मुंबई के एक प्रसिद्ध मेडिकल रिसर्च सेंटर में डॉ. कृतिका वर्मा तीन साल से k-12 वायरस के कारण जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही है। उसकी सौतेली बहन, डॉ. कियारा वर्मा, उसकी इस हालत की असली जिम्मेदार है। लेकिन अब कियारा एक नई योजना के साथ लौट आई है। उसने कृत... मुंबई के एक प्रसिद्ध मेडिकल रिसर्च सेंटर में डॉ. कृतिका वर्मा तीन साल से k-12 वायरस के कारण जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही है। उसकी सौतेली बहन, डॉ. कियारा वर्मा, उसकी इस हालत की असली जिम्मेदार है। लेकिन अब कियारा एक नई योजना के साथ लौट आई है। उसने कृतिका को खत्म करने का फैसला कर लिया है। जब कियारा एंटीसेरम लेकर कृतिका के पास पहुंचती है, तो वह एक आखिरी चाल चलती है। लेकिन कृतिका ने जो किया, वह कियारा को भी उम्मीद नहीं थी। सिरिंज छीनकर उसे कियारा में इंजेक्ट करना... क्या यह कृतिका की जीत थी, या उसके बदले की शुरुआत? जाने के लिए पढ़िये "Reborn: Heaet of stone"
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मुंबई के प्रसिद्ध मेडिकल रिसर्च सेंटर के गहन चिकित्सा वार्ड में अंधेरा छाया हुआ था। हल्की-हल्की बीप की आवाज़ें मशीनों से आ रही थीं। बेड पर लेटी 28 वर्षीय डॉ. कृतिका वर्मा के शरीर में तमाम नलियाँ लगी हुई थीं। उसका चेहरा सूजा हुआ था, आँखों के नीचे काले घेरे थे। ऐसा लग रहा था, जैसे उसने मौत से लंबी लड़ाई लड़ी हो। वह बाहर से मजबूत दिखने वाली लड़की थी, लेकिन आज उसकी हालत इतनी कमजोर थी कि बोलने तक की ताकत नहीं बची थी। उसकी उंगलियाँ सफेद चादर को कसकर पकड़े हुए थीं, जैसे वह अपनी आखिरी ताकत जुटा रही हो। उसकी उंगलियाँ सूजी हुई, थी ऐसा लग रहा था, उसे सालो से बुरी तरह टोचर किया गया है, वह ठीक से साँस लेने मै भी असमर्थ थी, तभी बाहर कमरे में अचानक कदमों की आहट गूँजी। दरवाज़ा खुला, और अंदर एक सजी-धजी महिला ने प्रवेश किया। उसकी साड़ी चमचमाती हुई थी, उसके चेहरे पर निर्दोष मुस्कान थी, लेकिन उसकी आँखों में क्रूरता साफ झलक रही थी। वह और कोई नहीं, बल्कि कृतिका की सौतेली बहन डॉ. कियारा वर्मा थी। या यह कहे उसकी इस हालत की हसली वजह वही थी, वह कृतिका की और देखते हुए "वाह दीदी! तीन साल हो गए। फिर भी ज़िंदा हो?" कियारा ने उपहास भरे लहजे में कहा। उसकी आवाज़ में छलकता हुआ ज़हर महसूस किया जा सकता था। "वैज्ञानिकों ने तुम्हारे लिए एंटीसेरम बना लिया है। सोचो, बस एक इंजेक्शन और तुम ठीक हो जाओगी। लेकिन अफसोस! यह तुम्हारे नसीब में नहीं है।" कियारा ने अपनी जेब से एक सिरिंज निकाली। उसमें हल्के पीले रंग का तरल भरा हुआ था। उसने सिरिंज को हवा में घुमाते हुए कहा, "देखो! तुम्हारी