**तुम मुझसे जबरदस्ती शादी नहीं कर सकते हो** 19 साल की मीरा जब लंदन से भारत लौटती है, तो उसका दिल सिर्फ़ एक चाह में धड़कता है — अपने पिता को सरप्राइज़ देने की। एक प्योर, शांत, भावुक लड़की — जिसने रिश्तों की गर्माहट तो जानी है, मगर... **तुम मुझसे जबरदस्ती शादी नहीं कर सकते हो** 19 साल की मीरा जब लंदन से भारत लौटती है, तो उसका दिल सिर्फ़ एक चाह में धड़कता है — अपने पिता को सरप्राइज़ देने की। एक प्योर, शांत, भावुक लड़की — जिसने रिश्तों की गर्माहट तो जानी है, मगर दुनिया की साज़िशें नहीं। लेकिन जैसे ही वो दिल्ली एयरपोर्ट पर कदम रखती है, उसकी ज़िंदगी बदल जाती है। उसे अगवा कर लिया जाता है — बड़े प्लान के साथ, बेहद ठंडे इरादों से। अगवा करता है अमरीश मल्होत्रा एक अरबपति बिज़नेसमैन, जो दुनिया के लिए एक करिश्माई लीजेंड है, लेकिन अंदर ही अंदर बदले की आग में जलता एक दरिंदा। कियान को मीरा से कोई मोहब्बत नहीं... उसे उससे एक चेहरा दिखता है, जिससे उसका अतीत लहूलुहान हुआ था। मीरा उस चेहरे की परछाई है — मासूम, अनजान, और सबसे आसान शिकार। वो मीरा को छूता है, तोड़ता है, उसकी भावनाओं को कुचलता है — लेकिन बाहरी तौर पर प्यार का मुखौटा पहनकर। वो रिश्ते को नाम देता है — "रखेल"। मीरा को लगता है शायद यही उसका नसीब है। शायद इस मर्द की परछाई में ही अब उसे जीना है। लेकिन मीरा सिर्फ़ टूटी नहीं... उसने खुद को फिर से जोड़ा। जिस मासूमियत को कियान ने कमज़ोरी समझा था, वही एक दिन उसकी सबसे बड़ी हार बनने वाली थी। यह एक बदले की कहानी है — जहाँ नफ़रत ने इश्क़ का नक़ाब पहना, और मासूमियत ने खुद को आग में तपाकर बदला लेना सीखा। कहानी में न कोई हीरो है, न विलेन — सिर्फ़ वो सच, जो इंसान को या तो राक्षस बना देता है... या राख।
अमरीश मल्होत्रा
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लंदन की ठंडी सुबहें अपने आप में एक अलग ही क्लास रखती थीं। हल्की-हल्की धुंध और सर्द हवा, जिनमें लोग अपने ट्रेंच कोट में लिपटे तेज़ी से चलते दिखते। इन्हीं भीड़भरी सड़कों पर एक ब्लैक रेंज रोवर का दरवाज़ा खुला और उसमें से उतरी मीरा राजपूत। उसके कदमों की आहट जैसे ही पत्थरों पर गूंजी, सबकी नज़रें एक पल के लिए थम गईं।
मीरा राजपूत—नाम ही काफ़ी था। भारत के सबसे बड़े इंडस्ट्रियल घरानों में से एक की इकलौती बेटी। उसके पिता का बिज़नेस साम्राज्य सिर्फ़ इंडिया ही नहीं बल्कि यूरोप और मिडिल ईस्ट तक फैला हुआ था। लेकिन मीरा की पहचान सिर्फ़ एक रिच इंडस्ट्रियलिस्ट की बेटी भर नहीं थी। वह खुद अपने स्टाइल, अपनी पर्सनैलिटी और अपनी स्मार्टनेस से सबको इंप्रेस कर देती थी।
आज उसने हल्के पिंक शेड का वूलन ड्रेस पहना था, साथ में सफ़ेद हाई बूट्स और एक डिज़ाइनर बैग। उसकी आँखों पर बड़े ब्लैक गॉगल्स और खुले बाल उसे और भी ग्लैमरस बना रहे थे। वह हर तरह से “क्यूट एंड फैशनेबल” का परफेक्ट कॉम्बिनेशन थी।
उसकी रूटीन भी किसी प्रिंसेस से कम नहीं थी। सुबह लंदन के सिटी सेंटर में बने उसके प्राइवेट अपार्टमेंट से ड्राइवर उसे यूनिवर्सिटी ड्रॉप करता, जहाँ वह आर्किटेक्चर और बिज़नेस मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रही थी। यूनिवर्सिटी के कॉरिडोर में जब वह अपनी दोस्तों के साथ चलती, तो सबकी नज़रें अपने आप उसकी ओर खिंच जातीं।
"मीरा, आज का प्रेज़ेंटेशन तुम ही दे रही हो, राइट?" उसकी दोस्त सोफिया ने मुस्कुराते हुए कहा।
मीरा ने चश्मा उतारते हुए आंखें झपकाईं और बोली, "ऑफ कोर्स… मेरे बिना तो ये प्रोजेक्ट अधूरा ही रहेगा।" उसके अंदाज़ में कॉन्फिडेंस और मासूमियत दोनों झलकते थे।
क्लास खत्म होते ही वह यूनिवर्सिटी की कैफे में बैठकर अपनी कॉफी सिप करने लगी। लोग उसे देख कर सिर्फ़ उसके फैशन से ही नहीं, बल्कि उसके फ्रेंडली नेचर से भी आकर्षित होते थे। वह सबके साथ बात करती, हंसती, लेकिन फिर भी उसमें एक रॉयल डिस्टेंस रहता—जैसे वह किसी और ही दुनिया की लड़की हो।
शाम को ऑफिस की ओर जाते हुए वह अपने पिता की कंपनी के लंदन ब्रांच की मीटिंग्स में भी शामिल होती। वहां उसकी उम्र से दोगुना बड़े लोग बैठे होते, लेकिन मीरा की राय हमेशा सबसे ज्यादा मायने रखती। बिज़नेस हेरिटेज की वारिस होते हुए भी उसने खुद को “सिर्फ़ पापा की बेटी” नहीं बनने दिया था।
यूनिवर्सिटी, ऑफिस और फैशन—इन तीनों के बीच उसकी ज़िंदगी बैलेंस थी। वह दुनिया को दिखाती थी कि पैसा और पावर सिर्फ़ शो-ऑफ़ के लिए नहीं, बल्कि उससे कुछ क्रिएट करने के लिए भी होता है।
लेकिन उसकी इस चमकदार और परफेक्ट लगती दुनिया के पीछे एक सच्चाई छिपी थी। उसे अंदाज़ा तक नहीं था कि बहुत जल्द उसकी इस रॉयल लाइफस्टाइल पर किसी की नज़र पड़ने वाली है। कोई ऐसा, जो उसकी आज़ादी, उसके सपनों और उसके यकीन को चुनौती देने वाला था…
वही कोई, कोई उसकी जिंदगी को हमेशा के लिए बदल देगा।
उस दिन लंदन की ठंडी हवा में भी मीरा का कॉन्फिडेंस किसी गर्म धूप सा चमक रहा था। मगर किस्मत ने उसके लिए कुछ और ही लिखा था। उसकी हर मुस्कान, हर बेफ़िक्र चाल किसी अनजाने शिकारी की नज़रों में कैद हो चुकी थी। खेल शुरू हो चुका था, बस मीरा को इसकी भनक तक नहीं थी।
तभी उसके मोबाइल पर कॉल आई—कॉलेज की एक लड़की थी। वह हँसते हुए बोली, "मीरा, आज रात की पार्टी में तुम जरूर आना, वरना तुम्हारे बिना सारी पार्टी फीकी लगेगी।"
रात का समय, लंदन के सबसे फेमस क्लब में रोशनी से जगमगाहट थी। बड़े-बड़े झूमर और नीऑन लाइट्स मिलकर पूरे हॉल को किसी सपनों की दुनिया जैसा बना रहे थे। हर कोने में महकते परफ्यूम और हँसी की गूंज थी।
भीड़ अचानक शांत सी हो गई जब एंट्रेंस के दरवाज़े पर मीरा राजपूत का आगमन हुआ। उसने सिल्वर शिमर वाली वन-शोल्डर ड्रेस पहनी थी, साथ में हल्की हील्स और खुले लंबे बाल। बिना किसी ओवर मेकअप के भी वह बेहद खूबसूरत और मासूम लग रही थी।
“ओह माय गॉड! मीरा आ गई…” पार्टी में मौजूद लड़कियाँ उत्साहित होकर कह उठीं। लड़के एक-दूसरे को धक्का देकर उसकी ओर देखने लगे। हर किसी की निगाहें उसी पर टिक गईं।
मीरा ने मुस्कुराकर सबका अभिवादन किया। उसकी मुस्कान इतनी प्यारी और सच्ची थी कि कोई भी उसे देखकर मोहित हुए बिना नहीं रह सकता था। वह बेहद क्यूट लगी—जैसे कोई डॉल, लेकिन एक रॉयल टच के साथ।
कॉलेज की उसकी दोस्त, पार्टी की होस्ट, उसके पास आई और बोली—
“मीरा, तुम्हारे बिना तो पार्टी अधूरी थी… अब सब परफेक्ट है।”
मीरा ने मासूमियत से हँसते हुए कहा, “अरे पागल, मैं तो वैसे भी आती… तुम मेरी दोस्त हो ना।”
मीरा की मासूम बातों और प्यारे अंदाज़ ने सबका दिल जीत लिया। डांस फ्लोर पर जब वह अपने दोस्तों के साथ हँसते हुए डांस करने लगी तो उसकी क्यूटनेस और भी निखर आई। वह किसी सुपरमॉडल जैसी नहीं, बल्कि एक प्रिंसेस जैसी लगी—जिसकी हर हरकत मासूम और दिल को छू लेने वाली थी।
लड़कों की आँखों में सिर्फ़ मीरा ही थी। कोई उसकी स्माइल पर फिदा था, कोई उसके मासूम हाव-भाव पर। लेकिन मीरा को इन सबकी परवाह नहीं थी। वह तो बस अपनी दोस्तों संग मस्ती में डूबी थी।
कभी वह डांस छोड़कर टेबल पर बैठ जाती, कोक का ग्लास उठाती और दोस्तों से गॉसिप करने लगती। उसकी हंसी पूरे हॉल में गूंज जाती। उसकी हर हरकत में नजाकत थी, लेकिन बनावट नहीं। उसकी यही सादगी और मासूमियत उसे सबसे अलग और खास बना रही थी।
पार्टी देर रात तक चलती रही। हर किसी की नज़रें उस एक लड़की पर थीं—मीरा राजपूत। वह सिर्फ़ रिच और खूबसूरत नहीं थी, बल्कि इतनी प्यारी और सच्ची थी कि हर कोई उसके दीवाने हो गया था।
किसी को अंदाज़ा भी नहीं था कि इस हँसी और चमक के पीछे बहुत जल्द एक तूफ़ान आने वाला है…
पार्टी अपनी रौनक पर थी। डांस फ्लोर पर म्यूज़िक की बीट्स तेज़ थीं और चारों तरफ़ जोश भरा हुआ था। तभी भीड़ से एक हैंडसम लड़का, क्लासी सूट पहने, मीरा के पास आया।
उसने विनम्रता से हाथ आगे बढ़ाया—
“मिस राजपूत, क्या मैं आपको डांस के लिए इनवाइट कर सकता हूँ?”
मीरा ने मुस्कुराकर उसे देखा, लेकिन फिर धीरे से सिर हिला दिया।
“सॉरी, आज डांस का मूड नहीं है।”
लड़का थोड़ी देर ठहरा, फिर झेंपते हुए चला गया। मीरा की दोस्तें तुरंत उसके पास आ गईं।
“गॉड, मीरा! कोई लड़का ऐसा नहीं है जो तुझ पर फ़िदा न हो… फिर भी तू किसी को भाव ही नहीं देती।”
दूसरी ने शरारत से कहा, “तेरी तो हर फोटो इंस्टाग्राम पर आते ही वायरल हो जाती है। सब कहते हैं—‘काश मीरा मेरी होती।’ लेकिन तू है कि किसी को मौका ही नहीं देती। आखिर तुझे कैसा लड़का चाहिए?”
मीरा ने पहले तो हल्की हंसी में टालना चाहा, मगर जब सबकी जिज्ञासु आँखें उस पर टिक गईं तो उसने गंभीर होकर कहा—
“देखो, मुझे कोई पिक्चर-परफेक्ट मॉडल या शो-ऑफ करने वाला नहीं चाहिए। मुझे ऐसा लड़का चाहिए जो सीधा-सादा हो, इनोसेंट हो। जो सिर्फ़ बाहर से ही नहीं, दिल से भी अच्छा हो।”
उसकी दोस्तें हैरान होकर सुनती रहीं।
मीरा ने आगे कहा—
“सबसे ज़रूरी ये है कि वो लड़कियों से हमेशा अच्छे से बात करे। उसके लहज़े में कभी बदतमीज़ी न हो। और… मेरी फीलिंग्स समझ सके। मुझे बार-बार बताना न पड़े कि मैं क्या सोच रही हूँ। वो बस मेरे एक्सप्रेशन्स से ही समझ ले।”
वह थोड़ी देर चुप रही, फिर उसकी आँखों में चमक सी आ गई।
“वो वेल-एजुकेटेड होना चाहिए। ऐसा इंसान, जिसके सामने मुझे कभी डर न लगे। जिसके साथ मैं सुरक्षित महसूस करूँ। ऐसा नहीं कि मुझे हर वक्त सोचना पड़े कि ये मुझे समझेगा या नहीं। मुझे किसी की ताक़तवर पर्सनैलिटी नहीं चाहिए, बल्कि उसका प्यारा सा दिल चाहिए।”
उसकी बातों पर सब उसकी ओर देखती रह गईं।
एक दोस्त ने मज़ाक में कहा, “तो मतलब तुझे प्रिंस चार्मिंग चाहिए?”
मीरा ने हंसकर सिर हिलाया—
“नहीं, प्रिंस चार्मिंग नहीं… मुझे बस कोई ऐसा चाहिए जो असली हो। जो मुझे मीरा राजपूत नहीं, बस एक सिंपल लड़की समझकर प्यार करे।”
उसकी आँखों की मासूमियत और शब्दों की गहराई ने माहौल को कुछ पल के लिए चुप कर दिया। शोर-शराबे वाली पार्टी में भी उसके दिल की ख्वाहिश साफ़ सुनाई दे रही थी।
लेकिन यह कोई नहीं जानता था कि किस्मत ने उसके लिए कैसा इंसान चुना है। शायद वही, जो उसकी चाहत से बिल्कुल उल्टा होगा… और फिर भी वही उसकी जिंदगी में सबसे गहरा असर छोड़ जाएगा।
एक दोस्त ने हंसते हुए कहा, “ओके, तो कल कॉलेज में हमारी आउटिंग पक्की है… हम सब मॉल चलेंगे, खूब शॉपिंग करेंगे।”
मीरा ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया, “नहीं… कल मैं इंडिया जा रही हूँ। बहुत वक्त हो गया है पापा से मिले हुए। पहले तो वो लंदन आते थे मुझसे मिलने, लेकिन अब काम की वजह से नहीं आ पाए। इस बार मैं ही उन्हें सरप्राइज देने जा रही हूँ।”
मीरा राजपूत के लिए यह दिन बेहद खास था। लंदन की चमक छोड़कर वह मुंबई लौट रही थी, अपने पिता से मिलने के लिए। एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही गर्म हवा और भीड़-भाड़ ने उसका स्वागत किया। लंबे सफ़र के बाद भी उसके चेहरे पर वही मासूम मुस्कान और चमक थी।
“मुंबई… आखिरकार मैं आ ही गई,” उसने खुद से कहा और ट्रॉली धकेलते हुए बाहर बढ़ी।
अचानक भीड़ में किसी से उसका हल्का सा टकराव हुआ।
“ओह, सॉरी!” वह कहकर आगे बढ़ने लगी, तभी उसने महसूस किया कि उस अजनबी ने जैसे उसके हाथ को कसकर पकड़ लिया और कुछ दबाया हो।
“अरे, क्या कर रहे हैं आप?” मीरा ने हैरानी से हाथ छुड़ाया।
वो शख्स जल्दी से भीड़ में गायब हो गया।
पहले तो मीरा ने सोचा कि यह बस एक मामूली हादसा था, लेकिन कुछ ही सेकंड बाद उसके हाथ में हल्की जलन और चुभन-सी महसूस हुई। उसने देखा, वहाँ लाल निशान पड़ गया था।
“ये क्या…?” उसने खुद से बुदबुदाते हुए ट्रॉली छोड़ दी और वॉशरूम की ओर बढ़ी।
वॉशरूम के शीशे के सामने खड़े होकर उसने अपनी कलाई देखी। अचानक उसे हल्की चक्कर-सी आने लगी। उसने दोनों हाथों से चेहरा पकड़ लिया।
“मुझे… ये क्या हो रहा है?”
