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Junooniyat

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ये कहानी है खूबसूरत रूह फारुखी और उसके कज़न यारम काज़मी की। यारम जिसका दूसरा नाम ही है बर्बादी और बर्बाद करना है जिसका शौक वही दूसरी ओर है रूह फारुखी जिसे बेइंतहा इश्क है अपनी आजादी से। दो मुख्तलिफ शख्सियत के मालिक जिनकी तक़दीर आपस में जुड़ने को है। या...

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यारम काज़मी

Hero

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रूह फारुखी

Heroine

Total Chapters (61)

Page 1 of 4

  • 1. Junooniyat - Chapter 1

    Words: 1296

    Estimated Reading Time: 8 min

    शाम का वक्त

    एक अठारह साल की बेहद खुबसूरत लड़की तेज़ बारिश में दिल्ली की सड़कों पर बेजान सी चली जा रही थी।

    उसकी खूबसूरती काली गहरी आंखें सुर्ख लाल और सूजी हुई थी। जिसका साफ़ मतलब था की वो लड़की कई घंटे रोई थी। उसने ब्लू डेनिम जींस के ऊपर लॉन्ग पिंक कुर्ती और गले में स्कार्फ डाला हुआ था।

    उसके कपड़े बारिश में भीगने की वजह से गीले हो चुके थे। बारिश के साथ ठंडी हवाओं के चलने से उसके हार्टशेप होठ भी कपकपा रहे थे।

    कुछ ही देर में वो चलते चलते एक बड़ी सी बिल्डिंग के सामने आकर रूकी और अपनी सुनी आंखों से उस शानदार इमारत को देखने लगीं जिस पर बड़े बड़े वर्ड्स में काज़मी चैन ऑफ़ कंपनीज लिखा हुआ था।

    उस लड़की ने एक गहरी सांस ली और उस बिल्डिंग के अन्दर चली गई।

    उस लड़की को वहा मौजूद लगभग हर शख़्स जानता था। इसलिए किसी ने भी उस लड़की को रोकने की कोशिश नहीं की उल्टा उसे देखकर सारे मेल्स एम्प्लॉय के साथ साथ फीमेल एम्पलॉइज ने भी डर से अपनी नज़रे नीची कर ली।

    उस लड़की ने एक नज़र उन सबकी ओर देखा जो अपनी नज़रे जमीन में गाड़े खड़े थे फिर वो लिफ्ट की ओर बढ़ गई। उस लड़की के लिए ये कोई नई बात नहीं थी। इसलिए उसने उन सबको इग्नोर किया।

    वो लड़की लिफ्ट से उस बिल्डिंग के टॉप फ्लोर जहां सीईओ का कैबिन था वो उस फ्लोर पे चली गई। लिफ्ट के बाहर ही उसे एक करीब 27 साल का हैंडसम लड़का दिखाई दिया जिसने politely उस लड़की को ग्रीट किया।

    वो लड़की उस लड़के को बिना जवाब दिए सीईओ के कैबिन की ओर चल दी।

    कैबिन के बाहर खड़े होकर उस लड़की ने एक लंबी सांस ली और बिना नॉक किए अन्दर चली गईं।

    वो कैबिन बेहद शानदार और लक्जिरस था। जो यूरोपियन स्टाइल से डिज़ाइन किया गया था। उस लड़की के नज़र सीईओ की रिवॉल्विंग चेयर पे गई जो खाली थी।

    उस लड़की ने नज़रे घुमा कर देखा तो उस कैबिन की बड़ी सी कांच की वॉल जिससे वो पूरा शहर दिखाई दे रहा था। वहा एक शख़्स उसकी ओर पीठ करके खड़ा था।

    उस शख़्स ने ब्लैक पैंट विथ ब्लैक शर्ट पहनी हुई थी। जिसकी आस्तीन को उसने फोल्ड किया हुआ था। उस शख़्स का एक हाथ उसके पॉकेट में तो वहीं वो अपने दूसरे हाथ से सिगरेट का कश ले रहा था।

    उस शख़्स को पीछे से ही देख कर बताया जा सकता था की वो 6'3 हाईट वाला एक बेहद अट्रैक्टिव शख़्स है जिसकी वेल बिल्ड मस्कुलर बॉडी और biceps उस शर्ट से साफ़ नज़र आ रही थी।

    उस शख्स को देखकर उस लड़की जिसकी आंखें कुछ देर पहले तक सुनी थी वो और भी ज्यादा लाल हो गई। उसने अपनी हाथों की मुट्ठियां कस ली। उसका गोरा चेहरा सुर्ख लाल होने लगा मानों सारा खून उसमें ही उतर आया हो।

    उस लड़की ने जैसे ही कुछ बोलने के लिए अपना मुंह खोलना चाहा उससे पहले ही उसे उस शख़्स की अट्रैक्टिव मेनली वॉइस सुनाई दी।

