अवनी मुश्किल और दुखों से घिरी एक ऐसी लड़की जिसकी जिंदगी में चारों तरफ से दर्द तकलीफ और बेज्जती के अलावा कुछ भी नहीं था जिसने अपने प्रॉब्लम से तंग आकर अपनी जान देने की कोशिश की, लेकिन जिस दिन वह जान देने वाली थी उस के साथ हुआ एक चमत्कार उस दिन उसके हा... अवनी मुश्किल और दुखों से घिरी एक ऐसी लड़की जिसकी जिंदगी में चारों तरफ से दर्द तकलीफ और बेज्जती के अलावा कुछ भी नहीं था जिसने अपने प्रॉब्लम से तंग आकर अपनी जान देने की कोशिश की, लेकिन जिस दिन वह जान देने वाली थी उस के साथ हुआ एक चमत्कार उस दिन उसके हाथ लगी एक ऐसी मैजिकल वॉच । कैसे उस मैजिकल वॉच ने अवनी की जिंदगी को पूरी तरह से बदल दिया लेकिन क्या होगा जब अवनी के सामने आएगी उस मैजिकल वॉच की सच्चाई क्योंकि असल में वह मैजिकल वॉच नहीं ,बल्कि उसके अंदर है एक बहुत ही बड़े बिज़नेसमैन की आत्मा और वो बिजनेस मेन पता लगाना चाहता है अपनी मां के कातिलों के बारे मे। तो कौन है वह बिजनेसमैन और कैसे उसकी आत्मा पहुंची एक बेजान घड़ी के अंदर ?और कौन थी यह मिडिल क्लास लड़की अवनी जिसकी जिंदगी में इतनी ज्यादा बेज्जती दुख दर्द था कि उसने अपनी जान देने की कोशिश की ?जानने के लिए पढ़िए, "Magical Girl "
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मुंबई के एक मशहूर नाइट क्लब के बाहर, रात के ठीक 11:30 बजे, एक लड़की को तीन-चार गार्डों ने बुरी तरह नाइट क्लब से बाहर निकालकर सड़क पर फेंक दिया था। उस वक्त तेज बारिश हो रही थी। गिरने से लड़की के शरीर पर कीचड़ लग गया था। उसके आँसू बारिश में छिप गए थे। उसे अपनी किस्मत पर बहुत रोना आ रहा था। उसे पहले भी कई जगह बेइज़्ज़ती सहनी पड़ी थी, लेकिन आज की बेइज़्ज़ती ने उसे पूरी तरह तोड़ दिया था। उसने जीने की इच्छा भी छोड़ दी थी।
वह रात के अंधेरे में, दौड़ती-भागती गाड़ियों के बीच, सड़कों पर आगे बढ़ने लगी। उसने सोचा था कि वह अपनी ज़िंदगी खत्म कर देगी, क्योंकि उसकी ज़िंदगी में सिर्फ़ दुख, दर्द और बेइज़्ज़ती ही थी।
अवनी ने सोच लिया था कि वह अपनी बेमतलब ज़िंदगी खत्म कर देगी। इसलिए वह तेज़ी से, गाड़ियों की परवाह किए बिना, सड़कों पर दौड़ने लगी। उसे नहीं पता था कि वह कहाँ जा रही है। दौड़ते-दौड़ते उसे एहसास हुआ कि उसके पीछे गली के कुछ कुत्ते पड़ गए हैं।
अवनी को कुत्तों से बहुत डर लगता था। वह अपनी जान देना चाहती थी, लेकिन कुत्ते के काटे जाने से नहीं। उसने अपनी तेज़ी बढ़ा दी और उल्टा-सीधा दौड़ने लगी। कुत्तों से डर के मारे छुपते-छुपाते, वह जो भी दिखाई दिया, उसी में छुप गई।
अवनी ने देखा कि वह शहर के कूड़ेघर में छुपी है, जहाँ सारा कूड़ा जमा होता था। वहाँ भयानक बदबू आ रही थी, लेकिन अवनी के पास कोई और रास्ता नहीं था। उसे कुत्तों से बचना था। अवनी ने अपना नाक-मुँह बंद करके, कुत्तों के जाने का इंतज़ार करने लगी।
वह सोच रही थी कि जैसे ही कुत्ते जाएँगे, वह किसी गाड़ी के आगे या किसी ऊँचाई से कूदकर अपनी जान दे देगी। उसने यह फैसला कर लिया था; इतनी बेइज़्ज़ती और दर्द उसका जिस्म झेल नहीं पा रहा था।
कुछ देर और कुत्तों से छिपी रही। फिर, जब अवनी को कुत्तों के भौंकने की आवाज़ बंद हुई, उसने हल्का सा सिर बाहर निकालकर देखा। चारों तरफ कुछ नहीं दिखा, तो उसने आगे बढ़ने का फैसला किया।
लेकिन तभी अवनी को एहसास हुआ कि उसकी पीठ में कुछ चुभ रहा है। वह एक कूड़े के पास छुपी थी, इसलिए सोचा कि कोई कूड़ा चुभ रहा होगा। वहाँ की भयानक बदबू उसे ज़्यादा देर वहाँ नहीं रहने दे रही थी।
तब अवनी ने सोचा कि वह कहीं से कूदकर या किसी बड़ी गाड़ी के आगे कूदकर अपनी जान दे देगी, लेकिन इस कूड़े की बदबू में नहीं।
जैसे ही अवनी वहाँ से जाने लगी, उसका ध्यान एक जगह अटक गया। ध्यान से देखने पर वह हैरान रह गई।
उस अंधेरे में, कूड़े के ढेर में कुछ जगमगा रहा था। अवनी हैरान हो गई कि इतनी रात को यह क्या जगमगा रहा था। पहले उसने सोचा कि शायद किसी की बैटरी या इमरजेंसी लाइट गिर गई होगी, लेकिन जब उसमें से अजीब सी आवाज़ आने लगी, तो उसने देरी किए बिना कूड़े के ढेर में हाथ दे दिया।
कुछ खास दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन हल्की जगमगाहट के साथ एक घड़ी उसके हाथों में आ गई। अवनी हैरान थी कि यह घड़ी किसकी थी। जैसे किसी छोटे बच्चे के पास लाइट और बोलने वाली घड़ी होती है, उस घड़ी को देखकर अवनी को ऐसी ही घड़ी की याद आई। वह सोचने लगी कि किसी बच्चे की यह घड़ी गलती से कूड़े में आ गई होगी।
अवनी ने सोचा, वह इस बच्चे की घड़ी का क्या करेगी? वह तो मरने वाली थी। जैसे ही अवनी घड़ी फेंकने लगी, उसमें से आवाज़ आई, "मुझे मत फेंको!"
"क्या? या... या... या..." अवनी की हैरानी का कोई ठिकाना नहीं था। वह सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि कोई घड़ी बोल सकती थी।
अवनी को लगा कि क्लब में पिलाई गई ड्रिंक के नशे से उसे यह घड़ी बोलती हुई सुनाई दे रही है।
फिर अवनी ने घड़ी फेंकने की कोशिश की, लेकिन फिर से आवाज़ आई, "मुझे मत फेंको!" अब अवनी को काफी अजीब लगा। उसने सोचा कि उसे सुबह देखना चाहिए कि यह क्या है। बिना सोचे-समझे उसने घड़ी अपने बाएँ हाथ पर बाँध ली और आँखें बंद करके सोचने लगी, "या तो कहीं जाकर मर जाए या सीधा उठकर अपने घर पहुँच जाए।"
जैसे ही अवनी ने मन ही मन में यह सोचा और आँखें खोली, तो उसकी हैरत का कोई ठिकाना नहीं था। वह अपने घर के कमरे में थी। अवनी को यकीन नहीं हो रहा था कि वह वाकई अपने कमरे में है, क्योंकि अभी थोड़ी देर पहले वह कूड़े के ढेर के पास थी। लेकिन अवनी का दिल इस बात को मानने को तैयार नहीं था। दिमाग सोच रहा था कि ड्रिंक के साइड इफेक्ट हो रहे हैं, क्योंकि पहली बार उसने ड्रिंक की थी, तो शायद इसी वजह से उसे उल्टी-सीधी चीज़ दिखाई और सुनाई दे रही है।
जब अवनी को एहसास हुआ कि वह अपने कमरे में है, तो उसने अपने कपड़े बदल लिए और सीधा बिस्तर में लेट गई। वह जल्द से जल्द हैंगओवर से छुटकारा पाना चाहती थी। वह नहीं चाहती थी कि हैंगओवर उसे उल्टी-सीधी चीज़ दिखाए। उसे किसी तरह का कुछ होश नहीं था और वह गहरी नींद में सो गई।
उन्नीस साल की अवनी मेहता एक मिडिल-क्लास लड़की थी, जो अपनी ज़िंदगी को सामान्य तरीके से जीने की कोशिश कर रही थी। उसके घर में सिर्फ़ उसकी माँ और एक छोटा भाई था। उसके पापा का बहुत समय पहले देहांत हो गया था, लेकिन अवनी की माँ ने उसके पिता के एक दोस्त से दूसरी शादी कर ली थी।
लेकिन अवनी इस शादी के ख़िलाफ़ थी। उसने अपने पिता के दोस्त, यानी अपने अंकल को, कभी अपना पिता नहीं माना। उसके सौतेले पिता की अवनी पर बुरी नज़र थी और वह ज़्यादा शराब पीते थे। इसीलिए अवनी अपने सौतेले पिता और अपनी माँ से कटी-कटी सी रहती थी।
जब भी अवनी अपनी माँ को अपने सौतेले पिता की बुरी नियत के बारे में बताती, उसकी माँ उसे टोंकती रहती थी और कहती थी कि इस घर को चलाने के लिए किसी मर्द की ज़रूरत है। "अगर मैं यह शादी नहीं करती, तो या तो मुझे अपना जिस्म बेचना पड़ता या तुम्हें बेचकर इस घर का ख़र्चा चलाती। हम लोग कोई अमीर या टाटा-बिड़ला नहीं हैं। हम लोग मिडिल-क्लास लोग हैं, और हमें हम लोगों की कुछ ज़रूरत है, जिसे एक आदमी ही पूरा कर सकता है। एक औरत कभी भी मर्दों की भीड़ में बाहर अकेले नहीं कमा सकती।"
अवनी की माँ रो-धोकर अवनी को इसी तरह की बातें सुनाकर उसे अपने सौतेले पिता को अपनाने के लिए मजबूर करती थी।
उन्नीस साल की अवनी मेहता एक मध्यमवर्गीय लड़की थी जो अपनी ज़िन्दगी को सामान्य रूप से जीने का प्रयास कर रही थी। उसके घर में परिवार के नाम पर सिर्फ़ उसकी माँ और एक छोटा भाई था। उसके पिता का बहुत समय पहले देहांत हो गया था।
लेकिन अवनी की माँ ने उसके पिता के एक दोस्त से दूसरी शादी कर ली थी।
लेकिन अवनी इस शादी के ख़िलाफ़ थी। अवनी ने कभी अपने पिता के दोस्त, यानी अपने अंकल को अपना पिता नहीं माना था।
एक तो उसके सौतेले पिता की अवनी पर बुरी नज़र थी, दूसरा वह ज़्यादा शराब पीते थे।
इसलिए अवनी हमेशा अपने सौतेले पिता के साथ-साथ अपनी माँ से भी तनावपूर्ण व्यवहार रखती थी।
जब भी अवनी अपनी माँ को अपने सौतेले पिता की बुरी नियत के बारे में बताती, तब उसकी माँ दिन भर अवनी को डाँटती रहती थी।
"इस घर को चलाने के लिए किसी मर्द की ज़रूरत है। अगर मैं ये शादी नहीं करती, तो या तो मुझे अपना शरीर बेचना पड़ता, या तुम्हें बेचकर इस घर का खर्चा चलाना पड़ता। हम लोग कोई अमीर या टाटा-बिड़ला नहीं हैं, हम लोग मध्यमवर्गीय लोग हैं और हमें अपनी कुछ ज़रूरतें हैं जिन्हें एक आदमी ही पूरा कर सकता है। एक औरत कभी भी मर्दों की भीड़ में अकेले बाहर नहीं कमा सकती।"
अवनी की माँ रो-धोकर अवनी को इसी तरह की बातें सुनाकर उसे सौतेले पिता को अपनाने के लिए मजबूर करने का प्रयास करती थी।
लेकिन अवनी ने कभी भी अपने अंकल को अपना पिता नहीं माना था। क्योंकि वह अपने पिता से बहुत प्यार करती थी। अपने पिता के जाने के बाद अवनी बहुत अकेली हो गई थी। वह रोज़ रात को रोया करती थी और सोचा करती थी कि एक दिन वह इतने पैसे कमा लेगी कि अपनी माँ की इस गलतफहमी को दूर कर देगी कि एक घर को चलाने के लिए किसी मर्द की ज़रूरत होती है।
अवनी एक किराए के घर में रहती थी। उसका सौतेला पिता जैसे-तैसे कुछ रुपये कमाकर उसकी माँ को दे दिया करता था, और कुछ रुपये शराब पी जाता था।
इतना ही नहीं, अवनी की माँ भी बड़े घरों में झाड़ू-पोछा और बर्तन का काम किया करती थी।
इस बीच, अवनी जैसे-तैसे कुछ बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपने कॉलेज की फीस भर रही थी और अपने छोटे भाई की पढ़ाई का भी ख़र्चा उठा रही थी। जैसे-तैसे उन लोगों की ज़िन्दगी चल रही थी।
फिर एक दिन कॉलेज में कुछ अमीर लड़कियों ने अवनी का खूब मज़ाक उड़ाया था, क्योंकि अवनी के पास पहनने के लिए सिर्फ़ कुछ ही जोड़ी कपड़े थे, जिन्हें वह बारी-बारी से पहन लिया करती थी। लेकिन आज जब अवनी कॉलेज गई थी, तो अचानक उसका दुपट्टा एक दरवाज़े में लगी कील पर अटक गया था।
जिससे उसका पूरा दुपट्टा फट गया था। अवनी को बहुत रोना आ रहा था, क्योंकि उसके पास इतने पैसे नहीं थे कि वह अपने लिए नया दुपट्टा खरीद लेती। जैसे ही अवनी का दुपट्टा फटा, वहाँ मौजूद लड़के-लड़कियाँ जोर-जोर से हँसने लगे।
एक मनचला लड़का अवनी के पास आकर खड़ा हो गया और कहने लगा, "क्या हुआ है? अगर तुम मुझे अपनी ओर आकर्षित करना चाहती हो, तो मैं तो ऐसे ही तुम पर मरता हूँ। तुम्हें इस तरह से अपना दुपट्टा फाड़कर मुझे अपनी ओर आकर्षित करने की कोई ज़रूरत नहीं थी।"
जैसे ही उस मनचले लड़के ने यह कहा, क्लास के सभी लड़के-लड़कियाँ जोरों से हँसने लगे। अवनी का दिल किया कि धरती फट जाए और वह उसमें समा जाए।
तभी अचानक एक लड़की वहाँ आई और अवनी का मज़ाक उड़ाते हुए कहने लगी, "अरे अवनी, तुम्हारे पास तो एक ही दुपट्टा था, और वह भी फट गया, तो अब क्या करोगी तुम?"
अवनी ने उसकी किसी बात का जवाब नहीं दिया।
तभी उस भीड़ में से एक लड़की, दिव्या, आगे आई। उसने वहाँ आकर अवनी का हाथ पकड़ लिया और कहने लगी, "तुम लोगों को शर्म आनी चाहिए! एक तो उस बेचारी का दुपट्टा फट गया है, ऊपर से तुम लोग उसका इस तरह से मज़ाक उड़ा रहे हो।"
दिव्या शुरू से ही अवनी का थोड़ा बहुत साथ देती थी। लेकिन अवनी के कुछ ख़ास दोस्त नहीं थे। अवनी किसी से ज़्यादा बात नहीं करती थी। वह ज़्यादा समय अपनी पढ़ाई में बिताती थी।
क्योंकि उसका मानना था कि जितना ज़्यादा वह पढ़ेगी, उतना वह आगे बढ़ेगी और सफल होगी। उसे पूरी उम्मीद थी कि एक न एक दिन उसे एक अच्छी नौकरी ज़रूर मिलेगी।
क्योंकि अवनी ने पहले भी कई जगह नौकरी के लिए कोशिश की थी, लेकिन उसके पिछले अनुभव और गरीबी को देखकर कोई भी उसे काम देने को तैयार नहीं हुआ करता था।
क्योंकि सभी लोगों की यही मान्यता थी कि अगर ये गरीब घर की लड़कियाँ हमारे बड़े-बड़े ऑफिस में काम करेंगी, तो हमारे घरों का काम कौन करेगा?
क्योंकि सभी लोगों का मानना था कि अवनी जैसी लड़कियाँ सिर्फ़ घरों में काम करने, झाड़ू-पोछा और बर्तन करने के लिए ही बनी हैं। जो काम उनकी माँ करती है, उन्हें भी वही काम करना चाहिए। कई जगह अवनी को तरह-तरह की बातें सुनने को मिलती थीं।
इसलिए अवनी ने थक-हारकर इंटरव्यू देना छोड़ दिया था और उसने सोच लिया था कि वह पढ़ाई के बल पर अपने आप को मज़बूत करेगी और कामयाबी हासिल करेगी।
यह सोचते हुए अवनी हर रोज़ सुबह सुबह की शिफ़्ट में बच्चों को ट्यूशन देकर कॉलेज जाती थी, फिर कॉलेज से आने के बाद शाम की शिफ़्ट में कुछ और बच्चों को ट्यूशन देती थी।
लेकिन उसके ट्यूशन के बच्चे भी ज़्यादातर गरीब घरों से ही आते थे। कुछ लोग तो उसे फीस दे दिया करते थे, और कुछ लोग उसकी फीस को हर बार टालते रहते थे। इसलिए अवनी का गुज़ारा बड़ी मुश्किल से हो पाता था। इसलिए वह कॉलेज के खाली समय में कैंटीन में काम किया करती थी, जिससे वह किसी न किसी तरह से अपनी और अपने भाई की कॉलेज की फीस मैनेज किया करती थी।
आज जैसे ही अवनी का दुपट्टा फटा, उसे बार-बार रोना आ रहा था। वह सोच रही थी कि किसी की किस्मत इतनी भी क्या बुरी हो सकती है! एक तो पहनने के नाम पर उसके पास कुछ ही कपड़े थे, और आज उसके इस दुपट्टे ने भी उसका साथ छोड़ दिया था।
तभी दिव्या अवनी का हाथ पकड़कर उसे डेस्क पर ले गई। अवनी की आँखों से आँसू निकलने लगे। तभी दिव्या ने स्टेपलर से अवनी के दुपट्टे को सिल दिया। लेकिन दुपट्टा काफी फट चुका था, इस छोटे से सिलाई से उसका कुछ नहीं होने वाला था।
लेकिन तब तक के लिए काम चल गया था। तभी क्लास में थोड़ी सी हलचल मच गई, क्योंकि क्लास का सबसे हैंडसम लड़का, वीर ओब्रॉय, क्लास में आया था।
पिछले तीन साल से वीर अवनी को इम्प्रेस करने की कोशिश कर रहा था, क्योंकि अवनी सबसे अलग और खूबसूरत लड़की थी। लेकिन कभी भी अवनी वीर के झांसे में नहीं आई थी।
क्योंकि अवनी वीर को अच्छी तरह जानती थी। वीर हर तीसरे दिन किसी न किसी नई लड़की के साथ घूमता रहता था। लेकिन आज तक अवनी ने उसे कोई मौका नहीं दिया था। कहीं न कहीं इस बात से वीर के मन में अवनी के प्रति कुछ अलग ही तरह की इच्छा जाग चुकी थी।
और आज अवनी के दुपट्टे के फटने की खबर वीर को मिल चुकी थी। कहीं न कहीं वह भी अवनी को अपनी आँखों से देखने के लिए आ गया था।
क्लास में आते ही उसने अवनी को ग़ौर से देखना शुरू कर दिया था। हालाँकि अवनी का दुपट्टा नीचे से फटा था, और दिव्या ने उसे स्टेपलर से सिल दिया था, लेकिन फटा हुआ दुपट्टा हर किसी की नज़रों में इस तरह आ रहा था मानो अवनी के शरीर का एक हिस्सा सबके सामने नज़र आ रहा हो।
जैसे ही अवनी ने देखा कि वीर की नज़रें उसके उभरे हुए अंगों पर टिकी हुई हैं, उसने जल्दी से खुद को ढँकने की कोशिश की।
और दिव्या से कहा, "मुझे लगता है मुझे आज बाकी की क्लासेस अटेंड नहीं करनी चाहिए, मैं घर चलती हूँ।"
जैसे ही अवनी ने यह कहा, दिव्या ने कहा, "अरे छोड़ो, तुम इतनी छोटी सी बात को लेकर इतना बड़ा मुद्दा क्यों बना रही हो? क्या तुमने नहीं देखा पूरी क्लास में अकेली तुम ही हो जो दुपट्टा पहनकर कॉलेज आती हो। बाकी सारी लड़कियाँ या तो शॉर्ट्स पहनती हैं, या हाफ निक्कर, या जीन्स। और तुम हो कि एक दुपट्टा न होने पर भी इतना परेशान हो रही हो। और फिर इससे फ़र्क क्या पड़ेगा? बस रिलैक्स रहो।"
जैसे ही दिव्या ने यह बातें कही, अवनी उसे देखने लगी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह उस वक्त दिव्या को क्या जवाब दे।
क्योंकि अवनी को हर किसी की नज़रें अपने ऊपर असहज लग रही थीं। उसे ऐसा लग रहा था कि हर कोई उसे अपनी गंदी नज़रों से घूर रहा हो।
जैसे-तैसे उस दिन का कॉलेज ख़त्म हुआ। जैसे ही सभी लोग अपने-अपने घर जाने लगे, अचानक वीर ने अवनी का रास्ता रोक लिया।
अवनी अचानक वीर को देखकर थोड़ी घबरा गई और धीमी आवाज़ में बोली, "वीर, तुम क्या कर रहे हो? तुम इस तरह से मेरा रास्ता क्यों रोक रहे हो?"
तभी वीर ने अवनी पर गौर से देखते हुए कहा, "अवनी डार्लिंग, मैं तुम्हारे लिए एक बेहतरीन ऑफर लेकर आया हूँ। मैंने सुना है कि तुम्हारा इकलौता दुपट्टा फट गया है। तो मैं चाहता हूँ कि क्यों ना तुम आज मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें मॉल ले जाता हूँ और तुम्हें बढ़िया-बढ़िया ब्रांडेड कपड़े दिलाता हूँ।"
तब अवनी ने वीर की ओर देखते हुए कहा, "वीर, मुझे किसी तरह के कपड़ों की ज़रूरत नहीं है। और मैंने कब कहा कि मुझे कपड़े चाहिए? मुझे लगता है तुम्हें अपने काम से काम रखना चाहिए।"
यह कहकर अवनी वहाँ से जाने लगी। लेकिन वीर को उसका यह जवाब सुनकर गुस्सा आ गया और उसने उसका हाथ पकड़कर अपनी ओर खींच लिया और कहने लगा, "आखिरकार किस बात का घमंड है तुम्हें? तुम्हारी दो पैसे की औकात नहीं है मेरे सामने। तुम दो कोड़ी की लड़की होकर इस तरह से मेरे सामने शेर बनती फिरती हो। तुम जानती हो, तुम्हारे जैसी कितनी ही लड़कियों को मैं अपने बिस्तर पर सुला चुका हूँ। लेकिन तुम ही हो जो आज तक नखरे कर रही हो।"
यह कहते हुए वीर ने अपने होंठों पर हाथ फेरा।
वीर की बातें और उसका व्यवहार सुनकर अवनी को बहुत गुस्सा आया और उसने वीर के मुँह पर जोरदार तमाचा मार दिया।
जैसे ही अवनी ने वीर को तमाचा मारा, वीर का चेहरा गुस्से से लाल हो गया, क्योंकि उसकी नज़रें वहाँ खड़े लड़के-लड़कियों पर पड़ी थीं।
जैसे ही अवनी ने सबके सामने वीर को तमाचा मारा, उसे अपनी बहुत बेइज़्ज़ती महसूस हुई और वह गुस्से से भर गया। लेकिन अवनी पहले ही वहाँ से जा चुकी थी।
तभी वीर गुस्से से बोला, "बहुत जल्द..."
आखिर अपनी को नीचा दिखाने के लिए वीर किस हद तक जाएगा? और क्या अवनी वीर की साज़िशों से बच पाएगी? जानने के लिए बने रहिए। कृपया अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रियाएँ कमेंट में दें।
जैसे ही अवनी ने सबके सामने वीर को चांटा मारा, उसे अपनी बेइज्जती का एहसास हुआ और वह गुस्से से भर गया।
लेकिन सारा पहले ही उसे चांटा मारकर जा चुकी थी। तब वीर गुस्से से बोला, "तुम्हें इसकी कीमत चुकानी होगी। देखना, बहुत जल्द तुम्हारा ऐसा हाल करूँगा कि तुम सोच भी नहीं सकती।"
ऐसा कहकर वीर चला गया। अवनी अपने घर भागना चाहती थी क्योंकि सबकी चुभती नज़रें उसे महसूस हो रही थीं। वह उनसे बचने के लिए जल्दी से घर पहुँचना चाहती थी।
और जल्दी ही वह घर पहुँच गई। जैसे ही अवनी घर गई, उसने देखा कि उसका सौतेला बाप लगातार ड्रिंक कर रहा था और उसकी माँ उसे चकना परोस रही थी। अवनी पहले से ही गुस्से में थी और अब उसका गुस्सा और बढ़ गया।
बिना सोचे-समझे उसने आगे बढ़कर अपनी माँ के हाथ से चकना छीनकर जमीन पर फेंक दिया।
और अपनी माँ की ओर गुस्से से देखते हुए बोली, "आखिर आप यह सब क्या कर रही हैं? इस आदमी को घर में, अपने जवान बच्चों के रहते हुए, दिन-दहाड़े शराब पिला रही हैं? क्या यह आपको शोभा देता है? क्या इस घर को चलाने के लिए किसी मर्द की ज़रूरत है? क्या औरतें घर में काफी नहीं हैं?"
अवनी के कहने और करने पर उसकी माँ को गुस्सा आ गया। उसने खींचकर अवनी के मुँह पर एक चांटा मारा और कहने लगी, "तू जानती भी है हम किस हालात में गुज़र रहे हैं और तुझे अभी भी इस शराब की पड़ी है? शायद तू भूल रही है, यह तुम्हारा बाप है, सौतेला ही सही, लेकिन यह तुम्हारा बाप है। और हाँ, अब तू इन्हें 'पिताजी' कहने की आदत डाल लो। और अगर तुझे ज़्यादा ही खुद्दारी सूझ रही है, तो क्यों नहीं कोई नौकरी ढूँढ लेती हो और उससे घर का खर्चा चलाने लग जाती हो? घर का खर्चा, तुम्हारे भाई की पढ़ाई, इस घर की सब्ज़ी, और घर का किराया भी देना होता है। और यह अगर अपने कमाए हुए पैसों से दारू पीता है, तो कुछ हिस्सा मुझे भी देता है जिससे मैं इस घर का किराया देती हूँ। समझी तू?"
अवनी ने अपनी माँ की बातें सुनीं। वह गुस्से से रोते हुए अपने कमरे में चली गई। उसे अपनी किस्मत पर रोना आ रहा था। पहले उसके पिता, जो हमेशा उसे प्यार करते थे और आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करते थे, ने उसे पढ़ाने के लिए क्या कुछ नहीं किया था!
उन्होंने उसे कभी यह एहसास नहीं होने दिया था कि घर में सब्ज़ी, रोटी, राशन, या स्कूल की फीस देनी है। सारे काम उसके पिता वक़्त से पहले ही पूरे कर दिया करते थे। अवनी को बहुत बाद में पता चला था कि उसके पिता तीन-तीन जगह काम किया करते थे।
दिन-रात वह काम किया करते थे, जिसकी वजह से उन्होंने अपनी सेहत का कभी ख्याल नहीं रखा और वही उनकी मौत का कारण बन गया।
अवनी कितनी देर तक अपने पिता के बारे में सोचती रही, पता नहीं, लेकिन गहरी नींद में सो गई। अगली सुबह जैसे ही अवनी उठी, वह परेशान हो गई क्योंकि उसे याद आया कि उसका एक दुपट्टा कॉलेज में फट गया था और अब उसके पास पहनने लायक कपड़े नहीं थे।
उसके पास सिर्फ़ एक जोड़ी अच्छा सा दुपट्टा था। उसे किसी तरह से एक दुपट्टा खरीदना होगा ताकि वह सूट पर पहन सके, और हो सके तो एक जोड़ी कपड़े ज़्यादा खरीद लेगी। काफी महीने से उसने अपने लिए कोई नया कपड़ा नहीं खरीदा था।
और कल गुस्से की वजह से उसने किसी बच्चे को ट्यूशन भी नहीं दिया था, जिसकी वजह से कुछ बच्चों के माँ-बाप ने उसे पैसे नहीं दिए थे।
अवनी आज ज़्यादा उदास थी। ऊपर से उसकी माँ ने उसे घर का किराया भरने को कहा था। अवनी ने सोचा कि वह ज़्यादा मेहनत करेगी और घर का किराया खुद देगी। अगले दिन सुबह उठकर, बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर, नहा-धोकर तैयार होकर कॉलेज गई तो उसके चेहरे पर उदासी साफ़ दिखाई दे रही थी।
तभी दिव्या ने अवनी को देखा और पूछा, "क्या बात है अवनी? तुम इतनी उदास क्यों हो?" तब अवनी ने अपनी परेशानी दिव्या को बताई, "क्या बताऊँ यार, घर में बहुत टेंशन है। मुझे घर का किराया देना है, लेकिन कोई ढंग की नौकरी नहीं मिल रही है। मैंने सोचा था कि पढ़ाई के साथ-साथ घर का भी कुछ खर्चा कम कर लूँगी, लेकिन कुछ नहीं हो पा रहा है।"
अवनी की बात सुनकर दिव्या कुछ सोचने लगी और बोली, "अगर तू बुरा ना माने, तो मेरे पास एक काम है। अगर तू चाहे, तो रात में एक घंटा काम कर सकती है, और एक घंटे के तुझे पूरे ₹2500 मिलेंगे।"
"क्या?! क्या कह रही हो तुम? ऐसा कौन सा काम है जिसके लिए एक घंटे में ₹2500 मिलेंगे? मैं बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर मुश्किल से ₹2000 कमा पाती हूँ, और उससे अपना और अपने भाई का खर्चा निकाल रही हूँ।"
दिव्या ने कहा, "देखो, मैं तुझे बताती हूँ। कॉलेज से फ्री होकर कुछ लोग स्ट्रेस दूर करने के लिए एक जगह जाते हैं। बस उस जगह पर तुझे लोगों को जूस, पानी, या ड्रिंक सर्व करनी होगी। और सिर्फ़ एक घंटे के लिए ₹2500 मिलेंगे।"
अवनी कुछ सोचने लगी और बोली, "नहीं-नहीं, मैं इस तरह की जगह नहीं जा सकती। तुम नहीं जानती वहाँ कितने घटिया लोग होते हैं। मैंने टीवी में देखा है, वहाँ लड़कियों का जाना ठीक नहीं है।"
दिव्या ने अवनी को समझाया, "देख, मैंने तुझे काम बताया, और मैं तेरी मदद कर सकती हूँ। ऐसा नहीं है कि वहाँ सब बिगड़े हुए लोग ही आते हैं। सब कुछ तुम्हारे ऊपर डिपेंड है। अगर तुम अपना काम ठीक करोगी, तो कोई तुम्हें कुछ नहीं कहेगा। तुम्हें सिर्फ़ एक घंटा काम करना है और ₹2500 लेने हैं।"
दिव्या के प्यार से समझाने पर अवनी मान गई। "इस वक़्त मेरी मजबूरी बहुत बड़ी है। और मैं अपनी माँ को दिखाना चाहती हूँ कि मैं भी कमा सकती हूँ और इस घर का किराया भी भर सकती हूँ। कमाने के लिए मुझे उस सौतेले बाप को घर में शराब पिलाने की ज़रूरत नहीं है, और इस घर में किसी मर्द की कोई ज़रूरत नहीं है।"
अवनी मन ही मन में ये बातें सोचने लगी और दिव्या से बोली, "ठीक है यार, अगर ऐसी बात है, तो मैं आज शाम को तुम्हारे साथ चलूँगी।"
दिव्या मुस्कुराई, आगे बढ़कर अवनी को गले लगा लिया और बोली, "मुझे पूरी उम्मीद थी कि तू मानेगी। मैं आज ही तेरी बात अपने अंकल से कर लेती हूँ।"
अवनी ने हल्का सा हाँ में अपनी गर्दन हिलाई और क्लास में चली गई। दिव्या छुपते-छुपाते कॉलेज के पार्क में चली गई। वहाँ उसकी नज़र वीर ओबेराय पर पड़ी। वीर भी दिव्या को देख रहा था। वह दिव्या के पास आया और बोला, "आओ आओ मिस दिव्या आहूजा, कैसे आना हुआ?"