उसकी साँसें तेज़ हो गईं। आँखों के सामने धुंध छाने लगी। वह घबराकर दीवार का सहारा लेने लगी। कुछ ही पलों में उसके पैर लड़खड़ाए और उसका पूरा शरीर ढहकर ज़मीन पर गिर पड़ा।
भीड़भाड़ वाले एयरपोर्ट के उस कोने में सबको लगा शायद कोई थकी हुई यात्री बेहोश हो गई है। लेकिन कोई समझ नहीं पाया कि यह सब योजना का हिस्सा था।
भीड़ के बीच से एक लंबा-चौड़ा, चौड़े कंधों वाला शख्स आया। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था—न घबराहट, न हैरानी। बस ठंडी आँखें और मजबूत इरादे। उसने बिना किसी हिचक के मीरा को अपनी बाँहों में उठाया, जैसे यह सब पहले से तय था।
लोगों को लगा कोई जान-पहचान वाला मदद कर रहा है। किसी ने रोकने की हिम्मत नहीं की।
वह आदमी एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही काली SUV कार की ओर बढ़ा। पिछला दरवाज़ा खोला, और मीरा को आराम से सीट पर लिटा दिया। उसकी साँसें भारी थीं, और आँखें आधी खुली हुईं, जैसे बेहोशी और नींद के बीच झूल रही हो।
कार शहर की भीड़ से निकलकर धीरे-धीरे वीरान रास्तों की ओर बढ़ने लगी। हर स्ट्रीट लाइट के बाद अंधेरा गहराता गया। मीरा का सिर हल्का-हल्का हिल रहा था, जैसे वह कुछ कहना चाहती हो लेकिन बोल नहीं पा रही थी।
करीब एक घंटे बाद कार एक पुराने गेट के सामने रुकी। गेट पर लगी जंग लगी चेन खनकती हुई खुली और SUV अंदर दाख़िल हुई। यह जगह मुंबई का शोरगुल नहीं, बल्कि सन्नाटा समेटे हुए थी।
वह एक हवेली थी—ऊँची दीवारें, टूटी खिड़कियाँ और चारों ओर पसरा अंधेरा। हवेली में कदम रखते ही ऐसा लगता था जैसे वक्त यहाँ कई साल पहले थम गया हो।
शख्स ने कार से उतरकर मीरा को फिर से अपनी बाँहों में उठाया। हवेली के अंदर के बड़े हॉल में धूल जमी थी, लेकिन ऊपर की मंज़िल पर एक कमरा साफ़-सुथरा और तैयार था।
वह उसे सीधा उसी कमरे में ले गया। कमरे के बीचों-बीच एक चौड़ा बिस्तर था। उसने मीरा को वहाँ सावधानी से लिटा दिया। मीरा की कलाई अब भी लाल हो रही थी, और उसकी साँसें नशे से भारी थीं।
शख्स ने कुछ पल उसकी ओर देखा। फिर बिना कुछ कहे कमरे का दरवाज़ा बाहर से बंद कर दिया और भारी ताले में चाबी घुमा दी।
अब हवेली की खामोशी के बीच सिर्फ़ मीरा की धीमी साँसों की आवाज़ गूँज रही थी।
कुछ देर बाद मीरा की आँखें धीरे-धीरे खुलीं। उसने खुद को अनजान कमरे में बिस्तर पर लेटा पाया। घबराकर वह उठी और चारों ओर नज़र दौड़ाई—ऊँची दीवारें, जालीदार खिड़की और बाहर से बंद दरवाज़ा। अचानक वह जोर-जोर से दरवाज़े को पीटने लगी, “मुझे यहाँ से बाहर जाने दो… कोई है?”
कमरे के बाहर अचानक भारी कदमों की आहट सुनाई दी। लकड़ी की फर्श चरमराई और किसी की परछाई दरवाज़े के नीचे से झलकने लगी।
मीरा का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसकी हथेलियाँ पसीने से भीग गईं।
"कौन है बाहर? फिर से मुझे कुछ करने आया है क्या?"
वह डर के बावजूद खुद को सँभालते हुए कमरे के कोने में भागी। वहाँ उसे एक टूटी हुई कुर्सी का टुकड़ा पड़ा मिला—ठंडा-सा लकड़ी का डंडा। उसने बिना सोचे-समझे उसे कसकर पकड़ लिया और परदे के पीछे छुप गई।
दरवाज़ा धीरे-धीरे चरमराता हुआ खुला। लंबा-चौड़ा साया कमरे में दाख़िल हुआ। मीरा ने सांस रोक ली। उसके कदम धीरे-धीरे अंदर बढ़े ही थे कि अचानक मीरा झपटकर बाहर आई और पूरी ताकत से डंडा उस शख्स पर वार करने लगी।
लेकिन अगले ही पल उसकी कलाई थाम ली गई। डंडा हवा में ही रुक गया। उस आदमी ने बिजली-सी तेजी से डंडा पकड़ लिया और उसे झटककर मीरा के हाथ से छुड़ा दिया।
मीरा ने छूटने की कोशिश की, लेकिन तभी वह शख्स अचानक आगे बढ़ा और उसे अपनी मज़बूत बाहों में जकड़ लिया।
मीरा की आँखें फैल गईं—और उसकी आँखें उस अनजान चेहरे से टकराईं।
कुछ पल के लिए सब सन्नाटे में बदल गया।
उसकी नज़रों में सख्ती थी, लेकिन कहीं गहराई में अजीब-सी गर्माहट भी थी। वहीं मीरा की आँखों में डर और गुस्से के साथ मासूमियत झलक रही थी।
दोनों की साँसें एक-दूसरे से टकरा रही थीं।
मीरा की धड़कनें तेज़ थीं, जबकि उस आदमी की पकड़ और कसती जा रही थी।
कमरा मानो इस अनजाने पल का गवाह बन गया था—जहाँ डर, गुस्सा और एक अजीब-सा खिंचाव साथ-साथ मौजूद थे।
मीरा उसके मज़बूत हाथों से खुद को छुड़ाने की पूरी कोशिश कर रही थी।
“छोड़ो मुझे! अभी के अभी छोड़ो!” उसने चीखकर कहा, आँखों में डर और गुस्से का मिश्रण था।
वह शख्स हल्की सी मुस्कान के साथ बोला,
“आज तो तुम्हारा पहला दिन है इस हवेली में… और अभी से छोड़ने की बातें कर रही हो? ये तो बहुत जल्दी है, मिस मीरा राजपूत।”
मीरा ने खुद को और जोर से छुड़ाने की कोशिश की, पर उसकी पकड़ लोहे जैसी थी।
“तुमने मुझे यहाँ क्यों लाया? क्यों किडनैप किया मुझे?” उसने काँपती आवाज़ में सवाल किया।
उस आदमी ने अपनी ठंडी, गहरी आँखों से उसे देखा।
“मेरा नाम… अमरीश मल्होत्रा है। और यह सब इसलिए हुआ क्योंकि तुम्हारे बाप से मेरा हिसाब बाकी है।”
मीरा चौंक गई, उसकी साँस अटकने लगी।
“पापा से? मेरा पापा ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?”
अमरीश की आँखों में गुस्से की ज्वाला भड़क उठी। उसने मीरा को कसकर पकड़ लिया और धीमे लेकिन सख्त स्वर में बोला—
“तुम्हारे बाप… राजवीर राजपूत ने मेरी पूरी फैमिली को मेरी आँखों के सामने खत्म कर दिया था। मेरी माँ, मेरे पिता, मेरी छोटी बहन… सबको!”
उसकी आवाज़ काँप रही थी लेकिन गुस्से से भरी हुई थी।
“मैं कुछ नहीं कर सका… बस देखता रहा। और आज, इतने सालों बाद, वही दर्द मैं उसके सामने वापस दूँगा। वो तड़पेगा, चीखेगा… जब देखेगा कि उसकी राजकुमारी मीरा उसी के सामने तड़प-तड़प कर मर रही है।”
मीरा की आँखें चौड़ी हो गईं। उसके होंठ काँप उठे।
“नहीं… नहीं! पापा ऐसा कभी नहीं कर सकते… तुम झूठ बोल रहे हो!”
अमरीश ने उसकी ठोड़ी पकड़कर उसकी आँखों में देखा।
“झूठ? तुम सोच भी नहीं सकती मीरा… कि तुम्हारे पापा किस हद तक गिर सकता है। और अब… तुम्हें उसी की सज़ा भुगतनी है।”
मीरा ने पूरी ताक़त से खुद को छुड़ाया और दीवार से सटकर खड़ी हो गई। उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं।
“प्लीज़… मुझे जाने दो… मैं तुम्हें प्रॉमिस करती हूँ मैं पापा से सब पूछूँगी, सच जानने की कोशिश करूँगी।”
लेकिन अमरीश ने ठंडी हँसी के साथ कहा—
“अब तुम्हारे पास कोशिश करने का वक्त नहीं, राजकुमारी। खेल शुरू हो चुका है… और इसमें जीत सिर्फ़ मेरी होगी।”
उसके शब्दों ने मीरा की रूह तक कंपा दी।
वह धीरे-धीरे अमरीश की ओर बढ़ी। उसके कदम काँप रहे थे, पर चेहरे पर मासूमियत की एक झलक अब भी थी। उसकी आवाज़ भर्रा गई थी, मगर शब्दों में अब भी विनती छिपी हुई थी।
“प्लीज़… मुझे जाने दो,” मीरा ने कहा, उसकी आवाज़ में ऐसी कोमलता थी कि कोई भी पत्थर दिल इंसान पिघल जाता।
“मैं तुमसे वादा करती हूँ, मैं किसी से कुछ नहीं कहूँगी। बस मुझे इस अंधेरी हवेली में मत रोको… मुझे डर लगता है। मैं सिर्फ अपने पापा से मिलने इंडिया आई थी… ये सब क्यों हो रहा है मेरे साथ?”
उसकी आँखें भर आईं। उसने दोनों हाथ जोड़ लिए और सिर झुकाकर बोली—
“मैं सच में बहुत डर गई हूँ। प्लीज़ मुझे जाने दो। मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ती हूँ।”
अमरीश मल्होत्रा, जो अब तक कठोर और सख्त खड़ा था, एक पल के लिए रुका। उसके दिल में कहीं गहराई में हल्की-सी चुभन उठी। उसकी निगाहें मीरा के आँसुओं पर टिक गईं। उसने सोचा—क्या ये लड़की सच में उतनी ही भोली है जितनी दिख रही है? या ये भी अपने बाप की तरह चालाकी में माहिर है?
उसकी उँगलियाँ मुट्ठी में कस गईं। लेकिन उसके चेहरे पर हल्का-सा भाव बदल गया। ऐसा लगा जैसे उसके भीतर का इंसान और भीतर का राक्षस एक-दूसरे से लड़ रहे हों।
कुछ सेकंड तक कमरे में सिर्फ मीरा की सिसकियाँ और हवा की सरसराहट गूँजती रही।
फिर अमरीश ने खुद को सँभाल लिया। उसने एक ठंडी हँसी हँसी, जैसे उसके दिल पर मीरा की मासूमियत का कोई असर ही न पड़ा हो।
“इतनी जल्दी?” वह धीमी आवाज़ में बोला। “आज तो तुम्हारा पहला दिन है इस हवेली में… और अभी से छोड़ने की बातें कर रही हो? नहीं मीरा… ये इतनी आसान नहीं है।”
मीरा ने उसकी ओर देखा, उसकी उम्मीद की आखिरी किरण भी बुझने लगी। उसकी आँखों में आँसू और गुस्से का मिश्रण था।
“क्या तुम सच में इंसान हो? तुम्हारे दिल में ज़रा-सी भी रहम नहीं है?”
अमरीश चुप रहा। उसकी खामोशी ने मीरा को और तोड़ दिया।
उसका डर अब गुस्से में बदल रहा था। उसने अचानक अपने आँसू पोंछे और खुद को मज़बूत करने की कोशिश की।
“ठीक है… अगर तुम मेरी बात नहीं सुन रहे… तो मैं खुद को बचाने की कोशिश करूँगी।”
उसने अचानक पूरी ताक़त से अमरीश को धक्का दिया।
“दूर हटो!”
लेकिन उसकी नाज़ुक बाहों का असर अमरीश की चौड़ी काया पर बिल्कुल भी नहीं हुआ। वह पत्थर की तरह वहीं खड़ा रहा। उसकी आँखें अब और गहरी, और भी ठंडी हो चुकी थीं।
मीरा और तमतमाई।
“क्या तुम सुन नहीं रहे? मुझे यहाँ से जाने दो!”
उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। दिल धड़क-धड़ककर जैसे सीने से बाहर निकलने को था।
“अगर तुमने मुझे नहीं छोड़ा,” उसने दहाड़ते हुए कहा, “तो तुम जानते नहीं हो कि मेरे पापा क्या चीज़ हैं! वो तुम्हें खड़े-खड़े खरीद सकते हैं… और चाहें तो तुम्हें मिट्टी में भी मिला सकते हैं!”
उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि हवेली की दीवारों तक गूँज उठी।
ये सुनते ही अमरीश की आँखों में गुस्से की लपटें उठ खड़ी हुईं। उसके चेहरे पर नफ़रत साफ़ झलकने लगी। उसकी साँसें भारी हो गईं। उसने अपने दाँत भींच लिए।
वह धीरे-धीरे मीरा की ओर बढ़ने लगा। हर कदम के साथ मीरा के भीतर डर और बढ़ता जा रहा था।
मीरा पीछे हटती गई। उसकी पीठ दीवार से जा टकराई। अब उसके पास पीछे हटने की कोई जगह नहीं थी।
अमरीश उसके बिल्कुल करीब आ गया। उसका चेहरा इतना पास था कि मीरा उसकी साँसों की गर्माहट महसूस कर सकती थी। उसकी आँखें क्रोध से लाल थीं।
“खरीद लेंगे?” उसकी आवाज़ गहरी और कड़क थी।
“तुम्हारे बाप ने मुझे कभी खरीदने की कोशिश की थी। लेकिन वो भूल गया कि अमरीश मल्होत्रा बिकने वालों में से नहीं है। अब… वही उसकी सबसे बड़ी गलती बनेगी।”
मीरा काँप उठी। उसने डर को छिपाने की कोशिश की, लेकिन उसकी आँखें सब बयां कर रही थीं।
“तुम… तुम क्या करोगे?” उसकी आवाज़ फुसफुसाहट जैसी थी।
अमरीश और करीब झुका, उसके चेहरे पर गुस्से की परछाई फैल गई।
“तुम अभी देखोगी… कि अमरीश मल्होत्रा के गुस्से का अंजाम क्या होता है।”
मीरा का दिल जैसे एक पल के लिए रुक गया। उसकी आँखें चौड़ी हो गईं। उसके होंठ काँप उठे।
कमरे का सन्नाटा अब और भी भारी हो गया। बाहर हवाएँ जोर से चल रही थीं, खिड़की के पर्दे फड़फड़ा रहे थे।
और अमरीश का गुस्सा… अब फूटने ही वाला था।
मीरा राजपूत दीवार से सटी खड़ी थी। उसकी साँसें तेज़ थीं, आँखों में आँसू, और होंठों पर डर और गुस्से का मिला-जुला असर। वह बार-बार अपने काँपते हाथों को कसकर पकड़ रही थी, जैसे खुद को टूटने से बचाना चाहती हो।
अमरीश मल्होत्रा उसके सामने खड़ा था। लंबा-चौड़ा, चौड़ी छाती, और चेहरे पर नफ़रत की आग। उसकी आँखें ऐसी थी जैसे उनमें कोई जलता हुआ तूफ़ान कैद हो।
मीरा ने काँपती आवाज़ में कहा—
“मैंने कहा था न… मेरे पापा तुम्हें बर्बाद कर देंगे अगर तुमने मुझे नहीं छोड़ा तो। तुम्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं है कि वो कौन हैं!”
अमरीश के चेहरे पर एक कड़वी हँसी फैल गई।
“पापा… पापा…” उसने शब्दों को चबाते हुए दोहराया। “तुम्हारे पापा ही वो शख़्स हैं जिन्होंने मेरी ज़िंदगी तबाह कर दी। मेरी फैमिली को मेरी आँखों के सामने मार डाला। और अब… मैं वही दर्द तुम्हारी आँखों में देखना चाहता हूँ। ताकि उसे भी पता चले कि जब अपनी औलाद तड़पती है तो कैसा लगता है।”
मीरा की आँखें चौड़ी हो गईं। उसके होंठ काँपने लगे।
“नहीं… ये सच नहीं हो सकता…”
“ये सच है,” अमरीश गरजा। “और अब तुम ही उस खेल का हिस्सा हो।”
मीरा के पैरों के नीचे जैसे ज़मीन खिसक गई। वह काँपते हुए बोली—
“प्लीज़… मुझे इसमें मत घसीटो। मैं निर्दोष हूँ। मैं… मैं सिर्फ पढ़ाई करती हूँ। मुझे इन सब से क्या लेना-देना?”
उसके शब्दों में मासूमियत थी। उसका चेहरा आँसुओं से भीग गया। लेकिन अमरेश के दिल की नफ़रत उसकी मासूमियत से कहीं बड़ी थी।
वह उसके और करीब आया। मीरा ने पीछे हटना चाहा लेकिन उसकी पीठ दीवार से टकरा गई। अब वह कहीं भाग नहीं सकती थी।
अमरीश ने अपना हाथ दीवार पर रख दिया, बिल्कुल मीरा के सिर के पास। उसकी चौड़ी काया मीरा को चारों तरफ से घेर चुकी थी। उसकी गहरी आवाज़ गूँजी—
“भाग कहाँ जाओगी, राजपूत? ये हवेली अब तुम्हारी कैदखाना है।”
मीरा ने हिम्मत जुटाई और गुस्से में बोली—
“तुम मुझे कैद कर सकते हो… लेकिन मेरी आत्मा को नहीं। मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करूँगी। तुम राक्षस हो।”
यह सुनते ही अमरीश की आँखों में खून उतर आया। उसका चेहरा और पास आया।
“राक्षस?” उसने धीरे से कहा। “हाँ… तुम्हारे बाप ने मुझे यही बना दिया। और अब इस राक्षस से बचने का कोई रास्ता नहीं है तुम्हारे पास।”
मीरा का दिल ज़ोर से धड़क रहा था। उसके आँसू अब लगातार बह रहे थे। उसने काँपते हुए फिर से रिक्वेस्ट की—
“प्लीज़… मुझे जाने दो। मैं किसी को कुछ नहीं बताऊँगी। मैं वादा करती हूँ…”
अमरीश ने उसकी आँखों में झाँका। वहाँ सिर्फ मासूमियत और डर था। एक पल के लिए वह रुका। उसके भीतर की किसी डोर ने उसे रोकना चाहा। लेकिन अगले ही पल उसका गुस्सा और बदले की आग और भी भड़क उठी।
“वादा?” वह तड़पकर हँसा। “तुम्हारे बाप ने भी मुझे वादा किया था कि वो मेरी फैमिली को नहीं छूएगा। लेकिन उसके वादे का अंजाम मैंने अपनी आँखों से देखा। अब तुम्हारे वादे मेरे लिए सिर्फ मज़ाक हैं।”
मीरा ने गुस्से में उसका हाथ धक्का देकर हटाने की कोशिश की।
“हटो! मुझसे दूर रहो!”