    "Dove यहां कैसे आना हुआ?" वो लड़की उस शख़्स की आवाज़ से ही ये साफ़ जान सकती थी की ये सवाल पूछते वक्त उस शख्स के चेहरे पर एक तंजिया मुस्कान होगी।

    उस शख़्स के सवाल को सुनकर उस लड़की के चेहरे पर स्माइल आ गई मानों वो ख़ुद की मजबूरी पर ही हस रही हो। इससे पहले की उसकी आंखें उसका सारा दर्द बयां कर देती वो लड़की बोल पड़ी।

    "मैं आपसे निकाह के लिए तैयार हूं" वो लड़की अपनी अपनी नज़रे नीचे झुकाए हुए बोली। वो लड़की ख़ुद ही जानती थी की ये सब बोलते वक्त उसके दिल में कितना दर्द हुआ होगा। उसके वजूद को कितनी ही चोट पहुंची होगी।

    उस लड़की का जवाब सुनते ही उस शख्स के होठों के कोने ऊपर की ओर मुड़ गए।

    उस लड़के ने अपनी सिगरेट को नीचे फर्श पर फेका और उसे शूज से मसलते हुए अपनी emerald ग्रीन आईज से उस लड़की की ओर देखा।

    जो अपने चेहरे को नीचे किए खड़ी थी। उसकी हाथों की मुट्ठियां कसी हुई थी मानों वो अपने गुस्से को कंट्रोल कर रही हो।

    उस शख़्स को उस लड़की की ऐसी हालत देखकर बहुत सुकुन मिल रहा था।

    "मुझे अच्छे से सुनाई नहीं दिया Dove क्या तुम दोबारा बोलकर अच्छे से एक्सप्लेन कर सकती हो?" उस शख़्स ने उस लड़की की ओर अपने कदम बढ़ाते हुए कहा तो वो लड़की आपनी लाल आंखो से उस शख्स को घूरने लगी।

    परफेक्ट फेशियल फीचर शार्प jawline और हल्की बियर्ड वाला 32 साल का वो शख़्स बेहद हैंडसम था।

    लेकिन उस लड़की के लिए को उसकी ज़िंदगी का सबसे बुरा कभी न खत्म होने वाला नाइटमेयर था।

    वो लड़की उस शख़्स के सामने घुटनों के बल बैठ गईं।  "Mr यारम काज़मी क्या आप मूझसे यानी रूह फारुखी से निकाह करेंगे" इतना बोलते ही उस लड़की यानी रूह की आंखों में रुके ही अश्क मोतियों की तरह उसकी आंखों से बह निकले।

    यारम ने रूह को जमीन से उठाया और उसके आँखो से बहते आंसुओ को पोछते हुई अपनी अट्रैक्टिव वॉइस में बोला "आई टोल्ड यू Dove की एक दिन तुम खुद अपने घुटनों पर बैठकर मूझसे शादी के लिए रिक्वेस्ट करोगी, लुक आई डिड इट" ये सब बोलते हुए यारम के चेहरे पर विनिंग स्माइल थी तो वहीं रूह ने अपने दांत भींच लिए।

    यारम रूह के चेहरे पर झुका और उसके चेहरे पर अपनी गर्म सांसे छोड़ते हुए अपनी डीप वॉइस में कहा "तो रूह अज़ीज़ फारूखी रेडी हो जाओ Mrs रूह यारम काज़मी  बनने के लिए" इतना बोलकर वो रूह से दो कदम दूर हो गया।

    वहीं रूह अपनी आंखों में बेइंतहा नफ़रत लिए उसे ही देख रही थी। जिसने उसकी ज़िंदगी को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

    रूह को यारम के होठों की हसी कांटों की तरह चुभ रही थी। शायद यहीं वो चेहरा था जिससे वो हमेशा डरती थी लेकिन आज उसे इस चेहरे को देख डर नहीं नफ़रत लग रही थी।

    वो सोच रही थी काश वो छः महीने पहले पीछे जाकर सब कुछ ठीक कर सकती ताकी यारम नाम का बीस्ट उसकी ज़िंदगी में कभी ना आता।

    छः महीने पहले

    मुंबई

    एक सफ़ेद रंग का बंगला जिसके बाहर अंसारी मंज़िल लिखा हुआ था। उसके फर्स्ट फ्लोर पर बने एक कमरे जो ना तो ज़्यादा बड़ा था और ना ही ज़्यादा छोटा उस कमरे का इंटीरियर बेबी पिंक और व्हाईट कलर के कॉम्बिनेशन का था।

    उस कमरे के बीचों बीच एक राउंड शेप बेड था जिस पर एक सत्रह साल की लड़की औंधे मुंह लेटी हुई थी।

    उस लड़की ने शॉर्ट्स और एक लूज टी शर्ट पहनी हुई थी। जिससे उसके गोरे पैर साफ़ नज़र आ रहे थे। उसका रंग इतना ज़्यादा साफ़ था की छूने बस से उसकी स्किन रेड हो जाती थी।