दिव्या ने आगे बढ़कर वीर को गले लगा लिया, उसके होंठों को चूमा और बोली, "तुम्हारा काम हो गया है।"
वीर ने खुशी से दिव्या के होंठों को चूमा, उसे टाइट हग किया और बोला, "वाह मेरी जान! मुझे पूरी उम्मीद थी तुम मेरा काम जरूर करोगी। अब तुम देखना, उस लड़की का घमंड कैसे तोड़ता हूँ। बस तुम उसे आज रात बार में ले आओ।"
दिव्या मुस्कुराई और बोली, "देखो, उसके साथ तुम एक रात गुज़ार सकते हो, लेकिन उसके बाद तुम हमारी कमिटमेंट मत भूलना। तुम सिर्फ़ मेरे ही बनकर रहना और हमेशा मुझे खुश रखना है।"
वीर ने मुस्कुराते हुए फिर उसके होंठों को चूमा और बोला, "मेरी जान, तुम्हें परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है। तुम जैसा कहोगी, मैं वैसा ही करूँगा।"
अवनी आज ख़ुश थी क्योंकि दिव्या ने उसे पैसे कमाने का रास्ता बताया था। उसे पैसों की ज़रूरत थी क्योंकि घर के हालात बुरे थे। उसने फैसला कर लिया था कि वह एक घंटे का काम ज़रूर करेगी। सिर्फ़ एक घंटे की बात थी, जितना वह बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती है।
अवनी अपने घर तैयार होने लगी। जैसे ही वह बाहर जाने लगी, उसकी माँ आ गई और बोली, "यह लड़की इतना सज-धज के कहाँ जा रही है? तेरे पिता घर आने वाले हैं, और तू इस वक़्त घर से बाहर जा रही है। अगर तुझे घर पर नहीं पाएँगे, तो परेशान हो जाएँगे। इस वक़्त तू कहीं मत जा।"
अवनी को बहुत गुस्सा आया। "मैंने आपसे कितनी बार कहा है, वह सिर्फ़ आपके पति हैं, मेरे पिता नहीं। और मैं एक ज़रूरी काम से बाहर जा रही हूँ। मैं जल्दी आ जाऊँगी, और मैं कहाँ जा रही हूँ, यह बात मैं उन्हें बताना ज़रूरी नहीं समझती हूँ।"
उसकी माँ को गुस्सा आया। उन्होंने उसके बाजू को पकड़कर मरोड़ दिया और बोली, "तू पागल हो गई है! कितनी बार तुझे समझा चुकी हूँ? आखिर किस बात का घमंड है तुझे? तेरा बाप मुझे विधवा करके तुम दोनों को अनाथ करके जा चुका है। जिसे मैंने तेरा बाप बनाया है, उसे चुपचाप कबूल कर ले। समझी तू? वह घर का आधा किराया देता है। तुझे यह बात समझ में क्यों नहीं आती? और मैं तुमसे कितनी बार कह चुकी हूँ, पैसे किसी भी इंसान के लिए ज़रूरी होते हैं, और उससे ज़्यादा ज़रूरी किसी मर्द का घर में साया होता है। समझी तू?"
अवनी को अपनी बाजू में दर्द हो रहा था। "माँ, मेरा हाथ छोड़िए, मुझे तेज दर्द हो रहा है। और रही बात पैसों की, मेरी एक नौकरी लगी है। मैं इस सिलसिले में बात करने जा रही हूँ। और अगर सब कुछ ठीक रहा, तो बहुत जल्दी इस घर का किराया मैं ही भर दूँगी। उसके बाद आप वादा कीजिए, आप उस इंसान के साथ किसी तरह का कोई रिश्ता नहीं रखेगी।"
उसकी माँ को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने खींचकर एक चांटा उसके मुँह पर मारा और बोली, "यह क्या बकवास कर रही है तू? काम करने जाएगी? हां, क्यों जाएगी तू काम करने के लिए? और यह रात के टाइम कौन सा काम है जो करने जा रही है? कहीं तू खुद को बेचने तो नहीं जा रही है? किसी का बिस्तर गर्म करने तो नहीं जा रही है तू?"
अवनी को उन पर बहुत गुस्सा आया। "मैंने सपने में भी नहीं सोचा था आप अपनी बेटी के लिए ऐसी बातें करेंगी! अब मेरी बात ध्यान से सुनिए, आप अपनी ये फालतू की बकवास बंद कीजिए! मैंने आपसे कहा ना, मैं काम करने जा रही हूँ!"
अवनी के लिए वहाँ खड़े रहना मुश्किल हो गया था। अपनी माँ के मुँह से ऐसी बातें सुनकर उसका दिल दुखने लगा था। पहले उसका मन किया कि वह सब कुछ छोड़कर अपने कमरे में जाकर लेट जाए, लेकिन तभी दिव्या का फ़ोन आ गया। अवनी ने फ़ोन उठाया, और दिव्या ने कहा, "अवनी, आखिर तू कहाँ रह गई है?"
अवनी के लिए वहाँ खड़े रहना अत्यंत कठिन हो गया था। अपनी माँ के मुँह से अपने लिए ऐसी बातें सुनकर उसका दिल जोरों से दुखने लगा था।
पहले उसका मन किया कि वह सब कुछ छोड़कर अपने कमरे में जाकर लेट जाए।
किन्तु तभी दिव्या का फ़ोन आया। अवनी ने फ़ौरन फ़ोन उठा लिया। दिव्या ने कहा, "अवनी, आखिर तू कहाँ रह गई है? मैंने तुम्हारे अंकल से बात कर ली है और तुम अभी तक नहीं आई हो। याद रखना अवनी, अगर तुम आज नहीं आईं तो मैं अपने अंकल से फिर तुम्हारे लिए कभी बात नहीं कर पाऊँगी।"
"और मुझे अपने अंकल के सामने शर्मिंदा होना पड़ेगा, वह अलग।"
दिव्या की बात सुनकर अवनी को बुरा लगा। वह जाना नहीं चाहती थी, लेकिन अब दिव्या की बात का सवाल था। दिव्या ने ही तो उसके लिए बात की थी। यह सोचकर अवनी ने जाने का फ़ैसला लिया। तभी पीछे से उसकी माँ की आवाज आई, "जा तो रही है, लेकिन अगर तू बिना पैसों के घर लौटी तो देखना मैं तेरा क्या हाल करूँगी!"
"और हाँ, अगर आज तुझे नौकरी नहीं मिली तो तू अपने पिता को कबूल करेगी। मुझे यह वादा करना होगा।"
"और उन्हें पापा कहकर बुलाएगी, उनके साथ अच्छी तरह से बर्ताव करेगी।"
अवनी की माँ की बातें सुनकर वह केवल अपनी माँ को घूरने लगी। वह घर से बाहर भी नहीं निकली थी कि उसने देखा कि उसके सौतेले पिता नशे में धुत होकर घर आ रहे थे।
यह देखकर अवनी ने तुरंत अपना मुँह बना लिया और नाक-मुँह बंद करके घर से बाहर जाने लगी।
किन्तु तभी उसके पिता ने उसका हाथ पकड़ लिया और कहा, "तुम इतना सज-सँवरकर कहाँ जा रही हो?" तभी उसकी माँ आगे आई और बोली, "वह नाराज़ मत होइएगा। अवनी की एक दोस्त ने उसके लिए नौकरी की बात की है, तो वह बात करने जा रही है।"
अवनी के सौतेले पिता ने उसे ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा, "आखिर इतनी रात को कौन सी नौकरी की बात की है उसकी दोस्त ने? और कहाँ की है?" अवनी ने उनकी ओर देखते हुए कहा, "आपका इससे कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए। और वैसे भी रात नहीं हुई है, अभी सिर्फ़ शाम के छह बजे हैं, और मैं आठ बजे तक लौट आऊँगी।"
उसके पिता ने उसे घूरकर देखा और कहा, "अपनी फ़ालतू की बकवास बंद करो! आखिर इतनी रात को जाने की तुम्हें क्या ज़रूरत है? अरे मैं पूछता हूँ, मुझमें क्या कमी रह गई है? मैं तो काम ही कर रहा हूँ ना, तो तुम्हें बाहर जाकर कमाने की क्या ज़रूरत है?"
अवनी को अपने सौतेले बाप की बात सुनकर गुस्सा आया, और वह बोली, "अगर आप कमा रहे हैं तो आप अपनी बीवी के लिए कमा रहे हैं, मेरे लिए नहीं, समझे आप?"
अवनी की बात सुनकर उसके पिता ने उसका कंधा पकड़ लिया और कहने लगे, "कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम अपनी ज़िंदगी के कुछ कीमती पल किसी को लूटाने जा रही हो?"
अवनी उनका मतलब समझ गई और उसे उनकी सोच पर घिन आ रही थी। उसने अपनी माँ की ओर देखा। उसकी माँ ने भी उसके लिए ऐसे ही शब्दों का इस्तेमाल किया था। अवनी की नज़रों से अपनी माँ ने गर्दन झुका ली।
तभी उसके पिता ने कहा, "अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हें डबल पैसे दे सकता हूँ, लेकिन तुम्हें आज की रात मेरे साथ रहना होगा।"
उसके सौतेले पिता की गंदी बात सुनकर अवनी का गुस्सा और बढ़ गया। उसने एक तमाचा उसके मुँह पर मार दिया।
यह देखकर उसकी माँ बोली, "लड़की! तेरी हिम्मत कैसे हुई इस तरह से अपने पिता पर हाथ उठाने की?"
हालाँकि उसकी माँ को भी अपने पति की बात बुरी लगी थी, लेकिन उस वक़्त उनका यही मानना था कि इस घर को चलाने के लिए एक मर्द की ज़रूरत है।
उसकी माँ ने भी अवनी के मुँह पर एक तमाचा मार दिया और बोली, "ख़बरदार, जो तूने इस तरह से बदतमीज़ी अपने पिता के साथ की!" अवनी रोते हुए बोली, "आपको मेरी बदतमीज़ी दिखाई दे रही है? आपको क्या, आपके घटिया आदमी पति की हरकतें दिखाई नहीं दे रही हैं? वह किस भाषा में बात कर रहे हैं?" उसकी माँ कुछ सोचते हुए बोली,
"देखो, अगर तुम आज पैसे कमाकर नहीं लाईं तो याद रखना, मैंने तुमसे क्या कहा है, तुम्हें वह करना ही होगा। और इतना ही नहीं, जो कुछ तुम्हारे पिता कहेंगे, तुम्हें वह भी करना होगा।" कहीं ना कहीं उसकी माँ को भी यही लग रहा था कि अगर उसके पति ने कह दिया कि उसे अवनी चाहिए, तो वह इस बात को भी मानने के लिए तैयार थी।
क्योंकि उस आदमी ने उससे शादी सिर्फ़ उसके लिए नहीं, बल्कि उसकी बेटी के लिए भी की थी। अवनी के लिए वहाँ खड़े रहना बहुत मुश्किल हो गया था।
वह भागते हुए वहाँ से निकल गई और दिव्या के दिए हुए एड्रेस की ओर जाने लगी। उसे पूरी उम्मीद थी कि आज के बाद उसकी ज़िंदगी बदल जाएगी। अगर वह नौकरी करने लगेगी तो उसका सौतेला बाप उसे इस तरह से नहीं देखेगा, और साथ ही साथ उसकी माँ का मुँह भी हमेशा के लिए बंद हो जाएगा।
यह सोचते हुए अवनी दिव्या के दिए हुए एड्रेस पर जाने लगी और जल्दी ही वह शहर के मशहूर क्लब के बाहर खड़ी हो गई।
अवनी को अंदर जाने में हिचकिचाहट हो रही थी, क्योंकि आज से पहले वह ऐसी जगह पर नहीं आई थी। उसके पैर नहीं पड़ रहे थे कि वह अंदर जा सके। कई देर तक बाहर खड़े रहने के बाद उसने हारकर दिव्या को फ़ोन कर दिया। उसने देखा कि दिव्या तुरंत उसकी आँखों के सामने खड़ी हो गई थी।
दिव्या को इतनी जल्दी सामने देखकर अवनी हैरान हो गई और बोली, "तुम इतनी जल्दी कहाँ से आ गई हो?"
दिव्या ने कहा, "मैं तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी। अब चलो, तुम यहाँ खड़े-खड़े समय क्यों बर्बाद कर रही हो?"
अचानक दिव्या ने अवनी को रोक दिया और कहा, "तुम क्या ये कपड़े पहनकर आई हो? क्या तुम इस तरह के 'बहन जी टाइप' कपड़े पहनकर इतने बड़े स्टैंडर्ड लोगों के सामने जाओगी?"
अवनी हैरानी से दिव्या की ओर देखने लगी। "आप कहना क्या चाहती हैं? और मैं कौन से कपड़े पहनकर आऊँ? आप तो जानती हैं ना मेरे पास कुछ अच्छे कपड़े नहीं थे। यह सबसे अच्छा कपड़ा था, इसे मैंने ज़्यादा बार नहीं पहना है, इसलिए मैं यही पहनकर आ गई।" अवनी ने मासूमियत से जवाब दिया। दिव्या मन ही मन मुस्कुराई और बोली, "तुम एक काम करो, पहले मेरे साथ चलो।"
दिव्या अवनी को क्लब के बाहर बने कमरे में ले गई। वहाँ कई तरह के कपड़े रखे हुए थे। उसने उनमें से एक गाउन निकालकर अवनी को दिया। "तुम इसे पहनकर आओ।"
अवनी उस गाउन को लेकर हिचकिचाने लगी। भले ही गाउन पूरा लॉन्ग था, लेकिन अवनी ने इस तरह के कपड़े कभी नहीं पहने थे। अवनी ने कहा, "क्या इस तरह के कपड़े पहनना ज़रूरी है?"
दिव्या ने कहा, "देखो, तुम पहली बार मेरे अंकल से मिलने वाली हो, और तुम जानती हो मेरे अंकल यहाँ के पार्ट ओनर भी हैं। फ़र्स्ट इंप्रेशन इज़ द लास्ट इंप्रेशन। तुम ये कपड़े पहनकर चलो। उसके बाद तुम जैसे कपड़े चाहो वैसे पहन सकती हो। ओके?"
दिव्या ने जबरदस्ती अवनी को वह कपड़े पहना दिए। अब अवनी के पास कोई और रास्ता नहीं था। उसे भी लगा कि उसके कपड़े ज़्यादा 'बहन जी टाइप' हैं। यह सोचकर अवनी ने वह कपड़े पहन लिए और सोचा कि अंकल से मिलने के बाद वह कपड़े बदल लेगी। वह कपड़े पहनकर बाहर आ गई और दिव्या उसका हाथ पकड़कर अवनी को लगभग घसीटते हुए क्लब के अंदर ले गई।
क्लब में जाते ही अवनी हैरान रह गई। वहाँ कई लड़कियाँ थीं जिन्होंने नाममात्र के कपड़े पहन रखे थे। अवनी ही एक ऐसी लड़की थी जिसने साधारण सा गाउन पहन रखा था।
अपने आस-पास की लड़कियों को देखकर अवनी को अजीब और असहज लगने लगा। उसने दिव्या का हाथ पकड़कर कहा, "दिव्या, मुझे लगता है मैं यहाँ काम नहीं कर पाऊँगी। तुम प्लीज़ मेरे लिए कहीं और काम ढूँढ लेना।"
दिव्या को गुस्सा आ गया। वह बोली, "तुम मेरे अंकल से मिले बिना ही यहाँ से जाना चाहती हो? आखिरकार तुम समझती क्या हो अपने आपको? एक तो तुम जैसी दो-कोड़ी की लड़की से मैंने दोस्ती की, और ऊपर से तुम पर इतना बड़ा एहसान कर रही हूँ, लेकिन तुम पर कोई फ़र्क ही नहीं पड़ रहा है! तुम्हें यहाँ भी अपने रूल-रेगुलेशन मुझे बताने पड़ रहे हैं!"
दिव्या के बदतमीज़ शब्दों से अवनी हैरान रह गई। दिव्या हमेशा उसे प्यार से बात करती थी। अवनी ने कहा, "लेकिन यहाँ का माहौल मुझे ठीक नहीं लग रहा है। मैं यहाँ लोगों को चाय-पानी कैसे सर्व कर सकती हूँ? यहाँ चाय-पानी तो है ही नहीं, कोल्ड ड्रिंक तक नहीं है। यहाँ तो सीधा-सीधा शराब पी रहे हैं लोग, और मैं लोगों को शराब सर्व नहीं कर सकती।"
अवनी की बात सुनकर दिव्या गुस्से से घूरने लगी और बोली, "अपनी फ़ालतू की बकवास बंद कर! और अगर अब तू यहाँ आ ही गई है तो तुझे कोई हक़ नहीं है यहाँ से वापस जाने का। चल मेरे साथ!" उसने अवनी का हाथ कसकर पकड़ लिया और उसे क्लब के अंदर ले गई। वहाँ उसके ठीक सामने एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति बैठा था। दिव्या ने अपने अंकल की ओर इशारा करते हुए अवनी से कहा, "इनसे मिलो, ये मेरे अंकल हैं। तुम इनसे बैठकर बात करो। तब तक मैं तुम्हारे लिए कुछ खाने-पीने के लिए ले आती हूँ।"
दिव्या चली गई। अवनी उसे रोकना चाहती थी, क्योंकि उसके अंकल अजीब लग रहे थे। अंकल ने बड़े प्रोफेशनल तरीके से अवनी से बात करते हुए कहा, "अच्छा तो अवनी, बताइए आप एक घंटे में काम करने के कितने पैसे लेना चाहेंगी? जैसा कि आपको पता ही होगा, दिव्या ने आपको सारा काम बता दिया होगा। आपको सिर्फ़ लोगों को ड्रिंक सर्व करना है। और हाँ, मैं आपसे किसी तरह का कोई झूठ नहीं बोलूँगा, यहाँ पर कोल्ड ड्रिंक के साथ स्पेशल ड्रिंक वगैरह भी सर्व की जाती हैं। आप स्पेशल ड्रिंक का मतलब समझ रही हैं?"
अवनी को उनके बात करने का तरीका अच्छा लगा। उनकी बातों में बदतमीज़ी या नकारात्मकता नहीं थी। अवनी ने कहा, "जी सर, मैं आपका सारा काम समझ गई हूँ, लेकिन सर, एक्चुअली में यहाँ के माहौल में काम मुझे नहीं लगता मैं कर पाऊँगी। मैं कम्फ़र्टेबल नहीं हूँ।"
अंकल ने कहा, "ओह, इट्स ओके। तुम्हें परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है। कुछ लड़कियाँ एक्चुअली ऐसे ही करती हैं। यहाँ का माहौल उन्हें पसंद नहीं आता। तुम एक काम करो, मैं तुम्हारे लिए इतना कर सकता हूँ, दिन में जो लड़कियों की यहाँ पार्टी होती है, तो तुम उन्हें सर्व कर सकती हो ना?"
यह सुनकर अवनी हैरान हो गई। "आप क्या कह रहे हैं? क्या यहाँ लड़कियाँ भी पार्टी करती हैं?"
अंकल बोले, "हाँ, मैं बिलकुल ठीक कह रहा हूँ। मुझे लगता है तुम यहाँ इतने सारे लड़कों को देखकर अनकम्फ़र्टेबल फ़ील कर रही हो। तो मैं तुम्हारे लिए सिर्फ़ इतना ही कर सकता हूँ, क्योंकि तुम मेरी बेटी की दोस्त हो, तो मैं तुम्हें मायूस नहीं करूँगा। तुम दिन में दो घंटे यहाँ काम कर सकती हो। यहाँ बड़ी-बड़ी हाई प्रोफ़ाइल लेडीज़ अपनी बर्थडे पार्टी, एनिवर्सरी पार्टी वगैरह देती हैं। और उनमें शराब वगैरह भी कम यूज़ होती है, लेकिन होती तो है ज़रूर। तो मैं तुमसे किसी तरह की कोई बात नहीं छुपाऊँगा। तो क्या तुम दिन में यह काम कर लोगी? दिन में भी तुम्हें यही सब ड्रिंक सर्व करने का, या हो सकता है कुछ फ़ूड वगैरह करने का काम करना होगा।"
अवनी के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसने जल्दी से काम के लिए हाँ कह दिया। इससे पहले कि वह कुछ और कहती, दिव्या आ गई, उसके हाथ में एक ट्रे थी जिसमें दो ड्रिंक रखे हुए थे।
मैं तुमसे किसी तरह की कोई बात नहीं छुपाऊँगा, तो क्या तुम दिन में यह काम कर लोगी? दिन में भी तुम्हें यही सब ड्रिंक सर्व करने का, या हो सकता है कुछ फ़ूड, खाना वगैरह सब करने का काम करना होगा।"
जैसे ही अवनी ने यह कहा, उसके चेहरे पर एक मुस्कुराहट आ गई थी।
और उसने जल्दी से काम के लिए हाँ कह दिया था। और इससे पहले कि वह कुछ और कहती, तभी दिव्या वहाँ आ गई थी। उसके हाथ में एक ट्रे थी जिसमें दो ड्रिंक रखे हुए थे।
तब दिव्या ने अवनी की ओर एक पानी का गिलास बढ़ाते हुए कहा था, "अवनी, लो पानी पी लो। और क्या तुम्हारी बात हो गई अंकल से?"
तभी अवनी खड़ी होकर दिव्या का हाथ पकड़ लिया था और कहने लगी थी, "आई एम सो सॉरी दिव्या। मैं जब यहाँ आई थी, मैं थोड़ा सा परेशान हो गई थी।
इसलिए मैंने तुमसे वो सब कह दिया था। लेकिन अब तुम्हारे अंकल से बात करने के बाद मेरे सारे डाउट क्लियर हो गए हैं।
तुम जानती हो, तुम्हारे अंकल ने मुझे दिन का काम दिया है। दिन में जो लड़कियों की हाई प्रोफ़ाइल पार्टी होती हैं, सिर्फ़ उसमें सर्व करना होगा।
और वह भी सिर्फ़ २ घंटे के लिए। तुम तो जानती हो, कॉलेज की क्लासेस ठीक ३:०० बजे तक ख़त्म हो जाती हैं, तो ३:०० बजे के बाद मैं सीधा २ घंटे यहाँ काम कर लिया करूँगी।"
दिव्या अवनी की बात सुनकर मुस्कुराने लगी थी और कहने लगी थी, "चलो अच्छा है, तुम्हें काम पसंद आ गया। अब एक काम करो, तुम्हारी बात तो हो ही गई है।
तुम बस पानी पी लो और फिर मैं तुम्हें बाहर छोड़ देती हूँ।" ऐसा कहकर दिव्या ने पानी का गिलास जबरदस्ती अवनी के हाथ में थमा दिया था।
अवनी पानी पीना तो नहीं चाहती थी, लेकिन फिर उसने सोचा, "पानी तो है, पी लेती हूँ।" तो यह सोचते हुए अवनी ने दो-तीन घूँट जैसे ही पानी पिया, अचानक से उसका सर घूमने लगा था।
और अचानक से वह बेहोश की हालत में हो गई थी।
अवनी को बेहोश देखते ही दिव्या के चेहरे पर मुस्कुराहट तेज हो गई थी,
और उसने अपने उस अंकल की तरफ एक आँख मारते हुए कहा था, "कैसा लगा आपको मेरा तोहफ़ा? आई होप इसके पैसे आप मुझे मेरे अकाउंट में ट्रांसफ़र कर देंगे।"
ऐसा कहकर वह वहाँ से जाने लगी थी। तभी उसे दरवाजे पर वीर खड़ा हुआ दिखाई दे गया था। वीर भी अवनी और दिव्या की ओर देखकर मुस्कुराने लगा था और कहने लगा था, "इस दिन का मुझे बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार था।"
और तब उस बूढ़े अंकल की ओर देखकर कहने लगा था, "पहले मैं इसके साथ थोड़े से मज़े लेना चाहता हूँ, उसके बाद यह आपकी हुई।" ऐसा कहकर दिव्या और वीर अवनी को कंधे से पकड़कर एक कमरे में ले जाने लगे थे।
और जल्दी ही उसे कमरे में ले गए थे। यह सारा का सारा प्लान वीर ने ही बनाया था।
अवनी के थप्पड़ का बदला लेने के लिए उसने आज अवनी को बेइज़्ज़त करने का प्लान बनाया था।
तो इसीलिए वह उसे उस क्लब के कमरे में ले गया था और साथ ही साथ दिव्या ने इस बात का फ़ायदा उठाते हुए अवनी को कुछ पैसों के लिए अपने एक जानने वाले को बेच दिया था।
वीर के बाद वही उसके साथ रिश्ता बनाने वाला था। तो सारी बातें उन लोगों में तय हो चुकी थीं और अवनी को ब्लैकमेल करने के लिए उन्होंने फ़ोटोज़ वगैरह भी क्लिक कर ली थीं ताकि जब उनका मन हो, वह अवनी को अपने लिए इस्तेमाल कर सकें।
तो इसीलिए जैसे ही वीर अवनी को कमरे में ले गया, और अवनी ने क्योंकि ज़्यादा पानी नहीं पिया था,
तो हल्की-हल्की वह होश में थी।
और वीर को अपने पास देखकर वह काफ़ी ज़्यादा चौंक रही थी, लेकिन वह कुछ समझ नहीं पा रही थी। तब फिर जल्दी से वीर उसके आगे बढ़ा था, उसके कंधे पर हाथ रखकर और उसकी गर्दन पर हाथ चलाते हुए उसके गाल को उसने छू लिया था।
और अवनी नशे में उसका हाथ अपने आप से दूर कर रही थी, लेकिन वह सही से स्ट्रगल नहीं कर पा रही थी। तभी वीर ने थोड़ा सा आगे बढ़ते हुए उसके होंठों को छू लिया था।
लेकिन अवनी अपने आप को बचाने के लिए स्ट्रगल करने लगी थी, लेकिन उस वक़्त दिव्या ने उसे ड्रग के नशे की कुछ ऐसी गोलियाँ दी थीं जिसकी वजह से वह ज़्यादा स्ट्रगल नहीं कर पा रही थी।
और तभी अचानक वीर ने उसके होंठों को चूमने के बाद उसे बेड पर सीधा धक्का दे दिया था और उसने बेड पर लिटाकर और खुद उसके पास लेटकर पहले तो काफ़ी सारी फ़ोटोज़ खींची थीं।
और उसके बाद उसने धीरे-धीरे कपड़ों के ऊपर से ही उसके जिस्म पर हाथ फेरना शुरू कर दिया था।
अवनी का दिमाग बिल्कुल अच्छी तरह से काम नहीं कर रहा था, लेकिन उसका जिस्म बेजान सा हो गया था, तो वह स्ट्रगल भी नहीं कर पा रही थी। तभी अचानक अवनी की धीरे-धीरे से आँखें खुलीं तो उसने देखा कि उसकी साइड में एक पानी का भरा हुआ जग रखा हुआ था।
तो जैसे-तैसे अवनी उस जग तक जाना चाहती थी। वीर तो चूँकि उस वक़्त उसके जिस्म को पूरी तरह से घूरने और देखने में बिज़ी था,
तो वीर का ध्यान नहीं गया था कि अवनी ने कब वह भरा हुआ पानी का जग उठा लिया था।
और उसने वह जग उठाकर उसका पानी सीधा अपने मुँह पर डाल लिया था। तब तक वीर कुछ समझ पाता, अवनी तुरंत उसके सामने आ खड़ी हुई थी और उसने वह जग सीधा वीर के सर पर दे मारा था।
और जल्दी से उस कमरे से बाहर निकल गई थी। जैसे ही वह उस कमरे से बाहर निकली, दिव्या ने उसे पकड़ लिया था और कहने लगी थी, "तुम इतनी आसानी से यहाँ से बचकर नहीं जा सकती हो।
मैं अपना इतना बड़ा नुकसान नहीं होने दे सकती हूँ।" तभी दिव्या ने अवनी को अपने उस अंकल पर धकेलते हुए कहा था, "लगता है वीर तो सही से इसका इस्तेमाल नहीं कर पाया।
आप ही इसे ले जाइए अंकल, अब आप ही इसे लेकर जाइए। लेकिन एक बात याद रखिएगा, मैं अपना नुकसान किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकती हूँ।
मुझे इस लड़की की पूरी कीमत चाहिए। वैसे भी वीर की वजह से मैंने काफ़ी सारा नुकसान बर्दाश्त किया है। इसने मेरे वीर का सर फोड़ दिया है। मैं अब तो इसे किसी भी कीमत पर आज बचकर नहीं जाने दे सकती हूँ।
क्योंकि अगर ये आज बचकर चली गई, तो यह सबको मेरे बारे में बता देगी और यह मेरे लिए बिल्कुल भी अच्छा नहीं होगा।"
दिव्या का इतना घिनौना चेहरा अपनी आँखों के सामने देखकर अवनी का दिल कटकर रह गया था। वह सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि जिससे वह अपना एकलौता दोस्त मानती थी, वह उसे इतना बड़ा धोखा देगी। और उस अंकल ने, यानी कि उस आदमी ने, अवनी के बालों को कसकर पकड़ लिया था,
और उसके चेहरे पर वह बड़े ही बुरी तरह से अपना हाथ फेरने लगा था। अवनी को उससे बहुत ही ज़्यादा बुरी बदबू आ रही थी।
क्योंकि उस आदमी ने काफ़ी ज़्यादा ड्रिंक कर रखी थी। ऊपर से अवनी को भी एक ऐसा ड्रग दिया गया था जिसकी वजह से उसे उस अंकल में एक की जगह दो दिखाई दे रहे थे।
और ज़्यादा उसे कुछ खास होश नहीं था। तभी अवनी ने एक बार फिर हिम्मत करते हुए उसके अंकल के हाथ पर काट लिया था।
और जल्दी से दौड़कर वह सभी लोगों के बीच में आ गई थी जो लोग उस वक़्त वहाँ पर डांस कर रहे थे और हल्ला-गुल्ला काट रहे थे।
अवनी उल्टे-सीधे चाल चलती हुई जा रही थी। हालाँकि पानी गिरने की वजह से उसका नशा काफ़ी हद तक कम हो गया था, लेकिन पहली बार उससे इस तरह का नशा दिया गया था जिसकी वजह से उसकी हालत काफ़ी ज़्यादा बेकार सी हो गई थी।
उसे अपने जिस्म में बहुत ही ज़्यादा कमज़ोर सा महसूस हो रहा था। अवनी जैसे ही थोड़ा सा आगे गई, तभी उसने हल्का सा होश में एक स्टेप लिया था, वह सीधा जिस जगह गाने बज रहे थे, उस जगह जाकर उसने उस गाने को बंद करते हुए जोरों से चीखना-चिल्लाना शुरू कर दिया था।
जैसे ही गाना बंद होने पर चारों तरफ़ शांति छा गई, अवनी की चीखने-चिल्लाने की आवाज़ वहाँ गूँजी। सभी लोग हैरानी से अवनी की ओर देखने लगे थे।
और तभी उस बार के बाउंसर अवनी को समझाने लगे थे और कहने लगे थे, "आखिरकार आप हैं कौन? इस तरह से क्यों चीख रही हैं और चिल्ला रही हैं?"
