ऋषि नंदा — एक ऐसा नाम जिसे किसी पहचान की ज़रूरत नहीं।देश हो या विदेश, उसकी कंपनी का जाल हर कोने में फैला है। लड़कियां उसकी एक झलक पाने के लिए बेकरार रहती हैं... लेकिन ऋषि कभी किसी के करीब नहीं गया। पर एक दिन, एक अनजानी शादी में जाकर उसने जो किया, उसन... ऋषि नंदा — एक ऐसा नाम जिसे किसी पहचान की ज़रूरत नहीं।देश हो या विदेश, उसकी कंपनी का जाल हर कोने में फैला है। लड़कियां उसकी एक झलक पाने के लिए बेकरार रहती हैं... लेकिन ऋषि कभी किसी के करीब नहीं गया। पर एक दिन, एक अनजानी शादी में जाकर उसने जो किया, उसने सबको हैरान कर दिया — ऋषि ने सबके सामने दुल्हन से जबरदस्ती शादी कर ली। ना लड़की उसे जानती थी, ना वो लड़की को। लेकिन इस जबरन शादी के पीछे छुपा था एक ऐसा राज..जिसने ऋषि की ज़िंदगी को पूरी तरह बदल कर रख दिया। कौन थी वो लड़की?क्यों ऋषि ने बिना सोचे-समझे उससे शादी कर ली?और क्या थी उस दुल्हन की वो खौफनाक सच्चाई…जिसने सबको हिला कर रख दिया? एक जबरन रिश्ता…एक छुपा हुआ सच…और एक खेल, जिसे दोनों ने कभी खेला ही नहीं था।
ऋषि नंदा और आराध्या
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ओजस और काम्या
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रणवीर और प्रियंका
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आतिश नंदा
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इश्क़ी
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देहरादून की सड़कों पर सात गाड़ियों का काफिला जा रहा था। तीसरी कार की पिछली सीट पर एक हैंडसम आदमी बैठा था, सिर सीट पर टिकाए। उसकी आँखें बंद थीं, पर चेहरे पर गुस्सा साफ झलक रहा था। उसका गुस्सा इतना भड़का हुआ था कि वह पूरी दुनिया जला देना चाहता था। यह था ऋषि नंदा।
ऋषि नंदा, नंदा ग्रुप ऑफ़ इंडस्ट्रीज का इकलौता वारिस था। उसकी ऊँचाई छह फीट थी; मस्कुलर बॉडी, सिक्स पैक एब्स, गहरे भूरे रंग की आँखें और चेहरे पर तेज की चमक। एक कान में डायमंड की बाली और दाहिने हाथ पर महादेव का टैटू था।
ऋषि उस समय काफी गुस्से में था। ऋषि की कार में आगे उसका मैनेजर, सूरज, बैठा था।
"और कितना समय लगेगा?" ऋषि ने चिल्लाया।
"सर, बस बीस मिनट और," सूरज घबराते हुए बोला।
सूरज ऋषि के साथ कई सालों से काम करता था, इसलिए वह ऋषि के शॉर्ट टेंपर से अच्छी तरह वाकिफ़ था।
ऋषि ने जेब से अपना फ़ोन निकाला और गैलरी से एक फ़ोटो खोली। इस फ़ोटो में ऋषि और एक लड़की एक-दूसरे के गले में हाथ डाले हुए थे, और दोनों बहुत खुश लग रहे थे। उसने उस तस्वीर को बड़े प्यार से निहारा और मन में सोचा, "प्रियंका, आज मैं वह करने जा रहा हूँ, जिसके लिए शायद भगवान मुझे कभी माफ़ न करें, और मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, भगवान मुझे माफ़ करें या न करें, पर आज मैं तुम्हें इंसाफ़ दिलाने जा रहा हूँ। काश तुम मेरे साथ होतीं, तो तुम खुद अपने हाथों से उसे सज़ा देतीं। तुम न सही, मैं तो हूँ। मैं उस इंसान को ऐसी सज़ा दूँगा कि वह सारी ज़िन्दगी नहीं भूल पाएगा।"
दूसरी तरफ, देहरादून के एक मैरिज हॉल में एक शादी का समारोह चल रहा था। पंडित जी अग्नि के पास बैठे मंत्र पढ़ रहे थे। "दूल्हे को बुलाइए," उन्होंने आवाज़ दी। एक पचपन वर्षीय महिला जाकर एक लड़के से बोली, "गौतम, चलो, पंडित जी बुला रहे हैं।"
गौतम अपने दोस्तों के बीच से उठकर सीधे मंडप पर पंडित जी के पास पहुँचा और बैठ गया। पंडित जी गौतम के साथ कुछ मंत्र उच्चारण कर रहे थे। कुछ देर बाद, उन्होंने कहा, "कन्या को बुलाइए..." कुछ लड़कियाँ ऊपर हॉल के कमरे में गईं। वहाँ एक बाईस-तेईस साल की लड़की लाल शादी के जोड़े में सजी-धजी बैठी हुई थी। लड़कियाँ उसके पास आईं और कहने लगीं, "चलो, पंडित जी तुम्हें बुला रहे हैं।"
दुल्हन ने नज़रें उठाकर आईने में देखा। उसकी आँखों में आँसुओं का सैलाब था, उसका चेहरा मुरझाया हुआ था।
एक लड़की दुल्हन के पास आई और हैरानी से पूछा, "अरे यार, तुम रो क्यों रही हो? यह तो कितनी अच्छी बात है कि तुम्हारी शादी इतने बड़े घराने में हो रही है। वरना कौन तुम जैसी लड़की से शादी करता?"
"तुम्हें तो उन लोगों का एहसानमंद होना चाहिए। तुम्हें बिना दहेज़, बिना किसी समझौते, बस तुमसे शादी कर रहे हैं। सारी ज़िन्दगी उनके पैर धोओगी, तब भी कम पड़ेगा..."
लड़कियाँ दुल्हन को लेकर नीचे मंडप पर आईं और उसे गौतम के बगल में बिठा दिया। गौतम ने एक नज़र दुल्हन को देखा और मुस्कुराते हुए सामने देखने लगा।
जैसे ही पंडित जी दुल्हन की मांग भरने के लिए सिंदूर उठाने लगे, बाहर गाड़ियों के रुकने की आवाज़ आई। सब उस शोर से चौंक गए। कुछ ही समय में कई बॉडीगार्ड अंदर आ गए और हवा में फायरिंग शुरू कर दी। सब लोग फायरिंग से डर गए। गौतम के हाथ-पैर काँपने लगे और सिंदूर उसके हाथ से छूट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है।
तभी हॉल में ऋषि की एंट्री हुई। वह हॉल में आया और सब लोगों को एकटक देखने लगा। उसने अपने चश्मे उतारे। सब लोग ऋषि को देखकर हैरान हो गए, क्योंकि ऋषि नंदा कोई आम इंसान नहीं था; इंडिया के टॉप टेन बिज़नेसमैन में से एक। भीड़ में दबी आवाज़ें आने लगीं, "अरे, ये तो ऋषि नंदा है ना... हाँ, ये तो वही है... ऋषि नंदा यहाँ क्या कर रहा है...?"
ऋषि सीधे मंडप के सामने आकर खड़ा हुआ और एक नज़र गौतम को देखा। ऋषि की आँखों में गुस्सा साफ़ नज़र आ रहा था। ऋषि को देखकर गौतम और दुल्हन दोनों घबरा गए।
ऋषि ने सबकी तरफ़ देखा और कहा, "आप सबका यहाँ आने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद, पर क्या है ना, अब Mr. गौतम की शादी तो होने से रही। आप लोग आ ही गए हैं, तो खाना खाकर जाइए।"
गौतम गुस्से में उठा और उसकी तरफ़ उंगली करके बोला, "Mr. नंदा, ये क्या हरकत है? आप मेरी शादी में आकर ये क्या तमाशा कर रहे हैं?"
ऋषि ने गौतम की तरफ़ देखा और कहा, "तुम्हारी शादी अभी तक हुई नहीं है, और अब मैं आ गया हूँ, तो नहीं होने दूँगा।"
"आप चाहते क्या हैं? मेरी तो आपसे कोई दुश्मनी भी नहीं है," गौतम ने कहा।
"दुश्मनी तो तुम्हारी मेरी बहुत गहरी है। वक़्त आने पर तुम्हें सब पता चल जाएगा। और बात रही कि मैं चाहता क्या हूँ, तो फ़िलहाल के लिए तो मुझे तुम्हारी दुल्हन चाहिए," ऋषि ने कहा।
ऋषि के ये शब्द सुनकर गौतम गुस्से से उसकी तरफ़ बढ़ा, पर ऋषि को छूने से पहले ही सारे बॉडीगार्ड ने उसे घेर लिया और गौतम के सिर पर बंदूक रख दी।
गौतम एकदम से डर गया। उसे अपनी मौत सामने नज़र आ रही थी।
ऋषि गौतम के सामने आया और उसकी आँखों में आँखें डालकर बोला, "गुनाहगार तुम हो, इस लड़की की कोई गलती नहीं है। जिसे तुम शादी करना चाहते थे, उससे मैं शादी करूँगा। वैसे, तुम्हारी गलतियों की सज़ा मैं बाद में दूँगा..."
यह बोलकर ऋषि मंडप की तरफ़ जाने लगा। एक बॉडीगार्ड ने दुल्हन के सिर पर बंदूक रख दी। दुल्हन पहले से ही घबराई हुई थी, अब ये बंदूक देखकर उसकी हालत और भी ख़राब हो गई।
ऋषि आया और मंडप पर बैठ गया और पंडित जी से मंत्र शुरू करने के लिए कहा। डर के मारे पंडित जी ने मंत्र शुरू कर दिए।
पंडित जी ने ऋषि को फेरों के लिए खड़ा होने को कहा। ऋषि खड़ा हो गया, पर दुल्हन इतनी डरी हुई थी कि उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था, और वह फेरों के लिए खड़ी नहीं हुई। ऋषि ने देखा कि वह लड़की डर के मारे खड़ी नहीं हो रही है, तो उसने उस लड़की को अपनी गोद में उठा लिया और उसे गोद में लेकर फेरे पूरे कर लिए।
थोड़ी ही देर में ऋषि और दुल्हन की शादी संपन्न हो गई। दुल्हन की मांग भरकर और उसके गले में मंगलसूत्र पहनाकर, ऋषि उसका हाथ पकड़कर गौतम के सामने आया और बोला, "Mr. गौतम, आपकी शादी तो होने से रही, पर अब मेरी हो गई है। अब ये मेरी पत्नी है। ये तो सिर्फ़ एक सरप्राइज़ था आपके लिए, दूसरा सरप्राइज़ अभी बाकी है।"
ऋषि के इतना कहने पर वहाँ कुछ लोग आ गए।
ऋषि उनकी तरफ़ देखा और गौतम से कहा, "...दूसरा सरप्राइज़ सामने से आ रहा है।"
गौतम ने नज़रें उठाईं तो वकील थे; कई वकील। इतने सारे वकीलों को एक साथ देखकर गौतम पूरी तरह से चौंक गया।
तभी वे वकील ऋषि के सामने आये और उनमें से एक वकील ने गौतम से कहा, "Mr. गौतम, आपके दादा जी की वसीयत के मुताबिक, आपको अपने 25वें जन्मदिन से पहले शादी करनी थी। तभी उनकी सारी प्रॉपर्टी आपके नाम होती। और समय के मुताबिक, अभी 12 बज चुके हैं, और आप अपने 26वें साल में प्रवेश कर चुके हैं। और जहाँ तक हमें दिख रहा है, आपकी शादी नहीं हुई है। इसलिए वसीयत के मुताबिक आपको आपके दादा जी की प्रॉपर्टी और जायदाद में से कुछ नहीं मिलेगा।"
गौतम यह सुनकर तिलमिला गया। वह गुस्से में बोला, "क्या बकवास कर रहे हो? मैं यहाँ शादी करने ही आया था, पर मेरी शादी होने वाली थी उससे पहले ही Mr. ऋषि नंदा ने शादी कर ली है। अब आप कह रहे हैं कि मुझे उनकी विरासत नहीं मिलेगी? ये तो मेरे साथ धोखा हुआ है ना! मैंने उस जायदाद के लिए बहुत इंतज़ार किया है। अब मैं उसे ऐसे ही नहीं जाने दूँगा। कोई और उपाय बताइए।"
"सॉरी Mr. गौतम, पर हम कुछ नहीं कर सकते," वकील ने कहा।
गौतम गुस्से में आकर वकील का गिरेबान पकड़ लिया। वकील उसे छुड़ाते हुए धमकी भरे लहजे में बोले, "अपनी हद में रहिए Mr. गौतम, आप कानून को अपने हाथ में ले रहे हैं। अगर हमने कोई कार्रवाई कर ली तो आपको जमानत नहीं मिलेगी।"
वकील गौतम के हाथ में एक कागज़ थमाकर चले गए।
गौतम आँखें फाड़े उस कागज़ को देख रहा था।
इतने में ऋषि गौतम के सामने आया और मुस्कुराया। "क्या बात है गौतम जी? जिस प्रॉपर्टी के लिए इतनी मेहनत की, वो तो आपको मिली नहीं, और शादी करने आए थे, दुल्हन भी नहीं मिली।"
गौतम ऋषि की तरफ़ देखा और बोला, "आपका ये सब करने का क्या मकसद था? मेरी तो आपसे कोई दुश्मनी भी नहीं है, मैं आपको पर्सनली जानता भी नहीं हूँ। तो फिर आपने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?"
"ऐसा तुम्हें लगता है कि मेरी तुम्हारी कोई दुश्मनी नहीं है? और मैं ऐसे लोगों की शादी में जाकर उनकी दुल्हन से शादी कर लेता हूँ? Mr. गौतम, दुश्मनी तो आपसे बहुत गहरी है। और ये तो बस शुरुआत है। फ़िलहाल तो तुम्हें तुम्हारे दादा जी की विरासत नहीं मिली है और न ही तुम्हें दुल्हन मिली है। अभी भी तुम्हारे पास बहुत कुछ है जो मुझे चाहिए; तुम्हारा वो एम्पायर जो तुमने खड़ा किया है, मैं उसे सड़क पर ला दूँगा। मेरा नाम भी ऋषि नंदा नहीं है।"
ऋषि गौतम को सरेआम धमकी देकर जाने लगा, पर इससे पहले कि वह जा पाता, उसके गले में पड़े शादी के जोड़े से, जिसमें दुल्हन की चुनरी बंधी हुई थी, वह छूट गई।
ऋषि पलटकर देखा तो दुल्हन वहीं बर्फ की तरह जमी हुई थी, अपनी जगह से हिल नहीं पा रही थी, और वह गहरे सदमे में पहुँच गई थी।
ऋषि धीरे से उसके पास आया और उसका हाथ पकड़कर उसे अपने साथ ले गया। उसके पीछे उसके सारे बॉडीगार्ड भी बाहर आ गए। ऋषि अपनी कार के पास पहुँचा। एक बॉडीगार्ड ने कार का दरवाज़ा खोला। ऋषि ने दुल्हन को कार में बिठाया और खुद दूसरी तरफ़ जाकर बैठ गया। ऋषि के बाद सारी गाड़ियों का काफिला दिल्ली के लिए रवाना हो गया।
कार में सन्नाटा छाया हुआ था। करीब एक घंटा बीत गया; गाड़ी में पिन ड्रॉप साइलेंस था। ऋषि ने दुल्हन को देखा। उसकी आँखें आँसुओं से भरी हुई थीं, रोने की वजह से पूरा चेहरा लाल हो गया था। उसके मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी, पर आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे।
उसे इस तरह रोता देख ऋषि को बुरा लगा। उसने जल्दी से पानी की बोतल निकाली और दुल्हन को दी।
"पानी पी लो, इतना रोओगी तो तबीयत ख़राब हो जाएगी," ऋषि ने कहा।
लड़की ने धीरे से पानी की बोतल ली और थोड़ा-थोड़ा करके पानी पीने लगी। उसने अपने पास रखे रुमाल से आँसू पोछने लगी।
करीब छह घंटे के सफ़र के बाद सब दिल्ली पहुँच गए। गाड़ियों का काफिला दिल्ली के एक पॉश इलाके में आकर रुका। सब इतने थक गए थे कि गाड़ियों में ही सो गए। जैसे ही गाड़ी को ब्रेक लगा, ऋषि की नींद खुली। उसने आँखें खोलीं तो पाया कि वह अपने घर के गार्डन में है। वह गाड़ी से उतरने वाला था कि उसका ध्यान अपने बगल में बैठी दुल्हन पर गया, जो गाड़ी के शीशे पर सिर रखकर सो रही थी। ऋषि ने दुल्हन को देखा, फिर सामने बैठे सूरज से कहा,
"इसे उठाओ, बोलो घर आ गए," ऋषि ने कहा।
सूरज गाड़ी से उतरा और दुल्हन के दरवाज़े पर जाकर धीरे से बोला, "भाभी जी..."
दुल्हन को "भाभी" कहने पर ऋषि ने उसे घूरकर देखा।
सूरज ने अपने शब्दों को वापस लेते हुए फिर कहा, "मैडम... मैडम, उठिए, घर आ गए।"
दुल्हन की आँख खुली। धीरे-धीरे उसने आँखें खोलीं और बाहर देखा। बाहर का नज़ारा देखकर वह दंग रह गई। वह एक बहुत बड़े बंगले के सामने खड़ी थी। आस-पास फूलों से बना एक बहुत बड़ा बगीचा था, जहाँ पर फाउंटेन भी लगा हुआ था। बंगला देखने में किसी महल से कम नहीं लग रहा था।
ऋषि दरवाज़े के पास खड़ा था। उसने देखा कि दुल्हन पूरे घर को देख रही है, तो उसने थोड़े गुस्से में कहा, "बाद में आराम से देख लेना, घर कहीं भाग नहीं जा रहा है। अभी अंदर चलो।"
ऋषि के ऐसा कहने पर दुल्हन थोड़ी डरी हुई सी ऋषि की तरफ़ चलने लगी।
दुल्हन धीरे-धीरे कदमों से ऋषि के पास आ रही थी। उसे इतना धीरे चलता देख ऋषि चिढ़ गया।
ऋषि: "पूरा दिन नहीं है मेरे पास इंतज़ार करने के लिए। प्लीज थोड़ा जल्दी आओ।"
दुल्हन जल्दी-जल्दी ऋषि के पास पहुँची। एक नौकर आकर मेन डोर खोला।
जैसे ही दोनों अंदर आने वाले थे, एक महिला की आवाज़ आई, "वहीं रुक जाओ!"
जब दोनों ऊपर की तरफ़ देखे तो एक पचपन वर्षीय महिला सीढ़ियों से नीचे आ रही थी। वह महिला सीधे ऋषि और दुल्हन की तरफ़ आई और गुस्से भरी नज़र से ऋषि को देखते हुए बोली,
"मतलब जो न्यूज़ में सुन रही थी, वो सही थी! 😡 तुमने सच में किसी की शादी में जाकर उसी की दुल्हन से शादी कर ली! ऋषि, तुम ऐसा कैसे कर सकते हो? 😠"
ऋषि: "बड़ी माँ, मैं आपको सब बताता हूँ। बात वैसी नहीं है जैसा आप समझ रही हैं।"
बड़ी माँ: "और क्या समझना बाकी है? बोलो! आज सुबह की ताज़ा खबर यही है कि नामी बिज़नेसमैन ऋषि नंदा ने किसी की शादी में जाकर जबरदस्ती उसकी दुल्हन से शादी कर ली। सारे न्यूज़ चैनल, अख़बार, मैगज़ीन में यही टॉपिक चल रहा है। इसके बारे में क्या कहोगे तुम?"
ऋषि सूरज को घूरकर देखता है।
सूरज: "सर, वहाँ इतने सारे लोग थे, हो सकता है किसी ने चुपके से फ़ोटो लेकर मीडिया में लीक कर दी हो। आप परेशान मत होइए, मैं पता करता हूँ।"
ऋषि: "बड़ी माँ, मैं इस न्यूज़ को रुकवाता हूँ। आप परेशान मत होइए।"
बड़ी माँ: "ऋषि, मैं उस न्यूज़ से नहीं, इस बात से परेशान हूँ कि तुमने शादी कर ली, वो भी ऐसे।"
ऋषि: "बड़ी माँ, इस बारे में बाद में बात करेंगे, फ़िलहाल हमें अंदर आने दीजिए।"
बड़ी माँ: "बेटा, हर चीज़ का एक तरीका होता है। शादी तुमने अपनी मनमानी से कर ली है, कम से कम बहू का घर प्रवेश तो ठीक से करने दो।"
ऋषि: "बड़ी माँ, आपको जो करना है, थोड़ा जल्दी कीजिए, मेरी मीटिंग है।"
बड़ी माँ ने घर की एक नौकरानी, नीमो, को आवाज़ दी, "नीमो, आरती का सामान लेकर आओ।"
नीमो आरती का सामान और गृह प्रवेश का सामान वहाँ रख देती है।
बड़ी माँ ने ऋषि और दुल्हन की आरती की और दुल्हन से कहा,
बड़ी माँ: "बहू, अपने दाएँ पैर से इस कलश को गिराओ और कुंकुम से पैर रखकर इस घर में प्रवेश करो।"
दुल्हन वैसा ही करती है जैसा उसे कहा जाता है। अंदर आने के बाद बड़ी माँ सबको सोफ़े पर बिठा देती है। और घर के सभी नौकर वहाँ मौजूद हो जाते हैं। नीमो बड़ी माँ से कहती है, "मालकिन, दुल्हन का चेहरा तो दिखाओ।"
बड़ी माँ: "अरे, अभी तक तो मैंने खुद अपनी बहू का चेहरा नहीं देखा है। पहले मैं तो देख लूँ।"
बड़ी माँ धीरे से जाती है और दुल्हन का घूँघट, जो उसके चेहरे पर आधा ढँका हुआ था, उठाकर उसका चेहरा देखती है।
सब लोग दुल्हन का चेहरा देखकर दंग रह जाते हैं। इतनी प्यारी सी गुड़िया थी कि जिसे कोई एक बार देख ले तो नज़र न हटा सके। ऐसा लग रहा था जैसे आसमान से एक नाज़ुक सी परी लाल जोड़े में उनके सामने आकर बैठी है। एकदम दूधिया रंग का चेहरा, झील सी आँखें (रोने की वजह से थोड़ी लाल हो गई थीं), गुलाबी होंठ। इतनी प्यारी सी लड़की को देखकर सबका मन खुश हो गया। तभी नीमो बड़ी माँ से कहती है,
नीमो: "मालकिन, दुल्हन तो लाखों में एक है। अब इतनी प्यारी बहू मिली है, तो नेग तो बनता है।"
बड़ी माँ: "अरे, चुप करो! सब मेरी बहू को नज़र मत लगाओ।"
बड़ी माँ ने अपने हाथ से कंगन उतारकर दुल्हन के हाथ में पहनाया। दुल्हन कंगन को देखकर अपना सर झुकाती है, तो बड़ी माँ कहती है, "बहू, ये मुँह-दिखाई का है, खाली हाथ बहू का मुँह नहीं देखूंगी..." दुल्हन कंगन पहनने के बाद बड़ी माँ के पैर छूती है, तो बड़ी माँ उसे गले लगा लेती है।
तभी नीमो पूछती है, "मालकिन, बहू का नाम क्या है?" इस पर बड़ी माँ ऋषि की तरफ़ देखती है, तो वह चुप रहता है और कहता है,
ऋषि: "मुझे नहीं पता, और न मैंने पूछा। आप खुद ही पूछ लीजिए।"
बड़ी माँ दुल्हन की तरफ़ देखकर कहती है, "बेटा, तुम्हारा नाम क्या है?"
ये सुनकर दुल्हन परेशान हो जाती है, उसके चेहरे पर घबराहट साफ़ दिख रही थी।
बड़ी माँ: "परेशान होने की ज़रूरत नहीं, हम बस तुम्हारा नाम जानना चाहते हैं।"
दुल्हन फिर भी ख़ामोश रहती है।
बड़ी माँ: "बेटा, अगर नाम नहीं बताओगी तो हम बुलाएँगे कैसे?"
दुल्हन फिर भी परेशान और ख़ामोश खड़ी रहती है।
इतने में ऋषि भी परेशान हो जाता है। वह सोफ़े से उठकर खड़ा होता है और चिल्लाते हुए दुल्हन से कहता है,
ऋषि: "सब इतनी देर से नाम पूछ रहे हैं, आपका नाम नहीं बताया जा रहा है!"
ऋषि की इतनी रौबदार आवाज़ सुनकर दुल्हन पूरी तरह से काँप जाती है और उसकी आँखों से मोटे-मोटे आँसू निकलने लगते हैं।
दुल्हन को रोता देख बड़ी माँ ऋषि को डाँट लगाती है।
बड़ी माँ: "पागल हो गया क्या? कैसे बातें कर रहा है बहू से? एक तो जबरदस्ती से शादी करके ले आया है और अब चिल्ला रहा है। ख़बरदार, जो बहू से ऊँची आवाज़ में बात की! देख नहीं रहा, बेचारी कितनी डरी हुई है।"
ऋषि बड़ी माँ को कुछ कहने वाला होता है कि बड़ी माँ उसे उंगली दिखाकर चुप रहने का इशारा करती है और दुल्हन के पास जाकर उसे प्यार से पूछती है,
बड़ी माँ: "बेटा, इसकी बातों का बुरा मत मानो, ये है ही ऐसा। ये बचपन से मेरे साथ है, आज तक मैं ही नहीं समझ पाई इसे, फिर तुम तो अभी आई हो। धीरे-धीरे से पहचान जाओगी।"
"पर बात तो ऋषि की भी गलत नहीं है, तुम अपना नाम ही नहीं बताना चाह रही हो। सब कितने प्यार से पूछ रहे हैं, तुम्हारा नाम बता दो।"
तभी पीछे से नीमो आती है और कहती है, "अरे क्या बात है? दुल्हन, सब इतनी देर से नाम पूछ रहे हैं, नाम बता दो, क्या बात है? बोल नहीं सकती हो क्या?"
दुल्हन अपना सिर हाँ में हिलाती है।
यह देखकर सभी चौंक जाते हैं।😳
दुल्हन के सिर हिलाने पर सब एकदम से चौंक जाते हैं।😳😳
बड़ी माँ दुल्हन के पास आती है और कहती है,
बड़ी माँ: "बेटा, नीमो तो बस यूँ ही पूछ लिया था, कि तुम बोल नहीं सकती हो, तुम अपना सिर हाँ में क्यों हिला रही हो?"
दुल्हन अपनी एक उंगली अपने होठों पर रखती है और अपने सिर को ना में हिलाती है; वह इशारे में बताने की कोशिश करती है कि वह बोल नहीं सकती।
बड़ी माँ, ऋषि, सूरज, नीमो और सारे नौकर यह देखकर पूरी तरह से चौंक जाते हैं।
दो मिनट के लिए तो बड़ी माँ भी किसी सदमे में पहुँच जाती है, फिर वह खुद को संभालती है और फिर से पूछती है,
बड़ी माँ: "तुम बोल नहीं सकती? 😳"
दुल्हन अपना सिर हाँ में हिलाती है।
ऋषि दुल्हन के सामने आता है और चिल्लाते हुए कहता है, "क्या तुम बोल नहीं सकती? यह बात तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताई?"
बड़ी माँ: "जब बोल ही नहीं सकती तो कहाँ से बताएगी?"
इस पर सूरज बोलता है, "सॉरी सर, बीच में बोलने के लिए। आपने मैडम से बात ही नहीं की थी, आप तो सीधे शादी करके ले आए हैं। पूरे रास्ते आपने मैडम से कोई बात नहीं की, और न ही इनके बारे में कुछ जानने की कोशिश की। मैंने देखा था, शादी के मंडप पर आपने तो बंदूक की नोक पर इनसे शादी की है। और मैडम उस समय जितनी घबराई हुई थीं, वो क्या ही अपने बारे में बताती आपको।"
सूरज की बात सुनकर ऋषि एकदम खामोश हो गया, क्योंकि कहीं न कहीं सूरज सच ही तो बोल रहा था।
सूरज की बात सुनकर बड़ी माँ ऋषि की तरफ़ देखती है और कहती है, "ऋषि, बहू के सामने हटो, मैं बात करती हूँ।"
ऋषि सामने से हट जाता है। बड़ी माँ दुल्हन को अपने पास बुलाती है और उसे सोफ़े पर बिठाती है। प्यार से उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहती है,
"देखो बेटा, हमें अफ़सोस हुआ ये जानकर कि तुम बोल नहीं सकती। हमें तुम्हारे बारे में कुछ तो जानना होगा ना। अब तुम ही बता दो, तुम अपना नाम हमें किस तरीके से बताओगी?"
दुल्हन कुछ सोचती है, फिर इधर-उधर नज़र दौड़ाती है। उसे सामने की टेबल पर कुछ डॉक्यूमेंट के साथ एक पेन नज़र आता है और सामने ही एक न्यूज़पेपर है जिसमें ऋषि और उसकी शादी की एक फ़ोटो छपी हुई है। दुल्हन वो पेन उठाती है और उस पेपर पर अपनी फ़ोटो के बगल में अपना नाम लिखती है और बड़ी माँ को पकड़ा देती है। बड़ी माँ उस नाम को पढ़ती है और प्यार से बोलती है,
"...आराध्या..."
दुल्हन अपना चेहरा हाँ में हिलाती है। ऋषि, सूरज और सभी ये नाम सुनकर उसकी तरफ़ देखने लगते हैं।
बड़ी माँ: "बहुत प्यारा नाम है तुम्हारा।"
दुल्हन उसी नाम के बगल में कुछ और लिख देती है, जिसे बड़ी माँ फिर पढ़ती है, "...आरू... तुम्हें प्यार से आरू बुलाते हैं।"
आराध्या अपना सिर हाँ में हिलाती है।
बड़ी माँ आरू की तरफ़ देखती है और फिर कहती है, "आरू, तुम थक गई होगी इतने लम्बे सफ़र से। ऊपर से इतना हैवी जोड़ा... मुझे लगता है अब तुम्हें जाकर आराम करना चाहिए। नीमो, बहू को कमरे में ले जाओ। इसका नाश्ता भी कमरे में भेज देना।"
फिर बड़ी माँ आस-पास देखती है और कहती है, "सामान तो तुम अपना कुछ लाई नहीं होगी, क्या पहनोगी?"
आराध्या अपना सर नीचे कर लेती है। बड़ी माँ प्यार से उसके सर पर हाथ रखती है और कहती है, "अरे, परेशान क्यों हो रही हो? मैं हूँ ना यहाँ पर। तुम रूम में जाओ, जाकर फ़्रेश हो जाओ, मैं तुम्हारे लिए कपड़े भेजती हूँ। नीमो, इसे कमरे में ले जाओ।"
नीमो आराध्या को लेकर ऊपर कमरे में चली जाती है। उसके जाते ही बड़ी माँ के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ जाती है और वह ऋषि की तरफ़ देखते हुए कहती है, "तुम्हें नहीं पता था ना, वो बोल नहीं सकती?"
ऋषि: "नहीं बड़ी माँ, मुझे इस बारे में कुछ भी नहीं पता था। मैं इसका नाम भी नहीं जानता था। अभी उसने जब आपको बताया तब जाकर पता चला कि इसका नाम आराध्या है।"
बड़ी माँ हँसते हुए कहती है, 😃😂 "भाई वाह! क्या ढूँढ़ कर मेरे लिए बहू लाए हो! दुनिया की हर सास ये चाहती है कि वो अपनी बहू से कुछ भी सुनाई उसकी बहू से पलट कर जवाब ना दे। 😄 और मेरी बहू तो सच में मुझे पलट कर जवाब नहीं देगी। 😂"
(यह सुनकर सभी हँसने लगते हैं।)
ऋषि: "आप परेशान मत होइए बड़ी माँ, मैं जल्दी इसके किसी फैमिली मेंबर का पता लगाकर इसे उसके पास भेज दूँगा।"
बड़ी माँ हैरानी से ऋषि को देखती है और कहती है, "पागल हो गए हो क्या? कहाँ भेज दोगे? शादी की है या मज़ाक किया है? पूरी दुनिया को पता है तुमने इससे शादी की है। अब ऐसे छोड़ दोगे तो कहाँ जाएगी बेचारी?"
ऋषि: "बड़ी माँ, मैंने शादी सिर्फ़ एक मकसद के लिए की है। इसके साथ घर नहीं बसाना है मुझे। मेरा मकसद सिर्फ़ गौतम अग्रवाल को सड़क पर लाना है, उसे उसकी कर्मों की सज़ा देनी है। जिस दिन मेरा मकसद पूरा हो जाएगा, मैं इस लड़की को उसके परिवार के पास छोड़ दूँगा। टेंशन मत लो, मैं इसके बदले इतने पैसे दूँगा कि इसे और इसके परिवार को ज़िंदगी भर काम करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। बस एक बार गौतम से मेरा बदला पूरा हो जाएगा, उसे सज़ा दिलवा दूँगा।"
बड़ी माँ: "गौतम अग्रवाल? ये तो वही लड़का है ना..."
ऋषि: "हाँ बड़ी माँ, वही है... और आराध्या की शादी इसी से हो रही थी। लेकिन तभी मैं पहुँच गया और मैंने इससे शादी कर ली, और इसके बदले गौतम को जो उसके दादा जी की प्रॉपर्टी मिलनी थी, उसमें से उसे कुछ भी नहीं मिला।"
बड़ी माँ ये सुनकर एकदम दंग रह जाती है।
उधर नीमो आराध्या को ऋषि के कमरे में छोड़कर जाती है। आराध्या जब कमरे में पहुँचती है तो उस कमरे को गौर से देखने लगती है। कमरा बहुत ही सुंदर और कीमती चीज़ों से सजा हुआ था। आराध्या की नज़र दीवार पर जाती है जहाँ ऋषि और प्रियंका की बहुत सारी फ़ोटोएँ हैं।
ऋषि के कमरे में आराध्या, ऋषि और प्रियंका की तस्वीरों को गौर से देख रही थी। भले ही वह ऋषि को नहीं जानती थी, पर वह उसका पति तो था ही। अपने पति को किसी और लड़की के इतने करीब देखकर आराध्या के मन में एक टीस उठी। इन सभी तस्वीरों में ऋषि काफी हँसमुख और खुश नज़र आ रहा था। पर कल रात से, जब से वह ऋषि से मिली थी, उसने ऋषि का केवल गुस्से वाला रूप ही देखा था। आराध्या इन तस्वीरों को गौर से देख ही रही थी कि तभी उसके कमरे का दरवाज़ा खुला और ऋषि अंदर आया। ऋषि ने वहाँ आराध्या को अपनी और प्रियंका की तस्वीरों के पास देखा और थोड़ी रूखी आवाज़ में कहा,
"तुम यहाँ क्या कर रही हो?"
आराध्या ने जब दरवाज़े की तरफ़ देखा तो वहाँ ऋषि खड़ा था। उसने ऋषि को देखा और फिर अपनी गर्दन नीचे कर ली।
ऋषि आराध्या के पास आया और फिर से अपनी सख्त आवाज़ में कहा, "तुम मेरे कमरे में क्या कर रही हो?"
आराध्या ने कुछ नहीं कहा, वह वैसे ही सर झुकाए खड़ी रही।
इतने में पीछे से नीमो आई और ऋषि के कमरे में आते हुए बोली, "छोटे साहब, मालकिन ने इसे आपके कमरे में भेजा है।"
"कोई ज़रूरत नहीं है। इसे सामने वाले कमरे में ले जाओ। मुझे मेरे कमरे में किसी का होना बर्दाश्त नहीं।"
नीमो धीरे से आई, आराध्या का हाथ पकड़कर उसे अपने साथ सामने वाले कमरे में ले गई। वह कमरा भी काफी अच्छा था, हाँ, उसमें ऋषि के कमरे जैसी सुविधाएँ नहीं थीं, लेकिन वह कमरा काफी खूबसूरत था। आराध्या के दिमाग में अभी भी ऋषि और उस लड़की की तस्वीरें चल रही थीं जो उसने ऋषि के कमरे में देखी थीं। नीमो नाश्ते की प्लेट टेबल पर रखी और आराध्या से कहा,
"हाथ-मुँह धोकर नाश्ता कर लो। मैं तब तक तुम्हारे लिए कपड़े लेकर आती हूँ।"
आराध्या उस कमरे को गौर से देख रही थी, इधर-उधर घूम रही थी। उसके कमरे में बड़ी माँ और नीमो दोनों आईं।
बड़ी माँ ने आराध्या को यूँ गौर से कमरा देखते हुए कहा, "तुम्हें पसंद आया?"
