने इतिहास पर रिसर्च की थी। लेकिन आस्तिक ने उसे तुरंत रिजेक्ट कर दिया और उसका मज़ाक उड़ाते हुए उसे बच्चों के नर्सरी होमवर्क से कंपेयर कर दिया। अरुणिमा पार्टी के एंट्रेंस पर खड़ी थी। आस्तिक अकेले ही अंदर चला गया था, और अरुणिमा अभी भी वहीं खड़ी थी। उसके दिमाग़ में बहुत सारी बातें चल रही थीं। तभी उसकी तरफ़ एक हाथ बढ़ता है। वह चौंक जाती है और अपना चेहरा उठाकर देखती है। सामने आस्तिक खड़ा था। उसने धीरे से अपना हाथ फोल्ड करते हुए अपनी बाजू अरुणिमा की तरफ़ बढ़ाई और इशारा किया। अरुणिमा उसका इशारा समझ गई और उसने धीरे से अपनी बाजू आस्तिक की बाजू में फँसा ली। दोनों एकदम परफेक्ट कपल की तरह खड़े हो गए। लेकिन पार्टी हॉल में जाने से पहले, आस्तिक ने अरुणिमा की तरफ़ देखते हुए कहा, "तुम जानती हो ना कि मुझे क्या करना है?" अरुणिमा धीरे से आस्तिक की तरफ़ देखकर अपना चेहरा हिलाती है। आस्तिक तीखी नज़रों से उसे देखते हुए कहता है, "अगर जानती हो, तो मुस्कुराओ। दिखने में तुम ख़ूबसूरत हो। मुस्कुराओगी तो तुम्हारे चेहरे पर यह जो परेशानी है, यह लोगों को नज़र नहीं आएगी। इसलिए एक अच्छी बीवी की तरह बिहेव करो और मुस्कुराते हुए मेरे साथ पार्टी में चलो।" आस्तिक के ये शब्द अरुणिमा के दिल में चुभ रहे थे। उसने धीरे से अपने होंठ भींच लिए और जबरदस्ती अपने चेहरे पर एक नकली मुस्कान ले आई। आस्तिक और अरुणिमा पार्टी में एंटर करते हैं। लेकिन दरवाज़े पर पहुँचते ही, आस्तिक को पीछे से एक आवाज़ सुनाई देती है। "आस्तिक, तुम आ गए। हम तुम्हारा इंतज़ार कर रहे थे।" आस्तिक ने अपना चेहरा घुमाया। अरुणिमा ने भी इस आवाज़ की तरफ़ देखा। सामने उम्रदराज़ कपल खड़ा था। उनके चेहरे पर मुस्कान थी। अरुणिमा ने भी अपने चेहरे पर एक नकली मुस्कान ओढ़ ली। आस्तिक ने उन्हें पहचान लिया और उनकी तरफ़ हाथ बढ़ाया। वह कपल भी अब तक आस्तिक के पास आ गया था। उस आदमी ने आस्तिक से हाथ मिलाते हुए कहा, "कैसे हो? और शादी की पहली सालगिरह बहुत-बहुत मुबारक हो।" उस आदमी के साथ खड़ी उनकी वाइफ़ ने भी आस्तिक और अरुणिमा को देखते हुए कहा, "आप दोनों को शादी की पहली सालगिरह मुबारक हो।" आस्तिक और अरुणिमा दोनों के चेहरे पर फ़ॉर्मेलिटी वाली मुस्कान थी। आस्तिक ने मुस्कुराते हुए "थैंक यू" कहा, और अरुणिमा ने भी धीरे से सिर हिलाया। ये दोनों आस्तिक के पिता के बिज़नेस पार्टनर थे, मिस्टर और मिसेज़ जरीवाला। उनसे मिलने के बाद, आस्तिक और अरुणिमा हॉल में आते हैं, जहाँ पर पार्टी के लिए सब लोग मौजूद थे। जैसे-जैसे अरुणिमा पार्टी में अंदर बढ़ रही थी, उसकी घबराहट भी बढ़ती जा रही थी। दरअसल, अरुणिमा को लोगों के साथ ज़्यादा खुलकर मिलना पसंद नहीं था। उसकी घबराहट तब और बढ़ जाती थी, जब वह किसी पार्टी में सेंटर ऑफ़ अट्रैक्शन बन जाती थी। उसे लोगों की नज़रें अपने ऊपर अच्छी नहीं लगती थीं। पार्टी हॉल बहुत ख़ूबसूरती से सजाया गया था। लाइट्स, झूमर और चमकीले कैंडल्स के साथ इस पार्टी को एक आलीशान पार्टी का रूप दिया गया था। आस्तिक और अरुणिमा पार्टी हॉल में एंटर हो चुके थे, और जो भी उन्हें देख रहा था, उन्हें सालगिरह की बधाई दे रहा था।

  • 4. dost ke roop Mein jahrili Nagin

    Words: 2141

    Estimated Reading Time: 13 min

    पार्टी में पूरी तरह शामिल होने के बावजूद, अरुणिमा और आस्तिक के चेहरों पर वही बनावटी मुस्कान बनी हुई थी। वे केवल औपचारिकताएँ निभा रहे थे। लोगों के बीच पहुँचकर, अरुणिमा ने सबको देखकर हाथ हिलाया, और सभी ने उसे देखकर तालियाँ बजाईं। आस्तिक ने भी सभी को देखकर हाथ हिलाकर अभिवादन किया। तभी अरुणिमा की नज़र आस्तिक के माता-पिता पर पड़ी—मिस्टर पुष्कर रायचंद और उनकी पत्नी नेहा रायचंद। पुष्कर जी ने इस मौके पर खूबसूरत सफ़ारी सूट पहना हुआ था, जबकि नेहा जी ने बनारसी साड़ी के ऊपर भारी सोने का सेट पहना था। भले ही नेहा जी की उम्र अब दादी बनने वाली थी, लेकिन उनके चेहरे पर ऐसी चमक और रौनक थी कि कोई नहीं कह सकता था कि उनकी उम्र हो चुकी है। आस्तिक और अरुणिमा पुष्कर जी और नेहा जी के पास पहुँचे। आस्तिक अपने पिता के गले लगा और माँ के भी। अरुणिमा मुस्कुराते हुए उनके पास गई और झुककर उनके पैर छूने लगी। पुष्कर जी ने उसे बीच में रोकते हुए उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, "क्या कर रही हो? यह सब करने की ज़रूरत नहीं है।" पुष्कर जी का व्यवहार थोड़ा सख्त ज़रूर था, लेकिन उनका स्वभाव सभी के लिए ऐसा ही था। हालाँकि आस्तिक के लिए वे थोड़े कोमल थे, लेकिन बाकियों के सामने उनका वही रौबदार रूप देखने को मिलता था। पुष्कर जी को देखकर लोग अक्सर कहते थे कि आस्तिक का घमंड उन्हीं से आया है। उनके ऐसा कहने पर अरुणिमा ने बुरा नहीं माना, बल्कि मुस्कुराते हुए सिर हिला दिया। इसके बाद वह नेहा जी की ओर देखती है। नेहा जी मुस्कुराते हुए अरुणिमा के पास आईं और उसे गले लगाकर बोलीं, "बहुत-बहुत मुबारक हो, मेरी बच्ची। शादी की पहली सालगिरह आप दोनों के जीवन में ढेर सारी खुशियाँ लेकर आए।" अरुणिमा मुस्कुराते हुए नेहा जी को देखती है। पुष्कर जी और आस्तिक एक तरफ़ होकर कुछ बात कर रहे थे, जबकि नेहा जी अरुणिमा के साथ खड़ी थीं। उन्होंने अरुणिमा का हाथ पकड़ते हुए कहा, "अरुणिमा, धन्यवाद बच्चा। मैं बहुत खुश हूँ कि तुमने आखिरकार अपना वादा निभाया। मेरा बेटा तुम्हारे साथ अपनी शादी निभा रहा है। मैं जानती थी कि तुम मेरे बेटे के लिए सही इंसान हो। धन्यवाद, अरुणिमा, मेरे बेटे की ज़िंदगी संवारने के लिए।" नेहा जी की बातों में उनकी खुशी झलक रही थी, लेकिन अरुणिमा की मुस्कान उतनी ही झूठी थी। उसका मन कर रहा था कि नेहा जी को सारी सच्चाई बता दे, लेकिन उसे पता था कि सच्चाई जानकर उनका दिल टूट जाएगा और जो विश्वास उन्होंने अरुणिमा पर किया है, वह भी खत्म हो जाएगा। और वैसे भी अरुणिमा क्या बताएगी नेहा जी को? क्या यह कि उसकी शादी की सच्चाई कुछ और है? वह सारा दिन घर में एक सामान की तरह पड़ी रहती है। उसे कोई काम करने की ज़रूरत नहीं पड़ती, लेकिन फिर भी उसकी हालत घर में रखी निर्जीव चीज़ से भी बदतर है। अरुणिमा की ज़िंदगी राजकुमारी की तरह हो गई थी, जिसे एक महल में बंद कर दिया गया हो। भले ही अंदर सारी सुख-सुविधाएँ मौजूद थीं, लेकिन उसके पास जो चीज़ नहीं थी, वह थी आज़ादी। एक साल हो गया था, अरुणिमा ने इस कैद को सहन किया था। उसे खुद नहीं पता कि यह सब कब तक चलेगा। "अरुणिमा, आस्तिक तुम्हारे साथ ठीक से पेश आता है, न?" नेहा जी ने अरुणिमा से पूछा। यह सुनकर अरुणिमा की मुस्कान हल्की पड़ गई, लेकिन वह चुप रही। इससे पहले कि वह कुछ कह पाती, एक ठंडा हाथ उसकी कमर पर आकर उसे कसकर अपने करीब कर लेता है। अरुणिमा इस महक से पहचान गई थी कि यह हाथ आस्तिक का ही है। "मॉम, आप मेरी पत्नी को मेरे खिलाफ़ भड़का रही हैं? कमाल है। मैंने तो सुना था कि शादी के बाद सास-बहू की बनती नहीं है, पर यहाँ तो दृश्य ही उल्टा है। आप क्या चाहती हैं? यहाँ से वापस जाने के बाद मेरा और मेरी पत्नी का झगड़ा हो?" आस्तिक ने थोड़े दबंग अंदाज़ में कहा। आस्तिक की बात सुनकर नेहा जी जल्दी से बोलीं, "अरे नहीं, आस्तिक। ऐसी कोई बात नहीं है। तुम गलत सोच रहे हो। मैं तो बस यह जानना चाहती थी कि तुम और अरुणिमा एक साथ खुश तो हो, न।" "हाँ, बिल्कुल मॉम। हम एक साथ बहुत खुश हैं। क्यों, जान?" आस्तिक ने अरुणिमा को अपने और करीब करते हुए पूछा। अरुणिमा ने जबरदस्ती मुस्कुराते हुए कहा, "जी, मम्मी जी। आपको फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं है। हम दोनों बहुत खुश हैं।" नेहा जी को तसल्ली हो गई और उन्होंने सिर हिला दिया। तभी उनकी एक दोस्त वहाँ आ गई। नेहा जी आस्तिक और अरुणिमा को एक साथ छोड़कर अपनी दोस्त के पास चली गईं। उनके जाते ही, आस्तिक ने अरुणिमा की कमर से हाथ हटाया और कड़वी मुस्कान के साथ उसकी ओर देखते हुए कहा, "काफ़ी अच्छी एक्टिंग कर लेती हो। अच्छी बात है। जब तक पार्टी ख़त्म नहीं होती, यह एक्टिंग जारी रखना।" यह कहते हुए आस्तिक अरुणिमा को वहीं छोड़कर अपने पिता के पास चला गया, जहाँ उनके पिता बिज़नेस पार्टनर्स के साथ कुछ बात कर रहे थे। आस्तिक भी उन लोगों के बीच शामिल हो गया। थोड़ी देर बाद नेहा जी अरुणिमा को सोसाइटी की कुछ और महिलाओं से मिलवाने लगीं। अरुणिमा को उनसे मिलने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह बस नेहा जी के साथ औपचारिकताएँ पूरी कर रही थी। तभी अरुणिमा के कानों में काँच की आवाज़ सुनाई दी और वह अपना चेहरा घुमाकर देखती है। इस समय सामने बेला खड़ी थी, जिसने एक शिमरी वन-पीस ड्रेस पहनी हुई थी। वह अपने हाथों में वाइन का गिलास लेकर सबका ध्यान अपनी ओर खींच रही थी। जब सब उसकी ओर देखने लगे, तो वह मुस्कुराते हुए एक कुर्सी पर चढ़ जाती है और वाइन का गिलास हवा में उठाते हुए कहती है, "ध्यान दीजिए, महिलाओं और सज्जनों! जैसा कि आप सब जानते हैं, आज की रात हमारे परिवार के लिए बहुत ख़ास है। दरअसल, आज मेरे बड़े भाई आस्तिक रायचंद की शादी की पहली सालगिरह है। तो चलिए, हम सब मिलकर उनकी इस रात को और खूबसूरत बनाते हैं!" "चीयर्स, भाई!" ऐसा कहते हुए बेला ने अपने हाथ में पकड़े हुए वाइन के गिलास को आस्तिक की ओर हवा में लहराया। इसी के साथ वहाँ खड़े सभी लोगों ने अपने हाथ में पकड़े हुए शैंपेन, वाइन और अल्कोहल के गिलास को हवा में लहराते हुए आस्तिक को देखकर चीयर्स किया। आस्तिक ने भी मुस्कुराते हुए अपने हाथ के शैंपेन गिलास को हवा में उठाकर सभी का अभिवादन किया। दिखावे के लोग और दिखावे की दुनिया। पार्टी में कुछ लोगों की मुस्कान सच्ची थी, लेकिन बाकी सबके चेहरों पर नकली मुखौटे लगे हुए थे। अरुणिमा इन सबके चेहरे देखकर उनके भाव पहचान गई थी। वैसे रायचंद परिवार भी दिखावा करने में पीछे नहीं था। अरुणिमा से भी महँगे कपड़े इस वक़्त बेला ने पहने हुए थे, जो आदमियों के बीच अपने हुस्न का प्रदर्शन बखूबी कर रही थी। बेला के लिए शुरुआत में ही बता दूँ कि अगर एक तरफ़ जहरीला साँप हो और दूसरी तरफ़ बेला हो, तो आप लोग साँप पर भरोसा कीजिएगा, लेकिन बेला पर नहीं। इस लड़की के अंदर एक अलग ही जहरीली चालाकी छुपी है। और हो भी क्यों ना? इसके अंदर खून तो इसकी माँ का ही है। अब यह बात भी जान लीजिए कि बेला, नेहा जी की बेटी नहीं है। वह आस्तिक की सौतेली बहन है। मिस्टर पुष्कर रायचंद ने अपने जीवन में खूब आशिकियाँ की थीं। ऐसी ही एक आशिकी उन्होंने अपनी पत्नी की सबसे अच्छी दोस्त यानी नेहा जी की सहेली मालिनी के साथ भी की थी। मालिनी और नेहा बचपन से एक साथ पली-बढ़ी थीं। मालिनी नेहा जी के ड्राइवर की बेटी थी, लेकिन वह हमेशा नेहा जी के पैसे और रुतबे से जलती थी। नेहा जी ने उसे अपनी बहन की तरह माना था, लेकिन मालिनी ने हमेशा नेहा की किस्मत को कोसा। उसकी नफ़रत तब और बढ़ गई, जब नेहा की शादी पुष्कर रायचंद से हो गई। नेहा जी की किस्मत और खुशहाल ज़िंदगी देखकर मालिनी के मन में जलन और ज़्यादा बढ़ गई। उसे पता चला कि पुष्कर जी रंगीन मिजाज़ के आदमी हैं। अपनी ज़रूरतें पूरी करने और अपनी नफ़रत का बदला लेने के लिए मालिनी ने पुष्कर जी को अपने जाल में फँसा लिया। पुष्कर जी, जो पहले ही विवाहेतर संबंधों के लिए कुख्यात थे, मालिनी के जाल में फँस गए। मालिनी ने अपनी चालाकी से नेहा जी को यकीन दिलाया कि वह उनकी गर्भावस्था के दौरान उनका ध्यान रखने आई है। लेकिन हकीकत यह थी कि मालिनी और पुष्कर रातों को एक-दूसरे के साथ रंगीन वक़्त बिताते थे। नेहा जी के दूध में नींद की गोलियाँ मिलाकर वे उन्हें सुला दिया करते थे, और फिर पुष्कर मालिनी के साथ अपनी रातें बिताते थे। इस तरह मालिनी ने नेहा जी के भरोसे का ग़द्दारी करते हुए रायचंद परिवार के अंदर एक गहरी साज़िश की नींव रख दी थी। पर उनका यह खेल ज़्यादा दिन तक नहीं चल पाया। जब आस्तिक पैदा हुआ और उसके छह महीने बाद ही मालिनी को अपनी गर्भावस्था का पता चला, तो वह बहुत डर गई थी। उसके पास जाने के लिए और कोई जगह नहीं थी, और पुष्कर उसे दुनिया के सामने अपनाने वाला नहीं था। उसने साफ़-साफ़ कह दिया था कि वह चाहे तो गर्भपात करवा सकती है, लेकिन दुनिया की नज़रों में नेहा ही उसकी पत्नी रहेगी और आस्तिक ही उनका बेटा रहेगा। उसके लिए अपनी आत्मसम्मान से बढ़कर और कुछ भी नहीं था। तब मालिनी को एहसास हुआ कि पुष्कर जैसा इंसान कभी भी भरोसे के लायक नहीं था। उसने पुष्कर के साथ उम्मीद बाँधकर ही गलती की थी। इसलिए मालिनी ने नेहा से मदद की उम्मीद की। जब नेहा को इस बारे में पता चला, तो वह टूट गई थी। वह इतनी ज़्यादा परेशान हो गई और अंदर ही अंदर इतनी टूटकर बिखर गई थी कि उसने अपनी जान लेने की भी कोशिश की। लेकिन अपने बच्चों की आवाज़ सुनकर नेहा ने खुद को ख़त्म करने का इरादा छोड़ दिया। उस दिन के बाद से ना तो उसने मालिनी की ओर देखा और ना ही पुष्कर जी के साथ वह सामान्य तरीके से रही। पुष्कर जी के चेहरे पर अपराधबोध का एक भी भाव नहीं था। उन्होंने जो किया था, उसका उन्हें एक भी पछतावा नहीं था। वे हमेशा नेहा से यही कहा करते थे कि वे अपनी मर्ज़ी से अपनी ज़िंदगी जिएँगे। नेहा की पूरी ज़िंदगी वीरान हो गई थी। उनके पति उनके होकर भी उनके नहीं हो पाए थे। वे बस आस्तिक के लिए जी रही थीं। नेहा, आस्तिक को लेकर पुष्कर से अलग हो गई। पर शायद उनकी ज़िंदगी की तकलीफ़ें ख़त्म होना अभी बाकी थीं। मालिनी ने अपनी डिलीवरी के वक़्त जुड़वा बच्चों को जन्म दिया, लेकिन बच्चों के जन्म के दौरान वह गुज़र गई। जाने से पहले उसने सिर्फ़ नेहा के सामने ही मदद की उम्मीद की थी, क्योंकि पुष्कर से तो उसे कोई उम्मीद थी ही नहीं। वह जानती थी कि पुष्कर जितना क्रूर और कठोर दिल का इंसान है, नेहा उतनी ही कोमल दिल और सच्ची इंसान है। इसलिए उसने अपनी दोस्त को दोस्ती का वादा देकर अपने बच्चों की परवरिश की ज़िम्मेदारी दी। मालिनी के गुज़रने के बाद नेहा का दिल पिघल गया। उन मासूम बच्चों की इसमें कोई गलती नहीं थी। मालिनी ने एक बेटा और एक बेटी को जन्म दिया था और उनकी ज़िम्मेदारी नेहा पर डालकर चली गई थी। एक औरत होने के नाते नेहा शायद मुँह फेर लेती, लेकिन एक माँ होने के नाते वह इन मासूमों को अनदेखा नहीं कर पाई। इसके बाद नेहा ने पुष्कर के सामने एक शर्त रखी कि वह उनके पास वापस आ जाएगी और उनकी सभी शर्तों के हिसाब से ज़िंदगी जिएगी, लेकिन दुनिया के सामने मालिनी के बच्चों को अपनाना होगा। पुष्कर ने यह शर्त मान ली और नेहा उनके पास वापस आ गई। वह आस्तिक के साथ मालिनी के बच्चों को भी लेकर आई। पुष्कर ने दुनिया के सामने मालिनी के बच्चों को अपना नाम दिया, क्योंकि वह नेहा के साथ अपने रिश्ते ख़राब नहीं करना चाहता था। और तब तो बिल्कुल भी नहीं, जब पुष्कर का अंडरवर्ल्ड में नाम बनता जा रहा था। हालाँकि, नेहा ने मालिनी के बच्चों की परवरिश में कोई कमी नहीं रखी। जैसे-जैसे आस्तिक की परवरिश हुई, बिल्कुल उसी तरीके से मालिनी के बेटे चेतन और बेटी बेला की परवरिश भी हुई। नेहा ने उन दोनों को वही प्यार दिया जो आस्तिक को देती आई थीं। हालाँकि, चेतन और बेला अच्छी तरह जानते थे कि वे पुष्कर की नाजायज़ औलाद हैं। पुष्कर ने भले ही दुनिया के सामने उन्हें अपना लिया था, लेकिन घर के अंदर वह उन दोनों को एक आँख नहीं सुहाते थे। उनके लिए बस आस्तिक ही उनका बेटा था और आगे चलकर अंडरवर्ल्ड का अगला डॉन भी वही बनेगा, जिसकी नींव आस्तिक ने अपने दम पर रखनी शुरू कर दी थी।

  • 5. boring Arunima se Azadi

    Words: 1750

    Estimated Reading Time: 11 min

    भाभी, कंग्रॅजुलेशंस... अरुणिमा ने यह आवाज़ सुनकर चौंककर पीछे देखा। उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई। यह आस्तिक की कज़िन और दूर के रिश्ते में उसकी बहन थी। इसका नाम आभा था। फिलहाल नेहा जी के बाद आभा ही थी, जिससे अरुणिमा थोड़ा हँसकर बात करती थी। कुशल, पहले आभा के माता-पिता गुज़र गए थे, इसीलिए नेहा जी ने उसे अपने साथ घर ले आई थीं। अब वैसे तो आभा सेल्फ-इंडिपेंडेंट लड़की थी, वह आस्तिक की कंपनी में ही इंटर्नशिप कर रही थी और फिलहाल अपने दोस्तों के साथ पीजी में रहती थी। आभा और आस्तिक ने उसे घर आकर रहने के लिए कहा था, लेकिन आभा का कहना था कि पीजी में रहना ऑफिस के नज़दीक पड़ता है। आस्तिक और अरुणिमा की शादी में जिसने सबसे ज़्यादा खुलकर इंजॉय किया और अपने भाई की बारात में सबसे आगे बढ़कर डांस किया था, वह आभा ही थी। आभा को अपने सामने देखकर अरुणिमा खुश हो गई और मुस्कुराते हुए कहती है, "आभा, कहाँ रह गई थी तुम? अब आ रही हो? तुम्हें पता है, मैं तुम्हें कितना मिस कर रही थी। तुम तो मुझसे मिलने घर भी नहीं आती हो।" आभा, अरुणिमा का हाथ पकड़कर उसे साइड टेबल पर ले जाती है और कहती है, "अरे सॉरी भाभी। आप तो जानती हैं ना, भाई के ऑफिस में मेरी इंटर्नशिप चल रही है। भाई वैसे खाने के लिए बहुत अच्छे हैं, लेकिन वे थोड़े से स्ट्रिक्ट और खड़ूस हैं। अपने भाई की बहन होने के नाते मैं उनका दिल तो रख सकती हूँ, लेकिन उनकी कंपनी की एम्प्लॉई होने के नाते मुझे अपना काम टाइम पर करना ही होता है। इसलिए मैं घर पर नहीं रहती हूँ और पीजी में शिफ्ट हो गई हूँ। रही बात आपसे मिलने के लिए घर आने की, तो फ़िक्र क्यों कर रही हैं? बस कुछ महीने और, फिर मेरी इंटर्नशिप खत्म हो जाएगी। उसके बाद मैं एक लंबी छुट्टी पर आऊँगी। फिर देखना, खूब सेवा करवाऊँगी आपसे। फ़ुल नखरे देखेंगे आप अपनी छोटी ननद के।" खिलखिलाकर हँसते हुए आभा कहती है। अरुणिमा के चेहरे पर भी मुस्कान आ जाती है। उसने एक नज़र बेला को देखा, जो मर्दों के बीच शो-ऑफ करती हुई नज़र आ रही थी। उसने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, "तुम्हारे नखरे तो फिर भी मैं उठा सकती हूँ। अच्छा है कि तुम्हारी जगह बेला नहीं है, वरना उसके नखरे और हॉरर एटीट्यूड मेरे बस के नहीं हैं।" बेला के रवैये से तो पूरा घर वाकिफ था। आभा ने एक नज़र बेला पर डाली और फिर अरुणिमा से पूछा, "क्या सीन चल रहा है?" अरुणिमा हल्की मुस्कान के साथ बोली, "कोई सीन नहीं है। बस बेला ने तुम्हारे भाई को अभी-अभी उनकी शादी की सालगिरह की मुबारकबाद दी है।" "बस? भाई को शादी की सालगिरह तो आपकी भी है ना? उसने आपको कंग्रॅजुलेशन नहीं कहा?" आभा हैरानी से पूछती है। अरुणिमा कंधे उचकाते हुए बोली, "पता नहीं। शायद उसके लिए सिर्फ़ तुम्हारे भाई की सालगिरह है। बाकी तुम खुद जाकर पूछ लो।" आभा गुस्से में उठती है और अपने हाथ की एक उंगली अपनी नाक पर रगड़ते हुए कहती है, "अभी पूछती हूँ। क्या पार्टी में बस भाई अपनी एनिवर्सरी सेलिब्रेट कर रहे हैं?" यह कहते हुए आभा पैर पटकते हुए चली जाती है। अरुणिमा मुस्कुराते हुए उसे देखती रह जाती है। वैसे, अरुणिमा को इस पार्टी में किसी से कोई मतलब नहीं था। वह आस्तिक और उसके परिवार को बहुत मुश्किल से जानती थी। यहाँ वह चेहरों को भी ठीक से नहीं पहचानती थी। शादी के बाद जिनसे उसने मुलाकात की थी, वही लोग उसके लिए परिचित थे। बाकी लोग उसे पूरी तरह अनजाने लग रहे थे। इतने दिखावटी चेहरों के बीच अरुणिमा वैसे भी अनकंफर्टेबल महसूस कर रही थी। उसने टेबल से एक ऑरेंज जूस का ग्लास लिया और पीने लगी। उसे पार्टी में घूमने-फिरने या लोगों से मेल-जोल बढ़ाने का कोई शौक नहीं था। आभा को नेहा जी ने रास्ते में रोक लिया और अपने एक दोस्त के बेटे से मिलवाने के लिए अपने साथ ले गईं। आभा इन्हीं सब चक्करों की वजह से घर नहीं आती थी। आस्तिक अपनी एक बिज़नेस पार्टनर के साथ खड़ा था, उसके हाथ में ड्रिंक का ग्लास था। उसका बिज़नेस पार्टनर वहाँ से चला गया, और आस्तिक भी जाने ही वाला था कि उसके सामने बेला आ गई। वह अपनी चैंपेन का ग्लास उसके सामने हिलाते हुए बोली, "कंग्रॅजुलेशंस भाई! आपने अपनी जीत की तरफ़ एक और कदम बढ़ा लिया है।" आस्तिक ने मुस्कुराते हुए उसके ग्लास से अपना ग्लास टकराया और कहा, "थैंक्स सिस्टर। वैसे कंग्रॅजुलेशंस तुम्हें भी। आखिर इन सब में तुम्हारा भी तो फ़ायदा है।" एक जहरीली नागिन और एक रंग बदलने वाला भेड़िया—दोनों भाई-बहन एक-दूसरे को बराबर की टक्कर दे रहे थे। दोनों के चेहरे पर शातिर मुस्कान और मक्कारी झलक रही थी। तभी उनका ध्यान पुष्कर जी की तरफ़ गया, जो अपने माफ़िया के ग्रुप के साथ बात कर रहे थे। बेला ने अपने ड्रिंक का ग्लास हवा में घुमाते हुए कहा, "वैसे सुनने में आया है, डैड आज अपनी रिटायरमेंट अनाउंस करने वाले हैं। शायद आज ही वे अपनी कुर्सी आपको सौंप देंगे।" आस्तिक ने अपना ड्रिंक उठाया ही था कि उसके हाथ रुक गए। वह हैरानी से बेला की तरफ़ देखते हुए बोला, "क्या? यह तुम क्या कह रही हो? तुम्हें कैसे पता कि डैड आज अपनी रिटायरमेंट अनाउंस करने वाले हैं और वे अंडरवर्ल्ड की अपनी पोस्ट छोड़ देंगे?" बेला हँसते हुए बोली, "सीरियसली भाई? आपको लगता है कि इतने लोगों की बातें सुनने के बाद और इतनी तीखी निगाहों का सामना करने के बावजूद मैं यहाँ टिक सकती हूँ, तो क्या इतनी सी बात नहीं जान सकती? आपको क्या लगता है, आपकी और आपकी नाम की बीवी की एनिवर्सरी की पार्टी यहाँ क्यों रखी गई है? फ़ार्महाउस में क्यों नहीं? क्योंकि डैड आज अपनी रिटायरमेंट अनाउंस करेंगे। देख रहे हैं वह माफ़िया टेबल? वहाँ रखी फ़ाइल उनकी रिटायरमेंट की फ़ाइल है। सातों पोज़िशन्स के लिए अलग-अलग फ़ाइल्स तैयार हैं, ताकि वे आपको आपकी पोज़िशन सौंप सकें। और एक बार आपको वह मिल गया, तो आप चाहें तो अपनी बोरिंग बीवी से भी आज़ाद हो सकते हैं।" बेला की बात सुनकर आस्तिक के चेहरे पर एक डेविल स्माइल आ जाती है और उसकी नज़रें सिर्फ़ पुष्कर जी की तरफ़ ही थीं। अपने गिलास को खुशी-खुशी पीने के बाद आस्तिक उसे टेबल पर रखता है और खुश होते हुए बेला को देखकर कहता है, "बेला, अगर यह सच हुआ ना तो आज की रात यह शादी की सालगिरह और उस गँवार अरुणिमा के साथ रिश्ते की आखिरी रात होगी। मैंने तो शादी के बाद ही डाइवोर्स पेपर्स बनवा लिए थे, बस सही वक़्त का इंतज़ार है। एक बार मुझे वह पोज़िशन मिल जाए जो मेरी है, उसके बाद सबसे पहले अरुणिमा को अपनी ज़िंदगी से बाहर करूँगा।" बेला के चेहरे पर भी एक धूर्त मुस्कान थी। उसने अपनी एक आँख बड़ी करते हुए अपने भाई को इशारों में कुछ समझाने की कोशिश की। आस्तिक खुश होकर बेला के कंधे पर थपकी देते हुए बोला, "तुम फ़िक्र मत करो, मुझे मेरा वादा अच्छी तरह याद है। तुम्हारे हिस्से की प्रॉपर्टी और लंदन में तुम्हारा अपना फ़ैशन हाउस।" आस्तिक की बात सुनकर बेला के चेहरे पर भी जहरीली मुस्कान आ गई। उसने हाँ में सिर हिलाया, और दोनों भाई-बहन अपने-अपने ड्रिंक के साथ पुष्कर जी की तरफ़ देखने लगे, जो माफ़िया संगठन के साथ किसी गहन चर्चा में व्यस्त थे। हमेशा की तरह, अरुणिमा कुर्सी पर आराम से बैठी हुई थी। यह पार्टी उसे बोर कर रही थी। तभी उसका फ़ोन वाइब्रेट होता है। उसने देखा, उसकी माँ का मैसेज आया है, जिसमें उन्होंने शादी की सालगिरह की मुबारकबाद दी थी। अरुणिमा ने गहरी साँस लेते हुए सोचा, माँ ने रात में मैसेज क्यों किया? फ़ोन क्यों नहीं किया? कभी-कभी तो उसे ऐसा लगता है कि शादी के बाद उसके माता-पिता उससे दूर हो गए हैं। शादी के बाद उनकी ज़िम्मेदारियाँ तो ख़त्म हो गईं, लेकिन अरुणिमा को एहसास था कि उसके माता-पिता ने उसके लिए बहुत कुछ किया है। अपनी माँ के मैसेज का "थैंक यू" रिप्लाई करते हुए अरुणिमा ने फ़ोन टेबल पर रख दिया। "तुम्हारे हसबैंड ने तुम्हें फिर से अकेला छोड़ दिया... वेरी बैड।" यह आवाज़ सुनकर अरुणिमा चौंक गई। उसने चेहरा उठाकर देखा तो सामने चेतन खड़ा था। वह अरुणिमा के पास वाली कुर्सी खींचकर उसके बगल में बैठ गया। उसने मुस्कुराते हुए अरुणिमा की तरफ़ देखा, लेकिन अरुणिमा को उसे देखकर केवल झुंझलाहट हो रही थी। वह खुद को शांत रखते हुए कोई प्रतिक्रिया न देने का मन बनाती है और वहाँ से जाने का विचार करती है। "तुम्हारे पति तुम्हें हर बार अकेला छोड़कर चला जाता है, सही कहूँ तो देखो, यह पार्टी तुम्हारे नाम की है और तुम यहाँ अकेली बैठी हुई हो," चेतन ने कहा। उसके मुँह से शराब की बदबू आ रही थी, जिसे अरुणिमा ने चेहरा दूसरी तरफ़ घुमाते हुए कहा, "तुमने पी रखी है।" चेतन हँसने लगा और बोला, "नहीं, बस मेरे भाई की सालगिरह की खुशी में दो-तीन शॉट टकीला लिया है। वैसे मुझे शराब की आदत है। जैसे तुम्हारे पति के ऊपर इसका असर नहीं होता, वैसे ही मुझ पर भी नहीं होता।" अरुणिमा वहाँ से खड़ी हो गई और अपना बैग लेते हुए बोली, "पार्टी अभी बाकी है, जाकर और पी सकते हो। क्योंकि ना तो मुझे मेरे पति के पीने से कोई प्रॉब्लम है और ना तुम्हारे पीने से।" इतना कहकर वह वहाँ से जाने लगी, तभी चेतन ने उसकी कलाई पकड़ ली। अरुणिमा की आँखें गुस्से से लाल हो गईं और उसने चेतन को घूरते हुए देखा। चेतन तिरछी मुस्कान के साथ बोला, "इतनी भी क्या जल्दी है जाने की? अभी तो हमने बात शुरू ही की है।" अरुणिमा ने उसकी पकड़ से अपनी कलाई छुड़ाने की कोशिश की और गुस्से में बोली, "चेतन, हाथ छोड़ो मेरा। मैं यहाँ कोई तमाशा नहीं करना चाहती।" अरुणिमा का लहजा भले ही शांत था, लेकिन उसमें चेतावनी थी। चेतन उसकी बात को नज़रअंदाज़ करता हुआ उसकी कलाई और कसकर पकड़ने लगा। तभी एक बड़ा और मज़बूत हाथ चेतन की कलाई पर आया और एक झटके में अरुणिमा की कलाई को छुड़ा दिया। अरुणिमा की नज़र जब उस हाथ पर पड़ी तो उसने तुरंत पहचान लिया। उस हाथ की हथेली पर एक लाल दिल बना हुआ था, जिसमें खूबसूरती से "A" लिखा हुआ था। उसे पहचानने में देर नहीं लगी कि यह हाथ आस्तिक का है। आस्तिक उनके बीच में आकर खड़ा हो गया और चेतन को गुस्से भरी नज़रों से देखते हुए कहा, "हाउ डेयर यू? हिम्मत कैसे हुई मेरी बीवी को हाथ लगाने की?" आस्तिक की यह बात सुनकर अरुणिमा हैरान हो गई और उसे देखकर सन्न रह गई।

  • 6. Main Koi p********* Nahin hun

    Words: 1946

    Estimated Reading Time: 12 min

    "हाउ डू यू टच माय वाइफ?" आस्तिक गुस्से में चेतन की ओर देखते हुए कहा। उसकी गुस्से से भरी आवाज़ सुनकर चेतन एक पल के लिए घबरा गया, किंतु अरुणिमा की आँखें एकदम बड़ी हो गई थीं। आस्तिक को उसे अपनी पत्नी कहते सुनकर वह चौंक गई। आज तक आस्तिक ने उससे सीधे मुँह बात तक नहीं की थी और न ही उसे कभी अपनी पत्नी के तौर पर माना था।


    आस्तिक की बात सुनकर चेतन के चेहरे पर एक मजाकिया मुस्कान आ गई। उसने ताना देते हुए कहा, "कम ऑन भाई, मेरे सामने नाटक करने की जरूरत नहीं है। मुझे अच्छी तरह पता है कि तुम और अरुणिमा एक-दूसरे के साथ जबरदस्ती के रिश्ते में बंधे हो। लोगों के सामने तुम दोनों अच्छे पति-पत्नी का दिखावा कर सकते हो, लेकिन बंद दरवाजों के पीछे तुम दोनों ऐसे रहते हो जैसे एक-दूसरे को जानते भी नहीं हो। वैसे, मैं शर्त लगा सकता हूँ कि तुमने आज तक अरुणिमा को छुआ भी नहीं होगा। जब तुम्हारी शादी ऐसी हालत में है, तो तुम यहाँ उसकी हिफाज़त करने का नाटक क्यों कर रहे हो?"