    उस लड़की के काले सियाह सिल्की बाल उसके पुरे पीठ से होते हुए उसके चेहरे को ढके हुए थे जिस वजह से उस लड़की के सिर्फ़ हार्ट शेप गुलाब की पंखुड़ी जैसे होठ ही नज़र आ रहे थे। उस लड़की का ब्लैंकेट भी फर्श पे गिरा हुआ था।

    तभी एक लड़की बिना शोर किए उस लड़की के कमरे में एंटर होती है और दबे पैर उस लड़की के बेड के पास आ जाती है। उस लड़की को ऐसे उटपटांग ढंग से सोते देख उस लड़की के फेस पर स्माइल आ जाती है।

    अचानक उस लड़की के दिमाग़ में कोई खुराफात चलती है और उस लड़की के चेहरे पर शरारती स्माइल आ जाती है। वो लड़की साईड में नाइट स्टैंड पर रखे पानी के जग को उठाती है और उस सोई हुई लड़की के ऊपर डाल देती है।

    तो Reader's कैसा लगा ये चैप्टर आप सब कमेंट में ज़रूर बताना एंड प्लीज़ आप इस चैप्टर को लाईक करना और इस नॉवेल को शेयर करना मत भूलना।

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  • 2. Junooniyat - Chapter 2

    Words: 1132

    Estimated Reading Time: 7 min

    अब आगे 
     
    "आआआआ ज़लज़ला आ गया बचाओ" वो सोई हुई लड़की चीखते हुए उठकर बैठ गईं और अपने आस पास देखने लगी।

    तभी उसकी नज़र उसके सामने खड़ी उसी की हमउम्र लड़की पर पड़ी जो अपना मुंह दबाए हंस रही थी।

    उसे हस्ते देखकर उस लड़की का चेहरा गुस्से से लाल हों गया और उसने पिलो उठाकर उस लड़की को मार दिया "मलीहा की बच्ची मैं तूझे छोडूंगी नहीं। तेरी हिम्मत कैसे हुईं रूह फारुखी की नींद में खलल डालने की" इतना बोल वो लड़की यानि रूह मलीहा के पीछे भागने लगी।

    वहीं मलीहा हस्ते हुए आगे आगे भागते रही।

    मलीहा जिस चीज़ को भी फेंककर मलीहा को मारती मलीहा उसे कैच कर लेती।

    वो दोनों इसी तरह दौड़ते भागते नीचे हॉल में आ गए जहां मलीहा के अब्बू जमाल अंसारी न्यूज पेपर पढ़ते हुए चाय पी रहे थे।

    जब जमाल साहब ने उन दोनों को ऐसे एक दूसरे के पीछे भागते देखा तो वो मुस्कुरा दिए क्यूंकि उनके लिए ये कोई नई बात नहीं थी।

    "फूफा जान देखिए मलीहा को इसने मेरा क्या हाल कर दिया है" भागते भागते थकने के बाद रूह जमाल साहब से बोली तो मलीहा भी तुनक कर बोली "अब्बू आप इस रूह की बातों में मत आइए मैं कब से इसके डोर को नॉक कर रही थी। डोर नॉक करते करते मेरे हाथों में भी दर्द होने लगा लेकिन मजाल है इस मल्लिका को कोई फ़र्क पड़ा हो" मलीहा ने मुंह बनाते हुए कहा तो जमाल साहब ने उन दोनों के ही कान पकड़ लिए।

    "अह्ह्ह्ह फूफा जान अह्ह्ह्ह्ह अब्बू" वो दोनो एक साथ बोल पड़ी।

    "क्या फूफा हां? और क्या अब्बू? तुम दोनों का ये रोज़ का है अब तो तुम दोनों कॉलेज भी जानें वाली हो। अब तो बड़ी हो जाओ" जमाल साहब ने उन दोनों को प्यार से डांटते हुए कहा तो उन दोनों ने अपनी बत्तीसी चमका दी।

    तभी मलीहा के दिमाग़ में कुछ हिट किया और वो एकाएक सोफे से चीखती हुई उठ गई "या अल्लाह मैं भुल कैसे गई आज तो हमारा 12th का रिज़ल्ट आने को है" मलीहा की बात सुन रूह भी अपनी जगह से ऐसे उठ गई मानो किसी ने उसे करेंट लगा दिया हो।

    "अरे हां चल चेक करते है" रूह ने इतना कहा और अपने बेडरुम में अपना लैपटॉप लेने चली गई।

    थोड़ी देर बाद हॉल में रूह के लैपटॉप में टाइपिंग करने की आवाज़ आ रही थी जो सीरियस एक्सप्रेशन के साथ लैपटॉप पर ही नज़रे गढ़ाए हुए थी।

    उसके एक तरफ़ मलीहा तो उसके दुसरे तरफ़ जमाल साहब बैठे हुए थे।

    "मुबारक हो बहना तूने तो अपने स्कूल में टॉप किया है।" रूह ने मलीहा को गले लगाते हुए कहा तो मलीहा भी खुशी से चहक उठी।