आराध्या उनकी तरफ़ देखती है और एक छोटी सी मुस्कान के साथ अपना सिर हाँ में हिलाती है।
बड़ी माँ और नीमो अपने पास कुछ कपड़े लेकर आई थीं, जो उन्होंने रख दिए।
बड़ी माँ आराध्या के पास आई और उसका हाथ पकड़कर सोफ़े पर बिठाया और प्यार से उसके सर पर हाथ फेरते हुए बोली,
"मैं जानती हूँ ऋषि ने तुम्हें अपने कमरे में नहीं रहने दिया, तुम्हें बुरा लगा होगा।"
आराध्या अपना सिर ना में हिलाती है और यह बताती है कि उसे बुरा नहीं लगा।
बड़ी माँ आराध्या से कहती है, "देखो बेटा, मैं समझ सकती हूँ, तुम्हारी और ऋषि की शादी के हालात में हुई है। न वह तुम्हें अपना पा रहा है और न तुम उसे अपना पा रही हो। मैं तो यह कहूँगी, अपने रिश्ते को थोड़ा वक़्त दो। देखना, एक दिन वह खुद तुम्हें अपने कमरे में ले जाएगा।"
बड़ी माँ कपड़ों की तरफ़ इशारा करते हुए कहती है, "ये कुछ कपड़े हैं। फ़िलहाल तो मेरे से काम चला लो, कल हम तुम्हारे लिए शॉपिंग करेंगे।"
आराध्या अपना सिर हाँ में हिलाती है। बड़ी माँ उसके सर पर प्यार से हाथ फेरती है और उस कमरे से चली जाती है।
आराध्या उन कपड़ों में से एक साड़ी का सेट लेती है और बाथरूम में चली जाती है। थोड़ी देर बाद आराध्या नहा-धोकर ड्रेसिंग टेबल के सामने खुद को तैयार करती है। अपने बाल सुखाने के बाद उसने अपने चेहरे पर हल्का सा क्रीम लगाया। तभी उसका ध्यान अपने गले पर गया जहाँ ऋषि के नाम का मंगलसूत्र था। बाथरूम से नहाकर आई थी, तब उसने अपने खाली माँग को देखा तो ड्रेसिंग टेबल पर सिंदूर ढूँढने लगी, पर उसे सिंदूर कहीं नहीं मिला। थक-हारकर उसने ढूँढना छोड़ दिया। उसने नाश्ता किया। उसके बाद वह सीधे अपने कमरे चली गई।
अपने कमरे में फ्रेश होकर नीचे आई तो उसे सोफ़े के पास सूरज कुछ काम करते हुए दिखाई दिया। ऋषि ने सूरज से कहा,
"सूरज, आगे का क्या अपडेट है?"
"सर, गौतम अग्रवाल अपने सभी पार्टनर्स के साथ मिलकर अपने बिज़नेस को आगे बढ़ाने की प्लानिंग कर रहा है।"
"पता करो उसे फ़ाइनेंस कहाँ-कहाँ से मिल रहा है और उसके सारे फ़ाइनेंसर और बिज़नेस पार्टनर को अपनी तरफ़ करो। और हाँ, एक और काम है तुम्हारे लिए।"
"जी सर।"
"उस लड़की की सारी डिटेल निकलवाओ।"
सूरज (कन्फ़्यूज़ होते हुए): 🤔 "किसकी डिटेल निकालूँ?"
ऋषि अपनी कठोर नज़रों से सूरज को देखता है।
"आराध्या की डिटेल निकलवाओ! 😠"
सूरज (मन ही मन मुस्कुराते हुए): "अपनी बीवी का नाम इतने डरावने तरीके से ले रहे हैं, सीधे-सीधे नहीं बोल सकते, 'मेरी वाइफ़ की डिटेल निकलवाओ'।"
पर सूरज अपने ख्यालों को वहीं रोक लेता है क्योंकि उसे मालूम था कि अगर वह यह सब बोलेगा तो ऋषि उसकी क्या हालत करेगा।
इतने में बड़ी माँ और नीमो किचन से आती हैं और ऋषि से कहती हैं,
"ऋषि, बेटा, नाश्ता कर लो। सूरज, तुम भी आ जाओ।"
ऋषि और सूरज दोनों डाइनिंग टेबल की तरफ़ चले जाते हैं। दोनों अपना नाश्ता कर ही रहे होते हैं कि इतने में सीढ़ियों से आराध्या नीचे आ रही होती है।
नीमो की नज़र आराध्या पर पड़ती है तो वह बड़ी माँ से कहती है,
"मालकिन, लगता है आपके घर में धन-दौलत की कमी आ गई है।"
नीमो के ऐसा कहने पर बड़ी माँ, सूरज और ऋषि तीनों नीमो की तरफ़ देखते हैं। नीमो सबको अपनी तरफ़ देखते हुए बड़ी माँ से कहती है, "नहीं, जो दिख रहा है वही बोल रही हूँ।"
"ऐसा क्या देख लिया तूने जिसे देखकर तू यह कह रही है कि हमारे घर में धन-दौलत की कमी है?"
नीमो सीढ़ियों की तरफ़ इशारा करती है।
सबका ध्यान सीढ़ियों पर जाता है जहाँ आराध्या धीरे-धीरे कदमों से नीचे आ रही थी। बड़ी माँ ने पहले आराध्या को देखा और फिर नीमो को देखा और बोली,
"बोलना क्या चाहती है, साफ़-साफ़ बोल।"
"यही कि, अपनी शादी को ठीक से बारह घंटे भी नहीं हुए और दुल्हन यूँ ही घूम रही है। देखो ना, आँखों में काजल, माथे पे बिंदी, ना माँग में सिंदूर। बिना सिंगार के घूम रही है। बस इसीलिए कहा कि शायद धन-दौलत की कमी हो गई हो, जो आपकी दुल्हन बिना श्रृंगार के घूम रही है।"
आराध्या नीमो की बात सुन लेती है। वह बड़ी माँ के पास आती है और उससे इशारे में कहती है कि उसके पास श्रृंगार का कोई सामान नहीं है।
बड़ी माँ आराध्या की बात समझती है और नीमो की तरफ़ घूरकर देखती है और कहती है, "इस घर में कितनी सुहागिन हैं?"
"बड़ी मालकिन, सुहागिन तो इस घर में कोई भी नहीं है।"
"जब घर में कोई सुहागिन ही नहीं है तो श्रृंगार का सामान कहाँ से होगा? आराध्या का अपना कोई सामान है ही नहीं। और जहाँ तक बात रही मेरी, तो तुम्हारे मालिक गए कितने साल हो गए हैं, मेरे पास तो श्रृंगार का सामान होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। और प्रियंका की क्या ही बात करो। ले देकर बची तुम। तुमने तो कभी शादी नहीं की, जो तुमसे उम्मीद होगी कि तुम्हारे पास श्रृंगार का सामान होगा।"
फिर बड़ी माँ आराध्या की तरफ़ देखती है और कहती है, "तुम फ़िक्र मत करो, मैं किसी को कहकर तुम्हारे लिए सामान मँगवा देती हूँ। मेरी बहू बिना सिंगार के अच्छी नहीं लगती। तुम तब तक जाकर मंदिर से कुंकुम लगा लो।"
आराध्या वहाँ से सीधे मंदिर की तरफ़ चली जाती है।
ऋषि और सूरज अपना नाश्ता ख़त्म करते हैं और ऑफ़िस के लिए निकल जाते हैं।
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ऋषि की कार ऑफ़िस के एंट्रेंस पर रुकती है। एक गार्ड आकर जल्दी से गाड़ी का दरवाज़ा खोलता है। अपनी डैशिंग पर्सनालिटी के साथ ऋषि ऑफ़िस में एंटर करता है। ऋषि अपने प्राइवेट लिफ़्ट से सीधे अपने फ़्लोर पर चला जाता है।
ऋषि के चेहरे को देखकर वहाँ काम करने वाली लड़कियाँ आहें भरने लगती हैं, लेकिन उनकी हिम्मत नहीं होती ऋषि के आस-पास जाने की।
सूरज ऋषि को आज का शेड्यूल बता रहा था। दोनों ऋषि के सीईओ केबिन की तरफ़ बढ़ रहे थे। जैसे ही ऋषि ने केबिन का दरवाज़ा खोला, उसकी आँखें एकदम से चौंधिया गईं।
पूरा केबिन "कॉन्ग्रैचुलेशन" के पोस्टरों से भरा हुआ था; कुछ पर "मैरिज की बेस्ट विश" लिखी हुई थी। सूरज ऋषि के रिएक्शन को पहचान जाता है।
"सर, मैं अभी यह सब हटवा देता हूँ।"
"तुमने यह न्यूज़ अभी तक स्टॉप नहीं करवाई?"
"न्यूज़ तो स्टॉप करवा दी है, लेकिन यह सोशल मीडिया का ज़माना है। एक बार जो चीज़ ट्रेंड हो गई, उसे रोकना बहुत मुश्किल हो जाता है।"
ऋषि फ़्रस्ट्रेशन में बोलता है, "क्या मुसीबत है! अगले दस मिनट में मेरा केबिन साफ़ चाहिए!"
सूरज "यस सर" बोलकर वहाँ से निकल जाता है, अपने साथ दो क्लीनर को लेकर आता है और जल्दी-जल्दी रूम साफ़ करवाता है।
रूम साफ़ होने के बाद सूरज के पास एक कॉल आता है, जिसे अटेंड करने के लिए वह बाहर चला जाता है। ऋषि अपने डेस्क पर बैठकर काम करता है। शाम को उसकी बहुत इम्पॉर्टेंट मीटिंग है, वह उसी के लिए सारी तैयारियाँ कर रहा होता है।
थोड़ी देर बाद ऋषि के केबिन का दरवाज़ा खटखटाता है और सूरज अंदर आने की परमिशन मांगता है। ऋषि उसे अंदर आने को कहता है। सूरज के हाथ में एक फ़ाइल होती है। वह ऋषि की तरफ़ बढ़ाता है और कहता है,
"मैडम की सारी डिटेल है।"
ऋषि जो इस समय अपने लैपटॉप पर काम कर रहा होता है, अचानक से उसके हाथ रुक जाते हैं। वह सूरज की तरफ़ देखता है और अपने कोल्ड लुक में कहता है, "क्या इन्फ़ॉर्मेशन?"
"सर, मैडम का नाम आराध्या है।"
"वह मुझे पता है। उसके आगे की इन्फ़ॉर्मेशन बताओ।"
"मैडम बोल नहीं सकती; वह बेजुबान है।"
ऋषि: 😠 "क्या तुम कोई ऐसी इन्फ़ॉर्मेशन लेकर आए हो जो मेरे किसी काम की हो? यह बात तो मैं पहले से ही जानता हूँ कि वह बोल नहीं सकती।"
"सॉरी सर।"
"उसकी फैमिली कहाँ है और कौन-कौन है उसकी फैमिली में?"
"सर, मैडम अनाथ है।"
ऋषि: 😳 "व्हाट!"
"जी सर, मैडम बारह साल की थी जब वह जीवन दास अनाथ आश्रम में आई थी। अनाथ आश्रम में आने से पहले मैडम अपनी फैमिली के साथ फ़रीदाबाद में रहती थी। उनकी फैमिली में उनकी माँ और पिताजी थे। मैडम बचपन से गूंगी नहीं थी, वह पहले बोल सकती थी। लेकिन एक दिन वह अपने पूरे परिवार के साथ ट्रेन यात्रा पर निकली थी। अचानक से उस ट्रेन का एक्सीडेंट हो गया। उनके माता-पिता की मौके पर ही मौत हो गई और उसी हादसे में मैडम ने अपनी आवाज़ खो दी। उनकी फैमिली में उनके दूर के रिश्तेदार थे, मैडम के चाचा-चाची। पर उन्होंने एक लड़की की ज़िम्मेदारी उठाने से साफ़ मना कर दिया और मैडम को अनाथ आश्रम भेज दिया। मैडम ने अपनी स्कूल की पढ़ाई वहीं से की। क्योंकि मैडम बोल नहीं सकती थी, इसलिए गवर्नमेंट की तरफ़ से भी उन्हें काफी सपोर्ट मिला; एक स्कॉलरशिप के साथ उन्होंने अपनी कॉलेज की पढ़ाई की। मैडम अपने कॉलेज में लिटरेचर पढ़ रही थी; वह एक राइटर बनना चाहती हैं। लेकिन तभी गौतम अग्रवाल और उसके परिवार ने अनाथ आश्रम के हेड से बात करके इनसे शादी के लिए हाँ करवा ली।"
"गौतम ऐसी लड़की से क्यों शादी करना चाहेगा जो बोल नहीं सकती और एक अनाथ भी है?"
ऋषि ने कहा, "सूरज, एक ऐसी लड़की जो अनाथ है, जिसके आगे-पीछे कोई नहीं है, और ऊपर से वो बोल भी नहीं सकती... गौतम अग्रवाल जैसा इंसान उससे क्यों शादी करना चाहेगा? इसका क्या फ़ायदा है ऐसी लड़की से शादी करने में? अगर उसे अपने दादा जी की वसीयत के लिए ही शादी करनी थी तो वो तो नॉर्मल लड़की से भी कर सकता था। जहाँ तक मैं जानता हूँ, गौतम के पास उसका खुद का बहुत अच्छा बिज़नेस है। सोसाइटी में उसकी अच्छी पहचान है। उसे शादी करनी थी तो वो अपने लेवल की लड़की से करता। आराध्या जैसी लड़की से शादी करने का उसका क्या मकसद है?"
सूरज ने उत्तर दिया, "बहुत बड़ा मकसद है सर।"
ऋषि चौंककर सूरज की तरफ़ देखते हैं।
सूरज ने कहा, "आप तो ये बात अच्छी तरह से जानते हैं कि गौतम अग्रवाल एक वूमेनाइज़र है। लड़कियाँ उसका शौक हैं। एक नंबर का प्लेबॉय है। और अभी उसकी इतनी उम्र नहीं हुई है कि वो घर-परिवार में रहे। उसे तो बस अपनी मौज-मस्ती के लिए लड़कियाँ चाहिए। उसके दादा जी की ये वसीयत कि उसे अपने पच्चीसवें साल में शादी करनी होगी... आपको लगता है एक प्लेबॉय इंसान पच्चीस साल में शादी करके अपनी बीवी की ज़िम्मेदारी उठाएगा? वो मैडम से शादी बस इसलिए कर रहा था ताकि उसे अपने गले में कोई ज़िम्मेदारी की घंटी न बांधनी पड़े। मैडम से शादी करके वो उन्हें बस अपने एहसानों तले दबा रहा था। मैडम को ये लगेगा कि उस जैसी लड़की से कौन शादी करेगा, इतने बड़े परिवार में उनकी शादी हो जाने से मैडम वैसे भी कुछ नहीं कर पाती, बीवी बनकर घर के कोने में पड़ी रहती है। और Mr. अग्रवाल अपनी मनमानी करता। अगर किसी लड़की के साथ भी देख लेते तो मैडम क्या ही कर लेती? एक तो मैडम बोल नहीं सकती, ऊपर से उनके आगे-पीछे कोई है भी नहीं। और हाँ, हमें गुप्त सूत्रों से पता चला है कि Mr. अग्रवाल का मैडम को लेकर एक और सोच थी।"
ऋषि ने पूछा, "क्या?"
सूरज ने बताया, "यही कि शादी होने के बाद भी अगर मैडम Mr. अग्रवाल पर अपनी बीवी होने का दबाव बनाएँगी या उनके काम में टांग अड़ाएँगी, तो Mr. अग्रवाल उनका मर्डर करवा देंगे।"
ऋषि ने आश्चर्य से कहा, "😳 व्हाट्स!"
सूरज ने आगे बताया, "ये सर, उनका प्लान था। अगर मैडम उनकी लाइफ़ में ज़्यादा इंटरफ़ेयर करेंगी तो वो उनका मर्डर एक एक्सीडेंट के थ्रू करवाने का प्लान कर रहे थे... जिससे उनके मरने के बाद लोगों को ये लगे कि ये एक एक्सीडेंटल डेथ है। उन्हें लोगों की सिम्पैथी मिल जाती। लोग तो यही कहते ना, "देखो, एक तो बेचारे ने एक अनाथ, बेजुबान लड़की से शादी करके उसका जीवन सुधार दिया और भगवान ने उस लड़की को ही उठा लिया।""
ऋषि ने गुस्से से कहा, "😠 गौतम अग्रवाल एक गिरा हुआ इंसान है, ये तो मुझे पता था, पर वो इस हद तक जा सकता है, ये मैंने कभी नहीं सोचा था।"
सूरज ने कहा, "यस सर। एक तो मैडम के आगे-पीछे कोई नहीं है जो उनकी मौत पर अफ़सोस ज़ताएगा। अभी ये तो मैडम की अच्छी किस्मत है या कुछ भी कहें, ये गौतम अग्रवाल से शादी होने से पहले आप वहाँ पहुँच गए और आपने मैडम से शादी कर ली।"
सूरज ने ऋषि को आराध्या की सारी डिटेल्स देकर वहाँ से चला गया। ऋषि ने उस फ़ाइल को पढ़ा और उसके मन में कल रात से लेकर सुबह तक की सारी बातें एक रील की तरह चल रही थीं।
ऋषि ने अपने आप से कहा, "इस लड़की ने अपने जीवन में कितना कुछ सहन किया है। अपने माता-पिता को खो दिया, अपनी आवाज़ खो दी और गौतम जैसे इंसान से शादी करने वाली थी। अगर ये शादी हो जाती तो क्या होता इसका? और मैंने इसके साथ कौन सा बहुत अच्छा व्यवहार किया है? जब से आई है तब से डाँट रहा हूँ। इसने तो मुझसे शादी करने के लिए बोला भी नहीं था। मैंने ही इससे शादी की है। अब जब शादी की ही है तो कुछ न कुछ तो इसे इज़्ज़त तो दे ही सकता हूँ। वरना मुझमें और गौतम में फ़र्क क्या रहेगा?"
"एक बार इस गौतम का चैप्टर ख़त्म कर दूँ। उसके बाद मैं इसे अच्छी लाइफ़स्टाइल देकर तलाक़ दे दूँगा, ताकि ये कोई मजबूरी में न रहे और अपनी ज़िंदगी अपने तरीके से जी सके।"
ऋषि आराध्या की फ़्यूचर प्लानिंग करते हुए अपने काम में बिज़ी हो गया।
दूसरी ओर, मेंशन में...
बड़ी माँ ने आराध्या को श्रृंगार का सामान दिया और कहा,
बड़ी माँ: आरू, ये लो तुम्हारा श्रृंगार का सामान। जाओ, जल्दी तैयार होकर आ जाओ।
आराध्या ने सामान लिया और अपने कमरे में चली गई। कमरे में जाकर जब वो बैग खोलकर देखती है तो उसमें बहुत सारे सामान होते हैं; सिंदूर, बिंदी, चूड़ियाँ, काजल, लिपस्टिक... और भी बहुत कुछ। उसमें कुछ एक-आध गले के सेट भी होते हैं।
आराध्या जल्दी से शीशे के सामने बैठती है। सबसे पहले वो अपनी सूनी माँग में सिंदूर भरती है, फिर काजल लगाती है, माथे पर बिंदी, हाथों में चूड़ियाँ पहनती है। उसके होंठ तो वैसे ही लाल थे, पर हल्की लाली से और ज़्यादा निखर आए हैं। आराध्या जल्दी से अपने सारे श्रृंगार का सामान ड्रेसिंग टेबल पर सेट करती है और वापस नीचे चली जाती है।
जब आराध्या नीचे पहुँचती है तो बड़ी माँ और नीमो दोनों उसे देखती ही रह जाती हैं।
बड़ी माँ जल्दी से आगे आती है और आराध्या को गले लगा लेती है।
बड़ी माँ: मेरी बहू को तो सा श्रृंगार की ज़रूरत ही नहीं है। ये तो वैसे ही बहुत सुंदर लगती है। सिंदूर लगाने से क्या रंग निखर कर आया है मेरी दुल्हन का!
नीमो: ये तो आपने बिल्कुल सही कहा बड़ी मालकिन।
बड़ी माँ ने आराध्या से कहा, "शादी के बाद आज तुम्हारी पहली रसोई है। रसोई में कुछ मीठा बनाना होता है। तुम्हें बनाना आता है?"
आराध्या ने अपना सिर हाँ में हिलाया।
बड़ी माँ: तो ठीक है, मूँग दाल का हलवा बना लो। ऋषि को बहुत पसंद है। और हाँ, उसमें बादाम डालना मत भूलना। नीमो, इसकी मदद करना।
आराध्या ये सुनकर नीमो के साथ रसोई की तरफ़ चली जाती है।
आराध्या नीमो के साथ रसोई में जाती है। नीमो आराध्या को रसोई में सारा सामान दिखाकर वहाँ से बाहर निकल जाती है।
आराध्या मूँग दाल का हलवा बनाने के लिए सारा सामान इकट्ठा करती है और हलवा बनाते-बनाते अपने मन में सोचती है,
"यकीन नहीं होता, एक दिन में मेरी ज़िंदगी कैसे पलट गई। कहाँ तो मेरी शादी गौतम जी से होने वाली थी और कहाँ इनसे हो गई। इन्हें तो मैं अच्छी तरह से जानती भी नहीं। मेरे लिए तो ये पूरे अजनबी हैं जो अचानक से मेरी ज़िंदगी में तूफ़ान बनकर आ गए। पता नहीं इन्होंने मुझसे शादी क्यों की? जब इन्हें ये पता चला था कि मैं बोल नहीं सकती हूँ, तब मुझ पर कितना गुस्सा हुए थे। अब अगर इन्हें ये पता चलेगा कि मैं अनाथ लड़की हूँ और सारी ज़िंदगी बस बोझ बनकर ही रहूँगी, तो पता नहीं क्या करेंगे? कहीं ये मुझे छोड़ न दें। और छोड़ भी देंगे तो मैं क्या ही कर लूँगी? इस पूरी दुनिया में है ही कौन मेरा? कौन एक ऐसी लड़की से शादी करना चाहेगा जो बोल नहीं सकती? फ़िलहाल जो हो रहा है उसे होने देती हूँ, माता रानी यहाँ तक लाई है तो वही आगे ले जाएँगी। कुछ सोचकर उन्होंने ही तो ऋषि जी को मेरी ज़िंदगी में भेजा होगा, वरना मैं तो उन्हें जानती तक नहीं थी... फिर उनका अचानक से मेरी शादी में आना और मुझसे शादी कर लेना... ये सब माता रानी की मर्ज़ी थी। जब उन्होंने मेरा यहाँ तक साथ दिया है, आगे भी वही देंगी।"
अपने मन में अपनी ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव को याद करते-करते आराध्या ने मूँग दाल का हलवा बनाया। हलवे की पहली कटोरी लेकर उसने मंदिर में भोग लगाया।
बड़ी माँ ने आराध्या से कहा, "आरू, तुम एक काम करो, नीमो के साथ शाम के खाने की तैयारी कर लो। हलवा भी हम सब एक साथ मिलकर खाएँगे जब ऋषि आ जाएगा।"
आराध्या ने अपना सिर हाँ में हिलाया और नीमो के साथ रसोई में चली गई।
शाम का वक़्त... नीमो और आराध्या डिनर डाइनिंग टेबल पर लगाने की तैयारी कर रहे थे, तभी घर की डोरबेल बजती है।
एक नौकर जाकर दरवाज़ा खोलता है। ऋषि अंदर आता है; उसके एक हाथ में सूटकेस का बैग होता है और दूसरे हाथ में वो फ़ोन पर किसी से बात कर रहा होता है। वो बिना किसी पर ध्यान दिए सीधे अपने कमरे में चला जाता है।
आधे घंटे बाद ऋषि अपने हाथ में लैपटॉप लिए अपने कमरे से बाहर आता है। उसने घर के कैज़ुअल कपड़े पहने हुए हैं। वो सीधे सोफ़े पर बैठ जाता है और लैपटॉप पर काम करने लगता है।
आराध्या रसोई की खिड़की से ऋषि को देख रही होती है, तभी उसके पीछे नीमो आती है और आराध्या से कहती है,
नीमो: तुम्हारा ही पति है, चुपके से देखने की क्या ज़रूरत है? 😛
आराध्या हड़बड़ाकर वहाँ से हट जाती है और अपना सिर ना में हिलाती है। नीमो मुस्कुराकर उसके हाथ में एक कॉफ़ी का मग पकड़ाती है।
नीमो: जाओ, ऋषि बाबा को कॉफ़ी दे आओ।
आराध्या को याद आता है कि जब भी वो ऋषि के सामने जाती है वो उसे डाँट देता है। वो अपना सिर ना में हिलाती है।
पर नीमो उसकी एक नहीं सुनती और उसे जबरदस्ती ऋषि को कॉफ़ी ले जाने के लिए कहती है।
आराध्या धीरे-धीरे कदमों से ऋषि के पास जाती है और उसके बगल में जाकर खड़ी हो जाती है। ऋषि लैपटॉप पर काम कर रहा होता है; उसका सारा ध्यान लैपटॉप में ही होता है। आराध्या धीरे से कॉफ़ी को ऋषि के सामने टेबल पर रखती है। ऋषि जब नज़रें घुमाकर देखता है तो मेहँदी और चूड़ियों से भरा हुआ एक हाथ कॉफ़ी का मग टेबल पर रख रहा होता है। ऋषि अपनी नज़रें उठाकर आराध्या को देखता है।
पहली बार जब ऋषि ने आराध्या को देखा था तो वह दुल्हन के जोड़े में थी। आज सुबह जब देखा था तो बिना श्रृंगार के, सूनी-सूनी घूम रही थी। इसे देखकर मानो एक पल के लिए ऋषि के होश उड़ गए। उसने आराध्या को एकटक देखा। उसका चेहरा इतना मासूम सा दिख रहा था। उसके माँग में अपना नाम का सिंदूर देखकर ऋषि एक पल के लिए स्पೀचलेस हो गया। आराध्या कॉफ़ी रखकर वहाँ से चली गई। ऋषि उसे जाते हुए देखता रहा जब तक वो उसकी आँखों से ओझल नहीं हो गई।
वो धीरे से कॉफ़ी का मग उठाता है, उसे पीता है और फिर से लैपटॉप पर काम करने लगता है।
आधे घंटे बाद डिनर टेबल पर सबका डिनर लग गया। बड़ी माँ अपने कमरे से बाहर आई और डिनर टेबल पर बैठ गई। आराध्या डिनर लगा रही थी; नीमो उसकी मदद कर रही थी। बड़ी माँ ने ऋषि को आवाज़ दी,
बड़ी माँ: ऋषि, आ जाओ, खाना खा लो, बाद में काम कर लेना।
ऋषि: बस पाँच मिनट।
बड़ी माँ: कोई पाँच मिनट नहीं! सारा दिन ऑफ़िस में काम करते हो ना, कम से कम डिनर टाइम पर कर लो।
बड़ी माँ की डाँट सुनकर ऋषि डाइनिंग टेबल पर आ जाता है।
आराध्या ऋषि की प्लेट लगाने लगती है। बड़ी माँ देखकर मुस्कुराती है। ऋषि को थोड़ा सा अजीब लगता है क्योंकि आदत नहीं थी कि कोई उसकी देखभाल करे; वो अपने काम खुद ही करता था। लेकिन जब उसे आराध्या के बारे में पता चला तो उसने सोचा कि वो आराध्या को डाँटेगा नहीं, उस पर गुस्सा नहीं करेगा। इसीलिए वो जो करती थी उसे करने दे रहा था। आराध्या डिनर लगाकर वहाँ से किचन की तरफ़ जाने लगती है, तो बड़ी माँ उसे रोकते हुए कहती है,
बड़ी माँ: आरू, तुम भी हमारे साथ बैठकर खाना खाओ।
आराध्या अपना सिर ना में हिलाती है और ये बताती है कि वो बाद में खाएगी।
उसके इशारे को समझकर बड़ी माँ कहती है, "बाद में क्यों? आओ, हमारे साथ बैठकर खाना खाओ। बाद में अकेले-अकेले क्यों खाना खाओगी? अभी सब बैठे हैं ना, तुम भी आओ।"
आराध्या धीरे से वहाँ आती है और ऋषि के साथ वाली चेयर पर बैठने लगती है, पर जैसे ही वो चेयर पर बैठती है, ऋषि कहता है,
ऋषि: यहाँ मत बैठो, ये प्रियंका की जगह है। सामने जाओ।
ऋषि के बोलने पर प्रियंका की जगह आराध्या खड़ी हो गई। बड़ी माँ ने उसे ऐसे उठते देखा और ऋषि से कहा,
"ऋषि, ये क्या बदतमीज़ी है? आराध्या बैठी थी, उसे बैठने क्यों नहीं दिया? क्या प्रियंका यहाँ है, वहाँ बैठने के लिए?"
ऋषि ने जवाब दिया, "बड़ी माँ, आप जानते हैं, मैं प्रियंका के किसी भी सामान को लेकर कभी लापरवाही बर्दाश्त नहीं करता, चाहे वो यहाँ हो या ना हो। ये उसकी जगह है, और उसकी जगह कोई नहीं ले सकता। और जहाँ तक आराध्या के बैठने की बात है, यहाँ और भी कुर्सियाँ हैं।"
ऋषि की बात सुनकर बड़ी माँ आराध्या की तरफ़ देखती हैं। आराध्या सिर झुकाए, चुपचाप सामने वाली कुर्सी पर जाकर बैठ गई। निमो सबको डिनर सर्व करती है।
बड़ी माँ जब खाना का पहला निवाला मुँह में रखती हैं, तो उन्हें कुछ अलग सा स्वाद आता है। वो निमो से कहती हैं,
"क्या बात है निमो? आज तो खाना बहुत ही टेस्टी बना है! सच बताना, ऑनलाइन वीडियो देखकर बनाया है ना? 😄 क्योंकि तुम्हारे हाथ का स्वाद मुझे अच्छे से पता है।"
निमो कहती है, "क्या बड़ी मालकिन! मैं इतना बेकार खाना बनाती हूँ क्या?"
बड़ी माँ कहती हैं, "बेकार तो नहीं, बस खाने लायक बनाती हो, लेकिन आज का खाना तो बहुत ही स्वादिष्ट है। इसके लिए तुम्हें इनाम देना तो बनता है।"
निमो कहती है, "अरे बड़ी मालकिन! अगर कुछ देना ही है, तो मुझे नहीं, अपनी बहू को दीजिये। इसने सारा खाना बनाया है।"
ऋषि, जो चुपचाप अपना खाना खा रहा था, यह सुनकर अचानक खाना खाना बंद कर देता है। वो आराध्या को देखता है, जो अपनी नज़रें झुकाए बैठी है।
बड़ी माँ को जब पता चलता है कि आराध्या ने खाना बनाया है, तो वो खुशी से फूली नहीं समाती। वो निमो से कहती हैं कि वो उसके कमरे से उसका पर्स ले आए। निमो जल्दी से बड़ी माँ के कमरे में जाती है और पर्स ले आकर बड़ी माँ को दे देती है। बड़ी माँ पर्स से कुछ पैसे निकालकर आराध्या के हाथ में रख देती हैं।
आराध्या अपना सिर हिलाती है। बड़ी माँ कहती हैं, "बेटा, ये पहली रसोई का इनाम है, रख लो।"
तभी निमो मूंग दाल के हलवे की कटोरी रखती है। बड़ी माँ हलवे की कटोरी देखकर आराध्या से कहती हैं, "ये तो वही है ना, जो तुमने आज बनाया था?"