लेकिन अमरीश पत्थर की दीवार की तरह अडिग खड़ा रहा। उसकी पकड़ इतनी मज़बूत थी कि मीरा की छोटी-सी कोशिश का उस पर कोई असर नहीं पड़ा।
उसकी आँखें मीरा के काँपते होंठों पर टिक गईं। उसका गुस्सा अब एक खतरनाक रूप लेने लगा था।
“इतनी बहादुरी?” उसने धीमी आवाज़ में कहा। “ठीक है… तो सुनो। आज से तुम्हारा हर लम्हा, हर साँस, सिर्फ मेरी कैद में होगी। और ये बात मैं तुम्हें अभी साबित कर देता हूँ।”
इससे पहले कि मीरा कुछ समझ पाती, अमरीश ने अचानक उसे बाँहों में जकड़ लिया।
“छोड़ो मुझे!” मीरा चीखी, उसने पूरी ताक़त से हाथ-पाँव मारे। लेकिन अमरीश की पकड़ इतनी सख़्त थी कि वह बिल्कुल भी छूट नहीं पा रही थी।
मीरा की आँखों से आँसू बह रहे थे, उसकी साँसें तेज़ हो गईं।
“तुम पागल हो गए हो! मुझे जाने दो वरना…”
“वरना क्या?” अमरीश ने उसकी आँखों में सीधे झाँकते हुए कहा। “तुम्हारे पापा आएँगे? उन्हें बुला लो। लेकिन उससे पहले… मैं तुम्हें ये एहसास दिलाऊँगा कि अब तुम्हारी ज़िंदगी तुम्हारी नहीं रही।”
और उसी पल, अपने गुस्से और बदले की आग में जलते हुए, अमरीश ने झुककर मीरा के काँपते होंठों पर एक ज़बरदस्त, फोर्सफुल किस जड़ दिया।
मीरा की आँखें हैरानी और डर से चौड़ी हो गईं। उसने पूरी ताक़त से धक्का देने की कोशिश की, लेकिन अमरीश की बाँहों का घेरा और भी कसता गया। उसके आँसू गालों पर बहते रहे, वह तड़पती रही, पर अमरीश के गुस्से और ज़िद के सामने उसकी नाज़ुक कोशिशें नाकाम साबित हो रही थीं।
कुछ पल ऐसे लगे जैसे पूरा कमरा रुक गया हो। हवा थम गई, हवेली की दीवारें भी खामोश हो गईं।
आख़िरकार, अमरीश ने उसे छोड़ा। मीरा हाँफती हुई दीवार से टिक गई, उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
वह काँपती आवाज़ में बोली—
“तुम… तुमने ये कैसे किया… मैं तुमसे नफ़रत करती हूँ… सुन रहे हो? मैं तुमसे नफ़रत करती हूँ!”
अमरीश ने उसकी ओर ठंडी नज़रों से देखा।
“नफ़रत करो जितनी करनी है। क्योंकि यही नफ़रत… धीरे-धीरे तुम्हें मेरी दुनिया में बाँध लेगी।”
कमरे का सन्नाटा और गहरा हो गया। बाहर हवाओं की आवाज़ तेज़ होने लगी।
मीरा का दिल टूट चुका था। उसके आँसू बहते रहे, जबकि अमरेश का चेहरा कठोर और निर्दयी बना रहा।
उसने अपने गुस्से, अपने दर्द और अपने बदले की पहली चाल चल दी थी।
कमरे का माहौल ठहरा हुआ था। हवेली की मोटी दीवारों के बीच सिर्फ़ मीरा की हाँफती साँसें और अमरीश की गहरी साँसों की ध्वनि गूँज रही थी। खिड़की के बाहर हवाएँ ज़ोरों से चल रही थीं, जैसे भीतर हो रही जंग को बाहर का मौसम भी महसूस कर रहा हो।
मीरा दीवार से सटी खड़ी थी, आँखों में आँसू, बदन काँपता हुआ। उसके होंठ अभी भी उस ज़बरदस्ती के एहसास से जल रहे थे। वह हर साँस के साथ खुद को टूटने से बचाने की कोशिश कर रही थी।
अमरीश उसके सामने खड़ा था, उसकी आँखों में अब भी वही आग थी। उसने अपने जबड़े भींचे और धीमे कदमों से मीरा के करीब आया।
मीरा ने काँपती आवाज़ में कहा—
“पास मत आना … पीलिज…”
लेकिन अमरीश के कदम नहीं रुके। उसने एक झटके में हाथ बढ़ाकर उसके कंधे पर कसकर पकड़ बना ली। मीरा सिहर उठी, उसकी देह काँप गई।
“डर क्यों रही हो?” अमरीश की आवाज़ धीमी मगर भारी थी। “तुम्हारे पापा ने मुझे राक्षस बनाया था… और आज तुम देख रही हो वही राक्षस तुम्हारे सामने खड़ा है।”
मीरा ने उसकी पकड़ छुड़ाने की कोशिश की, मगर उसका हाथ लोहे की तरह जकड़ा रहा। आँसू उसकी आँखों से ढलकते गए।
“तुम… तुम इंसानियत भूल चुके हैं,” मीरा ने गुस्से और दर्द में काँपते स्वर में कहा। “तु मेरे साथ जितनी भी क्रूरता कर लो… मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करूँगी। न कभी डरूँगी।”
अमरीश का चेहरा एक पल को तन गया। उसकी आँखों में झलकते गुस्से और अंदर कहीं गहरी चोट का मिलाजुला भाव था। उसने धीरे से अपना दूसरा हाथ बढ़ाकर मीरा की ठुड्डी उठाई, ताकि उसकी आँखें उसकी आँखों में बंध जाएँ।
“डर नहीं रही हो?” उसने होंठ भींचकर कहा। “तो फिर ये आँसू किस बात के हैं?”
मीरा ने अपना चेहरा झटकने की कोशिश की, मगर उसकी ठुड्डी उसकी मजबूत उँगलियों में कैद थी।
“ये आँसू… तुम्हारी तरह के इंसानों की नफ़रत से हैं। मेरे आँसू मेरी कमज़ोरी नहीं, मेरी ताक़त हैं।”
अमरीश ने तड़पकर उसकी ठुड्डी छोड़ दी और पलटकर दीवार पर हाथ मारा। लकड़ी का पैनल ज़ोर से हिला। कमरे की खामोशी और गहरी हो गई।
“तुम्हें अंदाज़ा ही नहीं है मीरा राजपूत,” उसने भारी आवाज़ में कहा। “तुम्हारे पापा ने मुझसे सब छीन लिया। मेरा परिवार, मेरा घर, मेरी हँसी… सब कुछ। अब मैं वही छीनूँगा उनसे… तुम्हारे ज़रिए।”
वह फिर उसकी ओर मुड़ा। इस बार उसके कदम और भी धीमे, मगर खतरनाक थे।
मीरा दीवार से और सिमट गई। उसके हाथ काँप रहे थे, मगर उसने हिम्मत जुटाई और कहा—
“अगर तुम्हे बदला लेना है तो लो, मगर मुझे क्यों घसीट रहे हैं? मैं निर्दोष हूँ। मैं सिर्फ़ एक बेटी हूँ। तुम्हारे ग़ुस्से और तुम्हारे ज़ख़्मों की कीमत क्यों मुझे चुकानी पड़े?”
अमरीश उसकी बात पर एक पल के लिए थम गया। उसकी आँखों में अजीब-सी झलक आई—जैसे कोई पुराना ज़ख़्म फिर से ताज़ा हो गया हो। मगर तुरंत ही उसका चेहरा फिर कठोर हो गया।
वह आगे बढ़ा और उसके बिल्कुल करीब आकर खड़ा हो गया। उसकी साँसें मीरा के चेहरे को छूने लगीं। मीरा ने आँखें कसकर बंद कर लीं, जैसे वह उस एहसास से खुद को बचाना चाहती हो।
“अब तुम्हारा हर सवाल, हर साँस… मेरे जवाब पर निर्भर करेगा,” अमरीश ने धीमे स्वर में कहा। उसने अपना हाथ बढ़ाकर मीरा के गाल से बहते आँसू को छुआ, फिर तुरंत कसकर उसकी बाँह पकड़ ली।
मीरा चीखी—“छोड़ दो मुझे!” उसने पूरी ताक़त से खुद को छुड़ाने की कोशिश की, मगर अमरीश का हाथ और भी कस गया।
“तुम्हें लगता है तुम भाग सकती हो?” उसकी आवाज़ गरज उठी। “यह हवेली तुम्हारा कैदखाना है। हर दरवाज़ा, हर खिड़की मेरे इशारे पर खुलेगी। यहाँ तुम सिर्फ़ मेरी बंदी हो।”
मीरा की साँसें तेज़ हो गईं। उसके होंठ काँपते हुए शब्द बुदबुदाए—
“तुम्हें खुद पर शर्म आनी चाहिए।”
अमरीश की आँखें गुस्से से भर गईं। वह झुका और अचानक उसके कान के पास आकर फुसफुसाया—
“इंसानियत मेरी आँखों के सामने मर चुकी है। जिस दिन मैंने अपने माँ-बाप की लाशें देखीं… उसी दिन।”
मीरा की आँखें नम होकर और चौड़ी हो गईं। वह सिसकते हुए बोली—
“तुम्हारे दर्द को मैं समझ सकती हूँ… लेकिन इस तरह किसी निर्दोष को सज़ा देना… ये तुम्हें और भी छोटा बना देगा।”
अमरीश की उँगलियाँ उसके कंधे पर और कस गईं। वह उसकी आँखों में झाँकता रहा।
“तुम्हें लगता है मैं छोटा हूँ? नहीं… मैं वो आग हूँ जिसे तुम्हारे पापा ने खुद जलाया है। और अब उस आग में तुम भी जलोगी।”
उसने झटके से मीरा को अपनी ओर खींच लिया। उसका बदन उसके चौड़े सीने से टकराया। मीरा ने घबराकर उसे धक्का देने की कोशिश की, मगर उसकी पकड़ और कसती गई।
उसने एक पल उसके बालों में हाथ फेरा और धीमे स्वर में कहा—
“तुम्हारे होंठों पर अब भी मेरा निशान है… याद रखना, ये शुरुआत है।”
मीरा ने काँपते हुए कहा—
“तुम चाहे जितना भी क़ैद कर लो… मैं तुम्हारी नहीं हो सकती। मैं तुमसे नफ़रत करती हूँ। और ये नफ़रत ही मेरी ढाल होगी।”
अमरीश की आँखों में पागलपन-सा नाच गया। उसने कसकर मीरा की बाँह छोड़ी और कुछ कदम पीछे हट गया। उसके चेहरे पर ठंडी हँसी उभरी।
“नफ़रत… हाँ, वही नफ़रत तुम्हें बाँधेगी। याद रखना, मीरा राजपूत, नफ़रत और प्यार दोनों में सिर्फ़ एक धागे का फ़र्क़ होता है। और मैं यक़ीन दिलाऊँगा कि तुम उस धागे को कभी काट न सको।”
मीरा हाँफती हुई दीवार से टिक गई। उसके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। वह टूटी हुई-सी लगी, मगर उसकी आँखों में अब भी जिद थी, विरोध था।
कमरे में सन्नाटा फिर से उतर आया। बाहर हवाएँ और तेज़ हो गईं, जैसे हवेली का हर कोना आने वाले तूफ़ान की गवाही दे रहा हो।
अमरीश मुड़ा, और कमरे के दरवाज़े की ओर बढ़ गया। जाते-जाते उसने ठंडी नज़र से मीरा को देखा और कहा—
“आज से तुम्हारी ज़िंदगी मेरी है। न तुम इसे चाहो या न चाहो, फर्क नहीं पड़ता। याद रखना—मैंने अपनी पहली चाल चल दी है।”
दरवाज़ा ज़ोर से बंद हुआ।
मीरा वहीं दीवार से सटी खड़ी रही, टूटती साँसों के साथ। उसकी आँखों में आँसू थे, मगर दिल में एक आग—उस आग का नाम था विरोध।
दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ कमरे में गूँजती रही। मीरा ने काँपते हाथों से अपनी बाँहों को थाम लिया, जैसे अपने टूटे हुए आत्मविश्वास को संभालना चाहती हो। उसके गाल आँसुओं से भीगे थे, होंठ सूखे और काँपते हुए।
वह धीरे-धीरे दीवार से अलग हुई और फर्श पर बैठ गई। दोनों घुटनों को सीने से लगाकर, सिर को हथेलियों में छुपा लिया। उसके कानों में अब भी अमरीश की ठंडी आवाज़ गूंज रही थी—
“आज से तुम्हारी ज़िंदगी मेरी है…”
उसकी साँसें अनियंत्रित हो रही थीं। वह बुदबुदाई—
“नहीं… मेरी ज़िंदगी मेरी है… सिर्फ़ मेरी।”
उसने आँखें बंद कीं और अपने पापा का चेहरा याद किया। उनकी मुस्कान, उनकी मज़बूत आवाज़, उनकी सुरक्षा। एक पल को लगा जैसे उनके शब्द उसे शक्ति दे रहे हों—“मीरा, हालात चाहे जैसे हों, तुम राजपूत की बेटी हो। कभी हार मत मानना।”
मीरा ने गहरी साँस ली। उसके आँसू अब भी बह रहे थे, मगर भीतर कहीं उसकी नज़रों में जिद चमकने लगी थी।
“तुम ने मेरी आत्मा को कैद नहीं किया, अमरीश मल्होत्रा… और कभी कर भी नहीं पाएँगे।”
उसने काँपते कदमों से कमरे का मुआयना किया। खिड़कियाँ मोटे सरियों से बंद थीं, दरवाज़े पर भारी ताला। हवेली वाकई कैदखाना बन चुकी थी। लेकिन उसके भीतर एक विचार जन्म ले रहा था—कैसे भी करके, उसे यहाँ से निकलना होगा।
उसने अपनी हथेलियों को कसकर जोड़ा।
“आपकी नफ़रत मेरी ढाल बनेगी। और मैं साबित करूँगी कि आपकी जीत कभी पूरी नहीं होगी।”
बाहर हवाओं की आवाज़ और तेज़ हो गई, जैसे पूरी हवेली इस टकराव की गवाह बन चुकी हो।
अमरीश की वापसी
BMW 7-सीरीज काली चमकदार कार तेज़ रफ्तार से गोवा एयरपोर्ट से निकलकर मुंबई हाईवे पर दौड़ रही थी। आसमान पर बादल थे, हल्की रौशनी में कार के भीतर का माहौल ऐसा था मानो किसी गहरी योजना का मंच सजा हो।
पीछे की सीट पर अमरीश बैठा था — एकदम सीधा, तनकर, जैसे किसी युद्धभूमि से लौट रहा हो। उसकी आंखें स्थिर थीं, और चेहरा उस चुप्पी से ढका था जो किसी खतरे से पहले की चेतावनी होती है।
सूट का काला रंग उसकी ठंडक से मेल खा रहा था। बाल व्यवस्थित, गले में टाई की गिरावट तक गणना की तरह सटीक। उसकी कलाई पर बंधी घड़ी हर सेकंड के साथ जैसे किसी औरत की चीखें गिन रही थी।
अचानक उसकी उंगलियाँ खिड़की के किनारे बजने लगीं — धीमे, क्रमवार, जैसे कोई धुन नहीं बल्कि गिनती हो रही हो।
उसने एक लंबी साँस ली। सामने ड्राइवर पूरी तन्मयता से गाड़ी चला रहा था — लेकिन जानता था कि पिछली सीट पर बैठा शख़्स चुप होने पर सबसे ज़्यादा ख़तरनाक होता है।
“सर… सीधे हवेली?” ड्राइवर की आवाज़ बेहद धीमी थी।
अमरीश की पलकों ने भी हिलने से मना कर दिया। फिर कुछ सेकंड बाद उसकी आवाज़ आई — ठंडी, धारदार।
“तुम्हारी ज़ुबान की आवाज़ मेरी सोच में खलल डालती है। अगली बार बिना माँगे मत बोलना।”
ड्राइवर काँप गया। जवाब देने की हिम्मत भी नहीं बची। उसने शीशा ऊपर खींच दिया।
अब कार के भीतर सिर्फ AC की हल्की गूंज और अमरीश की साँसों की गहराई रह गई थी।
उसने अपनी जैकेट की जेब से एक सिल्वर फ्लास्क निकाली। ढक्कन खोला — धीमे, नपा-तुला — और उसमें से एक घूंट लिया। गला गर्म होने लगा। पर दिल… दिल अब भी बर्फ़ जैसा था।
उसकी आंखें अब छत की ओर उठीं। गाड़ी की छत — उस खाली कैनवास की तरह जिसमें वो मीरा की यातना की पेंटिंग बना रहा था।
“मीरा…”
वह नाम ज़बान पर जैसे ज़हर बनकर उतरा।
“तुम सोचती थी तुम आज़ाद है? मेरी गिरफ़्त से बाहर निकल चुकी है?” वह खुद से बात कर रहा था, लेकिन हर शब्द जैसे किसी अदृश्य शिकार के लिए फेंका गया शिकंजा था।
“गोवा में दो दिन की मीटिंग थी, पर इन दो दिनों में तुम मेरे ज़हन से एक सेकंड को भी नहीं गई, मीरा।”
उसने फ्लास्क को दोबारा होंठों से लगाया — एक लंबा घूंट।
“तेरा जिस्म अब मेरी हवेली में है। और बहुत जल्द… तेरी आत्मा भी होगी।”
उसकी उंगलियाँ अब सख़्त हो गई थीं। वह अपनी हथेली की रेखाओं को ऐसे देख रहा था जैसे इनमें से एक-एक रेखा मीरा को तड़पाने का प्लान हो।
“मैं तुझे तोड़ूँगा। दिन में तुझे आज़ाद रहने दूँगा, पर रात…”
“…रात को तुम मेरा चेहरा देखेगी, अपनी सासों से डरते हुए। मैं तुम्हें चैन से सोने नहीं दूँगा, मीरा।”
कार अब हाईवे से उतरकर मुंबई की ओर मुड़ चुकी थी। लेकिन अमरीश की आंखों में अब भी गोवा के समंदर की लहरें थीं — नहीं, वे लहरें नहीं थीं… वे यादें थीं।
वही मीरा की हँसी, जो आज उसे अंदर तक खा रही थी।
“तुम्हारे होंठों की वो हँसी… अब सिर्फ मेरी सज़ा की घंटी बनेगी।”
वह अचानक अपनी जैकेट की बटन खोलता है, कॉलर ढीला करता है, जैसे अपने भीतर के ज्वालामुखी को ठंडा करने की नाकाम कोशिश कर रहा हो।
“तुम्हारे हर आँसू से मेरा दर्द कम करेगे, मीरा।”
कार की रफ्तार तेज़ हो गई थी, लेकिन कार के भीतर समय जैसे ठहर गया था।
अमरीश अब अपने फोन को घूर रहा था। उसमें मीरा की एक पुरानी तस्वीर थी — सफेद कपडों में, आँखों में काजल, मुस्कान में निर्दोषियत।
वह कुछ देर देखता रहा… फिर अचानक वह तस्वीर डिलीट कर दी।
“यहाँ कोई रिश्ता नहीं… सिर्फ बस बदला है।”
उसके चेहरे पर एक धीमी मुस्कान फैली — विषैली, हिंस्र।
“तुम्हारे डर… तुम्हारे अपमान… वही मेरा प्रेम है अब। यही मेरी तृप्ति है।”
एक क्षण को उसने आँखें मूँद लीं — और फिर ज़ोर से ठहाका लगाया।
“हह! अमरीश से खेल? तुमने सोचा भी कैसे?”