    तभी रूह ने अपना रिजल्ट चेक किया तो वो अपनी जगह से उठकर कूदने लगी। "Yeappppp" रूह ने चहकते हुए कहा 

    "तूझे भी मुबारक हो मेरी बहना तू क्लास में सेकेंड आई है" मलीहा ने रूह को गले लगाते हुए कहा 

    जमाल साहब ने उन दोनों बच्चियों का प्यार से माथा चूमा और उनके लिए ढेर सारी दुवाए की। उन्होंने उन दोनों को ही शाम को गिफ्ट देने का वादा किया और अपने ऑफिस के लिए निकल गए।

    जमाल साहब मुम्बई इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में सीनियर ऑफिसर थे जिस वजह से उस शहर में उनकी काफ़ी इज़्जत की जाती थी।

    उनकी बीवी अफसाना अंसारी इस वक्त अपने मायके गई हुई थी। उनकी सिर्फ़ दो औलाद थी। एक बेटा फारस अंसारी जो एक आईपीएस ऑफिसर था और दूसरी बेटी मलीहा जिसने इस साल सवालेहा के साथ 12th बोर्ड का एग्जाम दिलाया था।

    आफरीन गोरे रंग, घुंघराले बाल और तीखे नैन नक्श की खुबसूरत लड़की थी जिसकी उम्र 18 साल थी। तो वहीं फारस अंसारी 6'1 की हाईट वाला हैंडसम लड़का था। जो अभी नासिक में पोस्टेड था। वो बहुत कम ही मुंबई आया करता था। 

    रूह मलीहा के मामू की लड़की थी, जो भोपाल में रहा करते थे। वो पिछ्ले दस सालों से अपनी फूफी अफसाना अंसारी के घर ही रहा करती थी।

    शाम का वक्त 

    रूह के बेडरुम में रूह और मलीहा नेटफ्लिक्स पर After सीरीज देख रहें थे के तभी रूह का मोबाइल रिंग हुआ।

    रूह जिसका पूरा ध्यान टीवी पर चल रहे सीन में था उसने मोबाइल की स्क्रीन की ओर देखा तो उस पर अम्मी नाम फ्लैश हो रहा था। 

    रूह ने बिना देरी किए कॉल उठाया तो दूसरी ओर से उसे एक मीठी आवाज सुनाई दी। "कामयाबी मुबारक हो बच्चा"

    ये आवाज़ रूह के लिए बेशकीमती थी आख़िर उसकी अम्मी की जो आवाज़ थी। "शुक्रिया अम्मी" रूह ने मुस्कुराते हुए कहा 

    "अब्बू कहा है?" रूह न क्यूरियस होते हुए पूछा 

    "तुम तो जानती हो न सियासतदारों की सियासतदारी हमारे पल्ले नहीं पड़ती। इस साल इलेक्शंस है बस इसी सिलसिले में पार्टी के हेड ऑफिस गए हुए है। बहुत ज़्यादा बिजी है इसलिए उन्होंने मुझे बोला है की तुम्हें उनकी ओर से भी मुबारकबाद दे दू" रूह की अम्मी सामिया फारूखी में कहा

    रूह के होठों पर फीकी सी मुस्कान आ गई। वो जानती थी की उसकी अम्मी उसका दिल रखने के लिए झूट बोल रही थी।

    "अब्बू को मेरी ओर से शुक्रिया बोल दीजिएगा" रूह की बात सुनकर उसकी अम्मी तुरन्त बोल पड़ी "शुक्रिया तुम उन्हें आकर बोलना"

    "वो क्यू?" रूह ने हैरानी से पूछा

    "अगले sunday तुम्हारे अब्बू की 50 वीं सालगिरह के मौक़े पर एक शानदार पार्टी रखी गई है जिसमें उनके पार्टी की ओर से उन्हें टिकिट के लिए नॉमिनेशन अनाउंस किया जाएगा" सामिया बी ने खुश होते हुए बताया तो रूह भी ख़ुश हो गई। 

    लेकिन फिर कुछ सोचकर उसके चेहरे की मुस्कुराहट एकाएक बुझ गई। 

    "अम्मी क्या उस पार्टी में सब आयेंगे? आई मीन सब?" रूह ने हिचकिचाते हुए पूछा 

    सामिया बी अपनी बेटी की परेशानी साफ़ समझ सकती थी। उन्होंने एक ठंडी आह भरी और प्यार से समझाते हुए बोली "बेटा पुरानी बातों को भुल जाओ। कब तक उन जख्मों को दिल पर लेकर रखोगी और तुम दूसरो की वजह से अपने घर आने से क्यू कतराओगी। वैसे भी शायद वो आउट ऑफ़ कंट्री है" सामिया बी की बात सुनकर रूह के चेहरे पर सुकुन की लकीरें छा गई।

    "ठीक है अम्मी हम अगले हफ़्ते भोपाल ज़रूर आएंगे" रूह ने कहा और अल्लाह हाफिज बोल कॉल कट कर दिया।

    वहीं मलीहा जो कब से रूह की बाते सुन रही थी वो उसके कॉल काटते ही उससे पूछ बैठी "तू सच में जाएगी?" 