आराध्या धीरे से सिर हिलाती है। ऋषि जैसे ही मूंग दाल का हलवा देखता है, उसे पता चल जाता है कि आराध्या ने यह बनाया है। वो तुरंत अपनी सीट से खड़ा हो जाता है और कहता है, "मेरा मीठा खाने का मन नहीं है।" वो सीधे अपने कमरे में चला जाता है। आराध्या को थोड़ा बुरा लगता है कि ऋषि ने मीठा नहीं खाया, क्योंकि बड़ी माँ ने उसे बड़े प्यार से, यह कहकर बनवाया था कि ऋषि को मूंग दाल का हलवा बहुत पसंद है।
बड़ी माँ आराध्या को देखकर उसके हाथ पर हाथ रखकर कहती हैं, "कोई बात नहीं। यह होता ही ऐसा है। तुम्हें धीरे-धीरे आदत हो जाएगी, जैसे हम लोगों को हो गई है।"
आराध्या धीरे से सिर हिलाती है और अपने चेहरे पर एक छोटी सी मुस्कान लाती है।
रात को सब डिनर करके अपने-अपने कमरों में आराम कर रहे थे। ऋषि अपनी बालकनी में बैठा आसमान की तरफ़ देख रहा था। तभी ऋषि के कमरे का दरवाज़ा खुलता है। ऋषि पलटकर देखता है तो बड़ी माँ एक प्लेट लेकर आ रही होती हैं। वो प्लेट टेबल पर रख देती हैं और धीरे-धीरे ऋषि के पास बालकनी में आ जाती हैं।
"क्या सोच रहे हो?" बड़ी माँ पूछती हैं।
ऋषि कहता है, "कुछ नहीं, बस ऐसे ही।"
"ऋषि, मैंने तुम्हें जन्म भले ही नहीं दिया, लेकिन बचपन से पाला है। तुम्हारी रग-रग से वाकिफ़ हूँ। सच बताओ, क्या सोच रहे हो?" बड़ी माँ कहती हैं।
"बड़ी माँ, आप प्लीज आराध्या से ज़्यादा क्लोज़ मत होइए। मैं देख रहा हूँ, जब से वो आई है, आप उससे जुड़ाव महसूस कर रही हैं। प्लीज, उसे थोड़ी दूरी बनाकर रखें, क्योंकि कल को जब वो घर से जाएगी, तो आपको सबसे ज़्यादा तकलीफ़ होगी।" ऋषि कहता है।
"और तुम यह क्यों चाहते हो कि वो घर से जाए?" बड़ी माँ पूछती हैं।
"बड़ी माँ, मैंने उससे एक मकसद के लिए शादी की है, जिस दिन वो पूरा हो जाएगा..." ऋषि कहता है।
"उस दिन तुम उसे इस घर से निकाल दोगे? यही ना?" बड़ी माँ बीच में रोकते हुए कहती हैं।
"उसके बाद उसे यहाँ रखने की कोई वजह भी तो नहीं है।" ऋषि कहता है।
बड़ी माँ हँसते हुए कहती हैं, "वजह तो बहुत बड़ी है बेटा, और यह वजह तुमने ही उसे दी है। भूल गए? वो तुम्हारी बीवी है, तुमने शादी करके लाई है, दुनिया के सामने हाथ थामा है उसका, और उसी हाथ को पकड़ के घर में लाए हो।"
बड़ी माँ के कहने पर ऋषि स्पीचलेस हो जाता है और चुपचाप खड़ा रहता है।
बड़ी माँ उसके कमरे से जाने लगती हैं और जाते-जाते कहती हैं, "दुनिया का हर रिश्ता हमारी मर्ज़ी से नहीं बनता, कुछ रिश्ते ऊपरवाला ऊपर से बनाकर भेजता है, जैसे तुम्हारा और आराध्या का रिश्ता। एक-दूसरे से अनजान दो लोग आज एक छत के नीचे हैं, और एक पवित्र बंधन में बंधे हुए हैं। हाँ, यह अलग बात है कि तुम इस बंधन को बोझ समझ रहे हो, लेकिन आराध्या ने यह बंधन पूरी ईमानदारी से निभाया है। और उसकी पहल, वो मीठा बनाकर दिया था। और मैं जानती हूँ, तुमने यह हलवा क्यों नहीं खाया, क्योंकि यह मूंग दाल का हलवा जितना तुम्हें पसंद है, उतना ही प्रियंका को भी पसंद था। मैं जानती हूँ, प्रियंका की जगह तुम्हारी ज़िंदगी में, या हम सबकी ज़िंदगी में कोई नहीं ले सकता, पर आराध्या अपने लिए एक अलग जगह डिज़र्व करती है। एक कदम आराध्या ने बढ़ाया है, एक कदम तुम बढ़ा दो। तुम दोनों जब तक साथ हो, तब तक तो एक रिश्ते में ईमानदार रहो।"
बड़ी माँ के जाने के बाद ऋषि आसमान की तरफ़ देखकर बड़ी माँ की बातें सोच रहा था। थोड़ी देर बाद ऋषि अपने ख्यालों से थककर कमरे में आता है। वो देखता है कि उसके बेडसाइड टेबल पर एक कटोरे में मूंग दाल का हलवा रखा हुआ है। वो देखकर ही समझ जाता है कि यह वही हलवा है जो आराध्या ने बनाया था और बड़ी माँ लेकर आई हैं।
वो टेबल के पास जाता है और कटोरी उठाकर बेड पर बैठ जाता है। न जाने अपने मन में क्या सोच रहा होता है, वो अचानक हलवा उठाकर अपने मुँह में डाल लेता है। उसका मीठा स्वाद और बादाम उसे बहुत पसंद आता है।
हलवा खाकर ऋषि के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ जाती है। ऋषि कुछ सोचते-सोचते पूरी कटोरी हलवा खा जाता है। थोड़ी देर बाद वो बेड पर लेट जाता है, तभी उसकी नज़र सामने की दीवार पर लगी अपनी और प्रियंका की फ़ोटो पर जाती है।
ऋषि प्रियंका की फ़ोटो देखकर उससे बातें करता है:
"मुझे नहीं पता प्रियंका, मैंने जो किया है वो सही है या गलत, उस समय मेरे दिल ने मुझे जो करने के लिए कहा, मैंने वही कर दिया। तुम होतीं तो शायद मुझे सही-गलत के बारे में कुछ बता सकतीं। पता है प्रियंका, आज जब मुझे आराध्या के बारे में उसकी सच्चाई पता चली, तो मैंने सोच लिया था कि मैं आराध्या पर गुस्सा नहीं करूँगा। पता नहीं मैं अपने इस वादे पर कब तक कायम रहूँगा। आराध्या की शादी करने का फैसला मेरा था, शादी के रिश्ते में न तो फीलिंग है, न कोई एहसास है, बिना किसी एहसास के एक रिश्ता सिर्फ़ बोझ होता है। आराध्या ने अपनी ज़िंदगी में बहुत सारे दुख देखे हैं, अब मैं उसे शादी के बोझ तले नहीं दबाना चाहता हूँ। तुम यहाँ होतीं तो शायद बात कुछ और होती।"
"प्रियंका, तुम मुझसे नाराज़ तो नहीं हो ना, कि मैंने तुम्हें शादी की बात नहीं बताई। चलो कोई नहीं, कल आकर तुम्हारी सारी नाराज़गी दूर कर देता हूँ।"
ऋषि प्रियंका की तस्वीर से बात करते-करते सो जाता है।
अगले दिन सुबह, आराध्या जल्दी उठ जाती है। वो सबसे पहले भगवान को प्रणाम करती है। बेड से उतरकर वो खिड़की पर जाती है और वहाँ से सारे पर्दे हटाने लगती है ताकि बाहर की रोशनी उसके कमरे में आ सके।
आराध्या अपनी बालकनी में जाकर सुबह के मौसम को निहार रही होती है। तभी उसकी नज़र नीचे ऋषि पर पड़ती है। वो गार्डन से होते हुए कहीं जा रहा होता है। आराध्या देखती है कि ऋषि चलते-चलते गार्डन एरिया क्रॉस करके थोड़ी दूरी पर बने एक आउटहाउस में जा रहा है।
यह आउटहाउस उसके बंगले से थोड़ी दूरी पर, पर उसी बंगले के एरिया में है। आराध्या ने अभी तक वो बंगला भी पूरी तरह नहीं देखा था, तो आउटहाउस कहाँ है, यह उसे नहीं पता था।
आराध्या देखती है कि ऋषि उसमें अंदर जाता है और अंदर से दरवाज़ा बंद कर देता है।
आराध्या को समझ नहीं आता कि ऋषि इतनी सुबह-सुबह आउटहाउस क्यों गया है।
आराध्या जल्दी से फ्रेश होती है और नीचे आ जाती है। बड़ी माँ पूजा की तैयारी कर रही होती है। आराध्या उनकी मदद करती है। बड़ी माँ ने आज की पूजा आराध्या के हाथों से करवाई।
पूजा खत्म होने के बाद आराध्या और निमो किचन की तरफ़ चले जाते हैं। बड़ी माँ मंदिर में बैठकर रामायण का पाठ कर रही होती हैं।
नाश्ता बनाते हुए आराध्या की नज़र किचन की खिड़की से मेन डोर पर जाती है, तो वो देखती है कि ऋषि अंदर आ रहा है।
आराध्या घड़ी देखती है। ऋषि डेढ़ घंटे बाद घर वापस आता है, डेढ़ घंटे तक वो आउटहाउस में ही रहा।
ऋषि सीधे अपने कमरे में चला जाता है। जब तक ऋषि तैयार होकर नीचे आता है, तब तक आराध्या और निमो ने सारा नाश्ता टेबल पर लगा दिया होता है और बड़ी माँ भी पाठ करके टेबल पर आ जाती हैं।
सब डाइनिंग टेबल पर बैठते हैं। निमो सबको नाश्ता सर्व करती है।
बड़ी माँ नाश्ता करते हुए ऋषि से कहती हैं, "ऋषि, बहू अपना कोई सामान तो लाई नहीं है? मेरे पास कुछ पुरानी साड़ियाँ थीं, वो मैंने बहू को दे दी हैं। अब नई-नवेली दुल्हन ऐसे पुराने कपड़ों में अच्छी थोड़ी ना लगेगी। तू कहे तो मैं बहू के लिए थोड़े कपड़े ले आऊँ।"
ऋषि कहता है, "बड़ी माँ, मैंने आपको कभी कुछ करने से रोका है क्या? और आप यह सब छोटी-छोटी बातें मुझसे पूछती हैं? जो मन करे, वो कीजिये।"
"ठीक है।" बड़ी माँ कहती हैं।
ऋषि अपना नाश्ता खत्म करके ऑफिस के लिए निकल रहा होता है, तभी सूरज आता है और ऋषि से कहता है, "गुड मॉर्निंग सर।"
"मॉर्निंग सूरज, तुम सुबह-सुबह घर पर क्या कर रहे हो?" ऋषि पूछता है।
"सर, आज मुझे Mr. परिहार के साथ मीटिंग है, हम सीधे मीटिंग में जा रहे हैं।" सूरज जवाब देता है।
एक गार्ड गाड़ी का दरवाज़ा खोलता है। गाड़ी में बैठते हुए ऋषि सूरज से कहता है, "तुम फ़ाइल मुझे दे दो, मीटिंग में अकेले देख लूँगा। बड़ी माँ और आराध्या आज बाहर जा रहे हैं, मैं चाहता हूँ कि तुम उनके साथ जाओ, और हाँ, सिक्योरिटी को अपने साथ ले जाना मत भूलना।"
"ओके सर।" सूरज कहता है।
ऋषि अपने मीटिंग के लिए निकल जाता है और सूरज सिक्योरिटी को कुछ समझा रहा होता है।
थोड़ी देर में निमो, आराध्या और बड़ी माँ बाहर आते हैं। सूरज को देखकर बड़ी माँ कहती हैं,
"अरे सूरज! तुम यहाँ क्या कर रहे हो? तुम्हें तो ऋषि के साथ होना चाहिए ना।"
सूरज कहता है, "जी मैम, पर मुझे सर ने आप लोगों की सुरक्षा के लिए यहाँ रखा है। उन्होंने कहा है कि आप और आराध्या मैम बाहर जा रहे हैं, तो आप लोगों की सुरक्षा के लिए मैं आपके साथ चलूँ।"
"अरे वाह! इससे पहले तो ऋषि ने कभी भी किसी एम्प्लॉयी को हमारी सुरक्षा के लिए नहीं भेजा है। जब देखो बॉडीगार्ड हमारे साथ रहते थे।" बड़ी माँ कहती हैं।
निमो कहती है, "अरे बड़ी मालकिन! हमारे लिए तो अभी भी बॉडीगार्ड है, यह हाई सिक्योरिटी तो बहू रानी के लिए की गई है! 😄"
निमो के मुँह से यह सुनकर आराध्या शर्माने लगती है।
बड़ी माँ और आराध्या शॉपिंग के लिए निकल गई थीं। सूरज ने पहले ही मॉल में फोन करके उनके आने की खबर दे दी थी। इसलिए मॉल की सुरक्षा कड़ी कर दी गई थी, और वहाँ लोगों की भीड़ कम थी।
आराध्या और बड़ी माँ मॉल पहुँचीं। आराध्या पहली बार मॉल में थी; उसने पहले कभी इतनी बड़ी जगह पर शॉपिंग नहीं की थी। वह पूरे मॉल को देखकर दंग रह गई। बड़ी माँ आराध्या का हाथ पकड़कर उसे सीधे चौथी मंजिल पर ले गईं। महिलाओं के कपड़ों के सेक्शन में जाने के बाद, उन्होंने एक लेडी को उनके लिए कपड़े लाने के लिए कहा। लगभग एक घंटा शॉपिंग में बीत गया।
सूरज दुकान के बाहर खड़ा लोगों पर नज़र रखे हुए था। उसने एक मिनट के लिए भी अपनी नज़रें नहीं हटाई थीं।
एक घंटे बाद सूरज का फ़ोन बजा। उसने देखा कि ऋषि का कॉल है।
वह फ़ोन उठाता है और "हेलो" कहता है।
ऋषि: "वो लोग कहाँ हैं?"
सूरज: "सर, दोनों मैडम अभी ज्वेलरी शॉप में हैं, जल्दी से खरीददारी कर रही हैं।"
ऋषि: "हम्म… सब कुछ ठीक तो है ना? कोई प्रॉब्लम तो नहीं हुई?"
सूरज: "नहीं सर, मैंने पहले ही कॉल करके मैनेजर को बता दिया था कि मैडम आ रही हैं, तो मॉल की सुरक्षा कड़ी कर दी गई है और यहाँ लोग भी कम हैं।"
ऋषि: "ठीक है, कोई प्रॉब्लम हो तो फ़ोन करना।"
सूरज: "जी सर।"
तीन घंटे बाद उनकी शॉपिंग खत्म हुई। इस शॉपिंग में आराध्या का कोई हाथ नहीं था; वह बस मॉल की हर चीज़ को निहार रही थी। सारी शॉपिंग बड़ी माँ ने आराध्या के लिए की थी। शॉपिंग खत्म होने के बाद, बड़ी माँ सारा सामान घर पहुँचाने को कह देती हैं और आराध्या को लेकर वापस मेंशन के लिए निकल जाती हैं।
शाम का वक़्त, मेंशन।
आराध्या शाम को बगीचे में टहल रही थी। वह पहली बार मेंशन के बगीचे में आई थी। सुंदर-सुंदर फूल और पौधे उसे बहुत अच्छे लग रहे थे। आराध्या उन फूलों की क्यारियों को देखकर खुश हो गई।
आराध्या फूलों की क्यारियों को देखते-देखते बगीचे के पिछले हिस्से में चली गई। तभी उसकी नज़र सामने आउटहाउस पर पड़ी। आराध्या को अचानक सुबह ऋषि का यहाँ आना याद आ गया।
आराध्या इधर-उधर देखती है, तो दूर कुछ बॉडीगार्ड नज़र आते हैं, जो अपनी बातों में मशगूल थे।
आराध्या धीरे से चलकर आउटहाउस की तरफ़ बढ़ने लगी। वह आउटहाउस से बस पाँच कदम की दूरी पर थी। आराध्या के मन में बहुत सारे सवाल चल रहे थे। वह सोच रही थी कि क्या यहाँ जाकर वह कोई गलती तो नहीं कर रही। जैसे ही आराध्या अपना एक और कदम बढ़ाती है, पीछे से एक हाथ उसके कंधे पर आता है।
आराध्या घबराकर पीछे देखती है, तो वहाँ ऋषि था।
ऋषि आराध्या को वहाँ देखकर गुस्से में था, लेकिन उसने सोचा कि वह आराध्या पर गुस्सा नहीं करेगा। इसलिए थोड़े सख्त लहजे में कहा,
ऋषि: "यहाँ क्या कर रही हो?"
आराध्या अपना सिर हिलाती है।
ऋषि: "अंदर जाओ।"
आराध्या जैसे ही देखती है, वह वहाँ से भागती हुई मेंशन के अंदर चली जाती है, जैसे किसी शेर के पिंजरे से छूटकर भागी हो।
जैसे ही आराध्या मेंशन में जाती है, ऋषि सख्त आवाज़ में चिल्लाता है,
ऋषि: "गार्ड!"
ऋषि के चिल्लाने पर वहाँ तीन-चार गार्ड आ जाते हैं। ऋषि गुस्से में चिल्लाता है,
ऋषि: "मैंने कहा था ना तुम लोगों से कि इस तरफ़ आने की इज़ाज़त सिर्फ़ मुझे और बड़ी माँ को है, तो आराध्या यहाँ तक कैसे आई?"
एक गार्ड घबराते हुए कहता है, "सॉरी सर, शायद हमारा ध्यान नहीं था।"
ऋषि: "सॉरी माई फ़ुट! अगर तुम लोगों को काम नहीं करना है तो निकल जाओ यहाँ से! अगली बार अगर मैंने तुम लोगों की तरफ़ से ऐसी लापरवाही देखी, तो मैं तुम्हें यहाँ से बाहर निकाल दूँगा। समझे?"
सारे गार्ड डर के मारे अपना सिर हिलाते हैं।
ऋषि एक बार आउटहाउस की तरफ़ देखता है और फिर मेंशन की तरफ़ चला जाता है।
ऋषि सीधे अपने कमरे में चला जाता है। आज उसकी मीटिंग जल्दी खत्म हो गई थी, इसलिए वह जल्दी घर आ गया था।
बड़ी माँ आराध्या के पास आती है और कहती है, "आरू, मैं अपनी सहेली के घर जा रही हूँ, उसकी बहू की गोद भराई है। रात को शायद देर से आऊँगी। निमो मेरे साथ जा रही है। तुम भी हमारे साथ चलो।"
आराध्या इशारों से कहती है कि वह नहीं जा पाएगी, क्योंकि ऋषि घर आ गया है।
बड़ी माँ: "क्या? ऋषि घर आ गया है? ओहो, चलो कोई बात नहीं, फिर मैं भी नहीं जाती।"
आराध्या इशारों से उन्हें जाने के लिए कहती है और कहती है कि वह सब मैनेज कर लेगी।
आराध्या के इतना कहने पर बड़ी माँ मान जाती है। बड़ी माँ नीचे आती है तो देखती है कि ऋषि सोफ़े पर बैठा लैपटॉप पर काम कर रहा है।
वह ऋषि से कहती है, "ऋषि, मैं और निमो बाहर जा रहे हैं। तुम अपना ख्याल रखना, हम लोग जल्दी घर आ जाएँगे।"
ऋषि: "ठीक है बड़ी माँ, आप लोग आराम से जाइए। और ड्राइवर को अपने साथ ले जाइए।"
ऋषि को बड़ी माँ के जाने पर यह लगा कि आराध्या भी उनके साथ गई होगी।
उन लोगों के जाने के दस मिनट बाद ऋषि के कानों में पायल की आवाज़ आती है। ऋषि नज़रें उठाकर देखता है तो देखता है कि आराध्या सीढ़ियों से नीचे उतर रही है।
ऋषि मन में सोचता है, "ये बड़ी माँ के साथ क्यों नहीं गई?"
आराध्या धीरे से किचन में चली जाती है। लगभग पाँच मिनट बाद आराध्या बाहर आती है। ऋषि के कानों में अभी भी उसकी पायल की हल्की आवाज़ आ रही होती है।
आराध्या धीरे से ऋषि के पास आती है और उसके टेबल पर एक कॉफ़ी का मग रख देती है।
आराध्या कॉफ़ी का मग रखकर किचन की तरफ़ जा रही होती है, तभी उसे पीछे से ऋषि की आवाज़ सुनाई देती है।
ऋषि: "आराध्या।"
शादी के बाद यह पहली बार था जब ऋषि ने आराध्या का नाम लिया था। वह कभी उसे ठीक से देखता भी नहीं था।
आराध्या पीछे मुड़कर ऋषि को देखती है। वह अपनी गहरी भूरी आँखों से आराध्या को देखता है।
दो मिनट की खामोशी के बाद ऋषि आराध्या से कहता है,
"क्या हम बात कर सकते हैं?"
आराध्या जैसे जम जाती है यह सुनकर। उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था कि ऋषि उससे बात करने के लिए बुला रहा है।
ऋषि धीरे से कहता है, "अगर तुम बिज़ी नहीं हो, तो हम दो मिनट बात कर सकते हैं।"
आराध्या अपना सिर हिलाती है।
ऋषि उसे सोफ़े पर बैठने का इशारा करता है। आराध्या ऋषि के सामने सोफ़े पर बैठ जाती है।
ऋषि को समझ नहीं आता कि बात कहाँ से शुरू करे, लेकिन उसका आराध्या से बात करना ज़रूरी था।
ऋषि: "आराध्या, मैं जानता हूँ कि मैंने तुमसे इस तरह शादी करके गलती की है। मेरा तरीका गलत था, लेकिन मेरी नियत गलत नहीं थी। वह गौतम तुमसे सिर्फ़ अपने दादाजी की वसीयत के लिए शादी कर रहा था। उसे तुमसे कोई प्यार वगैरह नहीं था।"
(ऋषि के यह कहने पर कि गौतम को उससे प्यार नहीं था, आराध्या ऋषि को देखने लगती है, जैसे वह अपनी निगाहों से सवाल कर रही हो कि क्या प्यार आपको भी मुझसे नहीं है?)
आराध्या की निगाहों को समझते हुए ऋषि अपना सिर झुकाता है और आगे कहता है,
ऋषि: "मैं मानता हूँ कि हमारे रिश्ते में कुछ भी ऐसा नहीं है कि हम एक-दूसरे को सफ़ाई देने की ज़रूरत पड़े। पर मैं तुमसे एक बात क्लियर कर देता हूँ। मैंने तुमसे शादी सिर्फ़ इसलिए की है क्योंकि मुझे उस गौतम अग्रवाल को बर्बाद करना है। जिस दिन गौतम बर्बाद हो जाएगा, उस दिन मेरा तुमसे शादी करने का मकसद पूरा हो जाएगा, और उस दिन तुम इस रिश्ते से आज़ाद हो जाओगी।"
(ऋषि के यह कहने पर आराध्या के पैरों तले ज़मीन खिसक जाती है।)
ऋषि: "अगर मैंने तुम्हें अभी यहाँ से जाने दिया, तो गौतम तुम्हें मेरे ख़िलाफ़ इस्तेमाल करेगा। इसलिए जब तक मेरा मकसद पूरा नहीं होता, तुम्हें यहीं रहना पड़ेगा। डोंट वरी, तुम्हें यहाँ किसी भी चीज़ की कोई दिक्कत नहीं होगी। पर प्लीज़, बड़ी माँ से थोड़ी दूरी बनाकर रखो। अगर तुम इसी तरह उनके क्लोज़ रहोगी, तो कल को जब तुम मेरे घर से चली जाओगी, तो उन्हें सबसे ज़्यादा दुख होगा। आई होप तुम मेरी बात समझ रही हो।"
(आराध्या अपना सिर झुकाकर अपने दुख को छिपाते हुए सिर हिलाती है।)
ऋषि: "थैंक्स, मेरी बात समझने के लिए।"
ऋषि आराध्या को थैंक यू कहकर अपना लैपटॉप लेकर अपने कमरे में चला जाता है।
ऋषि के जाने के बाद आराध्या अपना चेहरा ऊपर करती है, तो उसकी आँखों में आँसुओं की धार होती है।
आराध्या ने ऋषि का खाना उसके कमरे में भेजवा दिया था, पर आज उसका खुद कुछ खाने का मन नहीं था, इसलिए वह बिना खाए अपने कमरे में चली गई।
वह अपने चेहरे को अपने घुटनों के बीच छिपाए जोर-जोर से रोती है, लेकिन वह अपने मुँह पर हाथ रख लेती है ताकि उसकी आवाज़ बाहर ना जाए।
आराध्या अपने मन में माता रानी से कहती है, "क्यों माता रानी? क्यों मेरी ज़िंदगी में इतनी परीक्षाएँ लिखी हैं आपने? आपने मेरे माँ-बाप को छीन लिया, मुझसे मेरी आवाज़ छीन ली, मुझसे जीने का हर सहारा छीन लिया… पर फिर भी मैंने अपनी भक्ति आप पर से कम नहीं होने दी। जब मेरी शादी गौतम जी से हो रही थी, तो मैंने इसे आपकी मर्ज़ी समझकर स्वीकार किया… फिर अचानक से आपने ऋषि जी को मेरी ज़िंदगी में भेज दिया… मैंने उन्हें भी आप ही की मर्ज़ी समझकर स्वीकार किया। इस रिश्ते में मैंने ऋषि जी या उनके घरवालों से कभी कुछ नहीं माँगा। इस रिश्ते के नाम पर ना कभी कोई हक़ माँगा, ना कभी कोई अधिकार माँगा। मैं तो बस यूँ ही जी रही थी… पर आज ऋषि जी ने मुझे अपनी मन की बात बताकर मुझसे जीने का अधिकार भी छीन लिया।"
आज आराध्या बहुत दुखी थी। वह अपने मन में अपने बुरे नसीब को कोस रही थी। आज उसे ऐसा लग रहा था कि वह इस दुनिया पर बस बोझ है।
वहीं दूसरी तरफ़ ऋषि के कमरे में, ऋषि ने आराध्या को ये सारी बातें तो बोल दी थीं, पर न जाने क्यों उसे अपने मन में कुछ भारी सा महसूस हो रहा था। उसे लगा कि वह आराध्या को सब बता देगा तो उसका मन हल्का होगा, लेकिन यहाँ तो उसकी बेचैनी और बढ़ गई थी। वह अपनी बेचैनी और घबराहट को कम करने के लिए बाथरूम में जाता है और शर्टलेस होकर शॉवर के नीचे खड़ा हो जाता है।
शॉवर का पानी बस उसके शरीर को ठंडा कर सकता था, लेकिन उसके मन में चल रही उलझन को न तो शॉवर का पानी ठंडा कर पा रहा था और न ही ऋषि खुद शांत हो पा रहा था।
ऋषि अपने मन में बोलता है, "इतनी बेचैनी क्यों हो रही है मुझे? मैंने आराध्या से कुछ गलत नहीं कहा, झूठ नहीं बोला। यह रिश्ता उसकी मर्ज़ी से नहीं बना है, तो क्यों वह इसमें बोझ बनकर रहेगी? मुझे जल्द से जल्द अपना काम खत्म करना होगा। कहीं ऐसा ना हो कि आराध्या हम सब से कोई ऐसी उम्मीद बाँध ले, जो हम पूरा ना कर पाएँ।"
अभी उसने खाना नहीं खाया था। उसका दिमाग खराब हो रहा था। वह बेड पर लेट जाता है और कल की प्लानिंग करते हुए सो जाता है।
पर आज आराध्या को नींद कहाँ आने वाली थी। वह रो-रोकर बुरा हाल हो रखा था और सुबह उसकी आँखें सूजी हुई थीं।
आज की रात दोनों के लिए मुश्किल रही। जैसे-तैसे रात कटी। अगली सुबह बड़ी माँ और निमो सात बजे तक घर आ गए। आराध्या तब तक उठकर किचन में आ चुकी थी। आज दिल्ली के मौसम ने अपना रुख बदल लिया था; बादल छाए हुए थे और बारिश होने की बहुत ज़्यादा संभावना थी। हल्की-हल्की हवाएँ चल रही थीं।
बड़ी माँ और निमो दोनों घर आ गए थे। निमो आराध्या की किचन में मदद कर रही थी। बड़ी माँ तैयार होकर नीचे आ गईं।
थोड़ी देर बाद डाइनिंग टेबल पर सबका नाश्ता लग गया। ऋषि भी तब तक नीचे आ गया था।
आज ऋषि को आराध्या से नज़र मिलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी।
वह चुपचाप आकर डाइनिंग टेबल पर बैठ गया।
बाहर का मौसम खराब होता जा रहा था। बड़ी माँ ने कहा,
"मौसम खराब हो रहा है, लगता है ज़ोरदार बारिश होगी।"
ऋषि: "मुझे भी यही लगता है। आप सब घर में ही रहिएगा, बाहर जाने की ज़रूरत नहीं है।"
ऋषि अपना नाश्ता खत्म करके वहाँ से ऑफिस के लिए निकल गया।
आराध्या ने ऋषि को एक बार भी नज़र नहीं उठाई; कल रात से उसका मन बहुत दुखी था। और यह बात बड़ी माँ ने नोटिस कर ली।
बड़ी माँ ने आराध्या से कहा, "आराध्या, मुझे कुछ काम है, तो थोड़ी देर के लिए मेरे कमरे में आओगी।"
आराध्या ने हाँ में सिर हिलाया।
थोड़ी देर बाद आराध्या बड़ी माँ के कमरे में थी।
बड़ी माँ का कमरा ज़्यादा सजा-धजा नहीं था, क्योंकि उन्हें सादगी पसंद थी। पर फिर भी उस कमरे का इंटीरियर बहुत खूबसूरत था। बड़ी माँ ने धीरे से आराध्या को अपने पास बुलाया। आराध्या उनके सामने बेड पर बैठ गई।
बड़ी माँ: "क्या बात है? सुबह से देख रही हूँ, तुम्हारा चेहरा उतरा हुआ है। कल रात तुम्हारे और ऋषि के बीच कोई बात हुई? उसने तुमसे कुछ कहा? अगर उसने तुमसे कुछ गलत कहा है, तो मुझे बताओ, मैं अभी उसकी क्लास लेती हूँ।"
आराध्या ने अपना सिर हिलाया।
बड़ी माँ ने आराध्या का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा, "आराध्या, मैं समझ सकती हूँ, इस समय तुम दोनों का रिश्ता एक अनचाहे बंधन में बना हुआ है। पर बेटा, कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो ऊपर से बनकर आते हैं। ऐसा ही रिश्ता तुम्हारा और ऋषि का नज़र आ रहा है। न तुम उसे जानती थीं, न वह तुम्हें जानता था… फिर भी आज तुम दोनों इस रिश्ते में जुड़े हुए हो। मुझे नहीं पता ऋषि के दिमाग में क्या चल रहा है। मैं बस इतना जानती हूँ… तुम मेरे ऋषि की ज़िंदगी में एक आशा की किरण बनकर आई हो। और मैं चाहती हूँ कि तुम मेरे ऋषि की बेरंग ज़िंदगी में अपने प्यार के रंग भर दो। आराध्या, क्या तुम मेरे कहने पर अपने इस रिश्ते को एक मौका नहीं दोगी?"
बड़ी माँ की बातें सुनकर आराध्या असमंजस में फंस गई। कल रात ही ऋषि ने उससे कहा था कि वह जल्द ही उसे अपनी ज़िंदगी से और घर से बाहर कर देगा, और आज बड़ी माँ उससे ऋषि की ज़िंदगी का हिस्सा बनने की बात कर रही थीं।
आराध्या को सोचते देख बड़ी माँ ने कहा, "क्या बात है आराध्या? क्या सोच रही हो? मैं तुम पर कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं कर रही हूँ। अगर तुम्हारी मर्ज़ी नहीं है, तो कोई बात नहीं।"
आराध्या ने बड़ी माँ के हाथ पर अपना हाथ रख दिया और प्यार से मुस्कुरा दी।
बड़ी माँ ने भी आराध्या को प्यार से गले लगा लिया।
बाहर मौसम खराब हो गया; ज़ोरदार हवाएँ चलने लगीं और देखते-देखते एकाएक बारिश शुरू हो गई। इतनी ज़ोरदार बारिश में न जाने कहाँ शॉर्ट सर्किट हो गया और पूरे मेंशन की बिजली चली गई।
बड़ी माँ, निमो और आराध्या तीनों लिविंग रूम में बैठे लाइट आने का इंतज़ार कर रहे थे। इस वक्त सिर्फ़ मेंशन में इमरजेंसी लाइट जल रही थी।
तभी एक गार्ड भागता हुआ बड़ी माँ के पास आया और घबराई हुई आवाज़ में कहा, "बड़ी मालकिन! शॉर्ट सर्किट की वजह से आउटहाउस में आग लग गई है।"
बड़ी माँ और निमो यह सुनकर एक पल के लिए सन्न रह गए। वे भागते हुए आउटहाउस की तरफ़ गए, तो देखा कि आउटहाउस लगभग आग की चपेट में आ चुका था।
बड़ी माँ ज़ोर-ज़ोर से घबराकर कहती हैं, "अरे कोई बचाओ! मेरी बच्ची अंदर है!" गार्ड्स और निमो बड़ी माँ को कस के पकड़े हुए थे ताकि वह अंदर न जा पाएँ। आराध्या यह सब देखकर बहुत घबरा गई।
ऋषि का ऑफिस… खराब मौसम की वजह से ऋषि ने अपने ऑफिस में सबको छुट्टी दे दी थी, बस ज़रूरी लोग ही आए हुए थे। ऋषि अपने केबिन में बैठे काम कर रहा था। तभी उसका फ़ोन रिंग हुआ।
ऋषि ने फ़ोन देखा तो पाया कि घर से फ़ोन है। ऋषि ने फ़ोन उठाया और "हेलो" कहा। सामने से एक गार्ड ने कहा, "साहब, आउटहाउस में आग लग गई है।"
ऋषि यह सुनते ही एक पल के लिए जैसे साँस ही रुक गई।
ऋषि: "व्हाट? कैसे?"
गार्ड: "साहब, मौसम खराब होने की वजह से शॉर्ट सर्किट हो गया था।"
ऋषि: "जल्दी से फायर ब्रिगेड को कॉल करो और एम्बुलेंस को भी। मैं आ रहा हूँ।"
ऋषि जल्दबाजी में ऑफिस से घर के लिए निकल गया। उसे भागते हुए देख सूरज परेशान हो गया और वह भी उसके साथ चला गया।
फ़ुल स्पीड में गाड़ी चलाकर वह जल्द से जल्द घर पहुँचा। वहाँ जाकर उसने देखा कि आउटहाउस में आग पर काबू पा लिया गया था।
फिर भी आउटहाउस की हालत देखकर वह घबरा गया। तभी निमो वहाँ आकर बोली, "छोटे साहब, सब अंदर हैं।" ऋषि सीधे मेंशन की तरफ़ भागा।
ऋषि अंदर पहुँचकर बिना किसी की तरफ़ देखे सीधे बड़ी माँ के कमरे में गया। वहाँ उसने देखा कि बड़ी माँ बेहोश पड़ी हैं और एक डॉक्टर उन्हें चेक कर रहे हैं। ऋषि ने डॉक्टर से पूछा,
ऋषि: "बड़ी माँ कैसी हैं?"
डॉक्टर: "Mr. नंदा फ़िलहाल ठीक हैं। हादसे की वजह से ज़्यादा घबरा गई थीं, इसलिए बेहोश हो गईं। डोंट वरी, मैंने इन्जेक्शन दे दिया है। मॉर्निंग तक रेस्ट करने दीजिये। कल सुबह तक एकदम ठीक हो जाएँगी।"
डॉक्टर की बात सुनकर ऋषि को थोड़ी राहत मिली। फिर वह निमो की तरफ़ देखा और कहा, "वह कहाँ है?"
निमो: "ऊपर वाले कमरे में।"
ऋषि सीधे ऊपर गया और देखा कि एक कमरे में दो डॉक्टर और कुछ नर्स एक बेड को घेरे खड़े हैं। ऋषि ने देखा कि उस बेड पर आराध्या बेहोश पड़ी है। ऋषि उसके पास जाकर उसका एक हाथ अपने हाथ में लेकर कहा,
ऋषि: "मैं बता नहीं सकता तुम्हें ठीक देखकर मुझे कितनी राहत मिली है। अगर तुम्हें कुछ हो जाता, तो मैं क्या करता, मुझे खुद नहीं पता।"
ऋषि ने अपने हाथ से उसके चेहरे पर आ रहे बालों को ठीक किया और डॉक्टर से पूछा,
ऋषि: "अब कैसी है यह?"
डॉक्टर: "डोंट वरी सर, थोड़ी चोट आई थी, बट अब यह ठीक है।"
ऋषि डॉक्टर की बात सुनकर राहत की साँस ली, फिर भी वह इन सब की वजह जानना चाहता था। वह गुस्से में कमरे से बाहर आया और गुस्से में बोला, "गार्ड!"
एक गार्ड भागता हुआ आया और ऋषि के सामने खड़ा हो गया।
ऋषि (गुस्से में): "कैसे हुआ यह?"
गार्ड: "सर, शॉर्ट सर्किट की वजह से आग लग गई, तभी आराध्या मैम…"
आराध्या का नाम सुनकर ऋषि का गुस्सा और बढ़ गया। वह बिना कुछ सुने वहाँ से चला गया।
ऋषि हॉल में आया और देखा कि आराध्या अपने घायल हाथ पर बर्फ लगाने की कोशिश कर रही है। ऋषि सीधे उसके पास आया और बिना कुछ सोचे-समझे आराध्या को बाजू से पकड़कर खड़ा कर दिया। आराध्या इससे पहले कुछ समझ पाती, ऋषि ने उसे एक तमाचा मार दिया।
आराध्या फिर से सोफ़े पर गिर गई। ऋषि गुस्से में आराध्या से बोला,
ऋषि (गुस्से में): "कहा था मैंने कि आउटहाउस से दूर रहना, कहा था कि बड़ी माँ या किसी और से रिश्ते बनाने की कोशिश मत करना। लगता है तुम्हें मेरी बात समझ नहीं आई। कोई नहीं, मैं तुम्हें अपने तरीके से समझाऊँगा…"
ऋषि ने आराध्या को फिर से बाजू से पकड़कर उठाया।
आराध्या के चेहरे पर ऋषि के थप्पड़ के निशान थे और उसका चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था।
ऋषि एकदम गुस्से में कसकर उसके बाजू को पकड़े हुए बोला,
ऋषि: "तुम्हें मेरी बात ठीक से समझ नहीं आई थी, तो मैं तुम्हें आज साफ़-साफ़ बता देता हूँ… तुम्हारा मुझसे या मेरे परिवार से कोई रिश्ता नहीं है… मैंने तुमसे जो शादी की, उसके कोई मायने नहीं हैं। तुम्हारा मेरी ज़िंदगी में कोई वजूद नहीं है… तो दूर रहो मुझसे और मेरे परिवार से… चली जाओ यहाँ से…"
ऋषि ने आराध्या को जोर से धक्का दिया जिससे आराध्या ज़मीन पर गिर गई। ऋषि बिना उसकी तरफ़ देखे चला गया।
ऋषि की बातों से आराध्या पूरी तरह से टूट चुकी थी। इस वक्त उसे ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उसके शरीर से जान निकाल ली हो। आराध्या के कानों में इस समय ऋषि के आखिरी शब्द गूंज रहे थे ("चली जाओ यहाँ से…")
आराध्या उठी और दरवाज़े की ओर बढ़ गई।
ऋषि पूरी रात बड़ी माँ के कमरे में रहा। निमो भी वहीं थी। निमो कुर्सी पर अपने सिर को हाथ से टिकाए सो रही थी।
ऋषि बड़ी माँ के बगल में बैठा, उनके हाथ को अपने माथे से लगाए, वहीं बैठे-बैठे सो गया था।
सुबह करीब 7:00 बजे बड़ी माँ नींद से जागीं। उनके नींद से जागते ही हलचल होने लगी जिससे ऋषि की आँख खुल गई।
बड़ी माँ उठने के साथ ही बैठने की कोशिश करने लगीं, जिस पर ऋषि ने उनकी मदद की। अब तक निमो की भी आँख खुल चुकी थी। वह भी बड़ी माँ के बगल में आकर खड़ी हो गई।
"बड़ी माँ, अब आपको कैसा लग रहा है?" ऋषि ने पूछा।
"मैं तो बिल्कुल ठीक हूँ। प्रियंका कैसी है?" बड़ी माँ ने घबराते हुए कहा।
"बड़ी माँ, परेशान मत होइए, प्रियंका बिल्कुल ठीक है। डॉक्टर और नर्स उसके पास हैं।" ऋषि ने आश्वस्त किया।
बड़ी माँ उठकर जाने लगीं तो ऋषि ने उन्हें रोकते हुए कहा,
"बड़ी माँ, आपकी तबीयत ठीक नहीं है, आप आराम कीजिए।"
पर बड़ी माँ ऋषि की एक नहीं सुनतीं और सीधे प्रियंका के कमरे में चली जाती हैं। वहाँ प्रियंका को सही-सलामत देख उनकी जान में जान आ जाती है। बड़ी माँ प्रियंका के कमरे से निकलकर सीधे आराध्या के कमरे की तरफ जाने लगीं तो ऋषि उन्हें बीच में रोकता है।
"बड़ी माँ, अपने कमरे में चलिए, आपकी तबीयत ठीक नहीं है।"
"मेरी तबीयत बिल्कुल ठीक है। मुझे इस समय आराध्या की टेंशन हो रही है। उसे कल बहुत बुरी तरह चोट लगी है। मुझे अभी उसे देखना है।"
"बड़ी माँ, आप इतनी टेंशन मत लीजिए, उसे कुछ भी नहीं हुआ है। आप बेकार में परेशान हो रही हैं।"
"मैं भी बेकार में परेशान हो रही हूँ? अरे, आज उसकी वजह से प्रियंका ठीक है! अगर वह नहीं होती तो प्रियंका आग में जल चुकी होती।"
"क्या... बड़ी माँ, ये आप क्या कह रही हैं? आराध्या की वजह से प्रियंका ठीक है? मतलब मैं कुछ समझा नहीं।" ऋषि हैरान हो गया।
"हाँ, कल जब आग लगी थी, तो मैं वो सब देखकर एकदम घबरा गई... और वो सारे गार्ड बाहर खड़े बस तमाशा देख रहे थे। आग धीरे-धीरे बढ़कर प्रियंका के कमरे की तरफ जाने लगी थी। मेरी तो हालत ही खराब हो गई थी। तभी....... "
फ्लैशबैक...