ज़िंदगी इस छोटी-सी सिरिंज में कैद है। क्या तुम चाहती हो कि मैं इसे तुम्हें दे दूँ?" फिर अचानक कियारा शैतानी हंसी हँसते हुए, कहती है माना पड़ेगा इस K-12 से संक्रमित करने के बाद भी तुम तीन साल तक जिन्दा रही बरना इस वायरस से संक्रमित लोग तो एक महीने मै मर जाते है, लेकिन अच्छा हुआ तुम जिन्दा रही इसी की वजह से मुझे तुम्हे सताने का मौका मिला, कृतिका की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसने जल्दी से अपने गुस्से को दबा लिया। उसे अच्छी तरह पता था कि कियारा उसे बचाने नहीं, बल्कि उसकी मौत सुनिश्चित करने आई है। तीन साल पहले कृतिका एक होनहार डॉक्टर थी। उसने K-12 वायरस की वैक्सीन तैयार करने के लिए दिन-रात मेहनत की थी। वह रिसर्च सेंटर की सबसे काबिल वैज्ञानिकों में से एक मानी जाती थी। लेकिन उसकी सफलता ने कियारा को अंदर से जलाकर रख दिया था। कियारा ने चालाकी से कृतिका की मेहनत को अपना बना लिया। उसने जानबूझकर उसे K-12 वायरस से संक्रमित कर दिया। धीरे-धीरे वायरस ने कृतिका के शरीर को जकड़ लिया। वह बीमार पड़ने लगी और रिसर्च सेंटर से उसे निकाल दिया गया। कियारा ने न सिर्फ उसकी रिसर्च चुराई, बल्कि उसे दुनिया के सामने बदनाम भी कर दिया। वर्तमान में लौटते हैं कृतिका ने उन दिनों को याद किया जब वह कियारा को अपनी बहन मानती थी। उसे लगा था कि कियारा हमेशा उसका साथ देगी। लेकिन अब वह जान चुकी थी कि कियारा उसकी सबसे बड़ी दुश्मन थी। "मुझे एंटीसेरम चाहिए," कृतिका ने कांपती आवाज़ में कहा। लेकिन तभी उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आई। "मुझे मरने का शौक नहीं है। मैं जीना चाहती हूँ। लेकिन सिर्फ़ इसलिए ताकि मैं तुमसे अपना हर एक हिसाब चुका सकूँ।" कियारा ने ठंडी हँसी के साथ कहा, "क्या तुम मुझे चुनौती दे रही हो? देखती हूँ, तुम कैसे बचती हो।" कियारा ने सिरिंज लेकर कृतिका की ओर कदम बढ़ाए। लेकिन जैसे ही उसने सिरिंज को कृतिका के करीब लाना चाहा, अचानक कृतिका ने अपनी बची हुई ताकत से सिरिंज उसके हाथ से छीन ली और पूरी ताकत से उसे कियारा की बाँह में घुसा दिया। "नहीं!" कियारा चीखी। उसका चेहरा डर से सफेद पड़ गया। उसने मदद के लिए पुकारना चाहा, लेकिन जहर तेजी से उसके शरीर में फैलने लगा। "तुम्हें क्या लगा? मैं कमजोर हूँ?" कृतिका ने धीमे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा। कियारा की आँखें चौड़ी हो गईं। उसने कृतिका की ओर देखा, लेकिन अब उसके पास बचने का कोई रास्ता नहीं था। वह धीरे-धीरे फर्श पर गिर गई, उसकी साँसें उखड़ने लगीं। कमरे में अलार्म बजने लगा। डॉक्टर्स दौड़ते हुए कमरे में आए। उन्होंने कियारा को जमीन पर पड़ा देखा और तुरंत उसकी हालत संभालने की