अब वह खिड़की के बाहर देख रहा था — शहर की रौशनी पास आ रही थी। लेकिन उसके भीतर अंधेरा और गहरा होता जा रहा था।
“रखैल… इस शब्द को मै तुम्हारी किस्मत बना दूगां ”
“अब यही तुम्हारा नाम है — हर जगह में, हर इंसान की नज़र में… तुम से जुड़ी हर बात में।”
वह अब सीट की टेक से पीछे झुकता है। उसकी टाँगें फैल जाती हैं। जैसे एक साम्राज्य का बादशाह अपने फैसले से संतुष्ट होकर विश्राम कर रहा हो।
“हर रात जब तुम आईना देखोगी — तुम्हें दिखाऊगा कि तुम सिर्फ एक औरत नहीं… तुम मेरा अभिमान मरोड़ने का दंड हो। और मैं वो न्याय हूँ, जो अपने हाथों से तुम्हें भोगेगा।”
गाड़ी अब शहर के आलीशान इलाके में दाखिल हो चुकी थी।
अमरीश ने अंतिम घूंट फ्लास्क से लिया, और उसे वापस जैकेट में रख दिया।
“अब तुम मेरी हवेली में हो, मीरा। और तुम्हें आज़ादी नहीं मिलेगी — तब तक नहीं, जब तक तुम घुट-घुट कर ये न कह दे कि तुझे मुझसे नफ़रत नहीं… डर लगता है।”
वह सीधा बैठ गया।
अब वह तैयार था — नहीं, मीरा के लिए नहीं… अपने ही रचे नरक के रंगमंच पर पहला दृश्य खेलने के लिए।
कार ने हवेली के बाहर ब्रेक लगाया। लेकिन अमरीश के भीतर जो लपटें थीं, वे अब भी धधक रही थीं।
“अमरीश वापस आ गया है, मीरा…”
“…और अब तुम कहीं नहीं जा सकती।”
अगर यह कहानी आपके दिल को छू गई हो...
तो एक छोटी-सी गुज़ारिश है...
मैंने अपने दिल की परतों को और भी कई कहानियों में उतारा है।
हर कहानी में कुछ अधूरे सपने हैं, कुछ सच्चे जज़्बात, और कुछ ऐसे किरदार —
जो शायद कहीं न कहीं आपके अपने जैसे लगें।
अगर इस कहानी ने आपको एक पल के लिए भी रोका हो,
सोचने पर मजबूर किया हो…
तो मेरी बाकी कहानियाँ भी आपका इंतज़ार कर रही हैं।
जाकर ज़रूर पढ़िए…
क्योंकि शब्दों के उस संसार में —
शायद कोई और कहानी आपका नाम ले रही हो।
पढ़ेंगे न?" 🤍📖
हवेली में अमरीश की एंट्री
हवेली के ऊँचे फाटक भारी आवाज़ के साथ खुले — जैसे वक़्त ने फिर से किसी पुरानी सज़ा की किताब का पहला पन्ना पलटा हो। कार धीमे-धीमे भीतर घुसी। बाहर की रोशनी से काली BMW के चमकते बदन पर परछाइयाँ लहराईं, लेकिन कार के भीतर बैठे आदमी की आँखों में सिर्फ एक सीधा लक्ष्य था — हवेली के उस दरवाज़े को फिर से पार करना, जहाँ से नफ़रत ने आख़िरी बार उसे विदा किया था।
गाड़ी के रुकते ही नौकर दौड़ता हुआ आया — देव।
उसने झुककर सलाम किया, पर उसकी आँखों में डर था। नहीं, यह सामान्य सम्मान का डर नहीं था — यह उस इंसान के लौट आने की दहशत थी, जिसे हवेली की दीवारें भी कभी भुला नहीं सकीं।
“सर…” देव की आवाज़ लड़खड़ाई, “आपका स्वागत है।”
अमरीश ने बिना उसकी ओर देखे दरवाज़ा खोला। पॉलिश किए हुए जूतों ने ज़मीन को छुआ — और हवेली की ज़मीन पर एक बार फिर वह अंधेरा उतर आया, जिससे मीरा भागती रही थी।
वह आगे बढ़ा — धीमे, सधे हुए क़दम। जैसे हर दीवार को एक बार फिर अपने अधीन करने जा रहा हो।
अंदर की दीवारें वही थीं, पर उनमें अब एक अजीब-सी खामोशी थी — जैसे हवेली को पता था कि उसका सबसे क्रूर राजा वापस आ गया है।
सीढ़ियों की ओर बढ़ते वक़्त, उसने अचानक देव की ओर देखा।
“मीरा…?”
सिर्फ एक शब्द। पर देव के लिए यह किसी हथौड़े जैसा था।
“सर, वो… वो ऊपर अपने कमरे में ही हैं।
“अच्छा है” अमरीश ने खुशी से कहा।
देव ने एक पल को अपनी नज़रें झुका लीं।
अमरीश के होठों पर हल्की मुस्कान आई — वह मुस्कान नहीं, एक संतोष था।
वह आगे बढ़ा, पर एक पल को फिर रुका। “देव, हवेली में बाकी स्टाफ इस वक्त कहाँ है?”
“वो साहब, सब आराम कर रहे हैं |
“ठीक है।” अमरीश ने कहा, और फिर सीधे अपने पुराने कमरे की ओर बढ़ गया।
हवेली का वही कमरा — लेकिन अब और गहरा
कमरे का दरवाज़ा उसने धीमे से खोला। सब कुछ वैसा ही था, जैसे वह छोड़ गया था। बेड की चादर, सोफे की जगह, वॉर्डरोब में लगी लकड़ी की वही खुरदरी गंध… पर एक चीज़ नई थी — दीवार पर लगी एक तस्वीर… मीरा की।
ब्लैक कपडों में, खिड़की के पास बैठी — कैमरा शायद चुपके से लिया गया था।
उसने जाकर तस्वीर को देखा — उंगलियाँ उसके फ्रेम को छूने लगीं, जैसे उस तस्वीर के ज़रिए मीरा की साँसों को महसूस करना चाहता हो।
फिर उसने अपनी जैकेट उतारी, फ्लास्क बाहर निकाली, और एक लंबा घूंट लिया।
कमरे की खिड़की से दूर-दूर तक हवेली का पिछला हिस्सा दिखाई दे रहा था। और वो कमरा… जहाँ मीरा थी — बस तीन कमरे दूर।
मीरा के कमरे में
कमरे की खिड़की पर बैठी मीरा को अचानक जैसे ठंडी हवा का एक झोंका छू गया। उसने घबराकर पर्दा गिरा दिया।
फिर धीमे से उठी, अलमारी में रखे एक पुराने डिब्बे से कुछ कागज़ निकाले — वह वही डायरी थी, जिसमें वह अमरीश के जाने के बाद अपने डर, अपने घाव और अपनी उम्मीदें लिखती आई थी।
लेकिन जैसे ही वह डायरी खोलने लगी — बाहर से देव की धीमी आवाज़ आई —
“मैडम… साहब लौट आए हैं।”
मीरा के हाथ से डायरी गिर पड़ी।
साँसें जैसे थम गईं।
“क्या?” उसकी आवाज़ फटी।
देव ने धीरे से कहा, “हां, गाड़ी अभी-अभी आई है। सीधे अपने कमरे में गए हैं।”
मीरा पीछे हट गई — खिड़की से दूर, दीवार से लगकर बैठ गई। उसका दिल बेतहाशा धड़कने लगा।
उसने खुद से बड़बड़ाना शुरू किया — “नहीं… नहीं… वो वापस नहीं आ सकता। इतना जल्दी नहीं। अभी तो कुछ दो ही हुए हैं।”
उसके भीतर की लड़ाई अब फिर से शुरू हो गई थी — वही डर, वही छवियाँ, वही रातें जब अमरीश की आँखों में नींद नहीं, क्रूरता होती थी।
“अब क्या करेगा वो? अब क्या बचा है उसे मुझसे छीनने के लिए?”
उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे। उसने अपना चेहरा अपने घुटनों में छुपा लिया।
“हे भगवान… मुझे बचा ले… कोई तो रास्ता दिखा… मैं फिर से टूट नहीं सकती।”
पर उस कमरे की दीवारों को पता था — यह हवेली अब फिर से एक अखाड़ा बनने जा रही है।
कमरे में एक हलचल
मीरा ने अपने आप को समेटा — चेहरे को पोंछा। वह अब कुछ सोचने लगी थी — “नहीं, इस बार मैं सिर्फ डरूंगी नहीं। मैं देखूंगी कि अब उसका इरादा क्या है।”
वह धीरे से उठी, खिड़की के पर्दे को थोड़ा हटाया — सामने वाले कमरे की खिड़की से हल्की सी रौशनी झांक रही थी।
“वह वहीं है…” मीरा ने खुद से कहा।
लेकिन उसकी आँखें अब डर के साथ एक सवाल भी पूछ रही थीं — “क्या वह बदला लेने आया है… या मेरी रूह को फिर से कैद करने?”
अमरीश अपने कमरे में
वह खड़ा था — ठीक खिड़की के पास, जहाँ से मीरा के कमरे की परछाईं दिखाई दे रही थी।
उसने देखा — एक हल्का सा परदा हिला, फिर रुका।
एक छोटी-सी मुस्कान उसके चेहरे पर फैल गई।
“डर अभी भी वहीं है, मीरा… और यही डर मेरी सबसे बड़ी जीत है।”
वह वापस पलटा, और कमरे की बत्तियाँ बुझा दीं।
पर हवेली में, उस रात — एक भी दीवार नहीं सोई।
अध्याय: गिफ्ट की रात — खौफ की दस्तक
हवेली की हवा में कुछ अलग था उस दिन। जैसे हर चीज़ किसी अनदेखे तूफ़ान के इंतज़ार में स्थिर थी। घड़ियाँ धीमी लग रही थीं, और दीवारों पर लगी पेंटिंग्स जैसे निगाहें फेर चुकी थीं।
अमरीश अब अपने कमरे में था, सुबह की शराब उतर चुकी थी, लेकिन उसकी आँखों में अब भी नशा था — मीरा को एक बार फिर अपने शिकंजे में देखने का नशा।
उसके हाथों में एक काले रिबन से बंधा हुआ बॉक्स था — चमकदार, भारी, और भीतर कोई ऐसी चीज़ थी जो सिर्फ गिफ्ट नहीं… एक आदेश थी।
उसने घंटी बजाई। कुछ ही सेकंड में दरवाज़े पर नौकरानी आ गई — हमेशा मीरा के कमरों में जाती थी।
“ये ले जा,” अमरीश ने बिना उसकी आँखों में देखे हुए कहा।
“मीरा को दे देना। और बोलना — यह आज रात की डिनर ड्रेस है। ये पहनना है। बस।”
नौकरानी ने सिर झुका लिया और धीरे से बॉक्स को थाम लिया। लेकिन तभी अमरीश ने उसे फिर रोका।
“एक मिनट।”
उसने ड्रॉअर से एक छोटा-सा सफेद नोट निकाला, उसमें दो लाइनें लिखीं — हाथ की लिखावट जैसे ब्लेड से काटी गई हो।
“आज रात यही पहनना है। नहीं तो सोच लेना — इस बार सिर्फ आवाज़ नहीं दबेगी, सांसें भी थम जाएँगी।”
नोट को उसने बॉक्स में रख दिया और उसे नौकरानी को सौंप दिया।
“जाओ।”
मीरा का कमरा — खामोशी में कम्पन
नौकरानी दरवाज़े पर पहुंची, और धीरे से दस्तक दी।
“मैडम?”
मीरा किताब पढ़ रही थी, पर अब उसकी आँखें दीवार पर टिकी थीं — जैसे उसे किसी आने वाली आहट का अंदाज़ा हो।
“हां, आओ।”
नौकरानी ने दरवाज़ा खोला और बॉक्स को मीरा के बेड पर रख दिया। उसकी आँखें मीरा से मिलाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थीं।
“ये… साहब ने भेजा है। उन्होंने कहा है — आज रात की डिनर ड्रेस है। आपको पहननी है।”
मीरा के चेहरे से रंग उड़ गया।
“क्या?” उसकी आवाज़ सूखी थी।
नौकरानी ने सिर झुकाया — “एक नोट भी है… अंदर है।”
मीरा ने काँपते हाथों से बॉक्स खोला। भीतर एक गहरी लाल रंग की सिल्क सैक्सी क्ड्रेस थी — बेहद सुंदर, बेहद खुली, और बेहद असहज। उस कपड़े को देख मीरा कि आंखे फैल गई |
उसके साथ ही वह सफेद कागज़ रखा था।
मीरा ने उसे उठाया — और जैसे ही उसने पढ़ा, उसकी साँसें थमने लगीं।
“आज रात यही पहनना है। नहीं तो सोच लेना — इस बार सिर्फ आवाज़ नहीं दबेगी, सांसें भी थम जाएँगी।”
उसके हाथ से कागज़ छूटकर ज़मीन पर गिर गया।
वह तुरंत उठी, अलमारी के पास गई, और दीवार का सहारा लेकर बैठ गई। आँखों से आँसू बहने लगे — लेकिन वो चीख नहीं रही थी। वो जानती थी, चीखने से कुछ नहीं बदलेगा।
“ये सब क्यों हो रहा है…” वह बड़बड़ाई।
“नहीं… अब नहीं… मैं ये ड्रेस नहीं पहन सकती। मैं कोई गुड़िया नहीं… कोई साज़िश का हिस्सा नहीं…”
उसने एक बार फिर ड्रेस को देखा — उसकी लाल चमक अब उसकी आँखों में खून की तरह लग रही थी।
उधर, अमरीश का कमरा — जीत की तैयारी
अमरीश अब शीशे के सामने खड़ा था। अपने बाल सलीके से सेट कर रहा था, कोलोन की हल्की बूँदें गले के पास लगाई थीं। हर अंग का संयोजन जैसे किसी शिकारी की सजावट हो — डिनर नहीं, किसी शिकार की अंतिम तैयारी।
उसने फ्लास्क से एक घूंट लिया और खुद से बुदबुदाया —
“आज की रात यादगार बनेगी, मीरा।”
वह आईने में खुद को देखता रहा — आँखों में कुछ ऐसा था जो नफरत और जुनून के बीच की रेखा को मिटा रहा था।
“अगर तुमने वो ड्रेस नहीं पहनी…” वह रुका, फिर हँसा — “तो आज रात तेरा डर मेरे हर कमरे की दीवारों में गूँजेगा। मैं तुझे वहाँ ले जाऊँगा, जहाँ न रौशनी होगी, न उम्मीद।”
वह खिड़की की ओर बढ़ा और मीरा के कमरे की ओर देखा।
“देख रहे हो तुम, मीरा। सोच रही होगी कि क्या करूं, कैसे मना करूं…”
वह वापस पलटा और कुर्सी पर बैठ गया।
“पर अब तुम्हें मना करने का हक़ नहीं। तुम्हें बस निभाना है — मेरा हुक्म।”
उसने फिर से खुद से बातें शुरू कर दीं — जैसे कोई अंदर का शैतान अब खुलकर बोल रहा हो।
“मैं तुझसे हमेशा से नफरत करता हूँ, मीरा… पर तुमने मुझे चांटा मार अच्छा नहीं किया। अब जो मिलेगा, वह प्रेम नहीं — प्रतिशोध होगा।”
उसकी उँगलियाँ बाँहों पर खिंच गईं — जैसे अपने ही शब्दों को जकड़ रहा हो।
“आज की रात… तुम अगर वो ड्रेस नहीं पहनेगी, तो फिर तुम्हें मेरे सामने खड़ा नहीं किया जाएगा — तुम्हें ज़मीन पर घसीटा जाएगा।”
मीरा — ख़ामोशी की गिरफ़्त में
मीरा अब अपने कमरे में अकेली थी। ड्रेस बेड पर रखी थी — और वह खिड़की के पास बैठी थी, घुटनों को सीने में समेटे।
उसके होठ काँप रहे थे, और आँखें उस ड्रेस को घूर रही थीं जैसे वह किसी साँप की तरह धीरे-धीरे उसकी ओर सरक रही हो।
“क्या मैं फिर से सह लूंगी?” उसने खुद से पूछा।
“क्या हर बार लड़ने के लिए कुछ बचता है?”