जब आराध्या ने देखा कि बड़ी माँ इतनी घबरा रही हैं, उसे समझने में देर नहीं लगी कि अंदर कोई है जिसके लिए बड़ी माँ इतनी परेशान हो रही हैं। आराध्या ने सारे गार्ड्स की ओर देखा और उन्हें अंदर जाकर मदद करने के लिए इशारा किया।
"मैडम, हमने फायर ब्रिगेड को फोन कर दिया है। आप देख सकती हैं ना कितनी बुरी तरह आग लगी है। बस थोड़ी देर में फायर ब्रिगेड आ जाएगी।" गार्ड ने कहा।
आराध्या को समझने में देर नहीं लगी कि गार्ड अंदर जाकर मदद नहीं करना चाहते हैं। आराध्या बड़ी माँ की हालत देख नहीं रही थी। उसने अपनी साड़ी का पल्लू अपनी कमर में खोस लिया... और पीछे की तरफ से एक खिड़की की मदद से अंदर चली गई। बड़ी माँ ने जब आराध्या को अंदर जाते देखा तो उनकी हालत और खराब हो गई। वो जोर-जोर से और मदद के लिए चिल्लाने लगीं।
आराध्या जब अंदर पहुँची तो देखा एक कमरा है जहाँ पर अभी आग नहीं पहुँची थी। पर कुछ ही देर में वह कमरा आग की चपेट में होगा अगर जल्दी कुछ ना किया गया तो। आराध्या सीधे उसी कमरे की तरफ गई। उसने देखा वहाँ पर एक नर्स जो बाहर निकलने की कोशिश कर रही थी। उसने नर्स को बाहर निकलने में मदद की।
"अंदर पेशेंट है।" नर्स ने कमरे से बाहर आते ही आराध्या से कहा।
आराध्या फिर से अंदर गई... देखा बेड पर एक लड़की, 22-23 साल की, लेटी हुई है। आराध्या ने गौर से देखा तो पाया यह वही लड़की है जिसकी तस्वीर उसने ऋषि के साथ उसके कमरे में देखी थी। आराध्या को नहीं पता था यह लड़की ऋषि की कौन लगती है।
आराध्या खड़ी प्रियंका को ही देख रही थी, इतने में नर्स की आवाज़ आई, "मैडम, प्लीज़ जल्दी कीजिए, आग बढ़ती जा रही है।"
आवाज़ सुनकर आराध्या जल्दी प्रियंका के पास आती है, वह प्रियंका को जल्दी से कंधे का सहारा देकर खड़ी करती है। आराध्या जैसे-तैसे प्रियंका को बाहर लेकर आती है। बाहर आते ही नर्स भी उसकी मदद करने लगती है।
आराध्या, नर्स और प्रियंका को लेकर उस खिड़की के पास पहुँचती है जहाँ से वह अंदर आई थी। सबसे पहले नर्स उस खिड़की से कूदकर बाहर निकलती है। बाहर आते ही कुछ गाड़ियाँ भी वहाँ पहुँचती हैं। आराध्या प्रियंका का एक हाथ नर्स के हाथ में देती है और उसके शरीर को सपोर्ट करते हुए, खिड़की के उस पार पहुँचाने की कोशिश करती है। इसमें नर्स और गार्ड उसकी मदद करते हैं।
जब बड़ी माँ देखती हैं कि प्रियंका बाहर आ गई है, पर उसके शरीर पर जगह-जगह थोड़ी बहुत चोट के निशान थे।
अब आराध्या जैसे ही खिड़की से कूदकर बाहर आने को उठती है, ऊपर से एक जलती हुई लकड़ी आकर उसके बाजू पर लग जाती है। आराध्या जल्दी से उठकर उस लकड़ी को फेंकती है और उठकर, खिड़की से बाहर खुद जाती है। ऐसे ही आराध्या बाहर आती है, बड़ी माँ उसका जला हुआ बाजू देखती हैं।
"जल्दी से डॉक्टर को फोन करो, इनकी हालत बहुत खराब है।" नर्स एकदम से प्रियंका को देखकर कहने लगती है।
जैसे ही बड़ी माँ यह सुनती हैं कि प्रियंका की हालत खराब है, उनके होश उड़ जाते हैं और घबराहट के मारे बेहोश हो जाती हैं।
फ्लैशबैक एंड...
ऋषि यह सब सुनकर इस समय किसी गहरे सदमे में था। उसे तो यकीन नहीं हो रहा था कि आराध्या ने यह सब किया। उसे अब याद आता है कि कल रात को उसने आराध्या के साथ कितना बुरा बर्ताव किया और उसे क्या-क्या नहीं सुनाया।
वह जल्दी से भागकर आराध्या के कमरे में जाता है। देखता है वह कमरे में नहीं है। फिर वह सीधे नीचे आता है। एक मेड घर की सफाई कर रही होती है। ऋषि उससे पूछता है, "आराध्या कहाँ है?"
"पता नहीं मालिक, हमने सुबह से उसे नहीं देखा है।" मेड ने उत्तर दिया।
अब ऋषि के हाथ-पैर ठंडे होने लगते हैं। ऋषि आराध्या को पूरे मेंशन में ढूँढता है, पर आराध्या उसे कहीं नहीं मिलती। अब ऋषि को अपने किए पर पछतावा हो रहा था। तभी उसके पास एक गार्ड आता है और ऋषि से कहता है:
"सर, कल रात मैंने मैडम को मेन गेट की तरफ जाते हुए देखा।"
गार्ड की बात सुनकर ऋषि का और दिमाग खराब हो जाता है। आराध्या रात को ही घर से चली गई थी। यह सोच-सोचकर ऋषि और पागल होता जा रहा था। उसे याद आता है उसका फ़ोन तो मेंशन में ही रह गया है। वह वापस जाता है और अपना फ़ोन लेकर जैसे ही बाहर आता है, उसे हॉल में बड़ी माँ मिल जाती हैं।
बड़ी माँ ऋषि को रोकती हैं और पूछती हैं, "क्या बात है? तुम इतने परेशान क्यों नज़र आ रहे हो?"
"बड़ी माँ, टेंशन मत लीजिए, आराध्या जल्दी मिल जाएगी।" ऋषि ने कहा।
"मिल जाएगी...? मिल जाएगी तो तुम्हारा क्या मतलब है? ऋषि, आराध्या कहाँ है?" बड़ी माँ चौंकते हुए बोलीं।
"बड़ी माँ, मैं उसे ढूँढ लूँगा, परेशान मत होइए।"
"परेशान ना हो कैसे? परेशान ना हो? मेरी बहू घर पर नहीं है और तुम मुझे कह रहे हो कि मैं परेशान ना होऊँ? कहाँ गई आराध्या? कल तो यहीं थी। ऐसा क्या हो गया एक रात में कि वह घर छोड़कर चली गई?"
ऋषि समझ गया था कि बड़ी माँ इस समय बहुत ही गुस्से में हैं। ऋषि ने बड़ी माँ से कहा: "बड़ी माँ, कल आपकी और प्रियंका की हालत को देखकर मुझे लगा इन सब की वजह शायद आराध्या है, और मैंने गुस्से में उसे कुछ ज़्यादा ही डाँट दिया।"
"सिर्फ़ डाँटा ही नहीं है बड़ी मालकिन, मैंने देखा था छोटे मालिक ने बहुरानी पर हाथ उठाया था और साथ उन्हें यहाँ से चले जाने के लिए भी कहा। मैंने देखा था, पर उस समय मालिक इतने गुस्से में थे कि मैं कुछ बोल ही नहीं पाई... और आपकी भी तबीयत ठीक नहीं थी।" निमो ने कहा।
बड़ी माँ ने जब यह सुना तो उनका गुस्सा ऋषि पर फूट पड़ा।
"यह मैं क्या सुन रही हूँ, ऋषि? तुमने बहू पर हाथ उठाया? घर जाने के लिए कहा?" बड़ी माँ ने गुस्से से कहा।
"बड़ी माँ, आप जानती हैं, आप और प्रियंका के आगे मुझे कोई नहीं दिखता। मैं इतने गुस्से में था कि मुझे कुछ समझ में नहीं आया, मैं क्या कर रहा हूँ। और इन्हीं सब में मेरा हाथ उठ गया... पर मैंने उसे घर से जाने के लिए नहीं कहा था। बस कुछ समय यहाँ से जाने के लिए कहा था... मतलब अपने रूम में जाए, मुझे नज़र ना आए। पर वह तो घर से ही चली गई।" ऋषि ने समझाया।
"घर से नहीं जाती तो क्या तुम्हारी आरती उतारती? तुमने बिना सोचे-समझे उस बेजुबान पर हाथ उठा दिया। अरे, इतना तो सोचा होता, वह लड़की बोल नहीं सकती है। जब से घर में आई है, तुम्हारा गुस्सा ही तो देखा है उसमें। मत भूलो ऋषि, वह नहीं आई थी तुमसे शादी करने के लिए। तुम गए थे दिल्ली से देहरादून उसे शादी करने के लिए। वजह चाहे जो भी हो, पर पूरे रीति-रिवाज से तुमने उसे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। और इस रिश्ते को ना तुम बदल सकते हो, ना विधाता। जब शादी कर रहे थे उससे, कभी नहीं सोचा था उसकी ज़िम्मेदारी होगी तुम पर। कौन सी ज़िम्मेदारी निभाई है तुमने उसके लिए? एक पत्नी होने का कौन सा हक़ दिया है तुमने? अरे, हक़ छोड़ो, तुमने तो उसे अपने कमरे में भी नहीं रहने दिया।" बड़ी माँ ने ऋषि को खरी-खोटी सुनाई।
ऋषि चुपचाप सर झुकाए बड़ी माँ की सारी बातें सुन रहा था।
"बड़ी माँ, आपको मुझे जितना भला-बुरा बोलना है, बोल लीजिएगा, पर प्लीज़ इस समय मुझे आराध्या को ढूँढने जाने दीजिए।" ऋषि ने विनती की।
बड़ी माँ खुद को थोड़ा शांत करते हुए कहती हैं: "उसके मायके फ़ोन करो, पता करो वहाँ आई है क्या?"
"बड़ी माँ, वह अनाथ है, उसका इस दुनिया में कोई भी नहीं है।"
बस यही सुनना बाकी था कि बड़ी माँ को जो गुस्सा शांत होने जा रहा था, वह फिर से भड़क गया।
तभी हॉल में एक जोर से थप्पड़ की गूंज आई, जो बड़ी माँ ने ऋषि को मारा था।
"मतलब तुम जानते थे कि आराध्या अनाथ है? वह बेजुबान लड़की जो बोल नहीं सकती, जिसका इस दुनिया में कोई भी नहीं है, उसके साथ ऐसा करते हुए तुम्हें जरा भी शर्म नहीं आई? ऐसे संस्कार नहीं दिए थे मैंने तुम्हें। आज तुमने आराध्या के साथ गलत करके मेरी परवरिश पर सवाल उठाया है।" बड़ी माँ ने गुस्से से कहा।
बड़ी माँ ऋषि की तरफ़ पीठ करके खड़ी हो जाती हैं और कहती हैं: "ऋषि नंदा! जब तक मेरी बहू इस घर में वापस नहीं आती, मुझे अपनी शक्ल मत दिखाना। और अगर आराध्या नहीं मिली और तुम खाली हाथ वापस आए, तो मैं इस घर को छोड़कर हमेशा के लिए चली जाऊँगी।"
इतना बोलकर बड़ी माँ प्रियंका के कमरे में चली जाती हैं।
बड़ी माँ की इतनी कड़वी बातें सुनने के बाद ऋषि जैसे हिल सा गया था। उसे तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि बड़ी माँ उससे कभी ऐसा भी कुछ कह सकती हैं। पर वह जानता था इस बार गलती उसी की है। और बड़ी माँ को मनाने का सिर्फ़ एक ही तरीका है कि वह आराध्या को जल्द से जल्द ढूँढकर लाए।
ऋषि सीधे मेंशन से बाहर आता है और अपनी गाड़ी में बैठते हुए सूरज को कॉल करता है।
"सूरज, कमिश्नर साहब से कांटेक्ट करो और उनसे कहो कि पूरे शहर में रेड अलर्ट जारी कर दें। मुझे आराध्या किसी भी कीमत पर चाहिए। और हाँ, हमारे जितने भी आदमी हैं, उन्हें एयरपोर्ट, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, हर जगह पर जाकर आराध्या को ढूँढने के लिए बोल दो।"
"जी सर।" सूरज ने उत्तर दिया।
ऋषि की गाड़ी उस समय दिल्ली की सड़कों पर बेलगाम घूम रही थी। ऋषि पागलों की तरह आराध्या को ढूँढ रहा था। जैसे-जैसे वक्त बीत रहा था, ऋषि की धड़कन और तेज होती जा रही थी। ऋषि का फ़ोन एक मिनट के लिए भी बंद नहीं हुआ; हर फ़ोन के बाद उसके पास दूसरा फ़ोन आ जाता था आराध्या की डिटेल्स के लिए। ऋषि और आराध्या की शादी की जो न्यूज़ पब्लिक हुई थी, ऋषि ने उसी न्यूज़ से आराध्या की फ़ोटो सबको दे दी थी ताकि आराध्या को ढूँढने में कोई प्रॉब्लम ना हो। दिल्ली एनसीआर के कई इलाकों में ड्रोन से नज़र रखी जा रही थी।
एयरपोर्ट, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन की सीसीटीवी फ़ुटेज चेक की जा रही थी। ऋषि ने जितना हो सका, इस न्यूज़ को मीडिया से छिपाने की कोशिश की क्योंकि ऋषि के बहुत से दुश्मन थे। अगर उन्हें पता चल जाता कि उसकी वाइफ़ इस समय लापता है, तो वो उसके लिए प्रॉब्लम खड़ी कर सकते थे।
इसीलिए ऋषि ने अपनी तरफ़ से आराध्या को ढूँढने की कोशिश की थी; वो इस समय मीडिया को इस बारे में नहीं पता लगने दे सकता था। ऋषि को आराध्या को ढूँढते हुए इस समय पूरे 4 घंटे हो चुके थे। ऋषि काफ़ी परेशान था, तभी ऋषि का फ़ोन एक बार फिर बजा।
इस वक़्त कोई भी कॉल अवॉइड नहीं कर सकता था, इसलिए उसने कॉल पिक कर ली। ये एक अननोन नंबर था।
"हेलो।"
"हेलो सर, मैं रोहिणी सेक्टर 9 से कॉन्स्टेबल अजय बोल रहा हूँ। मुझे कमिश्नर साहब ने एक तस्वीर दी थी और कहा था इस महिला को ढूँढना है।"
"हाँ, वो मेरी वाइफ़ है। क्या कुछ पता चला?"
"जी सर, इस समय आपकी वाइफ़ राम जानकी हनुमान मंदिर में है। मैं आपको लोकेशन सेंड करता हूँ।"
"मैं अभी वहाँ पहुँच रहा हूँ और जब तक मैं ना आऊँ, आप प्लीज़ उसका ध्यान रखिएगा और देखिए वो कहीं चली ना जाए। उसे वहीं रोककर रखना।"
"सर, मैं यहीं मंदिर के बाहर ही खड़ा हूँ। आप जल्दी आ जाइए, मैं यहीं हूँ, मैं मैडम को कहीं नहीं जाने दूँगा।"
ऋषि ने अपनी गाड़ी फ़ुल स्पीड में मंदिर की तरफ़ दौड़ा दी। उसने अपने फ़ोन से सूरज को कांटेक्ट किया कि वो भी जल्दी से अपने गार्ड्स को लेकर मंदिर पहुँच जाएँ। ऋषि की गाड़ियों का काफ़िला कुछ ही समय में मंदिर पहुँच गया। उन्होंने मंदिर को चारों तरफ़ से कवर कर दिया। 10 से 15 मिनट बाद ऋषि की गाड़ी मंदिर के सामने आकर रुक गई। ऋषि जल्दी से दौड़कर मंदिर के अंदर पहुँचा। जैसे ही उसने सीढ़ियों पर क़दम रखा, उसके सामने कॉन्स्टेबल आ गया।
"सर, सर, मैंने आपको फ़ोन किया था। मैडम उस तरफ़ है।"
ऋषि कॉन्स्टेबल की बताई दिशा की तरफ़ भागता है। जैसे ही वो मंदिर के प्रांगण में पहुँचा, वो देखता है मंदिर के एक तरफ़ बहुत सारे भिखारी लाइन लगाकर बैठे हुए हैं। वहाँ पर कुछ ऐसे लोग भी हैं जो कि बूढ़े-बुज़ुर्ग हैं और वो भी भीख माँग रहे हैं।
ऋषि अपनी नज़रें दौड़ाकर इधर-उधर देखता है। उसे भिखारियों से थोड़ी दूरी पर एक पेड़ से टेक लगाकर आराध्या बैठी हुई दिखती है।
आराध्या जब कल रात घर से निकली थी तो बारिश हो रही थी। उसी बारिश में उसके सारे कपड़े भीग गए थे और पैदल चलते-चलते उसके सारे कपड़ों में मिट्टी लग गई थी। रोने की वजह से उसका मासूम सा चेहरा सुर्ख पड़ गया था। उसकी आँखें लाल और सूजी हुई थीं। बाल बिखरे पड़े थे। आराध्या घर से बिना चप्पलों के ही निकली थी, तो उसके पैरों में भी कई जगह से कट गए थे और वहाँ से खून भी निकल रहा था जो कि अब सूख गए थे। उसके बाजू में जलने का घाव था जो कल प्रियंका को बचाने के चक्कर में उसे लगा था।
आराध्या जिस पेड़ के नीचे बेसुध सी बैठी थी, उसके सामने एक केले और दो सेब रखे थे। शायद किसी ने आराध्या को भिखारी समझकर दे दिए थे।
आराध्या को ऐसा देखकर एक पल के लिए तो ऋषि की दुनिया ही उजड़ गई थी। इस समय ऋषि की कंपनी के शेयर की कीमत 50 बिलियन डॉलर है। ऋषि की कंपनी में इन्वेस्ट करने के लिए बड़े-बड़े बिज़नेसमैन लाखों-करोड़ों में डील करते हैं। ऋषि की कंपनी का टर्नओवर ट्रिलियंस में आता है। नंदा ग्रुप ऑफ़ इंडस्ट्री में एक परसेंट की इक्विटी लेने के लिए लोग बिलियंस में इन्वेस्ट करते हैं।
और उसी ऋषि नंदा की वाइफ़ आज एक भिखारी की तरह मंदिर के सामने बैठी हुई थी।
ऋषि धीरे क़दमों से चलकर आराध्या के सामने आता है। ऋषि के क़दम जैसे उठ ही नहीं रहे थे। एक-एक क़दम इतना भारी था कि उसे खुद नहीं पता चला कि कब वो सामने आ गया। ऋषि की आँखों में इस समय पश्चाताप के आँसू थे। 🥺
ऋषि धीरे क़दमों से पेड़ के पास आता है। आराध्या अभी भी एकटक मंदिर की तरफ़ देख रही थी। उसने ध्यान ही नहीं दिया कि ऋषि उसके सामने आ गया है।
ऋषि आराध्या के सामने अपने घुटनों पर बैठ गया और अपने दोनों हाथों को जोड़ दिया।🙏
"मुझे माफ़ कर दो।🙏 प्लीज़ मुझे माफ़ कर दो। तुम जो चाहो मुझे सज़ा दो, पर प्लीज़ मुझे माफ़ कर दो।" 🥺😔
आराध्या ने जब ऋषि की आवाज़ सुनी, तब उसे ऋषि के होने का एहसास हुआ। उसने अब मंदिर से नज़र हटाकर सामने ऋषि को देखा। उसने आज से पहले ऋषि को जब भी देखा था, तो वो ड्रेस-अप रहता था; कपड़े एकदम सलीके से पहने हुए, बाल एकदम सेट और चेहरे पर अलग ही नूर रहता था। पर आज ऋषि के कपड़े पसीने से पूरी तरह से भीगे हुए थे, उसके पूरे बाल अस्त-व्यस्त थे, आँखें रो-रोकर सूज गई थीं और चेहरे पर पश्चाताप और अफ़सोस के भाव थे। आराध्या भी एक पल के लिए ऋषि को पहचान नहीं पाई थी।
जब आराध्या ने ऋषि को अपने घुटनों के बल बैठा हुआ और माफ़ी माँगते देखा, तो वो एकदम शॉक्ड हो गई। उसे नहीं लगा था कि ऋषि उसे ढूँढने आएगा, उसे तो लगा ऋषि ने उसे घर से और अपनी ज़िंदगी से निकाल दिया है। अब उसका इस दुनिया में कोई भी नहीं है, उसे ऐसे ही दर-दर की ठोकरें खानी पड़ेंगी।
कल रात जब आराध्या ऋषि के घर से निकली थी, उसे लगा कि शायद अब उसका इस दुनिया में अपना कहने वाला कोई भी नहीं है। ऋषि ने पहले ही कह दिया था कि शादी का उसकी ज़िंदगी में कोई मायने नहीं है। और जब उसने आराध्या को अपनी ज़िंदगी से और अपने घर से बाहर निकाल दिया, तो शायद वो उसे लेने कभी नहीं आएगा। आराध्या को तो ये भी नहीं पता था कि वो इस समय दिल्ली के किस इलाके में है। वो बस बेसुध सी चलती जा रही थी।
चलते-चलते उसे ये मंदिर दिखा। तो उसे बचपन में सिखाई एक बात याद आ गई: जिसका कोई नहीं होता, उसका भगवान होता है। और भगवान अपने बच्चे की हर मनोकामना पूरी करता है। बस यही सोचकर आराध्या उस मंदिर के सामने चबूतरे पर पेड़ के नीचे बैठ गई। और उसने आज पहली बार भगवान से अपने लिए मौत माँगी थी। इतनी बड़ी दुनिया में बेसहारा कैसे जीती? हर किसी ने तो उसे अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल किया है। पहले गौतम ने उसे अपनी प्रॉपर्टी के लिए शादी करना चाहा... और ऋषि ने उसे अपने मक़सद के लिए शादी की। रात ऋषि ने उसे अपने घर से भी निकाल दिया था...था ही कौन उसका जिसके लिए वो जीती।
आराध्या उस मंदिर में बैठे-बैठे उसे इतना भी होश नहीं रहा कि कब रात से सुबह हो गई। वो बस अपने आने वाली मौत का इंतज़ार कर रही थी। एकदम सामने राम-सीता की मूर्ति को देख रही थी। उसने जीने की सारी उम्मीद छोड़ दी थी।
पर शायद किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। ऐसे ही बैठे-बैठे उसके कानों में अचानक से ही ऋषि की आवाज़ आई:
"मुझे माफ़ कर दो, प्लीज़ मुझे माफ़ कर दो। तुम जो चाहो मुझे सज़ा दे सकती हो, पर मुझे माफ़ कर दो।"
आराध्या ने जब ऋषि को देखा तो एक पल के लिए चौंक गई। उसे एक पल के लिए भी यकीन नहीं हुआ कि ये ऋषि है। उसने सोचा भी नहीं था कि ऋषि उसे ढूँढेगा और उसे लेने यहाँ तक आ जाएगा। उसे समझ में ही नहीं आ रहा था कि वो इस समय किसी की बातों को कैसे समझे। वो बस ऋषि को देख रही थी और उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे।
ऋषि ने जब उसकी तरफ़ नज़रें उठाकर देखा, तो उसे आराध्या के चेहरे पर बेतहाशा सवाल नज़र आए। वो आगे बढ़ा और उसने अपने हाथ से आराध्या के आँसुओं को पोछा। ये पहली बार था जब ऋषि ने अपने हाथ से आराध्या के चेहरे को छुआ था।
ऋषि उसके बगल में बैठ गया। उसने आराध्या का एक हाथ अपने हाथ में लिया और पश्चाताप के साथ बोला:
"मैं मानता हूँ मैंने तुम्हारे साथ गलत किया है और मेरी गलती शायद माफ़ी के काबिल नहीं है। पर फिर भी तुमसे माफ़ी की उम्मीद करता हूँ। क्या तुम मुझे माफ़ कर सकती हो? 🥺"
आराध्या अभी भी एकटक ऋषि की आँखों में देख रही थी। चुपचाप बस उसे देख रही थी; वो उसके सवालों का कोई रिएक्शन नहीं दे रही थी। ऋषि को लगा शायद आराध्या ने उसे माफ़ नहीं किया। उसने इधर-उधर नज़र दौड़ाई। उसे मंदिर के प्रांगण में थोड़ी ही दूर पर एक 3 फ़ीट का त्रिशूल दिखा जो ज़मीन में गाड़ा हुआ था।
ऋषि बिना कुछ सोचे-समझे वहाँ तक गया और उसने अपना एक हाथ त्रिशूल में गाड़ दिया। उसके हाथ से खून निकलने लगा। आराध्या ये देखकर बहुत घबरा गई। वो भागकर ऋषि के पास आई और उसने उसका हाथ त्रिशूल से हटाया। उसने देखा ऋषि के हाथ से खून निकल रहा है। जल्दी से उसने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ा और ऋषि के हाथ पर बाँध दिया।
"ये क्या किया आपने?"
"इसी हाथ से मैंने तुम पर हाथ उठाया था ना। इतनी सज़ा तो मिलनी ही चाहिए थी मुझे। क्या अब तो मुझे माफ़ करोगी?" 🥺
आराध्या ने अपने हाथों से कुछ इशारा किया। वो कहना चाहती थी कि ऋषि ने कल रात उसे घर से बाहर निकाल दिया है। ऋषि को उसके सारे इशारे समझ तो नहीं आ रहे थे, लेकिन इतना मालूम पड़ गया था कि वो घर से बाहर निकलने की बात कर रही है।
"मैंने तुम्हें घर से जाने के लिए नहीं कहा था। मैंने बस उस समय तुम्हें वहाँ से जाने के लिए कहा था। तुम बिना सोचे-समझे घर छोड़कर आ गई। प्लीज़ आराध्या, घर चलो। बड़ी मां तुम्हें बहुत याद कर रही हैं। किसी और के लिए ना सही, उनके लिए घर चलो। तुम्हें मुझसे शिकायतें हैं ना, पर बड़ी मां ने तो तुम्हें हमेशा अपनी बेटी की तरह ही समझा है।"
आराध्या फिर अपने हाथों से कुछ इशारा करती है। वो पूछना चाह रही थी कि बड़ी मां से तो उसका रिश्ता मां-बेटी का बन गया है, पर आप किस रिश्ते से उसे वहाँ ले जा रहे हैं?
"मुझे समझ नहीं आ रहा तुम क्या कह रही हो।"
आराध्या ने इधर-उधर देखा। उसे सामने राम-सीता की मूर्ति नज़र आई और वो ऋषि का हाथ पकड़कर राम-सीता की मूर्ति के पास ले गई।
"ये दोनों कौन हैं?"
"राम-सीता।"
फिर उसने अपनी एक उंगली ऋषि की तरफ़ रखी और फिर अपनी तरफ़ की ओर रखकर पूछा कि हम दोनों कौन हैं? ऋषि को अब समझ में आ गया था कि वो अपने और उसके रिश्ते का वजूद माँग रही है। ऋषि ने देखा कि वहाँ की पूजा की थाली में सिंदूर पड़ा है। रात भीगने की वजह से आराध्या की माँग का सारा सिंदूर धुल गया था और उसकी माँग इस समय पूरी सूनी हो रखी थी।
ऋषि ने उस थाली से सिंदूर उठाया और आराध्या की माँग में भर दिया।
"आराध्या, तुम ऋषि नंदा की हो। मेरी पत्नी हो। पहले मैंने तुमसे शादी मकसद से की थी, पर आज अपने मन से, भगवान को साक्षी रखते हुए, मैं तुम्हें अपनी पत्नी स्वीकार करता हूँ। और आज भगवान के सामने ये वचन देता हूँ कि मैं शादी में हमेशा तुम्हारे साथ ईमानदार रहूँगा और तुम्हें हर वो सम्मान मिलेगा जिसका मेरी पत्नी को हक़ है।"
ऋषि अपना एक हाथ आगे बढ़ाता है और आराध्या से पूछता है:
"आराध्या, क्या तुम मेरा हाथ थामकर सारी ज़िंदगी मेरे साथ चलने के लिए तैयार हो?"
ऋषि का हाथ आराध्या के सामने था। आराध्या भी ऋषि को देख रही थी, कभी-कभी उसके हाथ को। आराध्या को यकीन ही नहीं हो रहा था कि ऋषि ने अभी-अभी क्या किया है। इस समय उसे ऋषि की आँखों में सिर्फ़ सच्चाई नज़र आ रही थी; ना कोई छल, ना कोई धोखा। आराध्या ने एक बार राम-सीता की मूर्ति की तरफ़ देखा और इसे भगवान का फ़ैसला मानकर ऋषि के हाथ पर अपना हाथ रख दिया।
आराध्या ने मन में कहा, "भगवान जी, कहीं पढ़ा था कि हर किसी को अपनी गलती सुधारने का एक मौका मिलना चाहिए... इनको भी अपनी गलती का एहसास है। इसीलिए आप पर भरोसा करके मैं इनको ये मौका दे रही हूँ।"
ऋषि ने जब ये देखा कि आराध्या ने उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया है, तो ऐसा लगा जैसे उसके मन से कोई भारी बोझ उतर गया है। उसने कसकर आराध्या का हाथ थामा और एक छोटी सी मुस्कान के साथ कहा:
"घर चलें।"
आराध्या ने भी अपना सिर हाँ में हिलाया।
आराध्या जैसे ही अपना एक क़दम आगे बढ़ाई, ऋषि ने उसे रोक लिया। आराध्या ने ऋषि को सवालिया नज़रों से देखा। ऋषि झुककर आराध्या को अपनी बाहों में उठा लिया। आराध्या का हाथ ऋषि के गले के चारों ओर लिपटा हुआ था। ऋषि आराध्या को लेकर जैसे ही मंदिर से बाहर आया, सूरज उन्हें देखकर एकदम दंग रह गया। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि ऋषि ऐसा भी कुछ कर सकता है।
ऋषि आराध्या को लेकर गाड़ी के पास आया तो एक गार्ड ने जल्दी से गाड़ी का दरवाज़ा खोला। ऋषि ने धीरे से आराध्या को गाड़ी में बिठाया और खुद बगल में जाकर बैठ गया। क्योंकि ऋषि के हाथ में चोट लगी थी, इसलिए वह ड्राइव नहीं कर सकता था। उसने ड्राइवर से कहा कि वह मेंशन की तरफ़ गाड़ी ले चले।
पूरे रास्ते ऋषि ने आराध्या का हाथ नहीं छोड़ा था। एक घंटे के बाद गाड़ियों का काफ़िला मेंशन पहुँचा।
एक गार्ड जल्दी से आगे आकर गाड़ी का दरवाज़ा खोला। ऋषि गाड़ी से बाहर निकला और वैसे ही आराध्या को अपनी गोद में उठा लिया। आराध्या को लेकर जैसे ही वह मेंशन के अंदर हॉल में आया, बड़ी मां और निमो हॉल में ही थीं। वे दोनों ऋषि और आराध्या को ऐसे देखकर चौंक गईं। बड़ी मां आराध्या की हालत देखकर और परेशान हो गई।
वह जल्दी से आराध्या के पास आई:
"आरू, ये क्या हो गया तुम्हें? तुम ठीक तो हो ना?"
आराध्या ने एक मुस्कान के साथ अपना सिर हाँ में हिलाया।
"बड़ी मां, आराध्या बिल्कुल ठीक है। आराध्या के कंधे पर और पैरों में चोट आई है और कल रात बारिश में भीगने की वजह से उसे फ़ीवर भी है... निमो आंटी, प्रियंका के रूम में जो नर्स है, उसे मेरे रूम में भेज दो।"
यह बोलकर आराध्या को लेकर वह सीधे अपने रूम की तरफ़ चला गया।
ऋषि अपने रूम में आराध्या को लेकर आया। आराध्या को प्यार से बेड पर लिटाया। इतने में ही रूम में बड़ी मां, निमो और एक नर्स आ गईं। नर्स ने आराध्या की ड्रेसिंग की, उसे इंजेक्शन दिया। नर्स ने ऋषि के हाथ की भी ड्रेसिंग की। इंजेक्शन की वजह से आराध्या को जल्दी नींद आ गई।
ऋषि ने निमो से कहा: "आंटी, आप आराध्या के रूम से उसके कपड़े ले आइए। वह कल रात से इन कपड़ों में है। इसके कपड़े बदल दीजिए।"
बड़ी मां प्यार से आराध्या के सर पर हाथ फेर रही थीं। ऋषि अपने रूम से निकलकर सीधे प्रियंका के रूम में गया। वहाँ लगे सोफ़े पर बैठ गया और डॉक्टर उसे प्रियंका की रिपोर्ट बता रहे थे। तभी रूम का दरवाज़ा खुला और बड़ी मां रूम में आई।
वह सबको बाहर जाने का इशारा करती हैं। सब के बाहर जाते ही बड़ी मां ऋषि के बगल में बैठती है और उससे पूछती है:
"कहाँ मिली आराध्या तुम्हें?"
"मंदिर में।"
"तो क्या सोचा है आगे तुमने?"
"किस बारे में?"
"आराध्या के बारे में। क्या सोचा है तुमने?"
"अब क्या कहना चाहती हैं बड़ी मां? मुझे समझ में नहीं आ रहा।"
"घर से निकलकर मंदिर में जाकर बैठ गई। पता है क्यों? क्योंकि उसका कोई घर नहीं है। दुनिया में उसका कोई भी नहीं है। बेजुबान, बेसहारा लड़की पूरी दुनिया में अकेली है।"
ऋषि ने बड़ी मां की बात बीच में काटते हुए कहा:
"वो बेसहारा नहीं है। मैं हूँ उसके साथ।"
"तुम तो अपना मक़सद पूरा करके उसे फिर से अपनी ज़िंदगी से बाहर निकाल दोगे।"
"पहले मैंने उससे शादी मक़सद से की थी, पर आज मैंने भगवान को साक्षी मानकर उसका हाथ थामा है। आज मैंने उसकी माँग में सिंदूर किसी मजबूरी से नहीं, इस रिश्ते को निभाने के लिए भरा है। मैं नहीं जानता कि मैं कभी आराध्या से प्यार कर पाऊँगा या नहीं, पर आराध्या को वो पूरा सम्मान मिलेगा जो मेरी पत्नी को मिलना चाहिए। आज इस रिश्ते में कोई मजबूरी नहीं है, एक-दूसरे के लिए सम्मान है। पर मैं पूरी कोशिश करूँगा कि आराध्या को खुश रख सकूँ।"
बड़ी मां ऋषि के मुँह से ये सब सुनकर बहुत खुश हुई। मन में यही सोच रही थी कि चलो शुक्र है, ऋषि ने अपने रिश्ते की शुरुआत तो की, कम से कम उसने आराध्या की तरफ़ अपना पहला क़दम तो बढ़ाया। बड़ी मां उसके सर पर प्यार से हाथ रखती है और वहाँ से उठकर जाने को होती है, तो ऋषि उनका हाथ पकड़ता है और उनकी तरफ़ देखकर कहता है:
"बड़ी मां, आपने मुझे माफ़ कर दिया ना?"
"मैंने तो तुम्हें उसी समय माफ़ कर दिया था जब तुमने आराध्या को अपनाया था। अब तो मैं बस यही चाहूँगी कि तुम और आराध्या अपने रिश्ते की एक नई शुरुआत करो।"
इस बात पर बड़ी मां की तरफ़ देखकर ऋषि मुस्कुरा दिया। 😊
रात का वक़्त, ऋषि जब अपने कमरे में आया तो देखा कि आराध्या अभी तक सो रही है। ऋषि आराध्या के पास गया, उसके सर पर हाथ रखकर उसका फ़ीवर चेक कर रहा था। आराध्या का फ़ीवर पूरी तरह से उतर चुका था। यह देखकर उसे थोड़ी राहत मिली। उसने उसे ब्लैंकेट से अच्छे से कवर किया और रूम की लाइट्स ऑफ़ करके बाहर आ गया।
नीचे डाइनिंग टेबल पर बड़ी मां ऋषि का वेट कर रही थी। ऋषि आकर डाइनिंग टेबल पर बैठता है।
"आरू कहाँ है?"