कोशिश की। कृतिका ने एक लंबी साँस ली। उसके चेहरे पर बदले की संतुष्टि थी। वह बिस्तर पर गिर गई, लेकिन उसके होठों पर हल्की मुस्कान थी। "अब से मेरी जिंदगी सिर्फ़ मेरी होगी," उसने खुद से कहा। "अब मैं उस परिवार का हिस्सा नहीं हूँ जिसने मुझे धोखा दिया। मैं सिर्फ़ खुद से प्यार करूँगी और अपना जीवन नए सिरे से शुरू करूँगी।" कमरे की रोशनी धीरे-धीरे धुंधली होने लगी। कृतिका बेहोश हो गई, लेकिन उसके भीतर एक नई ताकत जाग चुकी थी। अगर वह बच गई, तो यह उसका नया जन्म होगा—एक ऐसा जन्म, जहाँ कृतिका वर्मा अब कमजोर नहीं बल्कि अजेय बनेगी। "आखिर क्या कृतिका ले पाएगी अपने दुशमनो से बदला जाने के लिए पढ़िए अगला पार्ट...!
फूलवाड़ी हवेली के गेस्ट हाउस में हल्की-हल्की सी ठंड भरी हवा खिड़की की झिरी से अंदर आ रही थी। बाहर तेज़ बारिश हो रही थी, और बिजली की गड़गड़ाहट के साथ आसमान रोशनी से भर जा रहा था। कृतिका वर्मा अचानक आँखें खोलते ही उठ बैठी। उसका सिर भारी लग रहा था, जैसे किसी ने उसे बेहोशी की दवा दी हो। कमरे में अंधेरा था, बस कभी-कभी बिजली की चमक कमरे को रोशन कर देती। बिस्तर गंदा और पुराना था। उसके चारों तरफ धूल की परत जमी हुई थी। उसने चारों तरफ नज़र दौड़ाई। यह जगह उसे जानी-पहचानी लगी। उसके सिर में तेज़ दर्द हुआ और अचानक उसे तीन साल पुरानी वो रात याद आ गई। "रुको… मैं तो मर चुकी थी!" उसका दिल तेजी से धड़कने लगा। तीन साल पहले उसे अस्पताल में जीवन रक्षक मशीनों से हटाकर मृत घोषित कर दिया गया था। उसके दोनों पैर लकवाग्रस्त थे, और वो चलने-फिरने में बिल्कुल असमर्थ थी। लेकिन अब… उसके पैर हिल रहे थे। उसने धीरे-धीरे अपने पैरों को छूकर देखा। वे पूरी तरह सामान्य थे। एक पल के लिए उसे यकीन नहीं हुआ। उसके हाथ कांप रहे थे। उसने अपने बाएँ हाथ की तरफ देखा। वहाँ पन्ने की वही अंगूठी थी जो उसे अपनी सगाई के समय दी गई थी। "ये अंगूठी तो मुझसे छीन ली गई थी!" कृतिका की साँसें तेज़ हो गईं। उसके दिमाग में कई सवाल दौड़ने लगे। उसने खुद को स्थिर करने की कोशिश की। "क्या मैं वाकई अपने पुराने जीवन में लौट आई हूँ?" कमरे में खामोशी थी, सिर्फ बारिश की आवाज़ सुनाई दे रही थी। बाहर खिड़की के पास दो लोगों की धीमी बातचीत उसकी सोच में खलल डालने लगी। उसने ध्यान से सुना। "क्या वो अभी भी बेहोश है?" "हाँ, लेकिन जल्दी करो। ज़्यादा देर हुई तो दिक्कत हो जाएगी।" कृतिका को वो आवाज़ जानी-पहचानी लगी। उसका दिल तेजी से धड़कने लगा। "वही आवाज़ें… वही लोग… वही घटना!" यही वो लोग थे जिन्होंने तीन साल पहले उसकी जिंदगी तबाह कर दी थी। यही वो रात थी जब उसे नशे में धुत्त करके बेहोश किया गया था और बाद में उसकी इज्जत पर हमला हुआ था। --- यादों की