उसने फिर से खड़ा होने की कोशिश की, पर उसके पैर लड़खड़ा गए।
“अगर मैंने नहीं पहना… तो?” वह सोच रही थी।
लेकिन फिर एक ही पल में उसके अंदर दो आवाज़ें लड़ने लगीं — एक कहती, “मत पहनो। अपने आत्मसम्मान की रक्षा करो।”
और दूसरी फुसफुसाती, “मत पहनो, पर उसके बाद तुम रहेगी कहाँ?”
वह दीवार से लग गई — जैसे सारी ताक़त बह चुकी हो।
हवेली की रात — साज़िश की चुप्पी
रात अब पूरी तरह उतर चुकी थी। हवेली की बत्तियाँ जल चुकी थीं। किचन में धीमी आवाज़ें थीं — डिनर की तैयारी चल रही थी।
नौकरानी अब फिर मीरा के दरवाज़े पर थी।
“मैडम, साहब ने पूछा है — आप तैयार हैं?”
मीरा ने दरवाज़ा नहीं खोला। अंदर से सिर्फ एक जवाब आया —
“बोल देना, मैं आ जाऊँगी।”
पर नौकरानी ने अंदर से कुछ सुना — जैसे किसी के रोने की आवाज़।
वह समझ गई — गिफ्ट सिर्फ एक ड्रेस नहीं था… एक हथकड़ी थी।
मीरा का कमरा — एक बंद क़ैदखाना बन चुका था। हर कोना जैसे सिसकियाँ भर रहा हो। बाहर हवाओं की सिसकती सरसराहट, और भीतर दीवारों पर जमा हुआ डर। खिड़की से छनती चाँदनी उसके पीले पड़ चुके चेहरे पर एक अजीब-सी चमक बिखेर रही थी — वो चमक नहीं, कोई सज़ा थी।
बेड पर पड़ी ड्रेस अब भी वहीं थी — एक वेस्टर्न, डीप नेक, बैकलेस रेड सिल्क ड्रेस — इतनी छोटी कि मीरा को खुद से नज़रें चुरानी पड़ रही थीं। उस पर ब्लैक हिल्स और लाल लिपस्टिक भी रखी थी। जैसे ये सब उसे किसी के ‘दूसरे मनोरंजन’ के लिए तैयार करने का सामान हो।
ड्रेस नहीं — एक बदनुमा इरादा था।
वो काँपती साँसों के साथ घुटनों में चेहरा छुपाए बैठी थी। हर बार की तरह इस बार भी वही सवाल उसके दिल के गहरे कुएँ से उठ रहा था —
"क्या झुक जाऊँ? क्या मिटा दूँ खुद को किसी की मरज़ी के आगे?"
तभी...
दरवाज़ा ज़ोर से खुला।
“ओ सुनती नहीं क्या तू? कितनी बार आवाज़ दी, औरत!” — आवाज़ वही थी, जो कभी मीठी लगती थी… पर अब ज़हर थी।
देवयानी।
हमेशा जैसे उसमें किसी माँ की ममता नहीं, बल्कि किसी कसाई की सख़्ती थी। चेहरा कठोर, आँखों में तेज़, चाल में हुक़ूमत।
मीरा ने सर उठाया। होंठ फड़फड़ा उठे, “तुम…?”
“हाँ, मैं ही! अब चुपचाप उठ! ये पहन और नीचे चल! साहब इंतज़ार कर रहे हैं।” — उसने बेड से ड्रेस उठाई और हवा में झटका दिया। रेशमी कपड़ा जैसे चाबुक की तरह फड़का।
मीरा पीछे हट गई — जैसे वो कपड़ा नहीं, आग हो।
“नहीं… ये नहीं पहन सकती… प्लीज़…” उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"बड़ी माशूक़ा बनने चली है!” — देवयानी ने आगे बढ़कर उसका चेहरा कसकर थामा — “तुझे क्या लगता है, साहब तेरी नज़रों की मासूमियत पर फिदा हैं? नहींर, उन्हें सिर्फ ‘डॉल’ चाहिए — खेलने के लिए।”
मीरा ने रोते हुए कहा — “मुझे मत छूइए… मैं नहीं कर सकती ये सब… मैं नहीं हूँ ऐसी…”
“ऐसी?” — देवयानी हँसी — ज़हर भरी, जलती हुई। “ये ड्रेस देख! हक़ीकत है तेरी! ये बता रही है कि तू क्या बन चुकी है — एक खूबसूरत शोपीस!”
वो ड्रेस लेकर आगे बढ़ी। मीरा ने एक बार फिर खुद को बचाने की कोशिश की, पर देवयानी ने उसका हाथ झटक कर उसे बेड पर गिरा दिया।
“इतनी भी मासूम मत बन, सब जानती हूँ — तुझे भी शौक है वो लाइमलाइट का, बस डरती है कि बदनाम न हो जाए।”
मीरा फूट पड़ी — “प्लीज़… ये मत कहिए… मैं बस… मैं बस अपने शरीर से भागना चाहती हूँ…”
“अब भागने का वक़्त नहीं बचा! अब तुझे वही बनना है, जो साहब चाहते हैं।”
देवयानी ने उसकी बाँहें खींचकर ऊपर उठाईं। वो ड्रेस अब मीरा की देह पर जबरन डाली जाने लगी। मीरा काँप रही थी — कपड़े उसके आत्मसम्मान को चीर रहे थे।
पीठ खुली थी, छाती आधी ढँकी — हर कट, हर लाइन जैसे उसकी आत्मा पर खिंची जा रही थी।
देवयानी ने उसके बाल खोले, कंघी चलाई, होंठों पर जबरन लिपस्टिक लगाई — और ज़बरदस्ती उसे आईने के सामने खड़ा कर दिया।
“अब देख — बन गई न साहब की पसंद?”
मीरा के होंठों से कोई शब्द नहीं निकला। आँखों में पानी था, पर वो आँखें अब खुद को नहीं देख पा रही थीं।
आईने में एक औरत खड़ी थी — सेक्सी, सजी हुई, मगर टूटी हुई।
मीरा बुदबुदाई — “ये मैं नहीं हूँ… ये मैं नहीं हूँ…”
देवयानी ने उसकी बाँह कसकर पकड़ी। “अब तू चाहे जो समझ, साहब को बस यही चाहिए। अब चल! देर हो रही है — नहीं तो वो खुद ऊपर आ जाएँगे। फिर समझ लेना — ये लिपस्टिक और ड्रेस तूझे खुद पहनाएगे।”
मीरा थरथराते क़दमों से दरवाज़े की ओर बढ़ी।
देवयानी ने उसकी पीठ पर एक झटका मारा, “सीधी चल — मुस्कुरा के! वरना तेरे आँसू गीले कम्बल की तरह बदबू देंगे — और साहब को बदबू पसंद नहीं।”
और मीरा चल पड़ी… एक जल्लाद के बनाए रास्ते पर… अपनी आवाज़, अपनी पहचान और अपनी देह — सब छोड़ कर।
हवेली के कॉरिडोर में
हवेली की लंबी, पुरानी दीवारों से होते हुए एक पतला-सा कॉरिडोर नीचे डाइनिंग हॉल की ओर जाता था। सन्नाटा इतना गहरा था कि कदमों की आहट भी वहाँ अपना सिर झुका कर निकलती।
देवयानी ने मीरा का हाथ कसकर पकड़ रखा था, जैसे वह कोई दोषी हो और ये गलियारा उसकी सज़ा की पहली सीढ़ी।
मीरा की चाल लड़खड़ा रही थी। उसकी आंखों में आँसू थे, और बदन पर वो ड्रेस — जो उसके लिए किसी कैद की तरह थी। हर कदम पर वो महसूस कर रही थी कि उसके कपड़े नहीं, उसकी रूह उतारी जा चुकी है।
कॉरिडोर में चलते हुए रमा ने नज़रें आगे रखीं, लेकिन होंठ ज़हर उगलने लगे।
“बहुत नसीब वाली है तू… इतनी बड़ी हवेली… और वक़्त से पहले ही साहब के बिस्तर तक पहुँच गई। बाकी लड़कियाँ तो बरतन घिसते-घिसते बूढ़ी हो जाती हैं।”
मीरा चुप रही, उसकी नज़रे ज़मीन पर थीं।
“लेकिन तू तो सीधी कमरे से निकली और सीढ़ियाँ चढ़ गई… मालकिन बनने चली है?”
मीरा ने धीमे से कहा, “मैंने कभी कुछ नहीं चाहा… बस… बस चैन से जीना चाहा…”
देवयानी हँसी — वो हँसी नहीं, किसी तेज़ छुरी की धार थी।
“चैन? इस हवेली में तेरे जैसे लोगों के लिए सिर्फ़ दो चीज़ें होती हैं — या तो बिस्तर… या बासी जूठे बर्तन। और तूने तो बिस्तर का रास्ता चुना है।”
मीरा काँप गई। उसने चाहा कुछ कहे, कुछ समझाए। लेकिन शब्द जैसे उसके गले में अटक गए।
“तू सोचती होगी तू कोई खास है, है न?” रमा ने रुककर उसे आँखों में घूरा — “ साहब ने तुझसे मीठे बोल बोले, तो तूने मान लिया कि तू अब उनकी रानी है? अरे बेवकूफ लड़की — तू सिर्फ़ वक़्त काटने का ज़रिया है! कल कोई और आ जाएगी, और तू… तू वापस उसी गंदे स्टोर रूम में!”
मीरा ने कुछ हिम्मत की, “आप क्यों मुझे इतना नीचा दिखा रही हैं? मैंने आपका क्या बिगाड़ा है?”
देवयानी ने अपनी कपड़े ठीक किया, जैसे उसे गंदगी से बचाना हो।
“बिगाड़ा? तूने मेरी मेहनत का, मेरी वफादारी का मज़ाक बना दिया! सालों से इस हवेली में हूँ… दिन-रात खटती रही, मालिक के हर हुक़्म पर हाज़िर… पर कभी एक नज़र भी नहीं मिली उन आँखों से। और तू? तू आई और बिस्तर में जगह पा ली!”
मीरा अब रुक गई थी, उसका चेहरा घृणा और असहायता से भर चुका था।
“तो आपकी नफ़रत मेरी वजह से नहीं… आपकी अधूरी चाहत की वजह से है…” मीरा ने धीमे पर ठहरते हुए शब्दों में कहा।
देवयानी के चेहरे पर एक पल को खामोशी आई, फिर वो फूट पड़ी — “बदज़बान! मुँह लगाना सीख गई है? तुझे पता है तेरी औक़ात क्या है? तू इस हवेली में सिर्फ़ एक रखैल है — अमरीश की रखैल! एक कपड़े की गुड़िया, जिसे सजाया जाता है, दिखाया जाता है, और फिर फेंक दिया जाता है!”
मीरा की आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार वो रो नहीं रही थी — वो बस देख रही थी… जैसे एक कटघरे में खड़ी हो और सामने खड़ी गवाही इंसाफ़ नहीं, अपमान के काँटे बो रही हो।
“आपको अगर इतना ही दर्द है… तो आप अमरीश से क्यों नहीं लड़तीं? क्यों नहीं पूछतीं उन्हें कि सालों की वफादारी क्यों बेकार गई?” मीरा की आवाज़ काँप रही थी, लेकिन उसमें पहली बार आत्मा की लपट थी।
देवयानी एक पल को झिझकी — फिर उसके चेहरे पर अजीब-सी मुस्कान आ गई। “मैं उनसे नहीं लड़ सकती… वो मालिक हैं। लेकिन तुझसे? तुझसे तो हर रोज़ लड़ूँगी… क्योंकि तू मेरी हार की वजह बन गई है।”
कॉरिडोर का वो आख़िरी मोड़ अब करीब था। मीरा जानती थी कि कुछ ही कदमों में वो उस टेबल के सामने होगी, जहाँ उसे सिर्फ एक चीज़ दिखानी है — अपनी ‘सजावट’।
लेकिन इस मोड़ से पहले… कुछ टूट रहा था।
मीरा ने रुककर दीवार को थाम लिया, आँखें बंद कीं।
“आप चाहे जितना कह लें… चाहे जितनी बार मेरा नाम गंदा करें… लेकिन एक बात आप जान लीजिए — मैंने जो झेला है, वो किसी रखैल का हिस्सा नहीं होता। मैंने हर रात अपने आत्म-सम्मान को मरते देखा है… और फिर सुबह उसी को अपनी आँखों से छूने की कोशिश की है।”
देवयानी ने नज़रे फेर ली। “बहुत बड़ी शायरा बन गई है तू! चल, अब ये सब बातें साहब के सामने करना — तब देखेंगे कि क्या तेरे आँसू उन्हें रोक पाते हैं।”
और कहकर उसने मीरा की कलाई खींची। लेकिन अब मीरा थोड़ी थमी नहीं… उसने खुद को सीधा किया।
उसकी चाल अब लाचार नहीं थी — बोझिल थी, मगर सीधी।
देवयानी ने एक आखिरी जली-कटी बात फेंकी — “सज-धज के चल… कम से कम लगना तो चाहिए कि तू इस लायक है!”
मीरा ने उसकी ओर पलट कर देखा —
“सजावट के पीछे कितना टूटा चेहरा है, ये आप क्या जानें… आप तो उस औरत को देखती हैं, जो जगह ले गई… पर वो नहीं देखतीं, जो हर रात टूटती है।”
उनकी बातें वहीं कॉरिडोर के मोड़ पर रुक गईं।
और मीरा — अब डाइनिंग हॉल की ओर बढ़ रही थी, हर कदम के साथ अपनी आत्मा को समेटे… तैयार, शायद अपमान के एक और दौर के लिए… पर अब उसके भीतर एक औरत खड़ी हो चुकी थी।
एक औरत — जिसे जली-कटी बातों से नहीं जलाया जा सकता।
अध्याय: नज़रों की चुप भाषा
डाइनिंग हॉल की रोशनी धीमी थी। झूमर की परछाइयाँ दीवारों पर अजीब सी आकृतियाँ बना रही थीं। हवेली का यह हिस्सा जितना भव्य था, उतना ही ठंडा भी… और उस ठंडक में, सबसे अकेला था अमरीश।
वो एक लम्बी, लकड़ी की कुर्सी पर बैठा था — उसका कोट अब भी उसकी चौड़ी कंधों से लटक रहा था। सामने मेज़ पर सजाए गए चमचमाते बर्तन और खाली प्लेटें थीं। वाइन का गिलास आधा भरा हुआ था, और उसकी उँगलियाँ उस गिलास की डंडी पर नज़ाकत से घूम रही थीं।
वो इंतज़ार कर रहा था… बेताबी से नहीं, पर जैसे किसी आदत के तहत।
और तभी…
कॉरिडोर के सन्नाटे को चीरती मीरा की परछाईं दरवाज़े की देहलीज़ पर ठिठकी।
अमरीश ने सर उठाया।
वो आ गई थी।
मीरा।
रेशमी ड्रेस में लिपटी, काँपती-सी… मगर खुद को सम्भाले हुए।
उसकी चाल धीमी थी, लेकिन सिर झुका नहीं था। उसने नज़रे सीधे नहीं मिलाई, लेकिन उसने आँखें बंद भी नहीं की।
अमरीश की आँखों में एक क्षण को स्थिरता आ गई।
वो उसे देखता रहा — जैसे कोई चित्रकार एक अजीब पेंटिंग को देखता है, जिसमें रंग तो साधारण हैं, पर कुछ ऐसा है… जो नज़र टिक जाने को मजबूर करता है।
“आ गईं?” उसने बहुत हल्के स्वर में कहा, जैसे कोई ऊँचा स्वर इस पल की नाज़ुकता को तोड़ देगा।
मीरा ने हल्की-सी गर्दन हिलाई।
“बैठो,” अमरीश ने सामने कुर्सी की ओर इशारा किया।
मीरा ने झिझकते हुए कदम बढ़ाए और चुपचाप कुर्सी खींचकर बैठ गई। दोनों के बीच महज़ एक मेज़ थी — मगर फासला, जैसे किसी समुद्र-सा।
कुछ देर तक सन्नाटा छाया रहा। हवा, झूमर और दीवारें — सब इस चुप्पी का हिस्सा बन चुके थे।
अमरीश ने वाइन का एक घूंट लिया, फिर मीरा की ओर देखा।
“तुम्हें ड्रेस ठीक नहीं लगी?” वो हल्के से मुस्कराया।
मीरा की आँखें एक पल के लिए उठीं, फिर झुक गईं। “जो पसंद था… वो चुनने का हक नहीं था।”
उसके स्वर में कोई तीखापन नहीं था, बस एक सच्चाई थी — सीधी और नंगे पाँव।
अमरीश ने थोड़ी देर सोचा, फिर हल्के से हँसा — “तुम्हारी ये आदत अच्छी है… बात कह देती हो, बिना सजाए।”
मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी उंगलियाँ मेज़ के नीचे कपड़े को मसल रही थीं।
“डर तो नहीं लगा आने में?” उसने फिर पूछा।
मीरा ने धीमे से कहा, “डर अब जाता नहीं… बस आदत हो जाती है।”
अमरीश अब भी उसकी आँखों को पढ़ने की कोशिश कर रहा था — जैसे कुछ छिपा हो वहाँ… कुछ ऐसा जो खुद उसे भी समझ नहीं आ रहा।
“तुम अलग हो,” वह बुदबुदाया, जैसे खुद से कह रहा हो।
मीरा ने सिर उठाया। “कैसे?”