"वो उठी नहीं अभी तक। उसका खाना रूम में भेजवा देना। जब उठेगी तो मैं खिला दूँगा।"
बड़ी मां हल्का सा मुस्कुराती है। उन्हें यह जानकर काफ़ी खुशी मिलती है कि ऋषि आराध्या के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियाँ समझ रहा है।
ऋषि डिनर करके अपने रूम में गया। उसने आराध्या का डिनर रूम में ही मँगवा लिया था। रूम की लाइट ऑन की और सोफ़े पर बैठकर लैपटॉप पर अपना काम करने लगा।
रात के करीब 10:00 बजे आराध्या की नींद खुली। वह अपनी आँखें खोलती है और सामने देखती है। सामने सोफ़े पर ऋषि लैपटॉप पर बैठकर अपना काम कर रहा है। आराध्या पहले ऋषि को देखती है, फिर इधर-उधर नज़र दौड़ाती है। उसे पता चलता है कि यह उसका कमरा नहीं है। थोड़ा ध्यान से देखने पर उसे अंदाज़ा हो जाता है कि वह इस समय ऋषि के कमरे में है। 😳 यह अंदाज़ा होते ही वह एकदम से चौंक जाती है।
ऋषि तो कभी उसे अपने कमरे के आसपास भटकने भी नहीं देता था और आज वह उसके कमरे में, उसके बेड पर सो रही है। उसे तो यकीन ही नहीं हो रहा था। उसे लगा शायद वह कोई सपना देख रही है। आराध्या अपने एक हाथ से धीरे से अपने दूसरे हाथ की चुटकी काटती है। तब उसे यकीन होता है कि वह ऋषि के कमरे में है। वह चुपके से बैठ उठती है और धीरे क़दमों से उठकर अपने कमरे की तरफ़ जाने के लिए बढ़ती है।
आराध्या दबे पाव जैसे ही दरवाज़े के पास पहुँची, पीछे से ऋषि की आवाज़ आई:
"कहाँ जा रही हो?"
आराध्या घबराकर पलटती है। 🥺 वह कुछ नहीं कहती और चुपचाप ही खड़ी रहती है। ऋषि आराध्या के पास आता है और उसका हाथ पकड़कर उसे सोफ़े पर बिठा देता है। ऋषि आराध्या से कहता है:
"तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है, ज़्यादा इधर-उधर चलने की ज़रूरत नहीं। चुपचाप आराम करो। कुछ चाहिए तो मुझे बताओ।"
आराध्या अपना सिर ना में हिलाती है। ऋषि ने खाने की प्लेट आराध्या के आगे रखी।
"खाना खाओ, फिर तुम्हें दवा भी लेनी है।"
आराध्या पहले खाने की तरफ़ देखती है, फिर अचंभे में ऋषि की तरफ़ देखती है।
ऋषि जब देखता है कि आराध्या बस उसे देख रही है, तो वह पूछता है:
"क्या हुआ? खाना क्यों नहीं खा रही हो? तुम क्या चाहती हो? मैं अपने हाथ से खाना खिलाऊँ?"
आराध्या घबराहट के मारे अपना सिर ना में हिलाती है।
"तो खाना खा लो।"
आराध्या चुपचाप खाने की प्लेट उठाती है और खाना खाने लगती है और ऋषि अपने लैपटॉप पर काम करने लगता है।
थोड़ी देर बाद जब आराध्या का खाना ख़त्म हो जाता है तो ऋषि उसे दवा पकड़ाता है। आराध्या दवा खाती है। आराध्या ऋषि को चुरा-चुराकर देखती है; वह अभी भी लैपटॉप पर अपना काम कर रहा होता है।
आराध्या चुपचाप उठकर दरवाज़े की तरफ़ जाती है, पर जैसे ही वह एक क़दम आगे बढ़ती है, फिर से ऋषि की आवाज़ आती है:
"अब कहाँ जा रही हो?"
आराध्या पलटती है और ऋषि की तरफ़ देखती है। आराध्या ऋषि को इशारों में बताती है कि वह अपने कमरे में जा रही है।
ऋषि 🤔 (जिसे कुछ समझ में नहीं आया कि आराध्या ने इशारों में क्या बताया)
"यार, एक तो तुमसे बात करते समय दमसराज खेलना पड़ता है। डोंट वरी, मैं जल्दी इसका कोई तरीका ढूँढ लूँगा जिससे मैं तुम्हारी बात समझ सकूँ। फ़िलहाल मुझे कुछ समझ नहीं आया तुमने क्या कहा।"
आराध्या फिर अपनी एक उंगली से पूरे कमरे की तरफ़ इशारा करती है, फिर अपनी तरफ़ इशारा करती है और फिर वह बाहर के दरवाज़े की तरफ़ देखती है। ऋषि को कुछ-कुछ समझ में आता है कि वह कमरे की बात कर रही है...
"तुम कमरे की बात कर रही हो?"
आराध्या अपना सिर हाँ में हिलाती है।
"तुम ये कहना चाहती हो कि ये तुम्हारा कमरा नहीं है और तुम्हें अपने कमरे में जाना है?"
आराध्या अपना सिर हाँ में हिलाती है। ऋषि एक गहरी साँस लेता है और सोफ़े से उठकर आराध्या के सामने आकर खड़ा हो जाता है।
"देखो, अगर तुम जाना चाहती हो तो मैं तुम्हें रोकूँगा नहीं, पर तुम चाहो तो यहाँ रह सकती हो... मेरा मतलब है इस कमरे में रह सकती हो, मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है। मतलब मेरा कमरा काफ़ी बड़ा है, लेकिन मैं तुम्हें फ़ोर्स नहीं करूँगा। मर्ज़ी तुम्हारी है, तुम जहाँ मर्ज़ी वहाँ रह सकती हो।"
आराध्या ऋषि को ऐसे देख रही होती है जैसे वह दुनिया का आठवाँ अजूबा देख रही हो। 🙄😐 आराध्या अपना सिर गोल-गोल घुमाती है। बेचारे ऋषि को समझ में ही नहीं आया उसने हाँ कहा या ना कहा।
आराध्या ऋषि के रूम से बाहर चली गई। ऋषि को लगा आराध्या ने ना कहा, वह उसके साथ एक कमरे में नहीं रहना चाहती। ऋषि दोबारा सोफ़े पर बैठ गया और लैपटॉप पर अपना काम करने लगा, पर रह-रहकर उसका ध्यान आराध्या की तरफ़ जा रहा था। बेचारे ऋषि ने आराध्या की तरफ़ अपने रिश्ते को सुधारने की पहल की, तो आराध्या ने अपने क़दम पीछे ले लिए। यही सोचकर उसे और अफ़सोस हो रहा था। ऋषि यह सोच ही रहा था कि तभी उसके रूम का दरवाज़ा खुला।
ऋषि ने नज़रें उठाकर देखा तो रूम के दरवाज़े पर आराध्या खड़ी थी। उसके हाथ में कुछ कपड़े थे। आराध्या उन कपड़ों को लेकर ऋषि के सामने आ गई और उससे इशारों में पूछने लगी, "इसे कहाँ रखूँ?"
आराध्या अपने कपड़े लेकर ऋषि के सामने खड़ी थी। उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसे देखा जा रहा हो।
आराध्या ने फिर ऋषि से पूछा, "मैं अपने कपड़े कहाँ रखूँगी?"
तभी ऋषि का ध्यान टूटा और उसने अलमारी की तरफ इशारा किया।
"वहाँ, उस तरफ," ऋषि ने कहा।
आराध्या अलमारी की तरफ चली गई। जैसे ही उसने अलमारी खोली, उसमें पूरी जगह ऋषि के ही कपड़े थे। उसके कपड़े के लिए जगह नहीं थी। आराध्या ने नज़रें घुमाकर ऋषि को देखा। ऋषि ने पहले आराध्या को देखा, फिर अपनी अलमारी की तरफ देखा तो सच में उसकी अलमारी में एक प्रतिशत भी जगह नहीं थी जहाँ आराध्या अपने कपड़े रख सकें।
"जगह बना देता हूँ," ऋषि ने कहा।
ऋषि ने वहाँ से अपने कुछ कपड़े उठाए और उन्हें ले जाकर क्लासेट में रख दिया। आराध्या ने वहाँ पर अपने कपड़े रख दिए।
रात काफी हो गई थी। ऋषि ने आराध्या से कहा,
"रात काफी हो गई है, तुम सो जाओ।"
आराध्या बेड की तरफ गई। ऋषि का किंग साइज़ बेड था। आराध्या एक कोने में जाकर ब्लैंकेट ओढ़कर सो गई।
ऋषि सोफ़े पर बैठा लैपटॉप पर अपना काम कर रहा था। रात के करीब 2:00 बजे उसका काम खत्म हुआ। जब वह सोने के लिए अपने बेड पर गया, तो देखा आराध्या पहले से वहाँ पर एक छोटे से बच्चे की तरह सो रही थी। आराध्या सोते हुए बहुत क्यूट लग रही थी। ऋषि ने आराध्या को देखा और उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई। उसने देखा आराध्या का ब्लैंकेट अस्त-व्यस्त हो गया था। ऋषि आराध्या के पास गया और उसने उसे ढंग से ब्लैंकेट ओढ़ाया।
और बेड की दूसरी तरफ जाकर लेट गया। बेड इतना बड़ा था कि दोनों एक-एक कोने में लेट रहे थे, फिर भी बीच में जगह बाकी थी। आराध्या सोई हुई कली की तरह लग रही थी। ऋषि उसे प्यार से निहार रहा था, और ऐसे ही करते-करते उसकी आँख लग गई। दोनों की एक आदत थी, दोनों को नींद में छेड़छाड़ पसंद नहीं थी, इसीलिए ऋषि जहाँ सो रहा था वैसे ही सोता रहा और आराध्या जैसे सो रही थी वैसे ही सोती रही। दोनों एक-दूसरे से टच नहीं हुए।
अगले दिन सुबह, रूटीन के मुताबिक़ आराध्या की आँख 6:00 बजे खुल गई। आराध्या ने देखा कि ऋषि उसके साइड में लेटा हुआ है। वह एक पल के लिए झटके से उठ गई। फिर उसने ध्यान दिया कि उन दोनों के बीच अभी भी काफी दूरी है। यह देखकर उसे थोड़ी राहत मिली। जल्दी से उठकर नहा-धोकर नीचे आ गई। रोज़ की तरह बड़ी माँ आज भी मंदिर में थी। आराध्या सीधे उनके पास चली गई। आज आराध्या के चेहरे पर अलग ही नूर था, जो बड़ी माँ ने नोटिस कर लिया।
"क्या बात है? आज तो बहुत चमक रही है," बड़ी माँ ने कहा।
आराध्या ने शर्म से अपनी नज़रें नीची कर लीं।
"चेहरे पर चमक तो होगी ना बड़ी मालकिन, बहुरानी रात छोटे मालिक के कमरे में थी," निमो ने कहा।
"क्या? सच में? तुम रात ऋषि के कमरे में थी?" बड़ी माँ ने हैरानी से पूछा।
आराध्या ने शर्म से अपनी नज़रें नीची करके धीरे से अपना सिर हिलाया।
बड़ी माँ ने प्यार से आराध्या के सर पर हाथ फेरा और कहा, "मैं बहुत खुश हूँ यह जानकर। ऋषि को अपनी ज़िम्मेदारियों का एहसास हुआ है। आराध्या, तुमसे एक बात कहूँ।"
आराध्या ने अपनी गर्दन हिलाई।
"आरू, मेरा ऋषि बचपन से अकेला ही रहा है। उसे नहीं पता रिश्ते कैसे निभाते हैं। तुमसे शादी भी उसने एक मक़सद के लिए की थी। पर देखो, उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और आज वह अपने रिश्ते को सुधारने के लिए आगे बढ़ रहा है। जब तुम शादी करके घर में आई थी और ऋषि तुम्हें अपने कमरे में नहीं रहने दिया था, मैंने कहा था ना एक दिन ऋषि खुद तुम्हें कहेगा उस कमरे में रहने के लिए। अब जैसे ऋषि ने तुम्हें अपने कमरे में जगह दी है, वैसे ही तुम्हें अपने दिल में जगह देगा। आरू, क्या तुम मुझसे एक वादा करोगी... वादा करो कि चाहे परिस्थिति जैसी भी हो, तुम किसी का साथ छोड़कर कभी नहीं जाओगी।"
आराध्या धीरे से अपना हाथ बड़ी माँ के हाथ में रखती है और मुस्कुराकर सिर हिलाती है।
बड़ी माँ यह सुनकर काफ़ी खुश होती है। पूजा करने के बाद आराध्या निमो के साथ किचन में आती है और बड़ी माँ रामायण का पाठ करने लगती है। निमो नाश्ते की तैयारी करती है। आराध्या जल्दी से कॉफ़ी बनाती है और ऋषि के रूम में जाती है।
आराध्या जब रूम में पहुँचती है, तब उसे बाथरूम से पानी चलने की आवाज़ आती है। वह समझ जाती है ऋषि नहा रहा है।
वह कॉफ़ी को टेबल पर रखती है। ऋषि के कपड़े निकालकर बेड पर रख देती है। लैपटॉप और फ़ाइलें समेटकर उसके बैग में डाल देती है। उसका पर्स, घड़ी, मोबाइल और रुमाल सभी ड्रेसिंग टेबल पर रेडी रख देती है। रूम से निकलकर सीधे नाश्ता बनाने के लिए नीचे चली जाती है।
ऋषि जब नहाकर बाहर आया, अपने कपड़े बेड पर देखकर चौंक गया। वह इधर-उधर नज़र दौड़ाता है पर उसे कोई नहीं मिलता। फिर उसका ध्यान टेबल पर जाता है जहाँ पर कॉफ़ी रखी होती है। वह कॉफ़ी देखकर समझ जाता है कि आराध्या आई थी। उसके चेहरे पर एक मुस्कान आ जाती है। जल्दी से कॉफ़ी पीता है, और आराध्या ने उसके लिए कपड़े निकाल रखे हैं, उन्हें पहनकर रेडी हो जाता है। अपने सारे सामान को सेट देखकर ऋषि मन ही मन बहुत खुश होता है। उसे आदत नहीं थी कि कोई उसके लिए चीज़ें संभाले, सारे काम खुद ही करता था। ऋषि रेडी होकर नीचे आता है। डाइनिंग टेबल पर बैठता है। बड़ी माँ तब तक आ जाती है। आराध्या और निमो डाइनिंग टेबल पर नाश्ता लगा देते हैं। ऋषि आराध्या को देखता है।
आज वह बहुत सुंदर लग रही थी। सुंदर तो आराध्या रोज़ ही लगती थी पर ऋषि कभी उसे इतने गौर से देखता ही नहीं था। आराध्या ऋषि के सामने बैठकर डाइनिंग टेबल पर नाश्ता कर रही होती है। ऋषि चुपचाप नाश्ता करता है। ऑफ़िस निकलने से पहले आराध्या से कहता है, "नाश्ता करके मेडिसिन ले लेना।" इतना बोलकर वह निकल जाता है। बड़ी माँ मन ही मन बहुत खुश होती है।
दोपहर का वक्त, ऋषि का ऑफ़िस।
ऋषि बैठा लैपटॉप पर अपना काम कर रहा था। तभी उसके कमरे का डोर नॉक हुआ। ऋषि ने बिना दरवाज़े की तरफ़ देखे कहा, "कम इन।" दरवाज़ा खुलता है और वहाँ से सूरज आता है।
"सर, आपने जो ने बुलाया था वह आ गए हैं," सूरज ने कहा।
"ठीक है, उन्हें लेकर आओ," ऋषि ने कहा।
सूरज "ओके" बोलकर चला जाता है। 5 मिनट बाद सूरज फिर से रूम में आता है, इस बार सूरज के साथ 45 साल का एक आदमी है।
"सर, यह मिस्टर स्वामी सुब्रमण्यम हैं। यह इस समय एक डम्ब स्कूल के टीचर और प्रोफ़ेसर दोनों हैं। इन्होंने साइलेंट लैंग्वेज पर कई किताबें भी लिखी हैं जिनकी वजह से इन्हें कई अवार्ड और खिताब भी मिले हैं...... और मिस्टर सुब्रमण्यम, यह हमारे बॉस और इस कंपनी के सीईओ हैं, मिस्टर ऋषि नंदा," सूरज ने परिचय कराया।
"हेलो मिस्टर नंदा, आपसे मिलकर खुशी हुई," सुब्रमण्यम ने अपना एक हाथ ऋषि की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा।
ऋषि भी उनसे हाथ मिलाता है और कहता है, "हेलो प्रोफ़ेसर सुब्रमण्यम। मुझे भी आपसे मिलकर काफ़ी अच्छा लगा। बताइए आप क्या लेंगे, चाय कॉफ़ी?"
"जी, इन सब की कोई ज़रूरत नहीं है। हम सीधे काम की बात पर आते हैं। बताइए आप मुझसे क्यों मिलना चाहते हैं," सुब्रमण्यम ने कहा।
"प्रोफ़ेसर, मैं साइलेंट लैंग्वेज सीखना चाहता हूँ," ऋषि ने कहा।
"ओके... (फिर थोड़ा चौंकते हुए) जी?" सुब्रमण्यम ने हैरानी से पूछा।
"क्या हुआ? कोई प्रॉब्लम है क्या?" ऋषि ने पूछा।
"पर सर, आप तो बोल सकते हैं। और जहाँ तक मुझे लगता है आप सुन भी सकते हैं। आप तो बिल्कुल ठीक हैं," सुब्रमण्यम ने कहा।
"प्रोफ़ेसर, मैं बिल्कुल ठीक हूँ। पर यह लैंग्वेज मैं अपने लिए नहीं, किसी और के लिए सीखना चाहता हूँ," ऋषि ने कहा।
"किसी और के लिए? कमाल है! आज तक मैंने यह लैंग्वेज सिर्फ़ उन्हीं लोगों को सिखाया है जो बोल-सुन नहीं सकते। किसी और के लिए साइलेंट लैंग्वेज सीखने का यह मेरा पहला एक्सपीरियंस होगा। जान सकता हूँ आपके घर में कौन स्पेशल चाइल्ड है?" सुब्रमण्यम ने पूछा।
"चाइल्ड नहीं है, मेरी वाइफ़ है," ऋषि ने कहा।
सुब्रमण्यम तो जैसे गिरते-गिरते बचे। "वाइफ़?"
"जी, मेरी वाइफ़, वह बोल नहीं सकती। और उसकी आधी से ज़्यादा बात मुझे समझ में नहीं आती। इसीलिए मैं साइलेंट लैंग्वेज सीखना चाहता हूँ ताकि उससे बात कर सकूँ और उसकी बातें समझ सकूँ," ऋषि ने समझाया।
"कमाल है! आज पहली बार देख रहा हूँ, इतना बड़ा बिज़नेसमैन ने बेजुबान लड़की से शादी की। सर, सच कह रहा हूँ अगर आप जैसे लोग दुनिया में होंगे... तो शायद अंधे-गूँगे-बहरे जैसे लोग अपने आप को दुनिया में सबसे अलग नहीं समझेंगे। आप फ़िक्र मत कीजिए, मैं आपको पूरी साइलेंट लैंग्वेज सिखाऊँगा," सुब्रमण्यम ने कहा।
"ओके, तो कल से क्लास स्टार्ट करते हैं," ऋषि ने कहा।
प्रोफ़ेसर सुब्रमण्यम "ओके" बोलकर वहाँ से चले जाते हैं। वह जाते-जाते ऋषि को एक किताब देकर जाते हैं ताकि उसे थोड़ा-बहुत साइलेंट लैंग्वेज के बारे में जानकारी मिले।
प्रोफ़ेसर सुब्रमण्यम के जाने के बाद कमरे में सिर्फ़ ऋषि और सूरज ही रह गए थे। सूरज ने यह सुनकर कि ऋषि आराध्या के लिए साइलेंट लैंग्वेज सीखना चाहता है, एक पल के लिए शॉक्ड होने का भाव दिखाया।
सूरज: "सर, अगर आप बुरा ना मानें तो क्या मैं आपसे एक बात पूछ सकता हूँ?"
ऋषि: "मैं जानता हूँ तुम यही पूछना चाहते हो ना कि मैं साइलेंट लैंग्वेज क्यों सीखना चाहता हूँ।"
सूरज: "जी सर। मतलब, जहाँ तक मुझे याद है, जब आपने ये डिसाइड किया था कि आप गौतम की शादी में जाकर उसकी दुल्हन से शादी कर लेंगे, जिससे मिस्टर गौतम को उनके दादाजी की प्रॉपर्टी ना मिले, और आपने वैसा ही किया। लेकिन तब आपने ये भी डिसाइड किया था कि ये शादी आपके लिए सिर्फ़ एक ज़रिया है मिस्टर गौतम को बर्बाद करने का। और जिस दिन आपका मक़सद पूरा हो जाएगा, आप मैडम को तलाक़ दे देंगे। बदले में आप उन्हें एक अच्छी-खासी रक़म भी देंगे जिससे उनकी लाइफ़ सेटल हो जाए। अचानक से ये सब..."
ऋषि ने गहरी साँस ली और सोफ़े पर टेक लगाकर बैठते हुए कहा:
ऋषि: "मैं इसी बात पर कायम था जब तक कि आराध्या घर छोड़कर नहीं गई थी। इतना ही नहीं, मैंने उससे इस बारे में बात भी की थी। जिस दिन मेरा मक़सद पूरा हो जाएगा, मैं उसे तलाक़ दे दूँगा। और वो इस बात के लिए मान भी गई थी। उसने मुझसे कभी कोई सवाल नहीं किया। मैं जो बोलता, वो चुपचाप मानती गई, चाहे उससे शादी करने का फ़ैसला हो या उसे तलाक़ देने का फ़ैसला। आराध्या के घर छोड़कर जाने पर मुझे एहसास हुआ कि आराध्या ने अपने पूरे जीवन के साथ समझौता कर रखा है। उसे ज़िन्दगी में कभी किसी से कोई उम्मीद ही नहीं है। जब गौतम उससे शादी कर रहा था, वो बिना किसी ना-नुकुर के उससे शादी करने के लिए तैयार हो गई थी; जब मैंने जबरदस्ती शादी की, तब भी उसने कोई सवाल नहीं किया; जब मैंने उसे तलाक़ देने की बात कही, तब भी वो चुप बैठी थी। मैंने गुस्से में उसे चले जाने को कहा, तो वो छोड़कर चली गई। इसलिए जब मैं उसे वापस लेकर आया, तो मैंने ये डिसाइड किया कि अब आराध्या अपने जीवन में किसी भी चीज़ को लेकर कोई समझौता नहीं करेगी, और जहाँ तक बात रही मेरी साइलेंट लैंग्वेज सीखने की... वो मैं इसलिए सीख रहा हूँ क्योंकि मुझे उसकी बात ही समझ में नहीं आती।"
सूरज: "तो क्या सर, मैं ये समझूँ कि आप मैडम को पसंद..."
सूरज इतना ही बोल पाया था कि ऋषि ने उसे घूर कर देखा।
ऋषि: "ऐसा कुछ नहीं है। मतलब, मैं ये नहीं कहता कि मैं आराध्या को पसंद नहीं करता, लेकिन उस तरीक़े से पसंद नहीं करता। वो मेरे लिए सिर्फ़ एक ज़िम्मेदारी है। और मैं अपनी शादी में सिर्फ़ ईमानदार रहना चाहता हूँ। उस लड़की ने अपने जीवन में बहुत कठिनाइयों का सामना किया है, मैं उसकी लाइफ़ में और कोई प्रॉब्लम नहीं खड़ी करना चाहता। अब मैं ये चाहता हूँ कि उसे उसके हिस्से की खुशियाँ मिलें।"
सूरज कुछ कहने ही वाला था कि ऋषि ने कहा, "बहुत सारे सवाल हैं तुम्हारे पास? ऑफ़िस में काम नहीं है क्या?"
सूरज मुस्कुराकर ऋषि के कमरे से बाहर आ गया। मन में खुद से कहता है,... "सर, मैडम के लिए आपका ये सॉफ़्ट नेचर पहले तो कभी नहीं देखा। हो ना हो आपके दिल में मैडम के लिए एक सॉफ़्ट कॉर्नर बन गया है। और मैं आशा करूँगा, जिसे आप अभी सिर्फ़ अपनी ज़िम्मेदारी कह रहे हैं, भविष्य में वो आपकी ज़रूरत बन जाए। पर आपको देखकर ऐसा लगता है कि बहुत जल्दी मैं उन्हें मैडम से 'भाभी जी' कहने लगूँगा..." 😊
शाम का वक़्त था। ऋषि अपने मेंशन में पहुँचा। घर आकर वो सीधे अपने कमरे में चला गया। वहाँ जाकर सबसे पहले उसने अपने लैपटॉप का बैग सोफ़े पर रखा और अपनी टाई की नॉट खोली। ऋषि अलमारी से अपने लिए कम्फ़र्टेबल कपड़े लेकर वॉशरूम में चला गया। वॉशरूम से बाहर आकर उसने देखा कि आराध्या कमरे में नहीं थी। उसे लगा शायद वो नीचे होगी।
अपना फ़ोन लेकर वो नीचे हॉल में आया। ऋषि ने नौकरों से पूछा कि आराध्या कहाँ है, पर नौकरों ने कहा कि उन्हें इस बारे में कुछ नहीं पता। तभी ऋषि को निमो दिखाई दी। ऋषि ने निमो से पूछा कि आराध्या कहाँ है। निमो ने बताया कि वो बड़ी माँ के साथ गार्डन में है। ऋषि उनकी बात सुनकर सीधे गार्डन की तरफ़ चला गया। वहाँ उसने देखा कि बड़ी माँ और आराध्या गार्डन के पास एक बेंच पर बैठी थीं। ऋषि जब उनकी तरफ़ आ रहा था, तब उसने देखा कि आराध्या एक फ़्लावर पॉट में फूल लगा रही थी। ऋषि वहाँ आकर उनके सामने बैठ गया और बड़ी माँ से कहा,
ऋषि: "क्या हो रहा है बड़ी माँ?"
बड़ी माँ: "कुछ नहीं, इस फूलदान में थोड़े नए फूल लगा रही थीं, और आरू मेरी मदद कर रही है।"
ऋषि आराध्या की तरफ़ देखकर बोला, "मेडिसिन खाई तुमने?"
आराध्या ने धीरे से अपना सर हिलाया।
ऋषि: "अब तबीयत कैसी है?"
आराध्या ने अपने हाथ से 'ओके' का साइन बनाया 👌 और बताया कि अब वो ठीक है।
उन दोनों को इस तरीक़े से बातें करता देख बड़ी माँ मुस्कुरा दी। वो उठकर अंदर जाने लगी कि ऋषि ने उसे रोक लिया।
ऋषि: "आप कहाँ जा रही हो?"
बड़ी माँ: "तुम दोनों बातें करो, मैं प्रियंका को देखकर आती हूँ।"
ऋषि: "मैं भी चलता हूँ।"
बड़ी माँ: "नहीं, तुम यहाँ बैठो, आरू के साथ बातें करो। मैं अंदर जा रही हूँ। और हाँ, गुस्सा मत करना इस बार।"
ऋषि मुस्कुराकर अपना सर हिलाया।
बड़ी माँ के जाने के बाद ऋषि ने देखा कि आराध्या बहुत प्यार से गार्डन के फूलों को देख रही है।
ऋषि: "तुम्हें फूल पसंद हैं?"
आराध्या ने अपने हाथ से कुछ इशारा किया और फिर वो बात ऋषि के सर के ऊपर से गुज़र गई। कुछ समझ में नहीं आया, वो आराध्या की बात नहीं समझ पा रहा था।
ऋषि (अपने मन में): "अब क्या बोल रही है, पता ही नहीं चल रहा है। जब तक साइलेंट लैंग्वेज नहीं आ जाती, तब तक कुछ करना पड़ेगा, नहीं तो इससे बात करना मुश्किल हो जाएगा।"
कुछ सोचकर उसने अपना दिमाग लगाया और फिर अपना फ़ोन निकाला। उसने उसमें नोटपैड ओपन करके आराध्या के सामने किया।
ऋषि: "लिखकर बताओ क्या बोल रही हो, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा।"
आराध्या ने ऋषि का फ़ोन लिया और उसमें लिखकर उसे वापस दे दिया।
ऋषि ने फ़ोन लिया और उसे पढ़ा। आराध्या ने लिखा था:
"मुझे आपका गार्डन बहुत पसंद आता है, यहाँ की हरियाली सब मन को शांति देती है।"
ये पढ़कर ऋषि के चेहरे पर एक स्माइल आ गई। वो आराध्या की तरफ़ देखकर बोला:
ऋषि: "एक चीज़ दिखाऊँ?"
आराध्या ने अपना सर हिलाया।
ऋषि ने आराध्या का हाथ पकड़ लिया। आराध्या की तो जैसे साँस ही रुक गई। ऋषि उसका हाथ पकड़कर गार्डन में अंदर की तरफ़ ले गया।
आराध्या ने आज तक गार्डन केवल बाहर से ही देखा था, वो कभी गार्डन के अंदर नहीं गई थी।
ऋषि उसे एक जगह ले गया और कहा:
ऋषि: "सामने देखो।"
आराध्या जब सामने देखी तो वो एकदम शॉक्ड हो गई 😳।
आराध्या को वो जगह देखकर लगा जैसे कि वो किसी दूसरी ही दुनिया में आ गई है। यहाँ गार्डन के पीछे एक सुंदर सा लेक था, जहाँ पर छोटे-छोटे फूलों की क्यारियाँ बनी हुई थीं, और आस-पास जुगनू से वो जगह और भी ख़ूबसूरत लग रही थी। लेक में से गिरने वाला फाउंटेन उसे और भी ख़ूबसूरत बना रहा था।
आराध्या तो उस जगह को देखकर एक पल के लिए मानो खो सी गई थी। उसे इस तरीक़े से प्यार से जगह को निहारता देख ऋषि उसके पास आया और धीरे से पूछा:
ऋषि: "पसंद आया?"
आराध्या ने अपना सर हाँ में हिलाया।
ऋषि: "जब मैं बहुत ज़्यादा अकेला फील करता हूँ या फिर मेरा माइंड बहुत ज़्यादा डिस्टर्ब होता है, तो मैं यहीं आकर बैठ जाता हूँ। मुझे बहुत अच्छा लगता है, ये जगह मुझे एक सुकून देती है।"
ऋषि ने जहाँ बैठने की जगह थी, उस तरफ़ इशारा करके कहा, "चलो वहाँ बैठते हैं।"
आराध्या उसके साथ चल दी। वहाँ पर छोटे-छोटे टेबल-कुर्सियाँ लगी हुई थीं जो कि लकड़ी की बनी हुई थीं। आराध्या और ऋषि वहाँ जाकर बैठ गए और उस जगह को निहारने लगे।
आराध्या को उस जगह को इतने प्यार से देखता देख ऋषि बहुत खुश हुआ। ऋषि आराध्या से पूछा:
ऋषि: "आराध्या..."
आराध्या उसकी तरफ़ देखी।
ऋषि: "एक बात पूछूँ?"
आराध्या ने अपना सर हाँ में हिलाया।
ऋषि: "तुमने मुझसे कभी कोई सवाल क्यों नहीं किया? मेरी हर बात चुपचाप क्यों मान जाती हो?"
टेबल पर ऋषि का फ़ोन रखा हुआ था। आराध्या ने फ़ोन उठाया और नोटपैड ओपन करके उसमें लिखकर ऋषि को दे दिया।
"मुझे आपसे क्या सवाल करना चाहिए?"
ऋषि: "मैंने तुम्हारे साथ इतना सब कुछ किया। तुमसे जबरदस्ती शादी की, फिर तुम्हें छोड़ने की बात कही, गुस्से में तुम पर हाथ उठा दिया। तुम घर छोड़कर चली गई। इतने सब में एक भी सवाल नहीं?"
आराध्या (टाइपिंग): "अगर मैं आपसे कुछ पूछूँ भी तो क्या आप मुझे जवाब देंगे?"
ऋषि: "हाँ, पूछो ना।"
आराध्या (टाइपिंग): "प्रियंका कौन है? देखिए, ये सब पूछने का हक़ तो नहीं है मुझे, लेकिन मैं इस घर में आपसे जुड़े सबको जानती हूँ, सिर्फ़ एक प्रियंका जी ही हैं जिनके बारे में मैं कुछ नहीं जानती।"
ऋषि मुस्कुराया और उसकी तरफ़ प्यार से देखकर कहा:
ऋषि: "प्रियंका बड़ी माँ की बेटी है।"
आराध्या: 😳
उसे इस तरह देखता देख ऋषि समझ गया कि आरू को कुछ समझ नहीं आया।
ऋषि: "मेरा और प्रियंका का रिश्ता समझने के लिए तुम्हें सबसे पहले मेरा और बड़ी माँ का रिश्ता समझना होगा। आराध्या, अभी जब तुमने ये कहा कि मेरे जीवन में किसी के बारे में जानने का तुम्हें कोई हक़ नहीं है... तो मैं तुम्हें ये बात क्लियर कर दूँ कि मुझे जुड़ी हर बात जानने का हक़ है तुम्हें। आरू, तुम अकेली ही इस दुनिया में नहीं हो जिसके आगे-पीछे कोई नहीं है। बल्कि मैं भी उनमें से एक हूँ। मेरा भी इस दुनिया में कोई नहीं है।"
आराध्या (टाइपिंग): "बड़ी माँ?"