    चेतन की बात सुनकर अरुणिमा की आँखें और बड़ी हो गईं। वह घबराते हुए आस्तिक और चेतन को देखने लगी। अगर चेतन को उनके रिश्ते के बारे में पता है, तो इसका मतलब कहीं पूरे परिवार को तो नहीं पता चल गया? अगर ऐसा हुआ भी तो इसमें कोई हैरानी की बात नहीं होगी, क्योंकि चेतन को अगर पता चल सकता है तो किसी को भी पता चल सकता है। अरुणिमा ने आस्तिक की ओर देखा, लेकिन उसके चेहरे पर कोई भी भाव नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे चेतन की बातों की उसे कोई परवाह ही नहीं थी।


    आस्तिक ने एक मजाकिया मुस्कान के साथ चेतन की ओर देखा और हँसते हुए कहा, "तो तुम मेरी शादी पर शर्त लगा रहे हो? ठीक है, अगर बात ऐसी है तो मैं भी तुम्हारे साथ एक शर्त लगाता हूँ। अगर तुम्हें मेरी पत्नी के साथ अकेले में कुछ करने का मौका भी मिल जाए, तो तुम उसके साथ कुछ नहीं कर सकते। और क्यों नहीं कर सकते, यह बात सिर्फ़ हम दोनों जानते हैं। क्या तुम चाहते हो कि मैं यह बात सबके सामने ला दूँ? और अगर ऐसा हुआ तो तुम्हारी क्या इज़्ज़त रहेगी?"


    आस्तिक की बात सुनकर चेतन का चेहरा गुस्से में सख्त हो गया। लेकिन आस्तिक ने उसकी कॉलर ठीक करते हुए कहा, "मेरे और मेरी पत्नी के बीच क्या रिश्ता है, यह हमारा निजी मामला है। तुम्हें इसमें पड़ने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन तुम्हारा और तुम्हारी गर्लफ्रेंड का रिश्ता क्या कहलाता है? शुक्र करो वह लड़की आज तक तुम्हारे साथ है और वह भी सिर्फ़ तुम्हारे पैसों की वजह से। वरना उसे जो चीज़ तुमसे मिलनी चाहिए थी, वह लेने के लिए मेरे पास नहीं आती।"


    चेतन की मुट्ठियाँ गुस्से में कस गईं और वह कुछ कहने के लिए अपना हाथ उठाने ही वाला था कि आस्तिक ने उसकी उंगली पकड़कर स्टाइल से नीचे कर दी। उसने कहा, "पर डोंट वरी, मैंने तुम्हारी गर्लफ्रेंड की तरफ़ देखा भी नहीं। वह क्या है ना, आस्तिक रायचंद के पास आने के लिए भी लोगों की औक़ात मैटर करती है। और तुम्हारी गर्लफ्रेंड की इतनी हैसियत नहीं कि वह मेरे डस्टबिन के पास भी खड़ी हो सके, तो मेरे बिस्तर तक आना तो बहुत दूर की बात है।"


    आस्तिक के चेहरे की डेविल स्माइल और गहरी हो गई। वह धीरे से चेतन के कान के पास जाकर फुसफुसाते हुए ख़तरनाक आवाज़ में बोला, "वैसे अगर तुम कहो, तो मैं तुम्हारी गर्लफ्रेंड की ख़्वाहिश पूरी कर सकता हूँ। लेकिन सिर्फ़ एक बार। वह क्या है ना, मेरे घर का डस्टबिन भी हर रोज़ बदलता है। तो गंदगी को बार-बार इस्तेमाल करना मेरा स्टैंडर्ड नहीं है। और मैं अच्छी तरह समझ सकता हूँ कि तुम्हारी गर्लफ्रेंड तुम्हारे साथ होते हुए भी क्यों दूसरों के पास अपनी संतुष्टि ढूँढ़ने जाती है।"


    आस्तिक के हर शब्द से चेतन का सब्र जवाब दे रहा था। उसने गुस्से में आस्तिक को देखते हुए कहा, "अपनी बकवास बंद करो!"


    आस्तिक ने ठंडे लहजे में कहा, "अगर तुम चाहते हो कि मैं यह बकवास दुनिया के सामने न कहूँ, तो आज के बाद मेरी पत्नी के आसपास भी मत दिखना।" इतना कहकर आस्तिक ने अरुणिमा का हाथ कसकर पकड़ा और उसे खींचते हुए पार्टी हॉल के एक कोने में ले गया, जहाँ थोड़ी अँधेरी जगह थी और लोगों की नज़र वहाँ पहुँचना मुश्किल था।


    आस्तिक ने अरुणिमा की कलाई इतनी जोर से पकड़ ली थी कि उसकी कलाई में दर्द होने लगा। उसने दर्द में आस्तिक से रुकने के लिए कहा, लेकिन आस्तिक को इसकी जरा भी परवाह नहीं थी। वह अरुणिमा को खींचता हुआ गैलरी के कोने पर ले गया और दीवार से लगाकर उसकी कलाई छोड़ दी। अरुणिमा ने राहत की साँस ली, लेकिन उसकी कलाई बुरी तरह लाल पड़ गई थी और दर्द से कराह रही थी। आस्तिक गुस्से में उसे घूरते हुए बोला:


    "तुम क्या कर रही थी उसके साथ?"


    आस्तिक के गुस्से से चिल्लाने पर अरुणिमा की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह नज़र उठाकर उसे देख सके। उसने कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन आस्तिक ने फिर चिल्लाकर कहा:


    "मेरी बात कान खोलकर सुन लो, अरुणिमा। मुझे इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि शादी से पहले या बाद में तुम कितनों के साथ सोई हो। लेकिन ख़बरदार, जो तुमने मुझे बदनाम करने की कोशिश की। तुम्हारी बेवकूफ़ी भरी हरकतों की वजह से मैं अपनी इज़्ज़त पर दाग नहीं लगने दूँगा, समझी तुम?"


    आस्तिक की बातों ने अरुणिमा को पूरी तरह दंग कर दिया। वह हैरानी से उसे देखते हुए बोली:


    "नहीं, आप गलत समझ रहे हो..."


    लेकिन आस्तिक ने उसकी बात काटते हुए और चेतन को लेकर अपनी गलतफ़हमियों पर गुस्सा निकालते हुए कहा:


    "सुनो, अरुणिमा। मैंने कहा ना, मुझे फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम कितने मर्दों के साथ हो। लेकिन दुनिया की नज़रों में तुम मेरी पत्नी हो, और मैं अपनी फैमिली को इस रिश्ते की सच्चाई का पता नहीं चलने दूँगा। आज रात बहुत कुछ बदलने वाला है। डैड अपनी माफ़िया और अंडरवर्ल्ड की सारी ज़िम्मेदारियाँ छोड़ने वाले हैं और उनकी जगह मैं लूँगा। जब तक मुझे वह पोज़िशन नहीं मिल जाती, मैं तुम्हें कुछ भी ख़राब करने नहीं दूँगा।"


    आस्तिक ने गुस्से में अरुणिमा की बाजू पकड़ ली और उसकी आँखों में नफ़रत से देखते हुए कहा। उसकी हर बात से अरुणिमा इतनी तड़प उठी कि उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े। आस्तिक ने जब उसके लाल पड़े चेहरे को देखा, तो धीरे से उसकी बाजू छोड़ दी। उसकी आँखों और चेहरे पर अरुणिमा के लिए नफ़रत साफ़ नज़र आ रही थी।


    तभी किसी लड़के की आवाज़ आई:


    "आस्तिक, तू यहाँ है क्या?"


    जैसे ही आस्तिक ने उस तरफ़ देखा, अरुणिमा ने तुरंत अपना चेहरा दूसरी तरफ़ घुमा लिया और अपने आँसू पोछने लगी। यह आवाज़ उनके पुराने दोस्त विक्रम खंडेलवाल की थी।


    विक्रम भी उतना ही हैंडसम और आकर्षक था, लेकिन वह खुद को दुनिया के सामने शो ऑफ़ नहीं करता था। उसकी दुनिया उसकी माँ के इर्द-गिर्द घूमती थी। विक्रम और आस्तिक बचपन के दोस्त थे। लेकिन स्कूल के बाद, आस्तिक अपनी पढ़ाई के लिए विदेश चला गया, जबकि विक्रम इंडिया में रहकर अपना बिज़नेस संभाल रहा था।


    आस्तिक जितना एगोइस्ट और सेल्फ़-ऑबसेस्ड है, विक्रम उतना ही जॉली नेचर का, लविंग और केयरिंग है। ये दोनों एक-दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त हैं। इसके अलावा उनमें और कुछ भी सामान्य नहीं है। दोनों अपनी पर्सनल और प्रोफ़ेशनल लाइफ़ अलग-अलग रखते हैं और उनकी दोस्ती वाली लाइफ़ तो बिल्कुल अलग चलती है। ये दोनों कभी अपनी पर्सनल लाइफ़ एक-दूसरे के साथ डिस्कस नहीं करते और न ही कभी दूसरे को अपनी लाइफ़ में इंटरफ़ेयर करने देते हैं।


    "आस्तिक, तुम हो क्या वहाँ पर?"


    विक्रम की आवाज़ से आस्तिक सतर्क हो जाता है। उसने अरुणिमा को छोड़ दिया और तुरंत अपने चेहरे के एक्सप्रेशन बदल लिए। अरुणिमा ने भी जल्दी से अपना चेहरा दूसरी तरफ़ घुमा लिया ताकि उसके आँसू कोई देख न सके। विक्रम वहाँ आ पहुँचा और आस्तिक को देख मुस्कुराते हुए मजाकिया अंदाज़ में बोला:


    "सॉरी, मैंने कुछ नहीं देखा। तुम लोग कंटिन्यू करो। सॉरी, अगर मैंने तुम्हारा रोमांस ख़राब किया हो।"


    विक्रम को गलतफ़हमी हो गई थी कि आस्तिक और अरुणिमा वहाँ रोमांस कर रहे हैं। लेकिन आस्तिक ने उसकी गलतफ़हमी दूर नहीं की। उसने मुस्कुराते हुए कहा:


    "अब जब तूने कबाब में हड्डी का काम कर ही दिया है, तो सॉरी बोलकर मेरा मूड और ख़राब मत कर। वैसे भी पार्टी में तू लेट आया है, और मेरा रोमांस ख़राब किया, वह अलग।"


    विक्रम हँसते हुए बोला:


    "क्या करूँ यार, यहाँ का ट्रैफ़िक तो तुम जानते ही हो। जितनी शिद्दत से यहाँ पहुँचने की कोशिश की, कायनात ने उतनी ही रुकावटें डाल दीं।"


    आस्तिक ने कहा:


    "चल-चल, बहुत हो गई तेरी नौटंकी। जाकर मेरे लिए एक ड्रिंक बना, मैं 10 मिनट में आता हूँ।"


    "ओके, बॉस!" विक्रम यह कहते हुए वहाँ से चला गया।


    विक्रम के जाने के बाद, आस्तिक का गुस्सा फिर से बढ़ गया। उसने अरुणिमा की ओर गुस्से से देखते हुए कहा:


    "मेरे रूम में जाकर खुद को ठीक करो और फिर पार्टी में वापस आओ।"


    यह कहकर आस्तिक वहाँ से चला गया। लेकिन जाते हुए उसने धीरे से खुद से कहा:


    "पता नहीं, गँवार से मेरी शादी करवाती है..."


    भले ही आस्तिक ने ये शब्द बहुत धीमे कहे थे, लेकिन अरुणिमा ने सुन लिया। उसका सब्र जवाब दे गया। उसने धीमी लेकिन दर्द भरी आवाज़ में कहा,


    "मैं कोई प्रॉस्टिट्यूट नहीं हूँ।"


    अरुणिमा के ये शब्द सुनकर आस्तिक के क़दम रुक गए।


    उधर पार्टी में, विक्रम बार काउंटर पर पहुँचता है और बारटेंडर से ड्रिंक बनाने के लिए कहता है:


    "दो ड्रिंक बनाना।"


    विक्रम यह कहते हुए वहाँ रखे ऊँचे से स्टूल पर बैठ जाता है। बारटेंडर उसकी ओर देखकर बोला:


    "जी सर, कौन सी बनाऊँ?"


    "रॉक ऑन द स्कॉच।"


    यह एक लड़की की आवाज़ थी। विक्रम चौंककर पीछे देखता है और देखता है कि बेला उसके सामने खड़ी थी। वह अपने चेहरे पर एक आकर्षक मुस्कान लिए हुए विक्रम के पास आती है और उसके सामने वाले स्टूल पर स्टाइल से बैठ जाती है। अपने पैर को दूसरे पैर के ऊपर रखकर, वह विक्रम को प्यार से कहती है:


    "तुम्हारी पसंद रॉक ऑन द स्कॉच है। मुझे पता है, तुम्हें यही ड्रिंक पसंद है।"


    विक्रम के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ जाती है। उसने सिर हिलाते हुए कहा:


    "हाँ, मुझे रॉक ऑन द स्कॉच पसंद है, लेकिन आज मेरा मन यह पीने का नहीं कर रहा।"


    इसके बाद विक्रम ने बारटेंडर की ओर देखते हुए कहा:


    "मेरे लिए व्हिस्की लाओ।"


    "ओके सर," यह कहते हुए बारटेंडर वहाँ से चला गया। बेला मुस्कुराते हुए विक्रम से कहती है:


    "कम ऑन, विक्रम। हम बचपन से एक-दूसरे को जानते हैं। तुम भाई के दोस्त हो, और भाई का दोस्त मेरा दोस्त।"


    विक्रम के चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कान थी, लेकिन उसने उसे छुपाते हुए बेला से कहा:


    "सही कहा तुमने, हम बचपन से एक-दूसरे को जानते हैं। लेकिन जानने और पहचानने में फ़र्क होता है, बेला। और जहाँ तक दोस्ती की बात है, तो मुझे जबरदस्ती की दोस्ती पसंद नहीं है। मैं अपने दोस्त खुद बनाता हूँ, और जिससे दोस्ती करता हूँ, वह इंसान मेरी दोस्ती के लायक होता है।"


    बेला के चेहरे की मुस्कान फ़ीकी पड़ गई। उसकी आँखें कठोर हो गईं। उसने विक्रम को घूरकर देखा, लेकिन विक्रम ने उसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया और पार्टी की ओर बढ़ गया।


    जैसे ही विक्रम ने पार्टी की ओर देखा, उसकी नज़र सीढ़ियों के पास मेहमानों के बच्चों के बीच बैठी आभा पर पड़ी। उसे देखकर विक्रम के चेहरे पर एक हँसी छूट गई। आभा कुछ बच्चों के साथ बैठी थी और उसके हाथों में खट्टा-मीठा बर्फ का गोला था। वह बच्चों के साथ कंपटीशन कर रही थी कि कौन पहले गोला ख़त्म करेगा।

  • 7. Sabko Intezar Hai Ek Sahi Waqt Ka

    Words: 1519

    Estimated Reading Time: 10 min

    आभा बच्चों के साथ चुस्की गोला का कंपटीशन कर रही थी। तभी एक लड़की गोला खत्म करके चिल्लाते हुए बोली, "दीदी, मैं तो जीत गई! देखो, मेरा गोला खत्म हो गया, लेकिन आपका अब भी बाकी है। आप हार गईं।" ऐसा कहते हुए बच्चे हँसने लगे। आभा ने गुस्से में अपनी बर्फ का टुकड़ा गिलास में फेंकते हुए कहा, "नहीं! तुमने चीटिंग की है। रुको, मैं अभी एक और गोला लेकर आती हूँ। हम फिर से कंपटीशन करेंगे और इस बार मैं तुम्हें हराकर ही रहूँगी।" ऐसा कहते हुए आभा ने अपने बर्फ के टुकड़े को अपने मुँह में रखा। उसके होंठ बाहर बतख की तरह निकल आए, और बिल्कुल किसिंग के स्टाइल में वह बर्फ को चूसते हुए पीछे पलटी। ठीक उसी समय, उसके नाक के ठीक सामने विक्रम खड़ा था, जो उसे देखकर मुस्कुरा रहा था। विक्रम को अपने सामने देखकर आभा एक पल के लिए चौंक गई। उसकी आँखें टिमटिमाने लगीं। वह बार-बार अपनी पलकें झपकाते हुए विक्रम को देख रही थी, लेकिन विक्रम की नज़र सिर्फ़ आभा के होंठों पर थी। जिस तरीके से उसने अपने होंठ निकाले हुए थे, कोई देखता तो ऐसा लगता जैसे वह किस की डिमांड कर रही हो। विक्रम के चेहरे पर एक मुस्कान आ गई। उसने धीरे से आभा के कान के पास झुकते हुए कहा, "मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है, पर लोगों को हो सकती है। वैसे, तुम चाहो तो हम कहीं अकेले में जाकर यह कर सकते हैं।" आभा के मुँह में जो बर्फ का टुकड़ा था, विक्रम की बात सुनकर वह अचानक से अटक गया और उसे खांसी आने लगी। वह विक्रम को हैरानी और गुस्से भरी नज़रों से देखते हुए बोली, "क्या बकवास कर रहे हो! दिमाग खराब हो गया है क्या तुम्हारा? एक तो मेरा गेम बिगाड़ दिया, ऊपर से यहाँ खड़े होकर भाषण दिए जा रहे हो। हटो मेरे रास्ते से।" तभी एक बच्ची आभा के पास आकर पूछी, "दीदी, यह कौन है?" आभा ने मुँह बनाते हुए विक्रम की ओर देखकर बोली, "कनखजूरा।" "क्या? मैं तुम्हें कनखजूरा नज़र आता हूँ?" विक्रम ने सख्त एक्सप्रेशन के साथ उसे देखते हुए पूछा। आभा ने अपने दोनों हाथ सामने बांधते हुए और जबरदस्ती मुस्कान के साथ सिर हिलाते हुए कहा, "और नहीं तो क्या? जो कानों में कुशर-फुशर करते हैं, उसे कनखजूरा ही कहते हैं।" विक्रम बस हैरानी से उसकी बात सुनता रहा गया। आभा उसके बगल से निकलकर चली गई। पर जाने से पहले उसने अपने बालों को हवा में स्टाइल में घुमाया और अपनी नाक पर एक उंगली रगड़ी। उसकी इस अदा पर विक्रम फ़िदा हो गया। विक्रम उसे बच्चों के साथ जाते हुए देखता है और मुस्कुराते हुए अपने मन में कहता है, "तुम अभी भी बिल्कुल वैसी ही हो। उम्र में भले ही बड़ी हो गई हो, लेकिन दिल अभी भी बच्चों जैसा ही है। तुम्हारी यही मासूमियत हर बार मुझे तुम्हारी तरफ़ खींचती है। तुम्हें पता नहीं आभा, मैं तुम्हें कब से पसंद करता हूँ। तुम्हारी मासूमियत, भोलापन और यह बचपना – यह सब मुझे तुम्हारी ओर खींचते हैं। लेकिन मैं खुद को रोककर रखा हुआ हूँ, क्योंकि तुम आस्तिक की बहन हो। मैं आस्तिक के साथ अपनी दोस्ती खराब नहीं करना चाहता। इसलिए सही वक्त का इंतजार कर रहा हूँ, जब मैं तुम्हारे सामने अपने दिल का हाल रख सकूँ।" विक्रम तो यहाँ अपने दिल में आभा के लिए फीलिंग्स सजाए बैठा था, वहीं दूसरी तरफ़ आभा इन सबसे बेखबर अपनी ही दुनिया में मस्त थी। लेकिन दोनों इस बात से अनजान थे कि पार्टी के एक कोने में किसी की तीखी निगाहें विक्रम पर टिकी हुई थीं। बेला इस समय बार काउंटर पर बैठी थी और उसके साथ उसकी दोस्त जूली थी। जूली ने विक्रम पर नज़र डालते हुए कहा, "हैंडसम है, लेकिन तेरी तरफ़ देखा भी नहीं।" "इसीलिए तो यह मुझे इतना पसंद है," बेला ने मुस्कुराते हुए कहा। "क्योंकि इसकी पसंद मैं नहीं हूँ। तुझे पता है, बचपन से मैंने विक्रम को ऐसे ही देखा है। वह हमेशा चीजों को चुनने में समय लगाता है। भाई के बाद अगर किसी में वह बात है जो मेरे टैंट्रम को बर्दाश्त कर सके, तो वह सिर्फ़ विक्रम खंडेलवाल है। यह बंदा जितना खुद को लोगों से दूर रखने की कोशिश करता है, उतना ही मेरी नज़र से नहीं बच सकता। एक दिन इसे मैं हासिल करके रहूँगी। बस मुझे सही वक्त का इंतज़ार है।" आभा अभी भी बच्चों के साथ थी और उसके हाथों में आइसक्रीम के कप थे। वह कप से आइसक्रीम खाते हुए सामने चल रही पार्टी को देख रही थी। लोगों के दिखावे भरे चेहरे और दुनिया उसे नापसंद थी। वह इस दुनिया का हिस्सा न कभी बनना चाहती थी और न ही बनना चाहती थी। लेकिन उसने अपनी माँ से वादा किया था कि वह कभी अपने परिवार से अलग नहीं होगी। बस उसी वादे को निभाने के लिए वह इस परिवार का हिस्सा बनी हुई थी। पर यहाँ सिर्फ़ उसकी भाभी से लगाव था, और किसी से नहीं। दूसरी तरफ़, पार्टी की गैलरी में जहाँ आस्तिक और अरुणिमा थे, आस्तिक वहाँ से जाने ही वाला था कि अरुणिमा ने धीरे से कहा, "मैं कोई प्रॉस्टिट्यूट नहीं हूँ।" आस्तिक के कदम वहीं रुक गए। उसने गहरी साँस ली और गुस्से में सख्त चेहरे के साथ अरुणिमा की तरफ़ देखा। वह उसकी आँखों में गुस्से से देखते हुए बोला, "मेरी एक बात ध्यान से सुन लो। दोबारा यह गलती मत करना। कभी भी मुझे पलटकर जवाब देने की हिम्मत मत करना। वरना तुम्हारी जुबान तुम्हारी हलक से खींचकर निकाल दूँगा। जब तुम्हें बोलने के लिए कहा जाए, तभी मुँह खोलना। वरना इसे बंद ही रखना, यह तुम्हारे लिए बेहतर होगा। मेरे सब्र का इम्तिहान मत लो, क्योंकि गुस्से में मैं किसी की भी जान ले सकता हूँ। और मुझे तुम्हें मारने का रत्ती भर भी अफ़सोस नहीं होगा।" अरुणिमा डरी हुई नज़रों से आस्तिक को देख रही थी। आस्तिक की निगाहें इस समय किसी बीस्ट से कम नहीं लग रही थीं। उसने धीरे से अरुणिमा की गर्दन पर हाथ रखकर उसे सहलाना शुरू किया। अरुणिमा ने डरते हुए आस्तिक की कलाई को देखा, कहीं वह सच में उसका गला न दबा दे। लेकिन वह बस उसके गले को अजीब तरीके से सहलाते हुए उसे धमका रहा था। इस वक़्त अरुणिमा की नज़र आस्तिक के हाथ पर बने उस टैटू पर गई। दिल के अंदर बना हुआ वह एक शब्द अरुणिमा को सोचने पर मजबूर कर रहा था। यह टैटू उसने शादी से पहले भी आस्तिक के हाथों पर देखा था। शादी की रस्मों के बीच भी उसकी नज़र इस पर पड़ी थी। क्या यह आस्तिक के नाम का अल्फ़ाबेट था या कुछ और? अरुणिमा हर बार इसे देखकर सोचने पर मजबूर हो जाती थी। अरुणिमा का दिल तेज़ी से धड़क रहा था क्योंकि आस्तिक के कठोर हाथ उसकी गर्दन पर घूम रहे थे। वह हाथ अरुणिमा को डराने में कामयाब हो रहे थे। कहीं अगले ही पल आस्तिक उसकी गर्दन मरोड़ न दे, यही सोचते हुए उसका पूरा शरीर एक अकड़न से झकड़ा हुआ था। आस्तिक अपने अंगूठे से उसकी गर्दन सहलाते हुए धीरे से बोला, "समझ में आया मैंने तुमसे क्या कहा, माय डियर वाइफ़?" अरुणिमा डर गई। उसके सामने इस दानव को देखकर वह जल्दी से सिर हिलाती है और अपना चेहरा नीचे कर लेती है। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन आस्तिक को जरा भी फ़र्क नहीं पड़ा। उसने अरुणिमा को छोड़ दिया और अपने दोनों हाथ पॉकेट में डालते हुए बोला, "फ़्रेश होकर पार्टी में वापस आओ।" ऐसा कहते हुए आस्तिक पार्टी की तरफ़ चला गया। अरुणिमा दौड़ते हुए ऊपर सीढ़ियों की तरफ़ चली गई, क्योंकि ऊपर उसका पुराना कमरा था। हालाँकि शादी के बाद वह यहाँ सिर्फ़ एक बार आई थी, लेकिन उसे कमरे का रास्ता याद था। वह दौड़ते हुए कमरे में गई, दरवाज़ा बंद किया और दरवाज़े से लगकर रोने लगी। अपने सीने पर हाथ रखकर रोते हुए वह जमीन पर बैठ गई। उसने अपने मुँह पर हाथ रख लिया ताकि उसकी दर्द भरी सिसकियाँ कमरे से बाहर न निकलें। "क्यों? क्यों? क्यों? आप लोगों ने मेरे साथ ऐसा किया? अगर आप लोगों को अपनी परवरिश का बदला लेना ही था, तो मेरी जान ले लेते। इस तरीके से एक शैतान के हाथों मेरी शादी करके आपने मेरी ज़िंदगी मौत से भी बदतर बना दी है। मैं न यहाँ जी पा रही हूँ, न मर पा रही हूँ। बस इंतज़ार कर रही हूँ एक सही वक़्त का, जब मौत मुझे अपनी आगोश में ले ले।" अरुणिमा अपने दर्द को अकेले बर्दाश्त कर रही थी। वहीं, पार्टी में घुसते ही आस्तिक की नज़र पुष्कर जी पर पड़ी, जो अपनी माफ़िया गैंग के साथ खड़े होकर कुछ बात कर रहे थे। उनका चेहरा काफ़ी सीरियस लग रहा था। आस्तिक के चेहरे पर एक दबी हुई मुस्कान आ गई। वह धीरे-धीरे उनके पास जाते हुए मन ही मन सोचता है, "बहुत कुछ खोया है मैंने इस एक चीज़ को पाने के लिए। और इतने करीब आकर मैं इसे अपने हाथ से जाने नहीं दूँगा। मुझे वह पावर चाहिए, जो मुझे इस दुनिया पर हुकूमत करने के काबिल बनाएगी। और उसके बाद सबसे पहले उस लड़की को अपनी ज़िंदगी से बाहर फेंकूँगा। लेकिन इन सबके लिए मुझे बस इंतज़ार करना होगा… एक सही वक़्त का।"

  • 8. aastik Se Kisi dusri aurat ki Khushbu Aati Hai

    Words: 1964

    Estimated Reading Time: 12 min

    आस्तिक और अरुणिमा की सालगिरह की पार्टी अपने चरम पर थी। सभी लोग खूब आनंद ले रहे थे, सिवाय पार्टी के मुख्य आकर्षण के। ना तो आस्तिक को पार्टी में कोई रूचि थी और ना ही अरुणिमा यहाँ रुकना चाहती थी। लेकिन दोनों जबरदस्ती यहाँ थे, सिर्फ़ दुनिया को दिखाने के लिए। आस्तिक की नज़र सिर्फ़ पुष्कर जी पर थी, जो आज रात अपनी माफ़िया की कुर्सी उसे सौंपने वाले थे। वह बस इंतज़ार कर रहा था कि कब पुष्कर जी इस बारे में घोषणा करेंगे। दूसरी ओर, अरुणिमा आस्तिक के कमरे में थी और खुद को तैयार कर रही थी। उसने शीशे में खुद को देखा और पाया कि वह बिल्कुल ठीक लग रही है, रायचंद खानदान की बहू की तरह। यह देखकर उसने राहत की साँस ली, लेकिन फिर भी उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह पार्टी में जाकर आस्तिक के सामने खड़ी हो सके। अरुणिमा अभी भी कमरे में ही थी और डरते हुए दरवाज़े को देख रही थी। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। उसकी साँसें थम गईं। कहीं आस्तिक तो नहीं? क्या उसकी इतनी देर की गैरहाज़िरी पर वह फिर से नाराज़ हो गया? यही सोचकर वह डरते हुए धीरे-धीरे दरवाज़े की ओर देखते हुए बोली, "कौन है?" "मैम, मिस्टर रायचंद। आपको पार्टी में बुलाया जा रहा है," बाहर से एक नौकर की आवाज़ आई। नौकर की आवाज़ सुनकर अरुणिमा और डर गई। उसने धीमे स्वर में कहा, "मिस्टर रायचंद? यहाँ तो बहुत सारे मिस्टर रायचंद हैं। तुम किसकी बात कर रहे हो? नाम बताओ।" नौकर ने जवाब दिया, "मैं आपके पति की बात कर रहा हूँ। वे आपको पार्टी में बुला रहे हैं। वहाँ एक महत्वपूर्ण घोषणा होने वाली है।" "ठीक है, तुम जाओ, मैं आ रही हूँ," अरुणिमा ने जवाब दिया। नौकर वहाँ से चला गया। अरुणिमा ने एक बार फिर खुद को आईने में देखा, गहरी साँस ली और एक टिशू पेपर से अपने चेहरे को हल्के से साफ़ किया। फिर उसने अपना बैग उठाया और कमरे से बाहर निकल गई। धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए वह वापस पार्टी में आई। इस समय आभा नेहा जी के साथ खड़ी थी। आभा ने मुस्कुराते हुए अरुणिमा को देखा और हाथ हिलाया। अरुणिमा ने भी मुस्कुराते हुए उसे सिर हिलाकर जवाब दिया। इसके बाद नेहा जी ने अरुणिमा से कहा, "जाओ, आस्तिक के पास खड़ी हो जाओ।" अरुणिमा ने जब आस्तिक को स्टेज के पास खड़ा देखा, तो उसका डर फिर से चेहरे पर झलकने लगा। वह धीमे-धीमे कदमों से आस्तिक की ओर बढ़ी। आस्तिक का ध्यान इस समय अरुणिमा पर नहीं था, बल्कि पुष्कर जी पर था। लेकिन तभी उसे पास में किसी स्त्री के इत्र की महक महसूस हुई। उसने पलटकर देखा और अपने सामने अरुणिमा को पाया। उसका चेहरा गुस्से में सख्त हो गया। उसने एक नज़र अरुणिमा को देखा और तुरंत ही चेहरा दूसरी तरफ़ घुमा लिया। अरुणिमा के वहाँ होने या ना होने से आस्तिक को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। उसे बस पुष्कर जी की घोषणा का इंतज़ार था। पुष्कर जी ने कहा कि जब तक पूरा परिवार एक साथ नहीं होगा, तब तक वह घोषणा नहीं करेंगे। इसलिए आस्तिक ने नौकर को भेजा था, ताकि अरुणिमा को वहाँ बुलाया जा सके। आस्तिक और अरुणिमा, पुष्कर जी के साथ स्टेज के पास खड़े थे। पुष्कर जी ने नेहा जी को इशारा करके अपने पास बुलाया। नेहा जी उनके पास आईं और उनके साथ आभा और बेला भी आईं। ना चाहते हुए भी चेतन को भी उनके साथ आकर खड़ा होना पड़ा, क्योंकि वह भी उनके परिवार का हिस्सा था। इन सबके बाद पुष्कर जी ने विक्रम की तरफ़ देखा, जो सामने खड़ा मुस्कुराकर उन्हें देख रहा था। पुष्कर जी ने अपने सख्त लहजे में कहा, "विक्रम, वैसे तो तुम सिर्फ़ आस्तिक के दोस्त हो, लेकिन हमने तुम्हें हमेशा अपना बेटा ही माना है। और तुम भी हमारे परिवार का हिस्सा हो।" ऐसा कहते हुए पुष्कर जी अपना हाथ विक्रम की तरफ़ बढ़ाते हैं। विक्रम मुस्कुराते हुए स्टेज पर आ जाता है और आस्तिक के साथ खड़ा हो जाता है। आस्तिक उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे अपने पास खड़ा कर लेता है। सबके चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन दो लोग ऐसे थे जिनके चेहरे पर झूठी मुस्कान थी। एक पारिवारिक फोटो लेने के बाद पुष्कर जी ने माइक अपने हाथों में लिया और सबको देखकर घोषणा की: "देवियो और सज्जनों, सबसे पहले तो आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद कि आप लोग हमारी इस छोटी सी खुशी में शामिल होने के लिए यहाँ आए हैं। आज मेरे बड़े बेटे आस्तिक रायचंद और हमारी बहू अरुणिमा की शादी की पहली सालगिरह है। वैसे तो मैंने सोचा नहीं था कि आस्तिक अपनी शादी अरुणिमा के साथ एक साल तक निभा भी लेगा। लेकिन जब उनकी शादी सफल रही है, तो इस खुशी में हमने यह पार्टी आयोजित की है। लेकिन आज की इस पार्टी का मकसद सिर्फ़ आस्तिक और अरुणिमा की सालगिरह मनाना नहीं है, बल्कि एक और ख़ास बात है, जो मैं आप सबके सामने रखना चाहता हूँ।" आस्तिक को अब तक के भाषण में कोई रूचि नहीं थी। हालाँकि बाकी लोग पुष्कर जी की बातों को बड़े ध्यान से सुन रहे थे। लेकिन आस्तिक को जिस चीज़ का इंतज़ार था, वह अब बस आने ही वाली थी। उसके चेहरे पर एक दुष्ट मुस्कान उभर आई और वह मुस्कुराते हुए पुष्कर जी की ओर देखने लगा। पुष्कर जी ने अपना हाथ आस्तिक की ओर बढ़ाया और कहा: "मेरा बड़ा बेटा आस्तिक रायचंद, जिसने मेरी कंपनी को एक नई ऊँचाई पर पहुँचाया है। इसकी सफलता के बारे में शायद मुझे आप लोगों को बताने की ज़रूरत नहीं है कि यह कितना अच्छा व्यवसायी है। लेकिन इसी के साथ, मैं आस्तिक को एक और बड़ी ज़िम्मेदारी देना चाहता हूँ, जो मेरे अवैध कामों से जुड़ी है।" आस्तिक की उत्सुकता बढ़ रही थी, और उसके चेहरे पर दुष्ट मुस्कान और गहरी हो गई थी। वहीं चेतन के चेहरे पर गुस्से से भरे भाव थे। लेकिन पुष्कर जी ने आस्तिक और अरुणिमा की ओर देखकर कहा: "आस्तिक, अरुणिमा... यहाँ आओ। मुझे आप दोनों के लिए कुछ ज़रूरी बातें घोषित करनी हैं।" आस्तिक ने घूमती हुई नज़रों से अरुणिमा को देखा। अरुणिमा सहम गई और अपना चेहरा झुकाते हुए जल्दी से पुष्कर जी के पास चली गई। पुष्कर जी ने उसे अपने पास खड़ा किया और आस्तिक दूसरी तरफ़ जाकर खड़ा हो गया। इसके बाद पुष्कर जी ने माइक पर घोषणा की: "यहाँ मौजूद बहुत सारे लोग जानते हैं कि मैं अंडरवर्ल्ड का नेता हूँ। और आगे चलकर माफ़िया और अंडरवर्ल्ड के कामों को मुझे अगली पीढ़ी को सौंपना ही होगा। मुझे पता है कि आस्तिक में वह काबिलियत है जो उसे एक अच्छा नेता बना सकती है। लेकिन कोई भी चीज़ सिर्फ़ काबिलियत के बलबूते पर नहीं मिलती, जैसे कि मुझे नहीं मिली थी। मैंने इस पद को पाने के लिए बहुत मेहनत की है, बहुत त्याग किए हैं। मैंने बहुत कुछ पाया है और बहुत कुछ खोया भी है। इसी तरह, मेरे बेटे ने भी बहुत कुछ खोया है। लेकिन अब वक़्त है इसे पाने का। तो आज की पार्टी में मैं आप सबके सामने यह घोषणा करता हूँ कि अगले एक साल में मैं माफ़िया की कुर्सी से सेवानिवृत्ति ले लूँगा। और मेरे बाद अंडरवर्ल्ड का अगला बादशाह बनेगा मेरा बेटा, आस्तिक रायचंद।" इसी के साथ पूरे माहौल में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज गई और सभी लोग इस घोषणा से बहुत खुश थे। अरुणिमा को कुछ खास फर्क नहीं पड़ा क्योंकि वह जानती थी कि वह अंडरवर्ल्ड के खानदान से जुड़ी हुई है। हालाँकि, उसके पिताजी वैधानिक कामों में शामिल थे, लेकिन यह परिवार तो पूरा का पूरा अंडरवर्ल्ड अपने अंदर समेटे हुए था। इसीलिए उसे इस घोषणा से कुछ फर्क नहीं पड़ रहा था। अगले एक साल में पुष्कर जी सेवानिवृत्ति लेने की बात कर रहे थे। इसका मतलब था कि अगले एक साल तक आस्तिक की अंडरवर्ल्ड और माफ़िया में रहने की ट्रेनिंग होगी। इस बात को भी साफ़ कर दिया गया था। जैसा कि घोषणा की खुशी आस्तिक को हो रही थी, वह छुपाए नहीं छुप रही थी। उसका चेहरा खुशी से खिल उठा था। उसे ऐसा देखकर पुष्कर जी और नेहा जी के चेहरे पर भी खुशी झलक रही थी। आभा भी मुस्कुरा रही थी और विक्रम भी अपने दोस्त के लिए खुश था। लेकिन पुष्कर जी की घोषणा अभी बाकी थी। उन्होंने कहा, "रुक जाइए! उत्सुकता अभी ख़त्म नहीं हुई है और ना ही यह पार्टी। एक और घोषणा है, जो मुझे आप सबके सामने करनी है। और वह यह है कि यह साम्राज्य किसी को यूँ ही नहीं मिलता। साम्राज्य के लिए उसके मालिक के साथ-साथ उसके उत्तराधिकारी का होना भी ज़रूरी है। मुझे माफ़िया की कुर्सी तभी मिली थी जब मेरे बाद इस गद्दी को संभालने के लिए मेरा उत्तराधिकारी इस दुनिया में आ चुका था। यानी मुझे यहाँ हुकूमत करने की इजाजत तभी मिली थी जब आस्तिक मेरी गोद में था। क्योंकि मेरे बाद मेरा बेटा इस गद्दी का उत्तराधिकारी बनेगा। इसलिए मैं आज यह घोषणा करता हूँ कि अगले एक साल बाद, मेरे बाद मेरी जगह मेरा बेटा आस्तिक तभी ले सकता है जब वह अंडरवर्ल्ड को उसका उत्तराधिकारी देगा। आस्तिक, अरुणिमा... तुम्हें अगले साल तक एक बच्चा करना होगा ताकि आगे चलकर वह माफ़िया का अगला राजा बन सके।" इस घोषणा के साथ ही पूरे माहौल में तालियाँ इतनी जोर से गूंजने लगीं कि वहाँ कोई और शोर सुनाई ही नहीं दे रहा था। लेकिन आस्तिक और अरुणिमा के चेहरे का रंग उड़ गया था। वे दोनों हैरानी से पुष्कर जी को देख रहे थे। उन्हें अगले साल तक एक बच्चा करना होगा? वे दोनों तो एक साथ एक छत के नीचे भी नहीं रहते हैं, बच्चा तो बहुत दूर की बात है। अरुणिमा के कदम लड़खड़ा गए और वह धीरे-धीरे पीछे हटने लगी। इस वक़्त उसे किसी चीज़ का होश नहीं था और ना ही किसी चीज़ की परवाह थी। कौन उसे देख रहा है, कौन उसके बारे में क्या सोच रहा है—यह सब अब उसके लिए कोई मायने नहीं रखता था। उसके दिमाग में सिर्फ़ यही बात चल रही थी कि पुष्कर जी ने उसे एक आदेश दिया है—अगले साल तक उसे आस्तिक के साथ एक बच्चा करना होगा। लेकिन यह उसके लिए बिल्कुल असंभव था। वह इस निर्दयी दुनिया में एक नन्हीं सी जान को नहीं लाएगी, और आस्तिक जैसे आदमी के साथ तो बिल्कुल भी नहीं। "आस्तिक बाप बनने के लायक ही नहीं है और ना ही वह एक अच्छा बाप बन सकता है," यह बात अरुणिमा ने शादी के बाद ही पहचान ली थी। वह जान चुकी थी कि आस्तिक की ज़िन्दगी में उसकी कोई अहमियत नहीं है। अगर आस्तिक को एक बच्चा चाहिए भी होगा, तो वह अरुणिमा से नहीं, किसी और से पैदा करेगा। क्योंकि अरुणिमा ने हमेशा आस्तिक के पास एक अजीब सी खुशबू महसूस की थी। एक औरत होने के नाते अरुणिमा इस बात का अंदाज़ा लगा चुकी थी कि आस्तिक की ज़िन्दगी में पहले से ही कोई और है। वह ना तो अरुणिमा के साथ उसके घर पर रहा, ना ही उसके कमरे में। उसने कभी अरुणिमा की ओर देखा भी नहीं, उसे हाथ लगाना तो बहुत दूर की बात है। जब भी आस्तिक घर आता और अरुणिमा से सामना होता, तो अरुणिमा को एक अलग सी खुशबू महसूस होती थी, जो किसी दूसरी औरत की थी। जिसके साथ वह अपने दूसरे घर में रहता है। धीरे-धीरे अरुणिमा पार्टी से निकलकर पीछे के बगीचे में चली गई। वह अपना दर्द किसी के सामने नहीं दिखाना चाहती थी। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे और पुष्कर जी के घोषणा से जो उसे तकलीफ़ हुई थी, वह इसका सामना किसी के सामने नहीं करना चाहती थी। आस्तिक ने जब अरुणिमा को अपने पास नहीं पाया, तो उसे कोई खास फर्क नहीं पड़ा। उसे बस इस बात से फर्क पड़ रहा था कि पुष्कर जी ने उसे एक हुक्म सुनाया है—अगले एक साल में उसे अरुणिमा के साथ बच्चा करना होगा।