लेकिन अवनी तो बस बुरी तरह से चीखे जा रही थी, चिल्लाई जा रही थी। उससे एक भी शब्द नहीं बोला जा रहा था। तब तक वीर भी अपने उस कमरे से थोड़ा सा बाहर आया था।
और दिव्या और साथ ही साथ वह दिव्या का वह अंकल, जो कि उसका सगा कोई अंकल नहीं था,
बल्कि जवान लड़कियों को खरीदने वाला एक दलाल था, वह भी वहाँ गया था और गुस्से से दिव्या की ओर घूरते हुए बोला था, "आज सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हारी वजह से मुझे इतना बड़ा नुकसान हुआ है। मैं तुम्हें नहीं छोड़ूँगा।"
दिव्या का सर नीचे झुक गया था। तभी वह दलाल थोड़ा सा आगे आया था और जोरों से चिल्लाकर बोला था, "यह कोई पागल लड़की है जो यहाँ इस बार में घुस आई है।
और इसने कुछ नशा भी ज़्यादा ही कर लिया है। एक काम करो, इसे धक्के मारकर इस बार से बाहर निकाल दो।" तभी उस बाउंसर ने अपने बॉस की बात सुनकर जल्दी से अवनी को पकड़ लिया था।
और सभी ने उसे उसका चीखना-चिल्लाना बंद करते हुए उसे उस बार से बाहर निकालकर फेंक दिया था।
अवनी की हालत बहुत ही ज़्यादा खराब हो चुकी थी और कितनी देर तक वह अपनी किस्मत पर बैठे हुए रोती रही थी, उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। उसकी आँखों के सामने सिर्फ़ और सिर्फ़ धुंधलापन दिखाई दे रहा था।
हालाँकि वहाँ पर काफ़ी तेज बारिश हो रही थी, जिसकी वजह से धीरे-धीरे वह खुद को होश में लाने की कोशिश कर रही थी और धीरे-धीरे होश में जैसे-जैसे वह आ रही थी, उसे अपनी किस्मत पर बहुत ही ज़्यादा रोना आ रहा था।
और उसने आज बेहोशी की हालत में सोच लिया था कि आज वह अपनी इस बेमतलब की ज़िन्दगी को हर हाल में ख़त्म कर देगी, वह बिल्कुल भी नहीं जीएगी।
वह अपनी जान दे देगी। जितना उस वक़्त उसे समझ में आ रहा था, वह सोच रही थी और जल्दी ही अवनी सड़कों पर उल्टा-सीधा भागने लगी थी। तभी उसके पीछे कुछ कुत्ते पड़ गए थे। कुत्तों से बचने के लिए वह कूड़े के ढेर के पास छुप गई थी।
और वहाँ मिली थी उसे एक घड़ी जिसमें से अजीब सी आवाज़ आ रही थी। अवनी उस घड़ी को फेंकना चाहती थी, लेकिन उसमें से आई आवाज़ के कारण वह उसे फेंक नहीं पाई।
और उसने वह घड़ी अपने हाथों में बाँध ली थी और सोचने लगी थी कि या तो मैं कहीं जाकर मर ही जाऊँ या सीधा अपने घर, अपने बिस्तर पर चली जाऊँ।
क्योंकि अब उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह किसी रिक्शा करके या किसी से लिफ़्ट लेकर या जैसे-तैसे दौड़कर भागकर सड़कों पर अपने घर जा सके।
अवनी को कुछ समझ में नहीं आया था और अगले ही पल उसने अपने आप को अपने घर में पाया था। उस वक़्त अपने आप को वह नशे में ही समझ रही थी।
तो जो कुछ भी हो रहा था, उसे इस बात का एहसास नहीं था और जल्दी ही वह अपनी आँखें बंद करके, अवनी को उल्टा-सीधा जो अपना बिस्तर दिखाई दे रहा था, उस पर सो गई थी।
क्या होगा अवनी का जब उसके सामने आएगी उस जादूई घड़ी की सच्चाई? जानने के लिए बने रहिए दोस्तों।
वहीं दूसरी और दिव्या गुस्से से तिल मिला उठी थी उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि उसका प्लान इतनी बुरी तरह से फ्लॉप हो जाएगा. और उसका अंकल उस पर बहुत ही ज्यादा गुस्सा करने लगा था और उसने उसे कहा था कि जब से उसने उस लड़की को देखा है अब मैं उसे पाना चाहता हूं मैं नहीं जानता कि तुम क्या करोगी मैं तुम्हें सिर्फ और सिर्फ तीन दिनों का टाइम देता हूं तीन दिनों के अंदर अंदर वह लड़की मुझे मेरे बेड पर चाहिए और याद रखना दिव्या अगर तुम तीन दिनों के अंदर अंदर उस लड़की को मेरे बेड तक नहीं लेकर आ पाई , तो उसकी जगह तुम्हें मेरे बेड पर आना होगा जैसे ही उस आदमी ने बड़े ही बेशर्मी से दिव्या से यह कहा दिव्या उसे घूर कर रह गई थी वह किसी भी कीमत पर अपनी रात उसे आदमी के साथ तो नहीं बिताना चाहती थी क्योंकि वह आदमी दिखने में बड़ा ही भद्दा और अधिक उम्र का बदसूरत आदमी था तभी दिव्या ने गुस्से से वीर की ओर देखा था वीर जो की एक जगह अपना सर पकड़े बैठा हुआ था वीर के सर से हल्का-हल्का खून आ रहा था वेल तभी दिव्या वीर के पास गई थी और कहने लगीं थी चलो मेरे साथ ऐसा ककह कर दिव्या वीर को उस बार में बने एक कमरे में ले गई थी उस कमरे में जाकर दिव्या ने वीर को बेड पर धकेल दिया था खुद उसके ऊपर आ गई थी और कहने लगी थी उस अवनी की वजह से मेरा मूड बहुत ही ज्यादा खराब हो चुका है और इस वक्त केवल तुम ही हो जो मेरा मूड ठीक कर सकते हो, तो इसीलिए मैं तुम्हें मौका दे रही हूं कुछ ऐसा करो जिससे मेरा मूड बिल्कुल ठीक हो जाए और याद रखना अगर तुमने कोई गलती की तो मैं तुम्हें नहीं छोडूंगी वीर जोकि उस वक्त अपने सर को लेकर काफी ज्यादा परेशान था अब दिव्या के बात सुनकर हैरान हो गया था लेकिन वीर के पास कोई और रास्ता नहीं था तो इसीलिए अचानक वीर ने अपने सर पर निकले खून की परवाह न करते हुए दिव्या को पकड़ कर बुरी तरह से चूमना शुरू कर दिया था ।।।। वह दिव्या को सांस तक लेने का मौका नहीं दे रहा था क्योंकि दिव्या की जगह वह अवनी को ऑब्जर्व कर रहा था वह यह सोच रहा था कि दिव्या नहीं बल्कि अवनी इस वक्त उसके बेहद करीब है इसीलिए वीर दीवानों की तरह दिव्या को चूमने लगा था और कहीं ना कहीं वीर के आज इस तरह से बताओ करने में अवनी के लिए दिव्या को अग्रेशन साफ नजर आ रहा था । और इसी बात का वह फायदा उठा लेना चाहती थी वह अच्छी तरह से जानती थी वीर इस वक्त गुस्से में है और अपना गुस्सा उतारने के लिए वह दिव्या को काफी खुश कर सकता है तो इसीलिए जल्दी ही उन दोनों ने एक दूसरे के साथ पूरी तरह से प्यार करना शुरू कर दिया था और करीब 2 घंटे के बाद जब दोनों एक दूसरे के बराबर मेंलेटे हुए थे तब वीर ने दिव्या के कंधे पर हाथ फेरते हुए कहा था तुम्हे फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं है, भले ही वह लड़की आज हमसे बचकर यहां से भाग गई है लेकिन उसे आना तो इसी बेड पर पड़ेगा क्योंकि मैंने उसे की ऑलरेडी फोटोस ले ली है और तुम अच्छी तरह से जानती हो इन गरीब घर की लड़कियों को, अगर मैं उसे उसकी इज्जत का हवाला दूंगा तो वह वह सब कुछ करेगी जो हम चाहएंगे और तुम देखना इस बार हम अवनी से कितने रुपए कमाएंगे की कोई सोच भी नहीं सकेगा।।।। जैसे ही वीर ने यह कहा दिव्या मुस्कुराने लगी थी और एक बार फिर वह वीर के ऊपर आकर वह उसके होठों को चूमने लगी थी वहीं दूसरी ओर अवनी की मां रात भर घर के बाहर अवनी के आने का इंतजार करती रही थी लेकिन अवनी इस वक्त अपने कमरे में आराम से चैन सुकून की नींद सो रही है इस बात के बारे में उन्हें दूर-दूर तक कोई ख्याल नहीं था वही जैसे ही उसके सौतेले बाप ने अवनी की मां को इस तरह से अवनी के लिए परेशान होते हुए देखा तो वह उसके पास आकर खड़ा हो गया था और अपनी लड़खड़ाती हुई जुबान में बोला था क्यों तुम उसे बेशर्म लड़की का इंतजार कर रही हो और अपनी रात खराब कर रही हो चल मेरे साथ मुझे अपना शरीर अपने जिस्म का सुख दे तेरी वह बेशर्म बेटी तो किसी और के को सुख दे रही होगी लेकिन तुम देखना कल रात से तो वह बेशम्र लडकी मेरे साथ ही सोया करेगी जैसे ही उसके सौतेले बाप ने उसकी मां के सामने ऐसी बात की उसकी मां की गैरत को काफी ज्यादा ठेस पहुंची थी और इस बार वह खुद पर कंट्रोल कर नहीं कर पाई और उसने खींच कर अपने पति के मुंह पर एक चांटा मार दिया था। और कहने लगी थी आखिरकार तुम इतना कैसे गिर सकती हो जब जिस वक्त मैंने तुमसे शादी की थी मैंने तुमसे साफ-साफ कहा था कि तुम्हारा सिर्फ और सिर्फ मेरे जिस्म पर अधिकार होगा मेरी बेटी के नहीं लेकिन क्या तुम्हारी ये बात दिमाग में नहीं आई आखिरकार तुम मेरी बेटी के बारे में ऐसा सोच भी कैसे सकते हो और तुमने सोच भी कैसे लिया कि मैं अपनी बेटी की जिंदगी इस तरह से तुम्हारे हाथों बर्बाद होने दूंगी तुम उसके सौतेले बाप हो लेकिन मैं उसकी सगी मां हूं मैं इस तरह से अपनी बेटी के साथ नाइंसाफी नहीं होने दूंगी समझे तुम जैसे ही अवनी की मां ने उसके बाप को यानी अपने पति को मुंहतोड़ जवाब दिया तब गुस्से से उसका पति तीलमिला उठा था और उसने उसे अपनी की मां के बालों को कसकर पकड़ लिया था और कहने लगा था तेरी यह फालतू की बकवास में कल सुनूंगा अभी चल मेरे साथ मुझे तेरी जरूरत है ऐसा कहकर लगभग उसकी मां को घसीटता हुआ अपने साथ बेडरूम में ले गया था और फिर जी भर कर उसने उसके साथ मनमानी की थी तब तक अपनी मनमानी करने के बाद वह थक कर सो चुका था लेकिन उनकी मां की आंखों में आज कोई भी नींद नहीं थी वह अपनी जवान बेटी के घर आने का इंतजार कर रही थी क्योंकि उसकी बेटी अभी तक घर नहीं आई थी और ऐसी बीच घर के बाहर वाले दरवाजे पर बैठे-बैठे ही वह भी सो चुकी थी वहीं दूसरी और अगली सुबह जैसे ही जैसे ही अवनी सो कर उठी अचानक से उसे उसका सर काफी ज्यादा भारी भारी सा महसूस होने लगा था और उसे अपने आस पास की जगह को देखा था और अपना घर अपना कमरा अपना वह मामूली सा बेड देखकर अवनी की आंखें हैरत के मारे फैट की फटी रह गई थी वह सोचने लगी थी कि आखिरकार वह घर कब आई और तभी अचानक अवनी ने आंखें बंद करके कल रात जो कुछ भी उसके साथ हुआ था वीर ने उसके साथ क्या किया था इतना ही नहीं उसके सबसे प्यारी सहेली दिव्या ने उसके साथ क्या किया था यह सब उसके याद आने लगा था।।।। और अचानक से ही उसकी आंखों से आंसू निकलना शुरू हो गए थे और तभी अवनी की नजर कोने में पड़े हुए उस गाउन पर गई थी जो गांव दिव्या ने उसे जबरदस्ती पहनाया था अब अवनी अपने कपड़े ऑलरेडी बदल चुकी थी अवनी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिरकार उसने कपड़े कब बदले और वह घर कैसे आए जबकि उसे अच्छी तरह से याद था कि उसके साथ क्या हुआ था और उसकी तो इतनी हालत थी ही नहीं कि वह अपने कपड़े तक चेंज कर पाती अवनी अपने सर पर हाथ मार मार कर अपने कमरे में इधर-उधर घूम-घूम कर याद करने की कोशिश कर रही थी लेकिन उसे कुछ भी याद नहीं रहा था तभी अचानक अवनी की नजर अपनी हाथ में बंधी हुई घड़ी पर गई थी और तब अवनी को थोड़ा-थोड़ा धुंधला सा याद आने लगा था कि कूड़े के ढेर से उसे यह घड़ी मिली थी लेकिन कूड़े के ढेर से वह सीधा अपने घर कैसे आ गई थी अवनी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था और कहीं ना कहीं अवनी को ये लग रहा था कि शायद वह पागल हो गई है और उसने गलती से किसी की चीज उठा लिया तो यह सोचते हुए अवनी उस घड़ी को अपने हाथ से खोलने लगी थी और जैसे ही उसने उस घड़ी को हाथ से खोलने की कोशिश की तो वह नाकाम थी और एक बार फिर उस घड़ी में से आवाज आने लगी थी मुझे क्यों खोल रही हो जैसे ही अवनि दने यह सुना उसके पैरों के तले से जमीन खिसक चुकी थी और बार-बार अपने सर पर हाथ मार कर चेक करने लगी थी कि कहीं वह अभी भी तो नशे में नहीं है क्यों कि वह इतना तो समझ चुकी थी कि कल रात उसे नशा दिया गया था दिव्या जो उसके लिए पानी लेकर आई थी वह केवल पानी ही नहीं था बल्कि उसमें जरूर कुछ ना कुछ नशा था वह किस तरह का नशा था अवनी को इस बात के बारे में कुछ नहीं पता था तो कहीं ना कहीं उसे यही लग रहा था कि शायद वह अभी भी नशे में ही है और अवनी ने उस घड़ी के ऊपर दो-तीन हाथ मार कर अच्छी तरह से उसे अपने कान के पास ले जाकर सुनना शुरू किया था उसमें से केवल टक टक टक की ही आवाज आ रही थी तब अवनी को लगा कि शायद उसका नशा अभी तक पूरी तरह से नहीं उतरा है तो इसीलिए अवनी ने एक बार फिर उसे खोलने की कोशिश की थी लेकिन एक बार फिर उसे घड़ी में से आवाज सुनाई देने लगी थी मुझे क्यों खोल रही हो, अब तो अवनी काफी ज्यादा हैरान हो गई थी और वह सोचने लगी थी कि आखिरकार उसे हुआ क्या है यह घड़ी इस तरह बोलती हुई उसे क्यों सुनाई दे रही है उसे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था तभी अचानक अवनी को लगा की जरूर उसके पीछे कोई भूत प्रेत पड़ गया है इसीलिए अवनी डर के मारे अपने बेड पर जा चुकी थीऔर जो भी गायत्री मंत्र हनुमान चालीसा जो भी उसे याद आ रहा था वो पढ़ते जा रही थी और अपने आसपास अच्छी तरह से देखकर कहने लगी थी कौन है या कौन बोल रहा है मुझे कोई दिखाई क्यों नहीं दे रहा है आखिरकार कौन हो तुम यहां पर अवनी को इस तरह से घबराया हुआ देखकर अचानक से वह घड़ी फिर से बोल उठी थी देखो मैं कौन हूं कौन नहीं बस मेरी एक बात ध्यान से सुनो मुझे ऊपर वाले ने तुम्हारी मदद करने के लिए भेजा है और तुम मुझे कभी भी अपने आप से अलग मत करना जो कुछ कहोगे वह मैं तुम्हे लाकर दूंगा तुम्हारी हर एक इच्छा में पूरी करूंगा बस सिर्फ और सिर्फ तुम्हें अपने मन में वह इच्छा सोचनी है जैसे ही अवनी ने यह सुना उसे तो हैरानी हो रही थी उसे तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि उसके साथ ऐसा भी कुछ हो सकता था और तभी उसने उसे कहा था अच्छा तो जो कुछ तुम कहोगे तुम मुझे लाकर दोगे क्या तुम वाकई मुझे यहां मारने के लिए नहीं आये । क्या तुम कोई भूत प्रेत नहीं हो।, तभी उस घड़ी के अंदर से हंसने की आवाज आने लगी थी और वह कहने लगा था मैंने तुम्हें कहा ना जो कुछ तुम्हें चाहिए वह मैं तो मिला कर दूंगा। बोलो तुम्हें क्या चाहिए तभी अवनी मन ही मन में सोचने लगी थी कि उसने एक बार मिस्टर इंडिया और बाकि की कितनी मूवी में देखा था कि यह घड़ी जादुई घड़ी होती है और जो चाहिए वह मिल भी जाता है और इसे पहन कर गायब भी हो जाते हैं तब अवनी ने सोचा कि क्या वाकई इस घड़ी को पहन कर गायब भी हो सकते हैं लेकिन अवनी गायब होकर इस तरह का उस का कोई टेस्ट नहीं लेना चाहती थी। तभी उसने कुछ सोचते हुए उसे घड़ी से कहा था अच्छा तो तुम वाकई कुछ मैं कहूंगी वह पूरा कर सकते हो तो मुझे कपड़े ला कर दो मेरे पास पहनने के लिए अच्छे कपड़े नहीं है और जैसे कपड़े में पहनती हूं मुझे वैसे ही नए कपड़े चाहिए जैसे ही अवनी ने यह कहा और अगले ही पल देखते-देखते उसके पास कितने सारे कपड़ों का ढेर लगा हुआ था और अब अवनी की आंखें हैंरत के मारे फटी के फटी रह गई थी और उसने अपने हाथ से दूसरे हाथ पर चिकोटी काट ली थी कि कहीं वह सपना तो नहीं देख रही है इस तरह से इतने सारे कपड़े अचानक से पलक झपकते कैसे आ सकते हैं।।।।।🙏🏻🙏🏻🩷🩷🩷💕💕💕🙏🏻🩷🩷🩷💕💕💕🙏🏻🙏🏻🩷🩷🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻 क्या यह जादुई घड़ी वाकई अवनी की सारे मुसीबत को दूर कर देगी या आगे चलकर यह बढ़ाने वाली है अवनी की काफी सारी मुश्किलें जानने के लिए बने रहो दोस्तों।।।।।
अवनी अब काफी ज्यादा हैरान हो गई थी। वह कभी उन कपड़ों को छूकर देख रही थी, तो कभी उस घड़ी को। वह इधर-उधर घूमने लगी थी, कभी हँस रही थी, कभी रो रही थी। उसकी हालत बड़ी अजीब सी हो गई थी।
तभी अवनी ने एक बार फिर सोचा कि कहीं यह शायद कोई सपना तो नहीं है। और अगर यह घड़ी कहीं खो गई तो क्या यह फिर मेरी कोई इच्छा पूरी कर पाएगी?
क्योंकि उसने मूवी में देखा था कि यह घड़ी किसी और को मिल जाती है और किसी और की इच्छा पूरी करती है। तभी अवनी ने जल्दी से कहा, "अगर तुम वाकई मेरी मदद करना चाहते हो और हमेशा मेरे साथ रहने वाले हो, तो मैं चाहती हूँ कि तुम इस घड़ी में न रहकर सीधा मेरे अंदर ही आ जाओ।"
"और मेरे अंदर बस जाओ। और इस घड़ी को छोड़ दो।" जैसे ही अवनी ने यह कहा, अचानक देखते-ही-देखते अवनी के हाथ से वह घड़ी छूटकर नीचे गिर गई। और उसमें से एक अजीब सी रंग-बिरंगी रोशनी निकलकर अवनी के दाएँ हाथ में चली गई।
वह काफी ज्यादा हैरान हो गई थी क्योंकि उसे अपने दाएँ हाथ में हल्का सा भार महसूस होने लगा था। अवनी ने सोचा कि शायद यह कुछ ना कुछ सपना है या कुछ और है, क्योंकि उसे अभी तक यकीन नहीं आया था।
तभी उसे उसकी माँ की कही हुई बातें याद आने लगीं: "या तो तुम अपने सौतेले पिता को अपना लो, वरना पैसे लेकर आओ।"
इसलिए अवनी ने उस घड़ी को आजमाने के लिए एक और कोशिश की और कहने लगी, "मुझे कुछ पैसे चाहिए। मुझे घर का किराया देना है।" जैसे ही अवनी ने यह कहा, अचानक उसके हाथों में नोटों की मोटी-मोटी गड्डी रखी हुई थी।
अवनी की आँखें हैरत के मारे खूली की खूली रह गई थीं। इतने सारे पैसे उसने अपनी ज़िंदगी में नहीं देखे थे।
तभी अवनी ने उन कपड़ों को देखा, उन पैसों को देखा। अब उसने यकीन कर लिया था कि वाकई शायद ऊपर वाले को उस पर तरस आ गया है।
और इसीलिए उसने उसकी मदद करने के लिए अपना कोई फ़रिश्ता उसके पास भेज दिया है।
अवनी ने जल्दी से खुशी के मारे सारे कपड़े अपने गले से लगा लिए थे। वह बहुत ही ज्यादा खुश हो गई थी। उसने उनमें से एक जोड़ी कपड़े पहनकर तैयार हो गई थी।
वहीं दूसरी ओर, अवनी की माँ जो कि रात भर उसके दरवाजे के पास इंतज़ार कर रही थी, अगली सुबह अपनी बेटी को न देखकर काफी ज्यादा परेशान हो गई थी।
तब तक उसका बेटा भी उठकर उसके पास आ गया था। उसके सौतेले पिता भी उसके पास आ गए थे और कहने लगे थे, "तो आ गई तेरी बेटी? नहीं आई ना? तेरी वह बेशर्म बेटी! मुझे पता था कि ज़रूर वह अभी तक नहीं आई होगी और किसी न किसी का बिस्तर गर्म करने गई होगी।"
"लेकिन तूने ही मेरी बात पर यकीन नहीं किया। अब तो यकीन कर लिया ना? और तूने मेरी इतनी सी बात को सुनकर मुझ पर हाथ भी उठा दिया। तू जानती है मैं तेरा क्या हाल कर सकता हूँ।"
तभी उसकी माँ का दिल अपने शराबी पति की बात सुनकर कट कर रह गया था। वह कहने लगी थी, "मेरी बेटी ऐसा कोई काम नहीं करेगी। इसीलिए मैंने इस उम्र में ना चाहते हुए तुमसे शादी कर ली। और मैं अच्छी तरह से जानती थी कि तुम एक शराबी हो, लेकिन फिर भी मुझे इस बात का यकीन था कि तुम जैसे-तैसे हमारा घर का खर्चा उठाओगे।"
"लेकिन तुमने ऐसा नहीं किया। तुम मेरी बेटी को अपना प्यार नहीं दे पाए। उल्टा तुम्हारी तो गंदी नज़र मेरी बेटी के जिस्म पर थी। और आज मेरी बेटी पूरी रात घर नहीं आई है, सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हारी वजह से। आज मेरी बेटी को अपना जिस्म बेचना पड़ा।"
"यह मैंने कभी भी नहीं सोचा था कि मेरी बेटी अपना जिस्म बेचने पर मजबूर हो जाएगी। मैंने तो सोचा था कि अगर मैं दूसरी शादी कर लूँगी तो उसका दूसरा बाप कम से कम घर का खर्चा तो उठाएगा और मेरी बेटी को ऐसी कोई हालातों से नहीं गुज़रना होगा।"
"और जैसे-तैसे उसकी पढ़ाई पूरी होने पर किसी लड़के को देखकर मैं उसकी शादी कर दूँगी। लेकिन मैं हार गई। मैं ऐसा नहीं कर पाईं।" ऐसा सोचते हुए उसकी माँ जोरों से रोने लगी थी।
तब अचानक उस शराबी ने आगे बढ़कर अवनी की माँ के बालों को कसकर पकड़ लिया था और कहने लगा था, "अच्छा, तो तूने अपनी बेटी के मुस्तकबिल के लिए मुझसे शादी की थी? ताकि तू अपनी बेटी के सर पर एक बाप का साया रख सके?"
"और उसे पढ़ा-लिखाकर किसी और के साथ भेज सके? तूने ऐसा सोच भी कैसे लिया? और मैंने तुम जैसी बुढ़िया से, दो बच्चों की माँ से, शादी क्यों की है? ताकि तेरी खूबसूरत जवान बेटी के लिए! और वैसे भी तेरी बेटी अब शुरुआत कर चुकी है, तो अब दूसरी रात उसे अपनी मुझे ही देनी होगी।"
जैसे ही उसके बाप ने इतनी बेशर्मी से कहा, उसका भाई बोल पड़ा था (वह छोटा था, उसे ज़्यादा समझ नहीं थी, वह केवल बारह साल का था)। जैसे ही उसके सौतेले बाप ने उसकी माँ को मारने के लिए हाथ उठाया, तो वह बोला था,
"खबरदार! जो मेरी माँ को तुमने हाथ भी लगाया! छोड़ो मेरी माँ को! छोड़ो!" ऐसा कहकर वह अपनी माँ को छुड़ाने की कोशिश करने लगा था।
और जैसे ही अवनी के कानों में बाहर हल्ले-गुल्ले की आवाज़ आई, तो वह हैरान हो गई थी। जैसे ही वह बाहर गई और उसने देखा कि उसका सौतेला बाप उसकी माँ को मार रहा था, तो अवनी का गुस्से के मारे बुरा हाल हो गया था। उसने आगे बढ़कर अपने सौतेले बाप को हटा दिया था और अपनी माँ को संभालने लगी थी।
वहीं अवनी की माँ ने जैसे ही अवनी को देखा, तो हैरान हो गई थी और कहने लगी थी, "अवनी, तू कहाँ थी? मैं तो पूरी रात तेरा बाहर इंतज़ार कर रही थी। तू घर कब आई और अंदर से कैसे आ रही है?"
"और ये नए कपड़े कहाँ से आए?" तभी अचानक अवनी ने खुशी से अपनी माँ को गले से लगा लिया था और कहने लगी थी, "माँ, मैं तो कल रात ही घर आ गई थी।"
"उसी टाइम आ गई थी, 8:00 बजे ही। मैं तो घर जाकर कब से सो रही थी अपने कमरे में। क्या आपने मेरे कमरे में आकर मुझे नहीं देखा?"
जैसे ही अवनी ने यह कहा, उसकी माँ हैरान हो गई थी। उसने तो अवनी को घर आते हुए नहीं देखा था। उसे तो यही लग रहा था कि अवनी अभी तक घर से बाहर नहीं आई है। इसी चक्कर में वह पूरी रात घर से बाहर बैठकर उसका इंतज़ार करती रही थी।
तभी उसने अपनी माँ से कहा था, "मेरे जिस वक़्त मैं घर आई थी, शायद आप उस वक़्त घर पर नहीं थीं। आप शायद पड़ोस में कहीं गई हुई थीं।"
"तो इसीलिए मैं घर आकर सीधा अपने कमरे में जाकर सो गई थी।" तभी अवनी की माँ उसकी ओर देखकर कहने लगी थी, "तो क्या तू कल रात किसी और के साथ नहीं थी? मतलब तूने किसी और के साथ कोई रिश्ता नहीं बनाया था?"
जैसे ही अवनी की माँ ने डरते-डरते यह कहा, अवनी तुरंत अपनी माँ की बातों का मतलब समझ गई थी और कहने लगी थी, "यह आप कैसी बातें कर रही हैं माँ? मैं भला कोई ऐसा काम कर सकती हूँ जिससे आपको शर्मिंदा होना पड़े?"
जैसे ही अवनी ने यह कहा, उसकी माँ ने उसे खुशी से गले से लगा लिया था और कहने लगी थी, "मेरी बच्ची! तूने मेरी सारी परेशानियाँ खत्म कर दीं। मुझे तो लगा था कि आज मैं पूरी तरह से बर्बाद हो गई हूँ, लेकिन तूने मुझे बचा लिया। मेरे बच्चे! तूने मुझे बचा लिया।" ऐसा कहकर वह पूरी तरह से रोने लगी थी।
तभी अवनी अपनी माँ को चुप कराने लगी थी। उसने अपनी माँ को उठाकर वहीं बरामदे में पड़ी कुर्सी पर बिठा दिया था। तब उसकी माँ अवनी की ओर ध्यान से देखने लगी थी। अवनी आज नए कपड़ों में बड़ी ही सुंदर लग रही थी। तब उसकी माँ ने उसे कहा था, "बेटा, तेरे पास नए कपड़े कहाँ से आए?"
तभी अवनी ने अपनी माँ की ओर देखते हुए कहा था, "माँ, मुझे नौकरी मिल गई है।"
"और आपको पता है, मुझे बहुत ही ज्यादा अच्छी नौकरी मिली है। और मुझे कुछ पैसे भी एडवांस मिल गए थे। तो उससे मैंने अपने लिए कुछ कपड़े खरीद लिए। आप तो जानती हैं, मेरे कपड़े काफी ज़्यादा खराब हो गए थे।"
"और मेरा दुपट्टा भी कॉलेज में फट गया था।" जैसे ही अवनी ने यह कहा, उसकी माँ मुस्कुरा दी थी और कहने लगी थी, "क्या वाकई तुझे नौकरी मिल गई है?" तो अवनी ने हाँ में अपना सर हिला दिया था।
और अवनी ने कुछ पैसे अपनी माँ के हाथों में रखते हुए कहा था, "माँ, ये लीजिए पैसे। इन पैसों से आप पूरे छह महीने का किराया दे देना।"
जैसे ही अवनी ने यह कहा, उसकी माँ की आँखें हैरत के मारे फटी रह गई थीं। वह कहने लगी थी, "लेकिन बेटा, इतने सारे पैसे तुझे कहाँ से मिले? और ऐसी तुझे कौन सी नौकरी मिली है?"