ऋषि: "बड़ी माँ से मेरा खून का रिश्ता नहीं है, लेकिन बड़ी माँ मेरे लिए वो हैं जिनके लिए मैं अपना खून बहाने के लिए भी तैयार हूँ। बड़ी माँ ने मुझे पाला है। उनके होते हुए ही तो मैं दुनिया में खुद को अकेला नहीं समझता हूँ, वो हैं तभी मुझे ऐसा लगता है कि मेरी भी एक फैमिली है। (ऋषि थोड़ा गंभीर हुआ, फिर एक गहरी साँस ली और आराध्या की तरफ़ देखकर कहा) मैं अपने जीवन का वो सच बताने जा रहा हूँ जिसके बारे में मैं बड़ी माँ और प्रियंका ही जानते हैं। क्योंकि अब तुम भी हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा हो, इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम्हें पूरा सच पता रहे।"
ऋषि ने आराध्या का हाथ अपने हाथ में लिया और उसकी तरफ़ देखते हुए कहा:
ऋषि: "बड़ी माँ और प्रियंका मेरे अपने नहीं हैं, लेकिन वो मेरे लिए अपनों से बढ़कर हैं। मेरे लिए हर रिश्ते, हर नाते से बढ़कर हैं। वो तुमसे बढ़कर हैं मेरे लिए, यहाँ तक कि वो मेरे से भी बढ़कर हैं मेरे लिए। जब बात बड़ी माँ और प्रियंका की आती है, तो मुझे दुनिया में कुछ भी सही-गलत नज़र नहीं आता। और उसी वजह से मेरी तुमसे शादी हुई।"
आराध्या ने ऋषि को सवालिया नज़रों से देखा।
ऋषि ने एक फ़ीकी सी मुस्कान के साथ आराध्या को देखा और कहा:
ऋषि: "आराध्या, मैं तुम्हें अपने जीवन की ये सच्चाई बताने जा रहा हूँ, ये सुनने के बाद जिस ऋषि नंदा को तुम जानती हो, वो तुम्हें एक झूठ लगने लगेगा।"
ये पहली बार था जब दोनों एक-दूसरे से बिना किसी शिकायत और बिना किसी समझौते के बात कर रहे थे। आज पहली बार ऋषि आराध्या से खुलकर बात कर रहा था। आज ना उसे किसी बात का डर था और ना ही किसी बात की झिझक।
ऋषि: "मैं तुम्हें अपने जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई बताने जा रहा हूँ। और मेरे बारे में सब सुनने के बाद तुम ये जानोगी कि जैसा मैं हूँ, वैसा मैं नहीं था। आराध्या, बड़ी माँ से मेरा अपना कोई रिश्ता नहीं है, पर उन्होंने मेरे लिए अपनों को छोड़ दिया। मेरे पापा, श्री विष्णु नंदा, बड़ी माँ के पति (प्रमोद अवस्थी) की कंपनी में एक मामूली से मैनेजर थे। लेकिन बड़ी माँ के पति मेरे पापा पर आँख बंद करके भरोसा करते थे क्योंकि मेरे पापा ने उनके कई लीगल कामों में उनका साथ दिया था। कई बार उनके साथ फ़्रॉड होने से बचाया था। बस इसीलिए प्रमोद अंकल पापा पर आँख बंद करके भरोसा करते थे। वहीं दूसरी तरफ, बड़ी माँ (निधि) और मेरी मम्मी (पूनम) दोनों एक ही कॉलेज में पढ़ती थीं और दोनों ही बेस्ट फ़्रेंड थीं। अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने के बाद दोनों ने एक कंपनी में इंटर्नशिप के लिए ज्वाइन किया। सौभाग्य से, वो दोनों ही प्रमोद अंकल की कंपनी में इंटर्न लगीं। प्रमोद अंकल की कंपनी इतनी बड़ी तो नहीं थी, लेकिन उनकी और पापा की मेहनत की बदौलत उनकी छोटी कंपनी होने के बावजूद दिल्ली की कंपनियों में उनका नाम लिया जाता था।"
जब बड़ी माँ और मम्मी अंकल की कंपनी में लगी थीं, तो समय के साथ-साथ बड़ी माँ को प्रमोद अंकल से और मेरी मॉम को मेरे पापा से प्यार हो गया। दोनों की शादी एक ही मंडप में हुई थी। शादी के बाद मेरे पापा ने प्रमोद अंकल की कंपनी छोड़कर अपना कुछ काम स्टार्ट करने की सोची, जिसके लिए प्रमोद अंकल ने फ़ाइनेंस में पापा की बहुत हेल्प की थी। प्रमोद अंकल की हेल्प की वजह से पापा ने नंदा ग्रुप ऑफ़ इंडस्ट्री की पहली नींव रखी थी। उनकी शादी के डेढ़ साल बाद मेरा जन्म हुआ। सब बहुत खुश थे। पापा के हार्ड वर्क की वजह से नंदा ग्रुप ऑफ़ कंपनी बहुत ही कम समय में प्रमोद अंकल की कंपनी के बराबर हो गई थी।
चार साल बाद प्रमोद अंकल और बड़ी माँ को प्रियंका हुई। मुझे अच्छे से याद है, उस दिन प्रियंका का नामकरण था। हम सब प्रमोद अंकल के घर में प्रियंका के नामकरण की तैयारी कर रहे थे। प्रियंका को ये नाम मेरी मम्मी ने ही दिया था। प्रियंका को हम अपनी बेटी की तरह ही मानते थे, और बड़ी माँ मुझे अपनी बेटी की तरह। और मेरे लिए तो खेलने के लिए मुझे एक प्यारा सा खिलौना मिल गया था 😊 मैं सारा दिन प्रियंका के झूले के आस-पास ही उसके साथ खेलता रहता था।
प्रियंका के नामकरण के अगले दिन, हम सबको वापस घर आना था। हम लोग घर आने की तैयारी कर रहे थे, इतने में फ़ोन आया कि प्रमोद अंकल की कंपनी में आग लग गई है। प्रमोद अंकल बहुत परेशान हुए। वो अपनी कंपनी जाने के लिए निकले थे, पापा भी उनके साथ जाने की ज़िद करने लगे। प्रमोद अंकल और पापा दोनों प्रमोद अंकल की कंपनी के लिए निकल गए। दो घंटे बाद मम्मी के पास फ़ोन आया कि कंपनी में कुछ मज़दूरों के बीच हाथापाई हो गई थी, पापा और प्रमोद अंकल को चोट आई है। बड़ी माँ को इस बारे में कुछ भी नहीं पता था, उनकी तबीयत ठीक नहीं थी, इसीलिए मम्मी ने बड़ी माँ को कुछ नहीं बताया और उन्होंने मुझे और प्रियंका को बड़ी माँ के पास छोड़ दिया। वो खुद अंकल की कंपनी के लिए निकल गईं।
वहाँ जाकर मम्मी ने देखा कि अंकल और पापा को बहुत चोट आई है। पुलिस ने सारा मामला अपने हाथ में ले लिया था। वहाँ की स्थिति तो कंट्रोल में थी, लेकिन पापा और अंकल की हालत ख़राब थी। मम्मी उन्हें जल्दी से लेकर हॉस्पिटल के लिए निकल गईं। मम्मी इतनी घबराई हुई थी कि गाड़ी पर कंट्रोल खो बैठी और गाड़ी एक ट्रक से टकरा गई। किसी को संभलने का मौक़ा नहीं मिला और गाड़ी सीधे खाई में गिर गई। बड़ी माँ को जब इस बात का पता चला तो उन्हें बहुत बड़ा सदमा पहुँचा। वो जल्दी से हादसे की लोकेशन पर पहुँची। वहाँ पापा, प्रमोद अंकल और मेरी मम्मी की डेड बॉडी को देखकर बड़ी माँ खुद को संभाल नहीं पा रही थीं। इस वक़्त वहाँ पर प्रमोद अंकल के भाई और पापा के भाई मौजूद थे। प्रमोद अंकल के परिवार ने जैसे-तैसे करके बड़ी माँ को संभाला। तीनों का अंतिम संस्कार करने के बाद बड़ी माँ तो जैसे ज़िंदा लाश बन गई थीं। प्रियंका के पास तो फिर भी जीने के लिए उसकी माँ थी, पर मैं तो एक पल में अनाथ हो गया। 🥺 मेरा इस दुनिया में कोई नहीं था।
उनके गुज़रने के कुछ दिन बाद प्रमोद अंकल के परिवार ने बड़ी माँ से कहा कि वो उन्हें और प्रियंका को अपने साथ ले जाना चाहते हैं। प्रियंका उनके बेटे की आखिरी निशानी है, वो उसे अपने साथ रखना चाहते थे। तो बड़ी माँ ने साफ़ मना कर दिया। उन्होंने कहा कि वो चाहें तो कभी भी आकर प्रियंका से मिल सकते हैं, लेकिन वो और प्रियंका मुझे छोड़कर नहीं जाएँगी। बड़ी माँ ने कहा कि उनके पास तो फिर भी कहने को एक परिवार है, पर मैं इस दुनिया में बिल्कुल अकेला हूँ। मैं उनकी बहन जैसी सहेली की आखिरी निशानी हूँ उनके पास। बड़ी माँ ने कहा कि जब उनकी मम्मी ने मुझे छोड़कर उन्हें छोड़ा था, तब उनके आखिरी शब्द यही थे—"ऋषि का ख्याल रखना"—इसलिए मैं उनकी ज़िम्मेदारी हूँ। प्रमोद अंकल के परिवार को निराश होकर वापस जाना पड़ा। बड़ी माँ ने मुझे और प्रियंका को अकेले पाला है। उन्होंने मेरी परवरिश के साथ-साथ कंपनी को भी बहुत अच्छे से संभाला। उन्होंने मुझमें और प्रियंका में कभी कोई फ़र्क नहीं किया। यहाँ तक कि मुझे हायर एजुकेशन के लिए लंदन भेजा। और जब मैं अपनी स्टडी पूरी करके इंडिया वापस आया, तो उन्होंने नंदा ग्रुप ऑफ़ इंडस्ट्री की सारी ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी। जिसकी नींव मेरे पापा ने रखी थी, मुझे उस कंपनी को आगे बढ़ाना था। मैंने बचपन से ही देखा था कि कैसे बड़ी माँ ने मेरे लिए अपने परिवार के साथ जाने से मना कर दिया, उन्होंने प्रियंका से पहले मेरी खुशियाँ रखीं, इसलिए मैंने उन्हें माँ से ऊँचा दर्जा दिया, इसलिए मैं उन्हें बड़ी माँ कहता हूँ। मैंने देखा है कैसे बड़ी माँ ने मुझे और प्रियंका को पाला, दिन-रात कंपनी में मेहनत की, पापा की कंपनी को डूबने नहीं दिया। उन्होंने उस कंपनी को मेरी अमानत समझकर संभाला। इसलिए मेरे लिए बड़ी माँ और प्रियंका सबसे पहले हैं। प्रियंका तो मेरे लिए मेरी बेस्ट फ़्रेंड है, मेरी बहन है, मेरी इंस्पीरेशन है। प्रियंका की खुशियों के आगे मुझे और कुछ नहीं दिखता। बड़ी माँ और प्रियंका मेरे लिए दुनिया में सबसे अज़ीज़ हैं।"
ऋषि ने जब आराध्या को अपने बीते दिनों की सारी कहानी सुना दी, तब आराध्या ने ऋषि की आँखों में नमी देखी। 😢 आराध्या ने धीरे से अपना हाथ ऋषि के हाथ में रखा और उसे एक प्यारी सी मुस्कान के साथ देखा। वो उसे ये बताना चाहती थी कि अब वो इस दुनिया में अकेला नहीं है, आराध्या उसके साथ है। दोनों इसी तरीक़े से एक-दूसरे की आँखों में देख रहे थे और चाँद की रोशनी इस बात की गवाह बन रही थी। 😊😊
सुबह सब लोग डाइनिंग टेबल पर बैठकर नाश्ता कर रहे थे। आराध्या ने आज सबके लिए आलू के पराठे बनाए थे। ऋषि अपने हाथ से नाश्ता कर रहा था और दूसरे हाथ से फ़ोन में मेल की डिटेल चेक कर रहा था। आराध्या ने जब ये देखा तो बड़ी माँ को कुछ इशारा किया। बड़ी माँ ने आराध्या का इशारा समझा और ऋषि से कहा:
बड़ी माँ: "ऋषि, आराम से नाश्ता कर लो। ये काम ऑफ़िस में जाकर भी हो सकता है।"
ऋषि (फ़ोन में देखते हुए): "बड़ी माँ, ज़रूरी ईमेल हैं, वही चेक कर रहा हूँ।"
ऋषि का नाश्ता लगभग ख़त्म ही हो गया था, उसके प्लेट में पराठे बस ख़त्म होने वाले थे। पर जब आराध्या ने देखा कि ऋषि फ़ोन नहीं छोड़ रहा है, उसने जाकर ऋषि की प्लेट में एक और पराठा रख दिया।
ऋषि ने जब ये देखा कि आराध्या ने उसकी प्लेट पर पराठा रख दिया है, तो उसने बेचारा सा मुँह बनाकर आराध्या की तरफ़ देखा। 🥺
बड़ी माँ और निमो देखकर हँस पड़ीं। 😄
ऋषि ने चुपचाप फ़ोन साइड कर दिया और चुपचाप नाश्ता करने लगा। उसे पता चल गया था कि अगर वो फ़ोन में देखते-देखते नाश्ता करेगा, तो आराध्या उसकी प्लेट में पराठे रखती जाएगी। 😄😄
निमो ने धीरे से बड़ी माँ के कान में कहा: "देखा बड़ी मालकिन, जिसके सामने किसी की नहीं चलती, वो आज चुपचाप अपनी बीवी की बात कैसे मान रहा है। 😊 आपके कहने पर तो उसने फ़ोन नहीं रखा, पर बहू रानी की वजह से चुपचाप फ़ोन भी रख दिया और नाश्ता भी कर रहा है।"
बड़ी माँ: "हम्म्म, देख रही हूँ। बस सब माता रानी से यही माँगती हूँ कि ये दोनों ऐसे ही हँसी-खुशी अपनी ज़िन्दगी की नई शुरुआत करें। और आराध्या ऐसे ही मेरे ऋषि को हमेशा खुश रखे। 😊"
सब लोग नाश्ता कर ही रहे थे कि तभी सूरज वहाँ आया और कहा:
सूरज: "गुड मॉर्निंग सर, गुड मॉर्निंग बड़ी माँ... (आराध्या की तरफ़ देखकर) गुड मॉर्निंग भा... भाभी जी... मैम।"
ऋषि बस अपना सर हिलाया तो सूरज उसे बोला: "सर, आपने जो सामान कहा था वो मैं ले आया हूँ।"
सूरज ने ऋषि को एक पैकेट दिया।
ऋषि (वो पैकेट लेते हुए): "ठीक है, तुम गाड़ी में मेरा वेट करो, मैं आता हूँ।"
सूरज के जाने के बाद ऋषि वो पैकेट आराध्या को दिया:
ऋषि: "ये तुम्हारे लिए।"
आराध्या तो वो देखकर एकदम शॉक्ड हो गई। 😳 उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि ऋषि उसे कोई गिफ़्ट देगा। शादी के बाद ये पहली बार था जब ऋषि ने आराध्या को कोई गिफ़्ट दिया था। आराध्या बस एकदम ऋषि को देखे जा रही थी।
बड़ी माँ: "आरू, तुम्हारे लिए गिफ़्ट लाया है, तुम ले क्यों नहीं रही हो?"
बड़ी माँ की आवाज़ सुनकर आराध्या अपने ध्यान से बाहर आई। ऋषि के हाथ से वो पैकेट लिया। उसे ओपन किया तो अंदर एक बॉक्स था। जैसे ही वो बॉक्स बाहर निकाला तो बड़ी माँ खुश होकर बोली:
बड़ी माँ: "अरे वाह! फ़ोन 📱... वो भी लेटेस्ट।"
आराध्या बॉक्स में से फ़ोन निकाला और हैरानी से ऋषि की तरफ़ देखी।
ऋषि: "ऐसे क्या देख रही हो? फ़ोन की ज़रूरत होती है।"
आराध्या अपने हाथों से कुछ इशारा किया। इशारों से इतना तो समझ में आ गया कि वो फ़ोन के बारे में कुछ बता रही है, पर उसकी बातें किसी को समझ में नहीं आ रही थीं।
ऋषि परेशानी से अपना सर झटका और आराध्या के हाथों से उसका फ़ोन ले लिया। उसके फ़ोन में एक नोटपैड ओपन करके दिया:
ऋषि: "इसमें लिखो क्या बोलना चाहती हो।"
आराध्या (टाइपिंग): "मैं भला फ़ोन का क्या करूँगी? फ़ोन तो उन लोगों के काम आता होगा जिन्हें किसी से बात करनी है। मैं कहाँ किसी से बात कर पाऊँगी।"
ऋषि ने उसे पढ़ा और आराध्या से कहा: "फ़ोन में सिर्फ़ बातें ही नहीं होती हैं, और भी बहुत सारे काम होते हैं। बहुत सारी नॉलेज की चीज़ें भी सीखने को मिलती हैं।" (ऋषि आराध्या के फ़ोन में व्हाट्सऐप इंस्टॉल कर दिया) और उसे देते हुए कहा:
"घर में सभी को तुमसे बात करने में थोड़ी-बहुत प्रॉब्लम होती है। तुम्हें किसी से कुछ भी कहना हो तो तुम हमें लिखकर बता सकती हो। मैंने व्हाट्सऐप इंस्टॉल कर दिया है, इसमें सबके नंबर हैं। तुम्हें कुछ भी कहना हो तो तुम मैसेज कर सकती हो। और फ़ोन को हमेशा अपने पास रखना। इमरजेंसी में पता होना चाहिए कि तुम कहाँ हो। बाकी सारी डिटेल तुम्हें बड़ी माँ बता देंगी। मुझे ऑफ़िस जाने को लेट हो रहा है।"
इतना कहकर वो अपना फ़ोन और लैपटॉप बैग लेकर ऑफ़िस के लिए निकल गया।
बड़ी माँ आराध्या के साथ सोफ़े पर बैठकर उसे फ़ोन के फ़ंक्शन बता रही थी। बड़ी माँ अपने फ़ोन से आराध्या को फ़ोन में सभी लोगों की फ़ोटो भेज दी।
बड़ी माँ: "अच्छा आरू, जल्दी से बताओ तुम्हारे व्हाट्सऐप पर डीपी कौन सी लगाऊँ?"
आराध्या पिक्चर्स देखती है, उनमें से एक पिक्चर वो थी जिसमें ऋषि और आराध्या की शादी वाले दिन ऋषि ने उसे अपनी गोद में उठाकर फेरे लिए थे। आराध्या को पिक्चर देखकर मुस्कुराहट आ गई। 😊 बड़ी माँ उसकी मुस्कान देखकर समझ गई कि आराध्या को ये पिक्चर काफ़ी पसंद आई है। वो उसी पिक्चर को आराध्या के व्हाट्सऐप की डीपी पर लगा दिया। बड़ी माँ आराध्या को फ़ोन के बारे में बताकर अपने कमरे चली गई। आराध्या फ़ोन में कुछ करने लगी, तभी उसे ख़्याल आया कि क्यों ना वो ऋषि को मैसेज करे।
आराध्या व्हाट्सऐप ओपन किया और ऋषि की प्रोफ़ाइल देखी। उसकी डीपी काफ़ी हैंडसम लग रही थी।
ऋषि ऑनलाइन था। उसके स्क्रीन पर बार-बार आराध्या की टाइपिंग आ रही थी, पर मैसेज कोई नहीं आ रहा था। 🤔 परेशान होकर ऋषि ही आराध्या को पहला मैसेज कर दिया:
ऋषि: "इतनी देर से क्या टाइप कर रही हो? 🤨"
आराध्य ने जब ऋषि का मैसेज देखा, तो वह हैरान हो गई। फ़ोन उसके हाथ से छूटते-छूटते बचा। बेचारी आराध्य को समझ ही नहीं आ रहा था कि अब क्या रिप्लाई करे। ऋषि ने जब देखा कि आराध्य ऑनलाइन है, पर रिप्लाई नहीं कर रही है, तो उसने फिर मैसेज किया, "क्या हुआ? तुम ठीक तो हो ना?"
आराध्य ने जब दुबारा मैसेज देखा, तो खुद को थोड़ा नॉर्मल किया और रिप्लाई किया:
आराध्य= हाँ जी, मैं ठीक हूँ।
फिर थोड़ा रुककर:
आराध्य= आप ऑफ़िस पहुँच गए?
ऋषि ने जब यह मैसेज देखा, तो उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई। उसने रिप्लाई किया:
ऋषि= बस पहुँचने वाला हूँ। 😊
आराध्य= अच्छा, ठीक है। आपको बहुत काम होगा। मैं भी बड़ी माँ के पास जा रही हूँ।
ऋषि= ठीक है, शाम को बात करते हैं। बाय
आराध्य=😊
ऋषि मैसेज करते हुए लगातार मुस्कुरा रहा था, जो बहुत कम देखने को मिलता था। यह सूरज ने देखा, तो उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ। वह तो हैरान हो गया।
जब ऋषि को लगा कि कोई उसे घूर रहा है, तो उसने नज़र उठाकर सूरज की तरफ़ देखा। सूरज सकपाक कर यहाँ-वहाँ देखने लगा।
ऋषि (अपने अंडरटोन में): मुझे पर ध्यान देने से ज़्यादा अपने काम पर ध्यान दो, तुम्हें उसी की सैलरी मिलती है। 🤨
सूरज.. 😔 सॉरी सर।
ऋषि अपने काम में लग गया। वहीं आराध्य बड़ी माँ के साथ प्रियंका के रूम में थी। वे दोनों उस वक्त प्रियंका की ड्रेस बदल रही थीं। एक नर्स उनकी हेल्प कर रही थी।
सब होने के बाद बड़ी माँ और आराध्य एक सोफ़े पर बैठ गए। आराध्य बस प्रियंका को देखे जा रही थी।
बड़ी माँ= ऐसे क्यों देख रही हो?
आराध्य ने अपना फ़ोन लिया और टाइप किया:
आराध्य= प्रियंका को क्या हुआ है?
बड़ी माँ ने पढ़कर कहा:
बड़ी माँ= यह कोमा में है, पिछले 6 महीने से।
आराध्य= पर कैसे?
बड़ी माँ= एक एक्सीडेंट हुआ था, उस दिन वह काफ़ी परेशान थी। आखिरी बार इसकी ऋषि से ही बात हुई थी। फिर कुछ घंटे बाद खबर आई कि वह हॉस्पिटल में है। और फिर डॉक्टर ने बताया कि यह कोमा में चली गई है। ऋषि उस दिन बुरी तरह से टूट गया था। उसने दुनिया भर के डॉक्टरों से प्रियंका का इलाज करवाया, पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ। पर ऋषि अभी भी हिम्मत नहीं हारी है। उसे अभी भी यकीन है कि एक न एक दिन प्रियंका ज़रूर उठेगी। जान बसती है उसकी प्रियंका में।
बड़ी माँ यह कहते हुए बहुत इमोशनल हो गई थीं, उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। आराध्य को अब अफ़सोस हो रहा था कि उसने यह सवाल पूछा ही क्यों बड़ी माँ से। आराध्य ने अपना हाथ बड़ी माँ के हाथ में दिया और प्यार से अपना सर हिलाया। बड़ी माँ ने आराध्य की तरफ़ देखा, फिर अपने आप से कुछ बोली और आराध्य से कहा:
बड़ी माँ= पता है आराध्य, मेरी सारी दुनिया सिर्फ़ ऋषि और प्रियंका के आसपास ही घूमती थी। इन दोनों को देखकर कोई कह ही नहीं सकता था कि इन दोनों में खून का कोई रिश्ता नहीं है। प्रियंका में ऋषि की जान बसती है, अगर प्रियंका को कोई खरोच भी आती है, तो ऋषि दुनिया हिला देता है। पर जब दोनों एक साथ होते हैं ना, तो बच्चों की तरह लड़ते हैं, पर इन दोनों में प्यार भी उतना ही है। कौन कहता है दोस्ती का रिश्ता किसी रिश्ते से बड़ा नहीं होता? कोई देखे मेरे ऋषि और प्रियंका को, और फिर बोले कि दोस्ती का रिश्ता किसी रिश्ते से बड़ा नहीं होता।
आराध्य ने अपना फ़ोन लिया और टाइप किया:
आराध्य= बड़ी माँ, मैंने घर में ही आकर सारे रिश्तों को देखा है। मैं अनाथ हूँ, मुझे आज तक कभी किसी रिश्ते से समझ नहीं हुई। माँ का प्यार मुझे आपसे ही मिला है। ऋषि जी जैसा एक अच्छा साथी मिला, प्रियंका जैसी बहन, और देखना, एक दिन प्रियंका हम सबके साथ फिर से हँसेगी, खेलेगी।
दोनों बात ही कर रही थीं कि तभी निमो आई और बड़ी माँ से पूछती है:
निमो= बड़ी मालकिन, खाना तैयार है।
बड़ी माँ आराध्य का हाथ पकड़कर उठाती है और कहती है, "चलो, खाना खा लो।"
आराध्य कुछ सोचती है और बड़ी माँ से इशारों में कहती है कि आप चलिए, मैं आती हूँ।
बड़ी माँ प्रियंका के कमरे से चली जाती हैं। आराध्य अपना फ़ोन उठाती है और ऋषि को मैसेज टाइप करती है:
आराध्य= अपना खाना खाया?
ऋषि इस वक्त अपनी मीटिंग में होता है और उसका फ़ोन सूरज के हाथ में होता है। सूरज के हाथ में जब फ़ोन वाइब्रेट करता है, तो वह स्क्रीन पर मैसेज देखता है, ऊपर नाम आता है 'आराध्य'। मैसेज पढ़कर सूरज अपने मन में कहता है:
सूरज= मुझे तो भाभी जी बोलने भी नहीं देते! और खुद देखो, आराध्य की जगह आरू लिखते हैं।
फिर कुछ सोचकर अपने दिमाग को झटकता है और धीरे से ऋषि के कान में जाकर बोलता है: सर, घर से मैडम का मैसेज आ रहा है।
ऋषि जब यह सुनता है, तो वह अपना फ़ोन लेता है और उसमें आराध्य का मैसेज देखता है। वैसे तो अपनी मीटिंग में ऋषि का चेहरा एकदम कठोर और सख्त होता है, पर आराध्य का मैसेज देखकर उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ जाती है। अब उसका ध्यान मीटिंग में कहाँ लगना था? वह आराध्य को रिप्लाई करता है:
ऋषि= अभी मीटिंग चल रही है, जब खत्म होगी तब लंच करूँगा।
आराध्य यह मैसेज पढ़ती है और इसी को रिप्लाई करती है:
आराध्य= कब खत्म होगी आपकी मीटिंग?
ऋषि= 2 घंटे बाद।
आराध्य=😳😳 आप इतना लेट खाना खाते हैं?
ऋषि= कभी-कभी तो इतना बिज़ी होता हूँ कि लंच करने का भी टाइम नहीं मिलता।
आराध्य= ऐसे तो आपकी सेहत खराब हो जाएगी।
ऋषि= मैं बहुत स्ट्रांग हूँ, एक टाइम खाना ना खाने से मुझे कुछ नहीं होता।
आराध्य= आपको काम के बारे में ज़्यादा नहीं जानती, इसलिए कुछ नहीं बोलूँगी, पर प्लीज़ खाना टाइम पर खा लिया कीजिए।
ऋषि आराध्य का मैसेज पढ़कर मुस्कुरा देता है:
ऋषि= 😊ओके।
तभी मीटिंग में से किसी ने कहा, "मिस्टर नंदा, क्या हम यह डील फ़ाइनल समझे?"
🤭 बेचारे ऋषि ने तो कुछ सुना ही नहीं था! अब वह क्या बोले, उसे समझ में ही नहीं आ रहा है 🤦♂️🤦♂️। वह तो अपनी प्यारी बीवी के साथ चैटिंग करने में लगा हुआ था 😂😂।
बेचारा ऋषि बुरी तरह से फँसा हुआ था। उसने तो मीटिंग पर ध्यान ही नहीं दिया था। वह तो इस वक्त अपनी प्यारी बीवी के साथ चैटिंग करने में बिज़ी था 😄😄😄। ऋषि ने एक बार मीटिंग हॉल में सबको देखा और उसके बाद बेचारा सा मुँह बनाकर 🥺🥺 सूरज की तरफ़ देखा। सूरज ऋषि को देखकर समझ गया कि उसे मीटिंग का A B C कुछ भी नहीं पता चला 😄। सूरज मीटिंग में सबकी तरफ़ देखता है और कहता है:
सूरज= आपका प्रपोज़ल हमें काफ़ी पसंद आया, पर फ़िलहाल हम इसके बारे में और डिटेल्स के साथ बात करना चाहेंगे। हमें उम्मीद है कि आप लोगों को इसमें कोई प्रॉब्लम नहीं होगी। एक बार आपके प्रोडक्ट की सारी डिटेल्स हमारे पास आ जाएँ, फिर हम इसमें इन्वेस्ट करने का सोचेंगे।
मीटिंग हॉल में सभी इस बात से सहमत होते हैं। वे सभी आगे का वर्क प्रोसेस करने के लिए मीटिंग को यहीं पर खत्म करते हैं और मीटिंग हॉल से बाहर चले जाते हैं। उनके बाहर जाते ही ऋषि एक गहरी साँस लेता है और खुद से कहता है... "थैंक गॉड! आज तो सूरज ने संभाल लिया।" 😄😄😄
ऋषि अपने आप से ही बात कर रहा था कि इतने में मीटिंग हॉल का दरवाज़ा फिर से खुलता है और सूरज अंदर आता है। सूरज ऋषि से कहता है:
सूरज= सर, मिस्टर गौतम अग्रवाल की जो डिटेल्स आपने निकालने के लिए कही थीं, वह सारी इन्फ़ॉर्मेशन इस फ़ाइल में है।
सूरज की बात सुनकर ऋषि का चेहरा फिर से सख्त हो जाता है और वह सूरज से डिटेल्स पढ़ने के लिए कहता है।
सूरज एक फ़ाइल उठाता है और उसमें से गौतम की कंपनी की सारी डिटेल्स पढ़ता है:
सूरज= सर, Mr. अग्रवाल की टोटल 6 कंपनियाँ हैं। जिसमें से दो टेक्सटाइल में हैं, दो फ़ाइनेंसियल एंड मार्केटिंग में हैं, और एक उनका मुंबई में अपना खुद का फ़ाइव स्टार होटल है। और साथ ही साथ उनके पास एक केमिकल फैक्ट्री है। यह केमिकल फैक्ट्री उनकी अभी रिसेंटली स्टार्ट हुई है, करीब 3 महीने पहले। देखा जाए तो उनके बिज़नेस का सबसे ज़्यादा प्रॉफ़िट उन्हें फ़ाइनेंसियल और मार्केटिंग वाली कंपनी से ही मिलता है।
ऋषि इस वक्त गौतम के बिज़नेस की डिटेल्स पढ़ रहा था और उसका चेहरा सख्त होता जा रहा था। ऋषि अपनी कोल्ड आवाज़ में कहता है:
ऋषि= इसके अलावा कुछ ऐसा जो हमें जानना चाहिए?
सूरज= जी सर, इनकी सारी कंपनी के जो शेयरहोल्डर हैं, वह अलग-अलग फ़ील्ड से हैं, मतलब देखा जाए तो कोई भी इनकी कंपनी में प्रॉपर शेयरहोल्डर नहीं है, सिवाय एक के।
ऋषि= और वह कौन है?
सूरज= सर, वह तो नहीं पता चल रहा है। पर उनके ये शेयरहोल्डर्स उनके 60% शेयर के मालिक हैं। Mr. अग्रवाल की कंपनी में प्रॉफ़िट हो या लॉस, इनकी तरफ़ से Mr. अग्रवाल को हमेशा से ही सपोर्ट मिलता आया है।
ऋषि= ठीक है, पता करने की कोशिश करो कि यह शख्स कौन है। और गौतम अग्रवाल के जितने भी शेयरहोल्डर हैं, उनमें से सबसे ज़्यादा इक्विटी जिसकी भी है, उसके साथ मेरी मीटिंग फ़िक्स करो।
सूरज= जी सर।
सूरज के केबिन से जाने के बाद ऋषि अपनी कुर्सी को स्विंग करता है और पेपरवेट को अपने हाथ में घुमाते हुए कहता है:
ऋषि= गौतम अग्रवाल, तुम्हारी बर्बादी की शुरुआत तो उसी दिन कर दी थी मैंने, जिस दिन तुम्हारी शादी में घुसकर आराध्य से मैंने शादी की थी। इसी की वजह से तुम्हें तुम्हारे दादाजी की प्रॉपर्टी नहीं मिली थी। और अब धीरे-धीरे तुम्हारे सारे बिज़नेस को अंदर से खोखला कर दूँगा। जितनी तकलीफ़ तुम्हारी वजह से मेरे अपनों को हुई है, उससे कहीं ज़्यादा दर्द और तकलीफ़ मैं तुम्हें दूँगा। 😠😠।
ऐसे ही कुछ दिन बीत रहे थे। जहाँ एक तरफ़ ऋषि गौतम को बर्बाद करने की तैयारी कर रहा था, वहीं दूसरी तरफ़ आराध्य के साथ अपने रिश्ते की नई शुरुआत कर रहा था। ऋषि ने धीरे-धीरे साइन लैंग्वेज सीख ली थी, पर वह अभी उतना परफ़ेक्ट नहीं था। अभी भी आराध्य को अपनी बात सबको समझाने के लिए मैसेज की मदद लेनी पड़ती थी। पर ऋषि अब आराध्य के हैंड मूवमेंट्स को कुछ हद तक समझ पा रहा था। ऋषि के ऑफ़िस जाने के बाद आराध्य अपना ज़्यादातर समय प्रियंका के कमरे में ही बिताती थी। बड़ी माँ अब बहुत खुश थी कि आराध्य और ऋषि अपने रिश्ते में धीरे-धीरे बदलाव कर रहे हैं। पर कहीं ना कहीं उनके दिल के कोने में यह दुःख भी था कि प्रियंका कोमा में है। ऋषि ने प्रियंका के ट्रीटमेंट के लिए फिर से डॉक्टरों की एक नई फ़ौज खड़ी कर दी थी।
एक शाम, ऐसे ही आराध्य प्रियंका के कमरे में थी। वह प्रियंका की अलमारी में उसके कपड़े सेट कर रही थी कि तभी रूम का डोर ओपन होता है और ऋषि अंदर आता है। पहले वह आराध्य को देखता है, और फिर प्रियंका को।
ऋषि आराध्य से कहता है:
"तुम अकेली यहाँ क्या कर रही हो? नर्स कहाँ गई?"
आराध्य हाथों से इशारा करती है 👉👌🤟🤞 (नर्स को मैंने बाहर भेज दिया, सारा दिन यहाँ बैठी रहती है)।
ऋषि अब कुछ हद तक आराध्य के हैंड मूवमेंट्स समझने लगा था।
ऋषि= ठीक है।
आराध्य फिर इशारा करके पूछती है कि क्या वह उसके लिए कॉफ़ी लेकर आया है?
ऋषि= नहीं, उसकी ज़रूरत नहीं है। बस कुछ देर प्रियंका के पास बैठना चाहता हूँ।
आराध्य मुस्कुराकर फिर से अलमारी में अपना काम करने लगती है। ऋषि प्रियंका के पास आकर उसके बगल में बैठ जाता है। वह ड्रॉअर से एक नॉवेल निकालता है और उसे पढ़कर प्रियंका को सुनाने लगता है। पढ़ते-पढ़ते अचानक से ऋषि प्रियंका को देखता है जो कि उसके पढ़ने पर कोई रिएक्शन नहीं देती, बस ऐसे ही बेजान सी पड़ी रहती है। ऋषि की आँखों में अचानक से आँसू आ जाते हैं।
आराध्य ऋषि की आँखों में नमी को पहचान लेती है। वह धीरे से उसके पास आती है और उसके कंधे पर अपना हाथ रखती है।
ऋषि अपने आँसू पोछता है और आराध्य का हाथ पकड़कर उसे सामने बिठाता है और प्रियंका को देखते हुए कहता है...
ऋषि उस वक्त प्रियंका के कमरे में बैठा हुआ था। उसने एक हाथ से आराध्य का हाथ पकड़ा हुआ था और दूसरे हाथ से प्रियंका का। ऋषि प्रियंका की तरफ़ देखकर आराध्य से कहता है,
"पता है आराध्य, ये पागल मुझसे बहुत लड़ती थी। जब तक दिन में दो-चार बार मुझे परेशान ना कर ले, इसका खाना नहीं हज़म होता था। मैं इसे 'बिल्ली' बुलाया करता था। कभी शांत नहीं रहती थी, हमेशा बिल्ली की तरह उछलती-कूदती रहती थी। पर अब देखो, इतनी शांत है। पर ये शांत प्रियंका मुझे अच्छी नहीं लग रही। पहले की तरह क्यों नहीं हो जाती, मुझसे लड़ने वाली, मुझे परेशान करने वाली।"
आराध्य जब ऋषि की तरफ़ देखती है तो पाती है कि उसकी आँखों में नमी है। वो अपना दूसरा हाथ ऋषि के हाथ के ऊपर रखती है। ऋषि अब प्रियंका से हटकर आराध्य को देखता है। आराध्य अपना एक हाथ बढ़ाकर ऋषि की आँखों से आँसू पोछती है।
"आप परेशान मत होइए," आराध्य इशारों में कहती है, 🤟🖖🤞 "प्रियंका बिलकुल ठीक हो जाएगी। जब आपका और बड़ी माँ का प्यार इसके साथ है तो इसे कुछ नहीं होगा। और देखिएगा, एक दिन जल्दी ये पहले की तरह आपसे फिर लड़ेगी।"
ऋषि के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ जाती है और वो आराध्य से कहता है,
"तुम्हें यकीन है?"
आराध्य अपना सर हाँ में हिलाती है। 😊
ऋषि और आराध्य बात ही कर रहे थे कि इतने में ऋषि का फ़ोन बजता है। ऋषि फ़ोन लेकर बालकनी में चला जाता है। देखता है, सूरज का कॉल है। ऋषि कॉल रिसीव करता है,
"हाँ, बोलो सूरज, क्या बात है?"
"सर, मैंने पता करवा लिया है। Mr. गौतम अग्रवाल की कंपनी के 60% शेयर किसी 'जेपी' के नाम हैं।"
ऋषि कंफ़्यूज़ होकर पूछता है,
"जेपी? ये कौन है? पहले तो कभी इसका नाम नहीं सुना।"
"वो हमने इसलिए नहीं सुना क्योंकि हमारा क्राइम और अंडरवर्ल्ड से कोई लेना-देना नहीं है।"
ऋषि चौंकते हुए कहता है,
"मतलब...? कहना क्या चाहते हो सूरज?"
"'जेपी' इस वक़्त दुबई में रहता है और वहीं से अपने सारे इलीगल काम को करता है।"
"पर इसका गौतम से क्या लेना-देना? ये जेपी गौतम पर इतना मेहरबान क्यों है?"
"क्योंकि सर, Mr. गौतम अपने लीगल कामों के बीच जेपी के इलीगल कामों को अंजाम देता है।"
ऋषि हैरान होकर कहता है,
"क्या? गौतम अग्रवाल अंडरवर्ल्ड से जुड़ा हुआ है?"
"जी सर। गौतम अग्रवाल के जितने भी लीगल काम हैं, उन सब के पीछे वो जेपी के इलीगल कामों को अंजाम देता है। ड्रग्स रैकेट, हथियारों की तस्करी, ह्यूमन ट्रैफिकिंग, यहाँ तक कि प्रॉस्टिट्यूशन भी। ये सारे काम में गौतम जेपी के लिए करता है।"
ये सब सुनकर ऋषि बिलकुल शॉक में आ जाता है। उसे तो यही लगता था कि गौतम एक धोखेबाज़ और जालसाज इंसान है, लेकिन वो असल में इन सब चीज़ों से जुड़ा हुआ हो सकता है, ये उसने कभी सोचा भी नहीं था।
ऋषि सूरज से बात करके अपना फ़ोन पॉकेट में रखता है। उसके दिमाग में इस वक़्त यही बात चल रही होती है कि गौतम अंडरवर्ल्ड के लोगों से जुड़ा हुआ है, मतलब उसके बिज़नेस को बर्बाद करना इतना आसान नहीं होगा। वही सब सोच ही रहा होता है कि उसे फील होता है कि उसके कंधे पर किसी का हाथ है।
ऋषि चौंककर पीछे पलटकर देखता है तो पता चलता है कि आराध्य है। ऋषि आराध्य को देखकर घबरा जाता है कि कहीं उसने उसकी बात तो नहीं सुन ली। वो खुद को थोड़ा नॉर्मल करता है और नॉर्मल टोन में आराध्य से पूछता है,
"क्या हुआ?"
आराध्य ऋषि से इशारों में पूछती है, 🤞👌🖖
"आप इतनी देर से फ़ोन पर बात कर रहे थे, निमो आंटी दो बार खाने के लिए बोलकर गई हैं।"
"हाँ, ऑफ़िस में कुछ ज़रूरी बात चल रही थी। तुम चलो, मैं थोड़ी देर में आता हूँ।"
आराध्य वहाँ से चली जाती है। उसके जाते ही ऋषि प्रियंका के पास आता है और उसे देखते हुए कहता है,
"प्रियंका, मैंने गौतम की बर्बादी की शुरुआत कर दी है। बस अब इस काम को उसके अंजाम तक पहुँचाना है। और तुम देखना, बहुत जल्द गौतम अग्रवाल सड़क पर होगा।"
वो प्रियंका की बगल में बैठता है और उसे देखकर प्यार से कहता है,
"प्रियंका, मैं जो कह रहा हूँ, वो सही है ना?"