  • 9. shaadi ka mukhauta

    Words: 2329

    Estimated Reading Time: 14 min

    पुष्कर जी ने अपनी घोषणा कर दी थी, पर उन्हें इसका अंदाजा नहीं था कि इस एक घोषणा से कितनी ज़िंदगियाँ उथल-पुथल में आ जाएँगी। अरुणिमा, अपने दर्द को बयाँ ना कर पाकर, पार्टी छोड़कर बाग़ में चली गई थी, जबकि आस्तिक को न तो अरुणिमा से, न ही वहाँ खड़े लोगों से कोई मतलब था। उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया था, और वह बेहद खतरनाक लग रहा था। उसकी निगाहें सिर्फ़ पुष्कर जी पर टिकी हुई थीं, जो अपने माफ़िया गिरोह के साथ खड़े होकर अपनी घोषणा को अमल में लाने में जुटे हुए थे। आस्तिक गुस्से में पुष्कर जी की ओर बढ़ा ही था कि किसी ने उसका हाथ पकड़ लिया। आस्तिक ने गुस्से से पीछे देखा तो उसने पाया कि जिस शख्स ने उसका हाथ पकड़ा था, वह उसे वहाँ खड़े लोगों के बीच से बाहर खींच रहा था। वह शख्स आस्तिक को सीधे लाइब्रेरी में ले गया और अंदर जाते ही दरवाज़ा बंद कर दिया। आस्तिक गुस्से में स्टडी टेबल के पास गया और वहाँ रखा सारा सामान ज़ोर से ज़मीन पर फेंक दिया। टेबल पर जो भी सामान था, वह अब बिखरा पड़ा था। आस्तिक अपने गुस्से पर काबू नहीं रख पा रहा था। उसे जो भी हाथ लग रहा था, वह सब कुछ तोड़ रहा था—फर्नीचर, शोपीस, यहाँ तक कि लैपटॉप को भी उसने इतनी बुरी तरह तोड़ा कि वह अब बेकार हो गया था। अगर उस वक्त पुष्कर जी उसके सामने होते, तो शायद अपने गुस्से में आस्तिक उन पर गोली भी चला देता। आस्तिक का सब्र जवाब दे चुका था। पर इससे पहले कि आस्तिक और ज़्यादा बेकाबू होता, जो शख्स उसे यहाँ लाया था, उसने आस्तिक की बाजू पकड़ी और उसे अपनी ओर खींच लिया। अगले ही पल आस्तिक के चेहरे पर एक जोरदार तमाचा लगा। आस्तिक का चेहरा दूसरी ओर झुक गया, पर उसकी आँखें अब भी गुस्से से लाल थीं। उसने अपना हाथ अपने गाल पर रखा और जलती हुई निगाहों से सामने देखकर चिल्लाया... "माँ..." आस्तिक के सामने नेहा जी खड़ी थीं, जिन्होंने उसे पार्टी से यहाँ लाया था। उन्होंने आस्तिक को पार्टी में ही देखा था कि वह गुस्से में पागल हो रहा है। इसलिए, स्थिति बिगड़ने से पहले ही उन्होंने आस्तिक को स्टडी रूम में ले आई थीं। नेहा जी ने गुस्से में आस्तिक की ओर उंगली दिखाते हुए कहा, "अपने गुस्से पर काबू रखो, आस्तिक। तुम्हारी एक बेवकूफी तुम्हें सब कुछ गँवा सकती है।" पर आस्तिक बेकाबू होते हुए चिल्लाया, "और मेरे पास बचा ही क्या है जो मुझसे छीना जा सके? पुष्कर रायचंद ने तो सब कुछ छीन लिया है। और क्या छीनना बाकी रह गया है? यहाँ तक आकर मैंने क्या हासिल किया है, बताइए!" "पुष्कर रायचंद का भरोसा हासिल किया है तुमने!" नेहा जी आस्तिक की बाजू पकड़कर उसे झकझोरते हुए बोलीं। आस्तिक ने अपनी जलती हुई निगाहों से नेहा जी को देखा, तो नेहा जी उससे भी ज़्यादा गुस्से में उसे घूरते हुए बोलीं, "हाँ, आस्तिक! इतने सालों से इस खेल का हिस्सा बनकर तुमने जो हासिल किया है, उसे भरोसा कहते हैं। पुष्कर रिटायर होना चाहते हैं, और उसके बाद यह जगह तुम्हारी होगी। पर अपनी जगह तुम्हें देने के लिए जो चीज़ तुम्हें हासिल करनी थी, वह है पुष्कर का भरोसा। उनका भरोसा तुम पर है, इसीलिए अपने बाद वे तुम्हें माफ़िया का वारिस बना रहे हैं। और जो वे तुमसे माँग रहे हैं, वह हमारे वंश को आगे बढ़ाने के लिए है।" "नहीं बढ़ाना है मुझे वंश आगे उस गवार अरुणिमा के साथ! उस लड़की को मैं अपने पास एक मिनट भी बर्दाश्त नहीं कर सकता, और आप चाहती हैं कि मैं उसके साथ सोऊँ, उसके साथ बच्चा पैदा करूँ! मैं ऐसा नहीं करूँगा। चाहे कुछ भी हो जाए, नहीं चाहिए मुझे कुछ भी। आप अच्छी तरह से जानती हैं, माँ, मैंने इन सबके लिए बहुत कुछ खोया है। और आपके ही कहने पर मैंने उस जाहिल अरुणिमा से शादी की, जबकि आप जानती थीं कि मैं सिर्फ़ अमायरा से प्यार करता हूँ। अमायरा के अलावा न तो मैं अपनी ज़िन्दगी में किसी और को इमेजिन कर सकता हूँ और न ही मेरी ज़िन्दगी में किसी और के लिए कोई जगह है। और उस अरुणिमा के लिए तो बिल्कुल भी नहीं। आपने ही कहा था न कि जिस दिन मुझे अंडरवर्ल्ड की गद्दी मिल जाएगी, मैं अरुणिमा को छोड़ सकता हूँ। लेकिन सब कुछ गलत हो गया है। वह अरुणिमा अभी भी मेरे गले में बंधी हुई है, और मैं अपनी अमायरा के साथ होकर भी उसके साथ नहीं हो पा रहा हूँ। इन सबके बावजूद पुष्कर रायचंद चाहते हैं कि मैं उस लड़की के साथ बच्चा पैदा करूँ।" "अगर पुष्कर चाहते हैं कि तुम्हारा और अरुणिमा का बच्चा हो, तो तुम्हें यह करना होगा। मुझे फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम अमायरा से प्यार करते हो या मैडोना से। लेकिन इस खानदान को बच्चा तुम्हें अरुणिमा से ही देना होगा। यह बात मैंने तुम्हें पहले ही बता दी थी। तुम्हारी शादी अरुणिमा से ज़रूर हुई है, लेकिन तुम्हें अपनी ज़िन्दगी में किसी को भी रखने की आज़ादी है। बस यह बात बाहर किसी को पता नहीं चलनी चाहिए। पिछले एक साल से तुमने इस बात का बहुत अच्छे से ख्याल रखा है कि तुम्हारी और अरुणिमा की मुँहबोली शादी के बारे में दुनिया को कुछ भी पता न चले। पर अब बात वारिस की है। दुनिया के सामने अरुणिमा ही तुम्हारी बीवी है। और तुम्हें उसके साथ एक बच्चा करना होगा ताकि यह खेल, जो हमने मिलकर खेला है, उसमें जीत हासिल कर सकें।" आस्तिक गुस्से और हैरानी से नेहा जी को देख रहा था। नेहा जी ने आस्तिक की कलाई छोड़ दी और पास रखी कुर्सी पर जाकर बैठ गईं। उन्होंने अपने एक पैर को दूसरे पर रखा और अपनी हथेलियों को कुर्सी के हत्थे पर रखते हुए गुस्से में अपनी मुट्ठी बांध ली। फिर बोलीं, "तुम्हें क्या लगता है, मेरे लिए यह सब करना आसान था? दुनिया के सामने एक मुखौटा पहनकर रखा है मैंने—अच्छाई का मुखौटा। और इसी मुखौटे के पीछे मैंने सबका भरोसा जीता है, सिर्फ़ इसलिए ताकि एक दिन तुम्हें इस जगह पर देख सकूँ। बहुत कुछ बर्दाश्त किया है मैंने तुम्हें यहाँ तक पहुँचाने के लिए। बस तुम्हारा प्यार तुम्हें नहीं मिला और तुम उसके लिए इतना पागल हो रहे हो। जरा मेरे बारे में सोचो। मुझे तो कभी वह नहीं मिला, जो मुझे चाहिए था।" "माँ-बाप ने पैसा देखकर पुष्कर से मेरी शादी करवा दी। शादी से पहले मुझसे पूछा भी नहीं कि मुझे यह शादी करनी है या नहीं। पुष्कर की अय्याशी और उसकी आवारगी के बारे में मुझे शादी से पहले से पता था, लेकिन फिर भी मेरे माँ-बाप ने कहा कि शादी के बाद पुष्कर बदल जाएगा। पर वह नहीं बदला। शादी के बाद भी उसकी रंगरलियाँ चलती रहीं। और जब मुझे पता चला कि उसकी अय्याशी का अगला शिकार मालिनी हुई है, तो मुझे ज़्यादा हैरानी नहीं हुई। क्योंकि जहाँ पुष्कर अय्याशी करने में नंबर वन था, वहीं मालिनी मुझे जलती थी। यह बात तो मुझे पहले से ही पता थी, और मुझे हराने के लिए वह कुछ भी कर सकती थी। पर हद तो तब हो गई जब मालिनी प्रेग्नेंट हो गई। वह अपना बच्चा गिराना नहीं चाहती थी। लेकिन तब तक? मैं तुम्हें वहाँ से लेकर आ चुकी थी। मैं वापस पुष्कर के पास नहीं आना चाहती थी, क्योंकि मुझे ऐसी ज़िन्दगी नहीं चाहिए थी, जिसमें भरोसा और प्यार, दोनों ही न हों। पर तभी मुझे पता चला कि मालिनी अपनी जुड़वा बच्चों को जन्म देते वक़्त सीरियस हो गई है और अपनी आखिरी साँसों में मुझसे मिलना चाहती है। मुझे अच्छी तरह से पता था कि मालिनी मुझसे क्यों मिलना चाहती है, क्योंकि इस दुनिया में उसके पास मेरे अलावा कोई और नहीं था। और पुष्कर ने पहले ही उन बच्चों की ज़िम्मेदारी लेने से मना कर दिया था।" मालिनी ने जाने से पहले अपने बच्चों की ज़िम्मेदारी मुझे दे दी। मेरा तो मन किया था उन दोनों बच्चों को अनाथ आश्रम में छोड़ दूँ और ऐसा करने वाली भी थी। पर तभी मेरे दिमाग में एक आइडिया आया। मैंने सोचा, जिन इंसानों ने मिलकर मेरी ज़िन्दगी को खिलवाड़ बना दिया है, मैं उन्हें सुकून से कैसे जीने दे सकती हूँ? मालिनी तो मर चुकी थी, लेकिन उसकी औलाद मेरे पास थी। और बस उसी दिन से मैंने अपना यह खेल शुरू किया, जिसमें मैंने पुष्कर से वह सब कुछ छीनने का वादा किया था जो उसने हासिल किया है—उसकी पोजीशन, पावर, कंपनी, प्रॉपर्टी और यहाँ तक कि माफ़िया का पावर भी। मैंने सोच लिया था कि यह सारी चीज़ें आगे चलकर मेरे बेटे को मिलेंगी। मैं तुम्हारे लिए अपनी ज़िन्दगी के इतने साल दिखावे में गुज़ारे हैं और तुम्हारी वजह से इसे खराब नहीं होने दूँगी, आस्तिक। मैं कभी पुष्कर के पास वापस नहीं आती, लेकिन मैं पुष्कर के पास वापस आई और दुनिया के सामने एक विक्टिम कार्ड खेला, ताकि लोग मुझे महान समझें और मुझ पर शक न करें। पुष्कर ने भी मुझे महान समझा और उसने कभी भी मुझ पर कोई सवाल नहीं उठाया। और इस महानता का पहला खेल था मालिनी के बच्चों की परवरिश। सारी दुनिया को पता था कि चेतन और बेला पुष्कर की नाजायज़ औलाद हैं, लेकिन फिर भी मैंने उन्हें अपनी औलाद से बढ़कर परवरिश दी। इसीलिए आज लोग मेरा नाम इज़्ज़त से लेते हैं। पर मुझे अपना बना-बनाया खेल खराब होता तब नज़र आया जब तुम और चेतन 17 साल के हो रहे थे। तुम दोनों उम्र की दहलीज़ पर कदम रख रहे थे और तुम दोनों की बॉडी में भी बदलाव आ रहे थे। तभी मुझे पता चला कि पुष्कर का झुकाव धीरे-धीरे चेतन की ओर बढ़ रहा है। चेतन पुष्कर को यह एहसास दिला रहा था कि वह आगे चलकर उनकी गद्दी संभाल सकता है। मैं उस साँप के फ़न को उठने से पहले ही कुचल देना चाहती थी, इसीलिए मैंने धीरे-धीरे चेतन को दवाइयाँ देनी शुरू कर दीं। और जब तक चेतन इस लायक हुआ कि कुछ कर सके, वह "नपुंसक" हो चुका था। तुम्हें क्या लगता है चेतन की यह हालत अपने आप हुई? नहीं, बल्कि उसे ऐसा मैंने बनाया। तुम्हें क्या लगता है, बेला के चाल-चलन के बारे में मुझे पता नहीं है? पर बेला से मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है। वह लड़की है, आज नहीं तो कल उसे शादी करके दूसरे घर जाना है। मेरी असली प्रॉब्लम तो चेतन था, जो मेरे मकसद के बीच आ रहा था। इसीलिए मैंने पहले उसे अपने रास्ते से हटाया। और जब पुष्कर को चेतन के बारे में पता चला, तो उनका सारा फ़ोकस तुम्हारी ओर आ गया। मेरे इतने सालों की मेहनत अब रंग लाई है। पुष्कर अब तुमसे एक वारिस की उम्मीद कर रहे हैं, ताकि वह तुम्हें अपना साम्राज्य दे सकें। और मुझे इस बात से ज़रा भी फ़र्क नहीं पड़ता कि इसके लिए तुम्हें अमायरा से प्यार करने के बावजूद अरुणिमा के साथ सोना पड़े। अपने इतने सालों के खेल को मैं तुम्हारी वजह से खराब नहीं होने दूँगी, आस्तिक। इसीलिए चुपचाप वही करो जो तुम्हें कहा जा रहा है। बस एक और साल के लिए तुम्हें अरुणिमा को बर्दाश्त करना है। उसके बाद जैसा तुमने सोचा है, वैसा ही करना। "जानता हूँ माँ, मैं सब जानता हूँ। लेकिन क्या करूँ? आप जानती हैं कि मैं अमायरा से प्यार करता हूँ। फिर भी मैंने अरुणिमा से शादी की क्योंकि आपने मुझे विश्वास दिलाया था कि एक साल के बाद यह मुसीबत मेरे सर से हट जाएगी। और अब आप कह रही हैं कि मैं इसके साथ एक बच्चा करूँ! मैं उस लड़की की शक्ल देखना पसंद नहीं करता, उसके साथ सोना तो दूर की बात है!" आस्तिक झुंझलाते हुए गुस्से में अपनी माँ को देखता है। तो नेहा जी अपनी जगह से खड़े होकर कहती हैं, "अगर शक्ल नहीं देखनी है, तो आँखों पर कपड़ा बाँध लेना। लेकिन अगले एक साल तक तुम्हें अरुणिमा को अपने साथ रखना होगा और उसके साथ इस खानदान को एक वारिस देना होगा। एक बार बच्चा हो जाए और तुम्हें अंडरवर्ल्ड का किंग बना दिया जाए, उसके बाद तुम चाहो तो अरुणिमा को छोड़ सकते हो।" आस्तिक हैरानी से नेहा जी को देखता है। तो नेहा जी कहती हैं, "बच्चे की फ़िक्र मत करो। इतना बड़ा खानदान है, घर के किसी कोने में पड़ा पाल जाएगा। और अच्छा है तो अरुणिमा उसे अपने साथ भी लेकर जा सकती है। तुम्हें न तो उस लड़की से कोई मतलब है और बच्चा तो तुम वैसे भी नहीं चाहते हो।" आस्तिक गुस्से में एक दीवार के पास चला जाता है और गुस्से में अपना हाथ दीवार पर मारते हुए कहता है, "मुझे थोड़ी देर के लिए अकेला छोड़ दीजिए।" नेहा जी वहाँ से चली जाती हैं। आस्तिक कमरे में अकेला रह जाता है। वह कसके अपनी आँखें बंद करता है और गुस्से में अपना हाथ दीवार पर मारते हुए बड़बड़ाता है, "मैं ऐसा करना नहीं चाहता हूँ, लेकिन मुझे ऐसा करना होगा। आई एम सॉरी, अमायरा, स्वीटहार्ट। शायद तुम्हें अपना बनाने के लिए मुझे और थोड़ा इंतज़ार करना होगा। मैं जानता हूँ, जब तुम्हें पता चलेगा कि मैंने तुमसे किया हुआ वादा तोड़ा है, तो तुम्हें दुख होगा। लेकिन माँ सही कह रही हैं। उन्होंने इतने साल तक इस खेल को जारी रखा ताकि मैं वहाँ तक पहुँच सकूँ। मैं अपनी माँ के बलिदान को बेकार नहीं जाने दूँगा। जब तक पुष्कर रायचंद को वारिस नहीं मिलेगा, तब तक वह मुझे अंडरवर्ल्ड का किंग नहीं बनाएँगे। इसलिए मुझे, न चाहते हुए भी, यह करना होगा। मुझे अपनी मंज़िल तक पहुँचाने के लिए इस जहरीले रास्ते से गुज़रना ही होगा।" आस्तिक ने स्टडी रूम के कॉर्नर पर लगे बार काउंटर से एक बोतल निकाली और उसे लेकर कुर्सी पर बैठ गया। उसने बोतल का ढक्कन खोला और उसे पीते हुए अपनी ज़िन्दगी के बारे में सोचने लगा। वह वह पल याद करने लगा जब वह और अमायरा साथ थे, और कैसे उसकी ज़िन्दगी से अमायरा को निकालकर अरुणिमा को शामिल किया गया था।

  • 10. morning Romance

    Words: 2585

    Estimated Reading Time: 16 min

    आस्तिक आस्तिक लाइब्रेरी के सोफे पर बैठा था, हाथ में वाइन की बोतल। उसने बोतल सीधे मुँह से लगाकर वाइन खत्म की। उसकी आँखें अंगारों जैसी लाल हो चुकी थीं। चेहरा इतना सख्त था कि उस वक्त कोई उसके सामने होता, तो शायद वह उसे जान से मार देता। उसे अपने गुस्से की आग में पागल होने की परवाह नहीं थी। अगर अरुणिमा यहाँ होती, तो बेचारी की खैर नहीं थी। पुष्कर जी की तो उसे परवाह ही नहीं थी; वह शख्स जिसके बारे में वह सोच रहा था, उसके अपने पिता थे।


    आस्तिक की बोतल लगभग आधी खाली हो चुकी थी, और वह गुस्से में अपनी ज़िन्दगी के बारे में सोच रहा था। किस तरह से पुष्कर रायचंद उसकी ज़िन्दगी को पूरी तरह से नियंत्रित कर रहे थे, और वह कुछ नहीं कर पा रहा था। पर इसकी शुरुआत आज नहीं, बल्कि 7 साल पहले हुई थी, जब आस्तिक भारत से अमेरिका पढ़ने गया था।


    जब पुष्कर जी को पता चला कि चेतन नपुंसक था और वह आगे चलकर न तो रायचंद खानदान को वारिस दे सकता था और न ही किसी लड़की के साथ रिश्ता बना सकता था, तब उन्हें माफिया की कुर्सी देना बेवकूफी लगने लगा। इसलिए पुष्कर जी का सारा ध्यान आस्तिक पर चला गया। स्कूलिंग पूरी करने के बाद पुष्कर जी ने आस्तिक को अमेरिका के माफिया अंडरवर्ल्ड के स्कूल में भेज दिया, जहाँ माफिया की ट्रेनिंग दी जाती थी। वहाँ उन्हें मुश्किलों से लड़ना सिखाया गया, और वह ट्रेनिंग बेहद कठिन थी।


    कॉलेज में पढ़ाई और माफिया की ट्रेनिंग के दौरान आस्तिक की मुलाक़ात अमायरा मलिक से हुई। अमायरा भारतीय थी और अमेरिका में पढ़ने आई थी। लेकिन आस्तिक से मुलाक़ात के बाद दोनों ने अपनी असल पढ़ाई छोड़कर किसी और पाठ को पढ़ना शुरू कर दिया।


    जवानी में किसी की तरफ़ आकर्षित होना आम बात है, और शायद आस्तिक और अमायरा भी इसी आकर्षण के शिकार हो गए। दोनों एक-दूसरे को शारीरिक रूप से संतुष्ट करते थे। आस्तिक को अमायरा के साथ खुद को पूरा महसूस होता था। इसीलिए वह धीरे-धीरे अमायरा की तरफ़ और ज़्यादा खिंचने लगा। इतना कि जब उनकी पढ़ाई खत्म होने वाली थी, तो दोनों को एक-दूसरे के साथ की परवाह होने लगी।


    चार साल के रिश्ते के दौरान आस्तिक ने माफिया की ट्रेनिंग बहुत अच्छे से की। बाकी माफिया सदस्यों में आस्तिक का सबसे अच्छा रैंक था। पढ़ाई में भी आस्तिक हमेशा नंबर वन था। इसके अलावा, उसने अमायरा के साथ अपने रिश्ते को भी बहुत अच्छे से बनाए रखा।


    आस्तिक अमायरा से अलग नहीं होना चाहता था, इसलिए वह उसे भारत ले आया। वह उसे अपने परिवार से मिलवाना चाहता था और उनसे शादी की बात करना चाहता था। पर जिस दिन आस्तिक अमायरा को परिवार से मिलवाने वाला था, पुष्कर रायचंद ने अमायरा और आस्तिक के रिश्ते को सिरे से नकार दिया। उन्होंने साफ़ कह दिया कि अमायरा जैसी लड़की उनके घर की बहू नहीं बन सकती।


    आस्तिक ने बगावत कर दी। अगर नेहा जी का सहारा नहीं होता, तो शायद आस्तिक की बगावत वहीं खत्म हो जाती। लेकिन अमायरा के लिए जो जुनून आस्तिक के अंदर था, उसने आस्तिक और पुष्कर जी के बीच एक दीवार खड़ी कर दी।


    पुष्कर जी ने साफ़ कह दिया कि अगर आस्तिक की शादी होगी, तो किसी ऐसी लड़की से होगी, जिसका परिवार माफिया से जुड़ा हो। क्योंकि आगे चलकर वह लड़की माफिया लेडी बॉस बनेगी। कोई ऐसी लड़की, जो माफिया से संबंधित नहीं है, इस पद को संभाल नहीं पाएगी।


    उन्होंने आस्तिक को सख्त लहजे में कहा,
    "अगर तुम्हें अमायरा के साथ जाना है, तो जाओ। पर तुम्हें न प्रॉपर्टी मिलेगी, न माफिया की कुर्सी और न ही यह साम्राज्य। यह सब मैं चेतन को दे दूँगा। और माफिया की गद्दी छोड़ दूँगा। उसके बाद इस पद को कौन अपनाएगा, इससे मेरा कोई लेना-देना नहीं होगा।"


    आस्तिक ऐसा नहीं होने देना चाहता था। उसे सब कुछ चाहिए था—यह साम्राज्य, दौलत, शोहरत, यह पद और साथ ही अंडरवर्ल्ड में अपनी जगह। वह सब कुछ इतनी आसानी से नहीं छोड़ना चाहता था। लेकिन इन सबके बावजूद वह अमायरा को भी नहीं छोड़ना चाहता था। अपनी माँ के कहने पर आस्तिक ने उस दिन खुद को इतना दूर कर लिया था कि उसका बस एक ही मकसद बनकर रह गया था—माफिया में अपनी जगह बनाना। इसके लिए उसने अमायरा से अपने रिश्ते खत्म कर दिए। अमायरा उसके रास्ते से दूर हो गई, और आस्तिक ने 1 साल के लिए अपना पारिवारिक व्यवसाय संभाला।


    लेकिन कहानी में असली ट्विस्ट अब आना था, जब पुष्कर जी ने आस्तिक और अरुणिमा की शादी तय कर दी। आस्तिक यह शादी नहीं करना चाहता था क्योंकि इन 1 सालों में भी वह अमायरा को भुला नहीं पाया था। लेकिन पुष्कर जी का फैसला अभी भी वही था। आस्तिक को शादी करनी ही होगी, और अगर उसकी शादी होगी, तो अरुणिमा से। क्योंकि अरुणिमा का परिवार पहले से ही माफिया से जुड़ा हुआ है।


    आस्तिक गुस्से में आगबबूला हो गया। उसने अपना घर अलग कर लिया। इससे ज़्यादा वह खुद को और बर्दाश्त नहीं कर सकता था कि अचानक एक पार्टी में उसकी मुलाक़ात अमायरा से हो जाती है। वह यह देखकर हैरान रह गया कि अमायरा की शादी हो चुकी है और उसका पति उम्र में बहुत बड़ा है—इतना कि वह उसका बाप लगता है। अमायरा और आस्तिक के दबे हुए जज़्बात फिर से जाग उठे और उन्होंने एक बार फिर एक-दूसरे को मोहब्बत में कैद कर लिया। अमायरा के पति अक्सर काम के सिलसिले में शहर से बाहर रहते थे, और इसी बीच आस्तिक और अमायरा एक प्राइवेट अपार्टमेंट में साथ रहने लगे।


    आस्तिक की शादी का दिन नज़दीक आ रहा था। उसने सोचा कि क्यों न अरुणिमा की तरफ़ से इस रिश्ते को इनकार करवा दिया जाए। जब उसने अरुणिमा के बारे में पता किया, तो जो सच उसके सामने आया, उसे सुनकर वह चौंक गया। उसने यह सारी बातें नेहा जी को बताईं। नेहा जी के दिमाग में तब एक और शैतानी प्लान आया। उन्होंने आस्तिक को अपने अगले प्लान में शामिल किया। उन्होंने आस्तिक को समझाया कि 1 साल के लिए अरुणिमा से शादी कर लो और फिर उसे तलाक दे दो। क्योंकि अरुणिमा पहले से ही किसी देव नाम के लड़के से प्यार करती है। अपने परिवार के दबाव में आकर उसने देव को छोड़ दिया था। वह आस्तिक से शादी सिर्फ़ इसलिए कर रही है क्योंकि पुष्कर जी ने अरुणिमा के पिता की डूबती कंपनी को बचाया था। अरुणिमा अपने पिता के एहसान का बदला चुका रही है।


    नेहा जी ने आस्तिक से कहा, "1 साल के लिए अरुणिमा से शादी करो और उसके बाद उसे तलाक दे दो। क्योंकि 1 साल बाद पुष्कर रिटायर हो जाएँगे और माफिया की गद्दी तुम्हें मिल जाएगी।"


    इसी शर्त पर आस्तिक ने अरुणिमा से शादी की। लेकिन शादी से पहले उसने अमायरा से वादा किया था कि वह हमेशा उसी का रहेगा। शादी से ठीक एक हफ़्ते पहले उसने अपनी कलाई पर अमायरा के नाम का पहला अक्षर लिखवाया था। यह एक वादा था कि वह हमेशा उससे प्यार करेगा और एक दिन दोनों साथ होंगे।


    शादी के तुरंत बाद आस्तिक ने अरुणिमा को साफ़ बता दिया था कि उसकी ज़िन्दगी में अरुणिमा के लिए कोई जगह नहीं है। पिछले 1 साल से वह अरुणिमा के साथ अजनबियों की तरह बर्ताव कर रहा था। वह हर बार अरुणिमा को नीचा दिखाता और यह एहसास दिलाता कि वह उसकी ज़िन्दगी में सिर्फ़ एक बोझ है। उनके रिश्ते के बारे में परिवारवालों को कुछ नहीं पता था। हाँ, नेहा जी को सब कुछ मालूम था। आखिरकार, इन सबकी कर्ता-धर्ता वही थीं। आज तक यह सब इसीलिए करता था कि जब अरुणिमा को छोड़ने की बारी आए तो अरुणिमा कोई ड्रामा न करे।


    आस्तिक ने अरुणिमा को अपने दूसरे बंगले में अकेला छोड़ दिया था, और खुद अमायरा के साथ अपने प्राइवेट अपार्टमेंट में रहता था। जब अमायरा का पति काम के सिलसिले में बाहर होता, तो वह आस्तिक के पास आ जाती। दोनों वहाँ ऐसे रहते, जैसे शादीशुदा हों। आस्तिक और अमायरा के इस विवाहेतर संबंध से आस्तिक को कोई दुख नहीं था। बल्कि वह पूरे हक़ के साथ अमायरा के साथ रहता था। उसे इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं थी कि अगर किसी को उनके बारे में पता चल गया, तो क्या होगा।


    आज आस्तिक और अरुणिमा की शादी की पहली सालगिरह थी। लेकिन आस्तिक अमायरा के साथ अपने बेडरूम में था। उसने अमायरा को अपनी बाहों में भर रखा था। वे दोनों बिना कपड़ों के एक चादर के नीचे सो रहे थे, जैसे उन्हें दुनिया की कोई खबर ही नहीं है। तभी आस्तिक का फ़ोन बजा।


    आस्तिक ने अमायरा को एक हाथ से थामते हुए अपने फ़ोन की स्क्रीन देखी, तो यह पुष्कर रायचंद की कॉल थी। उसने गुस्से में दाँत पीस लिए और अमायरा को अपनी बाहों में कसते हुए फ़ोन कान से लगाकर कहा, "जी, डैड।"


    "आज तुम्हारी और अरुणिमा की शादी की पहली सालगिरह है और घर में एक पार्टी है। तुम कहाँ हो?"


    पुष्कर के सवाल ने आस्तिक का सुबह-सुबह मूड खराब कर दिया। उसने गुस्से में कहा, "डैड, इतनी सुबह मैं कहाँ होऊँगा? जाहिर सी बात है, अपने कमरे में हूँ। प्लीज़, आप यह मत पूछना कि मैं किसके साथ हूँ। ज़ाहिर है, मैं उसके साथ हूँ जिससे मैं प्यार करता हूँ।"


    सामने से पुष्कर जी ने कहा, "मैं ऐसा कुछ पूछ भी नहीं रहा हूँ। मैं बस तुम्हें यह बता रहा हूँ कि आज शाम की पार्टी में समय पर पहुँच जाना, क्योंकि आज बहुत महत्वपूर्ण लोग आने वाले हैं और मुझे उनके सामने एक ज़रूरी बात करनी है।"


    आस्तिक के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान आ गई। उसने धीरे से अमायरा के कंधे को छूते हुए कहा, "डोंट वरी, डैड। मैं आज रात समय पर पार्टी में पहुँच जाऊँगा। आखिर, मुझे भी तो इस पल का काफी समय से इंतज़ार था।"


    इसके बाद आस्तिक ने फ़ोन काट दिया और अमायरा को देखने लगा, जो उसके सीने पर अपना चेहरा रगड़ते हुए गहरी नींद में थी। उसे देखकर आस्तिक के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। उसने धीरे से अमायरा के माथे पर एक चुम्मा लिया और उसे बिस्तर पर ठीक से सुला दिया।


    आस्तिक उठकर बैठ गया और इन सब बातों के बारे में सोचने लगा। तभी उसने अपनी पीठ पर अमायरा का हाथ महसूस किया। वह पलटकर देखता है, तो अमायरा अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मुस्कुराते हुए उसे देख रही थी। उसने पूछा, "क्या बात है, बेबी? तुम इतने परेशान क्यों लग रहे हो? किसका फ़ोन था?"