तब अवनी ने मुस्कुराते हुए अपनी माँ से कहा था, "माँ, बस समझ लीजिए कि ऊपर वाले को हम पर रहम आ गया है। और अब हमारी सारी परेशानी दूर हो जाएगी।"
जैसे ही अवनी ने इतने सारे पैसे अपनी माँ के हाथ में रखे, तो उसका शराबी पिता यह देखकर हैरान हो गया था और वहाँ से चला गया था। क्योंकि उसके पास अब कहने के लिए कुछ नहीं बचा था। और वैसे भी वह ज़्यादा कुछ नहीं कह सकता था। वह अच्छी तरह से जानता था कि अगर उसने ज़्यादा नुकर किया, तो ये दोनों माँ-बेटी उसे घर से बाहर निकालकर फेंक देंगी। और फिर शराब पीकर, हमेशा की तरह, वह पहले जहाँ नाली में पड़ा रहता था, वैसे ही कीचड़ में या कूड़े के ढेर पर पड़ा रहेगा और उसे कोई देखने वाला नहीं रहेगा।
वहीं दूसरी ओर, अवनी की माँ ने अवनी को गले से लगा लिया था और कल रात उसने जो उल्टी-सीधी बातें अपनी बेटी से कही थीं, उसकी माफ़ी माँगने लगी थी।
वह कहने लगी थी, "मुझे माफ़ कर दे मेरी बच्ची! मुझे तो लगा था कि वाकई इस घर को चलाने के लिए किसी मर्द की ज़रूरत है।"
"लेकिन मेरी बच्ची ने साबित कर दिया है कि ऐसी कोई ज़रूरत नहीं है। और कोई भी औरत अपना घर आसानी से चला सकती है।" तो अवनी ने खुशी से अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया था और कहने लगी थी,
"आपको बिल्कुल भी परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है। आपकी बेटी कभी भी आपको कोई परेशानी नहीं होने देगी। और आप देखिएगा, बहुत जल्द अब हमारे सारे सपने पूरे हो जाएँगे।" ऐसा कहकर उसने अपनी माँ को गले से लगा लिया था।
तभी अवनी का भाई उससे बोला था, "दीदी, मुझे स्कूल जाना है। मुझे स्कूल के लिए लेट हो रहा है। आप मुझे स्कूल छोड़ दीजिए। और आपको भी तो कॉलेज जाना होगा।" ऐसा कहकर उसका भाई तैयार होकर वहाँ गया था।
तब अवनी ने मुस्कुराकर अपने भाई की ओर देखा था और कहने लगी थी, "चलो, मैं तुम्हें स्कूल छोड़ देती हूँ और मैं भी फिर कॉलेज के लिए निकल जाती हूँ।"
ऐसा कहकर अवनी अपने भाई को स्कूल छोड़ते हुए अपने कॉलेज की ओर जाने लगी थी। आज अवनी के चेहरे पर आत्मविश्वास साफ़ नज़र आ रहा था। और कहीं ना कहीं उसे यह भी पता था कि दिव्या और वीर इस तरह से नहीं मानने वाले हैं। वे ज़रूर उसे परेशान करने के लिए किसी भी हद तक जाएँगे।
लेकिन अब जब से अवनी के शरीर में वह जादुई घड़ी में बोलने वाला इंसान उसके शरीर की दाईं बाजू में आया था, तब से उसे अपने शरीर में काफी ज़्यादा ताकत का एहसास होने लगा था।
वहीं वीर और दिव्या इसी तैयारी के साथ आज कॉलेज गए थे कि आज वे अवनी को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे। क्या अवनी दिव्या और वीर से बच पाएगी? और क्या अवनी उस आत्मा का राज जान पाएगी? जानने के लिए बने रहिए दोस्तों।
।। वही वीर और दिव्या इसी तैयारी के साथ आज कॉलेज गए थे कि आज वह अवनी को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे।। ।और उसे पूरी क्लास के सामने नीचे दिखाएंगे अगर अपनी उनकी बातें तरीके से नहीं मानी तो वह उसी की अश्लील फोटो सबके सामने रिवील कर देंगे लेकिन अवनी को किसी ने किसी तरह से मजबूर करके रहेंगे तो यह सोचते हुए वह लोग भी आज अपनी पूरी तैयारी के साथ कॉलेज में पहुंच चुके थे वही अवनी जैसे ही कॉलेज में गई तो उसने देखा कि कॉलेज में जाते ही सबसे पहले दिव्या हाथ बंधे उसे ही देख रही थी अवनी ने भी दिव्या को देखा था लेकिन उसने दिव्या को पूरी तरह से इग्नोर कर दिया था और सीधा अपनी क्लास में जाने लगी थी और जैसी वह क्लास में गई अचानक से वीर उसके सामने आ गया था और वीर ने उसका हाथ पकड़ लिया था अवनी ने देखा कि वीर के माथे पर पट्टी लगी हुई थी और तब अपनी को याद आ गया था कि उसने वीर के सर पर कांच के जग से जो वार किया था उसी पर की यह पट्टी लगी हुई है तब अवनी हल्का सा मुस्कुरा दी थी मन ही मन में तभी वीर ने अवनी से कहा था तुमने कल रात बहुत बड़ी गलती की है अवनी तुम्हें इस तरह से हमारे साथ बर्ताव नहीं करना चाहिए था और अब तुम्हे उस गलती का खामीयाजा भुगत ना पड़ेगा मैं तुम्हें सिर्फ और सिर्फ एक मौका देता हूं या तो तुम आज रात आराम से राजी खुशी अपने मन से उस जगह पर आ जाना और अपना वह अधूरा काम पूरा करना जिस काम को तुम छोड़ कर गई हो अगर तुमने ऐसा नहीं किया तो मैं तुम्हारी यह अश्लील फोटो जो भी इस वक्त मेरे पास है वह सारी जगह फैला दूंगा इतना ही नहीं कॉलेज के कैंपस में हर जगह में इसके बड़े-बड़े पोस्टर लगवा दूंगा ।। ऐसा कहकर उसने अपना फोन अवनी की ओर दिखाते हुए कहा था जैसे ही अवनी ने यह देखा अचानक से उसके माथे पर पसीना अगर आना शुरू हो गया था उसे डर लगने लगा था और तभी अचानक अवनी ने अपने हाथ से अपने दाएं हाथ के बाजू को छुआ था और मन ही मन में कहने लगी थी इसके फोन में जो कुछ भी है वह तुरंत बदलकर किसी और चीज में तब्दील हो जाए जैसे ही अवनी ने यह कहा पलक झपकते ही उसका वह काम हो गया था तब अवनी को जैसे ही इस बात का एहसास हुआ कि उसका काम अब तक हो गया होगा तब अवनी ने वीर की ओर देखते हुए कहा था तुम्हें क्या लगता है मैं तुम्हारी खोखली धमकियों से डर जाओगी और तुम्हें क्या लगता है मैं तुम्हारी हर बात मानूंगी तो यह तुम्हारी गलतफहमी है और जिन पोस्ट को जिन फोटोस को तुम पूरे कॉलेज कैंपस में लगवाना चाहते हो तो तुम लगवा सकते हो मुझे कोई एतराज नहीं है ऐसा कह कर जैसे ही अवनी वहां से आगे जाने लगी तभी दिव्या उसके सामने आकर खड़ी हो गई थी और कहने लगी थी क्या हुआ तुम्हारे कुछ ज्यादा ही पर निकल आए हैं तभी वह वीर की ओर देखते हुए कहने लगी थी वीर मेरा मुंह क्या देख रही हो फटाफट से इस के फोटो दिखाओ और इस लड़की को बोलो कि यह आकर मेरे उसे अंकल क्लाइंट को खुश करें अगर इसने उसे खुश नहीं किया तो वह उसने जो भी इसके बदले हमें पैसे दिए हैं वह सब वह हमसे वापस ले लेगा जैसे ही दिव्या ने यह कहा अवनी को उससे बहुत ही ज्यादा घिन आने लगी थी और वह कहने लगी थी मैं सोच भी नहीं सकती थी तुम इतनी घटिया किस्म की लड़की निकलेगी इस वीर के साथ तुम बेड शेयर करती हुई आई और एक और मेरी तरफ दोस्ती का दिखावा करती हो अरे तुमसे अच्छे तो वह दुश्मन है कम से कम सामने रहकर तो वार करते हैं तुम्हारे जैसे मीठी छुरी दोस्त बनकर तो वार नहीं करते जैसे ही अवनी ने इस तरह से दिव्या से बात की दिव्या का चेहरा गुस्से से लाल होने लगा था और वह कहने लगी थी अपनी हद थ में रह दो कौड़ी की लड़की तुम्हारी हमारे सामने औकात ही क्या है जिस घर से तू आती है उसी घर से हमारे यहां हमारे घरों में काम करने के लिए नौकरानी आती है और शायद तो भूल रही है तेरी मां भी एक नौकरानी है जो लोगों के घरों में जाकर काम करती है जैसे ही अवनी ने दिव्या की यह बात सुनी उसे भी गुस्सा आ गया था और वह कहने लगी थी दिव्या हम लोग कौन है यह कौन नहीं है यह हम अच्छी तरह से जानते हैं और हमारे पास इज्जत है और इज्जत ही सब कुछ होती है तुम्हारी तरह नहीं जो किसी भी भर के बेड पर जाकर अपनी इज्जत नीलाम करती फिरे । जैसे ही अवनी ने यह कहा अब तो दिव्या का गुस्सा जवाब दिया गया था उसने अपना हाथ जैसे ही दिव्या को मारने के लिए उठाया दिव्या की दाई बाजू ने अपने आप ही काम करना शुरू कर दिया था और अचानक से उसने दिव्या का हाथ पकड़ लिया था और अवनी कुछ कर भी नहीं रही थी और उसके बाजू और उस के राइट राइट हैंड ने अपने आप ही दिव्या का हाथ मरोड़ना शुरू कर दिया था और दिव्या जोरों से चिखने लगी थी और कहने लगी थी वीर तुम खड़े-खड़े क्या देख रहे हो देखो इस गवार लड़की ने मेरा हाथ मरोड़ दिया है पकड़ो इसे ऐसा कहकर जैसे ही वीर आगे आया दिव्या को छुड़ाने के लिए तब तक अवनी के दाएं हाथ ने दिव्या का हाथ छोड़कर अवनी के दाएं हाथ ने म अपने आप ही वीर के सीने पर हाथ रख दिया था और वीर वही का वही जम सा गया था उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह अवनी के हाथ को हटा कर आगे बढ सके।।। और अवनी का मुकाबला कर सके तभी दिव्या ने वीर से कहा था तुम खड़े-खड़े मूंह क्या देख रहे हो उसे इसके अश्लील फोटो दिखाओ और इसे कहो यह हमारी बात मानेगी अगर उसने हमारी बात नहीं मानी तो उसके बदतमीजी की सजा इसे क्या मिल सकती है इसे इसके बारे में बताओ इसे जैसे ही दिव्या ने यह कहा अब अवनी हाथ बांधकर खड़ी हो गई थी और कहने लगीं थी अच्छा-अच्छा चलो मैं भी तो देखु ऐसी क्या चीज है जिसके बलबूते पर तुम लोग इतना उछल रहे हो जैसे ही अवनी ने यह कहा वह दोनों हैरत से अवनी की ओर देखने लगे थे क्योंकि अवनी ने आज तक किसी से भी इस तरह से बात नहीं की थी अवनी को खुद नहीं पता था कि वह इस तरह से क्यों बोल रही है क्योंकि जब से अवनी के जिस्म में वह बोलने वाली आत्मा आई थी तब से अवनी कके हाव भाव बुरी तरह से बदल गए थे।।। अवनी को इतने आत्म विश्वास के साथ अपने सामने खड़े हुए देखकर वीर ने जल्दी से अपना फोन चेक करना शुरू कर दिया था और जैसे ही दिव्या और वीर ने मिलकर फोन चेक करना शुरू किया तो उन दोनों के चेहरे का रंग पूरी तरह से उड़ गया था क्योंकि उस फोन के अंदर अवनी की फोटो की जगह दिव्या और वीर की फोटो थी जो कल रात वो इंटिमेट हुए थे उन की वह सारी फोटोस ईतना ही नहीं वीडियो तक थी जैसे ही वीर और दिव्या ने देखा उन दोनों की आंखें फटी की फटी रह गई थी कि अचानक से यह क्या हुआ था उनके फोटो वीडियो किसने ले ली थी जबकि वहां पर तो कोई था ही इतना ही नहीं जबकि वह तो कितने ही महीनो से उसी जगह जाकर एक दूसरे के साथ रिश्ता बनाते हुए आए थे अब तो उन दोनों के चेहरे से पसीना छूटना शुरू हो गया था और तब अवनी ने उन दोनों के चेहरे पर पसीना छुटे हुए देखकर कहा था क्या हुआ है मुझे लगता है कि तुम लोग कुछ ज्यादा ही परेशान हो गए हो लाओ मुझे भी दिखाओ फोटो कौन सी फोटोस है मेरी जरा जिनके बलबूते पर तुम लोग मुझे ब्लैकमेल करने के लिए आए हो जैसे ही अवनी ने साफ-साफ यह कहा अचानक से वीर ने अपना फोन छुपा लिया था और दिव्या के चेहरे पर अब बेजजती सी नज़र आने लगी थी और जल्दी से वह दोनों अवनी के नजरों के सामने से भाग गए थे जैसे ही अवनी ने यह देखा वह जोरों से हंसने लगी थी और अचानक से ही अवनी ने अपनी बाजू को छू लिया था और कहने लगीं थी तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद मैं नहीं जानती तुम कौन हो कौन नहीं लेकिन तुमने मेरी जिंदगी बहुत ही ज्यादा आसान कर दी है वेल जल्दी ही अवनि अपना कॉलेज खत्म करके अपने घर जा चुकी थी और जैसे ही वह घर गई उसके लिए एक नई मुसीबत उसका इंतजार कर रही थी उसने देखा कि उसका घर काफी सारे लोगों से घिरा हुआ खड़ा था और उसकी मां अपने बेटे को अपने सीने से लगाकर खड़े हुए सब लोगों की बातों को सुन रही थी और जोरो से रो रही थी इतना ही नहीं उसका शराबी पति भी उन लोगों के सामने खड़ा होकर उस की मां को उल्टी सीधी बातें सुना रहा था अवनी जैसे ही वहां गई सभी लोग आवनी को देख कर कहने लगे थे लो आ गई को देख लो इसको किस तरह से चलकर आ रही है, और कपड़े तो देखो आज कैसे नया जोड़ा पहना है ,सभी लोग अवनी को देखते ही इस तरह की बातें करने लगे थे ।।।।।। और उन लोगों की बातें सुनकर काफी ज्यादा हैरान हो रही थी तभी अवनी अपनी मां के पास गई थी और कहने लगी थी क्या हुआ है मां आप इस तरह से क्यों रो रही है और यह सब क्या हो रहा है यहां, यह सब लोग कौन और हमारे घर में क्या कर रहे हैं तभी उसका वह शराबी बाप जोरों से चिल्लाने लगा था और कहने लगा था देख लो भाई यह देख लो यह लड़की कहां आ गई है और देखो किस तरह से शेर बनकर घूम रही है और कैसी बातें कर रही है तुम सब लोगों को भी बुरा भला कह रही है क्योंकि तुम किसकी तुम सब लोग यहां क्या करने के लिए आए हो जैसे ही अवनी के सौतेले बाप ने इस तरह की बातें करना शुरू की अवनी हैरान हो गई थी और कहने लगीं थी आखिरकार उसके सौतेले बाप को क्या हुआ है क्या इसने आज दिन में भी चढ़ा ली है क्या रात में तो चढ़ा कर आता ही है।।।।।।।।।। 🩷🩷🩷🩷🩷🩷🩷🩷🩷🩷🩷💕💕💕💕🙏🏻🙏🏻🙏🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻🩷🩷🩷🩷🩷🩷💕💕💕💕💕💕💕💕🙏🏻🙏🏻✍🏻✍🏻🙏🏻✍🏻🙏🏻🩷🙏🏻🩷🩷🙏🏻🩷🩷🩷🩷🩷🩷🩷🙏🏻🩷🙏🏻🩷🩷🩷🙏🏻💕🙏🏻💕🙏🏻 आख़िर कोन थे ये लोग और अवनि के घर पर क्या करने आए थे जानने के लिय बने रहिए दोस्तों।।।।
जैसे ही अवनी के सौतेले बाप ने इस तरह की बातें करना शुरू कीं, अवनी हैरान हो गई।
"आखिरकार तुम्हें क्या हुआ है? क्या तुम आज दिन में भी पीकर आए हो?" अवनी ने कहा।
जैसे ही अवनी ने यह कहा, सभी लोग अवनी को देखकर कहने लगे, "हे लड़की! अपनी फालतू की बकवास बंद कर। और एक बात खोलकर सुन ले, अपना सामान पैक कर और यहां से निकल जा। हम लोग तुम्हें सिर्फ़ 24 घंटे की मोहलत देते हैं।" उन लोगों के शब्द सुनकर अवनी की आँखें हैरत से फटी रह गईं। आखिरकार क्या हो रहा था और वे लोग उससे इस तरह का बर्ताव क्यों कर रहे थे?
और जल्दी ही सब लोग अवनी को धमकी देकर चले गए। उसका शराबी बाप भी अवनी की माँ की ओर देखता हुआ वहाँ से बाहर निकल गया।
तब अवनी ने अपनी माँ को रोते हुए चुप कराया और कहा, "माँ, आखिर हुआ क्या है? और ये सब लोग कौन थे? और ये हमें यहाँ से कहाँ जाने के लिए कह रहे हैं?"
तभी उसकी माँ ने अवनी से कहा, "बेटी, आज जो तू मुझे पैसे देकर गई थी, जैसे ही मैंने मकान मालिक को छह महीने का किराया दिया, वह मुझे ऊपर से लेकर नीचे तक देखने लगा।"
"और कहने लगा कि एक महीने का किराया देना भी तुम लोगों के लिए इतना ज्यादा भारी हो जाता है, तो आज अचानक से छह महीने का किराया कैसे दे रही हो? कहीं तुम धंधे पर तो नहीं बैठ गई हो या तुमने अपनी बेटी को धंधे पर नहीं बिठा दिया है?"
जैसे ही अवनी ने अपनी माँ की बातें सुनीं, हैरानी से उसकी आँखें फैल गईं।
उसकी माँ ने आगे बताया कि कैसे उस मकान मालिक ने सारी बातें सारे पड़ोस और आस-पास के लोगों में फैला दी थीं कि इन लोगों के पास अब काफी पैसा आ गया है और उनकी बेटी अब धंधे पर बैठ गई है। वह पढ़ने नहीं जाती, इसीलिए वह अब धंधे पर बैठकर काम करने लगी है।
मकान मालिक की बातों में आकर सभी लोगों ने अवनी की माँ को उल्टा-सीधा कहना शुरू कर दिया था।
"यह शरीफ़ों का मोहल्ला है और यहाँ पर ये गंदी हरकतें नहीं चलेगी," उन्होंने कहा।
अवनी काफी हैरान हो रही थी लोगों की सोच पर। लेकिन अवनी ने एक पल के लिए यह भी सोचा कि जिस तरह से लोग सोच रहे हैं, कहीं न कहीं वे सही भी सोच रहे हैं। अचानक से जिन लोगों के पास दो वक़्त का खाना सही से जुटा नहीं होता था, एक महीने का किराया सही से अरेंज नहीं कर पाते थे, उन्होंने अचानक से छह महीने का किराया कैसे दे दिया था?
कहीं न कहीं ये सारी बातें अब अवनी भी सोचने लगी थी। "माँ, आपको परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है। इन्होंने हमें 24 घंटे का टाइम दिया है, लेकिन अभी 24 घंटे की कोई ज़रूरत नहीं है। हम सिर्फ़ दो घंटे में ही यह घर छोड़कर किसी दूसरे बड़े शहर में जाकर रहेंगे," अवनी ने कहा।
जैसे ही अवनी ने यह कहा, उसकी माँ उसे हैरानी से देखने लगी। "क्या तू पागल हो गई है? तू जानती भी है क्या कह रही है? और हम इस घर को छोड़कर कहाँ जाएँगे? भले ही यह घर हमारा न हो, लेकिन हम कई सालों से यहाँ रहते आये हैं। तेरी और तेरे भाई की पढ़ाई, मेरा काम, सब कुछ यहीं है। अलग शहर में जाकर कैसे अपनी आजीविका चलाएँगे?"
अपनी माँ की बात सुनकर अवनी ने मुस्कुराते हुए कहा, "आपको कोई काम करने की ज़रूरत नहीं है। हम आज ही यहाँ से कहीं और जाएँगे।"
जैसे ही अवनी ने एक बार फिर अपनी बात दोहराई, उसकी माँ की आँखें हैरानी से फैल गईं। शायद उनकी बेटी पागल हो गई है जो इस तरह की बातें कर रही है।
लेकिन अगले ही पल उसकी माँ यह देखकर चौंक गई कि अवनी पहले से ही एक बैग पैक करके वहाँ आकर खड़ी हो गई थी। "चलो माँ, अब," अवनी ने कहा।
शारदा जी की हैरत का कोई ठिकाना नहीं था। वह हैरानी से अवनी की ओर देखते हुए बोली, "अवनी, तू जो कुछ कह रही है, क्या वह सही कह रही है? तू वाकई यहाँ से जाना चाहती है? हम यहाँ से आखिर जाएँगे कहाँ? और तूने मुझे यह भी नहीं बताया कि आखिरकार तुझे ऐसा कौन सा काम मिला जिससे तुझे इतना पैसा आ गया है कि तू अगले किसी शहर में जाकर भी रहने को तैयार थी।"
तब अवनी ने अपनी माँ से कहा, "बहुत जल्द मैं आपको सब बता दूँगी, लेकिन अभी आपको फिलहाल मेरे साथ चलना होगा।" ऐसा कहकर वह अपने भाई और माँ का हाथ थामकर उस घर से निकलकर किसी दूसरे शहर की ओर रवाना हो गई।
क्योंकि अब अवनी खुद उस शहर में नहीं रहना चाहती थी, उसने किसी दूसरे शहर में जाने के बारे में सोच लिया था। वह कहीं ऐसी जगह जाना चाहती थी जहाँ उसे रोकने-टोकने वाला या किसी की गंदी नज़रें भी उस पर न हों, और उसके पास कोई अच्छा सा घर हो जहाँ वह आराम से अपनी माँ और भाई के साथ रहे और वहाँ हर तरह का ऐशो-आराम मौजूद हो।
जैसे ही अवनी ने मन ही मन में ये बातें सोचीं, उसका यह सोचना पूरा हो चुका था। जल्दी ही बस एक जगह जाकर रुक गई थी।
और अचानक से उसे बस के अंदर तीन-चार आदमी चढ़े और अवनी की ओर देखकर कहने लगे, "मिस अवनी मेहता, आपका ही नाम है ना?"
अवनी ने हाँ में सिर हिला दिया। जल्दी ही उन्होंने कुछ पेपर्स अवनी के हाथों में थमा दिए और कहने लगे, "ये आपके घर के पेपर्स हैं। आपका घर तैयार हो चुका है। आप हमारे साथ चलिए, हम आपको वहाँ तक छोड़ देते हैं।" जैसे ही उन अनजान लोगों ने यह कहा, अवनी काफी हैरान हो गई।
साथ ही साथ उसकी माँ और भाई भी हैरान हो गए थे। आखिर ये लोग कौन हैं? और उन्हें अवनी का नाम कैसे पता चला? और ऐसा कौन सा घर है जो उन्होंने अरेंज कर दिया है? अवनी को अपने बाएँ हाथ पर भरोसा था, इसीलिए उसने ज़्यादा न सोचते हुए उन लोगों के साथ जाने लगी।
अवनी की माँ उसे रोकना भी चाहती थी, लेकिन जब उन लोगों ने सीधे-सीधे अवनी का नाम लिया, तो वह भी चौंक गई थी। इसलिए वह भी जाकर देखना चाहती थी कि आखिर ये लोग किस घर की बात कर रहे हैं। जल्दी ही अवनी ने देखा कि वे लोग कितनी सारी गाड़ियाँ लेकर आए थे।
और अवनी समेत उसके पूरे परिवार को उन्होंने गाड़ियों पर बिठा दिया और जल्दी ही गाड़ी एक बड़े ही खूबसूरत बंगले के सामने जाकर रुक गई।
उस बंगले को देखकर अवनी की माँ की आँखों में काफी सारे सवाल पैदा हो चुके थे। वह अपनी बेटी की ओर देखकर कहने लगी, "बेटी, आखिरकार ये सब कुछ क्या हो रहा है? ये लोग कौन थे? और इतना बड़ा घर किसका है? और ये सब लोग तुम्हें सलाम क्यों कर रहे हैं? आखिरकार हो क्या रहा है?" अवनी खुद हैरत में थी। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था।
लेकिन तभी अवनी को अपनी बाजू में थोड़े भारीपन का एहसास हुआ। वह समझ गई कि यह सब कुछ किसने किया है। लेकिन अब अवनी सोचने लगी कि अगर यह आँखों का जादू है, तो ये इंसान इस जादू के वश में कैसे आ गए और कैसे उन्होंने यह घर अचानक से अवनी को दे दिया? उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। ऊपर से उसकी माँ के सवाल उसे काफी परेशान कर रहे थे। जैसे ही अवनी उस बंगले के अंदर जाने लगी, तब अवनी की माँ बहुत डर गई।
उसने अवनी का हाथ पकड़ लिया और कहने लगी, "नहीं मेरी बेटी, मैं तुझे इस तरह से इस घर में नहीं जाने दूँगी। तुझे मेरे सवालों का जवाब देना होगा। अगर इस घर में जाकर हम हमेशा के लिए कैद हो गए, या किसी ने हमें अगवा कर लिया, या तुझसे किसी तरह की कोई बदतमीज़ी कर दी... नहीं-नहीं बेटा, मैं किसी तरह का कोई रिस्क नहीं ले सकती हूँ। मैं इस तरह से तुझे इस घर के अंदर नहीं जाने दूँगी।"
अभी अवनी और उसकी माँ बातें ही कर रही थीं कि तभी अचानक से वह आदमी फिर से उसके सामने आया और कहने लगा, "अवनी मैडम, ये घर की चाबियाँ हैं। और हाँ, ये नौकरों का स्टाफ़ है। इसमें से जो स्टाफ़ आप रखना चाहें रख सकती हैं और जिसकी छुट्टी करना चाहें कर सकती हैं। इस घर के कागज़ात सब कुछ आपके नाम हो चुके हैं। साथ ही सारी चीजें, पैसे, जेवर हमने अंदर लॉकर में रखवा दिए हैं। और ये लॉकर की चाबी है। आप चेक कर लीजिए। अब आप इजाजत दीजिए।" ऐसा कहकर वह आदमी वहाँ से चला गया।
अवनी हैरत से कभी उस आदमी को जाते हुए देख रही थी, तो कभी अपने हाथ में पकड़े हुए कागज़ात को देख रही थी।
अवनी हैरत से सब कुछ देख और सोच रही थी। उसे खुद समझ में नहीं आ रहा था। और तभी अवनी ने मन ही मन में सोचा, "ये सब कुछ हुआ कैसे? मैं ये सब कुछ जानना चाहती हूँ कि आखिरकार ये सब कुछ हुआ कैसे?"
जैसे ही अवनी ने मन ही मन में ये सोचा, अचानक से उसकी आँखें ऑटोमेटिक बंद होने लगीं, और लास्ट टाइम अवनी को खुद की ही शक्ल दिखाई देने लगी, जब अवनी ने सोचा था कि वह यहाँ से निकलकर कहीं और घर में शिफ्ट होना चाहती है, उसके लिए घर का इंतज़ाम किया जाए। जैसे ही अवनी ने ये सोचा और उसने अपनी आँखें खोलीं, तो उसे समझने में देर नहीं लगी कि ये सब कुछ उसके जिस्म में मौजूद आत्मा ने किया है।
तब अवनी ने मुस्कुराते हुए अपनी माँ को गले से लगा लिया और कहा, "माँ, आपको घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है। ये सब कुछ हमारा है। आप बिल्कुल भी परेशान मत होइए।"
अब उसकी माँ का सब्र जवाब दे गया था। "यार, ये सब कुछ तुम्हारा? कैसे? कोई इतने बड़े घर खरीदने में सालों लगा देता है, जन्मों लगा देता है, और हम तो इतने गरीब हैं कि किराए का घर भी अफ़ोर्ड नहीं कर पाते, तो फिर हम इतना बड़ा घर? इसका किराया कहाँ से देंगे? और ये लोग कह रहे हैं ये घर तुम्हारा है? मुझे तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है।"
अवनी इरिटेट हो चुकी थी। अवनी के पास अब कोई और रास्ता नहीं था, इसीलिए उसने एक-एक करके जो भी उस रात को हुआ था, वो सारी बातें अपनी माँ को बता दीं।
और जैसे ही उसकी माँ ने ये सुना कि उसकी बेटी के पास कोई आत्मा है, तो वह काफ़ी ज़्यादा हैरान हो गई थी। लेकिन उसकी माँ को बिल्कुल भी यकीन नहीं आया था। "नहीं मेरे बच्चे, तू ज़रूर कुछ न कुछ झूठ कह रही है। भला ऐसा भी कुछ हो सकता है? ये भूत-प्रेत, जादू, आत्मा... नहीं-नहीं बेटा, ऐसा कुछ नहीं हो सकता है।"
तभी अवनी ने अपनी माँ से कहा, "माँ, आप मेरी बात का यकीन करें, मैं आपसे जो कुछ भी कह रही हूँ, वो बिल्कुल सच कह रही हूँ। वाकई मेरे जिस्म में आत्मा का निवास है जो हमारी सारी इच्छाएँ पूरी कर रही है। और यकीन मानिए, ये घर खरीदने वाली बात भी मैंने ही उस आत्मा से बोली थी, और इसी आत्मा ने जादू से हमें ये घर खरीद कर दिया था।"
लेकिन उसकी माँ ने इस बात पर यकीन नहीं किया था। "लेकिन अगर आपको मेरी बातों पर यकीन नहीं आ रहा है, तो आप खुद मुझे बताइए कि आपको क्या चाहिए। मैं मन ही मन में वो बात बोलूँगी और मुझे पूरी उम्मीद है वो बात ज़रूर पूरी होगी।"
जैसे ही अवनी ने यह कहा, उसकी माँ उसे हैरत से देखने लगी। क्या अवनी की माँ उसकी बात सच मान लेगी? क्या उन्हें भी अब अवनी की जादू वाली कहानी पर विश्वास होगा?
अवनी ने अपनी माँ से कहा था, "माँ, आप मेरी बात पर विश्वास करें, मैं जो कुछ भी कह रही हूँ, वह सच है।"
वाकई, मेरे शरीर में एक आत्मा का वास है जो हमारी सारी इच्छाएँ पूरी कर रही है। और यकीन मानिए, यह घर खरीदने की बात भी मैंने ही उस आत्मा से कही थी।
और इसी आत्मा ने जादू से हमें यह घर दिला दिया था।
लेकिन उसकी माँ ने इस बात पर यकीन नहीं किया था।
"लेकिन अगर आपको मेरी बातों पर यकीन नहीं आ रहा है, तो आप खुद मुझे बताइए कि आपको क्या चाहिए। मैं मन ही मन में वह बात बोलूँगी और मुझे पूरी उम्मीद है, वह बात ज़रूर पूरी होगी।"
जैसे ही अवनी ने यह कहा, उसकी माँ उसे हैरत से देखने लगी। और वहीं, उसका शराबी पिता शाम को घर आया और किसी को नहीं पाकर हैरान हो गया। उसने चारों ओर अपने परिवार के बारे में पूछताछ की, लेकिन उनका कहीं पता नहीं चला।
कुछ सोचते हुए उसने कहा, "जब मैं तेरे पिताजी के साथ नए-नए शहर में आई थी, तब तेरा छोटा भाई बहुत बीमार पड़ गया था।"
"और तब मैंने अपनी माँ के सोने के कंगन बेच दिए थे। अगर वाकई तुझे लगता है कि तेरे पास ऐसा कोई जादू है जो मेरे वो कंगन वापस दिला सकता है, तो तू मुझे वो कंगन वापस दिला दे।"
जैसे ही अवनी की माँ ने यह कठिन काम अवनी को दिया, अवनी केवल अपनी माँ को घूरती रह गई। वह सोचने लगी, भला इस बोलने वाली आत्मा को कैसे पता कि माँ ने कंगन किस सुनार को बेचे थे, और वहाँ से कंगन कैसे आएंगे?
लेकिन खैर, अवनी को आजमाना था। इसलिए उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और कहने लगी, "मुझे मेरी माँ के वो कंगन चाहिए जो मेरी माँ ने मेरे भाई के बीमार होने पर बेचे थे।"
जैसे ही अवनी ने मन ही मन में यह बोला, देखते-देखते अवनी की माँ के हाथों में कंगन थे। यह देखकर उसकी माँ हैरान हो गई और उसकी आँखों से खुशी के आँसू निकलने लगे।
उसने अपनी बेटी को गले लगा लिया और कहा, "वाकई मेरी तपस्याओं का फल मिल गया है! मैं इतने दिनों से सिर्फ़ ऊपर वाले..."
"ऊपर वाले ने हम पर बहुत बड़ा उपकार किया है। शायद उन्हें हमारी गरीबी पर तरस आया, इसीलिए उन्होंने अपना एक फ़रिश्ता हमारे पास भेजा है।"
तब अवनी और उसकी माँ की आँखों में खुशी के आँसू थे। वे अपनी ज़िन्दगी की एक नई शुरुआत करना चाहते थे, इस जादू के बलबूते पर।
हालाँकि उन्हें इस बात का कोई एहसास नहीं था कि यह जादू उनकी ज़िन्दगी को आगे चलकर कितनी बड़ी मुसीबतों में घेरने वाला था।
अब अवनी और उसकी माँ खुशी-खुशी उस बंगले में चली गईं। और उस बंगले की खूबसूरती देखकर उनकी आँखें चौंधिया गईं। वह एक बहुत ही बड़ा, खूबसूरत बंगला था।
वहाँ ऐशो-आराम का हर सामान मौजूद था। अवनी के घर में पंखा तक नहीं था और वे गर्मियों में बदहाल रहते थे, आज उनके घर में बड़े-बड़े एयर कंडीशनर लगे हुए थे। अवनी हर कमरे को देख रही थी और उसे बहुत अच्छा लग रहा था। वह सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि उसकी ज़िन्दगी इस तरह करवट लेगी। अवनी ने एक बार भी यह जानने की कोशिश नहीं की थी कि आखिरकार जिस आदमी की आत्मा उसके शरीर में थी, वह कौन था और उसकी मदद इस तरह से क्यों कर रहा था।
अवनी को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था और न ही उसने उसके बारे में ज्यादा तहकीकात करने की कोशिश की थी।
जल्दी ही अवनी अपनी माँ का हाथ पकड़कर पूरा बंगला दिखाने लगी। वह उन्हें हर चीज का एहसास करवाना चाहती थी। उसने अपनी माँ को यह भी एहसास दिला दिया था कि किसी घर को चलाने के लिए किसी मर्द की ज़रूरत नहीं होती।
हालाँकि अवनी ने कुछ खास मेहनत नहीं की थी, लेकिन ऊपर वाले ने उस पर कृपा कर दी थी। अवनी बहुत खुश थी। कितनी देर तक वह महँगे सामानों को देखती रही। इतने कीमती सामानों को वह केवल लेने का सपना देखा करती थी।
अब कितना सारा कीमती सामान उसके पास मौजूद था। अवनी जो कुछ भी खरीदना, खाना, पहनना चाहती थी, हर तरह के कपड़े, हर तरह का खाना, हर तरह के जेवर-गहने, सब कुछ उसने उस जादू द्वारा मँगवा लिया था।
अवनी, उसकी माँ और उसका भाई, तीनों बहुत खुश थे और ऐशो-आराम से ज़िन्दगी बिताने लगे थे।
अवनी को नए घर में तीन दिन से ज़्यादा हो चुके थे, और इन तीन दिनों में उन्होंने जी भरकर इंजॉय किया था। जो कुछ खाना चाहते थे, खाया; जो कुछ पीना चाहते थे, पिया; जो चाहते थे, वो किया।
तभी एक रात, अवनी गहरी नींद में सोई हुई थी। अवनी को होश नहीं था, अचानक वह अपने आप ही अपनी अलमारी खोलने लगी। अलमारी खोलकर उसने जल्दी से काले रंग के कपड़े पहन लिए और एक चाकू अपनी जेब में रख लिया।
अवनी के चेहरे पर कोई भाव नहीं था। वह अजीब सा बर्ताव कर रही थी।
अवनी जल्दी ही उस बंगले से बाहर निकल गई और सड़कों पर बदहवास सी हालत में चलने लगी। उस वक़्त रात के 2:00 बज रहे थे और सड़कों पर कुछ खास लोग नहीं थे। सिर्फ़ दो-चार ट्रक ही गुज़र रहे थे। अवनी बदहवास सी हालत में आगे बढ़ती जा रही थी। उसे किसी तरह का कोई होश नहीं था।
तभी अचानक अवनी एक बड़े बंगले में पहुँच गई। कमाल की बात यह थी कि जिस बंगले को हमेशा सिक्योरिटी वाले घेरे रहते थे, आज उसमें कोई भी सिक्योरिटी मौजूद नहीं थी। और किसी ने अवनी को रोकने की कोशिश नहीं की। ऐसा लग रहा था कि अवनी किसी को दिखाई ही नहीं दे रही थी।
जल्दी ही अवनी उस बंगले के अंदर सो रहे एक बड़े, ज़बरदस्त आदमी के सामने थी। अवनी ने उस आदमी को अच्छी तरह देखा और अगले ही पल उसने अपने साथ लाए चाकू से उस आदमी पर वार कर दिए।
जब उसे इस बात का यकीन हो गया कि उस आदमी की जान जा चुकी है, तब अवनी उसी हालत में वापस अपने घर आ गई और अपने बिस्तर पर सो गई।
अवनी ने जिस आदमी का क़त्ल किया था, वह कोई आम आदमी नहीं था, बल्कि वह शहर का एमएलए, रणजीत सिंह था। एमएलए रणजीत सिंह की उसी के घर में, उसी के बिस्तर पर सोते हुए बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। लेकिन किसी को इसके बारे में दूर-दूर तक कोई एहसास नहीं था कि उसकी हत्या एक मामूली सी दिखने वाली, बेहद खूबसूरत लड़की अवनी ने की थी।
अगली सुबह, जैसे ही अवनी ने अपनी आँखें खोलीं, उसने अपने आप को काले कपड़ों में देखकर हैरान हो गई। जैसे ही उसने अपने शरीर पर लगे खून के छींटों को देखा, उसकी हालत खराब होने लगी। एक बड़ा सा चाकू उसके बिस्तर के पास रखा हुआ था। अवनी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर चाकू कहाँ से आया था और यह खून...?
अवनी के चेहरे पर पसीना आने लगा। उसे अजीब सी फीलिंग आ रही थी, लेकिन उसे कुछ भी याद नहीं था कि कल रात वह कहाँ गई थी और उसने क्या किया था। उसका सिर भारी हो चुका था। ज़्यादा न सोचते हुए, वह जल्दी से बाथरूम में घुस गई।
उसने खून लगे कपड़ों को साफ़ करना शुरू कर दिया और चाकू को डस्टबिन में फेंक दिया। यह सारा काम अवनी का दायाँ हाथ अपने आप कर रहा था। अवनी को कुछ भी सोचने-समझने का मौक़ा नहीं मिल रहा था।
खून साफ़ करने के बाद, अवनी एकदम नॉर्मल हो गई थी। ऐसा लग रहा था मानो वो खून किसी और ने साफ़ किया हो। लेकिन कहीं कुछ न कुछ उसे याद आ गया था जिसके बारे में वह सोच रही थी।
वह साफ़-सुथरे, उजले कपड़े पहनकर नीचे आ गई।
जैसे ही अवनी नीचे आई, उसके दिलो-दिमाग में कशमकश चल रही थी। उसे यकीन नहीं आ रहा था कि आखिर उसके कपड़े खून से क्यों सने हुए थे। क्या वह वाकई खून था या कुछ और?
रिमझिम को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। नीचे आने के बाद, जैसे ही अवनी ने अपनी माँ को देखा, उसकी माँ आराम से बैठकर अंगूर के गुच्छे खा रही थी और उसने एक महँगी साड़ी पहन रखी थी। वहीं, उसका भाई एक महँगा वीडियो गेम खेल रहा था। अवनी उन दोनों को देखकर बहुत खुश हो गई।
जल्दी ही वह खून वाली बात को भूलकर अपने परिवार के साथ बैठकर बातें करने लगी और सोचने लगी कि उन्हें आगे क्या करना चाहिए, क्या और जादू से मँगवाना चाहिए। उसके भाई ने अपना वीडियो गेम बंद करके एक बड़ी एलईडी टीवी ऑन कर दी।
जैसे ही टीवी ऑन हुई, उस पर सबसे पहले न्यूज़ में खबर दिखाई गई कि शहर के सबसे प्रसिद्ध एमएलए साहब, एमएलए रणजीत जी की बेरहमी से कल रात हत्या कर दी गई है, और एमएलए के शरीर पर 26 बार चाकुओं से वार किया गया था। जैसे ही अवनी ने यह खबर सुनी, उसके माथे से पसीना निकलने लगा।
क्या होगा जब अवनी को पता चलेगा कि यह खून उसने ही किया है? आखिर कौन थी वो आत्मा जो अवनी का इस्तेमाल करके मर्डर कर रही थी?