कोमा में पड़ी प्रियंका अपने दाहिने हाथ की तर्जनी उंगली को हल्का सा उठाती है, जो सिर्फ़ ऋषि ही देख सकता है।
ऋषि के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ जाती है और वो प्रियंका की तरफ़ देखकर कहता है, 😊
"तू इस हालत में भी मुझे परेशान करना बंद नहीं करती है। तेरी उंगली सिर्फ़ मेरे सामने ही उठती है। जब पहली बार तूने ऐसा किया था ना, तब मैंने डॉक्टर से कहा था कि तेरे हाथ में मूवमेंट हुई है, डॉक्टर ने इस बात को साफ़ मना कर दिया था। उसके बाद किसी ने भी तेरी इस उंगली को उठता हुआ नहीं देखा। तू ये बस मेरे लिए करती है ना, ताकि मुझे सही रास्ता दिखा सके। आराध्य के मामले में भी, जब मैंने तुझसे कहा था कि मैं गौतम जी की लड़की से शादी करने जा रहा हूँ, तब मैं कंफ़्यूज़ था, मैं सही कर रहा हूँ या गलत? तब मैंने तुझसे पूछा था कि क्या मैं जो करने जा रहा हूँ वो सही है या नहीं, तब भी तूने अपनी इस उंगली के इशारे से मुझे ये बताया था कि मैं सही कर रहा हूँ। तू हमेशा मुझे सही और गलत के बीच सही रास्ता दिखाती है। बहुत सारी बातें करनी हैं तुझसे, बहुत लड़ना है... ओ ये पागल बिल्ली, जल्दी उठ जाना।"
नीचे हॉल में सब डाइनिंग टेबल पर बैठे खाने की तैयारी कर रहे थे। आराध्य और निमो खाने की प्लेट लगा रही थीं। बड़ी माँ सोफ़े पर बैठी थीं। तभी सीढ़ियों से उतरता हुआ ऋषि नीचे आता है। वो अपनी चेयर पर बैठ जाता है। आराध्य सबको खाना सर्व करती है और उसके बाद वो भी अपनी चेयर पर बैठ जाती है। सब लोग अपना डिनर ख़त्म करते हैं और अपने-अपने रूम में चले जाते हैं।
आराध्य रूम में जाती है और अपने लिए कम्फ़र्टेबल कपड़े निकालकर बाथरूम में चली जाती है। ऋषि जब रूम में आता है तो उसे बाथरूम से पानी गिरने की आवाज़ आती है। उसे पता होता है कि आराध्य रात में सोने से पहले नहाती है। वो अपना लैपटॉप लेता है और सोफ़े पर बैठ जाता है। थोड़ी देर बाद बाथरूम का दरवाज़ा बंद होता है। आराध्य अपने बाल टॉवल से पूछते हुए बाहर आती है और सीधी ड्रेसिंग टेबल के पास चली जाती है।
आराध्य अपने बाल टॉवल से झटकती है, जिससे उसके बालों का पानी ऋषि के ऊपर बारिश की बूँदों की तरह आता है। ऋषि घूरकर आराध्य को देखता है। आराध्य को देखते ही उसकी साँसें ही अटक जाती हैं। आराध्य बिलकुल फ़्रेश लग रही होती है। ऋषि जब आराध्य को देखता है तो देखता ही रह जाता है।
आराध्य जब पलटकर ऋषि को देखती है तो पाती है कि ऋषि उसे ही घूर रहा है। ऋषि बिना पलक झपकाए आराध्य को लगातार देख रहा होता है। आराध्य धीरे से ऋषि के पास आती है, अपना हाथ उसके आँखों के सामने हिलाकर उसे होश में लाती है।
ऐसा करने से ऋषि हड़बड़ा जाता है और वो आराध्य को एकटक देखने लगता है, जैसे कि उसकी कोई चोरी पकड़ी गई है। 🥺🥺
आराध्य जब पलटकर ऋषि को देखती है, तो पाती है कि ऋषि उसे ही घूर रहा है। ऋषि बिना पलक झपकाए आराध्य को लगातार देख रहा था। आराध्य धीरे से ऋषि के पास आती है और अपना हाथ उसके आँखों के सामने हिलाकर उसे होश में लाने की कोशिश करती है।
ऐसा करने पर ऋषि हड़बड़ा जाता है और आराध्य को एकटक देखने लगता है, जैसे कि उसकी कोई चोरी पकड़ी गई हो। 🥺🥺
आराध्य के हाथ हिलने से ऋषि होश में आता है। तब उसे रियलाइज़ होता है कि वह क्या कर रहा था। आराध्य अब भी थोड़ी शर्माई हुई सी उसके सामने खड़ी थी। आराध्य ने इशारों से पूछा 👉🤟, "आप ऐसे क्यों घूर रहे हैं? और कहाँ देख रहे थे?"
ऋषि को लगा कि उसकी चोरी पकड़ी गई है। उसने हड़बड़ाते हुए कहा, "मैं कहाँ देखूँगा... हाँ, वो सामने पेंटिंग है, उसे देख रहा था। काफ़ी अच्छी पेंटिंग है।"
🤭🤭🤭 बेचारा ऋषि, रोमांस का भी नहीं आता, कम से कम बहाना तो अच्छा बनाता 😛😛
आराध्य ऋषि को ऐसे देख रही थी जैसे किसी बेवकूफ़ को देख रही हो 🤨। आराध्य मन में सोचती है, "पेंटिंग देख रहे थे? रूम तो इन्हीं का है 🤨"
ऋषि को जब लगा कि उसका बहाना बकवास है, तो वह उठकर सीधा बाथरूम में चला गया। आराध्य बस उसे जाते हुए देख रही थी। ऋषि बाथरूम में दरवाज़ा लॉक करके, अपने सीने पर हाथ रखकर शीशे के सामने खड़ा होकर खुद से कहता है:
ऋषि= ये क्या हो गया था मुझे? और ये मेरा दिल इतनी ज़ोर से क्यों धड़क रहा है? आराध्य के सामने ऐसे बच्चों वाली हरकत कर रहा था... पेंटिंग... ऐसा फ़ालतू बहाना कौन देता है? कसम से, करोड़ों की डील करना आसान है, पर बीवी के सामने बहाना बनाना बहुत मुश्किल है। आराध्य क्या सोच रही होगी मेरे बारे में?
थोड़ी देर बाद जब ऋषि वापस रूम में आता है, तो देखता है कि आराध्य अपनी साइड सो गई है। वह भी लाइट ऑफ करके अपनी साइड सो जाता है।
दिलों की दूरियाँ तो धीरे-धीरे कम हो रही थीं, पर इनके बेड के बीच अभी भी काफ़ी दूरी थी।
अगली सुबह ऋषि को अपने कानों में शोर सुनाई देता है। वह परेशान होकर एक तकिया अपने कान में लगा लेता है, पर शोर फिर भी कम नहीं होता। ऋषि की नींद खराब हो रही होती है, तो वह इर्रिटेट होकर उठता है, यह देखने के लिए कि किसने उसकी नींद खराब की... पर जब अपने सामने आराध्य को देखता है, तो बस देखता ही रह जाता है 😳।
आराध्य ने एक सुंदर सी साड़ी पहनी हुई थी और पूरा श्रृंगार किया हुआ था। जो चीज़ ऋषि को परेशान कर रही थी, वह थी आराध्य की चूड़ियों की खनखन और पायल की छनछन।
ऋषि की धड़कन एक बार फिर से तेज़ हो गई थी ❤। वह आराध्य को बिना पलक झपकाए देख रहा था। ऋषि को इस तरह खुद की तरफ़ देखता हुआ पाकर आराध्य थोड़ी अनकम्फ़र्टेबल हो रही थी।
दोनों अपनी हालत से जूझ ही रहे थे कि तभी दरवाज़े का डोर नॉक होता है। आराध्य जल्दी से जाकर दरवाज़ा खोलती है। सामने निमो खड़ी होती है, उसके हाथ में एक कॉफ़ी की ट्रे होती है।
निमो आती है और आराध्य से कहती है, "बहुरानी, बड़ी मालकिन आपको नीचे बुला रही हैं। जल्दी आ जाइए, सब तैयारियाँ हो गई हैं।"
आराध्य निमो के हाथ से कॉफ़ी की ट्रे लेकर उसे धन्यवाद का इशारा करती है।
निमो वहाँ से चली जाती है। आराध्य कॉफ़ी लेकर ऋषि के पास आती है और उसके सामने कॉफ़ी की ट्रे रखती है। ऋषि कॉफ़ी लेता है और आराध्य से पूछता है:
ऋषि= इतनी सुबह तैयार होकर कहाँ जा रही हो?
आराध्य इशारों में कहती है कि उसे बड़ी माँ ने कहा है तैयार होने के लिए।
ऋषि अपनी कॉफ़ी पी रहा होता है और इतने में आराध्य ऋषि के कपड़े निकालकर रख देती है, उसका ऑफ़िस का लैपटॉप और फ़ाइल समेटकर उसके बैग में डाल देती है और साथ ही उसकी घड़ी, पर्स और मोबाइल को भी एक जगह रख देती है।
ऋषि को अब इन सबकी आदत हो गई थी, आराध्य उसके लिए यह रोज़ करती थी।
आराध्य ऋषि का सारा सामान समेटकर नीचे चली जाती है।
थोड़ी देर बाद जब ऋषि रेडी होकर नीचे आता है, तो देखता है...
बड़ी माँ हॉल में आराध्य के साथ कुछ तैयारियाँ कर रही हैं।
ऋषि उनके पास आकर बैठता है और पूछता है:
ऋषि= बड़ी माँ, यह सब क्या है?
बड़ी माँ= अरे, आज एकादशी है, तो मैंने सोचा क्यों ना बहु के हाथ से मंदिर में दान करवा दूँ। (बड़ी माँ थोड़ा परेशान होकर ऋषि की तरफ़ देखती है और कहती है) ऋषि, मैंने तुमसे पूछा तो नहीं कि क्या मैं आराध्य को लेकर मंदिर जाऊँ?
ऋषि= बड़ी माँ, आपको यह सब पूछने की क्या ज़रूरत है? आप घर की बड़ी हैं, और आराध्य के लिए कोई भी फ़ैसला लेने के लिए आपको मुझसे पूछने की ज़रूरत नहीं है। आपकी बहु है, आप जैसे चाहो वैसे करो।
ऋषि वहाँ से सीधे डाइनिंग टेबल पर जाकर बैठ जाता है। निमो उसे ब्रेकफ़ास्ट सर्व करती है, पर जब ऋषि देखता है कि कोई और ब्रेकफ़ास्ट टेबल पर नहीं है, तो वह फिर से बड़ी माँ से पूछता है:
ऋषि= बड़ी माँ, आप लोग ब्रेकफ़ास्ट क्यों नहीं कर रहे हैं?
बड़ी माँ= मेरा और आराध्य का व्रत है आज एकादशी का। हम लोग पूजा करके शाम को ही कुछ खाएँगे।
ऋषि ने एक बार आराध्य की तरफ़ देखा, और फिर अपने सामने पड़ी प्लेट की तरफ़ देखा जिसमें पोहा था।
ऋषि ने पोहे की प्लेट हटाते हुए निमो से कहा, "आंटी, मुझे अभी भूख नहीं लगी है, मैं ऑफ़िस में कुछ खा लूँगा।"
ऋषि बाहर आता है और सिक्योरिटी हेड से कहता है, "सब मंदिर जा रहे हैं, बी केयरफ़ुल। वहाँ भीड़ होगी, तो एक मिनट के लिए भी अपनी नज़र उन लोगों के ऊपर से मत हटाना।"
सिक्योरिटी हेड कहता है, "डोंट वरी सर, मैंने गार्ड्स को पहले ही कह दिया है, वो लोग मंदिर में अलर्ट पर हैं।"
ऋषि वहाँ से ऑफ़िस के लिए निकल जाता है और आराध्य बड़ी माँ के साथ मंदिर के लिए निकल जाती है।
आराध्य और बड़ी माँ मंदिर पहुँचीं। वहाँ पूजा की सारी तैयारी पहले से ही हो रखी थी।
बड़ी माँ ने आराध्य के हाथ से ही पूजा करवाई। पूजा करके आराध्य बड़ी माँ के पास आई, तो बड़ी माँ और आराध्य मंदिर के आँगन में सबको दान दे रही थीं। थोड़ी देर बाद बड़ी माँ ने आराध्य से कहा:
"आराध्य, तुम यहाँ दान का काम देख लो, मैं तब तक मंदिर के अंदर आती हूँ।"
आराध्य ने हाँ में सर हिलाया। बड़ी माँ ने गार्ड को वहाँ छोड़कर चली गईं।
आराध्य सबको दान देकर जाने वाली थी, तभी उसने देखा कि एक साधु उसे ही देख रहा है। आराध्य उनके पास गई और जब वह साधु को दान देने लगी, तो वह साधु उसे देखकर मुस्कुराकर बोला:
"बेटी, मुझे ये नहीं चाहिए।"
तभी एक गार्ड आकर साधु से बोला:
"बाबा जी, अगर दान नहीं चाहिए तो मैडम को परेशान मत करो।" फिर आराध्य से कहा, "चलिए मैडम, बड़ी मैडम ने कहा है यहाँ काम खत्म करके आपको उनके पास ले जाऊँ।"
आराध्य गार्ड की बात सुनकर गार्ड के साथ जाने लगी, तभी पीछे से आवाज़ आई:
"तुम यहाँ अपने भाग्य से आई हो..."
यह सुनकर आराध्य रुक गई और पीछे देखा तो वही साधु आराध्य से यह कह रहा था। आराध्य उनके पास आई और आश्चर्य से देखने लगी। साधु ने आगे कहा:
"हाँ बेटा, तुम जहाँ हो, वहाँ अपने भाग्य से आई हो। तुम्हारी किस्मत तो कुछ और होनी थी, पर हुई यह है। पर जो तुम्हें मिला है वह बहुत कीमती है, इसे संभालकर रखना। क्योंकि भविष्य में यह सब तुमसे छीन लेने की कोशिश की जाएगी। आने वाले समय में तुम्हें बहुत सी मुश्किलों से सामना करना है, जीवन आसान नहीं होगा तुम्हारा, बस खुद पर यकीन रखना।"
आराध्य की बात सुनकर थोड़ी परेशान हो गई। वह कुछ सोच ही रही थी कि बड़ी माँ पीछे से आराध्य को आवाज़ दी:
"आराध्य, यहाँ सब हो गया या कुछ बाकी है?"
आराध्य ने बड़ी माँ को देखकर इशारों में बताया कि यहाँ सब हो गया है।
"अच्छा, ठीक है। सब काम हो गया तो चलो घर चलते हैं।"
आराध्य ने हाँ में सर हिलाया। फिर पलटकर देखा तो वह साधु ध्यान में थे। आराध्य उन्हें देखती रही, फिर वहाँ से चली गई। पूरे रास्ते आराध्य के मन में साधु की कही बातें चलती रहीं।
शाम को जब ऋषि घर आया तो सबने खाना खा लिया था। ऋषि ने यह बात नोटिस की कि आराध्य का मन खाने में नहीं था।
ऋषि जब रूम में आया तो देखा आराध्य बालकनी में थी। ऋषि उसके पास गया और पूछा:
"क्या बात है? कुछ परेशान लग रही हो।"
आराध्य ने ना में सर हिलाया और अपने चेहरे पर जबरदस्ती की मुस्कान लाने की कोशिश की।
आराध्य और ऋषि बालकनी में बैठे थे। ऋषि के यह पूछने पर कि आराध्य परेशान क्यों है, आराध्य ने ऋषि की तरफ़ देखा। उसने अपने चेहरे पर जबरदस्ती की मुस्कान लाई और अपना सर ना में हिलाया कि वह परेशान नहीं है।
ऋषि ने एक तिरछी मुस्कान के साथ आराध्य की तरफ़ देखा और कहा, "आराध्य, तुम्हें झूठ बोलना नहीं आता। तुम्हारे चेहरे पर साफ़ दिख रहा है कि तुम किसी बात से बहुत परेशान हो। बताओ मुझे, क्या बात है?"
आराध्य की चोरी पकड़ी गई थी। उसने पास में रखा अपना फ़ोन उठाया और नोटपैड में टाइप करके ऋषि को दिया। ऋषि ने वह नोटपैड पढ़ा। आराध्य ने उस नोटपैड में मंदिर में जो कुछ भी हुआ था, वह सब ऋषि को बता दिया था। वह पढ़ने के बाद ऋषि ने आराध्य का फ़ोन टेबल पर रखा और उसका हाथ पकड़कर उसे पास में रखी चेयर पर बिठाया और उसके सामने बैठकर उसकी आँखों में देखकर कहा:
"तो क्या तुम इन सब बातों पर यकीन करती हो?"
आराध्य (इशारों में): "पहले नहीं करती थी, क्योंकि पहले मेरे पास खोने के लिए कुछ भी नहीं था। पर अब मेरे पास मेरी जान से बढ़कर कीमती रिश्ते हैं, और मैं इन रिश्तों को खोना नहीं चाहती।"
यह बोलते वक़्त आराध्य की आँखें छलक आई थीं। 🥺
ऋषि ने अपना एक हाथ बढ़ाया और आराध्य के आँसू पोछे। और उसके दोनों गालों को अपने हाथों में भरकर उसकी तरफ़ बहुत प्यार से देखकर कहा:
"आराध्य, सबसे पहले रोना बंद करो। अब मेरी बात ध्यान से सुनो... देखो आराध्य, सुख-दुःख, जीना-मरना, यह सब हमारे हाथ में नहीं होता है। इंसान बस यह कर सकता है कि जितना वक़्त वह अपनों के साथ है, खुशी से बिताए। मैं यह तो नहीं कहता कि हम हमेशा साथ रह सकते हैं, हो सकता है ज़िन्दगी में कभी मेरा तुमसे साथ छूट जाए..."
जैसे ही ऋषि ने यह कहा, आराध्य ने उसके मुँह पर हाथ रख दिया और नम आँखों से देखते हुए अपना सर ना में हिलाया।
ऋषि ने उसका हाथ हटाया और अपने हाथ में लेते हुए कहा... 😊
"ज़्यादा मत सोचो। भविष्य में क्या होगा हम नहीं जानते, पर मैं तुमसे वादा करता हूँ, मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा। अगर तुम दूर भी जाना चाहोगी तो मैं जाने नहीं दूँगा। और जहाँ तक बात रही ज़िन्दगी में कठिन समय की, तो हम साथ मिलकर मुक़ाबला करेंगे उस समय 😊☺️"
आज दोनों अपने आने वाले भविष्य की बात कर रहे थे। भले ही इन बातों में कहीं यह ज़िक्र नहीं था कि वे दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं, पर कुछ अहसासों को शब्दों की ज़रूरत नहीं होती। दोनों ने सारी ज़िन्दगी साथ रहने का और खुश रहने का वादा किया था... आराध्य ऋषि के कंधे पर आराम से सर रखकर चाँद को देख रही थी। ऋषि ने अपने एक हाथ से आराध्य का हाथ थामा हुआ था, तो दूसरा हाथ उसके कंधे पर था।
आज पहली बार ऋषि और आराध्य एक-दूसरे के इतने करीब थे। दोनों को अहसास ही नहीं था कि वे दोनों एक-दूसरे की बाहों में बैठकर चाँद को देख रहे हैं!
ऋषि और आराध्य एक-दूसरे की बाहों में बैठकर चाँद को देख रहे थे। थोड़ी देर बाद ऋषि को अपने कंधे पर कुछ भारी सा महसूस हुआ। उसने देखा, आराध्य गहरी नींद में सो चुकी थी। ऋषि धीरे से मुस्कुराया 😊। उसने भी धीरे से आराध्य का हाथ हटाया और उसे अपनी बाहों में उठाकर बेडरूम में ले गया। ऋषि ने आराध्य को धीरे से बेड पर लिटाया। पर जैसे ही वह वहाँ से उठने वाला था, आराध्य ने उसकी टी-शर्ट पकड़ ली थी। आराध्य ने उसकी टी-शर्ट बहुत ज़ोर से पकड़ी हुई थी। ऋषि चाहता तो उसके टी-शर्ट को आसानी से छुड़ा सकता था, लेकिन न जाने क्यों वह ऐसा नहीं कर सका। वह वैसे ही आराध्य के बगल में लेट गया। आज पहली बार था कि ऋषि और आराध्य के बीच तकिये का फैसला नहीं था। उस अंधेरे कमरे में एक हल्की पीली रोशनी में आराध्य का चेहरा चाँद सा चमक रहा था। ऋषि लगातार आराध्य के मासूम से चेहरे को देखे जा रहा था। उसके चेहरे पर ना-दिखने वाली हल्की सी मुस्कान थी। तभी अचानक से आराध्य ने करवट ली और उसका चेहरा ऋषि के सीने में छुप गया। ऋषि को अपने सीने में आराध्य की साँसें महसूस हो रही थीं।😳 वह अचानक से बहुत घबरा गया और उसके दिल की धड़कन 100 की स्पीड से दौड़ने लगी ❤।
ऋषि ने जैसे-तैसे खुद को संभाला और वह आराध्य से थोड़ा पीछे हटने वाला था कि उसने देखा आराध्य ने उसकी टी-शर्ट अभी भी पकड़ी हुई है। ऋषि ने पहली बार महसूस किया कि आराध्य की बॉडी से एक हल्की सी, भीनी-भीनी खुशबू आती है। ऋषि ने अपना हाथ बढ़ाया और जिस हाथ से आराध्य ने उसकी टी-शर्ट पकड़ी हुई थी, ऋषि ने उसी हाथ को पकड़कर वैसे ही लेटा रहा। यह पहली बार था जब दोनों एक-दूसरे की साँसों को महसूस कर पा रहे थे। जहाँ आराध्य की साँसें ऋषि के सीने पर टकरा रही थीं, वहीं ऋषि की साँसें आराध्य के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान के साथ जा रही थीं 😊।
अगली सुबह, रोज़ की तरह आराध्य की आँख पहले खुली। उसने पाया कि उसकी कमर पर कुछ भारी सा वज़न रखा हुआ है। उसने अपनी आँखें खोली और उठने की कोशिश की तो पता चला कि ऋषि का हाथ उसकी कमर पर था। यह देखकर आराध्य एक पल के लिए हैरान हो गई कि वह ऋषि के इतने करीब कैसे आ गई। आराध्य ने हल्के हाथ से ऋषि का हाथ हटाने की कोशिश की, लेकिन ऋषि का भारी-भरकम हाथ आराध्य के एक हाथ से नहीं उठ रहा था। उसने दोनों हाथों से ऋषि का हाथ हटाने की कोशिश की। इतने में ऋषि नींद में ही कसमसाता हुआ आराध्य को और टाइट पकड़ लेता है और इर्रिटेट होकर कहता है 😠, "क्या यार! परेशान मत करो, सोने दो।"
आराध्य का तो यह सुनकर जैसे मानो दिन में तारे ही नज़र आ रहे थे! एक तो ऋषि ने उसे इतने ज़ोर से पकड़ लिया था, और दूसरे अपने चेहरे को उसके गाल पर रगड़कर अपनी गरम साँसें उसके गाल पर छोड़ रहा था। आराध्य को तो इस वक़्त 440 वोल्ट के झटके लग रहे थे। 🤭🤭
अब आराध्य का दिल 100 की स्पीड से दौड़ रहा था। जब उसे लगा कि उसका दिल फटकर बाहर ही आ जाएगा और अब उसे यहाँ रुकना बर्दाश्त नहीं होगा, तो वह जैसे-तैसे कसमसाते हुए ऋषि की बाहों से छूटकर तुरंत वाशरूम में भाग गई।
आराध्य जल्दी से फ्रेश होकर वापस रूम में आई तो देखा ऋषि अभी भी वैसे ही सो रहा है। वह जल्दी से ड्रेसिंग टेबल पर गई और अपना श्रृंगार करके रेडी होकर जल्दी से नीचे पहुँच गई।
रोज़ की तरह बड़ी माँ आज भी पूजा मंदिर में ही कर रही थीं। आराध्य सीधे उनके पास गई। बड़ी माँ ने आराध्य को देखा और उनसे पूछा:
"क्या बात है आराध्य? आज कुछ चमक मार रही हो! ऐसा क्या हो गया?"
आराध्य सुबह की बात याद करती है और उसका चेहरा फिर से गुलाबी हो जाता है। वह शर्म से अपनी नज़रें झुका लेती है और ना में सर हिलाती है।
आराध्य का लाल पड़ा चेहरा देखकर बड़ी माँ समझ जाती हैं कि कुछ तो बात है। पर वह इस वक़्त आराध्य को परेशान नहीं करना चाहती थीं 🤭। इसीलिए वह चुप रहीं। सबने मिलकर पूजा की। थोड़ी देर बाद सब डाइनिंग टेबल पर मौजूद थे। तभी ऋषि डाइनिंग टेबल पर आकर बैठ जाता है।
आज तो उसकी भी हिम्मत नहीं हो रही थी आराध्य से नज़रें मिलाने की। वह रात वाला इंसिडेंट याद करके उसका भी चेहरा लाल हो रहा था 😛।
बड़ी माँ ने जब ऋषि को देखा, तो उसके भी चेहरे पर लाली देखकर वह समझ गई कि कुछ तो गड़बड़ है। बड़ी माँ ने ऋषि से पूछा:
"क्या बात है ऋषि? तुम दोनों ने क्या कोई नया क्रीम लगाया है?"
बड़ी माँ के सवाल पर ऋषि आश्चर्य से उन्हें देखता है। उसे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था।
"नहीं तो बड़ी माँ! पर आप ऐसा क्यों पूछ रही हैं?"
"अरे, सुबह से ही देख रही हूँ, आराध्य का चेहरा भी लाल हो रहा है, तुम्हारा चेहरा भी लाल हो रहा है। गोरा करने वाली क्रीम तो मार्केट में बहुत हैं, पर यह लाल करने वाली कौन सी क्रीम है 😛😛?"
बड़ी माँ के सवाल पर ऋषि और आराध्य दोनों शर्मा जाते हैं। आराध्य जल्दी से भागकर किचन में चली जाती है और ऋषि जल्दी से अपना बैग उठाकर कहता है, "मेरी एक इम्पॉर्टेन्ट मीटिंग है, मैं शाम को मिलता हूँ।"
दोनों के जाने के बाद बड़ी माँ खिलखिलाकर हँसने लगती हैं। तो निमो उनके पास आती है और पूछती है, "अरे मालकिन! ऐसा क्या कह दिया आपने कि यह दोनों भाग गए?"
निमो के सवाल पर बड़ी माँ कहती हैं, "कुछ तो हुआ होगा, तभी तो दोनों लाल हुए पड़े हैं 🤭🤭। मैं तो बस यही चाहती हूँ कि माता रानी इन दोनों की जोड़ी ऐसे ही बनाए रखे 🙏।"
ऋषि अपने ऑफिस में बैठा एक फाइल पर काम कर रहा था। तभी उसके केबिन का दरवाज़ा खटखटाया। ऋषि बिना उस तरफ़ देखे कहा, "अंदर आइए।" दरवाज़ा खुला और सूरज अंदर आया। वह ऋषि के सामने आकर एक फाइल बढ़ाते हुए बोला:
सूरज: सर, ख़बर मिली है Mr. गौतम अग्रवाल, जो लंदन में किसी बिज़नेस कॉन्फ़्रेंस के लिए गए थे, वह वापस इंडिया आ गए हैं। मैंने उनके सारे वेंडर्स से बात की है, वे सब हमारे साथ काम करने के लिए रेडी हैं। आगे क्या करना है?
ऋषि यह सुनकर उसके चेहरे पर एक शैतानी सी मुस्कान आ गई। वह कुछ सोचा और फिर सूरज से कहा:
ऋषि: गुड जॉब! एक काम करो, उनके जितने भी वेंडर्स हैं, उनके साथ एक साथ मीटिंग फ़िक्स करवाओ। जब गौतम के सारे प्रोजेक्ट एक साथ उसके हाथ से जाएँगे ना, तब देखना कैसे बौखलाता है वो।
सूरज: जी सर, मैंने यह काम पहले ही कर दिया है। कल आपकी उन सभी वेंडर्स के साथ मीटिंग है।
ऋषि: द ग्रेट! कल की मीटिंग की सारी तैयारियाँ एक साथ रेडी रहनी चाहिए। हमारा प्रपोज़ल ऐसा होना चाहिए कि वे लोग गौतम के साथ काम करने के बारे में सोचें भी ना।
कुछ सोचते हुए ऋषि फिर सूरज से कहा:
ऋषि: सूरज, कल की मीटिंग की जितनी भी डिटेल्स हैं, वे सब तुम मुझे पर्सनल ईमेल करोगे। मैं कल की मीटिंग में कोई भी गलती नहीं देखना चाहता।
सूरज: जी बॉस, मैं हैंडल कर लूँगा।
सूरज फिर ऋषि के केबिन से बाहर चला गया।
ऋषि अपने चेयर पर पीठ दिखाकर आसमान की तरफ़ मुँह करके और अपनी आँखें बंद करके किसी गहरी सोच में डूबा हुआ था।
ऋषि (खुद से): बस एक दिन और, Mr. गौतम अग्रवाल! कल देखना कैसे मैं तुम्हारी रीढ़ की हड्डी तोड़ता हूँ!
शाम का वक़्त था। ऋषि के मेंशन में आराध्य, प्रियंका के कमरे में थी। वह प्रियंका के पिल्लो में कुशन सेट कर रही थी। आराध्य बेड के कोने पर बैठी, कभी पिल्लो में कुशन सेट करती, तो कभी प्रियंका को देखकर मुस्कुराती। आराध्य ने पिल्लो को आराम से प्रियंका के सर के नीचे सेट किया और उसके सर पर हाथ फेरते हुए मन में सोचने लगी:
आराध्य (मन ही मन): प्रियंका, मैं ज़्यादा तो नहीं जानती तुम्हारे बारे में, पर इतना जानती हूँ कि तुम बड़ी माँ और ऋषि जी के लिए बहुत मायने रखती हो। वे दोनों तुम्हें ऐसा देखकर बहुत दुखी होते हैं। अपने लिए ना सही, उनके लिए ही इस नींद की दुनिया को छोड़कर वापस आने की कोशिश करो।
आराध्य ने धीरे से अपना एक हाथ प्रियंका के हाथ पर रखा। तभी उसे कुछ महसूस हुआ। उसने अपने हाथ की तरफ़ देखा तो पाया कि प्रियंका की उंगलियों में मूवमेंट हो रहा था।
आराध्य यह देखकर चौंक गई। वह जल्दी से बेड से उतरकर दरवाज़े की तरफ़ भागी नर्स को बुलाने के लिए। पर जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला और बाहर जाने की कोशिश की, ऋषि से बहुत बुरी तरह से टकरा गई।
ऋषि ने उसे बहुत जल्दबाजी में संभाला। आराध्य लगभग गिरते-गिरते बची थी।
ऋषि ने उसे संभालते हुए खड़ा किया। आराध्य के चेहरे पर डर साफ़ दिख रहा था। ऋषि ने उसे देखकर कहा:
ऋषि: अरे! संभालकर! कहाँ भाग रही हो? तुम्हारे चेहरे पर हवाएँ उड़ रही हैं। क्या हुआ?
आराध्य ऋषि को देखती है और खुद को नॉर्मल करते हुए जल्दी से प्रियंका की तरफ़ इशारा करते हुए कुछ कहने की कोशिश करती है।
ऋषि: प्रियंका को कुछ हुआ है क्या?
आराध्य हाँ में अपना सर हिलाई।
ऋषि जल्दी से भागकर प्रियंका के पास गया। उसने प्रियंका को पूरा चेक किया, पर वह उसे ठीक नज़र आई। ऋषि फिर आराध्य की तरफ़ देखकर बोला:
ऋषि: ठीक तो है! अब क्या हुआ इसे?
आराध्य प्रियंका की तरफ़ हाथ इशारा करके बताया कि उसकी उंगलियाँ मूवमेंट कर रही थीं।
ऋषि यह सुनकर चौंक गया, क्योंकि प्रियंका उसके अलावा और किसी के सामने अपने हाथों में मूवमेंट नहीं करती थी।
ऋषि: तुमने प्रियंका के फ़िंगर में मूवमेंट देखी है?
आराध्य अपना सर हाँ में हिलाई और कहा कि वह नर्स को बुलाकर ला रही है।
ऋषि: उसकी कोई ज़रूरत नहीं है।
आराध्य चौंककर ऋषि को देखती है।
ऋषि: नर्स को बुलाने की कोई ज़रूरत नहीं है, क्योंकि यह बस मुझे परेशान करती है। मैंने भी जब पहली बार इसके हाथों में मूवमेंट देखी थी तो मैंने भी डॉक्टर को बुलाया था। पर उन सबका एक ही कहना था कि इम्पॉसिबल है। उसके बाद जब भी इसके हाथ मूव किए हैं, मेरे सामने ही किए हैं। और आज तुम्हारे सामने। डॉक्टर, नर्स सबके सामने यह ऐसे ही पड़ी रहती है। इसकी बॉडी में कोई मूवमेंट नहीं होती।
आराध्य ने अपने हाथों से पूछा कि क्या ऋषि को पहले से मालूम था कि प्रियंका के हाथों में मूवमेंट होती है?
ऋषि: हाँ, मुझे पहले से ही पता था, क्योंकि यह बस मेरे सामने ही अपने हाथ हिलाती है। पर मैंने यह बात बड़ी माँ को नहीं बताई, वरना उन्हें एक उम्मीद बंध जाती प्रियंका को लेकर। और अगर कभी प्रियंका होश में नहीं आई तो उनकी यह उम्मीद टूट जाएगी।
आराध्य ने धीरे से ऋषि के कंधे पर अपना हाथ रखा और उसे इशारों में कहा कि प्रियंका एक दिन होश में ज़रूर आएगी।
ऋषि ने भी आराध्य को देखकर एक प्यारी सी स्माइल की।
दोनों प्रियंका को देखकर नीचे डिनर करने चले गए। डिनर करके जब सब अपने रूम में गए, तो ऋषि ने आराध्य की तरफ़ एक पेपर बढ़ाया:
ऋषि: आराध्य, इस पर साइन कर दो।
आराध्य पेपर लेकर देखती है तो एकदम चौंक जाती है। वह हैरानी से ऋषि की तरफ़ देख रही होती है, जैसे पूछ रही हो कि वह सच में चाहता है कि आराध्य इस पेपर पर साइन करे। ऋषि ने उसकी आँखों की भाषा समझकर एक कोल्ड एक्सप्रेशन के साथ कहा, "हाँ, मैं चाहता हूँ कि तुम इस पर साइन करो।"
आराध्य ने जब वह फ़ॉर्म देखा तो ऋषि की तरफ़ हैरानी से देखने लगी।
ऋषि: ऐसे क्या देख रही हो? तुम्हें अपनी आगे की पढ़ाई पूरी नहीं करनी? तुम्हारे कॉलेज का फ़ॉर्म है। जल्दी से साइन करो।
आराध्य ने इशारों से पूछा, "आपको कैसे पता कि मेरी कॉलेज की पढ़ाई पूरी नहीं हुई है?"
ऋषि: मैंने सूरज से बोलकर पता करवाया था। उसी ने मुझे बताया कि तुम्हारी पढ़ाई अधूरी है। और यह भी बताया कि तुम्हें लिटरेचर पढ़ना था, राइटर बनना था?
आराध्य ने अपना सर हाँ में हिलाया। उसने जल्दी से पेन उठाया और उस पेपर पर साइन कर दिए। साइन करके वह पेपर आराध्य ने ऋषि की तरफ़ बढ़ा दिया। ऋषि ने वह पेपर लिया और अपनी फ़ाइल में रख दिया।
ऋषि आराध्य की तरफ़ मुड़ा और उसने कहा, "मंडे से टीचर आ जाएँगे, वे तुम्हारी स्टडी में तुम्हारी हेल्प करेंगे।"
आराध्य ने ऋषि को देखकर हल्का सा मुस्कुरा दिया।
अगली सुबह... आज का दिन ऋषि के लिए बहुत खास था, क्योंकि आज गौतम के सारे वेंडर्स के साथ उसकी बहुत इम्पॉर्टेन्ट मीटिंग थी।
ऋषि जल्दबाजी में घर से निकल रहा था। आराध्य ने उसे रोकते हुए नाश्ते के लिए कहा:
आराध्य: ऋषि जी, नाश्ता...