    अमायरा की मुस्कान देखकर आस्तिक की सारी टेंशन खत्म हो गई। उसने धीरे से अमायरा की कमर पर हाथ डाला और उसे खींचकर अपनी गोद में बिठा लिया। वे दोनों अभी भी बिना कपड़ों के थे और उन्हें इस बात की कोई शर्म नहीं थी, क्योंकि यह पहली बार नहीं था जब वे इस तरह एक-दूसरे के साथ थे।


    आस्तिक ने अमायरा की कमर पर हाथ रखते हुए कहा, "डैड का फ़ोन था। आज मेरी और उस साधारण लड़की के साथ शादी की पहली सालगिरह है, और उन्होंने पार्टी रखी है। बस, इसी वजह से फ़ोन कर रहे थे ताकि मैं पार्टी में जा सकूँ।"


    अमायरा के चेहरे की मुस्कान यह सुनकर हल्की फीकी पड़ गई। वह बस आस्तिक को देखने लगी। आस्तिक ने उसकी फीकी मुस्कान देखकर उसे अपनी बाहों में भर लिया। उसके गालों पर हाथ रखते हुए, उसके होठों को सहलाते हुए कहा, "डोंट वरी, बेबी। बस थोड़ा सा और इंतज़ार करो। एक बार डैड रिटायर हो जाएँ और उनकी जगह मुझे मिल जाए, उसके बाद हर फैसला मेरा होगा। तुम्हें पता है ना, मेरे डैड कभी अपनी बात से पीछे नहीं हटते। जो उन्हें चाहिए, वह उसे हासिल करके ही रहते हैं। उन्होंने हमें अलग कर दिया और मेरी शादी उस लड़की से करवा दी जिसे मैं एक पल भी बर्दाश्त नहीं कर सकता। मेरी ज़िन्दगी में, मेरी दुनिया में अगर कोई है, तो वह सिर्फ़ तुम हो। तुम्हें मुझ पर भरोसा है ना, स्वीटहार्ट?"


    अमायरा के चेहरे पर हल्की मुस्कान लौट आई। उसने सहमति में सिर हिलाया और आस्तिक के होठों पर अपने होठ रख दिए। अमायरा के ऐसा करते ही आस्तिक के अरमान फिर से जाग उठे। उसने धीरे से अमायरा के दोनों पैरों को अपनी कमर पर लपेटा और उसे गोद में उठाकर इसी तरह किस करता हुआ बाथरूम की तरफ़ ले गया।


    अमायरा की शादी एक बूढ़े अमीर आदमी से हुई थी, और वह अपने पति के साथ अपनी शारीरिक ज़रूरतें पूरी नहीं कर पा रही थी। लेकिन आस्तिक उसकी हर ज़रूरत पूरी करता था, चाहे वह उसकी ज़िन्दगी से जुड़ी हो या बिस्तर पर। आस्तिक हमेशा अमायरा के लिए हाजिर रहता था। इसी वजह से अमायरा और आस्तिक ने यह प्लान कर लिया था कि जिस दिन आस्तिक और अरुणिमा अलग हो जाएँगे, अमायरा को अपने पति को भी छोड़ना होगा। अमायरा ने तय किया था कि वह अपने पति का एक धोखे से एक्सीडेंट करवाएगी, जिससे यह सब एक हादसा लगे। इसके बाद कुछ दिनों में वह आस्तिक से शादी कर लेगी। उसके पति की जो भी प्रॉपर्टी होगी, वह अमायरा की होगी, और आस्तिक तो पहले से ही उसका है।


    आस्तिक ने भी अमायरा के साथ अपने रिश्ते को अपने परिवार से छुपाकर रखा था, खासकर पुष्कर रायचंद से। वह नहीं चाहता था कि पुष्कर को अमायरा के बारे में पता चले और वह एक बार फिर से आस्तिक और अमायरा को अलग कर दे। इसलिए आस्तिक ने अपनी हर चाल बहुत सोच-समझकर चली थी।


    बाथरूम में एक रोमांटिक शॉवर लेने के बाद आस्तिक तौलिये में ड्रेसिंग टेबल के पास खड़ा था, और अमायरा अलमारी में अपने कपड़े बदलने के लिए गई हुई थी। आस्तिक फ़ोन उठाकर जूली को कॉल करता है। वह उसे यह बताता है कि आज रात वह अरुणिमा के साथ पार्टी में जाएगा, इसलिए अरुणिमा को पहले से तैयार होने के लिए कह दे। साथ ही, वह अरुणिमा के लिए कपड़े और गहने भेज रहा था, ताकि वह रायचंद खानदान की बहू जैसी लगे और आस्तिक के साथ खड़े होने लायक दिखे।


    फ़ोन रखने के बाद आस्तिक का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। वह एक पल के लिए भी अरुणिमा को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। तभी अमायरा उसके पीछे आकर उसे अपनी बाहों में भरते हुए कहती है, "क्या हुआ? फिर से तुम्हारा मूड ख़राब हो गया? अगर ऐसा है, तो ठीक है। चलो, सुबह तुम्हारे साथ कुछ नॉटी-नॉटी हरकतें करती हूँ, ताकि तुम अपनी पत्नी के पास जाकर मुझे भूल न सको।"


    अमायरा की बात सुनकर आस्तिक उसकी कलाई पकड़कर उसे अपने सामने खींचता है और अपनी बाहों में भरते हुए कहता है, "दुनिया की कोई भी चीज़ तुम्हें मुझसे अलग नहीं कर सकती, और वह बदसूरत लड़की तो बिल्कुल भी नहीं।"


    अमायरा एक कामुक मुस्कान के साथ आस्तिक के गले में अपनी बाहें डालते हुए कहती है, "अगर ऐसा है, तो चलो। मैं तुम्हारा मूड सही कर देती हूँ, इससे पहले कि तुम अपनी उबाऊ पत्नी के पास वापस जाओ।"


    दो घंटे बाद, आस्तिक और अमायरा ने एक बार फिर खुद को बिस्तर पर संतुष्ट किया। इसके बाद अमायरा तैयार होने लगी। आस्तिक जब अलमारी से सूट पहनकर बाहर आया, तो उसने अमायरा को तैयार होते देखा। वह हैरानी से पूछता है, "तुम कहाँ जा रही हो?"


    अमायरा अपनी ड्रेस की ज़िप लगाते हुए कहती है, "मेरा पति वापस आ गया है। उसने मुझे अभी-अभी मैसेज किया है। मुझे घर जाना होगा।"
    ❤️

  • 11. Toxic marriage still needs to be maintained

    Words: 2238

    Estimated Reading Time: 14 min

    आमायरा और आस्तिक साथ-साथ अपार्टमेंट से निकलकर पार्किंग एरिया में आए। उन्होंने यहाँ कभी खुद को छिपाने की ज़रूरत नहीं महसूस की थी। हर आता-जाता इंसान उन्हें देखता, यहाँ तक कि जानता भी था कि वे साथ रहते हैं। लेकिन किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि उनके बारे में कुछ बोले। कुछ लोग जानते भी थे कि ये दोनों लिव-इन में रहते हैं। साथ ही वे लोग आस्तिक को भी अच्छी तरह पहचानते थे। अगर किसी ने आस्तिक के खिलाफ कुछ बोलने की हिम्मत की, तो अगली सुबह वह इंसान ज़मीन के छह फीट नीचे पाया जाता था।

    पार्किंग में पहुँचते ही आस्तिक और अमायरा के रास्ते अलग हो गए। अमायरा अपनी कार की ओर चली गई, जबकि आस्तिक की गाड़ी पहले से ही तिवारी जी लेकर खड़े थे। अमायरा से अलग होने से पहले आस्तिक ने उसे अपनी बाहों में भर लिया और उसके गालों को चूमा।

    "जल्दी मिलेंगे," आस्तिक ने उसकी आँखों में देखकर कहा।

    अमायरा ने भी उसके गले में बाँहें डालते हुए मुस्कुराकर कहा, "बिल्कुल, हम जल्दी मिलेंगे। मैं उस दिन का इंतज़ार कर रही हूँ, जब हम हमेशा के लिए साथ हो जाएँगे। लेकिन फ़िलहाल मुझे जाना होगा। मेरे पति वापस आ गए हैं, और अगर उन्होंने मुझे घर पर नहीं देखा, तो सवाल करेंगे। और तुम जानते हो ना, वे मेरे साथ क्या करेंगे।"

    आस्तिक का चेहरा गुस्से से सख्त हो गया, लेकिन अमायरा उसके गुस्से को महसूस कर सकती थी। उसने आस्तिक के गालों पर हाथ रखते हुए कहा, "आस्तिक, शांत रहो। तुम जानते हो ना, इस समय हमें संयम रखना होगा।"

    आस्तिक ने मुस्कुराते हुए उसके हाथों को पकड़ा और उसकी उंगलियों को चूमते हुए कहा, "बिल्कुल, स्वीटहार्ट। मुझ पर भरोसा रखना। मैं तुम्हें एक दिन उससे दूर ले जाऊँगा।"

    आस्तिक और अमायरा अपनी-अपनी गाड़ी में बैठ गए और उनकी गाड़ियाँ विपरीत दिशा में चली गईं। आस्तिक अपने घर की ओर जा रहा था, जबकि अमायरा अपने विला की ओर।

    शाम को

    आस्तिक और अरुणिमा साथ-साथ पार्टी में शामिल हुए। आस्तिक को पता था कि अरुणिमा पार्टी में अच्छा नाटक करेगी। पार्टी बिल्कुल वैसे ही चल रही थी, जैसा आस्तिक ने सोचा था। किसी ने उनके रिश्ते पर शक नहीं किया था। उन्हें बस इस पार्टी में एक-दूसरे को सहना था। इसके बाद सब कुछ पहले जैसा चलता रहता।

    आस्तिक को यकीन था कि पुष्कर जी आज रात अपने रिटायरमेंट की घोषणा करेंगे। लेकिन उनके रिटायरमेंट के साथ-साथ जो घोषणा हुई, उसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

    आस्तिक अपना गुस्सा कंट्रोल नहीं कर पाया और अरुणिमा पार्टी छोड़कर गार्डन में चली गई। लेकिन आस्तिक अभी भी लाइब्रेरी में बैठा सब कुछ सोच रहा था। वह जल्द से जल्द इन सब से बाहर निकलना चाहता था। लेकिन जितना वह इससे बाहर निकलने की कोशिश करता, यह दुनिया उसे और ज़्यादा अपने अंदर उलझा देती थी। पहले यह दिखावे की शादी, फिर आज की पार्टी में उसे एक वारिस की माँग करना—ये सब उसके प्लान का हिस्सा नहीं था।

    आस्तिक इन सबके बारे में सोच-सोचकर परेशान हो रहा था। लेकिन नेहा जी के समझाने पर उसने खुद को थोड़ा कंट्रोल किया। ड्रिंक खत्म करके उसने खुद को रिलैक्स किया और फिर से पार्टी में शामिल हो गया।

    दूसरी तरफ

    पार्टी के गार्डन में अरुणिमा अकेली बैठी हुई थी। पार्टी हॉल में, जब पुष्कर जी ने उसकी और आस्तिक के वारिस का जिक्र किया, तो अरुणिमा एकदम दंग रह गई। उसका चेहरा लाल हो गया और दिमाग धुंधला हो गया। उसके चारों तरफ ताली बजाने की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं, लेकिन वे भी धीरे-धीरे धीमी पड़ने लगीं। अरुणिमा का दिमाग इतना खाली हो चुका था कि अब कोई आवाज़ उसके कानों तक नहीं पहुँच रही थी।

    अरुणिमा को अचानक घुटन महसूस होने लगी। उसका शरीर जैसे वहाँ रुकने को तैयार ही नहीं था। ऐसा लग रहा था, जैसे उसके सीने में साँस ही नहीं आ रही हो।

    धीरे-धीरे कदम पीछे लेते हुए वह पार्टी हॉल से निकलकर गार्डन एरिया में चली गई। रास्ते में कुछ लोगों ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन अरुणिमा किसी की तरफ देखे बिना चुपचाप वहाँ से निकल गई।

    इस वक़्त अरुणिमा गार्डन में अकेली बैठी थी। उसकी नज़र आसमान की तरफ थी। उसने धीरे से अपना हाथ उठाया और अपने पेट पर रख लिया। अचानक उसका पूरा शरीर जैसे एक करंट की लहर से भर गया। पेट की तरफ देखते हुए उसने कहा, "ये कैसे पॉसिबल हो सकता है? एक बच्चा? मैं बच्चा कैसे पैदा कर सकती हूँ? ये नामुमकिन है।"

    अरुणिमा अपने ही विचारों में गुम थी। तभी उसने आस्तिक के बारे में सोचा। वैसे उसे इस बात की कोई परवाह नहीं थी कि इस वक़्त उसे कोई पार्टी में ढूँढ रहा होगा या नहीं। लेकिन वह अच्छी तरह जानती थी कि आस्तिक को बच्चे वाली बात पसंद नहीं आई होगी। वह तो अरुणिमा के साथ खड़ा रहना तक बर्दाश्त नहीं कर सकता, फैमिली प्लानिंग करना तो दूर की बात थी।

    दोनों ही अपनी शादी में खुश नहीं थे। दोनों बस एक-दूसरे के साथ दिखावा कर रहे थे। ऐसे में एक-दूसरे को स्वीकार करना और बच्चे के बारे में सोचना दोनों के लिए ही नामुमकिन था।

    डरते हुए अरुणिमा अपना फोन तलाशने लगी। फ़्लैशबैक की धुंधली यादों में खोई हुई, उसने फोन निकाला और अपनी माँ का नंबर डायल कर दिया। फोन की घंटी बजती रही, लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया। अरुणिमा की आँखों से आँसू बहने लगे। उसे इस वक़्त अपनी माँ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी। वह उनसे बात करना चाहती थी।

    लगातार चौथी बार फोन बजा, लेकिन इस बार भी किसी ने फोन नहीं उठाया। गुस्से में उसने फोन गार्डन की घास पर फेंक दिया। वह पागलों की तरह रो रही थी और इधर-उधर देख रही थी। गार्डन में रोशनी तो थी, लेकिन कोई इंसान नहीं था। इस अकेलेपन में उसे और भी ज़्यादा तन्हा और असहाय महसूस हो रहा था।

    कौन था उसके पास? वह सच में अकेली थी। उसके माता-पिता ने शादी के बाद उससे कभी ठीक से बात नहीं की थी, न ही मिलने आए थे। आस्तिक ने उसे दूसरे घर में ले जाकर ऐसे छोड़ दिया था, जैसे वह कोई सजावट का सामान हो। रायचंद खानदान से क्या ही उम्मीद करती? जब उसका खुद का पति उसकी परवाह नहीं करता, तो और कौन करेगा?

    अरुणिमा के पास देखा जाए, तो कुछ भी नहीं था। वह बिल्कुल अकेली थी।

    अचानक उसका सीना भारी हो गया। उसके दिल में तेज़ दर्द उठने लगा। रोते हुए उसने अपने सीने पर हाथ रखा और उसे सहलाने लगी। इस दर्द को वह बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। आखिर कोई उससे बच्चे की उम्मीद कैसे कर सकता है? हाँ, वह और आस्तिक शादीशुदा हैं, लोगों की नज़र में वे पति-पत्नी हैं। ऐसे में अगर खानदान उनसे बच्चों की उम्मीद करता है, तो इसमें कुछ गलत नहीं।

    लेकिन वह दुनिया के सामने अपनी शादी की सच्चाई नहीं लाना चाहती थी। यह भी सिर्फ़ इसलिए, क्योंकि आस्तिक चाहता था कि उनकी शादी का सच राज़ ही बना रहे।

    इतना तो वह आस्तिक को जानती थी कि अगर उसे बच्चा चाहिए भी होगा, तो वह अरुणिमा से नहीं होगा। क्योंकि आस्तिक ने कभी अरुणिमा को छुआ तक नहीं था। बिना छुए प्रेग्नेंट हो जाना? अरुणिमा कोई जादूगरनी थोड़ी ना है।

    अरुणिमा को पहले से पता था कि आस्तिक की ज़िंदगी में कोई दूसरी औरत है। और अगर उसे बच्चा चाहिए भी होगा, तो शायद वह उसे दूसरी औरत से होगा, अरुणिमा से नहीं।

    आस्तिक इस शादी से निकलना चाहता था, और अरुणिमा भी। लेकिन उनकी किस्मत में कुछ और ही लिखा था। इस जहरीली शादी को अभी और निभाना था।

    अरुणिमा अब भी गार्डन के बेंच पर बैठी हुई थी। आँसू सूख गए थे, लेकिन चेहरे पर दर्द अभी भी था। वह लगभग एक घंटे से वहीं बैठी थी और तारों को देख रही थी। तभी उसे अपने पीछे किसी आहट का एहसास हुआ।

    पीछे पलटकर देखा, तो वेटर की वर्दी में एक लड़की खड़ी थी और उसकी तरफ देख रही थी।

    "मैडम, आपके हस्बैंड ने मुझे आपको बुलाने के लिए भेजा है।"

    अरुणिमा ने लड़की की बात सुनी, लेकिन उसे कोई खास हैरानी नहीं हुई। अगर आस्तिक उसे वापस पार्टी में बुला रहा है, तो इसका मतलब पार्टी अभी खत्म नहीं हुई है। और वे दोनों ही आज की पार्टी के सेंट्रल ऑफ़ अट्रैक्शन हैं।

    "तुम जाओ, मैं आ रही हूँ," अरुणिमा ने लड़की से कहा।

    लड़की ने जवाब दिया, "मैडम, उन्होंने मुझसे कहा है कि मैं आपको साथ लेकर आऊँ। दरअसल, वे आपको अपने कमरे में बुला रहे हैं।"

    लड़की की बात सुनकर अरुणिमा की आँखें सिकुड़ गईं। उसने हैरानी से पूछा, "क्या? आस्तिक मुझे कमरे में बुला रहे हैं? तुमने ठीक से सुना है ना?"

    लड़की ने जल्दी से सिर हिलाते हुए कहा, "जी मैडम, उन्होंने यही कहा है कि वे आपको अपने कमरे में मिलना चाहते हैं। और वे थोड़े गुस्से में भी हैं। प्लीज़ मैडम, जल्दी चलिए।"

    इतना कहने के बाद वह लड़की वहाँ से थोड़ा पीछे हट जाती है। अरुणिमा उसे हैरानी से देखती है और फिर कहती है, "ठीक है, तुम चलो, मैं आ रही हूँ।"

    लड़की ने सिर हिलाया और वहाँ से पार्टी की तरफ चली गई। अरुणिमा कुछ देर सोचने लगी और फिर उसने सोचा, शायद आस्तिक को आज की अनाउंसमेंट के बारे में अकेले बात करनी है। शायद उसने कुछ सोच रखा होगा कि कैसे इस प्रॉब्लम से बाहर निकले। इसीलिए वह वहाँ से उठती है और एक गहरी साँस छोड़ते हुए हवेली की तरफ चल देती है। वह सीधे आस्तिक के कमरे की ओर बढ़ जाती है।

    अरुणिमा के हाथ पसीने से भीगे हुए थे। वह अभी इसी बारे में सोच रही थी कि आखिर आस्तिक ने इस बारे में क्या फैसला लिया होगा। यह पूरी तरह उसी के ऊपर निर्भर करता था। उसके पिता ने जो घोषणा की थी, उसके तहत उन दोनों के लिए यह बस एक सपना ही हो सकता है। ना तो आस्तिक को यह मंज़ूर था और ना ही अरुणिमा इस चीज़ को स्वीकार करने वाली थी।

    गैलरी में अपने कदम बढ़ाते हुए अरुणिमा बस यही सोच रही थी। पर जैसे ही वह आस्तिक के कमरे में एक बार फिर से जाती है, तो हैरान रह जाती है। कमरा पूरी तरह से अंधेरे में डूबा हुआ था।

    अरुणिमा हैरान हो गई। अभी एक घंटे पहले तो वह कमरे में आई थी, तब तो यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था। पर अब इस कमरे में इतना अंधेरा क्यों है? यही सोचते हुए अरुणिमा ने अपना हाथ स्विच बोर्ड की तरफ बढ़ाया। उसने दरवाज़े के पीछे लगे स्विच बोर्ड की तरफ अपनी उंगलियाँ रखी ही थीं कि अचानक से उसे अपनी बाजू पर एक जकड़न सी महसूस होती है। वह चौंक जाती है, और इससे पहले कि वह कुछ हरकत कर पाती, उसे अपनी नाक पर एक कपड़ा महसूस होता है। उसी के साथ एक तेज़ गंध ने उसके दिमाग पर कब्ज़ा कर लिया।

    किसी ने अरुणिमा की नाक पर क्लोरोफॉर्म लगाकर उसे बेहोश कर दिया था। और देखते ही देखते, अरुणिमा वहीं बेहोश होकर गिर जाती है।

    आस्तिक वापस पार्टी में आ गया था, लेकिन इस वक़्त उसकी नज़र सिर्फ़ पुष्कर जी की तरफ़ थी, जो अभी भी अपने माफ़िया ग्रुप के साथ खड़े थे। इस बार वे काफ़ी खुश नज़र आ रहे थे। जितना वे खुश नज़र आ रहे थे, उतनी ही नफ़रत आस्तिक को हो रही थी। उसने अपने हाथों की मुट्ठियाँ कस ली थीं और गुस्से में अपने पिता को देखते हुए मन ही मन कहा,

    "एक बार फिर से आप जीत गए, डैड। पर आस्तिक रायचंद ऐसा इंसान नहीं है जिसके साथ खेल खेला जा सके। आपने बहुत कंट्रोल कर लिया है मेरी ज़िंदगी को। अब से अपने डिसीज़न मैं खुद लूँगा।"

    आस्तिक के होंठों के किनारे थोड़े मुड़ गए और उसकी आँखों में अपने पिता के सबसे दर्दनाक अंजाम का मंज़र आ गया, जिसे वह भविष्य में सच करने की कल्पना कर रहा था।

    नेहा जी आस्तिक के पास आती हैं और कहती हैं, "अरुणिमा कहाँ है?"

    आस्तिक जहरीली मुस्कान के साथ मुस्कुराते हुए कहता है, "डोंट वरी मॉम, मारा नहीं है मैंने उसे। मतलब, अभी तक तो नहीं मारा। आगे का कह नहीं सकता। फ़िलहाल मुझे नहीं पता वह कहाँ है।"

    आस्तिक की बात सुनकर नेहा जी उसे घूरती हैं और कहती हैं, "अभी के लिए अपने जज़्बातों पर काबू रखो। कहीं ऐसा न हो कि बात हाथ से निकल जाए।"

    नेहा जी ने गुस्से से घूरती हुई नज़र से आस्तिक को देखा। पर तभी उनके आसपास कुछ लोगों की फुसफुसाहट सुनाई दी। आस्तिक और नेहा जी ने देखा कि लोग उनकी तरफ़ देख रहे थे और धीमे स्वर में कुछ बातें कर रहे थे।

    आस्तिक ने गुस्से में उन सबकी तरफ़ देखा। तभी उसकी नज़र प्रोजेक्टर पर गई। और जो उसने देखा, उसने उसके माथे की नसें खींच दीं और उसकी आँखें कठोर हो गईं। उसकी नाक गुस्से में भड़क रही थी, क्योंकि प्रोजेक्टर पर एक वीडियो चल रही थी।

    आस्तिक का शरीर गुस्से से काँप रहा था। उसकी मुट्ठियाँ जवाब दे चुकी थीं। उसने कमर पर रखी हुई पिस्तौल निकाली और उसे अनलॉक कर दिया। गुस्से में वह प्रोजेक्टर को देखते हुए बोला,

    "ये लड़की आज अपनी ज़िंदगी पर पछताएगी। हिम्मत कैसे हुई इसकी मेरी इमेज खराब करने की? किसी की इतनी हिम्मत नहीं जो मुझ पर कीचड़ उछाल सके। लेकिन इस लड़की ने आज यह गलती कर दी। आज तो यह मरी।"

    गुस्से में आस्तिक ने ज़ोर से टेबल पर लात मारी, और सामने रखा हुआ एनिवर्सरी केक अगले ही पल ज़मीन पर गिरकर धूल चाट रहा था। आस्तिक ने किसी की भी परवाह नहीं की। कोई उसे कुछ कहता, उससे पहले ही वह वहाँ से निकल गया।

  • 12. aaj se jungle ka raja Mor hai

    Words: 2446

    Estimated Reading Time: 15 min

    एक भरी महफ़िल में आस्तिक ने बंदूक निकाली और उसे लोड करते हुए अपने कमरे की ओर बढ़ा। सबके चेहरों पर घबराहट और डर साफ़ झलक रहा था। आभा इतनी डर गई थी कि अपनी जगह पर ही काँपने लगी। हालाँकि बचपन से ही उसने अपने परिवार को इस तरह बंदूक और माफ़िया के बीच देखा था, लेकिन वह हमेशा इन सब चीज़ों से डरती आई थी। इसीलिए वह कभी भी इन सब में शामिल नहीं होना चाहती थी। विक्रम, आभा के पास खड़ा था। उसे डरते हुए देख विक्रम ने कहा, "आभा, तुम कमरे में जाओ।" आभा डरते हुए विक्रम को देखकर बोली, "विक्रम... भाई गुस्से में गए हैं और वह भाभी को ज़रूर जान से मार देंगे। भाभी को बचा लो। वह ऐसा नहीं कर सकती। यह ज़रूर किसी की साज़िश है।" विक्रम ने एक नज़र आभा को देखा, उसके कंधे पर हाथ रखा और पास में कुर्सी पर बिठाते हुए कहा, "ठीक है, मैं आस्तिक को संभालता हूँ, लेकिन तुम खुद को संभालो।" यह कहते हुए विक्रम जल्दी से सीढ़ियों की ओर दौड़ गया। सारी महफ़िल की नज़रें स्क्रीन पर टिकी थीं, जहाँ एक के बाद एक तस्वीरें दिखाई जा रही थीं। स्क्रीन पर दिखाया जा रहा था कि अरुणिमा की साड़ी उसके कंधे से खुली हुई है और एक आदमी अरुणिमा के बहुत पास बैठा हुआ है... ऐसा लग रहा था जैसे वे दोनों कुछ करने वाले हैं। ऐसी तीन-चार तस्वीरें थीं, जो अभी स्क्रीन पर किसी फ़िल्म की तरह चल रही थीं। अरुणिमा का चेहरा पूरी तरह झुका हुआ था, और जो आदमी अरुणिमा के पास बैठा था, उसका चेहरा मास्क की वजह से नज़र नहीं आ रहा था। लेकिन ये तस्वीरें अभी की थीं, आस्तिक के कमरे की। क्योंकि जिस बिस्तर पर अरुणिमा बैठी हुई थी, उसके पीछे आस्तिक की तस्वीर लगी हुई थी। और यह वही साड़ी थी, जो अरुणिमा ने अभी पार्टी में पहनी हुई थी। स्क्रीन पर अरुणिमा को किसी और के साथ कमरे में देखकर सब लोग हैरान थे। और आस्तिक? उसका चेहरा गुस्से में अंगारों जैसा लाल हो रहा था। ऐसा लग रहा था मानो वह अपने आस-पास की हर चीज़ को जलाने वाला हो। गुस्से की आग में जलता हुआ आस्तिक अपने कमरे की ओर बढ़ रहा था ताकि अपनी बीवी के साथ-साथ उसके आशिक को भी ख़त्म कर सके। लेकिन जैसे ही आस्तिक कमरे में पहुँचा, वह एकदम हैरान रह गया। अरुणिमा कमरे में अकेली थी। सिवाय अरुणिमा के वहाँ और कोई नहीं था। वह बिस्तर पर बैठी हुई थी। अरुणिमा का चेहरा हल्का नीचे झुका हुआ था, और वह अजीब नज़रों से फर्श को देख रही थी। लेकिन जो चीज़ स्क्रीन पर थी, वह यहाँ भी थी। अरुणिमा की साड़ी उसके सीने से हटी हुई थी। आस्तिक गुस्से में अरुणिमा के पास गया। उसने अरुणिमा की बाजू पकड़कर उसे एक झटके से खड़ा किया। अरुणिमा लड़खड़ाते हुए आस्तिक की बाहों में झूल गई और उसे देखने की कोशिश करने लगी। आस्तिक ने गुस्से में दाँत पीसते हुए पूछा, "कहाँ है वह कमीना?" अरुणिमा उसे देखने की पूरी कोशिश कर रही थी। उसकी आँखें खुल ही नहीं रही थीं। लेकिन उसने जबरदस्ती अपनी आँखें खोलते हुए धीरे-धीरे मुस्कुराना शुरू कर दिया। और फिर हँसते हुए उसने आस्तिक को देखकर कहा, "यमराज!" आस्तिक हैरान रह गया। अरुणिमा ने हँसते हुए आस्तिक के गाल पर अपनी एक उँगली रखी और किसी बच्चे की तरह उसके गाल को दबाते हुए कहा, "मेरा पति यमराज से कम नहीं लगता। यह तो मैं जानती थी। लेकिन यमराज मेरे पति जैसा ही दिखता है..." इसके बाद अरुणिमा जोर-जोर से हँसने लगी। अरुणिमा की हँसी देखकर आस्तिक का गुस्सा और ज़्यादा बढ़ गया। उसने गुस्से में अरुणिमा की बाजू पकड़कर उसे एक झटके से छोड़ दिया। अरुणिमा बिस्तर पर बैठ गई और फिर से हँसने लगी। आस्तिक ने सबसे पहले उसकी साड़ी को उठाकर उसके कंधे पर ढँक दिया। अरुणिमा की ऐसी अजीब हरकतें देखकर आस्तिक समझ गया था कि अरुणिमा को नशा दिया गया है। उसे इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि उसके आस-पास क्या हुआ है और वह क्या कर रही है। पहले तो उसे अरुणिमा पर गुस्सा आ रहा था, लेकिन फिर उसे लगा कि किसी ने अरुणिमा का इस्तेमाल करके उसकी इमेज को खराब करने की कोशिश की है। अरुणिमा बिस्तर पर हँसते हुए आस्तिक को देखकर बोली, "पतिदेव, आपसे एक बात कहूँ?" आस्तिक कमरे में गुस्से से इधर-उधर देख रहा था ताकि उसे कुछ सुराग मिल सके। लेकिन अरुणिमा की बात सुनकर वह घूरती हुई नज़रों से अरुणिमा को देखने लगा। अरुणिमा हँसते हुए आस्तिक को देखकर बोली, "पतिदेव, आपको देखकर एक बात समझ नहीं आती है... घटिया होना अलग बात है, लेकिन घटिया होने पर इंसान गर्व कैसे कर सकता है?" आस्तिक गुस्से में अरुणिमा को देखता है और अगले ही पल अपनी बंदूक अरुणिमा की ओर कर देता है। अरुणिमा को अभी भी होश नहीं था। वह पागलों की तरह हँस रही थी। आस्तिक गुस्से में बोला, "अपनी ज़ुबान बंद करो, वरना अभी के अभी तुम्हारी जान ले लूँगा मैं।" तभी कमरे में विक्रम आ जाता है। वह जल्दी से आस्तिक को पकड़कर उसे पीछे करते हुए कहता है, "आस्तिक, क्या कर रहे हो? होश में आओ। देखो, भाभी होश में नहीं हैं। तुम्हें दिख नहीं रहा है? उन्हें नशा दिया गया है और वह नशे की हालत में यह सब कर रही हैं।" आस्तिक गुस्से में चिल्लाया, "इससे कहो अपनी ज़ुबान बंद रखे, वरना मुझे एक मिनट नहीं लगेगा इसकी ज़ुबान बंद करने में।" लेकिन अरुणिमा पर नशे का पूरा असर था। उसने अपनी जीभ बाहर निकालकर आस्तिक को चिढ़ाते हुए कहा, "🤪🤪🤪 नहीं करूँगी अपनी ज़ुबान बंद!" यह कहते हुए अरुणिमा किसी छोटे बच्चे की तरह आस्तिक को जीभ चिढ़ा रही थी और अजीब-अजीब आवाज़ें भी निकाल रही थी। आस्तिक का गुस्सा और बढ़ रहा था। लेकिन विक्रम ने आस्तिक का हाथ पकड़ा हुआ था, वरना इस समय आस्तिक के गुस्से के आगे अरुणिमा की जान ख़तरे में पड़ सकती थी। अब तक आभा और नेहा जी भी कमरे में आ चुकी थीं। जब उन्होंने अरुणिमा को इस हालत में देखा तो वे भी हैरान रह गईं। आभा ने जल्दी से एक नौकर को नींबू पानी लाने के लिए कहा और अरुणिमा के पास जाकर उसे संभालने लगी। नेहा जी ने आस्तिक को पकड़ा और उसे शांत करने की कोशिश की। आस्तिक गुस्से में चिल्लाया, "इस लड़की से शादी करके मैंने अपनी ज़िन्दगी बर्बाद कर ली है।" अरुणिमा ने मुँह बनाते हुए जवाब दिया, "तो तुमसे शादी करके मैं कौन सी हीरोइन बन गई हूँ?" नेहा जी ने गुस्से में आस्तिक को पीछे धकेलते हुए कहा, "आस्तिक, शांत रहो। वह नशे में है, तुम नहीं। नीचे पार्टी में बवाल हो चुका है। तुम्हारे डैड को यह हरकत बिल्कुल पसंद नहीं आई है, और वह वहाँ मेहमानों को सफ़ाई दे रहे हैं।" नेहा जी ने विक्रम की ओर देखकर कहा, "विक्रम, इसे संभालो। मैं नीचे जाकर देखती हूँ।" विक्रम ने सिर हिलाते हुए कहा, "जी, आंटी।" नेहा जी ने एक नज़र अरुणिमा पर डाली, जो नशे में आभा के ऊपर लगभग गिरने वाली थी, और फिर कमरे से चली गईं। लेकिन आस्तिक अभी भी गुस्से में अरुणिमा को ही देख रहा था। विक्रम ने आस्तिक को संभालते हुए कहा, "आस्तिक, सिचुएशन को समझो।" आस्तिक गुस्से में कमरे के इधर-उधर देख रहा था। उसकी नज़रें हर कोने में कुछ ढूँढ रही थीं। विक्रम को पता था कि वह क्या ढूँढ रहा है। इस बीच, नौकर नींबू पानी लेकर आ गया। आभा अरुणिमा को संभालते हुए उसे धीरे-धीरे नींबू पानी पिलाने की कोशिश कर रही थी। लेकिन अरुणिमा बार-बार आभा के हाथ झटक रही थी। सिर्फ़ आभा ही जानती थी कि इस वक़्त अरुणिमा को संभालना कितना मुश्किल हो रहा था। आस्तिक और विक्रम कमरे में कुछ ढूँढ रहे थे। तभी आस्तिक की नज़र फूलदान में फूलों के बीच छिपे हुए एक हिडन कैमरे पर पड़ी। उसने गुस्से में कैमरा उठाया और अगले ही पल जमीन पर पटककर तोड़ दिया। आस्तिक गुस्से में चिल्लाया, "कोई मेरी इमेज ख़राब करने की कोशिश कर रहा है। और मैं उस इंसान को जान से मार दूँगा जिसने यह करने की हिम्मत की है।" विक्रम ने टूटे हुए कैमरे को देखा और हैरानी से कहा, "यह तो बहुत बड़ी बात है। तुम्हें किसी पर शक है? भाभी के साथ इस तरह की हरकत कौन कर सकता है, वह भी उन्हें नशे में लाकर?" आस्तिक ने गुस्से में अपनी मुट्ठियाँ कस ली थीं और वह गुस्से में टूटे हुए कैमरे को देखकर बोला, "वह जो कोई भी है, उसने ग़लत इंसान से पंगा लिया है। मैं यह तो नहीं जानता कि वह कौन है, लेकिन अरुणिमा के साथ जब उसकी तस्वीर और वीडियो प्ले हो रही थी, तो मैंने उसके मास्क पर एक निशान देखा था। मुझे अपने किसी दुश्मन का चेहरा याद नहीं आ रहा है, जो मेरे साथ ऐसी घटिया हरकत कर सकता है। लेकिन वह चेहरे पर निशान वाला इंसान मैं जल्दी ही तलाश कर लूँगा और जिस दिन वह मेरे हाथ लगेगा, उस दिन उसकी वह हालत करूँगा कि वह अपनी जान की भीख माँगेगा।" इसके बाद आस्तिक ने एक नज़र गुस्से से अरुणिमा की ओर देखा, उसके चेहरे पर अरुणिमा के लिए नफ़रत साफ़ नज़र आ रही थी। मन तो उसका भी कर रहा था अरुणिमा की जान ले लेने का, लेकिन अभी उसे अरुणिमा की ज़रूरत थी। उसे अपने लक्ष्य को पूरा करना था। आस्तिक को जो पावर चाहिए, उसके लिए उसे माफ़िया में अपनी जगह बनानी थी और इसके लिए उसे अपने परिवार को अरुणिमा से एक वारिस देना था। इसीलिए वह चाहकर भी अरुणिमा को मार नहीं सकता था। विक्रम के फ़ोन में कुछ नोटिफ़िकेशन आते हैं। विक्रम जैसे ही उसे देखता है, उसकी आँखें एकदम से बड़ी हो जाती हैं। वह जल्दी से आस्तिक से कहता है, "आस्तिक, एक और प्रॉब्लम हो गई है। पार्टी में से किसी ने उसकी फ़ोटो की वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दी है और इस समय भाभी की फ़ोटो पूरे सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है।" आस्तिक का गुस्सा वैसे ही भड़का हुआ था, ऊपर से विक्रम की बात ने उसके गुस्से में पेट्रोल का काम कर दिया। वह भटकती हुई निगाहों से विक्रम को देखकर बोला, "पता करो कि किस कमीने ने सोशल मीडिया पर उसकी फ़ोटो डाली है। साला सब ने खिलौना समझ रखा है क्या? कुछ दिन के लिए शांत क्या रहा, गिद्धों को लगने लगा कि जंगल उनका है। लगता है अब समय आ गया है सबको बताने के लिए कि जंगल का असली राजा शेर होता है।" आस्तिक की बात सुनकर अरुणिमा जोर से हँसने लगती है और अपनी जगह पर खड़ी होते हुए कहती है, "जंगल का राजा शेर होता है, चल झूठे।" आस्तिक अपनी धधकती हुई नज़रों से अरुणिमा को देख रहा था, उसने खुद को किस तरीके से कण्ट्रोल किया हुआ था, यह तो बस वही जानता था। अरुणिमा को आभा संभालने की कोशिश कर रही थी, लेकिन अरुणिमा आस्तिक को देखकर हँसते हुए कहती है, "अरे, जंगल का राजा शेर होता है, यह बात शेर को थोड़ी न पता है। यह बात तो बस इंसानों को पता है, तो शेर को कौन बताया कि वह जंगल का राजा है? शेर को फ़र्क नहीं पड़ता कि वह जंगल का राजा है या नहीं, तो किसी को भी बना दो जंगल का राजा। शेर को कौन बताने जा रहा है? आज से जंगल का राजा मोर है।" आभा, "आज से जंगल का राजा मोर है, ऐलान कर दो।" अरुणिमा किसी भाषण देने वाले नेता की तरह ऑर्डर दे रही थी। विक्रम तो एकदम हैरान हो गया था, जबकि आस्तिक गुस्से में अरुणिमा को घूर रहा था। आभा ने अपना सिर पीट लिया और जल्दी से अरुणिमा को बिठाकर उसे नींबू पानी पिलाने की कोशिश करने लगी ताकि उसका नशा कुछ कम हो। आस्तिक को पता था अगर वह थोड़ी देर और यहाँ रुका, तो शायद अरुणिमा की हरकतें उसे इस हद तक पागल कर देंगी कि वह अरुणिमा की जान ले लेगा। इसीलिए वह जल्द से जल्द कमरे से बाहर निकल जाता है। वह अब यहाँ और नहीं रुकना चाहता था, इसीलिए उसने आभा से कहा कि नौकर की मदद से अरुणिमा को गाड़ी में बिठा दे, वह बस यहाँ से जल्द से जल्द निकलना चाहता था। पर जैसे ही आस्तिक सीढ़ियों से होता हुआ नीचे की ओर आ रहा था, उसके रास्ते में बेला आ जाती है। बेला के चेहरे पर एक जहरीली मुस्कान थी और वह आस्तिक को देख रही थी। आज तक वैसे ही गुस्से में था, लेकिन वह बहस नहीं करना चाहता था। बेला ने हँसते हुए कहा, "तुम्हें पता है भाई, इस समय पार्टी में हर कोई तुम्हारे बारे में बात कर रहा है। सबका यही कहना है कि शायद तुम अपनी बीवी को खुश नहीं कर पाते हो, इसलिए तुम्हारी बीवी अपनी खुशियाँ ढूँढने के लिए दूसरों के पास जाती है।" आस्तिक ने एक घूरती हुई और ख़तरनाक नज़र से बेला को देखा, तो बेला के चेहरे पर जो मुस्कान थी, वह हल्की फीकी हो जाती है और वह डरते हुए कहती है, "मैं तो बस वही बता रही थी जो लोग कह रहे हैं।" आस्तिक ने गुस्से में बेला से कहा, "मुझे नहीं पता कि किसने मेरे साथ धोखा करने की कोशिश की है, लेकिन वह जो कोई भी है, मैं जल्दी उसके बारे में पता लगा लूँगा और उसे अपनी जान देकर मुझे उलझने की कीमत चुकानी पड़ेगी, चाहे वह कोई भी हो।" आस्तिक ने यह भले से कहा था, लेकिन उसके शब्दों में चेतावनी और आँखों में एक ख़तरनाक इरादा नज़र आ रहा था। बेला काँप जाती है, लेकिन हिम्मत करते हुए कहती है, "भाई, अब मुझ पर शक कर रहे हैं।" आस्तिक ने पूछा, "मुझे एक वजह बताओ कि मैं तुम पर शक करूँ।" बेला के पास इसका कोई जवाब नहीं था और उसने अपना चेहरा दूसरी तरफ करते हुए कहा, "मैंने आपके लिए हमेशा अपनी वफ़ादारी साबित की है, भाई। और हम दोनों के बीच एक सौदा हुआ है, जिसके लिए मैंने अपने सगे भाई के साथ धोखा किया है। आपको लगता है मैं ऐसा कुछ कर सकती हूँ?" आस्तिक ने डेविल स्माइल के साथ कहा, "हाँ, मुझे पता है कि तुमने मुझे वफ़ादारी निभाने के लिए अपने सगे भाई के साथ धोखा किया है, पर जो लड़की अपने सगे भाई को नहीं छोड़ सकती, उस पर भरोसा करना बेवकूफी होगी।" "अगर बात ऐसी है, तो भरोसा तो अब हमें अरुणिमा पर भी नहीं है कि वह इस घर के वारिस को जन्म देने के लायक है।" यह आवाज़ पीछे से आई थी, और जब उन दोनों ने पीछे की तरफ देखा, तो दोनों की आँखें एकदम से बड़ी हो जाती हैं।