उसके भाई ने अपना वीडियो गेम बंद करके हाल में रखे बड़े, शानदार एलईडी टीवी को चालू कर दिया था।
जैसे ही टीवी चालू हुआ, सबसे पहले न्यूज़ में दिखाई गई खबर थी कि शहर के सबसे प्रसिद्ध एमएलए, रणजीत जी की, कल रात बेरहमी से हत्या कर दी गई थी।
एमएलए के शरीर पर चाकुओं से 26 वार किए गए थे। जैसे ही अवनी ने यह खबर सुनी, उसके माथे से पसीना निकलना शुरू हो गया।
फिर, धुंधली-धुंधली, उसे कल रात की अपनी हालत और पास रखा चाकू याद आया। अवनी को डर लगने लगा कि कहीं यह खून उसने तो नहीं किया है। लेकिन एमएलए का खून वह क्यों करती?
उसका एमएलए से क्या लेना-देना? हाँ, कॉलेज में कुछ लड़कों-लड़कियों, दिव्या और वीर ने, अवनी को परेशान किया था। अगर उसे खून करना ही होता, नींद में भी, तो उनका खून कर देती। या फिर अपने शराबी बाप का। उसका एमएलए से क्या लेना-देना हो सकता था?
यह सोचकर, अवनी ने अपनी सोच को झटक दिया और बेख़ौफ़ होकर बाकी न्यूज़ चैनल और मूवीज़ देखने लगी।
सारा दिन अवनी ने आराम किया, अपनी माँ और भाई के साथ समय बिताया, भाई के साथ थोड़ा खेला। आज उसके मन में कोई इच्छा नहीं जगी कि वह जादू से कोई नया सामान मँगवाए या कुछ करे, क्योंकि उसके पास पहले से ही सारा सामान मौजूद था: महंगे जेवर, सामान, गाड़ियाँ, बंगला। उसे और क्या चाहिए था?
लेकिन अवनी को इस बात का एहसास नहीं था कि कल को अगर यह जादू उसके पास नहीं रहेगा, तो घर का गुज़ारा कैसे चलेगा? उसके पास कोई काम नहीं था, न ही उसने कभी काम करने के बारे में सोचा था। वह अपनी ज़िन्दगी को एन्जॉय करने में मसरूफ़ थी।
चार-पाँच दिन अवनी ने मौज-मस्ती करते हुए गुज़ार दिए। जब भी उसे कुछ खाना-पीना होता, वह जादू से बोल देती, और ढेर सारा खाना उसके सामने आ जाता। वह खाना सबसे फ़ेमस होटलों जैसा स्वादिष्ट होता था।
पाँचवाँ दिन था, अवनी आराम से सोई हुई थी। अचानक वह उठी, कपड़े बदले, और एक बड़ा सा चाकू हाथ में लेकर, बदहवास सी हालत में सड़कों पर निकल पड़ी।
अवनी को कुछ होश नहीं था कि वह कहाँ जा रही है। उन चार-पाँच दिनों में उसने इतनी मौज-मस्ती की थी कि उसने खून और चाकू वाली घटना को पूरी तरह भुला दिया था।
लेकिन आज फिर अवनी चाकू लेकर सड़कों पर बदहवास सी हालत में निकल पड़ी थी। इस बार वह शहर के एक बड़े पुलिस अधिकारी, असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ़ पुलिस (एसीपी) के घर पहुँच गई थी।
वहाँ जाकर उसने एसीपी को एक औरत के बगल में लेटा देखा। औरत के जिस्म पर एक भी कपड़ा नहीं था, एसीपी भी नग्न था, औरत से चिपका हुआ सोया हुआ था।
अवनी ने आगे बढ़कर एक हाथ से एसीपी का मुँह दबा दिया, और दूसरे हाथ में लिए चाकू से, लेटे-लेटे ही, उस औरत पर लगातार 30-40 वार कर दिए।
देखते ही देखते एसीपी की भयानक मौत हो गई। अवनी जैसे गई थी, वैसे ही वापस आकर अपने बिस्तर पर लेट गई।
अगली सुबह जब अवनी की आँख खुली, उसने खुद को खून से लथपथ कपड़ों और पास में एक बड़ा सा चाकू पाया। उसकी हैरानी का कोई ठिकाना नहीं था।
चाकू हाथ में लेकर वह थर-थर काँपने लगी। पहली बार उसकी यादें धुंधली थीं, लेकिन अब दूसरी बार ऐसा होना कोई आम बात नहीं थी।
डरते-डरते अवनी उठी, कपड़ों पर लगा खून साफ़ किया, चाकू डस्टबिन में फेंककर, सीधे नीचे हाल में अपनी माँ के पास चली गई।
अवनी ने अपने चेहरे के डर को छिपा लिया, क्योंकि उसे खुद कुछ नहीं पता था, न ही कुछ याद था। तो वह अपनी माँ को क्या बताती?
नीचे जाकर उसने देखा कि उसकी माँ उसके लिए नाश्ता बना रही थी।
"मॉम, आपको नाश्ता बनाने की क्या ज़रूरत थी? हम जादू से भी तो मँगवा सकते थे नाश्ता," अवनी ने हैरान होकर कहा।
उसकी माँ ने हल्का मुस्कुराते हुए, अवनी के सर पर हाथ रखते हुए कहा, "तुम जानती हो बेटी, पूरे सात दिनों से न मैंने कोई काम किया है, न कोई बात सोची है, न टेंशन ली है। न पैसों की टेंशन है। इन सात दिनों में, जो इतने दिनों से मैं मुश्किलों का सामना करती आई थी, वह दिन बड़ी आसानी से कट गए। लेकिन यह खुशी के दिन...जिसमें मैं कोई काम नहीं कर रही हूँ, मेरे पास पैसों की कोई कमी नहीं है, नौकर-चाकर की लाइन लग जाए, लेकिन अवनी, अब नहीं पता क्या हुआ है, ये दिन काटना मेरे लिए मुश्किल हो रहे हैं। मुझसे ये दिन नहीं कट रहे हैं। आखिरकार कितना आराम करूँ? मैं बिस्तर पर बैठकर आराम कर चुकी हूँ, सारा दिन टीवी देख चुकी हूँ, एक से एक महंगी साड़ियाँ पहन चुकी हूँ, एक से एक महंगे जेवर पहन चुकी हूँ, लेकिन क्या करूँ अवनी, उनसे मेरा टाइम पास ही नहीं हो रहा है। अब तो मुझे अपनी पुरानी ज़िन्दगी याद आने लगी है, जो आज से ठीक दस दिन पहले की थी। मैं रोज सुबह उठकर पूरे घर का काम करके लोगों के घरों में काम करने जाती थी, शाम को आती थी, और फिर थककर कब सो जाती थी, पता ही नहीं चलता था। और पूरा दिन यूँ गुज़र जाता था। लेकिन अब, अब तो मुझे नींद भी आनी बंद हो गई है। अवनी, यह ऐशो-आराम मुझे रास नहीं आ रहा है।"
अवनी भी हैरान हो गई। वह भी अपनी ज़िन्दगी के बारे में सोचने लगी कि आखिर उसकी ज़िन्दगी कहाँ जा रही है, और ऊपर से वह खून, वह सब क्या था?
वह अपनी माँ के पास जाकर उसका हाथ पकड़ कर बैठ गई।
"शायद आप जो कुछ कह रही हैं, वह ठीक कह रही हैं। हमें इस तरह ऐशो-आराम में नहीं डूब जाना चाहिए कि हम अपनी असली पहचान ही भूल जाएँ। हम कहाँ रह रहे हैं, क्या कर रहे हैं, क्या खा रहे हैं, हमारा तो किसी से कोई मतलब ही नहीं है। हमारा बाहर की दुनिया से भी कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन भाई सारा दिन वीडियो गेम में घुसा रहता है, इस तरह से तो उसका दिमाग ही खराब हो जाएगा।"
अवनी थोड़ी सीरियस हो गई थी, क्योंकि सात दिन का आराम उसके जिस्म और दिमाग से निकल चुका था।
तभी अवनी ने देखा कि एक बार फिर एलईडी स्क्रीन पर उस शहर के फ़ेमस एसीपी की डेड बॉडी दिखाई जा रही थी। बताया जा रहा था कि कल रात एसीपी रंधावा की चाकू घोंपकर हत्या कर दी गई है, और उसके जिस्म पर 38 वार पाए गए हैं।
यह देखकर अवनी के हाथ में कंपन होने लगा। उसे अजीब सा लगने लगा, क्योंकि उसे एहसास होने लगा कि कहीं यह खून उसने तो नहीं किया है। लेकिन वह भला इन लोगों का खून क्यों करेगी? उसका तो इनसे कोई जान-पहचान नहीं है। तभी अवनी का ध्यान अपनी बाजू पर गया। उसे ऐसा लग रहा था मानो वह न्यूज़ देख रही हो।
अवनी ने अपना एक हाथ उस बाजू पर रख दिया और मन ही मन में कहा, "कहीं इन खूनो से तुम्हारा तो कोई लेना-देना नहीं है?"
जैसे ही अवनी ने यह कहा, अचानक एक आवाज़ उसके कानों में गूँजी, "हाँ, यह खून मैंने ही किया है।"
"क्या?!", अवनी की हैरानी का कोई ठिकाना नहीं था। आखिर कौन थी यह आत्मा जो उसके अंदर घुसकर किसी का खून करवा रही थी?
अवनी बेचैन हो गई थी, और उसे बहुत डर लगने लगा था। जहाँ वह ऐशो-आराम, दौलत, माल और बंगले देखकर खुश हो रही थी, वहाँ अचानक उसे हर चीज से डर लगने लगा था। वह अपनी माँ को कुछ बताने ही वाली थी कि एक बार फिर वह आवाज़ सुनाई दी।
"मेरी बात कान खोलकर सुन लो। अपनी माँ को, या किसी और को भी, इसके बारे में बताने की कोशिश मत करना। क्योंकि खून भले ही मैंने किया है, लेकिन खून तुम्हारे हाथों से हुए हैं।"
वह ऐशो-आराम में यह सब भूल चुकी थी कि उस वक़्त उसके जिस्म में एक आत्मा है, जिसे उसने खुद ही अपने जिस्म में आने के लिए कहा था। वह आत्मा तो एक घड़ी के अंदर थी। अवनी बहुत हैरान और परेशान हो गई थी। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर उसके साथ क्या हो रहा था।
डर के मारे वह अपनी माँ को कुछ बताए बिना सीधे अपने कमरे में चली गई, कमरे में खुद को बंद कर लिया, और अजीब सी नज़रों से चारों तरफ़ देखने लगी। आज जो महँगा सामान देखकर अवनी खुश हुआ करती थी, वह आज उसे डसने के लिए तैयार लग रहा था। हर सोफ़े, बिस्तर, यहाँ तक कि अलमारी में, उसे एक बड़ा सा नाग बैठा हुआ दिखाई दे रहा था।
अवनी की हालत बहुत ख़राब हो गई थी, और डर के मारे वह थर-थर काँपने लगी थी।
आखिर कौन थी यह आत्मा, और क्यों कर रही थी यह खून? क्या होगा अवनी का? जानने के लिए बने रहिए दोस्तों।
डर के मारे, वह अपनी माँ को बिना कुछ बताए सीधा अपने कमरे में चली गई थी। अपने कमरे में जाकर उसने अपने आप को बंद कर लिया था और कमरे में अजीब सी नज़रों से चारों तरफ़ देखने लगी थी।
आज जो महँगा सामान देख-देख कर अवनी हर रोज़ खुश हुआ करती थी, आज वह महँगा सामान ऐसा लग रहा था मानो उसे डसने के लिए तैयार था।
हर एक सोफ़े में, बेड में, यहाँ तक कि अलमारी में भी उसे एक बड़ा सा नाग बैठा हुआ दिखाई दे रहा था।
अवनी की हालत बहुत ही ज़्यादा खराब हो गई थी और डर के मारे थर-थर काँपने लगी थी।
अवनी को अब काफी ज़्यादा अजीब सा लगने लगा था। उसे लगने लगा था कि ज़रूर उसके साथ कुछ न कुछ बड़ा क्राइम हो रहा है और कुछ न कुछ तो उसके साथ ऐसा हो रहा है जिसके बारे में उसे किसी बात का कोई एहसास नहीं था।
तभी अचानक अवनी को अपनी बाज़ू में कुछ दर्द का एहसास हुआ था और फिर उसने जल्दी से अपने दूसरे हाथ से उस बाज़ू को छू लिया था और कहने लगी थी,
"क्या यह सब कुछ तुम तो नहीं कर रहे हो? सही बताओ, कौन हो तुम? मुझे जवाब दो, कौन हो तुम? यह सब क्या हो रहा है मेरे साथ? मेरे हाथों से दो-दो खून हो गए हैं, वह भी इतने बड़े-बड़े लोगों के! मुझे क्या हो रहा है?"
"कौन हो तुम? फिर तुम मुझे फँसाना तो नहीं चाहते हो? क्या तुम किसी की जान तो नहीं लेना चाहते हो?"
"क्योंकि मैंने बहुत सारी मूवीज़ में देखा है, वहाँ पर किसी ने किसी के साथ कुछ बुरा होता है या उसकी जान चली जाती है, तो वह आत्मा बनकर किसी के शरीर में घुसकर उससे मर्डर करवाते हैं।"
"कहीं तुम तो मुझे यह नहीं करवा रहे हो? बोलो, जवाब दो मुझे, कौन हो तुम?"
आख़िरकार ऐसा कहकर वह बड़ी ही बुरी तरह से चीखने-चिल्लाने लगी थी। उसके चीखने-चिल्लाने की आवाज़ सुनकर उसकी माँ उसके पास आ गई थी और कहने लगी थी,
"क्या हुआ मेरे बेटी को? इस तरह से क्यों चीख रही है? क्यों चिल्ला रही है?"
अवनी की हालत काफी ज़्यादा बुरी थी और वह कहने लगी थी,
"माँ, वह खून मैंने किये हैं! वह दो दिन से जिनकी मर्डर की खबर टीवी पर दिखाई जा रही है, वह खून मैंने किये हैं और इस आत्मा ने मुझसे वह खून करवाए हैं।"
जैसे ही उसकी माँ ने यह सुना, वह पूरी तरह से चौंक गई थी और कहने लगी थी,
"यह क्या कह रही है रिमझिम? तू जानती भी है तो यह क्या कह रही है?"
तभी अवनी ने एक बार फिर अपनी माँ की ओर देखते हुए कहा था,
"माँ, मैं जो कुछ कह रही हूँ, मैं बिल्कुल सच कह रही हूँ।"
"उस पुलिस वाले की जान, इतना ही नहीं, वह इतने बड़े अधिकारी की जान, सिर्फ़ और सिर्फ़ मैंने ही ली है। आपको मेरी बात का यकीन करना ही होगा।"
तभी उसकी माँ भी काँपने लगी थी और कहने लगी थी,
"मैं तुझे कहती थी ना, कुछ भी चीज़ दुनिया में फ्री में नहीं मिलती है! ज़रूर कुछ न कुछ तो गड़बड़ है!"
"और भला एक आत्मा ने तुझे इस तरह से अपने झांसे में कैसे ले सकती है? और मैं ही पागल थी, मैं ही बेवकूफ़ थी जो तेरी बातों में आ गई! इससे अच्छा तो मैं तेरा इलाज करवाती, किसी से इस आत्मा से तेरा पीछा छुड़वाने के लिए ले जाती!"
"इस आत्मा को मुक्त करवा देती! यह कोई भटकती हुई आत्मा है जो रात के अंधेरे में तेरे ऊपर हावी हो गई है।"
"अब यह तेरी जान ले लेगी या किसी दूसरों की जान ले लेगी, यह हमें नहीं छोड़ेगी।"
ऐसा कहकर उसकी माँ भी अब पूरी तरह से रोने लगी थी और कहने लगी थी,
"हमें इस तरह के ऐशो-आराम की चकाचौंध में नहीं आना चाहिए था। हमें दिमाग से काम लेना चाहिए था, लेकिन हमें ये पैसे, दौलत, यह सब कुछ चीज़ों को देखकर बुरी तरह से बर्ताव नहीं करना चाहिए था। हमें सोच-समझकर काम लेना चाहिए था।"
"और मैं भी तुम्हारे चक्कर में आ गई, जो है इन सब चीज़ों की जगह चुन में पूरी तरह से डूब गई। और उनके अंजाम के बारे में नहीं सोचा। आख़िरकार कौन हो सकता है यह आत्मा? मुझे किसका तुमसे खून करवा रही है?"
किसी को कुछ भी, उन दोनों माँ-बेटी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। तभी अचानक से उसे कमरे में अजीब सी दहाड़ने की आवाज़ सुनाई देने लगी थी, मानो कोई शेर दहाड़ रहा हो।
अब तो वह दोनों माँ-बेटी पूरी तरह से डरने लगी थीं और जल्दी से अवनी की माँ उससे बोली थी,
"अवनी बेटा, मुझे लगता है कि यह बुरी आत्मा हमारी किसी भी पल यहाँ जान ले लेगी। हमें इसी वक़्त यहाँ से जाना होगा और अपनी जान बचाने होगी। तो जल्दी चल, यहाँ से चलो!"
अपनी माँ की बात सुनकर अवनी ने भी हाँ में सर हिला दिया था और दोनों माँ-बेटी जैसे ही कमरे से निकलकर नीचे हॉल में आईं और वहाँ से उन्होंने अपने भाई को उठाया और तीनों के तीनों एक-दूसरे का हाथ पकड़कर जैसे ही उस घर से बाहर निकलने के लिए उस दरवाज़े की ओर भागे, अचानक से उस घर के दरवाज़े अपने आप ही जोरों से बंद हो चुके थे।
अवनी अब काफी ज़्यादा सहम गई थी और परेशान हो गई थी। इतना ही नहीं, उसके चेहरे से पसीना निकलना शुरू हो गया था और वह जोरों से दरवाज़ा पीटने लगी थी।
"खोलो! कोई है! बचाओ! बचाओ! कोई है! दरवाज़ा खोलो! हमें यहाँ से निकलना है! हम यहाँ पर फँस गए हैं! कोई तो हमारी बात सुन लो! कोई तो हमारी मदद करो! कोई तो मदद करो!"
ऐसा कहकर अवनी पूरी तरह से चिल्लाने लगी थी, लेकिन वह दरवाज़ा बिल्कुल भी नहीं खुल रहा था, बल्कि उस आत्मा की आवाज़ वहाँ गूँजने लगी थी,
"तुम लोग कहीं नहीं जाओगे! तुम लोग कहीं नहीं जाओगे! तुम लोग यहाँ से कहीं नहीं जाओगे!"
वह बिल्कुल सीन ऐसा था जो बेहद डरावना लग रहा था। अवनी और उसकी माँ काफी ज़्यादा डर गई थीं। उन्हें लगने लगा था कि आज जैसे उनका आख़िरी दिन है।
अब अवनी का सब्र जवाब दे गया था और वह जोरों से चिल्लाने लगी थी। तभी अचानक, जब अवनी का सब्र जवाब दे गया, तब वह जोरों से चीखने-चिल्लाने लगी थी और कहने लगी थी,
"आख़िरकार कौन हो तुम और क्या चाहते हो? अगर तुमने हमें यहाँ से जाने नहीं दिया तो हम लोग अपनी यहीं इसी वक़्त जान ले लेंगे।"
अवनी को अब लगने लगा था कि या तो इस घर में घुटकर मर जाएँगी, तो इससे अच्छा है कि वह खुद अपनी जान ले ले। तो यह सोचते हुए अवनी ने जल्दी ही टेबल पर रखा हुआ एक चाकू उठा लिया था और अपनी गर्दन पर रख लिया था और कहने लगी थी,
"अगर तुम हमें यहाँ से नहीं जाने दोगे तो हम अभी इसी वक़्त अपनी जान ले लेंगे! वैसे भी, जब तक हम ज़िंदा रहेंगे, तुम हमारे जिस्म का इस्तेमाल करोगे।"
जैसे ही अवनी ने इस तरह की धमकी दी, अचानक से उस घर में जो तूफ़ान आया हुआ था, वह बिल्कुल थम सा गया था और चारों तरफ़ एक सन्नाटा सा पसर गया था। और तभी वहाँ पर एक बड़ी ही धीमी आवाज़ गूँजी थी,
"ठहरो।"
"तुम्हें अपने आप को कुछ भी नुकसान पहुँचाने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैं तुम्हें और किसी तरह से परेशान नहीं करूँगा। यह बात सच है कि मैंने ही उन दोनों आदमियों की तुम्हारे जिस्म के द्वारा मदद लेकर उनकी जान ली है और इतना ही नहीं, मैं तीन लोगों को और मारना चाहता हूँ।"
जैसे ही अवनी ने यह सुना, वह हैरान हो गई थी। अचानक से उसके हाथ-पैर काँपने लगे थे और अचानक से अवनी ने जोरों से चीख मारी थी और कहने लगी थी,
"आख़िरकार क्यों? क्यों तुमने उन लोगों की जान ली है? ऐसा क्यों करना चाहते हो तुम? तो तुमने मेरा इस्तेमाल क्यों किया? क्यों मुझे दुनिया भर की खुशियाँ देकर इस तरह से बर्बाद कर दिया? इस तरह से मुझे तुमने खूनी बना दिया है! खूनी! आख़िरकार तुम ऐसा कैसे कर सकते हो?"
अवनी जोरों से चीख रही थी, चिल्ला रही थी, क्योंकि उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस चकाचौंध में वह पूरी तरह से डूब चुकी थी, वह चकाचौंध उसे खूनी बना देगी। तभी अचानक अवनी ने देखा कि उस हाल में जितनी भी लाइट जली हुई थीं, अचानक सब की सब बंद हो गई थीं और उस एलईडी में, जो कि बड़े से हॉल में लगी हुई थी, एक अलग ही तरह की मूवी चलने लगी थी।
जैसे ही अवनी ने यह देखा, उसमें साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा था कि अवनी ने किस तरह से बड़ा सा चाकू हाथ में लिया और सड़कों पर बदहवास सी हालत में, एकदम काले कपड़ों में कहीं जा रही थी और उसे कोई देख भी नहीं पा रहा था। और जैसे ही अवनी उस एमएलए को मारने के लिए गई और उसने बड़ी ही बेरहमी से उसके पेट में चाकू घोंप दिया, जैसे ही अवनी और उसकी माँ ने अपनी आँखों से सब कुछ देखा, तो उन दोनों माँ-बेटियों ने जोरों से चीख मार दी थी। और इसी तरह से उस आत्मा ने अवनी को यह भी दिखाया था कि किस तरह से अवनी ने उस एसीपी, यानी कि असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ़ पुलिस की जान ली थी और उसने लगातार कितने ही सारे उस पर भी वार कर दिए थे।
जैसे ही अब अवनी ने यह देखा, उसकी तो जान सूखने लगी थी और उसे अपने से काफी ज़्यादा नफ़रत सी होने लगी थी और वह सोचने लगी थी कि आख़िरकार वह ऐसा कैसे कर सकती है? वह भला इस तरह से इन लोगों को इतनी बुरी तरह से कैसे मार सकती है, जबकि उसने तो किसी का कुछ भी नहीं बिगाड़ा है। कहीं न कहीं अवनी को बहुत ही ज़्यादा गुस्सा आ रहा था और साथ ही साथ अपने आप को काफी ज़्यादा बेबस महसूस करने लगी थी।
और तब अपनी नज़रों से चीखने-चिल्लाने लगी थी और कहने लगी थी,
"आख़िर तुम हो कौन और क्या क्यों कर रहे हो यह सब कुछ मेरे साथ? मैंने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा?"
जैसे ही अवनी ने इस तरह से जोरों से चीखते-चिल्लाते हुए सब कहा, तब अचानक अवनी को एलईडी में एक बड़ा सा महल जैसा घर दिखाई देने लगा था। उसकी माँ और अवनी और साथ ही साथ उसका भाई, तीनों वहीँ दूसरे का हाथ थामे हुए, उस बड़े से महल-नुमा घर को देखने लगे थे।
अवनी और उसका भाई और उसकी माँ अपने उस बंगले की स्क्रीन पर लगे उस घर को देखने लगी थीं। कहीं न कहीं अब अवनी दिल थाम कर सारा मंज़र देख रही थी। उसे पूरे का पूरा यकीन था, कुछ न कुछ तो ऐसा था जो उसके सामने आने वाला था और वैसे भी वह इस बात का कारण ही पता नहीं लगा पा रही थी। अचानक से उसके साथ और उसके हाथों से यह खून क्यों करवाए थे? तो कहीं न कहीं अवनी इस बात को लेकर बहुत ही ज़्यादा परेशान थी, लेकिन शायद आज उसके सवालों के जवाब मिलने वाले थे।
अवनी ने देखा कि उस महल-नुमा घर में एक बड़े ही बुज़ुर्ग से आदमी गार्डन में टहल रहे थे, और उनके सामने तीन से चार नौकर सर झुकाए खड़े हुए थे। अवनी, उसकी माँ और उसके भाई को यही लग रहा था मानो कि किसी बहुत बड़ी मूवी की स्क्रीन उनके सामने चल रही हो। सब लोग बड़े ही ध्यान से टीवी देख रहे थे। उन्होंने उसमें देखा कि एक दादाजी बड़े ही गुस्से से इधर-उधर टहल रहे थे और कितने ही सारे नौकर उनके सामने खड़े हुए थे। और दादा जी खूब तेज चिल्लाकर बोले थे,
"मेरे पोते को बुलाओ! क्या तुम लोगों को सुनाई नहीं दे रहा है? जब तक मेरा पोता मेरी आँखों के सामने नहीं आएगा, जब तक मेरा पोता खुद अपने हाथों से आकर मुझे खाना नहीं खिलाएगा, तब तक मैं कुछ भी नहीं खाऊँगा।"
आख़िरकार कौन था यह दादा और कौन था इसका पोता? और आख़िरकार अवनी के शरीर में आई आत्मा अवनी को क्या दिखाना चाह रही थी? और ऐसा कौन सा राज था जिसके ऊपर से पर्दा हटने वाला था? जानने के लिए बने रहिए दोस्तों।
अवनी, उसकी माँ और उसका भाई, ऐसा लग रहा था मानो किसी बहुत बड़ी मूवी की स्क्रीन उनके सामने चल रही हो। सब लोग बड़े ही ध्यान से टीवी देख रहे थे। उन्होंने देखा कि एक दादाजी बड़े ही गुस्से से इधर-उधर टहल रहे थे और कितने ही नौकर उनके सामने खड़े हुए थे।
और दादाजी खूब तेज चिल्लाकर बोले, "मेरे पोते को बुलाओ! क्या तुम लोगों को सुनाई नहीं दे रहा है? जब तक मेरा पोता मेरी आँखों के सामने नहीं आएगा, जब तक मेरा पोता खुद अपने हाथों से आकर मुझे खाना नहीं खिलाएगा, तब तक मैं कुछ भी नहीं खाऊँगा।"
"इतना ही नहीं, मैं अपनी दवाइयाँ तक नहीं खाऊँगा।"
जैसे ही ७० साल के बुजुर्ग की ऐसी जिद देखी, अवनी के होठों पर मुस्कुराहट आ गई। और वह जहाँ उस स्क्रीन को देखते हुए डर रही थी, धीरे-धीरे उसका डर कम होने लगा और वह बड़े ही ध्यान से उसे देखने लगी। लेकिन तभी...
लेकिन तभी अचानक से वहाँ पर एक बड़े ही स्टाइलिश और खतरनाक ओरा के साथ एक इंसान आ रहा था। सबसे पहले उसे इंसान के महंगे, ब्रांडेड जूते दिखाई दिए, उसके बाद धीरे-धीरे उसे इंसान का स्टुअर्ट ह्युजेस का डायमंड एडिशन सूट (जो कि दुनिया का सबसे महंगा सूट है) पहना हुआ दिखाई दिया। उस इंसान का ओरा उस पॉवरफुल, हल्के नीले रंग के कोट में बड़ा ही जबरदस्त लग रहा था। ऐसा लग रहा था मानो कहीं किसी स्टेट का कोई राजकुमार हो। कितनी देर तक अवनी उस इंसान की खूबसूरती में खोई रही। बेसिकली, लड़कियों की खूबसूरती देखकर लड़के इम्प्रेस हो जाया करते थे, लेकिन यहाँ आज उल्टा हो गया था। जैसे ही अवनी ने उस पॉवरफुल इम्पैक्ट वाले इंसान को देखा, उसके दिल में अजीब सी धड़कन होने लगी, और उसने अपने दाएँ हाथ से अपने दिल को छुआ। उसे खुद नहीं पता था यह क्या था, लेकिन उसकी धड़कनें काफी ज्यादा तेज हो गई थीं।
वह इंसान जल्दी ही उस बूढ़े आदमी के सामने आकर खड़ा हो गया और कहने लगा, "क्यों करते हैं आप ऐसा दादाजी? आप अच्छी तरह से जानते हैं कि मैं आपसे कितना प्यार करता हूँ और मैं आपको किसी भी तरह से किसी भी मुसीबत में नहीं देख सकता हूँ। तो फिर क्यों आप बार-बार अपने आप को तकलीफ देते हैं? आखिर क्यों आप टाइम से अपनी दवाई और खाना नहीं खाते हैं?"
तभी उसके दादा ने उसकी तरफ से मुँह फेर लिया और कहने लगे, "मैं तेरी एक भी बात नहीं सुनना चाहता हूँ। तू भी इसी वक्त चला जा यहाँ से। मुझे तेरी कोई बात नहीं सुननी है। क्या तू भूल गया कि तूने मुझसे वादा किया था कि तू आज शाम को मुझे अपने साथ कहीं घुमाने लेकर जाएगा? इतना ही नहीं, शाम को हम मूवी देखेंगे, उसके बाद हम आइसक्रीम खाएँगे, और मस्ती करेंगे, लेकिन नहीं, तुझे तो हर वक्त सिर्फ काम, काम, काम। इस काम के चक्कर में तू जिंदगी जीना भी भूल गया है। बिल्कुल पैसे कमाने वाली मशीन बन गया है। आखिर क्या करेगा इतनी दौलत का? इतना पैसा, माल, दौलत, तेरे पास इतनी ज्यादा है कि तू पूरा किसी भी एक देश को पूरे का पूरा खरीद सकता है, तो फिर तुझे जरूरत क्या है कितनी ज्यादा और दौलत कमाने की?"
अपने दादाजी की बात सुनकर उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कुराहट आ गई। बेसिकली, यश बहुत ही कम मुस्कुराया करता था, लेकिन जब भी वह अपने दादा के पास हुआ करता था, ऑटोमेटिक वह अपने आप को थोड़ा नॉर्मल दिखाने की कोशिश किया करता था। हालाँकि, यश बिल्कुल भी नॉर्मल नहीं था। वेल, जैसे ही उसके दादा ने उससे इतनी सारी शिकायत की, वह उनके पास खड़ा होकर उनके कंधों को छूकर कहने लगा, "मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि आप कहना क्या चाहते हैं, लेकिन आप शायद भूल रहे हैं, मेरी एक बहुत इम्पॉर्टेन्ट मीटिंग थी। इसके लिए मुझे जाना पड़ा। लेकिन आप समझते क्यों नहीं हैं? बच्चों की तरह हर वक्त जिद क्यों करते हैं? मैं हर वक्त बच्चों की तरह आपके साथ नहीं रह सकता हूँ, हर वक्त आपके साथ नहीं घूम सकता हूँ, तो फिर क्यों आप बार-बार मुझे इस तरह से इमोशनल ब्लैकमेल करते हैं?"