“पता नहीं… बाकी लोग जब इस हवेली में आते हैं, तो या तो ज़मीन देख कर झुक जाते हैं… या झूमर देख कर उड़ने लगते हैं। लेकिन तुम… तुम बस चल रही हो। जैसे न ज़मीन का डर है, न उड़ने का लालच।”
मीरा ने नज़रे हटाईं। “कभी-कभी कोई रास्ता नहीं बचता… तो चलना ही पड़ता है।”
अमरीश अब मुस्कुरा नहीं रहा था।
“तुम्हें ये सब पसंद नहीं है… ये ड्रेस… ये रात… ये मेज़…”
“नहीं,” मीरा ने सिर हिलाया। “लेकिन नापसंद करने से कोई चीज़ बदलती नहीं है।”
उसके चेहरे पर अब भी वही मासूम थकावट थी — एक ऐसी शांति, जो तूफानों से गुजरकर आती है।
“तुम्हारे जैसे लोग… कम मिलते हैं,” अमरीश ने कहा, उसकी आँखों में हल्का धुआँ तैरने लगा।
मीरा ने चौंककर उसकी ओर देखा — “आपके जैसे लोग तो रोज़ मिलते हैं।”
उसका स्वर बहुत धीमा था, लेकिन उसमें एक अजीब-सी तल्ख़ी थी — बिलकुल वैसी जैसी पिघले हुए शीशे में होती है।
अमरीश ने कोई जवाब नहीं दिया। वो बस वाइन का गिलास खाली करता रहा, और धीरे-धीरे उसकी उँगलियाँ फिर उसी ग्लास की डंडी पर घूमने लगीं।
मेज़ पर खाना परोसा गया। चाँदी की प्लेटें, कीमती कटलरी, और वो सब कुछ जो अमीरी की पहचान होता है।
लेकिन दोनों की भूख जैसे कहीं और मर चुकी थी।
मीरा ने धीरे-धीरे खाने की ओर देखा — फिर एक टुकड़ा काटा, बिना स्वाद के मुँह में रखा।
अमरीश उसे देखता रहा।
वो कोई प्रेम नहीं था, कोई करुणा नहीं… बस एक अजीब-सा खिंचाव था — जैसे कोई अधूरी कहानी, जिसकी शुरुआत बिना जाने भी कोई पन्ना पलटना चाहता हो।
कुछ देर बाद अमरीश ने कहा, “अगर तुम्हें ये सब अच्छा नहीं लगता, तो तुम भाग क्यों नहीं जाती?”
मीरा ने मुस्कराने की कोशिश की — वो मुस्कान नहीं थी, किसी टूटे आईने का टुकड़ा था।
“कहाँ भागूं? भाग कर भी कोई लौटता है। कम से कम यहाँ… मुझे पता तो है, किस दर से चोट मिलेगी।”
अमरीश ने पहली बार उसकी आँखों में कुछ महसूस किया — नज़रों का एक सवाल, जो शायद उसके लिए नहीं… खुद मीरा के अंदर के डर के लिए था।
“तुम मुझसे डरती हो?” उसने पूछा।
मीरा ने थोड़ा सिर झुकाया।
“आपसे नहीं… पर आप जैसे लोगों से, जो किसी की हदें नहीं समझते।”
उसने ये बात बहुत हल्के से कही, लेकिन वो शब्द जैसे मेज़ के पार बैठे आदमी की धड़कनों तक पहुँच गए।
अमरीश ने गहरी साँस ली, कुर्सी से थोड़ी पीठ टिका दी।
“आज की रात सिर्फ़ तुम्हारे आने के लिए थी,” वो बोला।
मीरा ने फिर उसकी ओर देखा।
“तो अब क्या?”
“अब… कुछ नहीं,” अमरीश ने कहा, “मैं बस देखना चाहता था… कि तुम कैसे लगती हो, जब तुम्हें किसी और ने नहीं, बल्कि हवेली ने तैयार किया हो।”
मीरा उठने लगी। उसकी चाल अब भी सीधी थी, लेकिन थकी हुई।
“तो अब आपने देख लिया।”
अमरीश ने सिर हिलाया। “हाँ। और यकीन करो… अब और देखने का मन नहीं।”
मीरा चुप रही। उसने एक आखिरी बार उसकी ओर देखा — जैसे कोई परछाईं में खड़ा आदमी, जिसे रोशनी छू नहीं सकती।
अध्याय: ज़हर की परोस
चाँदी की प्लेटों में खाना परोसा जा चुका था। डाइनिंग टेबल की रोशनी मीरा के चेहरे पर पड़ रही थी — वो अब भी झुकी नज़रों के साथ बैठी थी, जैसे खुद को मेज़ का हिस्सा बना देना चाहती हो।
अमरीश अपनी कुर्सी पर फैलकर बैठा था। उसकी आँखें मीरा पर थीं — ठंडी, नपी-तुली, और कुछ अजीब सी खींचती हुई।
“खाओ,” उसने कहा, अपनी उँगलियों से एक कांटा उठाते हुए, “तुम भूखी लग रही हो।”
मीरा ने प्लेट की ओर देखा। घी में लिपटी सब्ज़ियाँ, चिकन की महक और महंगे चावल की सोंधी ख़ुशबू — लेकिन हर निवाला जैसे दिल को चीरकर गुज़रता हो।
उसने कांटा उठाया, पर हाथ काँप रहा था।
“नहीं पसंद?” अमरीश ने पूछा — उसका स्वर नरम नहीं था, बल्कि किसी शिकारी की तरह तौलता हुआ।
मीरा ने धीमे से सर हिलाया। “भूख… नहीं है।”
“भूख नहीं है या स्वाद नहीं आया?” अमरीश ने मुस्कराते हुए उसकी ओर झुकते हुए पूछा।
मीरा का चेहरा हल्का स्याह पड़ गया। उसने जवाब देना चाहा, लेकिन शब्द गले में अटक गए।
अमरीश ने अपना कांटा प्लेट पर रखा और सीधे उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा, “तुम्हें किसी ने सिखाया नहीं कि इस मेज़ पर मौन भी बदतमीज़ी मानी जाती है?”
मीरा की आँखें फटी रह गईं। वो कुछ कहना चाहती थी, पर खुद को सँभालते हुए बस धीरे से बोली, “मैं कुछ गलत नहीं कहना चाहती…”
“तो तुम सही भी नहीं कहतीं,” अमरीश हँसा, मगर उस हँसी में कटाक्ष था — कोई तेज़ चाकू जो बोलने से रोकता हो।
वो फिर से खाना खाने लगा, लेकिन निगाहें अब भी मीरा पर टिकी थीं।
“कभी सोचा है,” उसने कहा, “कि तुम्हें यहाँ लाया क्यों गया?”
मीरा ने कुछ नहीं कहा।
“शायद इसलिए,” अमरीश ने अपनी वाइन उठाते हुए कहा, “क्योंकि तुम दिखती हो… मासूम। लेकिन अंदर से पता नहीं क्या हो।”
वह गिलास होंठों से लगाता है, मीरा चुपचाप अपनी प्लेट के एक कोने में कांटे से कुछ चुभोती रही।
“कभी किसी आदमी को इतना गुस्सा आया है,” अमरीश ने फिर बोलना शुरू किया, “कि उसने सिर्फ इसीलिए किसी लड़की को अपने पास रख लिया हो — क्योंकि उसकी खामोशी बहुत तेज़ आवाज़ करती थी?”
मीरा की उंगलियाँ कांटे पर कसीं।
“मैं कोई आवाज़ नहीं हूँ…” वह धीमे से बुदबुदाई।
“नहीं हो?” अमरीश ने ज़ोर से हँसते हुए कहा। “तुम्हारी खामोशी मेरे कानों में हथौड़े जैसी बजती है।”
मीरा का चेहरा अब स्याह हो गया था। उसने सिर झुका लिया, और पहला निवाला मुँह में डाला। खाने का स्वाद जैसे किसी जलती राख की तरह था — न निगला जा रहा था, न उगला।
“तुम्हारी आंखें…” अमरीश ने कहते-कहते अपनी प्लेट में से एक टुकड़ा उठाया, “मुझे परेशान करती हैं।”
मीरा चौंकी।
“क्यों?” उसने पहली बार बिना डरे पूछा।
“क्योंकि उनमें कोई डर नहीं है… और मैं डर देखना पसंद करता हूँ,” अमरीश ने ठंडे स्वर में कहा।
मीरा की साँस अटक गई।
कुछ देर तक दोनों बिना बोले खाना खाते रहे। लेकिन वह चुप्पी भारी थी — किसी आंधी के पहले की तरह।
“कभी तुम्हें लगता है कि तुम इस सबके लायक नहीं हो?” अमरीश ने अचानक पूछा।
मीरा ने तुरंत उत्तर नहीं दिया। फिर बहुत धीरे से बोली, “हर रोज़ लगता है।”
“तो क्यों नहीं भागती?”
मीरा की पलकों में एक नमी चमक गई।
“क्योंकि भागने के लिए कोई रास्ता बचा नहीं।”
अमरीश ने कुछ नहीं कहा। उसने वाइन का गिलास खाली किया और एक लंबी साँस ली।
“तुम्हें कोई तो होगा, जिसे तुमने छोड़ा होगा वहाँ पीछे?” उसकी आवाज़ अब गहराने लगी थी।
मीरा ने होंठ भींच लिए। “कभी-कभी लोग छोड़ देते हैं… और हम उन्हें पीछे नहीं छोड़ पाते।”
उसने कुछ और खाना मुँह में डाला, लेकिन निगलते हुए जैसे गले में काँटे अटक गए।
अमरीश ने हाथ मेज़ पर रखा, उसकी उंगलियों की थाप बहुत धीमी थी — जैसे कोई ताल दे रहा हो किसी पुरानी धुन को।
“तुम मेरी हवेली में हो,” उसने कहा, “इसका मतलब तुम अब मेरी चीज़ हो।”
मीरा ने अपनी साँस रोक ली।
“मैं चीज़ नहीं हूँ,” उसके शब्द बमुश्किल निकले।
“ये मत कहो,” अमरीश ने मुस्कराकर कहा, “क्योंकि चीज़ें आवाज़ नहीं करतीं — और तुम कर रही हो।”
मीरा ने काँपते हाथों से गिलास उठाया, लेकिन पी न सकी।
“अगर मैं भाग जाऊँ…?” उसने सवाल किया।
“तो ढूँढ कर लाया जाऊँगा,” अमरीश ने नज़रों में सख्ती लाकर कहा।
“अगर मैं मर जाऊँ…?”
अमरीश मुस्कराया, मगर उसकी आँखें अब भी सख़्त थीं।
“तो तुम्हारी कब्र पर वो ड्रेस टाँग दूँगा जो आज पहनी है… ताकि सब जानें, तुम किसके लिए जिंदा रहीं।”
मीरा का चेहरा बुझ गया। उसने थाली की ओर देखा — खाना अब भी अधूरा था, लेकिन भूख जैसे अब खत्म नहीं, बल्कि सो चुकी थी।
अमरीश अब चुप था। उसकी आँखें मीरा पर टिकी थीं — जैसे वो हर जवाब की परतों को चीरना चाहता हो, मगर किसी वजह से रोक लेता हो।
वह कुर्सी से उठा। उसका भारी शरीर जब हिला, तो झूमर की रौशनी भी जैसे थरथरा गई।
“तुम्हें समझना होगा” उसने उसके पास आकर झुकते हुए कहा, “मैं अच्छा आदमी नहीं हूँ… और तुम भाग्यशाली नहीं हो।”
मीरा ने उसकी आँखों में देखा — उनमें गुस्सा था, तिरस्कार था… और साथ में वो कशिश, जो मीरा को डरा भी रही थी और जकड़ भी रही थी।
“पर मैं अब डरती नहीं,” मीरा ने फुसफुसाते हुए कहा।
“ये मत भूलो,” अमरीश ने धीमे स्वर में चेताया, “जो डरता नहीं… वो तोड़ दिया जाता है।”
अध्याय: शब्दों की आग
डाइनिंग हॉल की दीवारों पर फैली रोशनी अब धीमी हो चली थी। मीरा की थाली अब भी वैसी ही थी — अधूरी, ठंडी, जैसे कुछ भी निगल पाना उसके वश से बाहर था। अमरीश अब भी टेबल पर बैठा था, अपनी कोहनी टिकी हुई, हाथ में काँटा थामे, मगर उसकी नजर मीरा पर थी — एक शिकारी की तरह, जो शिकार के किसी छोटे से इशारे का इंतजार कर रहा हो।
“तुम्हें पता है,” उसने एक निवाला उठाते हुए कहा, “तुम्हारी ये चुप्पी मुझे बेवकूफ नहीं बना सकती।”
मीरा ने नज़र उठाई — बस एक पल के लिए — और फिर वापस झुका ली।
“कभी-कभी चुप्पी सबसे तेज़ आवाज़ होती है,” उसने बहुत धीमे कहा।
अमरीश हँसा। हँसी में वो गर्मी नहीं थी, बल्कि लहू को ठंडा कर देने वाली बर्फ थी।
“दिलचस्प बात है,” उसने कहा, “पर यहाँ मेरी मेज़ पर, तुम्हारी आवाज़ से ज़्यादा मेरी मर्ज़ी की कीमत है।”
मीरा ने थाली से एक चावल का दाना उठाया, उसे अंगुलियों में घुमाते हुए बोली, “आपके पास ताक़त है, हाँ… लेकिन शायद इंसानियत नहीं।”
उसके शब्द नर्म थे, मगर सीधा वार करते हुए।
अमरीश की आँखों में एक चमक उभरी — जैसे किसी ने उसकी त्वचा को चीरने की कोशिश की हो।
“इंसानियत?” उसने दाना चबाते हुए कहा, “उसकी कब्र मैंने बहुत पहले खोद दी थी — और वो भी अपने ही हाथों से।”
मीरा चुप रही।
“तुम जानती हो, मीरा,” वह आगे झुका, “मैंने बहुत औरतें देखी हैं… लेकिन उनमें से किसी ने भी इतनी हिम्मत नहीं दिखाई कि मेरी आँखों में देख सके।”
“शायद उन्होंने आपकी आँखों में झाँकने की हिम्मत इसलिए नहीं की क्योंकि वहाँ सिर्फ डर था, मोह नहीं,” मीरा ने साफ़ शब्दों में कहा।
वो पल एकदम ठहर गया।
अमरीश की उँगलियाँ थाली पर थम गईं। उसकी आँखें अब मीरा पर टिक चुकी थीं — बर्फ की दो धारियाँ, जो सीधा उसके सीने को चीर रही थीं।
“तुम्हें लगता है कि मैं कोई अधूरा आदमी हूँ?” उसने पूछा — अब उसका स्वर धीमा था, पर नुकीला।
“मुझे लगता है,” मीरा बोली, “कि आप अधूरी औरतों को पूरा करने की कोशिश करते हो, ताकि अपनी कमी छुपा सको।”
अमरीश की हँसी गूंज उठी — लेकिन वो हँसी एक चेतावनी थी, जैसे कोई दरवाज़ा बंद हो रहा हो।
“तुम्हें नहीं पता, किससे बात कर रही हो,” उसने कहा।
“मुझे पता है। उसी आदमी से जो जब भी आईने में देखता है, तो खुद से डर जाता है।”
इस बार अमरीश ने अपना गिलास ज़ोर से मेज़ पर रखा। मीरा थोड़ी काँपी, लेकिन फिर भी उसकी आँखें नहीं झुकीं।
“तुम्हारी ये जुबान… मैं चाहूं तो अभी काट सकता हूँ,” उसने फुसफुसाकर कहा।
“और मैं चाहूं तो इसे सील भी कर सकती हूँ… लेकिन तब आप फिर अकेले रह जाएंगे — अपनी गूंगी हवेली के साथ।”
अमरीश एक पल को जैसे रुक गया।
उसने गहरी साँस ली और वाइन का एक घूंट भरा, फिर टेबल के उस पार देखता रहा।
“तुम्हें लगता है, मैं अकेला हूँ?” उसने कहा।
मीरा ने उसकी आँखों में झाँकते हुए जवाब दिया — “आप अंदर से एक खंडहर हैं। बस बाहरी दीवारें अभी टूटी नहीं हैं।”
वो अब खुलकर उसकी ओर देख रही थी।
अमरीश ने अपना काँटा प्लेट पर रख दिया।
“तुम्हें क्या लगता है, इस सबके बाद भी मैं तुम्हें छोड़ दूँगा?” वह बोला।
“मुझे कोई भ्रम नहीं है,” मीरा ने शांति से कहा, “मैं आपके पिंजरे में हूँ — पर ये पिंजरा चाहे जितना भी सुंदर हो, उसका असल मतलब बंदिश ही होता है।”
“बंदिश?” अमरीश ने सिर झुकाते हुए कहा, “ये हवेली बंदिश है? ये खाना, ये कपड़े, ये मेज़ — सब ज़ंजीर हैं?”