बाढ़ उसकी आँखों में आंसू आ गए। वो उसी रात में वापस थी, लेकिन इस बार कुछ अलग था। इस बार वो पहले ही जाग चुकी थी। उसका दिल कह रहा था कि ये मौका उसे किसी बड़ी वजह से मिला है। "इस बार मैं हार नहीं मानूँगी!" उसने खुद से वादा किया। उसने अपने पैर ज़मीन पर रखे और उठने की कोशिश की। लेकिन तीन साल तक लकवाग्रस्त रहने के कारण चलना उसे लगभग भूल गया था। उसका संतुलन बिगड़ गया, और वह फिर से नीचे गिर गई। बाहर की आवाज़ें अचानक और तेज़ हो गईं। "अंदर से कुछ आवाज़ आई है। क्या वो जाग गई है?" उसके शरीर में हलचल होते ही वे चौकन्ने हो गए थे। वह बिस्तर से उठी और तुरंत गिर पड़ी। पिछले तीन सालों से चलने में असमर्थ होने के कारण उसके पैरों ने जवाब दे दिया। बाहर की आवाज़ें अचानक रुक गईं। "कमरे से आवाज़ आई है! क्या वह जाग गई?" कृतिका के चेहरे पर घबराहट छा गई। उसने उन आवाज़ों को पहचान लिया था। ये वही लोग थे जो उसकी ज़िंदगी को बर्बाद करने आए थे। उसने जल्दी से कपड़े उठाए और फर्श से उठने की कोशिश की। ठंडी बर्फीली बारिश की बूँदें खुली खिड़की से सीधे उसके चेहरे पर गिरीं। तभी उसे एहसास हुआ कि वह दूसरी मंज़िल पर है। गेस्ट हाउस फुलवाड़ी हवेली से काफी दूर था। हवेली में उसी रात एक बड़ी पार्टी चल रही थी, जिसमें परिवार के सभी सदस्य और मेहमान मौजूद थे। सारे नौकर-चाकर भी व्यस्त थे। बाहर खड़े गुंडों ने दरवाज़ा तोड़ने की कोशिश शुरू कर दी। "दरवाज़ा खोलो! जल्दी करो!" कृतिका को समझ में आ गया कि उसके पास भागने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। दर्द के बावजूद उसने खिड़की पर चढ़कर झाड़ियों में छलांग लगा दी। वह ज़मीन पर गिरी, तो उसका सिर हल्के से पत्थर पर लगा और हाथ छिल गया। "वो भाग गई! जल्दी ढूंढो!" कृतिका ने अपने दर्द को सहते हुए खुद को झाड़ियों के पीछे छिपा लिया। गुंडे उसकी तलाश में पत्तियों को डंडों से पीटने लगे। वह धीरे-धीरे फुलवाड़ी हवेली की तरफ बढ़ी। ठंड और कीचड़ से उसका शरीर अकड़ गया था, लेकिन उसने हार नहीं मानी। झाड़ियों के बीच से रेंगते हुए उसने फुलवाड़ी हवेली का दरवाज़ा देखा। --- हवेली के अंदर... शानदार ढंग से सजाए गए बैंक्वेट हॉल में पार्टी अपने अंतिम दौर में थी। मेहमान कम हो गए थे, लेकिन हर कोई किसी न किसी रसूखदार परिवार से था। आदित्य मलिक, जो कृतिका के बचपन का दोस्त था, अपनी बहन कियारा वर्मा की सगाई की पार्टी में मेहमानों का स्वागत कर रहा था। आदित्य की पहली पत्नी, जिसका जिक्र अक्सर गलत कारणों से होता था, पार्टी में मौजूद नहीं थी, लेकिन लोग उसके बारे में कानाफूसी कर रहे थे। "आदित्य को देखो... उसने अपनी पहली शादी के बाद कितनी मुसीबतें झेली हैं," एक महिला बगल में खड़ी