ऋषि: नहीं, मेरी बहुत इम्पॉर्टेन्ट मीटिंग है, मैं नाश्ता नहीं करूँगा। तुम टेंशन मत लेना, मैं ऑफ़िस में कुछ खा लूँगा।
ऋषि जल्दबाजी में घर से निकल गया।
आराध्य ऋषि के बिना खाए जाने से थोड़ी सी परेशान हो गई। तभी उसके कंधे पर बड़ी माँ का हाथ आया और उन्होंने आराध्य को देखकर कहा, "तुम परेशान मत हो, वह ऐसा ही है। कभी-कभी ज़्यादा काम आ जाता है तो ऐसे ही बिना खाए चला जाता है। तुम टेंशन मत लो, मैं सूरज से कह दूँगी, वह ऋषि को ऑफ़िस में नाश्ता करवा देगा।"
अब जाकर आराध्य को थोड़ी सी राहत मिली और वह बड़ी माँ के साथ अपने काम में लग गई।
ऑफ़िस पहुँचकर ऋषि ने सबसे पहले वेंडर्स के साथ मीटिंग की सारी फ़ाइलें रेडी कीं। 11:00 बजे तक ऋषि और सारे वेंडर्स कॉन्फ़्रेंस रूम में मौजूद थे।
सूरज के साथ मिलकर मीटिंग शुरू हुई। 11:00 बजे से लेकर 5:00 बज गए थे सारे वेंडर्स के साथ मीटिंग करते-करते। फ़ाइनली ऋषि ने सबके साथ अपनी डील फ़ाइनल कर ली।
रात के 9:00 बजे, दिल्ली के एक सेवन स्टार होटल के एक प्राइवेट रूम में... एक लड़की, जो किसी होटल की वेट्रेस थी, किसी को खुद को छोड़ने के लिए रिक्वेस्ट कर रही थी। पर एक आदमी पूरी तरह से उस वेट्रेस के ऊपर हावी हो रखा था। वह लड़की रो रही थी, गिड़गिड़ा रही थी कि वह उसे छोड़ दें। पर उस आदमी पर तो जैसे कोई जुनून सवार था। अचानक से उसका फ़ोन बजा। वह आदमी पूरी तरह से झल्ला गया कि उसके प्राइवेट मोमेंट पर इस वक़्त किसी ने डिस्टर्ब किया। उसने फ़ोन को इग्नोर किया और वापस कंटिन्यू करने लगा।
बार-बार फ़ोन बजने से वह आदमी और बुरी तरह से चिढ़ गया। उसने गुस्से में फ़ोन की स्क्रीन देखी तो पाया कि यह उसके P.A. का कॉल था। उसके P.A. को अच्छे से मालूम था कि उसका बॉस इस वक़्त कहाँ पर है और क्या कर रहा है, लेकिन इमरजेंसी की वजह से उसने उस आदमी को फ़ोन किया था।
आदमी जैसे ही उस लड़की से उठा, वेट्रेस वहाँ से ऐसे भागी जैसे शेर के पिंजरे से कोई चूहा।
फ़ोन उठाकर गुस्से में वह आदमी बोला, "कौन मर गया इस वक़्त? जो तुमने मेरा प्राइवेट टाइम ख़राब किया?"
P.A.: सर, वह... हमारी सारी वेंडर्स ने हमारे सारे प्रोजेक्ट्स से अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं। सब ने एक साथ हमारे प्रोजेक्ट्स को करने से मना कर दिया है।
(यह आदमी और कोई नहीं, गौतम अग्रवाल था।) यह सुनकर वह बौखला गया कि उसके सारे वेंडर्स ने एक साथ उसके सारे डील्स कैंसिल कर दिए हैं।
गौतम गुस्से में चिल्लाया:
गौतम: 😠😠 क्या बकवास कर रहे हो? एक साथ सभी डील्स कैसे कैंसिल कर सकते हैं?
P.A.: जी सर, मैं शाम से ही सब से बात करने की कोशिश कर रहा हूँ, पर सबका एक ही जवाब है। मैंने बहुत जानने की कोशिश की थी कि उन्होंने ऐसा क्यों किया, पर किसी ने कोई पॉज़िटिव रिस्पांस नहीं दिया। इसलिए मैंने आपको फ़ोन किया।
गौतम: ठीक है, सबके साथ मिलकर एक मीटिंग फ़िक्स करो। मैं ख़ुद इस चीज़ को हैंडल कर लूँगा।
P.A.: जी सर।
यह बोलकर P.A. फ़ोन काट देता है।
गौतम गुस्से में पास रखी टेबल पर ज़ोर से लात मारी और कहा, "यह क्या हो रहा है? एक-एक करके सारी चीज़ें कैसे मेरे हाथ से जा रही हैं? अब कल देखते हैं कैसे सबने एक साथ डील को मना किया है। इन लोगों को पता नहीं है मैं क्या कर सकता हूँ।"
दूसरी तरफ़, ऋषि के मेंशन में... ऋषि अपने लैपटॉप पर काम कर रहा था। उसके फ़ेस पर एक विनिंग स्माइल थी।
आराध्य ने जब ऋषि को मुस्कुराते देखा तो उसके चेहरे पर भी एक हल्की सी मुस्कान आ गई।
आराध्य बेड पर बैठी थी और अपने कॉलेज की तैयारी कर रही थी। उसने ऋषि को देखकर हल्के से अपनी चूड़ी खनकाई। आराध्य को जब भी ऋषि को कुछ कहना होता था तो वह ऐसे ही चूड़ी खनकाकर उसे बात करती थी।
ऋषि ने जब आराध्य की चूड़ी की खनक सुनी तो उसकी तरफ़ देखने लगा। आराध्य ने ऋषि को देखा और मुस्कान के साथ इशारों में पूछा कि वह इतना खुश क्यों है।
ऋषि मुस्कुराता हुआ आराध्य से कहा, "आज एक बहुत बड़ी डील फ़ाइनल हुई है। और इस डील के लिए मैंने बहुत मेहनत की थी। आज वह फ़ाइनल हुई है, बस इसीलिए मैं खुश हूँ।"
आराध्य ऋषि की कामयाबी देखकर और खुश हो जाती है और वह ऋषि को हाथ के इशारों से बेस्ट ऑफ़ लक कहती है।
गौतम अपने ऑफिस के कॉन्फ़्रेंस रूम में बैठा था। उसके सामने उसके सारे वेंडर्स बैठे हुए थे। गौतम की आँखें उस वक़्त बहुत कठोर थीं, जैसे वो अपनी आँखों से ही किसी का भी खून कर सकता था।
गौतम गुस्से में बोला, "आप सब की प्रॉब्लम क्या है? ऐसे कैसे आप लोग डील कैंसिल कर सकते हैं? 😡 आपके साथ मेरे सारे प्रोजेक्ट इस वक़्त मार्केट में हैं। आपको पता है मेरा कितना नुकसान होगा?"
तभी एक वेंडर बोला, "सॉरी Mr. अग्रवाल, पर अब हम आपके साथ इस प्रोजेक्ट को आगे कंटिन्यू नहीं करना चाहते। और कॉन्ट्रैक्ट के मुताबिक हमें जितना भी पे करना था, वो हम ऑलरेडी आपकी कंपनी को पे कर चुके हैं। तो ज़ाहिर सी बात है, आप हमें किसी भी तरीके से इस कॉन्ट्रैक्ट में रखने के लिए फ़ोर्स नहीं कर सकते। बाकी आपकी मर्ज़ी, हम यहाँ पर आपके एक बार बुलाने पर तो आ गए, पर नेक्स्ट टाइम हम आपके साथ किसी भी डील के लिए कोई कॉन्ट्रैक्ट साइन नहीं करेंगे। बाकी आपको जो बात करनी है, आप हमारे लॉयर से कर सकते हैं।"
इतना बोलकर वह वेंडर वहाँ से उठकर चला गया। उसके बाद एक-एक करके सभी लोगों ने वही बात दोहराई और वे वहाँ से उठकर चले गए।
गौतम बौखलाया हुआ अपने केबिन में सिगरेट के कश लगा रहा था। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि उसके सारे वेंडर्स ने एक साथ उसके प्रोजेक्ट को करने से मना कर दिया था। गौतम उस वक़्त बहुत टेंशन में था कि तभी उसका फ़ोन बजा। गौतम फ़ोन की स्क्रीन देखी और वहाँ फ़्लैश हो रहे नाम को देखकर उसके चेहरे पर हवाएँ उड़ रही थीं।
गौतम घबराहट के मारे फ़ोन उठाया और "हेलो" बोला।
जेपी: व्हाट द हेल, गौतम! मैंने सुना है कि तुम्हारे सारे वेंडर्स ने तुम्हारे प्रोजेक्ट को करने से मना कर दिया है 😡। तुम खुद इतनी प्रॉब्लम में हो, तो तुम मेरा काम कैसे करोगे?😡😡
गौतम: जेपी बॉस, अब बिलकुल भी परेशान मत होइए। आपका सारा काम बहुत आराम से हो जाएगा, कोई प्रॉब्लम नहीं होगी। वैसे भी उन वेंडर्स से और आपके काम से कोई लेना-देना नहीं था। आपका काम तो मैं पर्सनली हैंडल करता हूँ। आप बिलकुल फ़िक्र मत कीजिए।
जेपी: गौतम, भूलना मत, अगले महीने तुम्हारे मुंबई के होटल में एक हथियारों से भरा शिप आने वाला है। अगर ज़रा सी भी गलती हुई, तो मेरी गोली और तुम्हारा सीना!
गौतम थोड़ा घबरा गया, फिर भी अपनी आवाज़ में कॉन्फ़िडेंस लाते हुए कहा:
गौतम: आप फ़िक्र मत कीजिए, ऐसा कुछ भी नहीं होगा। सारे हथियार बहुत आराम से अपनी सही जगह पर पहुँच जाएँगे।
जेपी: गुड... पर ये सब हुआ कैसे? तुम्हारे सारे वेंडर्स एक साथ कैसे चले गए?
गौतम: वो तो मुझे भी नहीं पता। डोंट वरी बॉस, मैं जल्दी पता कर लूँगा कि ये सब अचानक कैसे हुआ।
जेपी: एक बात याद रखना गौतम, ज़िन्दगी हो या बिज़नेस, दोस्तों से ज़्यादा दुश्मनों की ख़बर रखना ज़रूरी होती है।
गौतम: जी बॉस, मैं पता करवाता हूँ कि मेरा ऐसा कौन सा नया दुश्मन पैदा हो गया है।
जेपी ने फ़ोन काट दिया। गौतम कुर्सी पर सर लगाकर जेपी की बात सोच रहा था। तभी उसका फ़ोन फिर से बजा। उसने स्क्रीन की तरफ़ देखा तो एक अननोन नंबर था।
गौतम कुछ सोचकर फ़ोन उठा लिया:
गौतम: हेलो, हू इज़ दिस?
आवाज़: तुम्हारा नया दुश्मन।
गौतम चौंक गया। उसने एक बार अपने फ़ोन की स्क्रीन देखी और फिर से फ़ोन कान में लगाकर कहा, "कौन बोल रहा है?"
आवाज़: वही, जिसने तुमसे तुम्हारा सब कुछ छीन लिया। जो तुम्हें कामयाब होने नहीं दे सकता। जिसने तुमसे तुम्हारे सारे वेंडर्स छीन लिए।
गौतम गुस्से में अपनी कुर्सी से खड़ा हुआ 😡 और चिल्लाते हुए कहा, "ब्लडी बस्टर्ड! कौन हो तुम? छुपकर क्या वार करोगे? दम है तो सामने से लड़ो!"
आवाज़ (ख़तरनाक हँसी के साथ): सामने से तो मैंने तुम्हारी सबसे कीमती चीज़ ले ली, और तुम कुछ नहीं कर सके। याद आया? कुछ महीने पहले... तुम्हारी शादी में आकर तुम्हारी दुल्हन से शादी की थी। ताकि तुम्हें तुम्हारे दादाजी की वसीयत ना मिले।
गौतम की पकड़ अपने फ़ोन पर कमज़ोर हो गई और वह झल्लाते हुए बोला 😠😠, "ऋषि नंदा!"
दूसरी तरफ़ से ऋषि बोला, "शुक्र है, मेरा नाम तो याद है।"
गौतम: तुम भूलने वाली चीज़ भी नहीं हो। मुझे उस दिन से आज तक समझ में ही नहीं आया कि तुमसे मेरी दुश्मनी क्या है, जो तुम मेरे पीछे हाथ धोकर पड़ी हो। चाहते क्या हो तुम मुझसे?
ऋषि: तुम्हारी बर्बादी।
गौतम 😠: बिना वजह तो तुम मुझे बर्बाद नहीं करना चाहोगे ना? तो बताओ, क्यों मेरे पीछे पड़े हो?
ऋषि: इतनी भी क्या जल्दी है? धीरे-धीरे पता चल जाएगा।
गौतम: बस ऋषि नंदा, बहुत हो गया ये चूहा-बिल्ली का खेल। अब मुझे पता चल गया है कि मेरे सारे नुकसान की वजह तुम हो। अब मैं तुमसे सामने से लड़ूँगा। जिस लड़की से तुमने मेरे सामने शादी की थी, वो मेरे लिए वैसे भी कोई मायने नहीं रखती थी। पर हाँ, बस जायदाद जाने का मुझे दुःख है। लेकिन तुमने मेरे बिज़नेस में टांग अड़ाकर बहुत बड़ी गलती की है। इस बिज़नेस को खड़ा करने के लिए मैंने बहुत मेहनत की है। ये मेरी ऐसी कोई जायदाद नहीं है जो मुझे किसी से भीख में मिली हो, और ना इसके लिए मुझे किसी गूँगी लड़की से शादी करनी पड़ी हो। ये मेरा अपना बिज़नेस है और मैं इसे बर्बाद नहीं होने दूँगा।
ऋषि हँसते हुए बोला, "तुम्हारे बिज़नेस की बर्बादी की शुरुआत तो मैंने कर दी है। बचा सकते हो तो बचा लो।"
यह बोलकर ऋषि ने फ़ोन काट दिया।
गौतम का दिमाग उस वक़्त बहुत गुस्से में फट रहा था। उसने अपने फ़ोन को लेकर सामने वाली दीवार, जहाँ पर शीशा लगा था, पर दे मारा। उसका फ़ोन और शीशा दोनों चूर-चूर हो गए। गौतम गुस्से में अपने P.A., नमन को बुलाया।
नमन जब केबिन में आया तो वहाँ की हालत देखकर बिलकुल घबरा गया। वह गौतम को देखकर एकदम डर गया।
गौतम गुस्से में नमन से बोला, "ऋषि नंदा की पूरी डिटेल पता करो। और उसकी मुझसे क्या दुश्मनी है, ये भी पता करो। 😡😡"
नमन हैरानी से गौतम की तरफ़ देखा और बोला, "सर, Mr. ऋषि नंदा... वो तो बहुत बड़े बिज़नेसमैन हैं। उनकी डिटेल...?"
गौतम: दुश्मन को बर्बाद करने के लिए उसकी डिटेल तो पता होनी चाहिए ना!
नमन यह सुनकर शॉक हो गया, पर फिर भी उसे अपने बॉस का ऑर्डर फ़ॉलो करना था, तो वह अपने काम पर लग गया।
शाम का वक़्त, ऋषि का मेंशन...
आराध्य अपने कमरे में बैठकर कॉलेज के प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी। मंडे से उसके क्लासेस थे।
रूम का गेट खुला और ऋषि आया। ऋषि के चेहरे पर उस वक़्त कुछ तनाव सा दिख रहा था।
ऋषि अपना लैपटॉप का बैग बेतरतीब ढंग से सोफ़े पर फेंक दिया और वहीं बैठकर अपनी टाई की नॉट को ढीला करने लगा।
आराध्य बेड से उठकर उसके पास आई और उसके लैपटॉप के बैग को उठाकर उसकी सही जगह पर रख दिया।
आराध्य इशारों में पूछा कि उसे क्या हुआ है।
ऋषि, एक परेशान चेहरे के साथ बोला, "सर में बहुत तेज दर्द हो रहा है। एक काम करो, मुझे कोई सर दर्द की मेडिसिन दे दो। मैं उसे खाकर सो जाऊँगा।"
ऋषि अपना सर पकड़कर सोफ़े पर ही बैठा रहा।
आराध्य कुछ सोची और जल्दी से कमरे से बाहर निकल गई। ऋषि कपड़े चेंज करके आया। उसका सर अभी भी बहुत दर्द कर रहा था। आराध्य अपने हाथ में एक चाय की प्याली लिए कमरे में आई और ऋषि की तरफ़ चाय बढ़ाई। ऋषि उसे हैरानी से देखा:
ऋषि: ये क्या है? मैंने तुम्हें दवाई लाने के लिए कहा था, तुम चाय ले आई?
आराध्य ऋषि के हाथों में चाय पकड़ाई और उसे पीने का इशारा किया।
ऋषि: आराध्य, मेरा सर वैसे ही बहुत दर्द कर रहा है, ऊपर से तुम ये उल्टी-सीधी हरकतें कर रही हो।
आराध्य ऋषि से इशारों में कहा, "उस पर भरोसा रखें।"
ऋषि एक बार आराध्य को देखा, फिर अपने हाथ में पकड़ी चाय को देखा। आराध्य की बात मानकर वह सारी चाय पी ली। चाय ख़त्म होने के बाद ऋषि कप रखा और आराध्य की तरफ़ देखकर कहा, "अब क्या? अब तो मुझे दवाई दो।"
आराध्य ऋषि का हाथ पकड़कर उसे बेड पर ले आई और उसे बेड पर लेटने का इशारा किया।
अब ऋषि सच में बहुत परेशान हो गया। वह आराध्य को परेशान होकर बोला:
ऋषि: आराध्य, प्लीज़ यार! मेरा सर बहुत दर्द कर रहा है। मुझे दवाई दे दो और मैं सो जाऊँगा, मुझे आराम मिल जाएगा।
आराध्य ज़बरदस्ती उसे बेड पर सुला दिया। ड्रेसिंग टेबल से एक ऑयल की शीशी लाई और ऋषि के बगल में बैठकर अपने हाथों में थोड़ा सा तेल लेकर ऋषि के सर पर हेड मसाज करने लगी।
जैसे-जैसे आराध्य ऋषि के सर पर मसाज करती रही, वैसे-वैसे ऋषि का सर हल्का होने लगा और उसकी आँखें भारी हो गईं। उसे पता ही नहीं चला कि कब उसका सर दर्द चला गया। उसे बहुत रिलैक्स फील हो रहा था। ऋषि कब सो गया उसे पता ही नहीं चला। आराध्य ऋषि को सोता देख कमरे की लाइट ऑफ़ कर दी और नीचे आ गई।
नीचे सब डिनर की तैयारी कर रहे थे। आराध्य बड़ी माँ से फ़ोन पर टाइप करके कहा, "ऋषि जी का सर में दर्द हो रहा था, तो वो आराम कर रहे हैं। मैं उनका खाना ऊपर ही ले जाऊँगी। जब उठेंगे तो मैं उन्हें खिला दूँगी।"
बड़ी माँ: ठीक है, तुम ऋषि का खाना कमरे में ही ले जाना।
आराध्य बड़ी माँ को डिनर करवाकर उन्हें मेडिसिन दे दी और ऋषि और अपना खाना लेकर कमरे में आ गई।
जब आराध्य कमरे में पहुँची तो देखा ऋषि अपने फ़ोन में कुछ चेक कर रहा था। ऋषि को जागता देख वह और चौंक गई।
आराध्य खाने की ट्रे ऋषि के पास रख दी और उसके हाथ से फ़ोन छीनकर गुस्से में उसे इशारों से कहा:
आराध्य (इशारों में): अभी कुछ देर पहले ही जब घर आए थे तो सर दर्द बता रहे थे और अब थोड़ा सा आराम मिलने पर वापस अपने काम में बिज़ी हो गए 😠।
ऋषि: आराध्य! क्या कर रही हो? बहुत इम्पॉर्टेन्ट काम है! फ़ोन तो वापस दो!
आराध्य (इशारों में): नहीं! पहले आप खाना खाएँगे।
ऋषि: मैं बाद में खा लूँगा, तुम पहले फ़ोन वापस करो। मुझे वो मेल अर्जेंट फ़ॉरवर्ड करनी है।
आराध्य फ़ोन लेकर अलमारी में रख दिया और अलमारी लॉक कर दी।
ऋषि परेशान होकर आराध्य से बोला, "अरे! बहुत इम्पॉर्टेन्ट मेल है! तुम क्यों नहीं समझ रही हो? फ़ोन वापस करो!"
आराध्य (इशारों में): मैं फ़ोन वापस कर दूँगी। मुझे आपका फ़ोन रखने में कोई दिलचस्पी नहीं है। आप खाना खा लीजिए, उसके बाद आराम से अपना फ़ोन ले लीजिएगा।
ऋषि को समझ में आया कि आराध्य तब तक फ़ोन वापस नहीं करेगी जब तक ऋषि खाना नहीं खा लेता।
वह चुपचाप बैठकर खाना खाने लगा। आराध्य भी अपना खाना ख़त्म कर लिया। खाना खाने के बाद ऋषि बेचारा मुँह बनाकर आराध्य से बोला, "अब तो मेरा फ़ोन वापस कर दो।"
आराध्य (इशारों में): सर दर्द कैसा है आपका?
ऋषि: बिलकुल भी सर दर्द नहीं है अब। प्लीज़, मेरा फ़ोन वापस करो।
आराध्य अलमारी से ऋषि का फ़ोन निकालकर उसके हाथ में पकड़ा दिया। पर फ़ोन देने से पहले आराध्य ऋषि को एक बार वार्निंग दी:
आराध्य (इशारों में): फ़ोन तो वापस दे रही हूँ, पर आपका सर में दर्द था, इसलिए आप फ़ोन पर ज़्यादा देर काम नहीं करेंगे।
आराध्य घड़ी की तरफ़ देखी तो 9:15 हो रहे थे। आराध्य ऋषि को देखकर इशारा किया कि सिर्फ़ 10:00 बजे तक।
बेचारा ऋषि, जिसे बिज़नेस की दुनिया का बादशाह कहा जाता था, जिसकी एक आवाज़ से लोग डर जाते थे, वह बेचारा अपनी बीवी की बात किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह मानने पर मज़बूर था। भले ही वह बिज़नेस का किंग था 🤴, पर उसकी ज़िन्दगी में चलती तो उसकी क्वीन 👸 ही थी।
ऋषि मोबाइल में अपने मेल चेक कर रहा था और आराध्य सोफ़े पर बैठकर अपने कॉलेज का काम कर रही थी। करीब एक घंटे बाद जब आराध्य देखती है कि ऋषि अभी भी अपने फ़ोन पर लगा हुआ है, तो वो ऋषि के पास आती है और झटके से उसके हाथ से फ़ोन छीन लेती है और स्विच ऑफ़ कर देती है। ऋषि एक पल के लिए चौंक जाता है।
ऋषि= अरे यार! मैं काम कर रहा था!
आराध्य घड़ी की तरफ़ देखती है। ऋषि भी घड़ी को देखता है और समझ जाता है कि फ़ोन यूज़ करने का उसका टाइम पूरा हो गया है। ऋषि बेचारा मुँह बनाकर आराध्य की तरफ़ देखता है 🥺।
ऋषि= एक घंटा और 🥺?
आराध्य फ़ोन लेकर साइड टेबल पर रख देती है। आराध्य ऋषि को लिटाकर उसके ऊपर ब्लैंकेट रख देती है और इशारों में आराम करने के लिए कहती है। आराध्य अपनी साइड आकर लेट जाती है और अपनी आँखें बंद कर लेती है। पाँच मिनट भी नहीं हुए होंगे कि ऋषि को लगता है आराध्य सो गई है। वो चुपके से अपना फ़ोन उठा लेता है 😂😂।
जैसे ही ऋषि अपना फ़ोन उठाकर पलटता है तो देखता है कि आराध्य बड़ी-बड़ी पलकें करके उसे देख रही है।
ऋषि अपने दाँत दिखाकर फ़ोन वापस रख देता है 😁।
आराध्य ऋषि के पास आती है, उसके दोनों हाथों को उसके सीने पर क्रॉस करके रख देती है और अपने एक हाथ से उसके दोनों हाथों को पकड़कर वहीं लेट जाती है। ऋषि जब देखता है कि आराध्य उसे पकड़कर ही सो गई है तो वो एक पल के लिए चौंक जाता है 😳।
आराध्य ने ये सब ऋषि के पास सोने के लिए नहीं किया था, वो बस ये चाहती थी कि रात में फ़ोन यूज़ करने से ऋषि का सर दर्द वापस ना आए। खुद को भी नहीं पता चला कि वो कब ऋषि के इतने करीब आकर लेट गई।
आज फिर से ऋषि को आराध्य की भीनी-भीनी खुशबू महसूस हो रही थी। वो आराध्य को एकटक देख रहा था। आराध्य को देखते-देखते और उसकी खुशबू महसूस करते हुए ऋषि को कब नींद आ गई उसे पता ही नहीं चला।
अगली सुबह सबकी ज़िन्दगी पहले की तरह चल रही थी, पर कोई था जो अपनी नाकामयाबी की वजह से परेशान था।
गौतम अपने केबिन में बैठे ऋषि के बारे में ही सोच रहा था। वो खुद से ही पूछता है, "आखिर क्यों ऋषि नंदा जैसा बड़ा बिज़नेसमैन मेरे पीछे पड़ा है? उसने तो मेरी शादी में जबरदस्ती घुसकर आराध्य से शादी कर ली, जिसकी वजह से मुझे दादाजी की जायदाद नहीं मिली। फिर उसने मेरे सारे प्रोजेक्ट छीन लिए और अब मुझे धमकी दे रहा है कि मुझे बर्बाद कर देगा।"
गौतम अपनी ही विचारों में मगन था कि तभी उसका दरवाज़ा ओपन होता है और नमन अंदर आता है।
नमन गौतम को देखकर कहता है, "सर, मैंने Mr. नंदा की इन्फ़ॉर्मेशन ढूँढी है। क्योंकि वो बहुत बड़ी हस्ती हैं, इसीलिए ज़्यादा कुछ तो नहीं पता चला, सारी इन्फ़ॉर्मेशन प्राइवेट ही रखी गई है। कुछ हद तक ये पता चला है।"
गौतम= क्या पता चला?
नमन= सर, बस इतना ही पता चला कि Mr. नंदा के पेरेंट्स की डेथ उनके बचपन में ही हो गई थी। उनकी मदद एक फ़्रेंड ने की थी, जिसने उनकी परवरिश की है। और वो लड़की, जिससे आपकी शादी होने वाली थी, पर Mr. नंदा ने उससे शादी कर ली, वो इस वक़्त उनके मेंशन में रहती है। बाकी उनके बारे में, उनकी कामयाबी के बारे में तो न्यूज़पेपर और मैगज़ीन में आए दिन छपता ही रहता है।
गौतम= ये सारी बकवास इन्फ़ॉर्मेशन का मैं क्या करूँगा? मुझे उनकी मुझसे दुश्मनी पता करनी है।
नमन= सर, उनकी और आपकी दुश्मनी की एक ही वजह है।
गौतम हैरानी से नमन की तरफ़ देखता है और पूछता है, "वो क्या है?"
नमन= प्रियंका।
गौतम प्रियंका का नाम सुनकर चौंक जाता है 😳।
गौतम झटके से कुर्सी से उठता है और कहता है, "व्हाट? प्रियंका से जुड़ी हुई है?"
नमन= जी सर, जिस औरत ने Mr. नंदा की परवरिश की है, प्रियंका उनकी बेटी है।
गौतम अपने सर पर हाथ रखता है और अपने सर को कसकर दबाते हुए कहता है, "अब मुझे सारा सर्कल समझ आया! ये ही वजह है कि ऋषि नंदा जैसा बड़ा बिज़नेसमैन मेरे पीछे पड़ा हुआ है!"
नमन= सर, एक और बात है।
गौतम= क्या?
नमन= सर, मिस प्रियंका इस वक़्त कोमा में हैं।
गौतम चौंकते हुए कहता है, "व्हाट? कोमा में? पर कैसे?"
नमन= जी सर, छह महीने पहले उनका एक कार एक्सीडेंट हुआ था। एक्सीडेंट की वजह तो नहीं पता चली, पर उसके बाद ख़बर आई कि वो कोमा में चली गईं।
गौतम सर पर हाथ रखते हुए= छह महीने पहले प्रियंका का एक्सीडेंट हुआ था...
इतना याद करते हुए उसके चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान आ जाती है और वो ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगता है।
गौतम नमन की तरफ़ देखते हुए कहता है 😂😂, "तो इसीलिए ऋषि नंदा मेरे पीछे पड़ा हुआ है! अब सारा मैटर समझ में आया!"
गौतम= नमन, तुम काम करो, ऋषि नंदा के साथ एक मीटिंग फ़िक्स करो। मैं अपने दुश्मन को सामने से बताना चाहता हूँ कि उसकी कमज़ोर जगह अब मेरे हाथ में है।
नमन को कुछ समझ में नहीं आया, पर फिर भी उसे अपने बॉस का ऑर्डर फ़ॉलो करना था और वो "ओके" बोलकर केबिन से बाहर चला गया।
गौतम हँसते हुए खुद से ही कहता है, "इतनी छोटी सी बात मेरे दिमाग में क्यों नहीं आई? ऋषि प्रियंका के लिए ये सब कर रहा है। अब देखो ऋषि नंदा, मैं कैसे तुम्हारा खेल बिगाड़ता हूँ।"
ऑफ़िस में ऋषि अपना काम कर रहा था। तभी उसके केबिन में एक 65 साल का ओल्ड मैन आता है और आते ही कहता है, "कैसे हो ऋषि बेटा?"
ऋषि अपनी नज़रें उठाकर देखता है तो अपने सामने खड़े इंसान को देखकर चौंक जाता है और कहता है, "अरे, कपूर अंकल! नमस्ते!"
मिस्टर कपूर प्यार से उसके पास आते हैं और कहते हैं, "क्या बात है? आजकल बड़े चर्चा में छाए हुए हो।"
ऋषि Mr. कपूर के साथ सोफ़े पर बैठते हुए कहता है, "नहीं-नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। आप बताइए, अचानक कैसे आना हुआ? कोई ज़रूरी काम था तो मुझे बता दिया होता, मैं आ जाता।"
Mr. कपूर= नहीं, बस थोड़े काम से आया था, सोचा तुमसे मिलता चलूँ।
ऋषि= ये तो बहुत अच्छा किया आपने। बताइए, क्या लेंगे? चाय, कॉफ़ी?
Mr. कपूर= ऐसी बात है तो एक कप चाय मँगवा दो।
ऋषि हँसते हुए= जी ज़रूर।
Mr. कपूर= तुम्हारी शादी की ख़बर पढ़ी न्यूज़ में।
ऋषि थोड़े संकोच भरी निगाहों से मिस्टर कपूर की तरफ़ देखता है और कहता है, "वो अंकल, सब कुछ इतनी जल्दबाजी में हुआ कि कुछ बताने का मौक़ा ही नहीं मिला।"
Mr. कपूर= चलो कोई बात नहीं। शादी तो कर ली, लेकिन बहू से तो मिलोगे?
ऋषि= अरे अंकल, ये भी कोई पूछने की बात है? अब जब चाहे तब मिल सकते हैं।
Mr. कपूर= ठीक है। तो कल की पार्टी में अपनी वाइफ़ को साथ ले आओ।
ऋषि चौंककर= पार्टी? किस खुशी में?
Mr. कपूर= क्या मतलब? तुम्हें नहीं पता? मुझे लगा तुम्हें सबसे पहले पता होगा।
ऋषि= नहीं, मुझे इस बारे में कुछ भी नहीं पता। आप किस बारे में बात कर रहे हैं अंकल?
Mr. कपूर= ओजस लंदन से वापस आ गया है, इसी खुशी में तो पार्टी है। तुम्हारी बातों से तो लगता है कि तुम्हें कुछ नहीं पता। चलो कोई बात नहीं। ना सही, अब तो पता चल गया ना कि वो वापस आ गया। और उसने इनवाइट भी किया होगा। उसी के आने की खुशी में कल एक पार्टी रखी गई है। तुम अपनी वाइफ़ को लेकर और अपनी बड़ी माँ को लेकर ज़रूर आना।
ऋषि एक स्माइल के साथ= ज़रूर अंकल 😊
Mr. कपूर ऋषि के साथ थोड़ी देर बात करते हैं और उसके बाद वहाँ से चले जाते हैं। उनके जाने के बाद ऋषि अपने सर पर हाथ रखकर सोचता है, "ओह गॉड! ओजस वापस आ गया है! उसे मेरी शादी की ख़बर मिल गई होगी। अब ये पता नहीं क्या-क्या क़यामत खड़ा करेगा!"
इसी सोच-विचार में ऋषि अपना काम करने लगता है और देखते-देखते उसके घर जाने का टाइम भी हो जाता है।
शाम को ऋषि अपने घर पहुँचता है। वो हॉल में सबके साथ बैठा है। आराध्य किचन में ऋषि के लिए कॉफ़ी बना रही है और बड़ी माँ के साथ बैठकर ऋषि कुछ बातें कर रहा है कि इतने में डोरबेल बजती है।
सर्वेंट जाकर दरवाज़ा ओपन करता है तो एक 26-27 साल का लड़का गुस्से में अंदर की तरफ़ आता है 😡।
वो लड़के को वहाँ देखकर सब चौंक जाते हैं। ऋषि अपनी जगह से खड़ा होता है और उसकी तरफ़ देखकर घबराहट में कहता है:
ऋषि= मेरी बात सुनो... मेरी बात सुनो... मैं बताने वाला था...
इससे पहले कि ऋषि कुछ बोल पाता, उस लड़के का एक ज़ोरदार थप्पड़ ऋषि के चेहरे पर आकर लगता है। ऋषि सोफ़े पर निढाल होकर गिर जाता है।
आराध्य ने देखा कि हॉल से कुछ आवाज़ें आ रही हैं, तो वो दौड़कर बाहर आती है। वो देखती है कि ऋषि को एक लड़का मार रहा है। आराध्य ये देखकर बुरी तरह से घबरा जाती है। वो जल्दी से दौड़कर बड़ी माँ के पास आती है, तो बड़ी माँ को देखकर आराध्य और भी ज़्यादा हैरान हो जाती है, क्योंकि बड़ी माँ वहाँ पर अपने मुँह पर हाथ रखे मंद-मंद मुस्कुरा रही थीं।
ऋषि अपनी जगह से खड़ा हो जाता है और कहता है, "अरे यार! बात तो सुन ले! मैं बताने वाला था, सच में!"
और फिर एक ज़ोरदार मुक्का उसके दूसरे गाल पर आकर लगता है।
ऋषि फिर सोफ़े पर गिर जाता है। जैसे-तैसे करके खुद को खड़ा करता है। एक बार जब उसकी तरफ़ एक मुक्का आ रहा होता है, तो वो उसका हाथ पकड़ता है और ज़ोर से झटका देकर उस लड़के को दूर धकेल देता है। लड़का अपनी जगह पर खड़ा होता है और ऋषि की तरफ़ बढ़ रहा होता है, तो ऋषि उसे देखकर कहता है, "ओजस! अगर तूने मेरे ऊपर एक भी बार और हाथ उठाया तो मैं तुझे तेरी भाभी से मिला दूँगा!"
ओजस ये सुनते ही रुक जाता है और अपने गुस्से भरी निगाहों से ऋषि की तरफ़ देखते हुए कहता है:
ओजस= अबे! जा तू कौन होता है मुझे भाभी से ना मिलने देने वाला?
इतना कहते ही ओजस फिर से ऋषि की तरफ़ आगे बढ़ता है उसे मारने के लिए। ऋषि झट से एक पिल्लो उठाकर अपने फ़ेस के ऊपर रख लेता है और जल्दी से कहता है:
ऋषि= तेरी भाभी वहाँ खड़ी है!
ये सुनते ही ओजस रुक जाता है और पलटकर देखता है तो आराध्य बड़ी माँ के साथ सहमी सी खड़ी है।
ओजस एक बार आराध्य को देखता है और फिर ऋषि की तरफ़ देखकर कहता है, "तुम्हें खुद को बचाने के लिए अपनी बीवी का इस्तेमाल कर रहा है।"
ऋषि= हाँ, तो अपनी बीवी का कर रहा हूँ, कौन सी दूसरी की बीवी का कर रहा हूँ? और मेरा छोड़ दो! मेरी तो शादी हो गई है... लेकिन बेटा, मेरा एक हाथ तुझे पड़ गया ना, तेरा चाँद सा मुँह बिगड़ जाएगा, फिर तुझे कोई गर्लफ़्रेंड नहीं मिलेगी और सारी ज़िन्दगी कुँवारा रह जाएगा।
ओजस= तुझे तो मैं बाद में देख लूँगा।
वो वहाँ से सीधे बड़ी माँ के पास जाता है और पैर छूकर उनके आशीर्वाद लेता है। "प्रणाम बड़ी माँ!" बड़ी माँ ओजस के सर पर हाथ रखकर प्यार से उसे आशीर्वाद देती हैं।
ओजस फिर आराध्य की तरफ़ जाता है और जैसे ही वो उसके पैर छूने वाला होता है, आराध्य दो कदम पीछे ले लेती है।