मीरा ने उसकी ओर देखा, उसकी आवाज़ में अब वो दर्द था जिसे उसने बहुत देर से छुपा रखा था।
“हाँ… क्योंकि ये सब चीज़ें जबरन दी गईं। जब किसी के शरीर से पहले उसकी आत्मा पर हक जमाया जाए, तो बाकी सब महज दिखावा होता है।”
अमरीश ने टेबल की एक तरफ देखा — जैसे कोई अनकहे सवाल उसे कचोट रहे हों।
फिर वह खड़ा हो गया।
“तुम बहुत बोलने लगी हो,” उसने सख़्ती से कहा।
“क्योंकि आप सुनने लगे हैं,” मीरा का जवाब सीधा था।
वो उसे घूरता रहा — कुछ पल — फिर धीमे से पास आया। उसका चेहरा अब मीरा के बहुत करीब था।
“तुम मेरी कैद में हो, मीरा,” उसने धीरे से कहा, “और ये कैद तुम्हारी साँसों से भी गहरी है। मत भूलो — ये मेरा क़ायदा है, और यहाँ मेरी जुबान आख़िरी होती है।”
मीरा ने बिना झुके कहा, “और जुबान से पहले कभी-कभी आत्मा फैसला ले लेती है।”
दोनों की आँखें टकराईं — आग और राख की तरह।
और फिर अमरीश एकाएक पीछे हटा।
“कल सुबह छह बजे नीचे आ जाना,” उसने मुड़ते हुए कहा, “मैं तुम्हें दिखाना चाहता हूँ कि कैद में भी कौन-सी ‘आज़ादी’ सबसे ज्यादा चुभती है। लेकिन उससे पहले बिस्तर पर मिलेगे तुम मेरा इंतजार करना और आज कोई रहम नहीं होगा | ”
वह चला गया।
मीरा अकेली रह गई — मगर इस बार उसकी आँखें झुकी नहीं थीं। डरी सहमी
वो जानती थी कि हवेली की दीवारें भले ऊँची हैं, लेकिन कहीं न कहीं, एक खिड़की ऐसी भी होती है जहाँ से हवा आना नहीं रोका जा सकता।
अध्याय: आईने के उस पार
रूम में धीमी पीली लाइट फैली हुई थी। खिड़की के बाहर रात अब और गहरी हो चली थी, लेकिन हवेली के इस रूम में सन्नाटा किसी गहरे ज़ख्म की तरह रिस रहा था।
मीरा मिरर के सामने खड़ी थी।
उसकी आँखें खाली नहीं थीं, मगर शांत थीं। बहुत ज़्यादा शांत — जैसे किसी बड़े तूफ़ान से पहले की मृत निस्तब्धता। उसने धीरे-धीरे अपने एयरिंग उतारे — नाज़ुक, मगर भारी। फिर वो नेकलेस, जो कॉलरबोन से उतरते ही जैसे किसी बोझ की तरह ज़मीन की तरफ गिरा। हर ज़ेवर उसकी कैद की एक और परत था।
उसने कंगन उतारा… बाएं हाथ से, ।
मिरर में उसकी परछाईं अब ज़्यादा साफ़ दिखने लगी थी — बिना ज़ेवरों के, एक सादा सी लड़की। लेकिन उसकी आँखों में अब कुछ बदल चुका था — शायद वो आग, जो अमरीश की बातों से सुलग चुकी थी।
मीरा ने हल्के हाथों से अपनी ड्रेस के कंधे को पकड़ा। धीरे-धीरे कपड़ा उसके कंधे से फिसलने लगा… जैसे वो किसी बोझ को उतार रही हो… लेकिन तभी —
पीछे से दो हाथ अचानक उसके कंधों पर आए।
गर्म, भारी और अधिकार जताने वाले।
मीरा का पूरा शरीर एक पल को सिहर उठा। उसकी साँसें थम गईं। उसने झट से मिरर में देखा।
अमरीश था।
उसकी आँखों में वही पुराना निर्दयी आत्मविश्वास था — लेकिन आज उनमें असहजता की एक अजीब सी परछाईं भी थी।
“कपड़े उतार रही हो, मैं मदद कर दू?” उसका स्वर नीचा था, मगर नुकीला।
मीरा एकदम से पलटी — लेकिन उसने अपनी ड्रेस को सीने पर कसकर पकड़ लिया। उसकी पलकें डरी हुई थीं, लेकिन होंठों पर दृढ़ता।
“आप मुझे डराने का कोई मौका नहीं छोड़ते है,” उसने कहा, “अब शरीर को भी बेइज़्ज़त करने आए हो?”
अमरीश की उंगलियाँ अब भी उसके कंधे के पास थीं, लेकिन उसने उन्हें पीछे हटा लिया। उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी — अपमान और तमाशे का मिला-जुला रूप।
“डरने वालों को ही तो मैं पालता हूँ,” उसने कहा, “ताकि जब वो काँपें… तो मेरी जीत और ज़्यादा मीठी लगे।”
मीरा पीछे हटी। ड्रेस को सीने से कसते हुए, वह अमरीश की आँखों में झाँकने लगी — “जीत? ये जीत नहीं, सिर्फ क़ब्ज़ा है। और क़ब्ज़ा तब तक ही चलता है जब सामने वाला खुद को खो दे। मैं अब और नहीं खोऊँगी।”
अमरीश ने एक और क़दम बढ़ाया। अब वो उसके बहुत पास था — इतना कि मीरा की साँसें अटकने लगीं।
“तुम मेरी हो, मीरा,” उसने धीमे कहा।
मीरा की आँखों में अब भी वही आग थी, जो डाइनिंग टेबल पर भड़की थी।
“अपने काग़ज़ों पर मुझे ‘मालिकियत’ बना लिया… लेकिन आत्मा पर दस्तख़त नहीं हो सकते। वहाँ ना ताकत चलती है, ना ज़ोर।”
अमरीश कुछ मिनट तक शांत रहा।
उसने रूम के चारों तरफ नज़र डाली — जैसे इस सजावट से खुद को यक़ीन दिला रहा हो कि वह मालिक है। फिर उसने एक हाथ मीरा के चेहरे के पास लाया — छूने के लिए नहीं, सिर्फ डराने के लिए।
“तुम क्या समझती हो,” उसने नरम स्वर में कहा, “कि ये सब तुम्हारी मर्ज़ी से हो रहा है? अगर मैं चाहूँ तो…”
“तो?” मीरा ने बीच में टोका।
“तो मैं सब कुछ ले सकता हूँ,” उसने गुर्राते हुए कहा।
मीरा हल्के से मुस्कुराई — एक फीकी, मगर अडिग मुस्कान।
“जो चीज़ आपने कभी दी ही नहीं… उसे छीनने का दावा मत कीजिए।”
एक पल का सन्नाटा — गहरा सन्नाटा।
रूम में सिर्फ उनकी भारी साँसें सुनाई दे रही थीं। मीरा अब भी नंगी आत्मा के साथ खड़ी थी — शरीर पर कपड़े ज़रूर थे, लेकिन आत्मा अब किसी परदे के पीछे नहीं थी।
“तुम मुझे नहीं जानती, मीरा,” अमरीश ने धीमे स्वर में कहा, “तुम्हें लगता है मैं सिर्फ एक ज़ालिम हूँ। पर मुझे तो… खुद को भी समझ नहीं आता कि मैं कितना बड़ा जालिम हूँ।”
मीरा उसकी तरफ एक क़दम बढ़ी। अब दोनों इतने पास थे कि एक-दूसरे की धड़कनें तक सुनी जा सकती थीं।
“शायद इसलिए आप दूसरों को चोट देकर खुद को महसूस करते हो।”
अमरीश की आँखें हल्की सी नमी से भर गईं — या शायद वो पसीना था।
उसने अपना चेहरा मोड़ लिया।
“तुम्हारी ये ज़ुबान... किसी दिन महँगी पड़ेगी,” उसने कहा।
मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया। वो मिरर की तरफ फिर मुड़ी। अब उसने अपनी ड्रेस के कंधे के पट्टों को और कसकर खींच लिया — जैसे अब उसे कुछ साबित नहीं करना था।
“कल जो दिखाना है, दिखा दीजिए…” उसने बस इतना कहा।
अमरीश ने उसे देखा — उसकी पीठ, उसकी खुली गर्दन, उसकी शांत बहादुरी।
वो अब भी वही खड़ा था मीरा के पीछे मिरर से दोनों एक दूसरे को देख रहे थे |
“तैयार रहना,” उसने अपने होठों को मीरा के रइट साइड वाले कान के पास ले जाकर कहा, “मैं तुम्हारी हिम्मत की आख़िरी परत भी नोच लूँगा।”
मीरा ने धीमे से कहा —
“हिम्मत कपड़ों से नहीं उतरती, साहब… वो तो दर्द की राख से उठती है।”
उसकी बात से एक पल को अमरीश ने गुस्से में आंखे बंद कर फिर खोली।
रूम में फिर वही गहरा सन्नाटा फैल गया।
मगर इस बार उस सन्नाटे में एक नई आवाज़ थी — आत्मा की, जो अब बंद दरवाज़ों से भी बाहर निकलने लगी थी।
अमरीश ने मीरा के बालों को एक साइड किया राइट से लैफ्ट मीरा सिहर गई और घबरा कर अमरीश कि और मुडी और थोड़ा साइड हटने लगी |
अध्याय: उस क्षण के पार — जहाँ शब्द रुक जाएँ
रात अपने सबसे गहरे सन्नाटे में थी। हवेली की खिड़कियों पर भारी परदे झूल रहे थे, लेकिन बाहर की हवा जैसे किसी अनजाने ख़तरे की भनक देती हुई भीतर रिस रही थी। दीवारों पर जमी परछाइयाँ स्थिर थीं, फिर भी उनकी छाया जैसे चल रही हो। आईने के सामने खड़ी मीरा की आँखों में नमी थी — वो नमी जो न रोने देती है, न बोलने।
उसने वही ड्रेस पहन रखी थी, जो अमरीश ने भिजवाई थी — गहरी रेशमी नीली, जो उसके काँपते कंधों पर ढीली पड़ी थी। पर अब उस ड्रेस में न कोई सजावट थी, न श्रृंगार का कोई अर्थ। वो जैसे एक लिबास नहीं, एक मजबूरी बन गई थी। उसका चेहरा एकदम खाली — किसी कठोर निर्णय की तरह।
दिल कि भारी आहट , उसके भीतर की साँसें एक पल को थम गईं।
।
धीरे-धीरे उसके पास आया। इस बार उसके कदमों की आवाज़ वैसी नहीं थी जैसे थोड़ी देर पहले थी — वह जब कुछ देर पहले था, तो धरती काँपती थी। अभी… जैसे उसकी आत्मा पहले से ज्यादा खतरनाक हो गई।
मीरा इसपल में उसकी परछाईं से भी डर रही थी।
"तुम क्या चाहते हो," वह धीरे से बोली, पर उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"और जो चाहू तो क्या दोगी, " अमरीश की आवाज़ वही सकती थी… पर भीतर कहीं कोई कुछ और भी था।
कुछ देर खामोशी।
फिर मीरा की साँस फूट गई। "प्लीज़… मुझे जाने दो," उसकी आवाज़ भीगी हुई थी, जैसे किसी ने दिल से चीर कर निकाली हो। "मैंने कुछ नहीं माँगा तुमसे… बस आज़ादी माँग रही हूँ। मत रोको मुझे… प्लीज़…"
अमरीश पास आया। बहुत पास।
उसके और मीरा के बीच अब कुछ नहीं था — न हवा, न शब्द।
"आज़ादी?" वह हँसा। बहुत धीमे, लेकिन वो हँसी ज़हर सी गूँजती रही। "तुम जानती हो मीरा… हमारे बीच कोनटरेक्ट हुआ है… इस हद तक कि तुम्हारी रूह को भी बाँध लूं।"
मीरा एक कदम पीछे हटी। "प्लीज़… मत देखो ऐसे… मुझे डर लगता है।"
"डर?…" वह उसकी ओर झुका। "तुम्हें मुझसे अब भी डर लगता है, मीरा?"
उसने मीरा के चेहरे को अपनी हथेली से पकड़ लिया — ज़ोर से नहीं, पर इतना कि उसकी मासूमियत काँप गई।
"मैं तुम्हें जाने नहीं दूँगा," उसने धीमे-धीमे, लेकिन बेहद खतरनाक लहजे में कहा। "क्योंकि तुम अब सिर्फ़ मेरी हो। तुम्हारा हर आँसू, हर साँस, हर कपकपाहट… मेरी है। और जो मेरा है… उसे मैं यूँ नहीं जाने देता।"
मीरा का चेहरा अब पूरी तरह रोशनी में आ चुका था — चेहरा नहीं, एक गुहार थी वो। उसने हाथ जोड़ दिए, काँपते हुए होंठों से बोली —
"मैं तुम्हारे क़ाबिल नहीं… मैं बस जीना चाहती हूँ… तुम्हारे बिना, एक सादा-सा जीवन… प्लीज़ मुझे छोड़ दो…"
अमरीश ने एक गहरी साँस ली, फिर अपने होठों से उसके कान के पास जाकर बुदबुदाया —
"तुम्हें जीने नहीं दूँगा, मीरा… अगर तुम मेरे बिना जियो।"
मीरा काँप गई।
"क्यों?" उसने लगभग फुसफुसाकर कहा, "क्यों मुझे यूँ कैद कर रखा है…?"
"क्योंकि तुम्हारा जाना… मुझे खत्म कर देगा," अमरीश का चेहरा अब बुझा-बुझा सा था। "और मैं मरना नहीं चाहता, मीरा… मैं तुम्हारे साथ जीना चाहता हूँ… या फिर तुम्हें खुद में खत्म करके जीना चाहता हूँ।"
फिर वो हंसने लगा ऐसी बात सिर्फ़ वो मीरा का बेवकूफ बनाने के लिए बोला |लेकिन मीरा जानती थी कि वो सिर्फ मीरा को पागल बना रहा है |
मीरा ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की, पर वो बाँहों में जकड़ गई। "प्लीज़… जाने दो न… देखो, मैं कुछ नहीं लूँगी, कुछ नहीं कहूँगी… बस चुपचाप चली जाऊँगी…"
अमरीश की आँखें अब अजीब सी चमक रही थीं — उसमें प्रेम नहीं था, सिर्फ़ पज़ेसिव दीवानगी थी। साथ एक क्रूर इरादे मीरा को तबाह करने के,
"तुम इतनी मासूम क्यों हो मीरा? इतनी मासूम कि मैं तुम्हें तोड़ दूँ…।"
"मत कहो ऐसा… मत छुओ मुझे ऐसे…" मीरा ने आँखें बंद कर लीं।
"मैं तुम्हें हर तरह से अपना बना चुका हूँ, मीरा। अगर तुम जाओगी… तो मैं वो सब भी खत्म कर दूँगा जहाँ तुम जा सकती हो।"
"ये जो तुम्हारी नफरत है…" मीरा की आवाज़ टूटी, कांपी। "ये कैद है… सज़ा है… ज़ुल्म है…"
"हाँ, है!" अमरीश चिल्लाया। पहली बार उसकी आवाज़ दीवारों से टकराई। "जो भी है ये ही और तुम्हें यज सब सहन करना होगा चूकाना होगा अपने चाचा का कर्ज,
मीरा के आँखों से अब आँसू बह चले — शांत, कोमल… लेकिन भीतर से जलते हुए।
उसने धीरे से कहा, "तो मुझे मार दो… पर यूँ हर रोज़ मत तोड़ो…"
अमरीश एक पल को सन्न रह गया। फिर, उसके चेहरे की कठोरता ढहने लगी।
धीरे-धीरे उसने मीरा की उँगलियों को थाम लिया। इस बार वह पकड़ मजबूत नहीं थी — बस छुअन थी।
"मैं नहीं जानता कि मैं कौन हूँ, मीरा…" वह फुसफुसाया। "एक पागल… एक अपराधी… या बस एक टूटा हुआ आदमी… लेकिन एक बात जान लो मैं घाटे के सौदे कभी नहीं करता हूँ और अगर हमारे बीच के सौदे में लोस हुआ तो बहोत बुरा होगा।"
मीरा ने देखा — उस चेहरे को, जिसे वो कभी देखना नहीं चाहती थी। लेकिन आज… उस चेहरे में पहली से ज्यादा पागल पन दिखा ।
"अगर मैं तुम्हारी सारी बातें मान लू तो," उसने कहा, "तो क्या वादा करोगे… कि फिर कभी हमें परेशान नहीं करोगे?"
अमरीश ने कोई जवाब नहीं दिया… बस धीरे से उसे गले से लगा लिया।
मीरा ने पल भर अमरीश को देखा और अपनी आंखों से उसके सीने कि और देख कहा,
"तुम्हारा दिल… बहुत तेज़ धड़कता है," मीरा ने बुदबुदाकर कहा।
"क्योंकि उसमें तुम हो तुम्हारी नफरत है।"
कुछ पल यूँ ही बीते… साँसों की टकराहट में कोई राज छुपा था।
"तुम यहाँ से चले जाओ…" मीरा ने टूटे शब्दों में कहा।
"ऐसे कैसे जाऊ," अमरीश ने कहा… पर उसकी आँखें रुक गईं, "
मीरा की आँखों से आँसू बहते रहे… लेकिन उनके बहाव में अमरीश के लिए नफरत थी।
" बहोत बुरे हो ",
अमरीश ने धीरे से कहा, "ये सून कर अच्छा लगा, "
अध्याय: "पलटकर देखा — जब पिंजरे में पर फड़फड़ाने लगे"
कमरे की हवा भारी थी।
अभी कुछ मिनट पहले ही एक खामोश शाम का पर्दा खिंचा था, लेकिन हवेली के इस पुराने कमरे में कुछ ऐसा था जो साँसों को धीमा कर देता था।
मीरा चुपचाप खड़ी थी। उसके बाल कंधों पर बिखरे हुए थे, माथे पर पसीने की एक हल्की लकीर थी। उसकी साँसें तेज़ थीं, और आँखें – वे अब भी अमरीश को घूर रही थीं।
लेकिन इस बार — कोई डर नहीं था। सिर्फ़ गुस्सा।
"तुम इंसान हो भी या सिर्फ़ अपना हुक्म चलाने वाला कोई पिशाच?" मीरा की आवाज़ धीमी थी, मगर धारदार।
अमरीश धीरे से एक कदम आगे रखखा। वो जो उसके पास खड़ा था, अब अचानक सीधा सामने आ गया — और एक पल के लिए बिल्कुल स्थिर हो गया।
"क्या कहा तुमने?" उसने फुसफुसाकर पूछा, लेकिन स्वर में एक चुभन थी।
"तुम्हें क्या लगता है?" मीरा ने ज़ोर से कहा, "तुम कुछ भी करोगे और मैं चुप रहूँगी? ये हवेली तुम्हारी है, लेकिन मैं नहीं!"