यश की बात सुनकर उसके दादा का मुँह पूरी तरह से फूल गया था। उनकी आँखों के किनारे भीग गए थे। ऐसा लग रहा था मानो यश के दादा की आँखों में इतने सारे सवाल थे, इतनी सारी बातें थीं जिन्हें वह अपने पोते यश ओबरॉय से करना चाहते थे। लेकिन, अपने पोते की इस तरह की बातें सुनकर उनका दिल बैठता हुआ सा महसूस हुआ। अचानक से वह एक जगह बैठ गए।
अभी इससे पहले कि उसके दादा-पोते के बीच कुछ और बात होती, वहाँ पर एक तीसरी आवाज़ गूँजी। वह आवाज़ किसी और की नहीं, बल्कि यश के पिता, मिस्टर रितेश ओबरॉय की थी। रितेश जी वहाँ आए और कहने लगे, "क्या हुआ है? आज फिर दादा-पोते में आर्गुमेंट हो गया है? आखिरकार आप लोग एक-दूसरे को बदल क्यों नहीं लेते हो? आप हो कि यश के साथ ही हमेशा रहने की भी जिद करते हो। क्या भूल गए हैं मैं भी आपका बेटा हूँ? आप अपने बेटे के हाथ से भी तो कुछ खा सकते हो, पी सकते हो, मेरे साथ भी तो रह सकते हो। हाँ... जब देखो आप दोनों बच्चों की तरह झगड़ते रहते हो। आप लोगों को पता है, अब तो घर के नौकर भी आप लोगों के झगड़े के बारे में बात करते हैं।"
जैसे ही उसके दादा ने यह सुना, वह खड़े हुए और अपने बेटे की ओर देखकर कहने लगे, "तू? तुझे हम दोनों दादा-पोते के बीच में पड़ने के लिए किसने कहा है? मैंने कहा है कि तू आकर मुझसे यहाँ बात करे या तू मुझे खाना खिलाए या तू मुझे घुमाने लेकर चले। तू जा अपने कमरे में और आइन्दा मेरे सामने मत आना।"
जैसे ही उसके दादा ने उसके पिता को इतनी बुरी तरह से डाँटा, रितेश चुप हो गया। हालाँकि, यह रोज़ की ही बात थी, क्योंकि यश यह अच्छी तरह से जानता था कि उसके दादा और उसके पापा में बिल्कुल भी नहीं बनती है, और रोज़ उन दोनों का चूहा-बिल्ली का खेल जारी रहता है और दोनों इस तरह से लड़ते-झगड़ते रहते हैं। वेल, अभी उन दोनों बाप-बेटे का आर्गुमेंट चल ही रहा था कि तभी वहाँ पर एक बड़ी खूबसूरत, स्टाइलिश सी लड़की आ गई, जिसने शॉर्ट कपड़े पहने हुए थे, साथ ही साथ उसके हाथ में फ़ोन और एक बड़ा सा महँगे गुच्ची का बैग था।
उसने वहाँ आकर कहा, "ओह, कम ऑन दादा ब्रो एंड ग्रैंडपा, आप लोगों का डेली ड्रामा हो गया है। कैरी ऑन, आई हैव टू लीव इट राइट नाउ, बिकॉज़ मुझे तो आज अपने फ़्रेंड्स के साथ ढेर सारी शॉपिंग करनी है। सो प्लीज़ कंटिन्यू।"
ऐसा कहकर उसने अपने दादा और डैड को अपनी फ़ाइट कंटिन्यू करने के लिए कहा और वहाँ से चली गई। यश अपनी बहन को केवल एक ही नज़र जाते हुए देख रहा था, वरना उसे किसी से कोई मतलब नहीं था।
तभी यश की मॉम, श्रीमती आरती, जैसे ही वहाँ आई, यश का मूड पूरी तरह से खराब हो चुका था, क्योंकि आरती यश की सौतेली माँ थी। यश की मॉम का बहुत पहले ही एक लंबी बीमारी के चलते डेथ हो गई थी, जिसके बाद उसके पिता रितेश ओबरॉय ने दूसरी शादी कर ली थी। दूसरी शादी से ही उनकी वह बेटी थी जो कि यश की सौतेली बहन थी। वेल, यश अपनी सौतेली माँ से बहुत ही ज्यादा नफ़रत किया करता था। वह उनके एग्ज़िस्टेंस को भी वहाँ पर एक्सेप्ट नहीं किया करता था, क्योंकि वह आज तक उसे अपनी माँ का दर्जा ही नहीं दे पाया था।
आरती ने वहाँ आते ही अपने पति से कहा, "ओह, कम ऑन रितेश, प्लीज़ लीव इट ना। क्यों रोज़-रोज़ यह बेकार का आर्गुमेंट्स करते रहते हो तुम दोनों? तुम्हें इन दोनों के बीच में इंटरफ़ेयर नहीं करना चाहिए।"
जैसे ही आरती ने रितेश को वहाँ से आने को कहा, यश केवल अपने पिता को देख रहा था और जल्दी ही वह आरती के बुलावे पर उसके पीछे-पीछे चला गया। शुरू से यही होता आया था ओबरॉय मेंशन में। जब से आरती आई थी, रितेश उसी की दुम बनकर रह गया था और उसे अपने बेटे और अपने पिता से कुछ खास मतलब नहीं था। बस केवल दादा-पोते ही थे जो एक-दूसरे के साथ टाइम स्पेंड किया करते थे और एक-दूसरे की परवाह किया करते थे। लेकिन जो कि अब उसके दादा यश से नाराज़ थे।
तब यश अपने घुटनों के बल बैठकर अपने दादा से कहने लगा, "दादाजी, आखिरकार आप ऐसा क्यों करते हैं? आप अच्छी तरह से जानते हैं ना कि मैं आपको दुखी और परेशान नहीं देख सकता हूँ। मैं आपके लिए कुछ भी कर सकता हूँ। मैं नहीं चाहता कि आपको कभी भी किसी भी तरह की कोई परेशानी हो। हाँ, मैं थोड़ा सा अपने बिज़नेस वगैरा को लेकर पॉज़ेसिव रहता हूँ, लेकिन मेरी सबसे पहले प्रायोरिटी आप हैं। पर प्लीज़ आप इस बात का नाज़ायज़ फ़ायदा मत उठाया करिए। आप अच्छी तरह से जानते हैं मैं आपके पूरे २४ घंटे का टाइम नहीं दे सकता हूँ, उनमें से केवल कुछ घंटे ही मैं आपको दे सकता हूँ।"
तभी अचानक उसके दादा ने यश का कान पकड़ लिया और कहने लगे, "बस कर, अपने फ़ालतू की बात बंद कर और मुझे बहुत भूख लगी है, चल मेरे लिए खाना लेकर आ।"
जैसे ही उसके दादा ने यह कहा, यश मुस्कुराने लगा और जल्दी उसने एक नौकर को इशारा कर दिया और उसके दादा के पसंद का सारा खाना वहाँ मौजूद था। उसने जल्दी ही अपने दादा को अपने हाथों से खाना खिलाना शुरू कर दिया। दादा-पोते का इस तरह का प्यार देखकर उनकी नौकरानी, जो कि कई सालों से उस परिवार के लिए काम किया करती थी, उसकी आँखों के किनारे भीग गए और कहने लगी, "हे भगवान, आज के ज़माने में भी ऐसा प्यार देखने को कहाँ मिलता है? बस इन दोनों दादा-पोते का प्यार इसी तरह से बनाए रखना।"
जो हमें यहाँ देखने को मिला था, जो कि यश का उसके दादा के साथ था। लेकिन अब यहाँ से यश ओबरॉय आखिर था कौन और क्यों उसकी आत्मा एक बेजान घड़ी के अंदर चली गई? इसके लिए हमें यश की ज़िन्दगी के कुछ पिछले पन्नों को पलट कर देखना होगा और तब हमें वहाँ जाकर पता चलेगा कि आखिरकार यश के साथ क्या हुआ था। यही से शुरुआत करते हैं हम इस स्टोरी के मेन पाठ की।
यश बचपन से ही ऑस्ट्रेलिया में रहा था। विदेश में उसने अपनी एक ऐसी साख बना रखी थी कि जिसे बीट करना किसी के लिए भी नामुमकिन था। नंबर वन विदेशी कंपनी का मालिक यश ओबरॉय था। हालाँकि, उसकी सौतेली माँ को इस बात का हमेशा से मलाल था कि वह कोई बेटा पैदा नहीं कर पाई थी, केवल एक बेटी ही वह पैदा करके रह गई थी। यश को अपनी बहन या माँ से किसी तरह का कोई लेना-देना नहीं था। हाँ, कभी थोड़ी-बहुत अपने पिता से बात कर लिया करता था, लेकिन सिर्फ़ और सिर्फ़ बिज़नेस के कामों के लिए। वेल, यश जल्दी ही सीधा अपने एक बड़े से शानदार ऑफ़िस की ओर रवाना हो चुका था, क्योंकि आज उसकी एक बहुत इम्पॉर्टेन्ट डील फ़ाइनल होनी थी।
तो जैसे ही आज यश वहाँ पर गया, उसने देखा कि उसके ऑफ़िस में कुछ अजीब सी हलचल मची हुई थी। किसी का भी ध्यान यश की ओर नहीं गया था। यश थोड़ा सा आगे बढ़ा, तभी उसने देखा कि एक ४० से ५० साल का उसका सिस्टम मैनेजर वहाँ पर बदहवास सी हालत में बैठा हुआ था और काफी सारे लोगों ने उसे घेर कर खड़ा कर रखा था। जैसे ही यश ने यह देखा, वह हैरान हो गया और उसने उन लोगों के ठीक पीछे जाकर खड़े होकर यह कहा, "यह क्या हो रहा है यहाँ पर? और इस तरह से सब लोग अपना काम छोड़कर यहाँ क्या कर रहे हैं?"
जैसे ही सबको वहाँ पर यश की आवाज़ सुनाई दी, सब थर-थर काँपने लगे। वह अच्छी तरह से जानते थे कि उनका बॉस कितना ज़्यादा रूड और एरोगेन्ट था। इतना ही नहीं, यश हमेशा से ही अपने सभी वर्कर्स से बिल्कुल मशीन की तरह काम लिया करता था। इतना ही नहीं, हो किसी को ५ मिनट के लिए भी चैन तक नहीं लेने दिया करता था। अगर कोई एक-दूसरे से बात तक कर लिया करता था, तो वह सीधा उसे रिस्ट्रिक्टेड कर दिया करता था। लेकिन आज तो सब लोग का काम-धाम छोड़कर इस तरह से एक मैनेजर को घेर कर खड़े हुए थे, तो वह हैरान हो गया था।
यश की बात सुनने के बाद जल्दी ही सभी लोग आनन-फ़ानन में अपने-अपने केबिन में जाने लगे, लेकिन जो मैनेजर साहब वहाँ पर बेहोश हुए थे, वह जल्दी से नहीं उठ पाए थे। तब यश ने अपने सेक्रेटरी से कहा, "यह सब क्या हो रहा है? यह मैनेजर साहब इस तरह से सब लोगों का काम छुड़वाकर नीचे बैठे हुए क्या कर रहे हैं?"
लेकिन आज तो सभी लोग अपना काम छोड़कर इस तरह से एक मैनेजर को घेर कर खड़े थे। वह हैरान हो गया। यश की बात सुनने के बाद सभी लोग आनन-फानन में अपने-अपने केबिन में जाने लगे। लेकिन जो मैनेजर साहब वहाँ बेहोश हुए थे, वे जल्दी नहीं उठ पाए।
तब यश ने अपने सचिव से कहा, "यह सब क्या हो रहा है? यह मैनेजर साहब इस तरह से सब लोगों का काम छोड़कर नीचे बैठे हुए क्या कर रहे हैं?"
जैसे ही यश ने अपने सचिव से यह बात कही, उसका सचिव, स्टीफन, मन ही मन में जुझला गया। स्टीफन कहने लगा, "मिस्टर डिसूजा को पैनिक अटैक आया था, जिसकी वजह से वे बेहोश हो गए थे, और सभी लोग सिर्फ़ उन्हें देखकर उनके हाल-चाल पूछ रहे थे।"
तब यश ने अपने सचिव से कहा, "तो क्या मिस्टर डिसूजा के लिए इन सब ने ऑफ़िस का काम करना छोड़ दिया? जाओ, जाकर सबको कॉन्फ़्रेंस हॉल में जमा होने को बोलो।"
यह कहकर यश ने अपने सचिव स्टीफन को देखा। स्टीफन अच्छी तरह जानता था कि अगर उसने अब मिस्टर डिसूजा के हाल-चाल पूछे, तो यह शायद उसका इस ऑफिस में आखिरी दिन हो सकता था। लेकिन वह किसी का रिस्क नहीं लेना चाहता था, क्योंकि यश कोई आम इंसान नहीं था, बल्कि एक ऐसा ब्रांड था जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। इसलिए स्टीफन ने जल्दी ही सबको कॉन्फ़्रेंस हॉल में जमा होने के लिए बोल दिया।
यश के सभी कर्मचारी बुरी तरह डरे हुए थे। उन्हें लग रहा था कि शायद आज उन्होंने बहुत बड़ी गलती कर दी है, क्योंकि ऑफिस के नियमों में यह स्पष्ट लिखा था कि कोई भी एक केबिन में, एक डेस्क के बाहर, ज़्यादा लोग नहीं होंगे। लेकिन आज पूरा ऑफिस वहाँ जमा था। सभी को काफी डर लगने लगा, क्योंकि उन्हें अपने बॉस यश ओबरॉय के बारे में पता था कि वह कितना खतरनाक और बेरहम था।
वेल, मिस्टर डिसूजा और सभी ऑफिस वाले कॉन्फ़्रेंस रूम में जमा हो चुके थे और जल्दी ही यश उनके सामने मौजूद था। यश ने मिस्टर डिसूजा की ओर देखते हुए कहा, "मिस्टर डिसूजा, अगर आपकी तबीयत ठीक नहीं है, तो मुझे लगता है कि आपको घर बैठकर आराम करना चाहिए। मैं आपका टर्मिनेशन लेटर भेजवा दूँ। शायद आप लोग भूल रहे हैं, मैं अपने सभी कर्मचारियों के लिए हर महीने हेल्थ चेकअप करवाता हूँ। लेकिन इस बार क्या आपने अपना हेल्थ चेकअप नहीं करवाया था? जवाब दीजिये, मिस्टर डिसूजा।"
यश हर महीने अपने सभी कर्मचारियों का हेल्थ चेकअप करवाता था। अगर किसी कर्मचारी को कोई बीमारी होती थी, तो यश उसे हमेशा के लिए छुट्टी दे दिया करता था, क्योंकि उसका मानना था कि अगर उनकी सेहत ही ठीक नहीं रहेगी, तो ऑफ़िस में काम क्या करेंगे? यश इन सब चीज़ों के लिए काफी सजग था। लेकिन आज मिस्टर डिसूजा के बेहोश हो जाने के बाद उसने उनसे यह सीधा सवाल पूछ लिया था। जैसे ही उसने मिस्टर डिसूजा से यह कहा, वह केवल उन्हें घूर कर रह गया। फिर यश की ओर देखते हुए, डरते-डरते कहने लगा, "वो बॉस, मैंने अपना हेल्थ चेकअप करवाया था और मुझे किसी तरह की कोई बीमारी नहीं हुई थी और मैं बिल्कुल फिट था। एक्चुअली बॉस, आज मेरी बेटी का एक्सीडेंट हो गया है और जैसे ही मैंने यह खबर सुनी, तो मैं अपने आप को संभाल नहीं पाया और मुझे पैनिक अटैक आ गया।"
मिस्टर डिसूजा की आवाज़ अटक रही थी। अपनी बेटी के एक्सीडेंट के बारे में बताने पर, उसकी आँखों से आँसू निकल कर उसके गालों पर आ गए थे। बाकी सभी कर्मचारी मिस्टर डिसूजा को नम आँखों से देखने लगे थे। उन्हें मिस्टर डिसूजा के लिए बुरा लग रहा था और वे उसकी बेटी के ठीक होने की प्रार्थना करने लगे थे। लेकिन यश बिना किसी भाव के उसकी ओर देखता रहा। यश के चेहरे पर कोई भाव नहीं था। कुछ देर बाद उसने डिसूजा की ओर देखते हुए कहा, "मिस्टर डिसूजा, आपकी बेटी का सिर्फ़ एक्सीडेंट हुआ है, उसकी मौत नहीं हुई है कि आपकी वजह से पूरे 15 मिनट का ऑफ़िस का काम रुका रहा।"
जैसे ही यश ने यह कहा, मिस्टर डिसूजा की आँखें बड़ी हो गईं और उन्हें अंदर-अंदर गुस्सा आने लगा। लेकिन वह उस वक्त अपना गुस्सा यश के सामने नहीं दिखा सकते थे, क्योंकि उन्हें अपनी नौकरी की बहुत ज़रूरत थी। तभी यश ने बाकी लोगों को देखते हुए कहा, "इस 15 मिनट काम न करने की सज़ा आप लोगों को मिलेगी। आज आप लोगों को पूरा एक घंटा एक्स्ट्रा ओवरटाइम करना होगा।"
यश की बात सुनकर मिस्टर डिसूजा ने कहा, "नहीं बॉस, मैं एक्स्ट्रा ओवरटाइम नहीं कर पाऊँगा, क्योंकि मैं अभी अपनी बेटी से मिलने के लिए अस्पताल जा रहा हूँ। मेरे लिए मेरी बेटी बहुत ज़्यादा महत्वपूर्ण है। मैं उसे देखे बगैर एक पल नहीं रह सकता हूँ।"
मिस्टर डिसूजा की बात सुनकर यश ने अपना माथा पकड़ लिया और कहने लगा, "मैंने आपसे कहा है ना, फैमिली सब बाद में। सबसे पहले काम है। आप लोगों को सिर्फ़ अपने काम पर ध्यान देना चाहिए। इस तरह से अपनी फैमिली को बीच लाकर काम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने देना चाहिए।"
यश की बात सुनकर मिस्टर डिसूजा खुद को रोक नहीं पाए और थोड़ा तेज आवाज़ में बोले, "सर, शायद आपकी ज़िन्दगी में कोई परिवार नहीं है, कोई आपसे प्यार नहीं करता है, इसीलिए शायद आपको प्यार की वैल्यू नहीं पता है। लेकिन मुझे पूरी उम्मीद है, जिस दिन आपकी ज़िन्दगी में प्यार आएगा, उस दिन आप रिश्तों की वैल्यू करना सीख जाएँगे। और हाँ, मैं जा रहा हूँ अपनी बेटी से मिलने के लिए अस्पताल। और अगर आपको मुझे नौकरी से निकालना है, तो निकाल दीजिये। ज़्यादा से ज़्यादा मेरा परिवार भूखा मर जाएगा, कोई बात नहीं, हम सब एक साथ तो मरेंगे, लेकिन मैं अपनी बेटी को देखे बगैर नहीं रह सकता हूँ।"
ऐसा कहकर मिस्टर डिसूजा वहाँ से जाने लगे। लेकिन यश ने उन्हें रोकते हुए कहा, "मिस्टर डिसूजा, आपको ऐसी हरकत नहीं करनी चाहिए। आप सोच लीजिये, अगर आप इस तरह से नौकरी के बीच में से चले गए, तो यह आपके लिए ठीक नहीं होगा। मैं आपके खिलाफ़ लीगल एक्शन भी ले सकता हूँ।"
तभी मिस्टर डिसूजा हल्का सा मुस्कुराते हुए कहने लगे, "मिस्टर यश ओबरॉय, अगर आप मेरे खिलाफ़ कोई लीगल एक्शन लेना है, तो लीजिये, मुझे इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। लेकिन इस वक्त मेरी प्राथमिकता मेरी बेटी है। तो मैं जा रहा हूँ मेरी बेटी के पास। और एक और बात, बस मिस्टर यश ओबरॉय, मैं चाहता हूँ कि ऊपर वाला आपको कुछ दे या ना दे, लेकिन प्यार ज़रूर दे।"
ऐसा कहकर मिस्टर डिसूजा यश को छोड़कर चले गए और यश उन्हें खाली नज़रों से देखता रहा। फिर उसने कॉन्फ़्रेंस मीटिंग खत्म कर दी और अपने केबिन में आ गया।
यश ने जल्दी ही अपना सारा काम खत्म कर लिया और मिस्टर डिसूजा का टर्मिनेशन लेटर अपने सचिव स्टीफन को दे दिया। स्टीफन मिस्टर डिसूजा का टर्मिनेशन लेटर देखकर दुखी हो गया, लेकिन वह कुछ नहीं कर सकता था। बुझे मन से उसने वह लेटर मिस्टर डिसूजा के पते पर पोस्ट करवा दिया। काम खत्म होने के बाद यश ने सोचा कि क्यों ना आज जल्दी जाकर वह अपने दादा के साथ समय बिताए। वह रात को 11 से 12 के बीच ही अपने घर जाता था, लेकिन आज उसने 6:00 बजे के करीब ही अपने घर जाने का फैसला कर लिया, क्योंकि बार-बार मिस्टर डिसूजा की बातें उसके कानों में गूंज रही थीं, "कि तुम्हारी ज़िन्दगी में कोई प्यार नहीं है।" इसलिए यश ज़्यादा देर ऑफिस नहीं रह पाया।
रास्ते में यश ने देखा कि एक बूढ़ी औरत अपने दो बच्चों के साथ सड़क पर खड़ी हुई कुछ पैसे माँग रही थी और हल्की बारिश हो रही थी। यश ने उन्हें थोड़ी देर देखा, लेकिन फिर अपनी नज़रें फेर लीं, क्योंकि उसकी नज़रों में ग़रीबों की कोई अहमियत नहीं थी। उसे ग़रीब कभी पसंद नहीं थे। उसका मानना था कि ये ग़रीब होते ही क्यों हैं? अगर इंसानों के पास रहने के लिए, खाने के लिए, अच्छे कपड़े, घर नहीं है, तो ऐसे ग़रीबों को जीने का कोई हक़ नहीं है। किसी का नारा है कि ग़रीबी हटाओ, लेकिन यश मानता था कि ग़रीबों को ही हटाओ। वह ग़रीबों से नफ़रत करता था। अगर उसके ऑफिस में कोई बीमार हो जाता या कोई समस्या होती, तो वह उसकी मदद करने के बजाय उसे सीधा-सीधा ऑफिस से निकाल देता। यश की आदत के बारे में उसके ऑफिस का चपरासी तक जानता था।
वह औरत गाड़ी रुकते ही यश की गाड़ी के पास आई और हल्के काँपते स्वर में कहने लगी, "बाबूजी, प्लीज़ तुम्हारी कुछ मदद कर दो।"
यश ने उसे ध्यान से देखा। मैले-कुचैले कपड़े पहने हुए एक लड़का और एक छोटी लड़की का हाथ उस औरत ने थाम रखा था, उसके कपड़े भी खराब हालत में थे। तभी यश ने मुँह फेर लिया। औरत को यह देखकर अजीब लगा और उसने गाड़ी के ड्राइवर से मदद माँगी। ड्राइवर ने अपने जेब से कुछ पैसे निकाल कर औरत के हाथों में रख दिए। औरत कभी उन पैसों को देख रही थी, तो कभी ड्राइवर को। फिर हल्का सा मुस्कुराते हुए यश की ओर देखते हुए कहा, "बहुत घमंड है ना तुम्हें अपनी अमीरी का? ग़रीबों से बहुत नफ़रत है ना तुम्हें?"
यश हैरान हो गया। उसने आगे कहा, "याद रखना बेटा, ऊपर वाला कब किसके साथ क्या करता है, यह कोई नहीं जानता, उसके लीला उसे ही पता है। और मुझे पूरी उम्मीद है, जिन ग़रीबों से तुम इतनी नफ़रत करते हो, वही ग़रीब तुम्हारी ज़िन्दगी बचाएँगे और तुम्हारी ज़िन्दगी के मालिक बन बैठेंगे।"
वह औरत चली गई। यश हैरान था कि औरत कह क्या रही थी और कौन से ग़रीब उसकी ज़िन्दगी के मालिक बनने वाले थे। उसने अपना शीशा ऊपर चढ़ा लिया और ड्राइवर को गुस्से से घूरते हुए बोला, "अगर तुम्हारा दान-पुण्य का काम ख़त्म हो गया हो, तो जल्दी चलोगे या नहीं?"
यश के ड्राइवर ने गाड़ी उसके मेंशन की ओर बढ़ा दी। यश जैसे ही अपने मेंशन के अंदर गया, उसके कानों में उसके पिता के चीखने की आवाज़ सुनाई दी। वह यश के दादाजी, मिस्टर दीवान ओबरॉय से चिल्ला कर बात कर रहा था, "वह मेरा बेटा नहीं है! क्यों एक अनाथ को आप मेरा बेटा बनाने के ऊपर तुले हुए हो? क्यों अपनी बेटी का सारा हिस्सा उसके नाम कर दिया? शायद आप भूल रहे हैं, मेरी पत्नी के मरने के बाद मैंने दूसरी शादी इसीलिए की क्योंकि मेरे कोई औलाद नहीं थी और वह यश, वह मेरा बेटा नहीं है, वह सिर्फ़ आपका पोता है।"
यश के पैर जम गए। उसके दादाजी चीखने लगे, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे बेटे को एक बार फिर अनाथ कहने की? अगर तुमने एक बार और मेरे यश को अनाथ कहा, तो मैं तुम्हारी जुबान खींच लूँगा! उसके बारे में किसी तरह की कोई बातें नहीं सुन सकता, समझे तुम? और वही मेरा वारिस है और वही रहेगा, इसलिए मैंने अपनी सारी जायदाद उसके नाम कर दी है। और अगर तूने उसके साथ किसी तरह की कोई घटिया हरकत करने की कोशिश की, या तूने उसे परेशान करने की कोशिश की, तो मैं तुझे हमेशा-हमेशा के लिए जो शेयर्स दे रहा हूँ, वह भी तुझसे छीन लूँगा।"
यश काफी हैरान था। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या वह वाकई रितेश ओबरॉय का बेटा नहीं था? यह सोचते हुए, वह धीरे-धीरे अपने दादाजी के पीछे जाकर खड़ा हो गया। रितेश ने यश को देखते ही चुप हो गया, क्योंकि वह यश के गुस्से से डरता था।
और क्या वह वाकई रितेश ओबरॉय का बेटा नहीं था? यह सोचते हुए, वह धीरे-धीरे अपनी कदम बढ़ाता हुआ अपने दादा के ठीक पीछे जा खड़ा हुआ।
रितेश ने यश को देखते ही चुप हो गया। यश के सामने वह ज़्यादा नहीं बोलता था; यश के गुस्से से वह डरता था।
वेल, दादाजी ने यश को पीछे खड़ा देखते ही उनके चेहरे का रंग उड़ गया। उन्हें डर सताने लगा कि कहीं यश ने उनकी बात तो नहीं सुन ली है। तभी दादाजी आगे आए और यश के सर पर हाथ रखते हुए बोले, "बच्चा, तुम इतनी जल्दी आ गए? तुम ठीक हो ना? तुमने कुछ सुना तो नहीं है ना? देखो, अगर तुमने कुछ भी उल्टी-सीधी, फ़ालतू की बात सुनी है, तो उसे अपने दिलो-दिमाग़ से निकाल दो। तुम मेरे पोते हो, मेरे वारिस हो, तुम अनाथ नहीं हो, समझे तुम?"
दादा की बातें सुनकर यश का यकीन डगमगा गया। पिता ने जो बात दादा से कही थी, उसमें कुछ सच्चाई ज़रूर थी। वह सच्चाई हर हाल में जानना चाहता था। उसने अपने दादा का हाथ लेकर अपने सर पर रख दिया और कहा, "दादाजी, आप अच्छी तरह से जानते हैं कि मैं कितना ज़्यादा स्ट्रांग हूँ और मुझे इन सब फ़ालतू बातों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। लेकिन अगर मेरा कोई ऐसा सच है, जो मुझे नहीं पता, तो मैं चाहता हूँ कि आप मुझे बता दें।"
यश के सीधे-सीधे कहने पर दादा हैरान हो गए। उनकी आँखों से आँसू निकलने लगे। वह तुरंत यश का हाथ पकड़कर अपने कमरे में ले गए। यश चुपके से उनके साथ चला गया।
यश को पहली बार अपने दिल में एक अलग तरह के दर्द का एहसास हुआ। पर शुरू से ही उसे किसी से ख़ास लगाव नहीं था, न ही किसी से मोहब्बत। उसकी सौतेली माँ ने उसे कभी प्यार नहीं दिया और न ही पिता। बहन तो नाम की ही थी। यश अगर किसी को अपना समझता था, तो वह सिर्फ़ उसके दादाजी थे। लेकिन आज दादा की आँखों में आँसू देखकर यश बेचैन हो उठा था। उसे एक अलग ही तरह के दर्द का एहसास हुआ।
जल्दी ही दादाजी उसे अपने कमरे में ले गए और कहा, "मुझे नहीं पता था, बेटा, कि यह राज़ मैं आज तुम्हें बताऊँगा, लेकिन यह बताना ज़रूरी है। बहुत बार रितेश मुझे धमकी दे चुका है कि वह तुम्हें सारा सच बता देगा, लेकिन हर बार मैं डरकर रह जाता हूँ। यह सोचता हूँ कि कहीं मैं तुम्हें खो ना दूँ। लेकिन नहीं, मैं तुम्हें खोने के डर से तुम्हारी पहचान को इस तरह से छुपाकर नहीं रख सकता हूँ। यह तुमने गलत सुना है कि तुम अनाथ हो। रितेश झूठ कह रहा है। तुम अनाथ नहीं हो। यह भी सच है कि रितेश तुम्हारा बाप नहीं है।"
"क्या...? क्या...?" यश हैरान हो गया और बोला, "आखिर आप कहना क्या चाह रहे हैं, दादाजी?"