    "हम्म हमें दिल्ली जाना ही होगा।" रूह ने बेमन से कहा

    मानों उसे अपने इन अल्फाजों को बोलते वक्त बिलकुल भी अच्छा ना लगा हो।

    उसकी बात सुनकर मलीहा दोबारा टीवी देखने लगीं तो वहीं रूह किसी गहरी सोच में गुम हो गई।

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  • 3. Junooniyat - Chapter 3

    Words: 1367

    Estimated Reading Time: 9 min

    अब आगे 
     
     
    "भाईजान" मलीहा ने चहकते हुए कहा और फ़ारस के गले लग गई।

    "कैसी है तू" फारस में उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा 

    "अल्हमदुलिल्लाह अच्छी हूं" मलीहा ने ज़वाब दिया।

    वहीं रूह तो चेहरे पर प्यारी सी स्माइल लिए अहान को ही देख रही थी।

    फारस ने एक नज़र रूह को देखा जो उसे इग्नोर करने का दिखावा कर रही थी।

    मलीहा ने भी अपने भाई और रूह की आंखों की गुस्ताखियां को अच्छे से देख लिया था , जिसे देख उसके दिमाग़ में शरारत सूझी "भाईजान मैं आप दोनों लव बर्डस के बिच कबाब में हड्डी बनना बिलकुल पसन्द नहीं करूंगी। आप दोनों चाहो तो मैं कैब से आ जाती हू" मलीहा ने उन दोनों को टीज करते हुए कहा और वहां से जानें की एक्टिंग करने लगी।

    "कोई ज़रूरत नहीं है तूझे कहीं अकेले जाने की। मैं भी तेरे साथ चल रही हू। और तू अपने भाईजान को बोल दे जैसे उन्होंने इतने दिनों से मेरे कॉल्स को इग्नोर किया है वैसे ही अब हमें भी कर दे"  रूह ने मुंह बनाते हुए कहा और मलीहा का हाथ पकड़ वहा से जानें लगीं।
    तभी फारस से रूह का हाथ पकड़ लिया। 

    "छोड़िए मेरा हाथ और जाकर किसी क्रिमिनल का हाथ पकड़िए क्यूंकि आपको मेरी नहीं उनकी ज़रूरत है" रूह ने हाथ छुड़ाते हुए कहा तो फारस की ग्रिप उसकी कलाई पर और भी ज़्यादा टाईट हो गई।

    "हाथ छोड़ने के लिए नहीं पकड़ा है माय फ्यूचर बेगम साहिबा" फारस की बात सुनकर रूह के चेहरे पर प्यारी सी स्माइल आ गई। उसके गाल लाल हों गए।


    "अभी बेगम बनी नहीं हू और क्या पता अब्बा माने या नह" अभी रूह ने इतना ही कहा था की फारस ने उसे अपनें थोड़े करीब कर लिया और उसकी काली आंखों में अपनी बेशुमार प्यार भरी आंखों से देखते हुए बोला "जब तक मेरा रब न चाहें तुम्हें मूझसे कोई जुदा नहीं कर सकता स्वालेहा और मुझे यकीन है मामूजान मान जायेंगे।

    नेक्स्ट मंथ जब तुम 18 साल की हो जाओगी तो मैं अम्मी अब्बू से बोलकर हमारे रिश्ते की बात मामू के सामने रखूंगा और मुझे यकीन है एक आला दर्जे के आईपीएस ऑफिसर को तुम्हारे अब्बू कभी मना नहीं करेंगे।"

    रूह उसकी बातों को सुनकर मुस्कुरा दी और उसके सिर पर प्यार से चपत लगाते हुए बोली "मैं भी देखती हू आप कैसे फूफीजान और फुफाजान से हमारे रिश्ते की बात करतें है" रूह ने फारस को चिढ़ाते हुए कहा और जाकर फारस के कार का डोर खोलकर पसेंजर सीट पर बैठ गई।

    मलीहा भी जाकर कार की बैकसीट पर बैठ गई। फारस ने उन दोनों को देखकर अपने कंधे उचका दिए और वो जाकर ड्राइविंग सीट पर बैठ गया।

    पांच दिन बाद

    "यार तेरी अभी तक पैकिंग ही नहीं हुई" मलीहा ने रूह के कमरे में आते हुए कहा जो अभी अपना बैग पैक करने में लगीं थी।

    "बस हो ही गया" रूह ने अपनें लगेज का चैन लगाते हुए कहा

    "चल मैं तूझे ड्रॉप कर देती हूं" मलीहा ने कार की key उठाते हुए कहा 

    "तू टाईम से आ तो जाएगी न" रूह ने मलीहा को शक भरी नज़रों से घूरते हुए कहा तो उसने अपने दांत दिखा दिए।

    "जा नहीं आती"