अमरीश की आँखें संकरी हो गईं।
वो धीरे-धीरे मीरा की तरफ बढ़ा।
"क्या करोगी तुम?" उसने पूछा, "भागोगी? चिल्लाओगी?"
"शायद…" मीरा ने एक कदम पीछे लिया, लेकिन चेहरा ऊँचा था, "या फिर तुम्हें वही बताऊँगी जो तुम्हारी माँ ने कभी नहीं कहा — कि कभी कभी घाटे का सौदा भी कर लेना चाहिए।"
अमरीश वहीं रुक गया।
उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान आई — न पूरी हँसी, न पूरी ग़ुस्सा।
"तुम मुझे समझाने चली हो अब?" उसने ताना मारा।
"हाँ," मीरा बोली, "क्योंकि जिस आदमी ने मुझे कैद किया, उसे शायद आज़ादी का मतलब कभी बताया ही नहीं गया।"
उसके शब्द, जैसे दीवार से टकरा गए।
अमरीश कुछ क्षण खामोश रहा… फिर अचानक, जैसे कुछ भीतर फूट पड़ा हो।
वो तेजी से मीरा की ओर बढ़ा।
मीरा को इसका अंदाज़ा नहीं था। वो चौंकी, और पीछे हटने लगी — लेकिन इससे पहले कि वो मुड़ती, अमरीश ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"कहाँ जा रही हो?" उसकी आवाज़ अब एकदम गहरी थी।
"छोड़ो मुझे!" मीरा ने झटके से कहा।
"तुमने ही कहा ना… मैं कुछ नहीं समझाया गया," अमरीश की साँसें उसकी गर्दन के पास थीं, "तो सिखाओ मुझे… पर यूँ मुँह मोड़कर नहीं।"
उसने मीरा को दीवार की ओर धकेला — हल्का सा, लेकिन उसके इरादे साफ थे।
मीरा की पीठ दीवार से लगी, और अमरीश ने उसके दोनों हाथों को ऊपर थाम लिया।
"तुम्हारा ये पागलपन है!" मीरा चीखी।
"पागलपन ही तो है जो मुझे तुम तक लाता है," अमरीश ने कहा, "वरना मैं कभी किसी को दो बार नहीं देखता… और तुम — तुम तो अब मेरी साँसों में हो।"
"ये सौदा नहीं है। ये सिर्फ़…"
"सिर्फ़ क्या?" उसने उसकी आँखों में झाँका।
मीरा हिचकी। उसकी साँसें तेज़ थीं, शरीर तनाव में था। मगर उसकी आँखें अब भी डरी नहीं थीं — वो जानती थी कि ये आदमी चाहे जितना भी कठोर क्यों न हो, उसके शब्दों से हिलता ज़रूर है।
"ये तुम्हारी हार है।" मीरा ने कहा।
अमरीश जैसे सुन्न हो गया।
उसने धीरे-धीरे मीरा के हाथ छोड़े।
वो कुछ पीछे हटा।
"मेरी हार?" उसने दोहराया।
"हाँ," मीरा आगे बढ़ी, "क्योंकि जो जीतते हैं, उन्हें बाँधने की ज़रूरत नहीं पड़ती।"
एक लंबा मौन छाया।
हवा की एक तीखी लहर कमरे में दाख़िल हुई। खिड़कियाँ हिल गईं।
अमरीश की आँखें अब नीची थीं।
"मैं तुम्हें बाँधता नहीं …" उसने धीमे से कहा, "मैं खुद तुमसे बँधा हूँ। फर्क बस इतना है — तुम दिखाती नहीं, और मैं छुपा नहीं पाता।"
मीरा की नज़रें उस पर टिक गईं।
वो अब भी कांप रही थी — पर अब उसमें एक थिर विश्वास आ गया था।
"तो मुझे रुलाकर, डराकर… क्या पाओगे?" उसने पूछा।
"तुम…" अमरीश ने उसकी ओर देखा, "तुम्हें खोने से डर लगता है। और जब मैं डरता हूँ… मैं पागल हो जाता हूँ।"
मीरा अब चुप थी।
वो जानती थी कि ये डर, ये जुनून — ये सब किसी ज़ख़्म की उपज है। और शायद, वो ज़ख़्म उसके कहे किसी वाक्य से फिर से खुल गया। एक चीजे सिर्फ एक सौदे कि वजह से तो नहीं हो सकता है
एक पल बाद, उसने आगे बढ़कर धीरे से कहा —
"डर तो मुझे भी लगता है, अमरीश। लेकिन मैं खुद को तो नहीं खो देती…"
उसकी आवाज़ में कोई दया नहीं थी — सिर्फ़ समझदारी थी।
अमरीश कुछ नहीं बोला। बस खड़ा रहा। जैसे किसी ने उसकी रीढ़ में ठंडक भर दी हो।
मीरा अब धीरे से कमरे से बाहर निकलने लगी।
लेकिन दरवाज़े तक पहुँचते ही उसने मुड़कर कहा —
"अगर कभी सच में खुद को समझना चाहो, तो मेरी आँखों में झाँकना… वहाँ तुम्हारा अक्स मिलेगा — वो जो सिर्फ़ ज़िद्दी नहीं, जख़्मी भी है।"
अध्याय: “हवा के उस पार – जब दृष्टि काँप जाए”
कमरे की खिड़की खुली थी। बाहर की चाँदनी धीरे-धीरे भीतर रेंग आई थी, जैसे किसी अनजाने गवाह की तरह, जो दोनों को बिना कहे पढ़ रही हो।
मीरा कमरे के बीच खड़ी थी, और उसकी आँखें अमरीश पर थीं — स्थिर, चुप, मगर बिलकुल भी नरम नहीं।
अमरीश कोने की आरामकुर्सी में बैठ गया, उसकी उँगलियाँ कुर्सी के हत्थे पर कसती और ढीली होती जा रही थीं। वो एक टकटकी में मीरा को देख रहा था, पर उसकी दृष्टि में अब चाहत नहीं… शक, कठोरता और एक अधूरे वश की जलन थी।
“तुम अब भी सोचते हो… मैं डरूँगी?”
मीरा की आवाज़ में नमी नहीं थी — वो एक धार थी, जो सीधे नस पर चली जाए।
अमरीश ने होंठ भींचे, और सिर हल्का-सा झुकाया — जैसे कोई शिकारी अपने अगले वार से पहले एक पल का धैर्य ओढ़ता है।
“डर…” वो हँसा, “तुम्हें अब भी लगता है मैं तुम्हें डराने की कोशिश करता हूँ?”
“नहीं,” मीरा ने धीरे कहा, “अब नहीं। अब तुम बस देखना चाहते हो — टूटती हुई मीरा को। शायद इसी से तुम्हारा 'पुरुष' संतुष्ट होता है।”
कमरे की हवा काँपी — जैसे किसी ने अचानक कोई पुराना ज़ख़्म फिर से खोल दिया हो।
चाँदनी अब दोनों के चेहरों पर थी — और उन चेहरों पर भाव… बर्फ़ की तरह सख़्त।
“तुम बहुत बदल गई हो,” अमरीश ने उसकी ओर देखा।
“और तुम अब भी वहीं अटके हो,” मीरा ने जवाब दिया, “जहाँ तुम्हारा अहम तुम्हारे पर हावी होता है ।”
उसने खिड़की के पास जाकर परदे को हौले से छुआ — जैसे हवा से कोई नया सवाल पूछ रही हो।
“क्या चाहती हो अब?” अमरीश की आवाज़ थोड़ी तेज़ थी, लेकिन भीतर कोई थकावट भी थी।
“तुम्हारा चेहरा याद रखना,” मीरा ने सीधा उसकी ओर देखा, “जिस दिन सब कुछ खत्म होगा, मुझे यक़ीन रहे — मैंने शैतान को पास से देखा है।”
उसका यह वाक्य कमरे की दीवारों से टकरा कर लौट आया। अमरीश एक पल के लिए चुप रहा, फिर कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।
वो अब ठीक उसके सामने था। उनके बीच एक लंबा मौन था — ऐसा, जिसमें दोनों अपनी-अपनी तलवारें म्यान से निकाल चुके थे… पर वार अभी रुका था।
“तुम जानती हो,”
उसका स्वर अब धीमा था, पर उसमें एक शीतल क्रूरता थी,
“अगर मैं चाहूँ, तो इस रात को तुम्हारा नाम ही नहीं, तुम्हारी साँसें भी रोक दूँ।”
मीरा मुस्कुराई — एक ठंडी, तिरस्कार भरी मुस्कान।
“तुम्हारा दुर्भाग्य यही है,” वो बोली, “कि तुम सिर्फ़ शरीर को हराना जानते हो। आत्मा को नहीं।”
अमरीश की आँखें संकरी हो गईं। एक पल को जैसे वह कुछ कहने ही वाला था… पर फिर वह चुप हो गया।
मीरा अब फिर खिड़की की ओर मुड़ी, पर उसकी पीठ में डर नहीं था — एक अजीब किस्म की अडिगता थी। जैसे कोई तूफ़ान खिड़की के पार खड़ा हो, और मीरा उसे नज़रें उठाकर चुनौती दे रही हो।
अमरीश ने मीरा को देख कहा,
“याद रखना, मीरा… ये लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।”
मीरा की आवाज़ पीछे से आई — एकदम स्पष्ट, स्थिर और चुनौतीपूर्ण:
“खत्म तो उस दिन होगी… जब तुम जानोगे कि मेरी चुप्पी तुम्हारे शोर से कहीं ज़्यादा तेज़ है।”
मीरा पुरी नफरत से अमरीश को देख रही थी | अमरीश भी मीरा को देख रहा था, मीरा अमरीश कि और देख सोच रही थी वो कितना बुरा इंसान है भले ही आज मीरा उसकी कैद में है लेकिन कोनटरेक्ट तो वो उसकी छोटी बहन जोकि अभी सिर्फ 17 साल कि है उसके लिए लाया था जिसके तहत आज मीरा उसकी कैद में है |
पर कमरे में अब भी जो रह गया था —
वो दुश्मनी की महक थी।
वो एक अघोषित युद्ध की घोषणा थी।
और वो एक औरत की आँखें थीं, जो अब झुकेगी नहीं।
अध्याय: पर्दे के पीछे — हँसी, जो ज़हर उगलती है
रात अपने काले आँचल में हवेली को लपेट चुकी थी। हर कोना चुप था, पर रसोई के ठीक पीछे बने छोटे-से नौकर क्वार्टर से धीमी-धीमी फुसफुसाहटें उठ रही थीं। मिट्टी की दीवारों के बीच रखे एक टूटे से बेड पर रमा अधलेटी थी, और सामने फर्श पर बैठा किशन — सिर पर पुरानी टोपी, आँखों में शरारत और होंठों पर गंदी मुस्कान लिए — पान चबा रहा था।
"तो… आज फिर वही लाल ड्रेस?" — कैलाश ने पान थूकते हुए पूछा।
रमा ने हँसते हुए कहा, "हाँ, वही। साहब की पसंद है — जितनी कम कपड़े हों, उतनी ज़्यादा लज्ज़त!"
किशन ने भौंहें नचाईं, “पर वो लड़की तो जैसे जल्लाद के सामने बकरी हो गई है — एकदम कांपती रहती है।”
रमा ने अपने बालों को पीछे बाँधा और धीमे से मुस्कुराई, “कांपेगी नहीं तो क्या करेगी? एकदम दूध की धुली आई है — शायद ज़िंदगी में पहली बार किसी ने उसे उसकी 'असली औक़ात' दिखाई है।”
किशन उठकर रमा के पास आ गया, और उसकी गोद में सिर रखकर लेट गया। “और तू… तू तो जैसे उसकी गुरू बन गई है… सिखा रही है कैसे किसी की गुड़िया बना जाता है।”
रमा ने उसकी नाक मरोड़ी, “गुड़िया नहीं, भाई… साहब की 'रखेल' कह! उस कमरे में जो होता है, वो इश्क़ नहीं होता — वो तो हुकूमत की सबसे बदसूरत शक्ल है।”
“तो फिर तू क्यों करती है ये सब?” — किशन की आवाज़ में हँसी थी, पर आँखों में एक अजीब-सी चाह।
रमा की नज़रें दूर शून्य में टिक गईं। “क्योंकि… इस घर में इज़्ज़त की जगह सिर्फ़ या तो चुप रहने वालों को मिलती है… या बिस्तर गर्म करने वालों को। मैं चुप रही, अब वो दूसरा रास्ता समझा रही हूँ।”
किशन ने धीरे से उसके हाथ पर उंगलियाँ फेरते हुए कहा, “लेकिन मीरा… वो तो न कुछ कहती है, न कुछ माँगती है… फिर भी साहब के लिए जैसे सबसे बड़ी तिजोरी बन गई है।”
रमा ने होंठ भींचे, फिर कहा, “क्योंकि वो नई है। और साहब को हर बार नई चीज़ चाहिए। उसकी मासूमियत भी उनके लिए एक नया ज़हर है।”
कमरे की बत्ती पीली झिलमिल रोशनी फैला रही थी। बाहर से कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आई। रमा ने थोड़ी देर चुप्पी के बाद कहा —
“तूने देखा ना, कैसे देखता है साहब उसे? जैसे कोई बच्चा नंगी गुड़िया देखता है… आँखों में भूख नहीं होती, लार होती है…”
किशन उसकी गोद से उठकर उसके कान के पास झुका, “पर तुझे तो जलन होती होगी ना?”
रमा हँस दी — एक ऐसी हँसी, जो औरत की हार से जन्म लेती है।
“जलन? नहीं… अब तो मज़ा आता है। जब उसे सजाकर भेजती हूँ ना… तो लगता है जैसे अपने हाथों से किसी पर चाबुक चला रही हूँ — जो कभी मुझे रुला चुका है।”
किशन ने उसका चेहरा छूने की कोशिश की, “और मैं? मुझे तू क्या समझती है?”
रमा ने उसकी उंगलियाँ हटाईं, फिर उसकी ओर देखती रही। “तू? तू तो बस वो है जो गवाह बनता है — इस घर की हर गंध का, हर चीख़ का। तू वही है, जो कभी साहब के जूते चमकाता था, और अब मेरी बातों से दिल बहलाता है।”
किशन झेंप गया, पर हँसी न रुकी। “मतलब मैं सिर्फ़ टाइमपास हूँ?”
“तू वक़्त है — जो चलता है, और सबकी औक़ात दिखा जाता है।”
कुछ पल खामोशी रही।
फिर रमा ने धीमे से कहा, “जानता है, आज वो लड़की कितनी रोई थी… जब मैंने उसे वो रेड ड्रेस दी? कहती रही — ‘मैं ऐसी नहीं हूँ’। और मैंने कहा — ‘अब बन गई है’।”
किशन ने आँखें बंद कीं, और बुदबुदाया — “वो लड़की बहुत ख़ूबसूरत है…”
रमा का चेहरा अचानक सख़्त हो गया।
“हाँ, है। इसलिए ही तो साहब ने उसे चुना। और इसलिए ही मैं उसे तोड़ रही हूँ — ताकि उसकी ख़ूबसूरती उसे ज़िंदा न रहने दे।”
किशन अब उठकर रमा के बराबर में आ बैठा। “तेरे अंदर बहुत दर्द है, रमा…”
“दर्द नहीं… हिसाब है।” रमा ने कहा, “इस हवेली में हर मुस्कान के नीचे एक दास्ताँ है — कोई बिस्तर से जुड़ी, कोई आईने से। और मीरा… वो बस अगली कड़ी है इस कहानी की।”
किशन ने धीमे से उसका कंधा चूमा।
“एक बात बोलूँ?” — वो फुसफुसाया — “तेरे अंदर की आग सबसे ज़्यादा ख़ूबसूरत है।”
रमा ने उसकी आँखों में देखा। “आग ख़ूबसूरत नहीं होती, किशन — सिर्फ़ जलाती है। और मैं अब जलाना जानती हूँ, जलना नहीं।”
किशन ने उसकी उँगलियों को अपने में बाँध लिया।
“तो फिर हम दोनों एक जैसे हैं — एक वो जो जलाते हैं… और एक वो जो राख में भी हाथ सेंक लेते हैं।”
रमा ने पहली बार हल्के से मुस्कुराकर उसकी ओर देखा। “कभी-कभी सोचती हूँ — तू भी अगर थोड़ा पहले आया होता… तो शायद मेरी भी कहानी कुछ और होती।”
किशन ने गहरी साँस ली — “कहानी वही होती है, जो हवेली तय करती है… हम तो बस किरदार हैं, रमा। कोई मीरा बने… कोई तू…”
बाहर चाँदनी फैल रही थी। कमरे में अब भी पसीने, पान और साज़िशों की महक थी।
और ऊपर, हवेली के बड़े कमरे में — एक लड़की, जो आज फिर अपना सच हार चुकी थी — आईने के सामने खड़ी थी।