होकर फुसफुसाई। "हां, लेकिन कियारा की सगाई आज फाइनल हो गई है। शायद अब सब कुछ ठीक हो जाएगा," दूसरी महिला ने कहा। --- तभी दरवाज़े ज़ोर से खुले। हर किसी की नज़र दरवाज़े की तरफ़ गई। कृतिका दरवाज़े पर खड़ी थी। उसकी आँखों में अनकही तकलीफ थी। उसका पूरा शरीर कीचड़ और बारिश से भीगा हुआ था। आदित्य ने चौंककर कहा, "कृतिका!" कृतिका के ठीक पीछे बिजली चमकी और तेज़ गड़गड़ाहट हुई। कृतिका कीचड़ और चोटों से लथपथ थी। उसके बाल गीले थे, कपड़े मिट्टी से भरे हुए, और चेहरा थकान के साथ-साथ दर्द की लकीरों से भरा हुआ था। वह बगैर जूतों के फुलवाड़ी हवेली के मुख्य हॉल तक किसी तरह पहुंची। हर कदम उसके लिए भारी था, लेकिन उसकी आँखों में एक अलग ही जिद थी। कमरे में कदम रखते ही मेहमानों की नजरें उस पर ठहर गईं। हलचल थम गई। चारों तरफ फुसफुसाहट होने लगी। किसी ने पहचान लिया— "अरे! यह तो कृतिका वर्मा है!" कृतिका ने कमरे में तेज नजर दौड़ाई और उसकी निगाहें कियारा पर जाकर टिक गईं। कियारा अपनी जगह से हिली नहीं, बल्कि उसकी ओर बढ़ते हुए धीरे-धीरे मुस्कुराई। "ओह, बहन!" कियारा ने हैरानी और चिंता का दिखावा करते हुए कहा, "तुम यहाँ कैसे? मुझे लगा तुम गेस्ट हाउस में आराम कर रही हो। तुम इतनी अस्त-व्यस्त क्यों दिख रही हो?" उसके शब्दों ने कमरे में खड़े मेहमानों के मन में कई सवाल खड़े कर दिए। कुछ ने सहानुभूति जताई, जबकि बाकी लोग कानाफूसी करने लगे। कियारा ने माहौल का फायदा उठाते हुए चालाकी से अगला सवाल दागा— "क्या... किसी ने तुम्हारे साथ बुरा बर्ताव किया?" सभी की आँखें अब कृतिका पर टिकी थीं। माहौल में एक असहज खामोशी छा गई। कृतिका ने गहरी सांस ली और कियारा की आँखों में सीधे देखा। उसकी निगाहें इस बार कमजोर नहीं थीं। "क्या तुम चाहती हो कि मैं सच बोलूं?" कृतिका ने शांत लेकिन गंभीर स्वर में कहा। कियारा का चेहरा पलभर को सख्त हो गया। उसने जल्दी से संभलते हुए भीड़ की ओर देखा, "अरे नहीं, मेरी बहन मजाक कर रही है। आप लोग परेशान मत होइए।" कृतिका उसके पास गई और फुसफुसाते हुए बोली, "तुम जो खेल खेल रही हो, उसमें माहिर हो, लेकिन तुम्हारे नकाब को सबके सामने उतारने का वक्त आ गया है।" कियारा के चेहरे की मुस्कान अचानक गायब हो गई। उसकी आँखों में झलकता डर किसी भी ध्यान देने वाले के लिए साफ था। उसने हंसने की कोशिश की, लेकिन उसकी आवाज कांप गई। "इतने लोग तुम्हें इस हालत में देख रहे हैं, बहन। अगर आदित्य तुम्हें इस तरह देखेंगे, तो कितने चिंतित हो जाएंगे!" कमरे में अचानक बिजली कड़की, और तेज गड़गड़ाहट हुई। माहौल की गंभीरता और बढ़ गई। "क्या कियारा हो जाएगी फिर से अपनी चाल मै कामयाब, AUR क्या सब समझेंगे की कृतिका की इज्जत लूट ली गई है,।