    "ठीक है तो मैं भी वापस नहीं आऊंगी, तू रहना अकेले और अपने प्यारे भाईजान के लिए भी कोई न्यू भाभी ढूंढ लेना" रूह ने मुंह बनाते हुए कहा तो मलीहा की हसी छूट गई।

    "तू फिकर मत कर मैं मामू की सालगिरह के दिन ही आ जाउंगी" मलीहा ने रूह को साइड हग करते हुए कहा तो रूह भी मुस्कुरा दी।

    कुछ ही देर में रूह फ्लाइट से भोपाल आ गई। रूह भोपाल एयरपोर्ट के बाहर अपने कैब का इंतज़ार करने लगी।

    क्यूंकि उसने अपने घर में किसी को भी अपने आने की ख़बर नहीं दी थी। वो अपने अम्मी अब्बू को सरप्राईज देना चाहतीं थी।

    कुछ ही देर में रूह की कैब आ गई और वो उसमें बैठकर अपने घर की ओर निकल गई।

    रूह अपने मोबाइल में अपनी और फारस की तस्वीर देख रही थी। फारस दो दिन पहले ही वापस पुणे गया था। इन तीन दिनों में वो, मलीहा और फारस तीनों ने खूब इंजॉय किया था। एम्यूजमेंट पार्क से लेकर जंगल में ट्रेक्टिंग उन्होंने सब ट्राई किया था।

    वो और फारस एक दूसरे को बचपन से दिलों दिल में पसन्द करते थे पर उन्होंने कभी अपने दिल की बात अपने जुबान तक नहीं लाई।

    लेकिन दो साल पहले जब फारस ने सिविल सर्विसेज की एग्जाम पास की तब उसने सबसे पहले रूह को प्रपोज किया।

    फारस ने सिर्फ रूह के लिए एग्जाम पास किया था क्युकी रूह बचपन से बोलती थी की वो किसी आईपीएस से शादी करेंगी।

    एक लड़की जैसा अपना हमसफर चाहेगी फारस बिलकुल वैसा ही था। उसका फारस जो सिर्फ़ उसका था। रूह यहीं सब सोच मुस्कुरा कर फारस के फ़ोटो पर अपने हाथ फिरा रही थी। 

    रूह ने खिड़की के बाहर देखा तो वो भोपाल शहर की हाई ट्रैफिक सड़कों को देखने लगी। पूरे चार साल बाद वो भोपाल आ रही थी। 

    उसकी कैब भोपाल के वीवीआईपी एरिया जो की पॉश इलाका था वहा एंटर हुई। तभी रूह की नज़र रोड के बीचोबीच फसे हुई एक बिल्ली के छोटे से बच्चे की ओर गई। जिसे देख उसकी आंखें चमक उठी।

    लेकिन जब रूह ने दोनों तरफ से आती हुई गाड़ियों के बिच उस फसे हुए बिल्ली के बच्चे को देखा तो उसकी आंखें डर से बड़ी हों गई।

    "भैया एक मिनट गाड़ी रोकिए" रूह ने हड़बड़ाते हुए कहा 

    "लेकिन मैडम आपको ज़्यादा चार्ज लग जायेगा" 

    "आप ज्यादा की टेंशन मत लीजिए I'll pay you double बस आप कार रोकिए" रूह ने ड्राइवर को ज़वाब दिया।

    रूह की ऐसी घबराई हुई आवाज़ सुनकर ड्राइवर ने कार रोक दी।

    रूह कार से उतरकर उस बिल्ली के छोटे से बच्चे को बचाने के लिए चली गई।

    गाड़ियों से बचते बचाते रूह उस बिल्ली के छोटे से बच्चे के पास पहुंच गई। रूह ने जैसे ही उस बिल्ली के छोटे से बच्चे को अपनी गोद में उठाया उसने उसके दुपट्टे को पकड़ लिया। उसके ऐसा करते ही रूह मुस्कुरा दी।

    रूह अभी जा ही रही थी के तभी अचानक उसके सामने एक कार आकर रूकी। रूह ने डर से उस बिल्ली के छोटे से बच्चे को अपने सीने में छुपा लिया और कस कर अपनी आंखे बन्द कर ली। कैब ड्राईवर भी ये सीन देखकर डर गया।

    वहीं कार के अंदर बैठा शख्स ने जब ड्राइवर को ऐसे अचानक से कार रोकते देखा तो उसने अपनी सर्द नज़रों से ड्राईवर की ओर देखा जो खुद सामने की ओर देख रहा था। जब उस शख़्स ने सामने की ओर देखा तो उसकी आंखें गहरी हो गई। 

    उसके कार के सामने एक लड़की जिसने व्हाईट अनारकली सूट पहना हुआ था। उसका चेहरा बालों से पूरी तरह ढका हुआ था।

    तभी अचानक उस लड़की ने अपनें चेहरे से अपनी जुल्फों को हटाया तो ऐसा लगा मानों बदलो में छुपा चांद बाहर निकल आया हो।