दादा ने एक एल्बम उसके सामने फेंक दी और कहा, "तुम यह हमारी फैमिली एल्बम देखो। हम आज से 20 साल पहले इंडिया में रहा करते थे।"
यह सुनकर वह हैरान हो गया। उसने शुरू से ही विदेश को अपना घर समझा था। वह ऑस्ट्रेलिया में इस तरह बस चुका था मानो वह उसका अपना घर हो। वह ऑस्ट्रेलिया में सबसे बड़ी कंपनी का मालिक था। सैकड़ों एम्प्लॉयी उसके नीचे काम करते थे। लेकिन आज यह जानने के बाद कि वह इंडिया का रहने वाला था, यश को अपनी पहचान अँधेरे में डूबती हुई महसूस होने लगी। इसका मतलब, पिछले 20 सालों से वह एक झूठी ज़िन्दगी जी रहा था। यह सब पूरे 26 साल का था।
तब दादा ने कहना शुरू किया, "तुम 5-6 साल के थे, जब हम तुम्हें इंडिया से यहाँ लेकर आए थे। तुम मेरे बेटे के बेटे नहीं हो, बल्कि तुम मेरी बेटी के बेटे हो। हाँ, तुम मेरे ग्रैंडसन हो। यह सच है, इसे कोई नहीं बदल सकता। लेकिन तुम्हारी असली पहचान यह है कि तुम मेरे बेटे के बेटे नहीं हो, बल्कि मेरी बेटी के बेटे हो। इंडिया में मेरी बेटी रहा करती थी। उसे तुम भुला दो। मरते वक़्त उसके आखिरी शब्द यही थे कि मैं तुम्हारा ध्यान रखूँ और तुम्हें अपने साथ ले जाऊँ। रितेश कभी भी तुम्हें अपने साथ नहीं लेकर आना चाहता था, क्योंकि वह तुमसे नफ़रत करता है। तुम जानते हो, रितेश तुमसे आज तक ढंग से बात क्यों नहीं करता है? क्योंकि तुम्हारी माँ ने उस वक़्त हम लोगों के फ़ैसले के ख़िलाफ़ जाकर तुम्हारे पिता से अपनी मर्ज़ी से शादी की थी। उसके बाद हमने तुम्हारी माँ से हर तरह के रिश्ते-नाते तोड़ लिए थे। लेकिन फिर हमें पता चला कि तुम्हारी माँ पर किसी ने जानलेवा हमला किया है और उसे कोई हॉस्पिटल में एडमिट करवाकर उसके 6 साल के बेटे के साथ छोड़कर जा चुका था। हमने गुस्से में कभी इस बात के बारे में भी पता लगाने की कोशिश नहीं की कि आखिरकार तुम्हारी माँ ने किससे शादी की थी और तुम्हारा पिता कौन था। लेकिन जब मैं हॉस्पिटल गया, तुम्हारी माँ ने रो-रोकर मुझसे माफ़ी माँगी और तुम्हारा हाथ मेरे हाथों में थमाया और कहने लगी कि 'मेरे बेटे को बाबूजी आप ले जाइए और आप इसका ध्यान रखिएगा और इसे लेकर यहाँ से कहीं दूर चले जाइए, क्योंकि इसके यहाँ काफी सारे दुश्मन हैं जो इसे जीने नहीं देंगे।' यश बेटे, मेरा यकीन मानो, उस वक़्त सिचुएशन ऐसी थी कि मैं तुम्हारे पिता के बारे में या किसी और चीज़ के बारे में कुछ भी जानने का या पता लगाने का मुझे मौका नहीं मिला था। और उसी पल तुम्हारी माँ की मौत के बाद मैं तुम्हें लेकर हमेशा के लिए ऑस्ट्रेलिया चला आया और यहाँ आकर मैंने तुम्हें तुम्हारे मामा, यानी के तुम्हारे पिता रितेश का नाम दिया। लेकिन रितेश कभी भी तुम्हें आज तक अपना नहीं पाया। तो कहीं ना कहीं इसका कारण ये भी है। और अब जो मैंने सारी प्रॉपर्टी तुम्हारे नाम कर दी, तो रितेश इस बात को लेकर गुस्सा है। लेकिन मैं तो सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हें तुम्हारा हक़ दे रहा हूँ, क्योंकि जिस वक़्त हम ऑस्ट्रेलिया में आए थे, उस वक़्त हम इतने ज़्यादा प्रॉपर्टी के मालिक नहीं थे। यह सब कुछ- प्रॉपर्टी, फ़ैक्ट्री, बंगले, गाड़ियाँ- यह सब कुछ तुमने अपनी मेहनत के बलबूते पर हासिल किया है, तो भला मैं तुमसे तुम्हारा हक़ कैसे छीन सकता हूँ? ऐसा नहीं है कि मैंने तुम्हारे पिता को कुछ नहीं दिया है, बल्कि मैंने 35% शेयर तुम्हारे पिता के नाम भी कर दिए हैं। लेकिन सारी कंपनी, सारी प्रॉपर्टी के मालिक ऑफ़िशियल तरीके से सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम होंगे।"
यह सुनकर यश बहुत हैरान हुआ। उसकी हैरानी का कोई ठिकाना नहीं था। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि आज एक ही पल में उसकी पहचान, उसका नाम, और जितने सालों से जो वह ज़िन्दगी जीता आया था, वह अचानक ख़त्म हो जाएगा। पाँच साल पहले की यादें वह आज भी सपने में देखा करता था, लेकिन हमेशा उसे इग्नोर कर दिया करता था। सपने में उसे एक छोटा सा गाँव दिखाई दिया करता था, जहाँ बच्चे खेला करते थे और एक बच्चे को खेलते-खेलते चोट लग जाया करती थी। यह सपना कई दिनों से यश की आँखों में आया करता था, लेकिन इससे आगे उसे कुछ भी दिखाई नहीं दिया करता था। लेकिन उसने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया था। लेकिन आज उसे सपने का मतलब समझ आ गया था- यह सपना उसके बचपन से जुड़ा हुआ था।
बिना दादा को एक शब्द कहे, यश सीधे अपने कमरे में आ गया और सोचने लगा कि आखिर उसकी ज़िन्दगी ऐसा कौन सा मोड़ लेने वाली थी? जो इस तरह से उसकी पहचान एक ही दिन में ख़त्म हो चुकी थी। यश की हैरानी का कोई ठिकाना नहीं था। वह इधर-उधर अपने कमरे में टहलने लगा और साथ ही साथ उसे गुस्सा भी आ रहा था। वह अपने काम को लेकर, अपने बिज़नेस को लेकर बहुत पॉज़ेसिव था। उसने लोगों को कितना परेशान किया था। एक बार जब एक लड़की उसके ऑफ़िस में जॉब माँगने आई थी, तो यश ने सिर्फ़ इस बात को लेकर उसे नौकरी पर नहीं रखा था कि उस लड़की के पिता नहीं थे, उसके पास बाप का नाम नहीं था। अब यश को आज वह बात याद आई, उसने खुद को उस लड़की की जगह रखकर देखने लगा था, क्योंकि खुद उसके पिता का पता नहीं था।
चूँकि वह आज ओबरॉय मेंशन जल्दी आ गया था, तो वह वहाँ से बाहर निकलकर गाड़ी लेकर सड़कों पर बेमन से घूमने लगा और सोचने लगा कि इतने सालों में उसने आखिर क्या-क्या किया है। यश को अच्छी तरह से याद था, उसने बड़ी जल्दी अपने बिज़नेस एजुकेशन कंप्लीट कर ली थी। उसके बाद उसने अपने दादा को ही उनके बिज़नेस में ज्वाइन किया था और धीरे-धीरे उसने दिन-रात कड़ी मेहनत करके पूरे बिज़नेस को ऑस्ट्रेलिया का नंबर वन बिज़नेस और नंबर वन फ़ैक्ट्री बना दिया था। यश की कंपनी लोगों का ड्रीम बन चुकी थी। यश की कंपनी में काम करने के लिए लोग तरसा करते थे। लेकिन यश ने बड़े गिन-चुनकर काफी सारी इंटरव्यूज़ को क्लियर करके अपने पास कुछ अच्छे ही एम्प्लॉयी रखे हुए थे, जो काम को लेकर हमेशा एक्टिव रहा करते थे। यश उन लोगों को मैनेज करते-करते कब इतना पत्थर दिल बन गया, कब इतना एरोगेन्ट बन गया, उसे खुद ही पता नहीं चला था। ऑफ़िस में जब आज मिस्टर डिसूजा बेहोश होकर गिर गए, तब भी उस पर कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ा था। मिस्टर डिसूजा की वजह से उसके काम पर कोई फ़र्क ना पड़े, इसीलिए उसने वह सारा काम उन लोगों में बाँट दिया था जो लोग उस वक़्त मिस्टर डिसूजा की मदद कर रहे थे। यश बड़ा ही बेरहम और पत्थर दिल का था, लेकिन आज अपने जीवन की इतनी बड़ी सच्चाई जानने के बाद उसके दिल के किसी हिस्से में कुछ दर्द सा महसूस हुआ था। अचानक से ही उसे अपनी ज़िन्दगी एकदम गुमनाम, अँधेरे में डूबी हुई सी महसूस होने लगी थी।
बेमन से गाड़ी चलाने के बाद, एक जगह जाकर यश ने गाड़ी रोक दी। उसने देखा कि आज ऑफ़िस से लौटते वक़्त जो ग़रीब माँ और उसके दो बच्चे उसे दिखाई दिए थे, वह सड़क के कोने में बैठे सोए हुए थे। यह देखते ही यश अपनी गाड़ी से नीचे उतर आया…
यश बड़ा ही बेरहम और पत्थर दिल था, लेकिन आज अपने जीवन की इतनी बड़ी सच्चाई जानने के बाद उसके दिल के किसी हिस्से में कुछ दर्द सा महसूस हुआ। अचानक उसे अपनी ज़िन्दगी एकदम गुमनाम, अँधेरे में डूबी हुई सी महसूस होने लगी। बेमतलब गाड़ी चलाने के बाद, अचानक एक जगह जाकर यश ने गाड़ी रोक दी। उसने देखा कि आज ऑफ़िस से लौटते वक़्त जो ग़रीब माँ और उसके दो बच्चे उसे दिखाई दिए थे, वे सड़क पर, सड़क के कोने में बैठे हुए सोए हुए थे। जैसे ही यश ने यह देखा, वह अचानक अपनी गाड़ी से नीचे उतर आया और उनके पास जाकर अपना महँगा कोट उतारकर उन्हें ओढ़ा दिया।
जैसे ही उस ग़रीब औरत ने अपनी आँखें खोलीं, वह हैरान हो गई। उसने यश को अच्छी तरह से पहचान लिया और कहने लगी, "तुम्हारे दिल में आज रहम जागा है? मुझे पूरी उम्मीद है, अब तुम्हारी ज़िन्दगी बहुत ही हसीन और ख़ूबसूरत हो जाएगी।"
यश को उस औरत की बातों का मतलब कुछ भी समझ में नहीं आया, पर उसने कितने ही सारे पैसे उस औरत को थमाकर अपना कोट पहन लिया और जल्दी ही गाड़ी में बैठ गया। उसे आज अलग ही तरह का सुकून का एहसास हो रहा था। यश सोचने लगा कि जिस सुकून की तलाश वह पैसों में, महँगी गाड़ियों में, लग्ज़रीज़ में, बिज़नेस वगैरह में ढूँढ रहा था, वह सुकून उसे एक औरत की छोटी सी मदद करने पर मिला था। और जैसे ही उस औरत की छोटी सी मदद करने के बाद यश अपने दिल को थोड़ा सा सुकून पहुँचाया, वह जल्दी ही ओबरॉय मेंशन की ओर रवाना हो गया।
अवनी और उसकी माँ और भाई साथ-साथ एक मूवी की तरह यश की ज़िन्दगी को देख रहे थे। अवनी के मन में पहले तो उस मूवी को देखते हुए झिझक सी महसूस हो रही थी, अब उसे ऐसा लगने लगा था मानो वह अपनी ज़िन्दगी का कोई हसीन नज़ारा देख रही हो, क्योंकि यश ओबरॉय को देखना किसी हसीन नज़ारे से कम नहीं था। यश ओबरॉय बहुत ही ज़्यादा डैशिंग और चार्मिंग था। अवनी काफी आराम से बैठकर अब यह देखने लगी कि आगे यश की ज़िन्दगी में क्या होने वाला था। और यश तो इतना ज़्यादा ख़तरनाक था, तो फिर वह किस तरह से अपने माँ-बाप को एक्सेप्ट करेगा? क्या उसे उसके माँ-बाप के बारे में कभी पता चल पाएगा या नहीं? यह सोचते हुए अवनी आगे देखने के लिए इच्छुक होने लगी।
वहीं दूसरी ओर, एक बार फिर यश का यहाँ से फ़्लैशबैक शुरू होता है। यश रात के करीब 1:00 बजे अपने मेंशन में पहुँच चुका था। वहाँ पर आज अजीब ख़ामोशी और शांति सी थी। जहाँ पर हर चीज़ जो कि यश को हमेशा अपनी लगती थी, आज उसे काफी ज़्यादा परायापन सा महसूस हो रहा था। हालाँकि वह अपने दादा का पोता था, लेकिन वह रितेश ओबरॉय का बेटा नहीं था, यह बात यश के लिए काफी बड़ी थी और इस बात को डाइजेस्ट कर पाना उसके लिए काफी मुश्किल हो रहा था। यश जल्दी ही अपने कमरे में जाने लगा, लेकिन वह बीच में रुककर सबसे पहले अपने दादाजी को देखने के लिए उनके कमरे की ओर चला गया।
यश ने देखा कि उसके दादा का कमरा खुला हुआ था। बेसिकली, जब भी उसके दादाजी सोए हुए थे, तो उनका कमरा बंद ही रहा करता था। आज अचानक से उनका कमरा खुला होने के कारण यश काफी हैरान हो गया और फिर उसने जल्दी से अंदर जाकर देखना शुरू कर दिया। उसके दादाजी अभी तक नहीं सोए हुए थे, बल्कि एक फ़ोटो को पकड़े हुए बैठकर रो रहे थे। जैसे ही उसने देखा, वह थोड़ा परेशान हो गया। वह जल्दी से अपने दादा के पास जाकर बैठ गया। उसके दादा ने एक नज़र उसको देखा और फिर उस फ़ोटो को यश को दिखाते हुए कहने लगा, "यह देख, तेरी माँ।"
जैसे ही यश ने अपने दादा की बात सुनी, उसने फ़ोटो पर नज़र डाली, तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। यश और उसकी माँ का चेहरा काफी मिलता-जुलता सा था। इतना ही नहीं, यश की आँखें बिल्कुल उसकी माँ की आँखों से मिलती थीं। उसकी माँ कमाल की ख़ूबसूरत औरत रही होगी। यश कुछ पल अपनी माँ की फ़ोटो को निहारता रहा और अपनी उँगलियों से उस फ़ोटो को उस तरह से छू रहा था मानो कि अपने माँ का चेहरा वह छू रहा हो। लेकिन क्योंकि यश काफी इमोशनल लेस था, उसके अंदर इतनी ख़ास कोई इमोशन्स नहीं थे, तो कुछ ही पल उस फ़ोटो को अच्छी तरह से देखने के बाद उसने एक बार फिर उस फ़ोटो को वापस रख दिया और अपने दादा की ओर देखकर कहने लगा, "आप अभी तक सोए नहीं हैं? आप जानते भी हैं क्या टाइम हो रहा है? अगर आप इस तरह से टाइम से नहीं सोएँगे, तो आपकी तबीयत ख़राब हो सकती है और आप अच्छी तरह से जानते हैं मैं आपकी तबीयत को लेकर किसी तरह का कोई रिस्क नहीं ले सकता हूँ, तो आप फ़टाफ़ट ये फ़ोटोस वगैरह रखिए और जाकर आराम कीजिए।"
तभी उसके दादा हैरानी से यश की ओर देखते हुए कहने लगे, "क्या तुम एक बार भी यह नहीं पूछोगे कि तुम्हारी माँ कौन थी? कैसी दिखती थी? क्या करती थी? और क्या नाम था उसका? तुमने तो आसानी से इस बात को एक्सेप्ट भी कर लिया। मैंने तो कभी भी नहीं सोचा था तुम इतनी आसानी से इस बात को एक्सेप्ट कर लोगे। अगर मुझे पहले ही पता होता, तो मैं इतने दिनों से यह भार अपने सीने पर ना लादे घूमता। मैं तुम्हें बहुत पहले ही इस बात के बारे में बता देता।"
तभी यश ने अपने दादा की ओर मुस्कुराते हुए देखते हुए कहा, "मुझे किसी के बारे में जानने में कोई इंटरेस्ट नहीं है और रही बात मेरी माँ की, अगर मेरी माँ इस दुनिया में नहीं है, तो भला मैं उनके बारे में जानकारी क्या करूँगा? और अब अगर मेरा इस दुनिया में कोई है, तो सिर्फ़ और सिर्फ़ आप हैं और मुझे किसी से कोई मतलब नहीं है।"
जैसे ही उसने यह कहा, अचानक से उसके दादा की आँखें भर आईं और वह कहने लगे, "तू जानता है, बेटा, इस बात का ग़म है कि तेरी माँ इस दुनिया में नहीं है, लेकिन आज तक मैं अपनी पॉवर, पोज़िशन, पैसा, सब कुछ इस्तेमाल करने के बाद भी इस बात के बारे में नहीं पता लगा पाया हूँ कि तेरा बाप कौन था और नहीं मैं यह पता लगा पाया हूँ कि आखिरकार तेरी माँ की मौत क्यों हुई थी, क्योंकि हॉस्पिटल में केवल कुछ ही पलों के लिए मैं उससे मिला था और उस पल में उसने तेरा हाथ मेरे हाथों में थमा दिया था।"
यश बड़े ही ध्यान से अपने दादाजी की बात सुन रहा था और कहने लगा, "दादाजी, आखिर आप कहना क्या चाहते हैं? क्या मैं अब इस बात के बारे में पता लगाऊँ कि मेरी माँ कौन थी और मेरा बाप कौन था और मेरी माँ की मौत क्यों हुई है?"
तभी यश के दादा की आँखों में चमक आ गई और वह कहने लगे, "बेटा, तूने तो मेरे मन की बात छीन ली है। तू जानता है, मैं तुझे जब भी देखा करता था, मेरे मन में यही सवाल आया करता था कि जब तू बड़ा होगा, तो मैं तुझे तेरी माँ के बारे में क्या सवाल का क्या जवाब दूँगा? लेकिन तूने कभी भी अपनी माँ के बारे में या किसी और के बारे में कुछ पूछने की कोशिश ही नहीं की और फिर वक़्त ने मुझे भी स्वार्थी बना दिया। तो इसीलिए मैंने भी तुझे कुछ नहीं बताया। लेकिन बेटा, कहीं ना कहीं रातों को मुझे तेरी माँ की आखिरी बार कही हुई शब्द याद आते हैं, "पिताजी, आप मेरे बेटे को ले जाइए, वरना वह लोग इसे नहीं छोड़ेंगे।" बेटा, तू उस वक़्त पाँच या छह साल का था और मुझे पूरी उम्मीद है तूने कुछ ऐसा देखा था जो तुझे नहीं देखना चाहिए था। लेकिन इस विदेश में आने के बाद तू पूरी तरह से यहाँ के रंग में ढलने लगा था। तू जानता है, जब तू नया-नया इस शहर में आया था, तब तो रातों को नहीं सोया करता था। तू हर रात को एक बुरा ख़्वाब देखा करता था और हमेशा सिर्फ़ और सिर्फ़ यही बोला करता था, "छोड़ दो उन्हें, छोड़ दो उन्हें, छोड़ दो उन्हें।" मैं नहीं जानता कि तू उस वक़्त क्या देख रहा होता था और क्या सोचा करता था। फिर धीरे-धीरे मैंने साइकियाट्रिस्ट की मदद से तेरे अंदर जो कुछ भी चल रहा था, उसे जानने की कोशिश की थी और तू जानता है, उस वक़्त तेरे बचपन में मैंने एक साइकॉलोजिस्ट की मदद से तेरी कुछ वीडियो बनवाई थीं। उसमें मुझे कुछ ख़ास पता तो नहीं लग पाया, लेकिन हाँ, तेरी जुबान से जो कुछ भी तूने बचपन में बोला था, मैंने वह सब एक साइकियाट्रिस्ट की मदद से वीडियो में कन्वर्ट करवा लिया था, तो वह मैंने आज तक संभाल कर रखी हुई है। उस वक़्त तूने कुछ ऐसे शब्द बोले थे जो काफी ज़्यादा भयानक थे। मैं नहीं जानता कि तू वीडियो सुनने और देखने के बाद किस तरह का रिएक्ट करेगा या कैसा नहीं... लेकिन तब मैंने साइकियाट्रिस्ट की मदद से तेरी उन यादों को हमेशा-हमेशा के लिए धुंधला करवा दिया था ताकि तू अपनी ज़िन्दगी में आगे बढ़ पाए। लेकिन अब मैं चाहता हूँ कि तू एक बार वह वीडियो देखें और सुनो और इस बात को समझने की कोशिश करो कि आखिरकार तू अपने बचपन में कहना क्या चाह रहा था। कुछ ऐसा था जो तू अपने सपनों के द्वारा हमें बताना चाहता था, लेकिन तू नहीं बता पाया। वह सारे वीडियो कैसेट इस बॉक्स के अंदर हैं, तो मैं चाहता हूँ कि तू एक बार इन वीडियो को ज़रूर देखे।"
लेकिन तब मैंने मनोचिकित्सक की मदद से तुम्हारी उन यादों को हमेशा-हमेशा के लिए धुंधला करवा दिया था ताकि तुम अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ पाओ।
लेकिन अब मैं चाहता हूँ कि तुम एक बार वह वीडियो देखें और सुनो, और यह समझने की कोशिश करो कि आखिरकार तुम अपने बचपन में कहना क्या चाह रहे थे।
कुछ ऐसा था जो तुम अपने सपने के द्वारा हमें बताना चाहते थे, लेकिन तुम नहीं बता पाए। वह सारे वीडियो कैसेट इस बॉक्स के अंदर हैं।
तो मैं चाहता हूँ कि तुम एक बार इन वीडियो को ज़रूर देखो।
और एक बार याद करने की कोशिश करो कि उस वक्त तुमने क्या देखा था। मैं जानता हूँ कि मुझे काफी स्वार्थी लग रहा होगा। तुम्हें लग रहा होगा कि मैं ऐसी बातें तुमसे पूछ रहा हूँ, वह भी इतने सालों के बाद। लेकिन मैं क्या करूँ, बेटा? जब तक मुझे अपनी बेटी के खून के पीछे की कहानी का पता नहीं चल जाता, मेरे दिल को सुकून नहीं मिलने वाला है।
और यहाँ तक कि अगर मैं बिना सच जाने मर गया, तो मेरी आत्मा को भी सुकून नहीं मिलेगा। जैसे ही यश के दादा ने यह कहा, यश उस बॉक्स को लेकर अपने कमरे में आ गया था।
उसने बड़े ही बुरी तरह से वह बॉक्स अपने बिस्तर पर फेंक दिया था और सिगरेट सुलगा ली थी। कुछ देर सिगरेट पीते हुए वह उस बॉक्स की ओर देखने लगा था।
रह-रह कर उसके कानों में मिस्टर डिसूजा और उस औरत की बातें आ रही थीं। लेकिन उस औरत की मदद करने के बाद उसे काफी अच्छा लगा था।
फिर कुछ सोचते हुए उसने जल्दी ही अपनी सिगरेट बुझा दी थी और बॉक्स खोल लिया था। अपने लैपटॉप पर एक डीवीडी चलाकर उसे चेक करने लगा था।
यश ने देखा, एक बच्चा हाफ निक्कर और एक साधारण सी चप्पल में, सफ़ेद चेक की शर्ट पहनकर बैठा हुआ था।
उसकी आँखों से आँसू लगातार उसके गले तक आ रहे थे। तब डॉक्टर उससे पूछ रहे थे, "यश, आपने आखिर क्या देखा था? क्या हुआ था?" यश की आँखें बंद थीं और वह बिना होशो-हवास में बोले जा रहा था—
"मेरी माँ! मेरी माँ को छोड़ दो! मेरी माँ को वह लोग ले गए! मेरी माँ को छोड़ दो! नहीं, मत मारो! मत मारो! मत तंग करो मेरी माँ को! मत तंग करो!"
मेरी माँ! बार-बार यश के मुँह से यही बातें निकलती जा रही थीं। यश कुछ और कहना चाहता था, लेकिन वह कह नहीं पा रहा था। जल्दी ही यश घबराकर अपनी आँखें खोल ली थीं और उसने जोर से चीख मारी थी।
अब डॉक्टर को उसे हिप्नोटाइज़ से बाहर लाना ज़रूरी था। इसीलिए डॉक्टर ने जैसे ही चुटकी बजाई, यश अपने होशो-हवास में आ गया था।
अपने नाना को देखकर वह उनके गले लगकर रोने लगा था और जोर-जोर से चिल्लाने लगा था— "मेरी माँ को बचा लो! बचा लो! वह लोग मेरी माँ को ले जा रहे हैं! पिताजी! मेरी माँ को बचा लो! पिताजी! पिताजी!" लेकिन कोई भी यश की कोई बात नहीं सुन रहा था।
किसी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। अब जैसे ही यश ने अपनी यह पुरानी बचपन की डीवीडी देखी, अचानक से उसके हाथ-पैर काँपने लगे थे।
और उसका सिर एकदम भारी होने लगा था। यश काफी ज़्यादा हैरान था कि क्या वाकई यह वही था जो इतनी बुरी हालत में था? और वह अपनी माँ को इस तरह से बचाए जाने की गुहार क्यों लगा रहा था?
आखिरकार क्या हुआ था उसकी माँ के साथ? यश को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। वह तो बस खाली मन से सारी चीज़ें देख रहा था। और फिर वह डीवीडी घबराकर बंद कर दी थी।
उससे आगे उसकी देखने की हिम्मत ही नहीं हुई थी। डीवीडी बंद करने के बाद उसने चारों तरफ अच्छी तरह से देखा और सोचने लगा कि आखिरकार उसके बचपन में ऐसा क्या हुआ होगा।
हालाँकि यश इन सब चीज़ों के बारे में शायद सोचना, समझना नहीं चाहता था, लेकिन डीवीडी पर खुद को देखने के बाद और अपनी इतनी बुरी हालत देखने के बाद यश के मन में यह इच्छा जाग चुकी थी कि आखिरकार उसकी माँ के साथ क्या हुआ है?
और वह इतनी बुरी तरह से क्यों रो रहा था? अगर मनोचिकित्सक ने उसकी यादों को धुंधली यादों में कैद कर दिया है, तो उसे अपनी यादें बाहर निकालनी होंगी।
और यह सोचकर वह सोने की कोशिश करने लगा था, लेकिन आज उसकी आँखों में दूर-दूर तक कोई नींद नहीं थी, क्योंकि उसे बार-बार अपने बचपन का आँसुओं से भीगा हुआ चेहरा याद आ रहा था।
बचपन से वह एक सपना ज़रूर देखता आया था कि एक छोटे से गाँव में वह खेल रहा था और खेल-खेल में उसे कुछ चोट लग जाती है।
लेकिन उसके बाद उसे कुछ भी याद नहीं रहता था। और आज जाकर उसे यह बात समझ में आई थी कि आखिरकार उसे पूरा सपना क्यों नहीं दिखाई देता था।
हमेशा धुंधला-धुंधला ही क्यों दिखाई देता था? क्योंकि उसके दादा ने मनोचिकित्सक की मदद से उसकी यादों को धुंधला करवा दिया था।
अगली सुबह यश जल्दी ही तैयार होकर नीचे आ गया था और अपने दादा की ओर देखते हुए कहा था, "दादाजी, आपने किस मनोचिकित्सक से मेरा इलाज करवाया था? मुझे उसका पता और नाम चाहिए।"
जैसे ही यश के दादा ने सुबह-सुबह यश की यह बात सुनी, वह हैरान हो गए थे। बिना किसी सवाल-जवाब के उन्होंने एक कार्ड निकालकर यश के हाथों में थमा दिया था।
और कहने लगे थे, "मुझे पता था कि अगली सुबह तुम मुझसे इस मनोचिकित्सक का पता ज़रूर माँगोगे। इसीलिए मैं पहले ही इसे लेकर तैयार था।"
जैसे ही यश ने अपने दादा की बात सुनी, वह हैरान हो गया था। बिना कुछ कहे वह कार्ड हाथ में लेकर वहाँ से जाने लगा था। तब उसके दादा उसे रोकते हुए बोले थे, "बेटा, कुछ खाकर तो चले जाओ।" लेकिन यश ने बोल दिया था कि नहीं, वह कुछ खाएगा ऑफिस जाकर।
"अभी उसे ज़रूरी काम है।" ऐसा कहकर यश वहाँ से निकल चुका था। तब तक रितेश अपनी पत्नी और बेटी के साथ डाइनिंग टेबल पर आ गए थे।
और यश को वहाँ ना पाकर वह लोग हैरान हो गए थे। तभी रितेश ने अपने दादा से कहा था, "क्या हुआ, पापा? आज आपका लाडला नाश्ता करने के लिए नहीं आएगा? क्या आज आपके लाडले साहब को नाश्ता उसके कमरे में ही चाहिए?" तब उसके पिता उसे घूर कर रह गए थे और कहने लगे थे—
"खबरदार! जो मेरे बेटे के बारे में कुछ भी बकवास करने की कोशिश की, तो! और हाँ, नाश्ता करने का टाइम है। सुबह-सुबह नाश्ता खा लो, और वह काम पर चला गया है, अपने ऑफिस।"
अब रितेश हैरान हो गए और कहने लगे थे, "जल्दी ऑफिस चला गया? लेकिन क्यों? अभी तो काफी टाइम है। जल्दी ऑफिस जाकर क्या करेगा?" तभी आरती जी ने अपने पति का हाथ पकड़ लिया और कहने लगी थीं—
यह क्या? आप क्यों बार-बार उस बेचारे के बारे में उल्टी-सीधी बातें करते रहते हो? क्यों परेशान करते रहते हैं पिताजी को? आप प्लीज़ ऐसा ना किया करें।
जैसे ही आरती जी ने इस तरह से रितेश का हाथ पकड़कर उसे शांत कराया, वह एक बार फिर चुप हो गया था। उसके पिता केवल उसे गहरी नज़रों से देखते हुए जूस पीने लगे थे।
और अचानक जूस पीते-पीते ही उनकी निगाह कहीं और नहीं, बल्कि उनकी पोती ने जो कपड़े पहन रखे थे, उस पर चली गई थी।
क्योंकि उनकी पोती ने आज एक वन-पीस ड्रेस पहना था जिसमें उसके ऊपर का हिस्सा ज़्यादा रिवील हो रहा था।
और तब उसके दादा ने उसे टोकते हुए कहा था, "दिव्या, बेटा, यह तुमने किस तरह के कपड़े पहने हैं? भले ही हम हिंदुस्तान में नहीं रहते हैं, लेकिन हिंदुस्तान के हिसाब से ही तो हमें कपड़े पहनने चाहिए।
और कम से कम पूरे कपड़े ही पहन लिया करो। तुम्हारे बाप को तो यश के बारे में पूछताछ करने के अलावा कुछ और फुर्सत नहीं है, और ना ही उसने तुम्हारी तरफ कभी देखा है।"
जैसे ही उसके दादाजी ने रितेश जी को टोकते हुए कहा, तो रितेश जी अपने पिता को घूर कर रह गए थे। और तब आरती जी बोली थीं, "पिताजी, आप क्यों मेरी बेटी के पीछे पड़े हुए हैं?
यह मॉडर्न ज़माना है और शायद आप भूल रहे हैं, आप हिंदुस्तान में नहीं, विदेश में हैं। और उसने जो कपड़े पहने हैं, बिल्कुल यहाँ के हिसाब से ठीक हैं। और आपको फैशन का कोई ज्ञान नहीं है। आप प्लीज़ नाश्ता कर लीजिए।"
फिर उसके दादाजी ने भी ज़्यादा बोलना ज़रूरी नहीं समझा था और चुपचाप अपना नाश्ता करते हुए वहाँ से जाने लगे थे।
और आरती जी उन्हें देखकर केवल घूर कर रह गई थीं। वहीं दूसरी ओर यश सीधे ऑफिस ना जाकर सीधे अपने दादा के दिए हुए उस मनोचिकित्सक के पते पर पहुँच चुका था।
उसने देखा कि यह कोई छोटा-मोटा क्लीनिक या किसी का घर नहीं था, बल्कि एक बहुत बड़ा, जाना-माना अस्पताल था।
उस अस्पताल में वह मनोचिकित्सक काम करते थे, जिसने बीस साल पहले यश का इलाज किया था। तो यश ने बिना देरी किए जल्दी ही उस अस्पताल के अंदर चला गया था।
और जैसे ही वह अस्पताल के अंदर गया, तो वह पूरी तरह से हैरान हो गया था।
वहाँ पर कितने ही मनोचिकित्सकों के नाम थे, और जिस नाम के साथ यश वहाँ आया था, कम से कम छह से सात लोग उस अस्पताल में काम करते थे।
क्योंकि यह एक बहुत बड़ा अस्पताल था, जिसकी वजह से बहुत सारे लोग वहाँ काम करते थे। यश जल्दी जाकर रिसेप्शन पर खड़ा हो गया था।
वह चाहता तो अपने किसी आदमी के द्वारा यह काम करवा सकता था, लेकिन यह उसकी पर्सनल लाइफ का मामला था, इसलिए वह खुद इसके बारे में तहकीकात करना चाहता था।
जैसे ही यश वहाँ गया और रिसेप्शनिस्ट ने यश को देखा, तो वह हैरान हो गई, क्योंकि आज तक उसने यश को सिर्फ़ मैगज़ीन, टीवी या न्यूज़ चैनल पर ही देखा था।
आखिर क्या है यश के पैदा होने का राज? जानने के लिए बने रहिए, दोस्तों।
क्योंकि वह एक बहुत बड़ा अस्पताल था, जिसकी वजह से काफी सारे लोग वहाँ काम किया करते थे। यश जल्दी जाकर रिसेप्शन पर खड़ा हो गया।
वह चाहता तो अपने किसी भी आदमी के द्वारा यह काम करवा सकता था, लेकिन यह उसकी पर्सनल लाइफ का मामला था, इसलिए वह खुद इसके बारे में तहकीकात करना चाहता था।
जैसे ही यश वहाँ गया और रिसेप्शनिस्ट ने उसे देखा, वह हैरान हो गई। आज तक उसने यश को सिर्फ़ मैगज़ीन्स, टीवी या न्यूज़ चैनल पर ही देखा था।
और आज यश को अपने सामने देखने के बाद, रिसेप्शनिस्ट लड़की ने उसे एक ही नज़र में पहचान लिया और कहने लगी, "सर, आप... आप यहाँ कैसे?" जैसे ही उसने यश को पहचाना, यश केवल हल्का सा मुस्कुराया।
"मैं यहाँ मिस्टर रिचर्ड से मिलना चाहता हूँ," यश ने कहा। वह केवल उसे देखती रही।
उस लड़की की हिम्मत ही नहीं हो रही थी कि वह यश के सामने कुछ भी बोल सके। क्योंकि यश को उसने आज लाइव अपनी आँखों के सामने देखा था, यह उसके लिए बड़ा ही अजब और नया अनुभव था।
क्योंकि यश रियल लाइफ में और भी ज़्यादा हैंडसम और स्मार्ट था, जिस तरह वह मैगज़ीन या टीवी पर दिखा करता था। जल्दी ही उस लड़की ने इस बात की जानकारी अपने सीनियर्स को दे दी।
कि इस अस्पताल में देश का सबसे बड़ा बिज़नेसमैन, और इतना ही नहीं, मोस्ट वांटेड बैचलर आया हुआ है। जैसे ही उसने यह खबर अपनी सीनियर तक पहुँचाई, यह बात जंगल में आग की तरह फैल गई।
और जल्दी ही कई सारे डॉक्टर, सिस्टर, वार्डबॉय, सभी ने आकर यश को पूरी तरह से घेर लिया।
अब यश को समझ में नहीं आया कि वह क्या करे। यश को अचानक याद आया कि वह एक नॉर्मल आदमी बनकर यहाँ आया था, जबकि उसे अपने पूरे प्रोफ़ेशनल सिक्योरिटी के साथ यहाँ आना चाहिए था।
यश के साथ हमेशा 15 से 20 गार्ड चला करते थे, लेकिन आज यश किसी को भी साथ में लेकर नहीं आया था।
तब कहीं ना कहीं उसे इस बात का बुरा लग रहा था। जल्दी ही अस्पताल के डीन वहाँ आ गए। उन्होंने उससे पर्सनली हेलो किया और यश ने भी उन्हें मुस्कुराकर ग्रीट किया। तब वह डीन बड़े ही पोलाइट तरीके से बोला,
"मिस्टर यश ओबरॉय, आप यहाँ आए हैं? तो प्लीज बताइए, ऐसा क्या काम पड़ा कि आप यहाँ अचानक हमारे अस्पताल में चले आए? आपकी तबीयत तो ठीक है ना?"