  • 13. bilaute Jaisi Aankhen

    Words: 2963

    Estimated Reading Time: 18 min

    "ऐसे में तो अब हमें भी तुम्हारी बीवी पर भरोसा नहीं करना चाहिए। मुझे नहीं लगता कि भाई साहब अब अपने घर का वारिस किसी बदचलन औरत से चाहेंगे। अरुणिमा ने रायचंद परिवार के नाम और प्रतिष्ठा पर कीचड़ उछाला है। और उसके बाद, क्या पता अगर वो प्रेग्नेंट हो भी जाए तो वो तुम्हारा बच्चा होगा भी या नहीं। हो सकता है किसी और के साथ..."


    "अपनी ज़ुबान पर लगाम रखकर बात कीजिए चाची जी। कहीं ऐसा ना हो कि अरुणिमा के लिए ना सही, लेकिन मेरी बीवी के कैरेक्टर को जज करने के लिए मेरे हाथों मेरे परिवार के किसी सदस्य का खून हो जाए।"


    आस्तिक ने गुस्से भरी ज़ुबान में चाची को देखते हुए कहा। इस समय उनके सामने कोई और नहीं, बल्कि आस्तिक की चाची थीं। ये चाची रिश्ते में चेतन और बेला की मौसी लगती थीं। ये बेला की माँ की दूर की रिश्तेदार थीं। अपनी बहन की मौत के बाद उन्होंने अपनी बहन के बच्चों को संभालने के लिए आस्तिक के चाचा से शादी कर ली थी। लेकिन शादी के कुछ सालों बाद ही आस्तिक के चाचा का एक हार्ट अटैक से निधन हो गया था।


    इन मोहतरमा का नाम था खुशबू रायचंद। ये आस्तिक की चाची और चेतन व बेला की मौसी लगती थीं। खुशबू जी की अपनी कोई संतान नहीं थी। उन्होंने हमेशा चेतन और बेला की परवरिश में ही अपना सारा ध्यान लगाया था। वो इस घर में सिर्फ आग में घी डालने का काम करती थीं, इसीलिए ज्यादातर इस घर से बाहर ही रहा करती थीं। उन्हें हमेशा लगता था कि चेतन और बेला को वो हक नहीं मिला जो उन्हें मिलना चाहिए था। इसीलिए वो हमेशा इन दोनों के हक के लिए खड़ी रहती थीं।


    आस्तिक और अरुणिमा की शादी में वो अकेली ऐसी शख्स थीं जो इस शादी के खिलाफ थीं। और ये कभी भी मौका नहीं छोड़ती थीं आस्तिक या उसके परिवार के किसी एक को ताने मारने का। सब लोग इनके कड़वे व्यवहार से वाकिफ थे, इसीलिए कोई भी इनके साथ उलझना नहीं चाहता था।


    खुशबू मौसी गुस्से में बेला के पास आ गईं और बेला को घूरते हुए, मौसी को नजरों से चुप रहने का इशारा किया। लेकिन खुशबू मौसी पीछे कहाँ रहने वाली थीं। उन्होंने अपने हाथ बांधते हुए कहा, "मुझे क्यों चुप करवा रही हो? जो सच है, वही तो कह रही हूँ। वो लड़की मुझे शुरू से ही पसंद नहीं थी इस घर की बहू के रूप में। लेकिन पता नहीं क्यों सबको किया भूत सवार था जो उसे घर की बहू बना दिया। अब देखो, उसने क्या किया है! इस घर का मान-सम्मान, प्रतिष्ठा सबको एक मिनट में धूल में मिला दिया है।"


    "अरुणिमा के बारे में आपको फिक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है, चाची जी। उसके लिए मैं बैठा हूँ। और मेरी बीवी इस घर को वारिस देगी या नहीं, ये फैसला मेरा और मेरी बीवी का होना चाहिए। वैसे देखा जाए तो इस घर के वारिस के लिए आप और किससे उम्मीद लगा सकती हैं?"


    आस्तिक ने ये बात खुशबू मौसी को ताना मारते हुए कही। उनका चेहरा गुस्से में सख्त हो गया था। वो घूरती हुई नजरों से आस्तिक को देख रही थीं और गुस्से में उन्होंने आस्तिक से कहा, "भाई साहब इस चीज़ के लिए कभी राजी नहीं होंगे। तुम्हारी बीवी एक बदचलन लड़की है और सबके सामने उसके रंगरलियों की फुटेज चल रही है। इतने सालों से तुम्हारे परिवार ने जो इज्जत समाज में कमाई थी, तुम्हारी बीवी ने वो सारी गँवा दी है। और भाई साहब इस बात से बहुत नाराज़ होंगे। देखना, वो कभी भी तुम्हारी बीवी से इस घर का वारिस देने की उम्मीद नहीं करेंगे।"


    "इस घर के वंश को अगर कोई आगे बढ़ाएगी तो वो है मेरी बहू अरुणिमा आस्तिक रायचंद..." ये आवाज पुष्कर जी की थी, जो गलियारे में गूंज गई। उनकी कड़क आवाज सुनकर सब लोग पीछे की तरफ देखते हैं, जहाँ पर पुष्कर जी और नेहा जी साथ में आ रहे थे। नेहा जी को देखकर खुशबू मौसी की आँखों में नफरत साफ नजर आ रही थी। वो शुरू से ही इस औरत से नफरत करती थीं। लेकिन इस समय नेहा जी पावर में थीं, इसलिए वो कुछ नहीं कर पा रही थीं।


    पुष्कर जी वहाँ आते हैं और सबको अपनी घूरती हुई नजरों से देखना शुरू करते हैं।


    "ये आप क्या कह रहे हैं भाई साहब? बाहर जो फुटेज चल रहा है, उसके बाद भी आप इस बात की उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि अरुणिमा हमारे घर को वारिस दे सकती है? अगर ये कोई मजाक है, तो बहुत घटिया मजाक है," मौसी जी ने नफरत से उन दोनों को देखते हुए कहा।


    लेकिन पुष्कर जी की आवाज का दम ऐसा था कि वो वहाँ के माहौल को शांत करवाने के लिए काफी था। उन्होंने घूरती हुई नजरों से खुशबू मौसी को देखा और कहा, "तुम्हें लगता है कि अपने परिवार के अगले वंश के लिए मैं मजाक करूँगा?"


    "लेकिन भाई साहब, आप अरुणिमा से वारिस की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? आपने देखा नहीं, वो लड़की किसी गैर मर्द के साथ आस्तिक के कमरे में किस हालत में थी?"


    मौसी किसी भी हाल में मानने को तैयार नहीं थीं और अरुणिमा पर इल्ज़ाम लगा रही थीं। लेकिन पुष्कर जी ने अपनी छड़ी जोर से जमीन पर पटकी। उसके बाद किसी की कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई। आस्तिक के चेहरे पर गुस्सा ज़रूर था, लेकिन अपने पिता के सामने उसने भी अपनी आवाज बंद रखी। बेला तो पुष्कर जी के वहाँ आते ही खामोश हो गई थी।


    "हाँ, देखा मैंने वीडियो। जो सबने देखा। लेकिन क्या तुमने नहीं देखा कि अरुणिमा को नशा दिया गया था? वो होश में नहीं थी। ये बात उस वीडियो में साफ-साफ दिखाई दे रही थी। तुम्हें लगता है, खुशबू, मैं बेवकूफ हूँ? इतनी बड़ी कंपनी, इतनी बड़ी प्रॉपर्टी, और माफिया का बिज़नेस मैंने क्या अंताक्षरी खेलते हुए बनाया है? इंसान को देखकर चेहरा पहचान लेता हूँ मैं। मेरे अपने घर में कितने साँप और कितने अजगर बैठे हुए हैं, मुझे अच्छी तरह से पता है। लेकिन अगर मैं सबकी सच्चाई पर से पर्दा उठाने शुरू कर दूँ, तो रायचंद परिवार एक दिन में बिखर जाएगा। इसीलिए, अगर रिश्ते बचाने के लिए खामोश रहना पड़े, तो इसमें बुराई क्या है?


    "और जहाँ तक बात रही अरुणिमा की, तो मैं कोई बेवकूफ नहीं हूँ जो राह चलते किसी लड़की से आस्तिक की शादी करवा दूँ। अरुणिमा के बारे में मैं अच्छी तरह से जानता हूँ। वो जितनी मासूम और भोली है, उतनी ही समझदार भी है। ऐसी बेवकूफी भरी हरकत वो खुद से नहीं करेगी। वीडियो में साफ-साफ पता चल रहा था कि उसे नशा दिया गया है। अरुणिमा ने आज तक शराब को हाथ भी नहीं लगाया है। ये बात सब जानते हैं।"


    पुष्कर जी ने सबके मुँह पर ताले लगाते हुए ये बात कही। लेकिन खुशबू मौसी को अभी भी चैन नहीं था। उन्होंने घूरती हुई नजरों से पुष्कर जी को देखकर कहा, "लेकिन भाई साहब, सिर्फ आपको भरोसा है। इसीलिए तो आप इतना बड़ा रिस्क ले रहे हैं। क्या भरोसा है कि वो लड़की आपके वंश को आगे बढ़ाने के लिए सही है या नहीं? और क्या गारंटी है कि अगर वो प्रेग्नेंट हुई, तो ये बच्चा आस्तिक का ही होगा?"


    नेहा जी को अब गुस्सा आने लगा था। उन्होंने अपने गुस्से को जितनी मुश्किल से कंट्रोल कर रखा था, उतना ही खुशबू मौसी ने उसे बाहर निकालने पर तुली हुई थीं। उन्होंने गुस्से में खुशबू मौसी की तरफ देखते हुए कहा, "बहुत हो गया, खुशबू! अपनी जुबान बंद करो। हमने तुम्हें यहाँ अपनी खुशियों में शामिल होने के लिए बुलाया था, लेकिन तुम तो यहाँ आकर हमारी ही बहू पर इल्ज़ाम लगा रही हो।"


    "इल्ज़ाम नहीं लगा रही हूँ, भाभी। सवाल कर रही हूँ। क्योंकि ये घर मेरा भी है और इस घर पर मेरा भी उतना ही हक है। मैं यहाँ सिर्फ चेतन और बेला की मौसी नहीं हूँ, बल्कि आपकी देवरानी भी हूँ। रायचंद परिवार की बहू हूँ मैं। और इस हक से कह रही हूँ कि एक ऐसी लड़की, जिसने हमारे परिवार की मान-प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिला दिया है, वो इस घर के वारिस को कैसे जन्म दे सकती है?"


    "तो तुम क्या चाहती हो, खुशबू? अगर अरुणिमा नहीं, तो फिर हमें वारिस कौन देगा? जहाँ तक मुझे पता है, चेतन इस लायक नहीं है कि बच्चा पैदा कर सके।"


    खुशबू मौसी के हाथों की मुट्ठियाँ कस गईं। उन्होंने घूरती हुई नजरों से आस्तिक को देखा, जिसके चेहरे पर डेविल स्माइल थी और वो अपनी आँखों से ही मौसी को चैलेंज कर रहा था। मौसी ने गुस्से में अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया और कहा, "चेतन बहुत जल्दी ठीक हो जाएगा। वो दवाइयाँ ले रहा है और अपना इलाज भी करवा रहा है। देखना, वो जल्दी ठीक हो जाएगा। और आप तो जानते हैं ना, भाई साहब, हाई स्कूल तक उसे कुछ भी नहीं हुआ था। वो बिल्कुल ठीक था। फिर पता नहीं कैसे..."


    "कैसे, क्या, कब, क्यों – इन सबसे मेरा कोई लेना-देना नहीं है, खुशबू। तुम इस घर की बहू हो, इसे हमने कभी नकारा नहीं है। मेरे छोटे भाई के गुज़रने के बाद भी मैंने तुम्हें वही सम्मान और जगह दी है जो उसकी पत्नी का होना चाहिए। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि तुम मेरी बहू पर उंगली उठाओगी। अरुणिमा का चयन मैंने बहुत सोच-समझकर किया है। और चलो, ठीक है, मान लिया कि चेतन अपना इलाज करवा रहा है। तो तुम बताओ, वो कब तक ठीक होगा? कितना समय लगेगा उसे ठीक होने में? उसके बाद शादी का छोड़ो, क्या गारंटी है कि वो ठीक होने के बाद वारिस देने के लायक रहेगा? कहो, खुशबू, गारंटी दे सकती हो?"


    "लेकिन भाई साहब..." खुशबू मौसी ने कुछ और कहने के लिए अपनी जुबान खोली ही थी कि आस्तिक बीच में आ गया। उसने अरुणिमा का बचाव करते हुए खुशबू मौसी को देखा और कहा, "मौसी जी, आपको नहीं लगता कि आप इस बात को कुछ ज़्यादा ही बढ़ा रही हैं? जब मुझे और मेरे परिवार को अरुणिमा से कोई शिकायत नहीं है, तो आप क्यों उसके पीछे हाथ धोकर पड़ी हुई हैं? ऐसा तो नहीं कि उसके बच्चा पैदा करने से या ना करने से आपका कोई फायदा या नुकसान हो।


    "वैसे भी, आपको चेतन के इलाज पर ध्यान देना चाहिए, ना कि मेरी बीवी के ऊपर। उसे संभालने के लिए मैं हूँ। और जहाँ तक मुझे पता है, मेरी बीवी इतनी बेवकूफ नहीं है कि शादीशुदा होते हुए भी किसी गैर मर्द के साथ रिश्ता रखे। दादा बिल्कुल सही कह रहे हैं, वो वीडियो में साफ दिखाई दे रहा था कि अरुणिमा को नशे की चीज़ देकर कमरे में ले जाया गया था। वरना अरुणिमा ऐसी हरकत कभी नहीं कर सकती। जब मुझे मेरी बीवी पर भरोसा है, तो फिर आप क्यों सबको उसके खिलाफ भड़काने की कोशिश कर रही हैं?"


    बेला ने खुशबू मौसी का हाथ पकड़कर पीछे खींचते हुए कहा, "मौसी, जब इन लोगों को कोई प्रॉब्लम नहीं है, तो आप क्यों उनके बीच में बोल रही हैं? वैसे भी अरुणिमा भाई से प्रेग्नेंट हो या किसी और से, ये उनका पर्सनल मैटर है। इसमें आपको पड़ने की ज़रूरत नहीं है। चलिए, वैसे भी चेतन भाई काफी देर से नज़र नहीं आ रहे हैं। चलकर उन्हें ढूँढते हैं।"


    ऐसा कहते हुए बेला, खुशबू मौसी को खींचते हुए अपने साथ ले जाती है। लेकिन नेहा जी की आँखों में जो नफरत थी, वो साफ नज़र आ रही थी। उन्होंने अपने हाथों की मुट्ठियाँ कस ली थीं।


    आस्तिक अपने पिता की तरफ देखते हुए कहता है, "मैं घर जा रहा हूँ। इतने सबके बाद मैं पार्टी में और नहीं रुक पाऊँगा।"


    पुष्कर जी गहरी साँस छोड़ते हुए कहते हैं, "ठीक है। तुम अरुणिमा को लेकर घर जाओ। रात काफी हो गई है। वैसे भी मैं पार्टी खत्म करने की अनाउंसमेंट करने ही वाला था। पर वीडियो की वजह से कुछ लोगों को सफाई देना ज़रूरी हो गया। तुम फ़िक्र मत करो, उन्हें मैं देख लूँगा। फ़िलहाल, अरुणिमा को संभालो।"


    आस्तिक हाँ में सर हिलाते हुए वहाँ से निकल जाता है। वो पीछे के गेट से वापस पार्किंग एरिया में जाता है, तो देखता है कि अरुणिमा अभी भी नशे में है और आभा उसे संभाले खड़ी है। तिवारी जी गाड़ी का दरवाज़ा खोलकर खड़े हैं, लेकिन अरुणिमा गाड़ी में बैठने के लिए नाटक कर रही है।


    आस्तिक अरुणिमा और आभा के पास पहुँचता है, जो गाड़ी के दरवाज़े के पास खड़ी थीं, लेकिन अरुणिमा अपने कदम दरवाज़े तक बढ़ा ही नहीं रही थी।


    "भाभी, प्लीज बैठ जाइए ना। आपको भाई के साथ घर जाना है।"


    "अगर मैं तुम्हारे भाई के साथ गई ना, तो वो मुझे घर नहीं, सीधे यमराज के पास भेजेगा... वो भी भैंस खुद ड्राइव करके। अरे, मत भेजो मुझे बिस्ट के साथ..." अरुणिमा ने नशे की हालत में खुद को खींचते हुए कहा।


    "तुम्हें मैं बिस्ट नज़र आता हूँ?"


    आस्तिक अरुणिमा के ठीक पीछे खड़ा था। अरुणिमा रुक जाती है, और आभा की आँखें एकदम बड़ी हो जाती हैं। अरुणिमा ने डरते हुए पीछे की तरफ देखा और सामने आस्तिक को देखकर अपने चेहरे की घबराहट छुपाते हुए लंबी-सी मुस्कान के साथ पूरी बत्तीसी चमकाते हुए बोली, "अरे पतिदेव, आप यहाँ खड़े हैं।"


    आस्तिक ने अपना हाथ अपनी पैंट की जेब से निकाला और अरुणिमा की कलाई पकड़कर उसे अपने करीब करते हुए आभा से कहा, "तुम जाओ। रात काफी हो गई है, जाकर आराम करो। सुबह तुम्हें ऑफिस जाना है।"


    आभा डरते हुए हाँ में सर हिलाती है और एक नज़र अरुणिमा को देखकर वहाँ से चली जाती है। लेकिन उसे जाता हुआ देखकर अरुणिमा के चेहरे पर घबराहट आ गई, क्योंकि अब वो आस्तिक के साथ अकेली थी।


    आस्तिक ने घूरती हुई नज़र से ड्राइवर तिवारी को देखकर कहा, "तुम भी जाओ। गाड़ी मैं खुद ड्राइव करूँगा।"


    अपने मालिक की आवाज़ सुनकर तिवारी कुछ नहीं बोल पाया। उसने हाँ में सिर हिलाया और गाड़ी की चाबी आस्तिक को देकर वहाँ से चला गया। अब वहाँ सिर्फ़ आस्तिक और अरुणिमा खड़े थे।


    आस्तिक ने घूरते हुए अरुणिमा की नशीली आँखों में देखते हुए कहा, "क्या कह रही थी तुम आभा से मैं बिस्ट हूँ?"


    "किसने कहा आप बिस्ट हो? मैंने तो बिल्कुल भी नहीं कहा। आपने गलत सुना होगा। आपके कान बज रहे होंगे। मैं तो आभा से ये कह रही थी कि कहाँ हैं तुम्हारे हैंडसम से भैया, जो मुझे अपनी गोद में उठाकर गाड़ी तक ले जाएँगे," अरुणिमा ने मासूमियत से कहा।


    आस्तिक उसे घूरते हुए बोला, "क्या कहा तुमने? मैं तुम्हें गोद में उठाकर गाड़ी तक ले जाऊँगा?"


    अरुणिमा अपनी टिमटिमाती हुई नजरों से आस्तिक को देखते हुए धीरे से बोली, "ले जाना तो पड़ेगा, क्योंकि आपने मेरे पैरों को चलने लायक ही नहीं छोड़ा है।"


    आस्तिक घूरते हुए बोला, "वो कैसे?"


    अरुणिमा रोती हुई सूरत बनाते हुए अपने पैर की तरफ़ देखती है। जब आस्तिक ने अरुणिमा के पैर देखे, तो उसने जल्दी से अपने पैर पीछे खींच लिए। दरअसल, अरुणिमा को पास लाते वक़्त आस्तिक ने अपने जूते वाले पैर अरुणिमा के सैंडल वाले पैरों पर रख दिए थे, जिससे उसकी उंगलियाँ बुरी तरह लाल हो गई थीं।


    आस्तिक घूरते हुए बोला, "अगर मेरे पैर तुम्हारे पैर पर थे, तो तुम बता नहीं सकती थी?"


    "कैसे बताती? आपकी इन बिलौटे जैसी आँखों से डर गई थी," अरुणिमा ने मासूमियत से कहा।


    आस्तिक दंग रहकर बोला, "बिलौटा? क्या?"


    अरुणिमा ने कहा, "और नहीं तो क्या। कभी देखा है खुद को आईने में? आपकी आँखें बिल्कुल बिलौटे जैसी हैं। इन्हें देखकर तो कोई भी डर सकता है। तो मैं तो मासूम सी चिड़िया हूँ।"


    आस्तिक अरुणिमा को खींचते हुए बोला, "बकवास बंद करो और चुपचाप गाड़ी में बैठो। वरना चिड़िया का शिकार करना इस बाज़ को अच्छी तरह से आता है।"


    अरुणिमा ने कदम बढ़ाए, तो उसके पैर में तेज दर्द हुआ। वो चिल्लाते हुए बोली, "मैं नहीं चल सकती। आपने अपने इस लेदर के जूते से मेरे पैर कुचल दिए हैं।"


    आस्तिक गुस्से में अरुणिमा को घूरता है और अगले ही पल उसे कंधे पर उठा लेता है। अरुणिमा हैरान रह जाती है। वो इसके लिए तैयार नहीं थी। लेकिन आस्तिक अब समय बर्बाद नहीं कर सकता था।


    वो अरुणिमा को लेकर गाड़ी तक गया और पिछला दरवाज़ा खोलकर उसे गाड़ी के अंदर धकेल दिया। अरुणिमा गाड़ी में लेट गई थी, और गाड़ी इतनी बड़ी थी कि वो पीछे की सीट पर आराम से फैल गई।


    आस्तिक ड्राइविंग सीट पर बैठा, गाड़ी स्टार्ट की और बैक मिरर से अरुणिमा को देखते हुए मन ही मन गुस्से में बोला, "आज तक किसी के लिए ऐसा नहीं किया, लेकिन इस लड़की ने मुझे ड्राइवर बना दिया। इसका बदला तो लेकर ही रहूँगा। बस ये होश में आ जाए, फिर आज रात जो कुछ इसने किया है, उसका पूरा हिसाब चुकाऊँगा।"


    वो अरुणिमा को लेकर घर पहुँचा। अरुणिमा गाड़ी में ही सो गई थी। उसे होश भी नहीं था कि आस्तिक उसे कब घर लेकर आया था।


    घर पहुँचकर आस्तिक ने अरुणिमा को अपनी गोद में उठाया और लिविंग रूम के सोफ़े पर पटक दिया। वो उसे उसके कमरे में नहीं ले गया। फिर उसने जूली और रोज़ी को अरुणिमा के पास छोड़कर अपने कमरे में चला गया। उसने एक बार भी पीछे मुड़कर अरुणिमा को देखा तक नहीं।


    अरुणिमा बेहोशी की हालत में सोफ़े पर ही सोती रही।


    अगली सुबह:


    जब अरुणिमा की आँख खुली, तो उसने देखा कि जूली और रोज़ी के साथ-साथ नीरज (आस्तिक का पर्सनल असिस्टेंट) भी खड़ा था।


    नीरज ने अपने बैग से एक टैबलेट निकालकर अरुणिमा की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा, "मैडम, ये दवाई खा लीजिए।"


    अरुणिमा हैरान होकर अपने मन में बोली, "मैं तो कल रात पार्टी में थी ना? फिर मैं घर कैसे आई?"


    उसे कुछ भी याद नहीं आ रहा था। आखिरी बात जो उसे याद थी, वो ये कि वो गार्डन में बैठी थी।


    तभी उसके सिर में तेज दर्द होने लगा। वो सिर पकड़कर सोफ़े पर बैठ गई। नीरज ने दवाई रखते हुए कहा, "मैडम, प्लीज ये दवाई खा लीजिए। आपका हैंगओवर उतर जाएगा।"

  • 14. aastik ke liye reputation mayne rakhti hai

    Words: 1176

    Estimated Reading Time: 8 min

    अरुणिमा अपने घर के सोफ़े पर बैठी थी। हैरानी से उसने अपने सामने खड़े नीरज, जूली और रोज़ी को देखा। उसका सिर दर्द से फटा जा रहा था, और उसे कुछ भी याद नहीं आ रहा था। वह हैरानी से नीरज की ओर देखती है, जो उसकी ओर एक दवाई बढ़ाते हुए कहता है, "मैडम, प्लीज़ आप इसे खा लीजिए, इससे आपका हैंगओवर उतर जाएगा।" अरुणिमा को कुछ भी याद नहीं आ रहा था। तभी उसकी नज़र अपने हाथ पर गई। उसका हाथ उंगलियों के निशान से लाल हो चुका था। उसकी कलाई पर उंगलियों के गहरे निशान थे। और यह साड़ी भी वैसी नहीं थी, जैसी वह कल रात पहनकर गई थी। उसने कल रात साड़ी सलीके से पहनी थी, लेकिन अब यह साड़ी अस्त-व्यस्त होकर बस उसके बदन पर लिपटी हुई थी। अचानक अरुणिमा की धड़कनें तेज हो गईं, और वह डरते हुए उन लोगों को देखने लगी। उसे डरा हुआ देखकर नीरज धीरे से पूछता है, "मैडम, क्या आपको कुछ याद है? आपको कौन कमरे में लेकर गया था और आपके साथ क्या हुआ है?" "क्या.. क्या कह रहे हो तुम? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। साफ़-साफ़ बताओ, तुम कहना क्या चाहते हो?" अरुणिमा डरते हुए नीरज से सवाल करने लगी। नीरज उसकी घबराहट देखकर पहचान गया कि अरुणिमा को नशे की वजह से कुछ भी याद नहीं है। नीरज ने अरुणिमा को देखते हुए कहा, "मैडम, आपको कोई नशीली चीज़ दी गई थी, जिसकी वजह से आप बेसुध हो गई थीं। उसके बाद कोई आपको आपके कमरे में ले गया और फिर आपके साथ कुछ अजीब तस्वीरें खींचकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दी हैं। इसकी वजह से बॉस की इमेज बहुत खराब हुई है।" अरुणिमा का मुँह खुला का खुला रह गया। वह अच्छी तरह से जानती थी कि आस्तिक के लिए उसकी प्रतिष्ठा कितनी मायने रखती है। उसने कई बार घर के नौकरों से सुना था कि अगर कोई आस्तिक की प्रतिष्ठा और छवि को खराब करना चाहता है, तो आस्तिक उस इंसान को जान से मार देता है, चाहे वह इंसान आस्तिक के लिए कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न हो। यही सोच-सोचकर अरुणिमा का शरीर जकड़ने लगा था। वह डरते हुए नीरज की तरफ़ देखने लगी। इस वक्त उसे इतना डर लग रहा था कि वह आस्तिक का सामना करने से बेहतर अपनी जान दे दे। वह डरते हुए नीरज से पूछती है, "क्या आस्तिक ने वह फ़ुटेज देखी है?" "जी मैडम, सिर्फ़ बॉस ने नहीं, कल रात पार्टी में सबने वह फ़ोटोज़ देख ली हैं।" अरुणिमा की धड़कनें अचानक से रुकने को हो गई थीं। वह डर से बुरी तरह काँप रही थी। उसे ऐसे दिखाया गया था जैसे वह कोई वेश्या हो। यह सिर्फ़ आस्तिक का नाम खराब नहीं कर रहा था, बल्कि अरुणिमा की गरिमा को भी चोट पहुँचा रहा था। लेकिन नीरज ने अरुणिमा को पूरी बात समझाते हुए कहा, "मैडम, उस फ़ुटेज को किसी ने इंटरनेट पर वायरल कर दिया है। वैसे बॉस इसके बारे में पता लगाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं कि इसे इंटरनेट पर किसने पोस्ट किया। कुछ ही घंटों में यह चीज़ इंटरनेट से हटा दी जाएगी।" अरुणिमा की साँसें तेज हो रही थीं। वह अचानक हिचकियाँ लेने लगी। उसकी आँखें आँसुओं से भर गई थीं, और उसका दिल इतनी बुरी तरह से धड़क रहा था कि वह अपनी जगह से हिल भी नहीं पा रही थी। नीरज, जूली और रोज़ी उसे ऐसे देखकर घबरा गए थे। रोज़ी ने जल्दी से कहा, "मैडम, क्या आप ठीक हैं? क्या मैं आपके लिए पानी लाऊँ?" रोज़ी भागते हुए किचन में गई और एक गिलास पानी लाकर अरुणिमा को दिया। अरुणिमा काँपते हुए हाथों से पानी का गिलास उठाती है और उसे पीने लगती है, लेकिन वह पानी पी कम रही थी और गिरा ज़्यादा रही थी। वह याद करने की कोशिश करती है कि कल रात क्या हुआ था, लेकिन उसे बस इतना याद आ रहा था कि वह आस्तिक के कमरे में गई थी। उसके बाद उसे कुछ भी याद नहीं आ रहा था। वह बहुत कोशिश कर रही थी पर उसे यह तक याद नहीं आ रहा था कि कमरे में किसके साथ थी और उसके साथ क्या हुआ। जैसा कि नीरज ने बताया, उसके मुताबिक सिर्फ़ अरुणिमा के चरित्र पर ही उंगली नहीं उठाई गई थी, बल्कि रायचंद परिवार भी अपमानित हुआ था। अरुणिमा घबराते हुए पानी पी ही रही थी कि तभी उसकी नज़र सीढ़ियों पर पड़ी। ब्लैक पैंट और शर्ट में आस्तिक अपनी बाज़ुएँ फोल्ड किए हुए सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था। उसके बाल हल्के बिखरे हुए थे, जैसे वह अभी सोकर उठा हो। आस्तिक को देखकर अरुणिमा का डर और ज़्यादा बढ़ गया। वह घबराई हुई नज़रों से आस्तिक को देखने लगी। लेकिन आस्तिक का चेहरा बिल्कुल भावहीन था। अरुणिमा को समझ ही नहीं आ रहा था कि आस्तिक गुस्से में है या नहीं, क्योंकि उसके चेहरे पर नाराज़गी के कोई लक्षण नज़र नहीं आ रहे थे। वह बिल्कुल सामान्य लग रहा था, जैसे हमेशा दूसरों के सामने रहता है। अरुणिमा के पास आकर आस्तिक उसे देखते हुए कहता है, "ठीक हो?" लेकिन अरुणिमा इतनी ज़्यादा डर गई थी कि वह आस्तिक के सवालों का जवाब भी नहीं दे पा रही थी। उसका मन कर रहा था कि इस वक्त यहाँ से कहीं भाग जाए। अरुणिमा घबराते हुए हाँ में सिर हिलाती है, लेकिन उसी वक्त आस्तिक ने अपने दोनों हाथ जोर से टेबल पर मारते हुए कहा, "अगर तुम ठीक हो, तो तुम्हें याद होगा कि कल रात तुम्हारे साथ कौन था। किसके साथ थी तुम कल रात कमरे में?" अरुणिमा के हाथों से पानी का गिलास छूट जाता है, और वह एकदम डर से काँप जाती है। वह जल्दी से ना में सिर हिलाते हुए कहती है, "मुझे कुछ भी याद नहीं है। मुझे नहीं पता कि मेरे साथ क्या हुआ है। मेरा यकीन करो, मैंने कुछ भी नहीं किया है।" लेकिन अगले ही पल आस्तिक ने गुस्से में अरुणिमा की कलाई पकड़ ली और उसे अपने साथ खींचकर कमरे की तरफ़ ले जाने लगा। अरुणिमा एकदम डर जाती है। वह रास्ते में आने वाली हर चीज़ को पकड़ने की कोशिश करती है ताकि खुद को बचा सके, लेकिन आस्तिक के सामने वह सब चीज़ें सिर्फ़ खिलौने जैसी थीं। इसके अलावा सारे नौकरों ने अपना सिर झुका लिया था, और नीरज भी चुपचाप अपनी आँखें बंद करके वहीं खड़ा था। रास्ते में जो भी नौकर आ रहे थे, वे आस्तिक को गुस्से में आता देख चुपचाप साइड हो जा रहे थे और अपना चेहरा दूसरी तरफ़ कर रहे थे। उनके लिए यह दृश्य जैसे था ही नहीं। उनके लिए सिर्फ़ एक ही चीज़ मायने रखती थी और वह था उनके मालिक का हुक्म। आस्तिक सीधे अरुणिमा को कमरे में ले गया और अगले ही पल उसे ले जाकर बिस्तर पर धकेल दिया। अरुणिमा संभाल नहीं पाई और अंधे मुँह बिस्तर पर गिर गई। इसी के साथ उसकी साड़ी का आँचल फिर से उसके सीने से सरककर नीचे जमीन पर बिखर गया।

  • 15. Get ready well tonight for our wedding night."