    गोरा दमकता रंग, लंबी घनी पलके काली गहरी आँखें, हार्ट शेप नेचुरल गुलाबी होठ जिन पर हल्की सी पिंक लिपस्टिक लगी हुई थी, कानों पहनी चांद बालियां, खुले काले बाल  हाथों में पहनी सिल्वर चूड़ियां और छोटी सी नाक जिस पर उस लड़की ने नोज रिंग पहनी हुई थी। वो लड़की दिखने में बेहद खुबसूरत थी जिसे एक बार कोई देख ले तो उसपर से अपनी नज़रे न हटा पाए।

    ये लड़की और कोई नहीं रूह ही थी जिसे देख अंदर बैठा शख़्स जिसकी आंखे कुछ देर पहले गुस्से से लाल थी अब उसकी आंखें बिलकुल पानी की तरह शांत हो गई।

    रूह उस बिल्ली के बच्चे को अपनी गोद में अच्छे से एडजेस्ट कर उस कार की ओर देखकर अपना एक कान पकड़ कर सॉरी बोल दी। रूह ने इतना क्यूट सा चेहरा बनाया की अंदर बैठे शख़्स उस पर से अपनी नज़रे ही नहीं हटा पाया।

    रूह जानती थी की गलती उसकी थी वही अचानक गाड़ी के सामने आ गई थी वो तो वक्त रहते उस ड्राईवर ने ब्रेक लगा दिया वरना आज तो उसका एक्सीडेंट ही हो जाना था।

    रूह उस बिल्ली के बच्चे से प्यार से बात करती हुई अपने कैब की ओर चली गई। वहीं कार में बैठा शख़्स तो रूह के होठों पर जमी प्यारी सी स्माइल को देखता ही रह गया।


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  • 4. Junooniyat - Chapter 4

    Words: 1367

    Estimated Reading Time: 9 min

    अब आगे 
     
     
    "भाईजान" मलीहा ने चहकते हुए कहा और फ़ारस के गले लग गई।

    "कैसी है तू" फारस में उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा 

    "अल्हमदुलिल्लाह अच्छी हूं" मलीहा ने ज़वाब दिया।

    वहीं रूह तो चेहरे पर प्यारी सी स्माइल लिए अहान को ही देख रही थी।

    फारस ने एक नज़र रूह को देखा जो उसे इग्नोर करने का दिखावा कर रही थी।

    मलीहा ने भी अपने भाई और रूह की आंखों की गुस्ताखियां को अच्छे से देख लिया था , जिसे देख उसके दिमाग़ में शरारत सूझी "भाईजान मैं आप दोनों लव बर्डस के बिच कबाब में हड्डी बनना बिलकुल पसन्द नहीं करूंगी। आप दोनों चाहो तो मैं कैब से आ जाती हू" मलीहा ने उन दोनों को टीज करते हुए कहा और वहां से जानें की एक्टिंग करने लगी।

    "कोई ज़रूरत नहीं है तूझे कहीं अकेले जाने की। मैं भी तेरे साथ चल रही हू। और तू अपने भाईजान को बोल दे जैसे उन्होंने इतने दिनों से मेरे कॉल्स को इग्नोर किया है वैसे ही अब हमें भी कर दे"  रूह ने मुंह बनाते हुए कहा और मलीहा का हाथ पकड़ वहा से जानें लगीं।
    तभी फारस से रूह का हाथ पकड़ लिया। 

    "छोड़िए मेरा हाथ और जाकर किसी क्रिमिनल का हाथ पकड़िए क्यूंकि आपको मेरी नहीं उनकी ज़रूरत है" रूह ने हाथ छुड़ाते हुए कहा तो फारस की ग्रिप उसकी कलाई पर और भी ज़्यादा टाईट हो गई।

    "हाथ छोड़ने के लिए नहीं पकड़ा है माय फ्यूचर बेगम साहिबा" फारस की बात सुनकर रूह के चेहरे पर प्यारी सी स्माइल आ गई। उसके गाल लाल हों गए।


    "अभी बेगम बनी नहीं हू और क्या पता अब्बा माने या नह" अभी रूह ने इतना ही कहा था की फारस ने उसे अपनें थोड़े करीब कर लिया और उसकी काली आंखों में अपनी बेशुमार प्यार भरी आंखों से देखते हुए बोला "जब तक मेरा रब न चाहें तुम्हें मूझसे कोई जुदा नहीं कर सकता स्वालेहा और मुझे यकीन है मामूजान मान जायेंगे।

    नेक्स्ट मंथ जब तुम 18 साल की हो जाओगी तो मैं अम्मी अब्बू से बोलकर हमारे रिश्ते की बात मामू के सामने रखूंगा और मुझे यकीन है एक आला दर्जे के आईपीएस ऑफिसर को तुम्हारे अब्बू कभी मना नहीं करेंगे।"

    रूह उसकी बातों को सुनकर मुस्कुरा दी और उसके सिर पर प्यार से चपत लगाते हुए बोली "मैं भी देखती हू आप कैसे फूफीजान और फुफाजान से हमारे रिश्ते की बात करतें है" रूह ने फारस को चिढ़ाते हुए कहा और जाकर फारस के कार का डोर खोलकर पसेंजर सीट पर बैठ गई।