तभी यश ने, थोड़ा सा सोचते हुए, वह कार्ड जो उसके दादा ने उसे दिया था, उस अस्पताल के डीन के सामने दिखा दिया और कहने लगा, "मैं जो नाम इस कार्ड पर लिखा हुआ है, मैं उनसे मिलना चाहता हूँ।"
जैसे ही यश ने वह कार्ड उस डीन को दिया, उस डीन के चेहरे पर कई सारे भाव आ गए।
और अगले ही पल, हल्का सा उस कार्ड को सहलाने के बाद, उस डीन ने यश से कहा, "यह कार्ड जो आप लेकर आए हैं, उस पर जो नाम लिखा हुआ है, यह एक्चुअली मेरे पिताजी का नाम है।"
"क्या? क्या आप... क्या कह रहे हैं? ये आपके पिताजी का नाम है?" यश हैरान हो गया।
तब उस डीन ने, सिर हिलाते हुए कहा, "जी हाँ। आज से २० साल पहले मेरे पिताजी ने ही इस अस्पताल में काम करने के साथ-साथ, एक छोटे से अस्पताल की शुरुआत की थी।"
"तब यह अस्पताल काफी छोटा था और मेरे पिताजी यहाँ पर एक अकेले डॉक्टर थे। फिर धीरे-धीरे उन्होंने अस्पताल को बढ़ाना शुरू कर दिया और आज देखो, आज उनकी मेहनत का नतीजा आपकी आँखों के सामने है।"
तभी यश ने अस्पताल के डीन साहब की ओर देखते हुए कहा, "तो क्या आप मुझे बता सकते हैं कि आपके पिताजी मुझे कहाँ मिल सकते हैं? एक्चुअली मुझे उनसे कुछ ज़्यादा ही ज़रूरी काम है, जो पर्सनल है।" जैसे ही यश ने यह कहा, अस्पताल का डीन केवल उसे घूर कर रह गया।
और सोचने लगा कि अगर इतने बड़े आदमी को ज़रूरी काम नहीं होता, तो भला ये यहाँ आते ही क्यों? लगता है इन्हें कुछ ज़्यादा ही ज़रूरी काम है। तब डीन साहब ने यश से कहा,
"जी मिस्टर ओबरॉय, मेरे पिताजी से तो आप मिल सकते हैं, लेकिन एक्चुअली अब वह काफी ज़्यादा बूढ़े हो चुके हैं, जिसकी वजह से उनकी तबीयत काफी ज़्यादा खराब रहती है। इस वक्त वह अस्पताल में नहीं, बल्कि मेरे घर पर मौजूद हैं। आप चलिए, मैं आपको पर्सनली अपने साथ लेकर चलता हूँ और आपको अपने पिता से मिलवाता हूँ।"
"पर हाँ, मिस्टर यश साहब, मैं आपको एक और बात साफ-साफ कह देता हूँ कि हो सकता है कि मेरे पिताजी जो भी आप उनसे जानना चाहते हैं, हो सकता है उन्हें कुछ याद ना हो। क्योंकि वह बूढ़े हो चुके हैं, उनकी याददाश्त काफी ज़्यादा कमज़ोर हो गई है।"
जैसे ही यश ने यह सुना, वह थोड़ा सा चौंक गया। और अगले ही पल उसे एक उम्मीद की किरण नज़र आने वाली थी, वह टूटती हुई उसे नज़र आने लगी।
लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी और उसने फिर हल्का सा मुस्कुराते हुए डॉक्टर से कहा, "ठीक है, मैं अभी इसी वक्त आपके पिताजी से मिलना चाहूँगा।"
हालाँकि यह यश का ऑफिस का समय था और आज तक, जब से यश ने होश संभाला था, उसने आज तक एक दिन भी अपना ऑफिस का न तो छुट्टी ली थी और न ही वह अपने ऑफिस में लेट गया था।
लेकिन आज वह कुछ और जानना चाहता था, तो इस चक्कर में आज उसने ऑफिस को काफी ज़्यादा लेट कर दिया था। और जल्दी ही वह अस्पताल के डीन के साथ उनके घर की ओर रवाना हो चुका था।
वहीं दूसरी ओर, अवनी की बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी और लगातार उसे अपने बाजू में अजीब सा दर्द महसूस होने लगा था। ऐसा लग रहा था कि अवनी के साथ-साथ, जो कहानी चल रही थी, उसके बाजू में जो आत्मा बसी हुई थी, वह भी उसे कहानी को देख रही थी।
उसे बार-बार इतना ज़्यादा दर्द हो रहा था कि वह हर बार अपना हाथ पकड़ कर बैठ जाती थी और उसे काफी ज़्यादा दर्द का एहसास होने लगता था।
लेकिन उसे फिलहाल अपने इस दर्द को इग्नोर करके सिर्फ़ यह जानना था कि आखिरकार जो यह हैंडसम चेहरा इस एलईडी स्क्रीन पर दिखाया जा रहा था, आखिरकार इसके साथ क्या हुआ था और क्या वाकई वह डॉक्टर उसे ऐसा कुछ बता पाएगा जिससे वह अपनी माँ के बारे में जान पाएगी।
तो कहीं ना कहीं यह सोचते हुए, अवनी बड़ी ही बेसब्री से यश के डीन साहब के घर पहुँचने का इंतज़ार करने लगी।
अस्पताल का डीन जल्दी ही उसे अपने घर ले गया। यश ने देखा कि उनका घर बड़ा ही शानदार बना हुआ था। उस शानदार घर में से जाते हुए, अचानक एक कमरे में जाकर अस्पताल के डीन ने इशारा किया, "यह कमरा मेरे पिताजी का है। आप जाइए और जाकर उनसे मिल सकते हैं। तब तक मैं आपके लिए नाश्ते का प्रबंध करवाता हूँ।"
डीन साहब यश को पूरी प्राइवेसी देना चाहते थे, इसलिए वह उसके साथ कमरे के अंदर तक नहीं गए। और यश को कमरे के बारे में बताकर वह वहाँ से चले गए।
और यश अपने आप को कमरे में जाने के लिए तैयार करने लगा।
और कुछ ही पल में वह एक बड़े ही बुज़ुर्ग आदमी के सामने बैठा हुआ था।
यश ने सीधे-सीधे उस बुज़ुर्ग को देखते हुए कहा, "सर, मुझे लगता है कि पहले तो मैं आपसे माफ़ी चाहता हूँ कि मैं आपको इस तरह से, ऐसी हालत में परेशान कर रहा हूँ।"
"लेकिन मेरा यहाँ आने का सिर्फ़ एक ही कारण है; अपनी पहचान। मैं जानना चाहता हूँ कि आखिरकार आपने ऐसी कौन सी यादें हैं जो मेरे दिल और दिमाग से धुंधली की थीं। यह डीवीडी आप प्लीज़ एक बार देख लीजिए, हो सकता है कि आपको कुछ याद आ जाए।" ऐसा कहकर यश ने अपने साथ लाई हुई वीडियो उस साइकियाट्रिस्ट के सामने चलाना शुरू कर दिया।
वह साइकियाट्रिस्ट कभी यश को देख रहा था, तो कभी डीवीडी को देख रहा था। अचानक से उसके हाव-भाव पूरी तरह से बदल गए और वह कहने लगा, "सुनो, तुम यश ओबरॉय हो क्या?" जैसे ही उसने अपनी टूटी-फूटी जुबान में यश का नाम लिया, यश हैरान हो गया।
"जी, जी सर, क्या आप मुझे जानते हैं?" यश ने पूछा। तब साइकियाट्रिस्ट ने आगे कहना शुरू किया, "हाँ, मैंने तुम्हारी कुछ यादों को धुंधला कर दिया था, क्योंकि वह यादें तुम्हें चैन से जीने नहीं दे रही थीं।"
"वह यादें क्या थीं, इसके बारे में तुम्हें पता नहीं लग पाया, लेकिन जो कुछ भी था, शायद बड़ा ही दर्दनाक था, जिसे तुम बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे। क्योंकि भले ही मैं सारी चीज़ें भूल जाऊँ, अपना नाम तक भूल जाऊँ, लेकिन तुम्हें मैं किसी भी कीमत पर नहीं भूल सकता हूँ।"
"क्योंकि तुम मेरी ज़िन्दगी के ऐसे बच्चे थे, इतने डरे हुए, सहमे हुए, और बड़े दर्द से गुज़रे हुए बच्चे थे, इसके बारे में मैं सोच भी नहीं सकता था।"
यश काफी ज़्यादा हैरान था कि जिस बुज़ुर्ग की याददाश्त काफी कम हो चुकी थी, वह उसे पहली नज़र में ही पहचान गया था। उसे एक ही बार डीवीडी देखते ही सारी चीज़ें बताना शुरू कर दिया था।
तब यश ने जल्दी से उस साइकियाट्रिस्ट से कहा, "तो क्या आप प्लीज़, जो भी यादें आपने मेरे दिल और दिमाग से मिटाई थीं, क्या आप उन्हें एक बार फिर से साफ़ कर सकते हैं?"
जैसे ही यश ने यह कहा, तब साइकियाट्रिस्ट हल्का सा मुस्कुराते हुए बोले, "मेरे बेटे को बुलाओ।" जैसे ही उस साइकियाट्रिस्ट ने यह कहा, यश ने देरी न करते हुए उनके बेटे को बुला लिया। उनके बेटे, यानी अस्पताल के डीन, यह देखकर पूरी तरह से हैरान हो गए।
कि उसके पिताजी यश से कितनी ज़्यादा कैज़ुअल तरीके से बात कर रहे थे, जबकि इतने सालों में उन्होंने किसी से भी ढंग से बात तक नहीं की थी। इन फैक्ट, अपने बेटे से ही बात तक नहीं की थी। तब उसके पिताजी ने अपने बेटे को देखते हुए कहा,
"बेटा, अपने अस्पताल के एक साइकियाट्रिस्ट को यहाँ बुलाओ।" जैसे ही उसके पिता ने यह हुक्म दिया, वह बहुत ही ज़्यादा खुश हो गया, क्योंकि इतने सालों के बाद उसके पिता ने यह शब्द उसे साफ़-साफ़ कहे थे।
जल्दी ही एक साइकियाट्रिस्ट को वहाँ बुलाया गया। और तब अस्पताल के उस साइकियाट्रिस्ट ने उस बुज़ुर्ग साइकियाट्रिस्ट से कुछ समझाना शुरू कर दिया।
बेटा, अपने हॉस्पिटल के एक साइकियाट्रिस्ट को यहाँ बुलाओ।"
उसके पिता का यह हुक्म सुनते ही वह बहुत खुश हो गया। इतने सालों बाद उसके पिता ने उसे साफ़-साफ़ कुछ कहा था। जल्दी ही एक साइकियाट्रिस्ट बुलाया गया। हॉस्पिटल के उस साइकियाट्रिस्ट ने बुज़ुर्ग साइकियाट्रिस्ट को कुछ समझाना शुरू कर दिया। यश को एक बड़ी कुर्सी पर बिठाया गया और बुज़ुर्ग के निर्देशानुसार उसका इलाज शुरू हुआ। उसे एक गहरे रंग पर ध्यान केंद्रित करने को कहा गया और यश जल्दी ही उनके वश में हो गया।
बुज़ुर्ग साइकियाट्रिस्ट ने उसी तरह, अमन की यादों में बीते बीस साल पहले जाकर, यश की पाँच-छह साल की उम्र की यादों को साफ़ कर दिया। फिर उन्होंने यश को उसकी कड़वी यादों के साथ, अपने वश से बाहर निकाल दिया।
जैसे ही यश बाहर आया, उसे अपने दिल में तेज दर्द हुआ। हालाँकि, उसने अभी उन यादों के बारे में जानने की कोशिश नहीं की। साइकियाट्रिस्ट ने कहा था, "जो यादें हमने आपकी साफ़ की हैं, वह शायद अभी आपको पूरी तरह से याद ना आएँ। उन्हें साफ़ होने में अभी थोड़ा वक़्त लगेगा। लेकिन हाँ, जिन यादों को हमने अपने साइकियाट्रिक टेक्निक का प्रयोग करके बंद/धुंधला कर दिया था, वह अब बिल्कुल आपके लिए साफ़ हैं। और किसी भी पल आपको वह सारी यादें ताज़ा हो सकती हैं।"
यश मुस्कुराया और साइकियाट्रिस्ट को धन्यवाद दिया। फिर विदा लेकर अपने ऑफ़िस की ओर चल दिया। वह काफी देर हो चुका था, और यश को देर होना बिल्कुल पसंद नहीं था।
ऑफ़िस पहुँचते ही सभी लोग उसे ऐसे देख रहे थे जैसे उन्होंने कोई एलियन देख लिया हो। यश ओबरॉय इतना लेट कभी नहीं आया था। सभी एक-दूसरे को हैरानी से देख रहे थे। लेकिन यश ने किसी को कुछ नहीं कहा। वह सीधा अपने केबिन में जाकर बैठ गया।
तभी उसका सेक्रेटरी स्टीफन आया और बोला, "बॉस, वह मिस्टर डिसूजा का ईमेल आया है। उसे पैसों की बहुत ज़रूरत है। लेकिन आपके रूल-रेगुलेशन के मुताबिक़, अगर किसी एम्प्लॉयी को जॉब से बीच में निकाल दिया जाता है, तो उसकी सैलरी महीने के आखिर में ही दी जाती है। तो बॉस, उसे अभी पैसों की ज़रूरत है, तो क्या हम उसे सैलरी उसके समय होने से पहले दे सकते हैं?"
यश ने उसकी ओर देखते हुए कहा, "ठीक है, तुम उसे पैसे दे सकते हो।"
स्टीफन हैरान हो गया और अपने बॉस को आँखें मसल-मसल कर देखने लगा। यश ने फिर कहा, "और हाँ, इस बात का पता लगाओ कि मिस्टर डिसूजा की बेटी कौन से हॉस्पिटल में एडमिट है। हम उसे देखने भी जाएँगे और पैसे, जो भी उनकी सैलरी के पैसे बनते हैं, वह तुम उनके अकाउंट में ट्रांसफ़र कर दो।"
यश अपना काम करने में व्यस्त हो गया। स्टीफन हैरान था कि आज उसके बॉस का बर्ताव इतना अलग क्यों है। यश खुद भी सोच रहा था कि वह क्या कर रहा है।
माँ के मृत्यु और रितेश ओबरॉय के उसके पिता न होने की जानकारी मिलने के बाद से उसकी ज़िन्दगी बदल गई थी। उसके दिल में थोड़ा रहम आ गया था। यश को इस बात का एहसास नहीं था कि यह रहम आगे चलकर कितना काम आने वाला था।
स्टीफन ने जल्दी ही मिस्टर डिसूजा की बेटी के हॉस्पिटल के बारे में जानकारी निकाल ली। यश अपने सेक्रेटरी के साथ हॉस्पिटल के लिए रवाना हो गया। आज उसे अपने करोड़ों या किसी चीज़ की परवाह नहीं थी। उसकी हालत अजीब सी थी। उसके मन में कई सवाल थे। उसकी ज़िन्दगी का क्या मतलब था? वह इतना कठोर कब हो गया था कि उसके आस-पास के लोग उससे डरने लगे थे?
हॉस्पिटल में पहुँचकर उसने देखा कि नम आँखों से मिस्टर डिसूजा अपनी बेटी के वार्ड की ओर देख रहे थे। स्टीफन ने जाकर मिस्टर डिसूजा के कंधे पर हाथ रखा। मिस्टर डिसूजा हड़बड़ा गए और अपने बॉस को देखकर हैरान हो गए। उन्होंने कहा, "स-स-सर, आप... आप... आपका यहाँ किस लिए आना हुआ? क्या आप मुझे अरेस्ट करवाने के लिए आए हैं कि मैंने आपकी नौकरी बीच में ही छोड़ दी है?"
यश को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने सचमुच बड़ी गलती की थी। उसके कर्मचारी उसके बारे में ऐसी राय रखते थे। यश ने दोनों हाथ जोड़कर कहा, "मुझसे जो भी गलती हुई है, प्लीज़ मुझे माफ़ कर दीजिए।"
उसने मिस्टर डिसूजा की नौकरी उन्हें वापस दे दी और उनकी बेटी के इलाज का सारा खर्चा अपने ऊपर ले लिया। मिस्टर डिसूजा की आँखों में खुशी के आँसू थे। उन्होंने अपने बॉस का इतना नरम रूप पहले कभी नहीं देखा था। उन्होंने दिल से दुआ दी, "आप ज़िन्दगी में कभी भी अकेले नहीं रहेंगे और आपकी ज़िन्दगी में इतनी खुशियाँ होंगी कि कोई सोच भी नहीं सकता है।"
यश हल्का महसूस कर रहा था। वह हॉस्पिटल से निकलकर सीधा घर चला गया। घर पर उसके दादाजी उसका इंतज़ार कर रहे थे। यश मुस्कुराया और उनके पास बैठ गया। उसका मन अपने दादा से ढेर सारी बातें करने को कर रहा था।
यश ने कहा, "दादाजी, जब से मैंने सच जाना है, जब से मैं हर रोज़ ऑफ़िस पर जा रहा हूँ, सारे काम कर रहा हूँ, लेकिन मेरे दिल में मुझे सुकून नहीं मिल पा रहा है और मुझे समझ नहीं आ रहा है कि वह सुकून की तलाश में मैं कहाँ करूँ? तो आपको मेरी मदद करनी ही होगी। आपको मुझे इस बात की सारी इनफ़ॉर्मेशन देनी होगी कि किस हॉस्पिटल से आप मुझे लेकर आए थे और किस हॉस्पिटल में मेरी माँ एडमिट थी और मेरी माँ का क्या नाम था?"
उसके दादा की आँखें भर आईं। उन्होंने कहा, "मेरे बच्चे, मैं अच्छी तरह से जानता था, साइकियाट्रिस्ट के बाद अगर तू किसी के बारे में पूछेगा, तो यह सारी इनफ़ॉर्मेशन ही पूछेगा। तेरे कमरे में एक नीले रंग की डायरी रखी हुई है, उसमें तुझे सारी इनफ़ॉर्मेशन मिल जाएगी। और एक और बात, तू साथ ही साथ इंडिया की टिकट भी अपने पास रख लेना। तो इसीलिए ध्यान से इंडिया जा और अपने मक़सद में कामयाब होकर आ।"
यश हल्का मुस्कुराया और उठ खड़ा हुआ। जैसे ही वह अपने कमरे की ओर जाने लगा, उसे अपनी बहन की आवाज़ सुनाई दी। रितेश जी की बेटी, जोर-जोर से अपनी माँ पर चिल्ला रही थी, "आखिरकार क्यों आप लोगों ने उसे ग़रीब, भिखारी को अपने घर में रखा हुआ है और वह हमारी सारी प्रॉपर्टी का मालिक बन बैठा है? उसे निकालिए यहाँ से और उसे यहाँ से जाने के लिए कहिए। मैं उसे अपना भाई नहीं मानती हूँ।"
वह अपनी माँ से झगड़ रही थी। उसकी माँ एक शातिर औरत थी और वह जानती थी कि यश ने अपनी मेहनत से यह मुक़ाम हासिल किया है। इतनी आसानी से वह यश को नहीं हटाना चाहती थी।
यश थोड़ी देर अपनी बहन की बातें सुनकर चौंका, लेकिन पहले कभी उसने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया था। लेकिन आज उसकी बातें उसे बुरा महसूस करवा रही थीं। वह कुछ देर सुनने के बाद अपने कमरे में चला गया।
उसने देखा कि उसके बेड पर एक नीली डायरी रखी हुई थी। यश ने उसे उठाया और पढ़ना शुरू कर दिया। वह हैरान हो गया। उसकी माँ का नाम यशस्वी था।
यश के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसे अपने नाम पर गर्व हुआ। वह समझ गया कि उसका नाम यश क्यों रखा गया था। उसने अपनी माँ से जुड़ी यादें पढ़ना शुरू कर दिया। उसने अपनी माँ के बारे में सब कुछ जान लिया। उसकी नज़र पास में रखे टिकट पर पड़ी, जो इंडिया के लिए था।
यश सोचने लगा कि उसके दादा ने उसे फ़्लाइट टिकट क्यों दिया है। वह हमेशा अपने चॉपर या प्राइवेट जेट से यात्रा करता था। उसे लगा कि शायद इंडिया में उसे मुश्किलों का सामना करना पड़े और उसे अपनी पहचान छुपानी पड़े। इसलिए उसने टिकट से यात्रा करने का फ़ैसला किया।
उसके दादा उसके पास आए और बोले, "बेटा, यह फ़्लाइट टिकट तुम्हारी कल सुबह की ही है और मुझे पूरी उम्मीद है, ऑफ़िस का काम यह सब कुछ तुम अपने लैपटॉप के द्वारा भी कर सकते हो और वैसे भी तुम अब इस मुक़ाम पर पहुँच गए हो कि तुम्हें कोई काम करना नहीं होता है, सिर्फ़ और सिर्फ़ लोगों को इंस्ट्रक्शन ही तो देना होता है और तुम आराम से हर सुबह उठकर आराम से सभी लोगों में काम भी बाँट सकते हो। और हाँ, तुम्हें एक और बात का अच्छी तरह से ध्यान रखना होगा। तुम्हें वहाँ जाकर अपनी पहचान को गुप्त रखना होगा। तुम किसी के सामने बिल्कुल भी यह बात नहीं आने दोगे कि तुम ऑस्ट्रेलिया के बिगेस्ट बिज़नेसमैन हो, क्योंकि तुम्हारी फ़ोटो, तुम्हारी इमेज, इतना ही नहीं, तुम्हें सिर्फ़ ऑस्ट्रेलिया का बच्चा-बच्चा जानता है, लेकिन इंडिया में तुम्हें कोई भी नहीं जानता होगा। मुश्किल से कुछ गिने-चुने बड़े बिज़नेसमैन ही तुम्हें जानते होंगे और उनसे तुम्हारा पाला नहीं पड़ने वाला है। तो इसीलिए तुम्हें इन सब बातों का अच्छी तरह से ध्यान रखना होगा। और यह एक और बात याद रखना, बेटा, इंडिया के लोग काफी ज़्यादा अलग हैं। वहाँ तुम्हें दिमाग़ से कम और दिल से काम ज़्यादा लेना होगा।"
क्या यश इंडिया जाकर अपनी माँ के बारे में जानकारी हासिल कर पाएगा? क्या हुआ था यश के साथ? जानने के लिए बने रहिए दोस्तों।
तुम किसी के सामने बिल्कुल भी यह बात नहीं आने दोगे कि तुम ऑस्ट्रेलिया के सबसे बड़े व्यापारी हो, क्योंकि तुम्हारी फ़ोटो, तुम्हारी छवि, इतना ही नहीं, तुम्हें ऑस्ट्रेलिया का हर बच्चा जानता है।
लेकिन इंडिया में तुम्हें कोई नहीं जानता होगा। मुश्किल से कुछ गिने-चुने बड़े व्यापारी ही तुम्हें जानते होंगे और उनसे तुम्हारा पाला नहीं पड़ने वाला है।
इसलिए तुम्हें इन सब बातों का अच्छी तरह से ध्यान रखना होगा। और यह एक और बात याद रखना, बेटा, इंडिया के लोग काफी अलग हैं। वहाँ तुम्हें दिमाग से कम और दिल से काम ज़्यादा लेना होगा।
तुम समझ रहे हो ना मैं तुम्हें क्या कहना चाह रहा हूँ?
जैसे ही उसने अपने दादा की बात सुनी, वह हल्का सा मुस्कुरा उठा और कहने लगा, "आप फ़िक्र मत कीजिएगा दादा जी। अब आपका पोता पत्थर दिल नहीं, बल्कि एक सामान्य दिल भी रखता है।"
"और मैं जल्दी ही सारी जानकारी के साथ आपके पास आऊँगा और आपको यह बताऊँगा कि आपकी बेटी की मौत क्यों हुई थी और साथ ही साथ इस बात के बारे में भी पता लगाऊँगा कि आखिरकार मेरे बाप कौन था।" यश की बात सुनकर उसके दादा में भी एक हिम्मत आ गई थी।
कि उनका इतने दिनों का सपना अब पूरा हो जाएगा। क्योंकि पिछले बीस सालों से वे सिर्फ़ और सिर्फ़ यही सोचा करते थे कि उनकी बेटी की मौत कैसे हुई है।
और उसका वह राज जानना चाहते थे और उनकी बेटी के कातिलों को सज़ा दिलाना चाहते थे। जो अब शायद उनका पोता यश पूरा करने वाला था। वही यश, जैसे ही रात में सोया, अचानक उसे उसके बचपन के सपनों से आगे कुछ दिखाई देने लगा था।
लेकिन वह यादें अभी भी साफ़ नहीं थीं और यश पूरा पसीने-पसीने हो गया था। वह सोचने लगा था कि उसे तो कुछ खास दिखाई भी नहीं दिया था, तो क्यों इतना ज़्यादा वह डरा हुआ सा महसूस कर रहा है?
अवनी के भी हाथों के रोएँ खड़े हो गए थे। वह सोचने लगी थी कि यह इंसान इतना ज़्यादा स्मार्ट है, इतना ज़्यादा हैंडसम है और इसके चेहरे पर जो पसीने ऐसे लग रहे हैं, मानो कि हरी-हरी घास पर सुबह की ओस की बूँदें।
तभी अवनी की माँ ने उसके हाथ पर हल्का सा मार दिया और कहने लगी, "ये तू किस तरह की बातें कर रही है? तू एक भूत के बारे में अपने ख्याल पैदा कर रही है। तू जानती नहीं, वह तेरे एक हाथ में है और उसने हमें यहाँ कैद किया है।"
तब अवनी ने अपनी माँ से कहा, "माँ, मुझे लगता है कि हमें पूरी सच्चाई देखनी चाहिए। और अब तो मुझे भी यह जानने की इच्छा हो रही है कि आखिरकार यश के साथ क्या हुआ है।"
तभी अवनी की माँ ने भी उसकी हाँ में हाँ मिला दी और वहीं अगले ही पल, वे तीनों बड़े ही ध्यान से अपनी एलईडी स्क्रीन को देखने लगे थे।
उसमें आगे दिखाई जा रहा था कि अगली सुबह जैसे ही यश उठा, उसने फटाफट से अपना सारा सामान पैक किया और अपने टिकट लेकर अपने दादा के पास आया।
जैसे ही उसके दादा ने यश को इस तरह से सामान के साथ तैयार देखा, वे हैरान नहीं हुए, क्योंकि वे अच्छी तरह से जानते थे कि यश सामान के साथ ही सुबह उनसे मिलने वाला था।
और जल्दी से उन्होंने आगे बढ़कर अपने पोते को गले से लगा लिया और कहने लगे, "मुझे पूरी उम्मीद है कि तुम बहुत जल्द कामयाब होकर लौटोगे।"
"और हाँ, बेटा, एक और बात तुम्हें याद रखनी होगी; भले ही तुम इंडिया में पैदा हुए थे, लेकिन तुम पले-बढ़े विदेश में हो। तो तुम्हारे लिए इंडिया किसी विदेश से कम नहीं है। तुम्हें वहाँ पर बड़े ही सोच-समझकर रहना होगा। एक और बात तुम्हें याद रखनी होगी कि किसी को भी इस बात का पता नहीं लगना चाहिए कि तुम यश ओबेरॉय हो, क्योंकि मैंने अच्छी तरह से रिसर्च कर ली है।"
"इंडिया में सिर्फ़ लोगों को तुम्हारा नाम पता है, लेकिन किसी ने भी वहाँ पर तुम्हें आज तक नहीं देखा है। ऑस्ट्रेलिया की बिज़नेस न्यूज़ कभी भी देश से बाहर नहीं गई है और क्योंकि किसी ने भी तुम्हें नहीं देखा है..."
"तो तुम्हें बहुत संभलकर रहना होगा।"
"तुम समझ रहे हो ना मेरी बात?" अपने दादा की बात सुनकर यश ने अपनी गर्दन हाँ में हिला दी और वह कहने लगा, "आपको परेशान होने की बिल्कुल भी कोई ज़रूरत नहीं है। मैं इंडिया जाकर जल्द से जल्द अपनी माँ के बारे में सारी जानकारी पता लगा लूँगा।"
"और अगर मेरी माँ के साथ वाकई किसी ने गलत किया है या मेरे बाप ने मेरी माँ के साथ गलत किया है, तो मैं उन्हें सज़ा दिलाकर जल्द से जल्द लौट आऊँगा।"
"मुझे पूरी उम्मीद है दादा जी, आप मेरा तब तक इंतज़ार करेंगे।" ऐसा कहकर यश ने अपने दादा को गले से लगा लिया और कहने लगा, "आप मुझे इज़ाज़त दीजिए।" ऐसा कहकर यश जल्दी ही वहाँ से निकल गया।
और उसके दादा उसे नम आँखों से देखते रहे। वहीं रितेश जी के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कराहट आ गई थी, क्योंकि वे तो शुरू से ही यश को वहाँ से भेजना चाहते थे।
और अब तो यश खुद वहाँ से जा रहा था, तो उन्हें ऐसा लगने लगा था मानो कि यह सब कभी वापस नहीं लौटेगा। उन्हें सिर्फ़ इंडिया में बसे यश के दुश्मनों को इस बात की खबर देनी थी कि यश इंडिया आ रहा है। लेकिन यश के दुश्मन कौन थे, इस बात के बारे में भी उन्हें कुछ खास जानकारी नहीं थी।
लेकिन उन्होंने सोच लिया था कि भले ही यश के दुश्मन इंडिया में ना हों, लेकिन वे दुश्मन पैदा तो कर सकते हैं। और वैसे भी, पैसा क्या नहीं कर सकता? पैसा किसी भी देश में बैठे हुए हो, दूसरे देश में भी काम करवा सकता है।
यह सोचते हुए उन्होंने अपने एक पुराने मित्र को कॉल कर दिया, जो कि कभी इंडिया में उनका क्लासमेट हुआ करते थे। और अपने मित्र को उन्होंने यश को "ठिकाने लगाने" का काम दे दिया, कि भले ही यश के असली दुश्मनों को यश मिले या ना मिले, लेकिन वे यश का काम वही तमाम कर देना चाहते थे।
क्योंकि यश ने आते ही, भले ही बिज़नेस को किसी भी मुक़ाम पर ले गया हो, लेकिन यश की कामयाबी वे बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे।
अगर यश की जगह उनका अपना बेटा इस तरह से कामयाब होता, तो शायद वे फूले नहीं समाते। लेकिन उनकी बहन का बेटा, उस बहन का बेटा जिस बहन ने उनकी नाक कटवाई थी, उनकी इज़्ज़त तार-तार कर दी थी...
उसके बेटे को इस तरह से वे आगे बढ़ते नहीं देखना चाहते थे। कहीं ना कहीं उनके मन में इसी बात की सबसे ज़्यादा नफ़रत थी।
वेल, यश जल्दी ही ऑस्ट्रेलिया की फ़्लाइट से इंडिया के लिए रवाना हो चुका था।
यश ने काफी मामूली से कपड़े अपने पास रखे थे। वह वहाँ पर एक सामान्य मानुष बनकर रहना चाहता था। किसी को भी इस बात का भनक नहीं लगने देना चाहता था कि असल में वह कौन है। वह अपना सारा काम अपने लैपटॉप से करने का फ़ैसला कर लिया था।
वेल, यश कितनी ही देर तक इन बातों, इन खयालों में खोया रहा था कि न जाने इंडिया में उसका बाप कौन होगा और क्या वह उसे अपनाएगा या नहीं? उसका बाप अच्छा होगा, बुरा होगा?
यश को किसी भी चीज़ के बारे में कुछ भी नहीं पता था। और इनही उलझनों में कब उसकी आँख लग गई, यश को एहसास ही नहीं रहा। तभी अचानक ख्वाब में यश ने देखा कि एक औरत की साड़ी उसके जिस्म से अलग होकर फ़र्श पर गिरी पड़ी थी।
इतना ही नहीं, वह औरत घुटनों में अपना सर दिए, बिल्कुल नग्न बदन बैठी हुई थी।
और जैसे ही यश ने उस औरत का चेहरा देखने की कोशिश की, तो वह पूरी तरह से हैरान हो गया, क्योंकि वह चेहरा उसकी माँ का बिल्कुल भी नहीं था।
तो फिर यह औरत कौन थी जो इस तरह से नग्न बदन बैठी हुई थी और उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में आँसुओं की लकीरें उसके गले तक आ रही थीं?
जैसे ही यश ने यह देखा, अचानक उसने घबराकर अपनी आँखें खोल लीं और डर के मारे पसीने-पसीने हो गया था। जैसे ही फ़्लाइट की एयर होस्टेस ने यश की ऐसी हालत देखी, तो उन्होंने तुरंत ही डॉक्टर से संपर्क करने की कोशिश की और उसे संभालने की कोशिश की।
तभी उसने कुछ देर बाद खुद को संभाला और एकदम ठंडी बियर अपने लिए मँगवा ली, क्योंकि वह थोड़ा सा खुद को बेहतर महसूस करना चाहता था। इसलिए उसने बियर का सहारा लिया और ठंडी बियर आने के बाद एक ही झटके में उसे पूरी ख़त्म कर गया और सोचने लगा कि यह सब क्या था?
क्योंकि जब से साइकियाट्रिस्ट ने उसकी खोई हुई यादों को साफ़ किया था, तब से उसे अलग-अलग तरह के दृश्य दिखाई दे रहे थे। लेकिन आज जो यह दृश्य था, वह सबसे ज़्यादा अलग और भयानक सा था।
और यश ने उस औरत के चेहरे को भी अच्छी तरह से देखा था। वह चेहरा उसकी माँ का बिल्कुल भी नहीं था, क्योंकि अपनी माँ की फ़ोटो वह अपने दादा के एल्बम में देख चुका था।
वेल, उसके बाद डर के मारे यश ने आँखें बंद नहीं कीं और कितनी ही देर तक वह इस तरह से बैठा रहा। और जल्दी ही, करीब बारह से तेरह घंटे में वह इंडिया के एयरपोर्ट पर मौजूद था। उसकी फ़्लाइट लैंड कर चुकी थी।
जैसे ही यश बाहर आया, तो वह हैरान हो गया, क्योंकि पहली बार उसने पूरे कपड़ों में लड़कियों और बच्चों को देखा था। क्योंकि यश जिस माहौल में बड़ा हुआ था, वहाँ खासकर छोटे कपड़े ही लड़कियाँ पहना करती थीं।
लेकिन यहाँ ज़्यादा से ज़्यादा साड़ियाँ, कुर्ते, सलवार सूट, अनारकली सूट, पजामा, लेहँगा सूट समेत लड़कियाँ उसने देखी थीं, जिन्होंने पूरे कपड़े पहन रखे थे। यश कितनी ही देर तक सभी को पागलों की तरह देखता रहा। और जब वह एक लड़की को बड़े ही ध्यान से देख रहा था, तब वह लड़की गुस्से से यश की ओर घूरते हुए कहने लगी,
"लड़के, कौन हो तुम और इस तरह से मुझे क्यों देख रहे हो?" तभी यश हड़बड़ा गया और जल्दी से दोनों हाथ जोड़कर माफ़ी माँगता हुआ बोला, "सॉरी मैडम, मैं तो सिर्फ़ आपके कपड़े देख रहा था। क्या यहाँ पर सभी पूरे कपड़े पहनते हैं?"
जैसे ही यश ने यह कहा, वह लड़की हैरान हो गई और उसकी ओर देखकर कहने लगी, "व्हाट यू मीन? यहाँ पर सभी पूरे कपड़े पहनते हैं? यहाँ यह इंडिया है और यहाँ जैसे मर्ज़ी वैसे कपड़े पहन सकते हैं। यहाँ पर कोई अलग से कानून पास नहीं हुआ है कि तुम्हें कम या ज़्यादा ही कपड़े पहनने हैं, समझे तुम?"
वह लड़की जल्दी ही यश को करारा जवाब देकर चली गई और यश ने एक बार फिर किसी और से यह सवाल करने के बारे में नहीं सोचा। क्योंकि वह सोचने लगा कि वह यहाँ पर इस तरह से उससे बात क्यों कर रहा है? क्या वह कोई अजीब बर्ताव कर रहा है?
लेकिन जैसे ही यश थोड़ा सा आगे आया, तभी उसके कानों में एक आवाज़ गूंजने लगी, "यश! यश!" यश हैरान हो गया कि यह आवाज़ किसकी है। और जैसे ही उसने पीछे मुड़कर देखा, तो हैरान हो गया। एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति, हाथ में उसके नाम की नेमप्लेट लिए, उसी का नाम पुकार रहा था। क्या यश अपनी मंज़िल में कामयाब हो पाएगा? जानने के लिए बने रहिए दोस्तों।