    Words: 2440

    Estimated Reading Time: 15 min

     आस्तिक अरुणिमा को लेकर सीधे कमरे में आता है और उसे बेड के कॉर्नर पर पटक देता है। अरुणिमा संभाल नहीं पाती और सीधे बेड पर गिर जाती है। उसकी साड़ी का आंचल उसके सीने से हट जाता है। वो डरते हुए बेड के ऊपर बैठ जाती है और अपनी कांपती हुई आवाज़ में आस्तिक से कहती है, "नहीं आस्तिक, मैंने कुछ भी नहीं किया है। मेरा यकीन करो, मैंने सच में कुछ नहीं किया।"



    "तुम्हें याद है हमारी शादी की रात मैंने तुमसे क्या कहा था? याद है या मैं फिर से याद दिलाऊं?"

    आस्तिक ने ये बात इतनी जोर से कही थी कि अरुणिमा अपनी जगह पर ही सिकुड़ गई। उसकी चिल्लाने की आवाज़ से अरुणिमा ने अपने दोनों घुटने मोड़कर अपना चेहरा उनमें छुपा लिया। उसकी आंखों से आंसू तेज़ी से बह रहे थे।



    आस्तिक अरुणिमा के पास आता है और ठीक उसके सामने खड़े होकर सवाल करने लगता है।

    "मुझे मत मारो! मैंने कुछ नहीं किया है। प्लीज मुझे चोट मत पहुंचाना। मैं सच कह रही हूं, मुझे इस बारे में कुछ भी नहीं पता।"



    अरुणिमा रोते हुए खुद को चोट न पहुंचाने की गुहार लगा रही थी। तभी आस्तिक ने गुस्से में उसका चेहरा अपने हाथों में लिया और उसे घुटनों से उठाकर अपनी तरफ कर लिया। अरुणिमा डरती हुई नज़रों से आस्तिक को देखने लगी। आस्तिक की लाल आंखें इस वक्त इतनी भयानक लग रही थीं कि अरुणिमा की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वो उसकी नज़रों से नज़र मिला सके। लेकिन आस्तिक ने उसके दोनों गालों को कसकर पकड़ लिया और उसे अपनी तरफ देखने पर मजबूर किया।



    "जवाब दो! तुम्हें याद है कि हमारी शादी की रात मैंने तुमसे क्या कहा था? ये आखिरी बार है जब मैं तुमसे पूछ रहा हूं, अरुणिमा। मैं अपनी बात बार-बार नहीं दोहराऊंगा।"

    आस्तिक ने गुस्से में धमकी भरे अंदाज़ में चेतावनी दी।



    अरुणिमा का पूरा बदन सुन्न हो गया था। उसके हाथ-पैर और चेहरा सब ठंडे पड़ गए थे। वो खुद को रोक नहीं पा रही थी। उसकी आंखों से आंसू इस तरह बह रहे थे जैसे उसके शरीर से प्राण निकल रहे हों।



    अरुणिमा ने काश कि अपनी आंखें बंद कीं और आस्तिक के सवालों पर गौर करने लगी। उसे उनकी शादी की रात याद आई, जब आस्तिक ने वो बात कही थी जिसने उनकी ज़िंदगी में एक दीवार खड़ी कर दी थी।



    जिस दिन आस्तिक अरुणिमा को शादी करके रायचंद मेंशन लेकर आया था, उसी दिन वो उसे वहां अकेला छोड़कर चला गया था। अरुणिमा पहली ऐसी दुल्हन थी जो अपनी रिसेप्शन पार्टी में अकेली खड़ी थी।

    सबको यही बताया गया था कि आस्तिक किसी ज़रूरी काम से गया है और उसका जाना बहुत ज़रूरी था। अगर वो नहीं जाता, तो कंपनी को भारी नुकसान हो सकता था। लेकिन अरुणिमा को शक हो गया था कि आस्तिक बिज़नेस की वजह से नहीं, बल्कि किसी और कारण से गया है।



    पुष्कर जी ने अरुणिमा को विश्वास दिलाया कि आस्तिक जल्द ही वापस आ जाएगा।

    अरुणिमा ने उनकी बात पर यकीन कर लिया और उसे एक बात की तसल्ली थी कि रिसेप्शन पार्टी में उसके माता-पिता बहुत खुश नज़र आ रहे थे। उन्हें खुश देखकर अरुणिमा को एहसास हुआ कि शायद उसने सही कदम उठाया है और अपने माता-पिता की परवरिश का एहसान चुकाया है।



    हालांकि, रिसेप्शन पार्टी में बेला ने अपनी सहेलियों के साथ मिलकर कोई कसर नहीं छोड़ी थी अरुणिमा को नीचा दिखाने की। उसने कहा था, "ये इकलौती ऐसी दुल्हन होगी जो अपनी रिसेप्शन पार्टी में अकेली खड़ी है।"

    लेकिन अरुणिमा ने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया।



    जैसे ही पार्टी खत्म हुई, अरुणिमा को गाड़ी में बिठाकर आस्तिक के प्राइवेट बंगले में भेज दिया गया, जहां उनकी वेडिंग नाइट होनी थी। नेहा जी ने यही बताया था कि उनकी फर्स्ट नाइट आस्तिक के बंगले में ही होगी और आस्तिक अपना काम खत्म करके सीधे वहां आएगा।







     अरुणिमा की एक कॉलेज फ्रेंड, जो उसकी सबसे अच्छी दोस्त थी, अवनी । और सिर्फ वही इकलौती ऐसी लड़की थी जिसे ये पता था कि अरुणिमा का देव के साथ पहले एक रिश्ता रह चुका है। देव के साथ रिश्ते से बाहर निकलने में और आस्तिक के साथ एक नई ज़िंदगी शुरू करने में अवनी ने ही अरुणिमा को समझाया था, क्योंकि वो हमेशा अपनी दोस्त का भला चाहती थी।



    अरुणिमा के आस्तिक के बंगले में जाने से पहले अवनी ने उसे एक हॉट और ट्रांसपेरेंट नाइटी दी थी, जो कि आज की रात को खास बनाने वाली थी। उसने स्पेशली कहा था कि इसे ही पहनकर आस्तिक के सामने जाना। अरुणिमा को पहले तो ये सब बहुत अजीब लगा, लेकिन जिस तरह से अवनी ने उसे समझाया, उसी तरह अरुणिमा ने खुद को भी समझा लिया कि आस्तिक उसका पति है और अब पूरी ज़िंदगी उसे आस्तिक के साथ ही इस रिश्ते में रहना है। अपने गुज़रे कल को भूलकर उसे आस्तिक के साथ एक नई ज़िंदगी शुरू करनी है। और इसके लिए ये सब करना ज़रूरी था।



    अवनी द्वारा दी गई अजीबोगरीब नाइटी को आखिरकार अरुणिमा ने पहन ही लिया, लेकिन उसने एक शॉल से खुद को ढक लिया, क्योंकि वो इस कपड़े में काफ़ी अनकंफर्टेबल महसूस कर रही थी। लेकिन फिर भी अरुणिमा ने ये किया, क्योंकि वो इस शादी के साथ ईमानदार थी और उसने खुद से वादा किया था कि अपनी शादी को सफल बनाएगी।



    बंगले में पहुंचकर अरुणिमा अपने कमरे में जाती है। वो हैरान रह जाती है, क्योंकि ये आस्तिक का कमरा नहीं था। उसे एक अलग कमरे में रखा गया था, और ये बहुत साधारण सा कमरा था। ना तो इसमें कोई सजावट थी और ना ही कुछ ऐसा, जो ये दिखा सके कि आज उनकी पहली रात है।



    अरुणिमा ने सोचा कि शायद रायचंद मेंशन इसके लिए तैयार किया गया होगा, इसलिए आस्तिक ने इस घर को सजाया नहीं होगा। वैसे भी अरुणिमा ने मन में सोचा कि ये अब उसका ही घर है, तो क्या फर्क पड़ता है अगर ये सजा है या नहीं। उसने इस बात पर ज़्यादा गौर नहीं किया। वो तैयार होकर कमरे में बैठी हुई थी और आस्तिक का इंतज़ार करने लगी।



    बैठे-बैठे ही वो बेड के कोने में टिककर कब सो गई, उसे पता ही नहीं चला। और जब दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई, तब जाकर उसे एहसास हुआ कि आस्तिक कमरे में आ चुका है। वो उसके इंतज़ार में ही सो गई थी। वो तुरंत उठकर खड़ी हो जाती है और आस्तिक को देखती है।



    आस्तिक कमरे में दाखिल होता है, और उसकी काली आभा से पूरे कमरे का माहौल अचानक से डरावना महसूस होने लगता है। पता नहीं क्यों, आस्तिक को अपने सामने देखकर अरुणिमा कांपने लगती है।



    उसने जैसे ही आस्तिक की उन भूरी आंखों में देखा, न जाने क्यों, आस्तिक को अपने करीब आते हुए देखकर उसके अंदर एक अजीब सा डर पैदा हो गया। और सबसे ज़्यादा हैरानी की बात तो ये थी कि वो आस्तिक की आंखों में अपने लिए घृणा के भाव देख रही थी।



    आस्तिक की वो तिरस्कार भरी आंखें अरुणिमा को चुभ रही थीं। और अरुणिमा ने देखा कि आस्तिक के हाथों में एक वाइन की बोतल है, जिसे पीता हुआ वो कमरे में दाखिल हो रहा है।



    अरुणिमा बेड के कोने में खड़ी थी, और आस्तिक कमरे के दूसरे कोने में जाकर खड़ा हो गया।







     अरुणिमा पर डर इतना ज्यादा हावी हो गया था कि वो पीछे जाने लगी, लेकिन दो कदम के बाद ही पीछे दीवार आ गई और अरुणिमा के पास अब जाने के लिए जगह ही नहीं बची थी। आस्तिक ने वाइन का एक घूंट लिया और बोतल को पास ही रख दिया। न जाने क्यों, अरुणिमा को आस्तिक से घबराहट हो रही थी और डर भी लग रहा था, जबकि अब तक आस्तिक ने कुछ नहीं किया था। और उनकी कोई बात भी नहीं हुई थी।



    आस्तिक धीरे-धीरे कदमों से अरुणिमा के पास आया। अरुणिमा डरते हुए आस्तिक को देख रही थी, उसका पूरा शरीर कांप रहा था। उसने मजबूती से अपने श्रग को पकड़ रखा था।



    "सो, माय डिअर वाइफ, चलो कुछ चीज़ें आज क्लियर कर देते हैं," आस्तिक ने बोलना शुरू किया। अरुणिमा हैरानी से उसे देख रही थी। आस्तिक ने उसे ऊपर से नीचे तक घूरकर देखा और फिर एक तिरस्कार भरी नजर से चेहरा फेरते हुए कहा, "बंद दरवाजे के पीछे हम दोनों अजनबी हैं और इससे ज्यादा कुछ भी नहीं। सिर्फ लोगों और परिवार के सामने तुम मेरी बीवी की तरह पेश आ सकती हो। इसके अलावा, अकेले में कभी भी मुझसे रिश्ता बनाने की कोशिश मत करना।"



    आस्तिक ने अपनी बात खत्म की और अरुणिमा हैरानी से उसे सुनती रही। उसने अभी-अभी क्या कहा? क्या उसने ये कहा कि उन दोनों का एक कमरे में कोई रिश्ता नहीं है? और अरुणिमा बस दुनिया के लिए नाममात्र उसकी बीवी है?



    अरुणिमा ने हैरानी से आस्तिक को देखते हुए कहा, "मैं कुछ समझी नहीं, आप कहना क्या चाहते हैं?"



    तभी आस्तिक ने अपना एक हाथ जोर से दीवार पर मारा। अरुणिमा बुरी तरह से कांप गई और कसकर अपनी आंखें बंद कर लीं। आस्तिक ने गुस्से में अरुणिमा के चेहरे की तरफ देखते हुए कहा, "मैं दुनिया में सिर्फ तीन चीज़ों से प्यार करता हूं। और वो तीन चीजें ही मेरी ज़िंदगी हैं।"



    "पहली है मेरी इमेज।

    दूसरी है मेरी पावर और प्रॉपर्टी।

    और तीसरी है मेरा लक्ष्य, जिससे तुम्हारा कोई लेना-देना नहीं। समझीं, माय डिअर वाइफ?"



    आस्तिक अपने जीवन की तीन सबसे अनमोल चीजों के बारे में बताते हुए, अपने दूसरे हाथ से अरुणिमा की ठुड्डी पकड़कर उसका चेहरा अपनी तरफ करता है। अरुणिमा डरते हुए आस्तिक को देखने लगती है। उसकी आंखें डर से पूरी तरह भरी हुई थीं और आस्तिक उसके चेहरे पर ये डर देखकर मुस्कुरा रहा था।



    उसने एक डेविलिश स्माइल के साथ अरुणिमा की आंखों में देखते हुए कहा, "ये तीन चीज़ें मेरी लाइफ में सबसे ज्यादा प्यारी हैं। और अगर इनमें से कुछ भी खराब हुआ, तो समझ लो तबाही मच जाएगी। और तबाह होने वाला शख्स कौन है, मुझे इससे जरा भी फर्क नहीं पड़ता। इसीलिए, गलती से भी मेरे रास्ते में आने की कोशिश मत करना। ये कमरा तुम्हारा है, और सिर्फ ये कमरा ही तुम्हारा रहेगा, वो भी तब तक जब तक तुम यहां हो। इसके अलावा, कभी भी मुझ पर अपना हक जताने की कोशिश मत करना। मेरी बीवी होने के नाते तुम्हें जो ऐशो-आराम चाहिए, ले सकती हो। लेकिन खबरदार, जो मेरी रेपुटेशन खराब करने की कोशिश की।"



    आस्तिक की उन लाल आंखों ने अरुणिमा को एकदम भावशून्य कर दिया था। अचानक से अरुणिमा अपने उस डरावने पल की यादों से बाहर निकलकर वर्तमान में आ जाती है, जब एक बार फिर आस्तिक ने उसे दीवार से दबोच लिया था। वो उससे सवाल कर रहा था।



    ये वही कमरा था, वही स्थिति थी, और वही शख्स, जो एक बार फिर अरुणिमा के अस्तित्व को चोट पहुंचा रहा था।



    अरुणिमा को याद आ जाता है कि आस्तिक ने उससे कहा था कि उसकी जिंदगी में सिर्फ तीन चीजें हैं जो सबसे इंपॉर्टेंट हैं। पहली है उसकी इमेज, यानी उसकी रेपुटेशन। आस्तिक अपनी रेपुटेशन और अपने नाम से बहुत प्यार करता है। और आज, अरुणिमा की वजह से ही उसका नाम खराब हुआ था।



    अरुणिमा डरते हुए आस्तिक को देख रही थी। आस्तिक उसके चेहरे पर डर देखकर समझ गया था कि उसे याद आ गया है कि उसकी बताई गई शर्तों में सबसे पहले क्या थी।







     उसके चेहरे पर एक डेविल स्माइल आ गई, और उसने धीरे से अरुणिमा के गालों को अपने अंगूठे से सहलाते हुए कहा, "तो तुम्हें याद आ गया कि मैंने तुम्हारे सामने क्या शर्त रखी थी। चलो, अच्छी बात है अगर तुम्हें याद आ गया है। जब तुम्हें सज़ा मिलेगी, तो तुम्हें पता रहेगा कि तुम्हें किस चीज़ की सज़ा मिल रही है। तुम्हारी वजह से लोगों के बीच मेरा नाम खराब हुआ है। लोग मेरा मज़ाक उड़ा रहे हैं। तुम्हारी वजह से मेरी रेपुटेशन मिट्टी में मिली है। तुम्हारी वजह से सब मुझ पर हंस रहे हैं।"



    "मैंने कुछ नहीं किया है, प्लीज़ मुझे छोड़ दो। मुझे नहीं पता ये सब किसने किया है..." अरुणिमा अपनी कांपती हुई आवाज़ में एक आखिरी बार रहम की भीख मांग रही थी। हालांकि उसे पता था कि आस्तिक रहम दिखाने वालों में से नहीं है।



    आस्तिक शैतानों की तरह हंसने लगा, और उसकी हंसी ने कमरे में और ज्यादा दहशत का माहौल बना दिया। उसने अरुणिमा को डरते हुए देखा और अपनी डरावनी आवाज़ में कहा, "तुम्हें छोड़ दूं? तुम्हें कैसे छोड़ सकता हूं, जान? तुम मेरी बीवी हो। हमारी शादी हुई है। वो क्या कहते हैं, हां, सात जन्मों का साथ वाला। साथ है हमारा। सात जन्म छोड़ो, सात साल भी नहीं हुए हमारी शादी को। इतनी जल्दी तो नहीं छोड़ने वाला हूं मैं तुम्हें। अभी मुझे तुम्हारी जरूरत है। और तुम ऐसा कैसे सोच रही हो कि मैं तुम्हें नुकसान पहुंचाऊंगा? अगर मुझे ऐसा कुछ करना ही होता, तो उस वीडियो के सामने आते ही तुम्हारी जान ले लेता। लेकिन तुम अब तक जिंदा हो, सांस ले रही हो... वरना मन तो मेरा बहुत किया था कि तुम्हें जान से मार दूं। पर फिलहाल, तुम्हें नुकसान पहुंचाने का आइडिया मुझे ड्रॉप करना पड़ा, क्योंकि अभी मुझे तुम्हारी जरूरत है।"



    अरुणिमा एकदम दंग रह गई आस्तिक की बात सुनकर। आस्तिक ने अरुणिमा की बाजू पकड़कर उसे कोने में बैठा दिया। अरुणिमा हैरानी से उसे देखती रह गई। आस्तिक ने उसकी साड़ी उठाई और लपेटते हुए उसके कंधे पर रख दी। फिर उसने अरुणिमा के बिखरे हुए बालों को धीरे-धीरे अपनी उंगलियों से संवारना शुरू किया। अरुणिमा उसे हैरानी भरी नज़रों से देख रही थी।



    आस्तिक मुस्कुराते हुए अरुणिमा को देख रहा था, लेकिन उसकी मुस्कुराहट में कुछ ऐसा राज छिपा था जिसे अरुणिमा समझ नहीं पा रही थी। आस्तिक एक पल के लिए साइको इंसान की तरह हरकतें कर रहा था। अभी-अभी वो अरुणिमा पर चिल्ला रहा था, उसके कैरेक्टर पर उंगली उठा रहा था, और अगले ही पल बिल्कुल शांत होकर उसे संवारने लगा। अरुणिमा उसे साइको की तरह हैरानी भरी नज़रों से देख रही थी।



    आस्तिक उसके बालों को सही करते हुए कहता है, "आज रात तैयार रहना।"



    अरुणिमा की आंखें छोटी हो जाती हैं, और वो हैरानी से आस्तिक को देखने लगती है। आस्तिक अपनी डेविल स्माइल को और गहरी करते हुए कहता है, "हमारी फर्स्ट नाइट नहीं हुई है। तुम्हारी भी कुछ इच्छाएं होंगी जो अधूरी रह गई होंगी। तभी तो तुम कहीं भी चली जाती हो। एक मर्द होने के नाते मैं तुम्हारी इच्छाओं को समझ सकता हूं। वो क्या है ना, जवानी में अगर ये सब ना मिले तो रात में नींद नहीं आती। पर तुम फिक्र मत करो... आज रात मैं तुम्हारी सारी इच्छाएं और ख्वाहिशें पूरी कर दूंगा। वो भी इस तरीके से कि तुम कभी किसी और के पास नहीं जा पाओगी। आज रात अच्छे से तैयार रहना। Get ready well tonight for our wedding night."

  • 16. pavitrata ka Saboot

    Words: 2469

    Estimated Reading Time: 15 min

    अपने कमरे में बैठी अरुणिमा किसी पत्थर की तरह जड़ हो गई थी। आस्तिक के कमरे से गए हुए दो घंटे हो चुके थे, लेकिन अरुणिमा अब भी वहीं बैठी हुई थी। आस्तिक के शब्द अब भी उसके कानों में गूंज रहे थे: "आज रात खुद को अच्छे से तैयार करना, ताकि तुम्हें देखकर मेरा थोड़ा मन हो तुम्हारे पास आने का। वैसे तो तुम खुद को कितनी भी अच्छी तरह से रेडी कर लो, मैं तुम्हारी तरफ देखना भी पसंद नहीं करूंगा। पर क्योंकि अगले एक साल में मुझे तुमसे बच्चा चाहिए, इसीलिए ना चाहते हुए मुझे तुम्हारे करीब आना होगा। So, my dear wife, be ready tonight." अरुणिमा के कानों में बस यही शब्द गूंज रहे थे: "आज रात के लिए तैयार रहना। आज रात।" आस्तिक के शब्द उसे झकझोर रहे थे। उसके पास आने का मतलब... अरुणिमा का मन घबराने लगा। उसने अपने कानों पर हाथ रख लिया और डरते हुए इन आवाजों को सुनना बंद करना चाहा। लेकिन जितना वह अपने कान बंद करती, ये आवाजें उतनी ही तेज उसके दिमाग में घूमने लगतीं। काफी देर तक सहन करने के बाद अरुणिमा से और बर्दाश्त नहीं हुआ। धीरे-धीरे वह खड़ी हुई और आईने के पास चली गई। आईने में उसने अपना टूटा हुआ अस्तित्व देखा: बिखरे हुए बाल, उजड़ा हुआ चेहरा। उसके पास बचा ही क्या था? एक बड़े घर की बेटी, एक बड़े घर की बहू, एक राइस बिज़नेसमैन की बीवी। लेकिन उसकी हैसियत? एक नौकरानी से भी बदतर। अरुणिमा के होंठ कांपने लगे। वह डरते हुए आईने में खुद को देखने लगी। उसकी नजर अपने खुले हुए पेट पर गई। नाभि के पास हाथ रखते हुए उसका दिल बुरी तरह धड़कने लगा। वह डरते हुए खुद से सवाल करने लगी, "नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। मैं शैतान के बच्चे को इस दुनिया में कभी नहीं लाने दूंगी। अगर ऐसा हुआ, तो मैं शैतान के साथ सारी जिंदगी के लिए बंध जाऊंगी। ऐसा हुआ तो मेरी और मेरे बच्चे की जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। मैं ऐसा नहीं होने दे सकती। मैं शैतान से प्रेग्नेंट नहीं हो सकती।" अरुणिमा यह सब सोचते हुए जल्दी से कैलेंडर के पास गई और वहां कुछ देखने लगी। जैसे ही उसकी नजर कैलेंडर पर पड़ी, उसने अपने मुंह पर हाथ रख लिया। "मेरे पीरियड्स तो अभी खत्म हुए हैं। इसका मतलब..." वह बुरी तरह डर गई। "नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। मुझे कुछ करना होगा, मुझे जल्दी कुछ करना होगा।" लेकिन "मैं क्या करूं? मैं क्या कर सकती हूं?" अरुणिमा घबराते हुए इधर-उधर देखने लगी। तभी उसके दिमाग में एक ख्याल आया। उसकी आंखें ठंडी पड़ गईं। चेहरे पर कोई भाव नहीं था। उसके हाथ पेट की तरफ कांप रहे थे, लेकिन उसके अंदर से एक जवाब आ चुका था। "मुझे भागना होगा। मुझे यहां से भागना होगा। मुझे शैतान से दूर भागना होगा।" अरुणिमा अलमारी के पास गई और घर के कपड़े पहन लिए। उसने खुद को ठंडे पानी से फ्रेश किया, चेहरा साफ किया, और बालों का एक मैसी सा बन बनाकर उसे एक लेटर से बांध लिया। वह कोने में बैठ गई और अपने किए गए निर्णय के बारे में सोचने लगी। उसने सोच लिया था कि वह भाग जाएगी। इन सब से दूर। इस धोखे की दुनिया से दूर। इन लोगों से दूर। और आस्तिक से इतनी दूर कि वह जिंदगी में कभी उसे ढूंढ न सके। "पहले भले ही मुझे छोटी-छोटी नौकरियां करनी पड़े। नौकरी न भी मिली, तो घरों में काम करके अपनी जिंदगी गुजार लूंगी। लेकिन कम से कम वह जिंदगी, इस जिंदगी से बेहतर होगी।" लेकिन समस्या यह थी कि अरुणिमा यहां से भागेगी कैसे? घर के हर तरफ सिक्योरिटी थी। अरुणिमा को दरवाजे से बाहर कदम रखने की भी इजाजत नहीं थी। पिछले एक साल से वह इस घर में कैद थी। गार्डन एरिया में 120 सीसीटीवी कैमरे थे, तो पूरे बंगले का तो पूछो ही मत। अगर कभी अरुणिमा को बाहर जाना होता, तो या तो आस्तिक उसे खुद साथ ले जाता, या फिर उसके साथ हाई-टेक सिक्योरिटी की एक पूरी टीम जाती। ऐसे हालात में अरुणिमा का यहां से भागना लगभग नामुमकिन था। उसे बिना किसी की नजर में आए यहां से निकलना था। यही सोचते-सोचते अरुणिमा के दरवाजे पर दस्तक हुई। वह चौंक गई। हैरानी और डर के साथ उसने दरवाजे की तरफ देखा। "इस वक्त कौन हो सकता है? क्या आस्तिक वापस आ गया है? लेकिन वह तो कहकर गया था कि रात को आएगा। फिर इतनी जल्दी कैसे?" अरुणिमा घबराते हुए दरवाजे की तरफ देखने लगी। वह सब सोच ही रही थी कि दरवाजे पर एक बार फिर दस्तक हुई... "मेम, डॉ. निशा आपसे मिलने आई हैं।" बाहर से रोज़ी की आवाज़ सुनकर अरुणिमा को थोड़ी राहत महसूस हुई, क्योंकि यह आस्तिक नहीं था। लेकिन डॉक्टर निशा उससे मिलने आई हैं? डॉक्टर निशा, अरुणिमा की पर्सनल डॉक्टर थीं, जिन्हें रायचंद फैमिली ने ही अरुणिमा के लिए प्रोवाइड करवाया था। ताकि जब भी अरुणिमा को डॉक्टर की जरूरत हो, तो डॉक्टर निशा ही उसका चेकअप करें। इस एक साल में डॉक्टर निशा सिर्फ दो बार अरुणिमा के चेकअप के लिए आई थीं। वे भी सबकी निगरानी में। एक बार जब अरुणिमा के पैर में मोच आ गई थी और दूसरी बार जब किचन में काम करते वक्त उसके हाथ में चोट लग गई थी। बस, इसके अलावा डॉक्टर निशा कभी उससे मिलने नहीं आईं। लेकिन आज अचानक डॉक्टर निशा यहां क्यों आ गईं? वह भी तब, जब अरुणिमा बीमार नहीं है। अरुणिमा हैरानी से यह सब सोच ही रही थी कि रोज़ी ने एक बार फिर से दरवाजा खटखटाया। अरुणिमा जल्दी से खड़ी हो गई और अपने दुपट्टे को कसकर संभालते हुए बोली, "ठीक है, उन्हें अंदर भेज दो।" जैसे ही अरुणिमा ने यह कहा, रोज़ी "ओके" बोलकर वहां से चली गई। अरुणिमा ने एक नजर आईने में खुद को देखा, "मैं ठीक तो लग रही हूं, ना?" तभी दरवाजा खुला। अरुणिमा ने देखा, दरवाजा नीरज ने खोला था। उसके हाथ में एक छोटा सा बैग था और उसके पीछे डॉक्टर निशा खड़ी थीं। उनके हाथों में स्टेथोस्कोप और आंखों पर हमेशा की तरह चश्मा था। वे मुस्कुराते हुए अंदर आईं। अरुणिमा ने भी जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश की। डॉ. निशा ने अरुणिमा को देखकर कहा, "हेलो अरुणिमा, कैसी हो तुम?" अरुणिमा बोली, "हेलो, डॉक्टर निशा। मैं ठीक हूं। पर आप अचानक यहां कैसे? मैं तो बिल्कुल ठीक हूं। मेरी तबीयत भी खराब नहीं है।" अरुणिमा ने हैरानी से डॉक्टर को देखते हुए कहा। तभी नीरज टेबल पर डॉक्टर निशा का बैग रखकर वहां से चला गया। डॉक्टर निशा ने अरुणिमा की ओर देखकर कहा, "अरुणिमा, मैं यहां तुम्हारा टेस्ट करने आई हूं।" "टेस्ट? कैसा टेस्ट?" अरुणिमा ने हैरानी से पूछा। डॉक्टर निशा ने स्टेथोस्कोप टेबल पर रखा और अपना बैग खोलते हुए बोलीं, "मुझे तुम्हारे हसबैंड ने भेजा है। वह तुम्हारा टेस्ट करवाना चाहते हैं। सोशल मीडिया पर जो वीडियो वायरल हुई है, वह मैंने भी देखी है।" डॉक्टर निशा की बातों ने अरुणिमा को शर्मिंदा कर दिया। वह समझ चुकी थी कि डॉक्टर निशा क्या कहना चाह रही थीं। आस्तिक ने उन्हें यहां भेजा था ताकि वे अरुणिमा का चेकअप कर सकें। हालांकि, डॉक्टर निशा एक प्रोफेशनल थीं, इसलिए उन्होंने अपने शब्दों को तोल-मोलकर इस्तेमाल किया। लेकिन फिर भी अरुणिमा महसूस कर रही थी कि कल रात की वजह से आस्तिक उसका टेस्ट करवाना चाह रहा है। यह बात अरुणिमा के लिए बेहद अपमानजनक थी। डॉक्टर निशा ने सिरिंज निकाली और अरुणिमा का ब्लड सैंपल लेने के लिए उसका हाथ आगे बढ़ाया। लेकिन अरुणिमा ने अपना हाथ पीछे करते हुए कहा, "मैं ठीक हूं। मुझे कुछ नहीं हुआ है और मेरे साथ भी कुछ नहीं हुआ है।" अपमान, घृणा और तिरस्कार की भावना से भरी अरुणिमा सब कुछ सहन कर रही थी, लेकिन अपने आत्मसम्मान को जिंदा रखने की पूरी कोशिश कर रही थी। डॉक्टर निशा उसकी मनोदशा समझ सकती थीं। उन्होंने सिरिंज को संभालते हुए कहा, "मुझे पता है, अरुणिमा, कि तुम्हें कुछ नहीं हुआ है और तुम्हारे साथ कुछ भी गलत नहीं हुआ। लेकिन मैं यहां सिर्फ अपना काम कर रही हूं। मिस्टर रायचंद चाहते हैं कि मैं तुम्हारा टेस्ट करूं। तुम फिक्र मत करो। मैं बस तुम्हारा ब्लड सैंपल लेने आई हूं। बाकी के टेस्ट हॉस्पिटल में होंगे। वहां तुम्हारी ब्लड रिपोर्ट भी मिल जाएगी। ब्लड सैंपल से हमें यह पता चल जाएगा कि तुम्हें किस तरह का नशा दिया गया था।" डॉक्टर निशा के शब्दों ने अरुणिमा के दिल में हजारों सवाल और चुभन पैदा कर दी। वह अंदर ही अंदर टूट रही थी। हालांकि वह खून के आंसू रोना चाहती थी, लेकिन उसने अपने जज्बातों पर काबू पाया। इन सब से यह बात साफ हो गई थी कि आस्तिक को अरुणिमा पर शक है। और उसके पवित्र होने पर भी। (लेखक की बात) टेस्ट की जरूरत तो आस्तिक को है, लेकिन उसके शरीर की नहीं, बल्कि उसके दिमाग की। खुद तो अमायरा के साथ इश्क़ फरमाता है और अरुणिमा से उसके पवित्र होने का सबूत मांग रहा है! फिलहाल, मैं अपने जज्बातों पर काबू रख रही हूं। लेकिन आस्तिक जितना अरुणिमा को टॉर्चर कर रहा है, लेखक होने के नाते मैं हर बात नोट कर रही हूं। और आने वाले एपिसोड्स में इसका पूरा हिसाब लिया जाएगा। चलिए, अब कहानी पर वापस आते हैं। अरुणिमा के कमरे में डॉक्टर निशा उसका ब्लड सैंपल ले रही थीं। हालांकि, अरुणिमा को इंजेक्शन के अंदर अपने खून के लाल रंग से ज्यादा तकलीफ इस बात की हो रही थी कि उसने जीवनसाथी के रूप में एक ऐसे इंसान को चुना जो शायद इंसान कहलाने के लायक ही नहीं है। शादी के वक्त उसने इस इंसान के साथ सारी जिंदगी निभाने की कसम खाई थी। अरुणिमा को पता ही नहीं चला कि डॉक्टर निशा ने कब उसका ब्लड सैंपल ले लिया। नीरज को कोई कॉल आ गया था, जिसे अटेंड करने के लिए वह कमरे से बाहर चला गया। डॉक्टर निशा ब्लड सैंपल को कलेक्ट करके बैग में रख रही थीं। अरुणिमा ने डॉक्टर निशा को देखते हुए कहा, "डॉक्टर, मुझे सच में कल रात का कुछ भी याद नहीं है, लेकिन इतना मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि मेरे साथ कुछ नहीं हुआ है। किसी ने मेरे साथ कुछ नहीं किया है। अगर किया होता तो मुझे पता चलता। मेरी बॉडी पर कुछ तो रिएक्ट होता। मुझे फंसाया गया है। कोई अपने षड्यंत्र में मुझे फंसाने की कोशिश कर रहा है, मेरा इस्तेमाल कर रहा है। आप समझ रही हैं ना मैं क्या कह रही हूं?" डॉक्टर निशा मुस्कुराते हुए सिर हिलाती हैं और कहती हैं, "हां अरुणिमा, मैं समझ रही हूं कि तुम क्या कह रही हो। इनफैक्ट, तुम्हारे चेहरे को देखकर कोई भी बता सकता है कि तुम उस वक्त नशे में थीं। जहां तक तुम्हें फंसाने की बात है, उसके लिए मिस्टर रायचंद हैं ना। तुम्हें पता है, सोशल मीडिया से वह सारी क्लिप्स डिलीट करवा रहे हैं। जिसने भी तुम्हारे खिलाफ कुछ बोलने की कोशिश की है, उसके साथ बहुत बुरा हो रहा है। बाकी सब चीजें तुम अपने हस्बैंड पर छोड़ दो। और यह बस एक नॉर्मल टेस्ट ही तो है। जब तुम जानती हो कि तुम्हारे साथ कुछ भी नहीं हुआ है, तो टेस्ट में कुछ भी नहीं निकलेगा। देखो अरुणिमा, आस्तिक एक मर्द है। किसी और के लिए ना सही, तो अपने हस्बैंड के लिए ही सही, उसे सेटिस्फाई करने के लिए तुम यह टेस्ट करवा लो। अस्पताल में तुम्हें ज्यादा टाइम नहीं लगेगा, ज्यादा से ज्यादा एक घंटा।" अरुणिमा कुछ और कहना चाहती थी, अपनी सफाई देना चाहती थी, लेकिन तभी उसके दिमाग में कुछ आया और उसने अपने हाथ वहीं रोक लिए। वह अपने हाथ पीछे करती है और डॉक्टर निशा को देखकर कहती है, "आपके हॉस्पिटल में मेरे बाकी टेस्ट होंगे? इसके लिए मुझे हॉस्पिटल आना होगा ना?" डॉक्टर निशा मुस्कुराते हुए सिर हिलाती हैं। अरुणिमा अपने दिमाग में कुछ सोचती है और कहती है, "ठीक है डॉक्टर, मैं शाम को आपके हॉस्पिटल आ जाऊंगी।" निशा अपनी जगह पर खड़ी हो जाती हैं और मुस्कुराते हुए कहती हैं, "यह हुई ना समझदारी की बात। चलो, शाम को अस्पताल में मिलते हैं। मैं तुम्हारा टेस्ट भी कर लूंगी और इस ब्लड सैंपल की रिपोर्ट भी तुम्हें हॉस्पिटल में ही मिल जाएगी।" डॉक्टर निशा कमरे से चली गईं। दरवाजे पर ही नीरज मिल गया था। उसने डॉक्टर निशा के हाथ से उनका बैग ले लिया और एक नज़र अरुणिमा को देखकर डॉक्टर निशा को वहां से ले गया। उनके जाने के बाद अरुणिमा ने जल्दी से दरवाजा बंद किया और उसके चेहरे पर सुकून उतर आया। उसने सोचा, डॉक्टर निशा के क्लीनिक में जाकर वह मौका तलाशेगी और जैसे ही मौका मिलेगा, वह वहां से भाग जाएगी। इस सोच के साथ ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसे यह सोचकर खुशी हो रही थी कि वह आस्तिक से आजाद हो जाएगी। भले ही यह खतरनाक हो सकता है, लेकिन अपनी आजादी के लिए उसे यह खतरा भी मंजूर है। इसके बदले अगर उसकी जान भी चली जाए, तो उसे अफ़सोस नहीं होगा। लेकिन वह उस शैतान के बच्चे को जन्म नहीं देने वाली। शाम को, जब अरुणिमा अस्पताल जाने के लिए घर से बाहर निकली, तो वह हैरान रह गई। नीरज और एक ड्राइवर के अलावा 10 से ज्यादा बॉडीगार्ड्स उसकी सुरक्षा के लिए वहां मौजूद थे। इतने सारे बॉडीगार्ड्स को देखकर अरुणिमा घबरा गई। उसने तो सोचा था कि नीरज और एक बॉडीगार्ड के साथ जाएगी और उन दोनों को चकमा देकर जल्दी से निकल जाएगी। लेकिन इतने सारे बॉडीगार्ड्स के बीच से निकलना लगभग नामुमकिन था। लेकिन अरुणिमा हार मानने वालों में से नहीं थी, कम से कम अपनी आजादी के लिए तो बिल्कुल भी नहीं। उसने गहरी सांस छोड़ी और मुस्कुराते हुए गाड़ी में जाकर बैठ गई, जैसे यह सब कुछ सामान्य हो। वह किसी को यह जताना नहीं चाहती थी कि इस वक्त वह कुछ सोच रही है। इसलिए उसने अपना चेहरा सामान्य बनाए रखा। जैसे-जैसे गाड़ी अस्पताल की तरफ बढ़ रही थी, अरुणिमा की योजना और ज्यादा मजबूत हो रही थी। अस्पताल पहुंचने के साथ ही बॉडीगार्ड्स ने अरुणिमा को ऐसे घेर लिया कि एक परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। इतनी हाई सिक्योरिटी के बीच, अरुणिमा डॉक्टर निशा के केबिन में पहुंची। वहां जाकर वह घबरा गई, क्योंकि उसकी भागने की योजना तो अस्पताल के दरवाजे पर कदम रखते ही खत्म हो गई थी। उसने सोचा था कि नीरज को और सिक्योरिटी को चकमा देकर वह अस्पताल की पार्किंग से ही भाग जाएगी। लेकिन यहां तो सिक्योरिटी उसे डॉक्टर निशा के केबिन तक लेकर आई थी। अब यहां से निकलना बहुत मुश्किल था। लेकिन अरुणिमा ने फिर भी हार नहीं मानी। डॉक्टर निशा के केबिन में आते ही निशा मुस्कुराते हुए बोलीं, "तुम आ गईं अरुणिमा, मैं तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी। चलो, मैं तुम्हारा टेस्ट शुरू करती हूं।" अरुणिमा जल्दी से डॉक्टर निशा के पास आई और उनका हाथ पकड़ते हुए बोली, "डॉक्टर, प्लीज मेरी मदद कीजिए। प्लीज, यहां से बाहर निकलने में मेरी मदद कीजिए। आपके हाथ जोड़ती हूं। मैं सारी जिंदगी आपकी एहसानमंद रहूंगी। प्लीज, मुझे यहां से बाहर निकालिए।"

  • 17. Arunima Bhag gai

    Words: 1947

    Estimated Reading Time: 12 min

    अरुणिमा उस समय डॉक्टर निशा के केबिन में बैठी थी। वह बहुत घबराई हुई थी। उसने मन बना लिया था कि वह यहाँ से भाग जाएगी, लेकिन नीरज अपने साथ पूरी सुरक्षा टीम लेकर आया था। उसका यहाँ से निकलना बहुत मुश्किल था। लेकिन अरुणिमा अपने फैसले से पीछे नहीं हट रही थी। यह उसके पास बचकर यहाँ से निकलने का एकमात्र मौका था। अगर वह यहाँ से नहीं निकल पाई, तो न चाहते हुए भी आस्तिक के साथ सोने के लिए मजबूर होना पड़ता। डॉक्टर निशा केबिन में आईं और अरुणिमा को देखकर मुस्कुराईं। उन्होंने एक इंजेक्शन और कुछ टेस्ट किट्स बाहर निकाले ताकि अरुणिमा का टेस्ट कर सकें। पर जैसे ही डॉक्टर निशा अरुणिमा के पास आकर उसके हाथ पर बीपी की मशीन लगाने वाली थीं, अरुणिमा ने उनका हाथ पकड़ लिया। डॉक्टर निशा हैरानी से अरुणिमा की तरफ देख रही थीं। यह एक आखिरी मौका था अरुणिमा के पास। अगर इसके लिए उसे किसी के सामने झुकना भी पड़ता, तो भी वह पीछे नहीं हटती। अरुणिमा ने डॉक्टर निशा का हाथ पकड़कर उनके सामने मदद की भीख माँगनी शुरू कर दी। "निशा, प्लीज... प्लीज मेरी मदद करो। मैं बहुत बड़ी मुसीबत में हूँ। मुझे तुम्हारी मदद की जरूरत है। इंसानियत के नाते मेरी मदद करो।" डॉक्टर निशा अचानक घबरा गईं, क्योंकि यह रवैया अरुणिमा का नहीं था। वह बिलकुल विपरीत लग रही थी। निशा हैरानी से अरुणिमा को देखकर बोलीं, "अरुणिमा, क्या हुआ? तुम ठीक तो हो ना? तुम्हें कुछ हुआ है? कोई प्रॉब्लम है तो मुझे बताओ। अच्छा, ठीक है। तुम यहाँ बैठो। मैं अभी नीरज को बुलाकर लाती हूँ।" लेकिन इससे पहले कि डॉक्टर निशा वहाँ से जा पातीं, अरुणिमा ने उनका हाथ पकड़ा और कहा, "नहीं निशा, प्लीज। तुम नीरज को मत बुलाओ और सिक्योरिटी को भी कुछ मत बताना। मुझे उनसे बचाने के लिए ही तुम्हारी मदद चाहिए।" अरुणिमा रोते हुए निशा से कहती है, तो निशा उलझन भरी निगाहों से उसे देखती हैं और हैरानी से पूछती हैं, "भगाने के लिए? मतलब? मैं समझी नहीं, अरुणिमा। तुम क्या कहना चाहती हो?" अरुणिमा को पता था कि डॉक्टर निशा रायचंद की डॉक्टर थीं, इसलिए वे इतनी आसानी से उसे जाने नहीं देंगी। लेकिन बाकी सारी बातें एक तरफ, अरुणिमा ने महसूस कर लिया था कि डॉक्टर निशा दिल की बुरी नहीं हैं। उनका स्वभाव काफी सरल था। हालाँकि वे अपने काम से काम रखती थीं, लेकिन वे एक नरम दिल और अच्छी इंसान थीं। इसी उम्मीद में अरुणिमा ने उन्हें अपने साथ हुई सारी घटनाओं के बारे में बता दिया—आस्तिक से शादी, कल रात सालगिरह की पार्टी में जो कुछ हुआ, सब कुछ। अपनी सारी आपबीती सुनाने के बाद अरुणिमा डॉक्टर निशा के सामने फूट-फूट कर रोने लगी। उसने डॉक्टर निशा से कहा, "डॉक्टर, मैंने अपने माता-पिता की बात मानकर आस्तिक से शादी की थी। उन्होंने मुझसे कहा था कि भरोसा रखो, एक दिन सब ठीक हो जाएगा। अपनी माता-पिता की खातिर मैं पिछले एक साल से सब कुछ ठीक होने का इंतज़ार कर रही हूँ। लेकिन इस एक साल में मैंने इस अकेलेपन का बोझ अकेले ही उठाया है। और मैं यह बोझ किसी और पर डालना भी नहीं चाहती। पर अब मुझसे और सहा नहीं जा रहा। मैं हार चुकी हूँ। मेरी मानसिक हालत बिगड़ने की कगार पर है। मैं अपनी जिंदगी से हार नहीं मानना चाहती, निशा। तुम तो डॉक्टर हो। तुम्हारा तो काम है लोगों को जीने की उम्मीद देना। मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ती हूँ। मेरी जिंदगी तुम्हारे हाथों में है। अगर तुम चाहो तो इसे बचा सकती हो, वरना मेरे पास जान देने के अलावा और कोई रास्ता नहीं होगा।" डॉक्टर निशा ने जब अरुणिमा की सारी कहानी सुनी, तो उन्हें यकीन नहीं हुआ कि पिछले एक साल से जिस अरुणिमा को वे देख रही थीं, वह असलियत में किस हालात से गुजर रही थी। अरुणिमा की हालत पर अफ़सोस करना डॉक्टर निशा को भी हैरान कर रहा था। क्योंकि रायचंद परिवार शहर का सबसे बड़ा और रईस परिवार था। दौलत, शोहरत और नाम के लिए वह खानदान पूरे शहर में सबसे ऊपर था। उनकी शानो-शौकत को देखकर कोई नहीं कह सकता था कि उनके घर में उनकी अपनी बहू इतनी प्रताड़ना के साथ रह रही है। अरुणिमा रोते हुए डॉक्टर निशा से आगे कहती है, "मैं उस घर में सिर्फ एक सामान हूँ। आस्तिक के साथ या तो सिर्फ मीटिंग्स के लिए बाहर जाती हूँ, या बड़ी-बड़ी पार्टियों में शोपीस की तरह इस्तेमाल की जाती हूँ। और बाकी समय, मैं उस घर में किसी कूड़े की तरह पड़ी रहती हूँ। आज तक उसने मेरे साथ जितना हो सके, उतना बुरा व्यवहार किया है। लेकिन आज रात..." अरुणिमा अपनी बात अधूरी छोड़ देती है और रोने लगती है। डॉक्टर निशा उसकी मनोदशा समझ सकती थीं। वे जल्दी से अरुणिमा को संभालती हैं और उसके सामने पानी का गिलास बढ़ाते हुए कहती हैं, "तो इसलिए आस्तिक तुम्हारा टेस्ट करवाना चाहता है, ताकि वह देख सके कि तुम वर्जिन हो या नहीं।" अरुणिमा फूट-फूट कर रोने लगती है और अपना सिर हिलाती है। डॉक्टर निशा गहरी सोच में पड़ गईं। उन्होंने अरुणिमा की हालत देखी और उसकी सारी आपबीती सुनने के बाद उनके अंदर भी हमदर्दी का भाव आ गया। लेकिन वे सिर्फ एक इंसान नहीं थीं, बल्कि रायचंद परिवार की डॉक्टर भी थीं। इसलिए वे आस्तिक को भी अच्छी तरह से जानती थीं। उन्होंने गंभीरता से कहा, "यह सब तो ठीक है, अरुणिमा। लेकिन तुम्हें लगता है कि तुम यह कर पाओगी? मतलब, नीरज बहुत जल्दी किसी भी चीज़ पर शक कर लेता है। उसे बेवकूफ बनाना आसान नहीं है। और फिर आस्तिक... तुम्हें लगता है कि तुम्हारे गायब होने की खबर सुनकर वह शांत बैठेगा? वह तब तक तुम्हें ढूँढता रहेगा जब तक तुम उसे मिल नहीं जाओगी। और अभी तो तुमने ही कहा कि वह तुमसे बच्चा चाहता है।" अरुणिमा ने अपने आँसू पोंछते हुए तुरंत कहा, "हाँ, मुझे पता है। इसलिए तो मैं यहाँ से भागना चाहती हूँ। मैं आस्तिक के बच्चे को पैदा नहीं करना चाहती। मुझे इस नरक से निकलने का बस यही एक रास्ता नज़र आ रहा है।" डॉक्टर निशा ने उसे इतना परेशान और हारा हुआ देखा तो आखिरकार उन्होंने उसकी मदद करने का फैसला कर लिया। सामने के दरवाजे पर नीरज और सुरक्षाकर्मी खड़े थे, इसलिए वहाँ से जाना खतरनाक हो सकता था। डॉक्टर निशा ने उसे अपने केबिन के पिछले दरवाजे से जाने के लिए कहा, जो अस्पताल के मोर्चरी एरिया से होते हुए जंगल के रास्ते तक जाता था। अरुणिमा हैरानी से डॉक्टर निशा को देख रही थी। हालाँकि, उसकी आँखों में खुशी की चमक साफ़ नज़र आ रही थी। जाने से पहले वह डॉक्टर निशा को गले लगाती है और डरते हुए कहती है, "निशा, तुम्हारा यह एहसान मैं कभी नहीं भूलूँगी।" डॉक्टर निशा ने दिलासा देते हुए कहा, "जाओ, मैं नीरज और बाकी सबको संभाल लूँगी। और डरो मत, मैं तुम्हारी रिपोर्ट भी बदल दूँगी। आस्तिक को तुम्हारे बारे में कुछ पता नहीं चलेगा।" अरुणिमा ने डॉक्टर निशा को गले लगाया और उनके केबिन के पीछे के रास्ते से निकल गई। वह सीधे मोर्चरी पहुँची, जहाँ शवों के बीच से गुज़रते हुए उसे बहुत अजीब लग रहा था। उसे उल्टी आ रही थी, लेकिन अपनी आजादी के लिए उसने खुद को काबू में रखा। अपने दुपट्टे से नाक ढकते हुए वह किसी तरह मोर्चरी से बाहर निकल गई। जैसे ही वह बाहर आई, तेज रोशनी ने उसकी आँखों पर प्रहार किया। उसने जल्दी से अपनी आँखों पर हाथ रख लिया। जब उसने धीरे-धीरे अपना हाथ हटाया और चमचमाते सूरज को देखा, तो उसे पहली बार राहत का एहसास हुआ। वह अस्पताल के पिछले दरवाजे तक पहुँच गई थी, जहाँ ना कोई सुरक्षाकर्मी था और ना ही कोई उसे पहचानने वाला। लेकिन यह सिर्फ शुरुआत थी। उसे यहाँ से भी जल्दी निकलना था। उसने अपने दुपट्टे से चेहरा ढँका और इधर-उधर देखते हुए सड़क पार करके दूसरी तरफ चली गई। आखिरकार, एक साल की कैद के बाद अरुणिमा आजाद हो गई थी। उसे कैसा महसूस हो रहा था, यह वह खुद भी नहीं बता पा रही थी। खुशी, दर्द, तकलीफ़ और नई उम्मीदें—सब कुछ एक साथ। जैसे-जैसे वह भाग रही थी, उसकी साँसें तेज़ होती जा रही थीं। राह चलते लोग उसे अजीब नज़रों से देख रहे थे, लेकिन अरुणिमा को इन सबसे फर्क नहीं पड़ता था। वह किसी तरह वहाँ से निकलना चाहती थी। रायचंद परिवार शहर का जाना-माना नाम था, और अरुणिमा का चेहरा भी किसी से छुपा हुआ नहीं था। अरुणिमा बस भागे जा रही थी। उसे नहीं पता था कि कहाँ जाना है। उसके पास पैसे भी नहीं थे, लेकिन इसके बावजूद उसके कदम नहीं रुके। वह हाईवे से होते हुए कच्चे रास्ते पर पहुँच गई। उसे जल्द से जल्द बस स्टैंड तक पहुँचना था। वहाँ से किसी की मदद लेकर वह अपनी दोस्त अवनी के पास जाना चाहती थी। उसे बस एक ही सहारा नज़र आ रहा था—अवनी। अपने माता-पिता से उसे कोई उम्मीद नहीं थी, जिन्होंने पिछले एक साल में उसकी खबर तक नहीं ली। उसे यकीन था कि अवनी उसकी मदद ज़रूर करेगी। अरुणिमा का प्लान था कि वह किसी ऐसे द्वीप पर चली जाए, जिसका कोई नामोनिशान न हो और जहाँ आस्तिक उसे कभी तलाश न कर पाए। भागते-भागते शाम से रात हो गई थी। चारों तरफ़ स्ट्रीट लाइट्स जल चुकी थीं। अरुणिमा अंधेरे में भी भागती जा रही थी। उसके पैरों और पेट में दर्द होने लगा था। उसने दोपहर से कुछ नहीं खाया था। लेकिन अरुणिमा हार मानने को तैयार नहीं थी। यह उसकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा मौका था और वह इसे गँवाना नहीं चाहती थी। जैसे ही अरुणिमा हाईवे से होते हुए कच्चे रास्ते की तरफ़ बढ़ी, वैसे ही वहाँ अंधेरा गहरा चुका था क्योंकि वहाँ से जंगल का रास्ता शुरू हो रहा था। वहाँ ना तो कोई स्ट्रीट लाइट थी और ना ही कोई रोशनी। अरुणिमा के पैर सुन्न हो चुके थे, और वह जोर-जोर से साँस लेते हुए बेधड़क भागे जा रही थी। कच्चे रास्ते पर उसे कोई गाड़ियाँ भी नज़र नहीं आ रही थीं, जिनकी रोशनी में देखने में मदद मिल सके या फिर वह किसी से लिफ़्ट की उम्मीद कर सके। अरुणिमा थोड़ी हैरान हो गई। यह कच्चा रास्ता हाईवे को उसके शहर से जोड़ता है, ऐसे में यहाँ गाड़ियाँ होना तो लाज़मी है, लेकिन यहाँ एक भी गाड़ी नहीं थी। यह देखकर अरुणिमा को थोड़ा अजीब लगा। फिर भी, अरुणिमा ने अपनी आँखों से ही रास्ता पहचानने की कोशिश की और आगे बढ़ती रही। न जाने क्यों उसके कदम लड़खड़ा रहे थे। उसे लग रहा था कि वह गलत दिशा में जा रही है। पर वह इस वक़्त रुक नहीं सकती थी। आखिरकार, एक जगह पर जाकर उसे रुकना ही पड़ा क्योंकि उसने देखा कि आगे की तरफ़ सिर्फ़ काँटेदार झाड़ियाँ और जंगल था। वहाँ कोई रास्ता नहीं था। यह देखकर अरुणिमा बुरी तरह चौंक गई क्योंकि उसके पास जाने के लिए आगे कोई रास्ता नहीं बचा था। अरुणिमा घबरा गई और रास्ता तलाशने लगी। वह धीरे-धीरे अपने कदम दूसरी दिशा की तरफ़ बढ़ाने लगी, लेकिन तभी उसके कानों में हल्की-हल्की आवाज़ सुनाई दी। अरुणिमा डर गई और डरते हुए पीछे देखा। तभी उसकी नज़र पीछे कच्चे रास्ते से आ रही दो काले रंग की स्कॉर्पियो पर पड़ी। इससे पहले कि अरुणिमा कुछ कर पाती या वहाँ से भाग पाती, वे स्कॉर्पियो तेज़ रफ़्तार से अरुणिमा के पास आ गईं। अरुणिमा का पूरा शरीर डर से जकड़ गया था। उसकी आँखें पत्थर जैसी हो गई थीं और वह अपनी जगह पर ही जड़ हो गई थी। दोनों स्कॉर्पियो अरुणिमा के पास आकर उसे घेर लेती हैं। तभी एक स्कॉर्पियो का दरवाज़ा खुलता है, और उसमें से आस्तिक उतरता है। उसके हाथ में बंदूक होती है। वह गुस्से में अरुणिमा की तरफ़ बढ़ते हुए कहता है, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझसे दूर भागने की?"

  • 18. Death game

    Words: 2233

    Estimated Reading Time: 14 min

    "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझसे दूर भागने के बारे में सोचने की? यह सोचने की भी?" आस्तिक ने कहा, अरुणिमा के करीब आते हुए। अरुणिमा ने उसे देखा, तो उसका पूरा चेहरा पीला पड़ गया। वह अपनी जगह पर जम गई थी, और उसके चेहरे पर डर साफ़ नज़र आ रहा था। अरुणिमा उसे अपने करीब आता हुआ देख रही थी। उसके एक हाथ में बंदूक थी और आँखों में दहशत भरे अंगारे थे। ऐसा लग रहा था, जैसे वह अरुणिमा को जान से मार डालेगा। अरुणिमा इतनी डर गई थी कि सोचने-समझने की हालत में ही नहीं थी। आस्तिक उसके पास आकर थोड़ी दूरी पर रुक गया। उसके सारे आदमी गाड़ी से बाहर निकलकर रास्ते के पास खड़े हो गए। आस्तिक ने अरुणिमा को देखा। उसका डर से भरा चेहरा देखकर आस्तिक के चेहरे पर एक सुकून भरी, शैतानी मुस्कान आ गई। आखिर वह तो एक माफिया ही था। लोगों के चेहरों पर डर देखना उसे अच्छा लगता था। और जब वह डर "आस्तिक राय चांद" के नाम का हो, तब वह इस चीज़ से और ज़्यादा घमंड महसूस करता था। आस्तिक अरुणिमा को ऐसा देखकर और ज़्यादा खतरनाक तरीके से मुस्कुराने लगा। हालाँकि उसके मन में तो यही था कि अरुणिमा को मारकर वह माफिया की कुर्सी हासिल कर ले। एक तरह से देखा जाए तो अरुणिमा उसके लिए एक बेवकूफ औरत से ज़्यादा कुछ नहीं थी। खासकर तब, जब उसने देखा कि अरुणिमा उसकी कैद से निकलने के लिए भाग गई थी, वह भी उसकी सुरक्षा को चकमा देकर। एक पल के लिए आस्तिक ने अरुणिमा की होशियारी की तारीफ़ भी की, क्योंकि उसने उसकी ट्रेन सुरक्षा को चकमा दे दिया था। लेकिन अरुणिमा एक जगह पर गलती कर गई। वह भूल गई कि यह इलाका, यह शहर, सब कुछ आस्तिक राय चांद का था। उसकी मर्ज़ी के बिना ना तो इस शहर में कोई आ सकता था और ना ही यहाँ से जा सकता था। खासकर उसकी बीवी तो कभी भी नहीं। "जान..." आस्तिक के "जान" कहने पर अरुणिमा की जान जैसे निकल गई। वह डरती हुई नज़रों से आस्तिक को देख रही थी। उसका शरीर किसी सूखे पत्ते की तरह काँप रहा था। उसकी उँगलियाँ इतनी बुरी तरह से काँप रही थीं कि उसे खुद भी समझ नहीं आ रहा था। शायद किसी ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन अरुणिमा अपने पैर के अंगूठे से जमीन पर गड्ढा करने की कोशिश कर रही थी। उसका मन कर रहा था कि अभी यहाँ एक बड़ा गड्ढा हो जाए और वह उसमें दफ़न हो जाए। उसे ऐसा देखकर आस्तिक के इरादे और खतरनाक हो गए। वह शैतानों की तरह अरुणिमा की तरफ़ अपने कदम बढ़ा रहा था। पर तभी अरुणिमा ने काँपती हुई जुबान से कहा, "नहीं... प्लीज़ मेरे करीब मत आना। मुझे कुछ मत करना।" आस्तिक के कदम नहीं रुके। वह बस अरुणिमा के डर से भरे हुए चेहरे को देखकर उसकी तरफ़ बढ़ता रहा। अरुणिमा लगातार अपना सिर हिलाते हुए उसे अपने करीब आने से मना कर रही थी। उसके बालों की लटें उसके गालों पर पसीने से चिपक गई थीं। उसकी आँखें पूरी तरह लाल हो चुकी थीं। उसका चेहरा बुरी तरह से डर से सुर्ख हो गया था और उसकी नाक और मुँह से पसीना बह रहा था। अरुणिमा पीछे हटते-हटते एक पेड़ से टकरा गई। अब उसके पास पीछे जाने की कोई जगह नहीं बची थी। चारों तरफ़ आस्तिक के आदमी खड़े थे और सामने खुद शैतान खड़ा था। आस्तिक अरुणिमा के पास आया। उसने उसकी गर्दन के पास अपनी उँगलियाँ फँसा दीं और उसके बालों को पकड़कर झटका दिया। उसके इस स्पर्श से अरुणिमा इतनी सहम गई, जैसे उसकी धड़कनें बंद हो गई हों। लेकिन आस्तिक की नज़रें अरुणिमा के चेहरे पर ही टिकी हुई थीं। उसका डर से भरा लाल चेहरा आस्तिक को न जाने क्यों बार-बार देखने पर मजबूर कर रहा था। "प्लीज़... मुझे जाने दो। मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ। मुझे जाने दो। मैंने कुछ नहीं किया है..." अरुणिमा ने काँपते हुए अपने हाथ जोड़कर आस्तिक से विनती करना शुरू की। आस्तिक ने उसकी यह हालत देखी, तो उसके चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई। उसने अपनी आँखें बंद कीं और अपना चेहरा साइड में करते हुए कहा, "बंद करो यह कहना।" लेकिन अरुणिमा नहीं रुकी। वह अभी भी कह रही थी, "प्लीज़, मुझे जाने दो। मुझे यहाँ नहीं रहना है। प्लीज़, मुझे जाने दो। मैं किसी से कुछ नहीं कहूँगी। मैं किसी को कुछ नहीं बताऊँगी। बस मुझे जाने दो।" आस्तिक अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से अरुणिमा को घूरता है। अरुणिमा डर से सहम जाती है और चुपचाप रास्ता देखने लगती है। तभी आस्तिक खतरनाक अंदाज़ में बोलता है, "मैं तुम्हें कैसे जाने दे सकता हूँ, जान? मुझे अपने आगे के प्लान के लिए तुम्हारी ज़रूरत है। और मुझे पता है कि तुम मेरा डार्क साइड नहीं देखना चाहतीं। इसीलिए मुझसे दूर भागने की कोशिश कर रही हो। लेकिन मैं तुम्हें नहीं जाने दूँगा, क्योंकि जो चीज़ मैं चाहता हूँ, वह मेरे बहुत करीब है। और तुम्हारी यह छोटी-सी रिक्वेस्ट मैं अभी पूरी नहीं कर सकता।" अरुणिमा डरते हुए काँपती आवाज़ में कहती है, "मुझे तुमसे बच्चा नहीं चाहिए। मैं तुम्हारे बच्चे को जन्म नहीं दे सकती। यह सरासर गलत होगा। प्लीज़, मुझे छोड़ दो।" आस्तिक उसके शब्द सुनकर गुस्से में अपनी मुट्ठी भींच लेता है। अरुणिमा का यह कहना कि वह उसके बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती, उसे अंदर तक झकझोर देता है। उसका गुस्सा इतना बढ़ जाता है कि उसका मन करता है कि अरुणिमा की जान ले ले, लेकिन वह जानता है कि ना वह इसे छोड़ सकता है और ना ही इसे मार सकता है। आस्तिक अरुणिमा से कुछ दूरी पर खड़ा उसे घूरता रहता है। वहीं, अरुणिमा डर से काँपते हुए उसे देखती है। फिर आस्तिक हल्की मुस्कान के साथ अपनी बंदूक की नोक से माथा खुजलाते हुए कहता है, "मुझे नहीं पता था कि तुम मेरे साथ नहीं रहना चाहती। तुमने कभी मुझे यह बताया ही नहीं। खैर, हमारे बीच ऐसा कोई मौका ही नहीं आया कि हम एक-दूसरे से कुछ बात कर सकें। इसलिए शायद मुझे तुम्हारे मन की बात पता नहीं चली। लेकिन अब यह समझ आ गया कि तुम मेरे साथ नहीं रहना चाहतीं। ठीक है, अगर ऐसी बात है तो मैं तुम्हें जाने देता हूँ। सिर्फ़ मुम्बई ही नहीं, अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हें इंडिया से बाहर भी भेज दूँगा। तुम्हारी फ़्लाइट और बाकी ख़र्च मैं खुद उठाऊँगा। जहाँ जाना चाहती हो, वहाँ सेटल हो जाना।" अरुणिमा हैरानी से आस्तिक को देखती है। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि आस्तिक इतनी आसानी से उसे जाने दे रहा है। उसने असहजता से पूछा, "तुम सच कह रहे हो? मैं जा सकती हूँ?" आस्तिक की शैतानी मुस्कान लौट आती है। वह सिर हिलाते हुए कहता है, "हाँ, बिल्कुल जा सकती हो। लेकिन एक बात जान लो—इस दुनिया में हर चीज़ की कीमत होती है। कुछ भी मुफ़्त में नहीं मिलता। अब तुम देख लो, तुम्हारे पापा की कंपनी को बचाने के लिए मैंने कितना पैसा लगाया था। उसके बदले मुझे तुम्हें कैद करने का हक़ मिला। लेकिन अगर तुम अब आज़ादी चाहती हो, तो तुम्हें उसकी कीमत चुकानी होगी।" "तुम कहना क्या चाहते हो? मैं समझी नहीं," अरुणिमा डरते हुए पूछती है। आस्तिक खतरनाक आवाज़ में कहता है, "इतना घबरा क्यों रही हो? मैंने अभी तो पूरी बात भी नहीं कही। तुम्हें आज़ादी चाहिए, लेकिन प्रॉब्लम यह है कि तुम्हारे पास ना पैसे हैं और ना ही और कुछ। इसलिए मैंने सोचा है कि मैं तुम्हारे साथ एक गेम खेलता हूँ। एक छोटा सा गेम। अगर तुम जीत गईं, तो तुम्हें तुम्हारी आज़ादी मिल जाएगी।" "कैसा गेम?" अरुणिमा हैरानी और डर से पूछती है। आस्तिक मुस्कुराते हुए धीमे लेकिन डरावने अंदाज़ में कहता है, "डेथ गेम।" अरुणिमा का शरीर डर से काँपने लगता है। वह काँपती जुबान में कहती है, "नहीं... मुझे कोई गेम नहीं खेलना।" लेकिन आस्तिक सनकी की तरह हँसता है। उसकी हँसी किसी डरावने शैतान जैसी थी। वह अपनी बंदूक को उँगलियों पर घुमाते हुए कहता है, "तुम्हारे गेम खेलने का कोई इरादा नहीं होगा, लेकिन मेरा मूड बन चुका है। और तुम्हारे पास इसके अलावा कोई और ऑप्शन नहीं है।" आस्तिक जंगल की तरफ़ इशारा करते हुए कहता है, "तुम जंगल में भागो। मेरे आदमी तुम्हारा पीछा करेंगे और तुम पर फायरिंग करेंगे। एक घंटा यह गेम चलेगा। अगर तुम बच गईं, तो तुम्हें तुम्हारी आज़ादी मिल जाएगी। और अगर मर गईं, तो श्रद्धांजलि।" आस्तिक इतनी सामान्य तरीके से बात कर रहा था, जैसे बच्चों के साथ कोई खेल की बात हो। अरुणिमा डर से काँपती है, लेकिन फिर उसने अपनी आँखों से आँसू पोछे और हिम्मत जुटाकर कहा, "मैं तैयार हूँ।" आस्तिक की मुस्कान गायब हो गई। उसने हैरानी से अरुणिमा को देखा। अरुणिमा उसे दृढ़ता से देखते हुए कहती है, "हाँ, मैं तैयार हूँ। यह गेम खेलने के लिए। और इसका परिणाम चाहे जो भी हो, जीत मेरी ही होगी। अगर मैं बच गई, तो तुम मुझे आज़ाद करोगे। और अगर मर गई, तो तुम्हारी कैद से मुक्त हो जाऊँगी। मौत तुम्हारे साथ रहने से बेहतर विकल्प है।" आस्तिक, जो अपनी उँगलियों में बंदूक घुमा रहा था, अचानक रुक गया और हैरानी से अरुणिमा को देखने लगा। अरुणिमा इस हद तक हताश हो चुकी थी कि वह मौत को अपनाना सही समझ रही थी, लेकिन आस्तिक को यह मंज़ूर नहीं था। आस्तिक ने तिरछी मुस्कान के साथ कहा, "चलो फिर ठीक है। खेलते हैं डेथ गेम।" आस्तिक सीधा अपनी स्कॉर्पियो में जाकर बैठ गया। गाड़ी का दरवाज़ा खोलते ही उसके सारे आदमी भी गाड़ी में बैठ गए। खिड़की का शीशा खोलकर उन्होंने अपनी-अपनी बंदूकें बाहर निकालीं और निशाने की तैयारी करने लगे। "भागो!" जैसे ही आस्तिक ने यह कहा, अरुणिमा जंगल की तरफ़ भागने लगी। आस्तिक भी अपनी गाड़ी लेकर अरुणिमा के पीछे-पीछे जंगल की तरफ़ चला गया। वह मज़े से इस खेल का आनंद ले रहा था, जबकि अरुणिमा अपनी पूरी ताक़त के साथ भाग रही थी। पीछे से लगातार फायरिंग हो रही थी। अरुणिमा पागलों की तरह हर पेड़ के पीछे छुपते हुए खुद को बचाने की कोशिश कर रही थी। जहाँ भी वह छुपती, उसके पास ही गोली निशाना बनाकर लगती। आस्तिक को यह खेल बहुत मज़ेदार लग रहा था, जैसे वह अरुणिमा का शिकार कर रहा हो। अरुणिमा एक पेड़ से दूसरे पेड़ की तरफ़ भागते हुए खुद को छुपा रही थी। तभी एक गोली उसके बाजू से गुज़र गई। जैसे ही आस्तिक ने यह देखा, उसने अपनी बंदूक पीछे कर ली। उसने देखा कि अरुणिमा तेज़ चीख के साथ पेड़ के पीछे खुद को संभाल रही थी। तभी उसने गुस्से में अपनी बंदूक एक आदमी की तरफ़ मोड़ी और कहा, "तुझे फ़ायरिंग करने को कहा था क्या मैंने?" वह आदमी डरते हुए बोला, "मुझे लगा आप उसे मारना चाहते हैं, इसलिए यह गेम खेल रहे हैं।" उस आदमी की बात सुनते ही आस्तिक ने अपनी बंदूक का ट्रिगर दबाते हुए कहा, "अगर उसे मारना ही होता, तो मैं उसे ढूँढता क्यों? उसके मरने का समय अभी नहीं आया। पर तेरा समय आ गया है। बहुत बड़ी गलती कर दी है तूने उस पर गोली चलाकर।" और इसी के साथ आस्तिक ने उस आदमी के सिर के बीचों-बीच गोली मार दी। वह वहीं मर गया। दूसरे आदमी ने गाड़ी का दरवाज़ा खोलकर उसकी लाश को बाहर धक्का दे दिया। इसके बाद आस्तिक ने देखा कि अरुणिमा अपनी जगह पर नहीं थी, जहाँ वह घायल होकर छुपी हुई थी। यह देखकर आस्तिक के चेहरे पर दुष्ट मुस्कान आ गई। वह जानता था कि अरुणिमा कहीं आसपास ही छुपी होगी। क्योंकि उसके बाजू में गोली लगी थी, अब खेल और भी दिलचस्प हो गया था। आस्तिक अपनी गाड़ी से बंदूक लेकर बाहर निकल गया। उसके आदमी भी बंदूकें लेकर बाहर आ गए। आस्तिक हँसते हुए उन पेड़ों की तरफ़ देखने लगा और बोला, "जान, कहाँ छुपी हो? मुझे तुम नज़र नहीं आ रही हो। अगर तुम दिखाई नहीं दोगी, तो मैं फ़ायर कैसे करूँगा? अरे डरो मत, वह गोली गलती से चल गई थी। वह भी उस बेवकूफ़ आदमी ने चलाई थी। अगर मैंने चलाई होती, तो तुम्हारे बाजू पर नहीं, सिर पर लगती। अच्छा, चलो बाहर आओ। मैं अपने आदमियों को मना कर दूँगा। कोई तुम पर गोली नहीं चलाएगा। सिर्फ़ मैं तुम्हारे साथ गेम खेलूँगा।" लेकिन उसे कहीं से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। अरुणिमा घायल थी, पर उसे कहीं भी दर्द का एहसास नहीं हो रहा था। आस्तिक थोड़ा रुककर अपनी नज़रों से इधर-उधर देखने लगा। उसे कुछ शक़ हुआ और उसने अपने आदमियों को जंगल घेरने का हुक्म दिया। आस्तिक के आदमियों ने तुरंत जंगल घेर लिया। अरुणिमा ज़्यादा दूर नहीं जा पाई थी, क्योंकि वह घायल थी। वह एक शिकारी के बनाए गड्ढे में गिर गई थी और वहीं अचेत पड़ी थी। आस्तिक के आदमियों ने उसकी धीमी साँसों की आवाज़ सुनी और उसे ढूँढ लिया। आस्तिक गड्ढे के पास घुटनों के बल बैठकर अरुणिमा को देखने लगा। अरुणिमा डरते हुए, काँपती आवाज़ में बोली, "प्लीज़, मुझे मार दो।" आस्तिक के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान आ गई। उसने अरुणिमा को देखते हुए कहा, "तुम्हारे साथ गेम खेलकर मज़ा आया, जान।" आस्तिक जल्दी से गड्ढे में उतर गया और अरुणिमा को अपनी गोद में उठा लिया। गोली लगने की वजह से अरुणिमा की हालत नाज़ुक हो गई थी। उसकी साँसें धीमी चल रही थीं। उसका पीला पड़ा चेहरा देखकर आस्तिक के चेहरे पर एक सुकून सा उतर आया। अरुणिमा ने आस्तिक के सीने पर सिर रखा और काँपते हुए बोली, "मौत तुम्हारे साथ रहने से बेहतर है।" आस्तिक के चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, लेकिन उसकी आँखों में कुछ और ही इरादे थे।

  • 19. hot and sexy a perfect body

    Words: 2106

    Estimated Reading Time: 13 min

    मेरी आँखों के सामने अंधेरा ही अंधेरा था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरे शरीर में कोई हलचल नहीं हो रही हो। सिवाय अंधेरे के, मुझे और कुछ नज़र नहीं आ रहा था। तभी एक रोशनी ने मेरी आँखों पर प्रहार किया, और इसी के साथ मेरी आँखें धीरे-धीरे खुलने लगीं। ऐसा लग रहा था, जैसे मैं गहरी नींद में थी और मेरे शरीर को किसी भारी पत्थर से बाँधकर जकड़ लिया गया हो। पर जब धीरे-धीरे मेरी पलकों ने खुलना शुरू किया, तब जाकर मेरा सामना रोशनी से हुआ। मैं धीरे-धीरे अपनी आँखें फड़फड़ाते हुए बेहोशी की हालत से बाहर आने लगी। मैंने देखा कि मैं इस वक़्त लेटी हुई थी, क्योंकि मुझे अपने ऊपर छत नज़र आ रही थी। छत पर सुंदर नक्काशियाँ बनी थीं और बीचो-बीच शानदार झूमर लगा हुआ था।

    मुझे अजीब लग रहा था, क्योंकि मेरे शरीर पर वो भारीपन अभी भी महसूस हो रहा था।

    जब अरुणिमा बेहोशी की हालत से होश में आई, तो पहला विचार उसके मन में यही आया। लेकिन वह अपने विचारों में ही उलझी हुई थी, तभी उसने एक आवाज़ सुनी, जिसने उसे होश में आने के साथ ही एक बार फिर से दहशत की दुनिया में धकेल दिया।

    "तुम उठ गईं जान, अब कैसा महसूस कर रही हो?"

    अरुणिमा एकदम से घबरा गई। उसने अपना चेहरा घुमाकर देखा और उसकी आँखें डर से बड़ी हो गईं। आस्तिक उसके बेड पर ही बैठा हुआ था, वह भी उसके बेहद करीब। इतने करीब कि वह उसकी साँसों को महसूस कर सकती थी।

    यह पहली बार था जब उसने आस्तिक को अपने इतने करीब देखा था। इसी के साथ उसका दिमाग उलझन से भर गया। तभी उसे याद आया कि वह तो जंगल में थी, और आस्तिक उसके साथ डेड गेम खेल रहा था। लेकिन उसके बाद गोली चली और फिर वह भागते हुए किसी गड्ढे में गिर गई थी। उसके बाद क्या हुआ, उसे कुछ याद नहीं था। वह बेहोश हो गई थी। अब जब उसे होश आया, तो उसने खुद को आस्तिक के साथ उसके कमरे में पाया।

    अरुणिमा को एक सेकंड नहीं लगा यह समझने में कि वह वापस उस बीस्ट की कैद में आ गई है। उसकी आजादी का एकमात्र ज़रिया, जो उसने भागने के लिए चुना था, अब उसके हाथ से निकल चुका था। आस्तिक ने उसे एक बार फिर से अपनी कैद में ले लिया था।

    अरुणिमा आस्तिक को सामने देखकर घबरा गई थी। उसने डरते हुए खुद को बिस्तर से उठाने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही वह कमर के बल बैठी, एक तेज़ दर्द ने उसे जकड़ लिया। वह दर्द से कराह उठी। उसने अपने बाजू को कसकर पकड़ लिया, और उसका चेहरा दर्द से मुरझा गया।

    आस्तिक ने उसे देखते हुए कहा, "किसने कहा तुम्हें हिलने के लिए? तुम्हें चोट लगी है। कुछ दिन आराम की ज़रूरत है।"

    अरुणिमा ने घबराई हुई नज़रों से अपने बाजू को देखा, जहाँ सफ़ेद रंग की पट्टी बाँधी हुई थी। उसे याद आया कि उसे गोली लगी थी। गोली उसे छूकर निकल गई थी। वह यह तो नहीं जान पाई कि गोली किसने चलाई—आस्तिक ने या उसके किसी आदमी ने। जो भी हो, लेकिन अरुणिमा पर गोली चली थी। वह भी इस तरह से जैसे वह कोई इंसान नहीं, बल्कि कोई जंगली जानवर हो। इंसान जानवरों का शिकार करता है, यह तो उसने सुना था। लेकिन इंसानों का शिकार करते हुए उसने पहली बार देखा था।

    अरुणिमा की आँखों में हल्के आँसुओं की परत आ गई। उसने आस्तिक को देखा। उसके चेहरे पर कुछ चिंता के भाव थे। अरुणिमा हैरान रह गई। उसे विश्वास नहीं हुआ कि आस्तिक जैसे इंसान के चेहरे पर उसके लिए चिंता हो सकती है। लेकिन उसे यह भी याद था कि उसे घायल करने वाला आस्तिक खुद ही था।

    अरुणिमा डरते हुए आस्तिक को देख रही थी। आस्तिक के चेहरे पर कोई एक्सप्रेशन नहीं थे। तभी अरुणिमा ने कुछ महसूस किया। उसने धीरे-धीरे अपना चेहरा नीचे किया। उसी पल उसकी जान गले में अटक गई। उसकी आँखें डर से बड़ी हो गईं, और वह तेज़ी से साँस लेने लगी। इस वक़्त कंबल उसकी कमर तक था। उसने ऊपर कुछ भी नहीं पहना हुआ था। यहाँ तक कि उसे ऐसा लग रहा था कि उसने कमर के नीचे भी कुछ नहीं पहना है।

    डर और घबराहट के मारे अरुणिमा ने जल्दी से कंबल को अपने हाथों से कसकर पकड़ लिया और अपने सीने तक ढक लिया। उसकी आँखों में आँसू आ गए। वह इतनी ज़्यादा घबरा गई कि उसे समझ ही नहीं आया कि यह क्या हो रहा है।

    आस्तिक ने उसकी घबराहट को देखकर एक शैतानी मुस्कान दी और घिनौनी हँसी के साथ कहा, "तुम्हें यह सब करने की ज़रूरत नहीं है, जान। मैं तुम्हें ऊपर से लेकर नीचे तक पूरा देख चुका हूँ।"

    अरुणिमा ने घबराई नज़रों से आस्तिक को देखा। आस्तिक उसकी हालत देखकर और ज़ोर से हँसा। फिर उसके चेहरे के करीब आकर उसके कानों में धीरे से फुसफुसाते हुए बोला, "और मानना पड़ेगा, तुम एकदम हॉट और सेक्सी हो। परफेक्ट बॉडी।"

    अरुणिमा ने काँपती आवाज़ में पूछा, "मेरे कपड़े कहाँ गए? और मेरे कपड़े किसने बदले?"

    आस्तिक ने हँसते हुए जवाब दिया, "तुम्हें क्या लगता है, यह करने की हिम्मत कौन करेगा?"


    आस्तिक हँसते हुए अरुणिमा से दूर जाता है और बेड के दूसरे कोने पर जाकर बैठ जाता है। वह अब भी उसे हँसते हुए देख रहा था, और उसके चेहरे की मुस्कान देखकर अरुणिमा का डर और गहरा होता जा रहा था।

    आस्तिक ने अपनी हँसी को धीमा करते हुए कहा, "आज के लिए इतना काफी है। अब जल्दी से जाकर तैयार हो जाओ। तुम्हारी नई डॉक्टर तुम्हारा चेकअप करेगी। वह किसी भी पल यहाँ आ सकती है, उससे पहले कपड़े पहन लेना।"

    आस्तिक की बात सुनकर अरुणिमा पूरी तरह कन्फ़्यूज़ हो गई। "नई डॉक्टर?" उसके मन में सवाल उठने लगे। उसकी पुरानी डॉक्टर निशा... निशा के होते हुए नई डॉक्टर की क्या ज़रूरत? और इस ख्याल के साथ ही अरुणिमा की आँखें बड़ी हो गईं। उसका दिल जोर से धड़कने लगा। डॉक्टर निशा। उसने अरुणिमा की भागने में मदद की थी। कहीं आस्तिक को इसके बारे में पता तो नहीं चल गया? कहीं उसने निशा को कुछ कर तो नहीं दिया? अगर ऐसा हुआ तो... यह सोचते ही अरुणिमा का दिल डर से भर गया।

    अरुणिमा ने जल्दी से कंबल को अपनी चारों तरफ़ लपेटा और घबराते हुए बोली, "निशा कहाँ है?"

    आस्तिक, जो बेड से उठने ही वाला था, अचानक पलटा और उसकी ओर देखा। उसके चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान और गहरी हो गई। उसकी आँखों में एक राज़ छिपा था। अरुणिमा ने उसकी आँखों की गहराई में छिपी बात को पहचान लिया। और उसी पल, एक अपराधबोध और निशा के लिए सहानुभूति उसके दिल में आ गई। निशा ने केवल उसकी मदद की थी, वह भी इंसानियत के नाते।

    अरुणिमा ने डरते हुए कहा, "प्लीज़, निशा को चोट मत पहुँचाना। उसने कुछ नहीं किया है। उसकी इसमें कोई गलती नहीं है। उसे छोड़ दो, उसे जाने दो।"

    अरुणिमा की बात सुनकर आस्तिक हँसता हुआ बेड से खड़ा हो गया। जब वह पूरी तरह खड़ा हुआ, तो अरुणिमा की नज़र उसके शरीर पर गई। उसकी आँखें शून्य हो गईं। आस्तिक ने सिर्फ़ स्वेटपैंट पहना हुआ था, और उसकी अपर बॉडी पर कुछ भी नहीं था। अरुणिमा की नज़रें उसके सीने पर बने ईगल टैटू पर अटक गईं। उसका टैटू उसके राइट शोल्डर से लेकर सीने तक फैला हुआ था। यह पहली बार था जब उसने आस्तिक को इस रूप में देखा।

    अरुणिमा की नज़र धीरे-धीरे उसके सिक्स-पैक एब्स पर गई। वहाँ, कमर के ऊपर एक ब्लैक डेविल का टैटू बना हुआ था। उसके टैटू इतने रियल लग रहे थे, जैसे किसी पेंटिंग में जान डाल दी गई हो।

    आस्तिक ने उसकी नज़रों को महसूस किया और मुस्कुराते हुए बेड से उतरकर उसकी तरफ़ बढ़ने लगा। अरुणिमा की नज़र इस बार उसकी पीठ पर गई। उसकी पूरी पीठ पर 10 सिर वाले रावण का 3D टैटू था। वह टैटू इतना भयानक और जीवंत लग रहा था, जैसे रावण उसके अंदर से हँस रहा हो।

    अरुणिमा की आँखें यह सब देखकर फटी रह गईं। उसे आस्तिक के करीब आते हुए पता ही नहीं चला। आस्तिक झुककर उसके चेहरे के पास आया और धीमे स्वर में बोला, "क्या बात है, जान? तुम मेरे टैटू को इतनी गौर से क्यों देख रही हो? क्या तुम्हें यह पसंद हैं? क्या इन्हें छूना चाहोगी?"

    उसके शब्दों ने अरुणिमा को उसकी ख्यालों की दुनिया से बाहर निकाला। उसने डरते हुए कहा, "मैं बस इतना चाहती हूँ कि तुम निशा को चोट मत पहुँचाओ। उसका इन सबसे कोई लेना-देना नहीं है। प्लीज़, उसे जाने दो। उसने वह सब मेरे कहने पर किया था।"

    आस्तिक सीधे खड़ा हो गया और अपने दोनों हाथ सामने बाँधते हुए बोला, "और तुम मुझे बताओगी कि मैं ऐसा क्यों ना करूँ? उस डॉक्टर को ज़िंदा रखकर मुझे क्या फायदा होगा, जबकि मैं जानता हूँ कि उसने तुम्हारी भागने में मदद की। वह डॉक्टर हमारी फैमिली ने तुम्हारे चेकअप के लिए रखी थी। लेकिन उसने तुम्हारी झूठी हेल्थ रिपोर्ट मुझे दी और तुम्हारी मदद की। यह सब मुझसे छुपाने का अंजाम तो भुगतना पड़ेगा, है ना?"


    अरुणिमा घबरा जाती है और जल्दी से कहती है, "नहीं आस्तिक, प्लीज़ उसे कुछ मत करना। उसने कुछ नहीं किया है। उसने जो कुछ भी किया है, मेरे कहने पर किया है। और अगर इसके लिए किसी को सज़ा मिलनी चाहिए, तो मुझे मिलनी चाहिए। प्लीज़ निशा को छोड़ दो। उसके हिसाब से कोई गलती नहीं है।"

    अरुणिमा के लगभग गिरते हुए शब्दों को सुनकर आस्तिक ने हँसते हुए कहा,
    "जान, मुझे लगता है इन सब की वजह से तुम चीज़ें भूलने लगी हो। तुम भूल रही हो कि कल ही तो मैंने तुम्हें सज़ा दी थी... याद है वह डेथ गेम? वह तुम्हारी सज़ा ही तो थी। मैंने तुम्हें अपने तरीके से सज़ा दी और मुझे तुम्हारे साथ वह गेम खेलने में बड़ा मज़ा आया। लेकिन उसका अंजाम कुछ नहीं निकला। ना तो तुम भाग पाई और ना ही तुम मर पाई। यहाँ तक कि तुम बचकर वापस मेरे पास आ गई हो। इसीलिए अब मरते दम तक तुम यहीं रहोगी... मेरी कैद में। लेकिन जहाँ तक बात रही उस डॉक्टर की, उसकी सज़ा भी बाकी है। और मैं उसे अपने तरीके से सज़ा दूँगा।"

    अरुणिमा डरते हुए आस्तिक को देखने लगती है। आस्तिक मुस्कुराते हुए अरुणिमा के पास आता है और कहता है,
    "देखना चाहोगी तुम्हारी वह सखी-सहेली, तुम्हारी वजह से किस हालत में पहुँच गई है?"

    अरुणिमा के मुँह से शब्द नहीं निकल रहे थे, लेकिन उसकी आँखों में इस बात का डर साफ़ दिख रहा था कि आस्तिक ने ज़रूर कुछ बुरा किया है। आस्तिक ने अपना फ़ोन निकाला और अगले ही पल नीरज को कॉल कर दिया।

    नीरज ने कॉल उठाया, उसका चेहरा स्क्रीन पर नज़र आया। आस्तिक ने उसे देखते हुए कहा,
    "नीरज, ज़रा मुझे डॉक्टर साहिबा का चेहरा तो दिखाओ।"
    "ओके, बॉस," नीरज ने कहा।

    नीरज अपने फ़ोन की स्क्रीन को कहीं और लेकर जाने लगा। अरुणिमा डरते हुए फ़ोन स्क्रीन को देख रही थी। स्क्रीन पर एक अजीब सी जगह दिख रही थी। वहाँ चारों तरफ़ खून के धब्बे थे और रोशनी बहुत कम थी। जगह-जगह दीवारों पर इंसानों के अंग लटके हुए थे, जिन्हें जंजीरों से बाँधा गया था।

    जैसे-जैसे नीरज उस गलियारे से एक कमरे की ओर बढ़ रहा था, अरुणिमा की घबराहट बढ़ती जा रही थी। वह जगह किसी नरक से कम नहीं लग रही थी।

    नीरज ने एक दरवाज़ा खोला और कमरे में दाखिल हुआ। अरुणिमा की नज़रें स्क्रीन पर जम गईं। उसने देखा कि एक कमरे में कुर्सी से बाँधकर निशा को रखा गया है। उसके चेहरे पर चोट के गहरे निशान थे। उसे जंजीरों से इस क़दर बाँधा गया था कि उसके शरीर से खून बह रहा था। लेकिन वह अब भी ज़िंदा थी, क्योंकि उसकी साँसें चल रही थीं। वह तड़पते हुए अपना चेहरा इधर-उधर हिलाने की कोशिश कर रही थी।

    निशा को इस हालत में देखकर अरुणिमा काँप उठी। वह आस्तिक से गिड़गिड़ाते हुए बोली,
    "नहीं आस्तिक, प्लीज़ उसे छोड़ दो। उसने कुछ नहीं किया है। मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ, प्लीज़ उसे जाने दो।"

    आस्तिक उसकी हालत देखकर मुस्कुराया और बोला,
    "अगर मैंने उसे छोड़ दिया, तो सबको लगेगा मैं हार गया हूँ, क्योंकि मैंने उसे सज़ा नहीं दी जिसने मेरी बीवी को भागने में मदद की। उसे छोड़ना तो नामुमकिन है। लेकिन हाँ, तुम्हारे लिए एक फ़ेवर कर सकता हूँ।"

    अरुणिमा डरते हुए आस्तिक को देखने लगी। आस्तिक हँसते हुए बोला,
    "माफ़िया की कुर्सी के लिए मुझे वारिस चाहिए। तुम मेरा बच्चा पैदा करो, और मैं तुम्हारी दोस्त को छोड़ दूँगा।"

    अरुणिमा गुस्से में चिल्लाते हुए बोली,
    "मैं ऐसा कभी नहीं करूँगी!"

    उसके जवाब पर आस्तिक की तिरछी मुस्कान और गहरी हो गई। उसने फ़ोन स्क्रीन की तरफ़ देखा और नीरज से कहा,
    "नीरज, शूट हर।"

  • 20. Tumhen kissss karna Nahin Aata Hai

    Words: 2383

    Estimated Reading Time: 15 min

    नीरज, उसे खत्म कर दो। वैसे भी वह डॉक्टर मेरे किसी काम की नहीं है।

    जैसे ही आस्तिक ने यह कहा, अरुणिमा जल्दी से चिल्लाते हुए बोली, "नहीं, आस्तिक, नहीं! तुम ऐसा कुछ मत करो। प्लीज़, उसे छोड़ दो, उसे जाने दो। उसने कुछ भी नहीं किया है। मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ। तुम जैसा कहोगे, मैं वैसा करूँगी, लेकिन प्लीज़, उसे कुछ मत करो!"

    आस्तिक ने उसे एक शरारती नज़र से देखा, जैसे वह अरुणिमा से कुछ खास सुनने का इंतज़ार कर रहा हो। अरुणिमा रोते हुए उसे देखती है और घुटन भरी आवाज़ में कहती है, "तुम चाहते हो ना कि मैं तुम्हारे बच्चे को पैदा करूँ? तो मैं ऐसा करूँगी। लेकिन प्लीज़, इसके बदले उसकी जान बख्श दो। उसने कुछ भी नहीं किया है। वह बेकसूर है।"

    आस्तिक के चेहरे पर एक दोहरी मुस्कान आ गई। उसने एक भौं ऊपर करते हुए कहा, "जान, तुम अपने पति के साथ सौदेबाज़ी कर रही हो? और तुम्हें लगता है कि मुझे तुम्हारी मंज़ूरी की ज़रूरत पड़ेगी? जानती हो ना who I am। और इसके बावजूद तुम्हें ऐसा लगता है कि तुम्हारी सहमति मेरे लिए मायने रखती है? मैंने तुमसे पूछा नहीं था, बल्कि तुम्हें बताया था कि तुम मेरे बच्चे को जन्म दोगी। इसमें तुम्हारी मर्ज़ी हो या ना हो, मुझे फ़र्क नहीं पड़ता। मैं जब चाहूँ, तब तुमसे यह करवाऊँगा। और तुम डॉक्टर की जान के लिए मेरे साथ सौदा कर रही हो? तुम्हें लगता है कि मैं डॉक्टर की जान तुम्हारे इस घटिया से सौदे के सामने छोड़ दूँगा? यह जानते हुए भी कि उस डॉक्टर ने मेरे साथ गद्दारी करने की कोशिश की है?"

    आस्तिक की बात सुनकर अरुणिमा के होश उड़ गए। वह डरते हुए आस्तिक को देखने लगी। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि आस्तिक इस हद तक गिर सकता है। लेकिन वह निशा की जान इस तरीके से खतरे में नहीं डाल सकती थी। उसने जल्दी से कुछ सोचा और हिम्मत करके बोली,
    "अगर तुम इसे सौदेबाज़ी समझ रहे हो, तो ठीक है, यह सौदा ही सही। मैं तुम्हारी मंज़िल को पाने का ज़रिया हूँ। लेकिन उस ज़रिये को दुनिया में लाने के लिए मेरी मंज़ूरी भी मायने रखती है... या फिर यह कहूँ, मेरा होना मायने रखता है।"

    आस्तिक की आँखें छोटी हो गईं और उसने गुस्से से अरुणिमा को घूरा। अरुणिमा ने अपने आँसुओं को बेरहमी से पोंछते हुए गुस्से में कहा,
    "मैं जानती हूँ कि तुम्हें अपने पापा के माफ़िया बिज़नेस को पाने के लिए एक वारिस की ज़रूरत है। और उस ज़रूरत को पूरा करने के लिए तुम्हें मेरी ज़रूरत है। तुम चाहते तो मुझे कल ही मार सकते थे, लेकिन तुमने ऐसा नहीं किया। बल्कि मुझे घायल करके यहाँ अपने पास ले आए क्योंकि अभी मैं तुम्हारी सबसे बड़ी ज़रूरत हूँ। दुनिया के सामने और तुम्हारे परिवार के सामने मैं तुम्हारी बीवी हूँ। तुम्हारे खानदान को मुझसे बच्चा चाहिए, इसके लिए मेरा रहना ज़रूरी है।
    तो मैं तुम्हारे सामने सौदा रखती हूँ, आस्तिक रायचंद। डॉ. निशा को छोड़ दो। क्योंकि अगर तुमने उसे कुछ भी किया, तो... तो मैं अपनी जान ले लूँगी। घर में बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं, जिनसे मैं खुद को खत्म कर सकती हूँ। और अगर मैं मर गई, तो ना तुम्हें माफ़िया की कुर्सी मिलेगी और ना तुम्हारे बाप की जायदाद।"

    अरुणिमा की बात सुनते ही आस्तिक का गुस्सा और बढ़ गया। उसने झट से उसकी गर्दन पकड़ ली। अरुणिमा की आँखें डर से बड़ी हो गईं और वह काँपने लगी। आस्तिक ने उसकी गर्दन इतनी जोर से दबाई कि अरुणिमा को लगा, अब उसका अंत नज़दीक है। उसकी साँसें अटकने लगीं। चेहरा लाल हो गया और आँखें बाहर निकलने को थीं।

    लेकिन इससे पहले कि वह आखिरी साँस लेती, आस्तिक ने उसकी गर्दन छोड़ दी। अरुणिमा ज़मीन पर गिर गई और ज़ोर-ज़ोर से खांसने लगी। वह तेज़ी से साँस लेकर अपने शरीर में ऑक्सीजन की कमी को पूरा करने की कोशिश करने लगी।

    आस्तिक घुटनों के बल उसके सामने बैठ गया और डरावनी हँसी के साथ उसे देखने लगा। अरुणिमा को यकीन नहीं हो रहा था कि वह अब भी ज़िंदा है। तभी आस्तिक की आवाज़ ने उसकी सोच को तोड़ा।
    "मुझे नफ़रत है उन लोगों से, जो यह समझते हैं कि वे मुझे बहुत अच्छी तरह जानते हैं। लेकिन तुम बेवकूफ़ हो, अरुणिमा। तुम सोचती हो कि तुम्हें मेरे बारे में सब पता है। तुम कुछ भी नहीं जानती। मुझे तुम्हारी ज़रूरत नहीं है। बल्कि तुम्हें ज़िंदा रहने के लिए मेरी ज़रूरत है। इसीलिए अब जब भी मेरे सामने आओ, तो सावधान रहना। कहीं ऐसा ना हो कि तुम मुझे नाराज़ कर दो। याद रखना, तुम्हारी ज़िंदगी मेरे हाथों की कठपुतली है।"


    और क्या कह रही थीं तुम? हाँ, यही कि तुम उस डॉक्टर की जान बचाने के लिए कुछ भी करोगी... क्या तुम अभी भी अपनी बात पर कायम हो? क्या तुम अभी भी उस डॉक्टर की जान बचाने के लिए मेरे सामने सौदा करने को तैयार हो?

    अरुणिमा का चेहरा डर से भर गया था, लेकिन निशा के लिए उसने फिर भी 'हाँ' में अपना सिर हिलाया। क्योंकि वह अपनी जान दे सकती थी, लेकिन निशा एक निर्दोष थी। उसकी जान नहीं ले सकती थी। वह भी बस इसीलिए क्योंकि निशा ने उसकी इंसानियत के नाते मदद की थी।

    उसके 'हाँ' कहते ही आस्तिक के चेहरे पर फिर से शैतानी मुस्कान आ गई और वह बुरी तरह से हँसते हुए बोला, "I like it."

    आस्तिक ने अपने हाथ में पड़े हुए फ़ोन से दोबारा नीरज को कॉल किया। उसने पहले नीरज को ऑर्डर देकर कॉल काट दिया था, लेकिन अब उसने दोबारा नीरज को फ़ोन लगाया और स्पीकर पर रखते हुए कहा, "नीरज, उसे डॉक्टर को जान से मारने की ज़रूरत नहीं है। बस उसे ऐसी जगह भेज दो जहाँ उसे कोई पहचान न सके। वह भी बिना किसी साधन के। और हाँ, उसे वहाँ छोड़ने से पहले उसकी याददाश्त मिटा देना। अनजान शहर में बिना पैसे और मदद के, एक भिखारी की तरह भटकते हुए उसकी ज़िंदगी कटेगी।"

    लेकिन अरुणिमा घबराते हुए बोली, "नहीं आस्तिक, प्लीज़ ऐसा मत करना। उसे जैसी है वैसी ही रहने दो। उसे कहीं भेजना है तो भेज दो, लेकिन उसकी याददाश्त मत मिटाओ। मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ती हूँ। जो तुम कहोगे, वह करूँगी, लेकिन उसे छोड़ दो।"

    आस्तिक तीखी नज़रों से उसे देखते हुए बोला, "सच में? तुम उस डॉक्टर के लिए इस हद तक गिरने को तैयार हो कि मेरे सामने भीख माँग रही हो? और जो मैं कहूँगा, वह करने को तैयार हो?"

    अरुणिमा रोते हुए अपना सिर 'हाँ' में हिलाती है। यह देखकर आस्तिक के चेहरे पर शैतानी मुस्कान और गहरी हो गई। उसने शैतानों की तरह अरुणिमा को देखकर कहा, "अगर ऐसी बात है तो ठीक है। मेरे बाप की ख्वाहिश पूरी करो। मेरे बच्चे को जन्म दो।"

    अरुणिमा बेबस हो जाती है। अपनी आँखें कसकर बंद करके, वह 'हाँ' में सिर हिलाती है। उसकी मंज़ूरी के साथ ही आस्तिक के चेहरे की मुस्कान और गहरी हो जाती है। उसने नीरज को फ़ोन पर कहा, "उसे डॉक्टर को दूसरे शहर में ट्रांसफ़र कर दो। और देखना, वह कोई चालबाज़ी न करे।"

    "ओके, बॉस," नीरज इतना कहकर फ़ोन काट देता है।

    आस्तिक अपनी जगह पर खड़ा हो जाता है और अरुणिमा वहीं ज़मीन पर बैठकर फूट-फूटकर रोने लगती है। आस्तिक उसे अपनी नज़रों से घूरते हुए कहता है, "मैं अपनी बात दोहराऊँगा नहीं। दो मिनट हैं तुम्हारे पास, मेरे पास आने के लिए।"

    यह कहता हुआ आस्तिक जाकर बेड पर बैठ जाता है। अरुणिमा ज़मीन पर बैठी हुई उसे देखती है। वह जल्दी से अपनी बेडशीट को दोनों हाथों से कस लेती है और धीरे-धीरे करके आस्तिक के करीब जाने लगती है। उसके कदम उठ नहीं रहे थे। बेड के पास जाना उसे मौत के मुँह में जाने जैसा लग रहा था।

    उसका चेहरा आँसुओं से भरा हुआ था। उसे पता था कि इस वक़्त उसका अस्तित्व दांव पर लगा है। पर उसके पास कोई और विकल्प नहीं था।

    धीरे-धीरे वह आस्तिक के पास पहुँचती है और बिल्कुल उसके सामने खड़ी हो जाती है। लेकिन उसने बेडशीट को अपने हाथों से कसकर पकड़ रखा था, जैसे कि वह छोटी सी चादर उसे आस्तिक से बचा लेगी।

    पर यह बस डूबते को तिनके का सहारा था। अरुणिमा ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और जो होने वाला था, उसके लिए खुद को तैयार करने लगी।

    अगले ही पल आस्तिक ने उसकी कलाई इतनी जोर से पकड़ी और खींच लिया कि अरुणिमा इसके लिए तैयार नहीं थी। उसने खुद अपनी बेडशीट को इतना कसके पकड़ा हुआ था कि आस्तिक ने जब उसकी कलाई पकड़ी तो बेडशीट भी उसके हाथों से छूट गई।

    वह सीधे आस्तिक के ऊपर जा गिरी। आस्तिक ने उसे अपनी बाहों में जकड़ लिया और उसे बेड पर लेटा लिया। चादर हवा में लहराते हुए उनके ऊपर गिर गई।

    अरुणिमा को आस्तिक ने अपनी बाहों में मज़बूती से पकड़ा हुआ था। उसकी आँखें बंद थीं। वह महसूस कर सकती थी कि इस वक़्त उसकी मर्ज़ी, उसके इमोशन्स, सब कुछ बेकार है। यहाँ सिर्फ़ आस्तिक की मनमानी चलने वाली थी।

    पहली बार आस्तिक अरुणिमा को अपने इतने करीब देख रहा था। उसकी डरती हुई पलकें, जो आँसुओं से भीगी हुई थीं, उसके काँपते हुए होंठ और उसकी लाल पड़ी हुई नाक। आस्तिक एक पल के लिए अरुणिमा के चेहरे को निहारने लगा। उसने कभी भी अरुणिमा को इस तरह गौर से नहीं देखा था।

    बिना मेकअप के भी अरुणिमा का चेहरा किसी चाँदी के बर्तन की तरह चमक रहा था। उसका फ़ेस स्ट्रक्चर एकदम परफ़ेक्ट था। उसे काजल की ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि उसकी पलकें ही इतनी घनी थीं। उसके होंठ इतने लाल थे कि उनके सामने चेरी भी फ़ेल हो जाए। उसकी नाक में सोने की नथ और उसके होठों के ऊपर, ठीक नथ के नीचे, एक काला तिल।

    आस्तिक ने शायद पहली बार अरुणिमा को इस नज़र से देखा था। आज तक उसने अरुणिमा के दिल को महसूस करना तो दूर, उसे ठीक से देखा भी नहीं था।

    वह एक पल के लिए उसके चेहरे को निहारने लगा। उसे खुद ही समझ नहीं आ रहा था कि अरुणिमा को इतने करीब देखकर वह क्यों उसे इस तरह देख रहा है। आस्तिक के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आ गई। उसने अरुणिमा को अपनी तीखी नज़रों से देखते हुए कहा,
    "आँखें खोलो, जान।"

    अरुणिमा डरते हुए अपनी आँखें खोलती है और आस्तिक को देखती है। उनकी नज़रें एक-दूसरे से टकरा जाती हैं। आस्तिक की आँखों में इस वक़्त जुनून और पागलपन था, जबकि अरुणिमा की आँखों में डर और दहशत।

    "किस करो मुझे," आस्तिक ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा।

    अरुणिमा की आँखें एकदम बड़ी हो गईं। वह हैरानी और डर से आस्तिक को देखने लगी। आस्तिक उसे घूरते हुए बोला,
    "मैं अपनी बात दोहराऊँगा नहीं। मैंने कहा ना, मुझे फ़र्क नहीं पड़ता कि यह सब तुम्हारी मर्ज़ी से हो रहा है या नहीं। अगर मैं करने पर आ गया, तो तुम्हें मौका नहीं मिलेगा। इसलिए चुपचाप वह करो जो मैं कह रहा हूँ।"

    अरुणिमा घबरा गई। उसने काँपते हुए आस्तिक के होंठों की तरफ़ देखा। आस्तिक के होंठों पर हल्की मुस्कान खेल रही थी। वह अरुणिमा के अपने होठों से मिलने का इंतज़ार कर रहा था।

    अरुणिमा डरते हुए आस्तिक के करीब आई और काँपते हुए अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए। उसने ऐसा पहले कभी नहीं किया था। यह पहली बार था जब वह किसी के इतने करीब आकर उसे किस कर रही थी।

    क्योंकि यह उसका पहला अनुभव था, उसे बिल्कुल नहीं पता था कि किस कैसे किया जाता है। कभी वह आस्तिक के निचले होंठ को काट रही थी, तो कभी ऊपर वाले को।

    अरुणिमा के इस अजीब व्यवहार से आस्तिक को तुरंत समझ आ गया कि उसे किस करना नहीं आता। लेकिन अरुणिमा का ऐसे उसके होंठों को काटना भी आस्तिक के अरमानों को भड़काने के लिए काफी था।

    जब अरुणिमा ने एक बार फिर से आस्तिक के होंठ को काटा, तो आस्तिक के रोंगटे खड़े हो गए। उसने गहरी साँस लेते हुए अरुणिमा के होंठों को अपने दाँतों से हल्का सा काटा।

    अरुणिमा अचानक दर्द से सिहर गई और डरते हुए आस्तिक को देखने लगी। आस्तिक मुस्कुराते हुए बोला,
    "तुम्हें किस करना नहीं आता, है ना?"

    अरुणिमा की पलकें शर्म से झुक गईं। उसने हल्का सा सिर 'हाँ' में हिलाया। आस्तिक के चेहरे पर एक जंग जीतने वाली मुस्कान थी।

    उसने अपने एक हाथ से अरुणिमा को थाम रखा था, क्योंकि उसकी बाज़ू में चोट लगी थी। दूसरे हाथ से उसने अरुणिमा के गालों को अपनी उंगलियों से दबा दिया, जिससे अरुणिमा के होंठ मछली की तरह खुल गए।

    आस्तिक ने धीरे से उसका चेहरा अपने करीब लाया और उसके होंठों को अपने होठों में समा लिया। वह धीरे-धीरे उसे किस करने लगा। आस्तिक के इस अंदाज़ से अरुणिमा एकदम से शॉक हो गई।

    कुछ पल बाद, आस्तिक ने अचानक उसके होंठों को छोड़ दिया और उसकी आँखों में देखते हुए मुस्कुराया। साँस लेते हुए उसने कहा,
    "ऐसे किस करते हैं। अब सिखा दिया है, तो इस बार ढंग से किस करना।"


    अरुणिमा की साँसें तेज़ हो गई थीं। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि आस्तिक उसे इतनी गहराई से किस कर रहा था। वह खुद उलझन में थी कि उसे यह दोबारा करना होगा।

    आस्तिक ने जब अरुणिमा को फिर से किस करने के लिए कहा, तो अरुणिमा डरते हुए धीरे-धीरे अपने होठों को फिर से आगे बढ़ाती है और आस्तिक के होठों पर रख देती है। लेकिन जब आस्तिक ने उसे कैसे किया था, तो अरुणिमा इतनी घबरा गई कि उसे समझ ही नहीं आया कि वह कैसे प्रतिक्रिया दे।

    घबराहट के कारण, अरुणिमा ने आस्तिक के होठों को काटना शुरू कर दिया और साथ ही उन्हें हल्के से चाट भी ली। आस्तिक उसके इस अनजाने रिएक्शन से एक पल के लिए सॉफ्ट हो गया। वह अरुणिमा के होठों से खुद को अलग करना चाहता था, लेकिन चाहकर भी खुद को रोक नहीं पा रहा था।

    अरुणिमा के होठों से अलग होने की कोशिश के बावजूद, आस्तिक खुद रेस्टलेस फ़ील करने लगा। वह अरुणिमा को और ज़्यादा कसकर पकड़ते हुए उसे एक गहरी और इंटेंस किस देने लगा।

    अरुणिमा ने यह किस शुरू की थी, लेकिन अब आस्तिक उस पर पूरी तरह हावी हो चुका था। उसकी सॉफ्ट हरकतों ने आस्तिक को पागल कर दिया था। वह बेकाबू होकर अरुणिमा के होठों को चूमने लगा।

    उसके दोनों हाथ अरुणिमा की कमर पर कसकर लिपट गए, और वह उसे गहराई और जुनून से किस करने लगा। इस पल में, आस्तिक ने खुद को पूरी तरह से खो दिया था।