    मलीहा भी जाकर कार की बैकसीट पर बैठ गई। फारस ने उन दोनों को देखकर अपने कंधे उचका दिए और वो जाकर ड्राइविंग सीट पर बैठ गया।

    पांच दिन बाद

    "यार तेरी अभी तक पैकिंग ही नहीं हुई" मलीहा ने रूह के कमरे में आते हुए कहा जो अभी अपना बैग पैक करने में लगीं थी।

    "बस हो ही गया" रूह ने अपनें लगेज का चैन लगाते हुए कहा

    "चल मैं तूझे ड्रॉप कर देती हूं" मलीहा ने कार की key उठाते हुए कहा 

    "तू टाईम से आ तो जाएगी न" रूह ने मलीहा को शक भरी नज़रों से घूरते हुए कहा तो उसने अपने दांत दिखा दिए।

    "जा नहीं आती"

    "ठीक है तो मैं भी वापस नहीं आऊंगी, तू रहना अकेले और अपने प्यारे भाईजान के लिए भी कोई न्यू भाभी ढूंढ लेना" रूह ने मुंह बनाते हुए कहा तो मलीहा की हसी छूट गई।

    "तू फिकर मत कर मैं मामू की सालगिरह के दिन ही आ जाउंगी" मलीहा ने रूह को साइड हग करते हुए कहा तो रूह भी मुस्कुरा दी।

    कुछ ही देर में रूह फ्लाइट से भोपाल आ गई। रूह भोपाल एयरपोर्ट के बाहर अपने कैब का इंतज़ार करने लगी।

    क्यूंकि उसने अपने घर में किसी को भी अपने आने की ख़बर नहीं दी थी। वो अपने अम्मी अब्बू को सरप्राईज देना चाहतीं थी।

    कुछ ही देर में रूह की कैब आ गई और वो उसमें बैठकर अपने घर की ओर निकल गई।

    रूह अपने मोबाइल में अपनी और फारस की तस्वीर देख रही थी। फारस दो दिन पहले ही वापस पुणे गया था। इन तीन दिनों में वो, मलीहा और फारस तीनों ने खूब इंजॉय किया था। एम्यूजमेंट पार्क से लेकर जंगल में ट्रेक्टिंग उन्होंने सब ट्राई किया था।

    वो और फारस एक दूसरे को बचपन से दिलों दिल में पसन्द करते थे पर उन्होंने कभी अपने दिल की बात अपने जुबान तक नहीं लाई।

    लेकिन दो साल पहले जब फारस ने सिविल सर्विसेज की एग्जाम पास की तब उसने सबसे पहले रूह को प्रपोज किया।

    फारस ने सिर्फ रूह के लिए एग्जाम पास किया था क्युकी रूह बचपन से बोलती थी की वो किसी आईपीएस से शादी करेंगी।

    एक लड़की जैसा अपना हमसफर चाहेगी फारस बिलकुल वैसा ही था। उसका फारस जो सिर्फ़ उसका था। रूह यहीं सब सोच मुस्कुरा कर फारस के फ़ोटो पर अपने हाथ फिरा रही थी। 

    रूह ने खिड़की के बाहर देखा तो वो भोपाल शहर की हाई ट्रैफिक सड़कों को देखने लगी। पूरे चार साल बाद वो भोपाल आ रही थी। 

    उसकी कैब भोपाल के वीवीआईपी एरिया जो की पॉश इलाका था वहा एंटर हुई। तभी रूह की नज़र रोड के बीचोबीच फसे हुई एक बिल्ली के छोटे से बच्चे की ओर गई। जिसे देख उसकी आंखें चमक उठी।

    लेकिन जब रूह ने दोनों तरफ से आती हुई गाड़ियों के बिच उस फसे हुए बिल्ली के बच्चे को देखा तो उसकी आंखें डर से बड़ी हों गई।

    "भैया एक मिनट गाड़ी रोकिए" रूह ने हड़बड़ाते हुए कहा 

    "लेकिन मैडम आपको ज़्यादा चार्ज लग जायेगा" 

    "आप ज्यादा की टेंशन मत लीजिए I'll pay you double बस आप कार रोकिए" रूह ने ड्राइवर को ज़वाब दिया।

    रूह की ऐसी घबराई हुई आवाज़ सुनकर ड्राइवर ने कार रोक दी।

    रूह कार से उतरकर उस बिल्ली के छोटे से बच्चे को बचाने के लिए चली गई।

    गाड़ियों से बचते बचाते रूह उस बिल्ली के छोटे से बच्चे के पास पहुंच गई। रूह ने जैसे ही उस बिल्ली के छोटे से बच्चे को अपनी गोद में उठाया उसने उसके दुपट्टे को पकड़ लिया। उसके ऐसा करते ही रूह मुस्कुरा दी।

    रूह अभी जा ही रही थी के तभी अचानक उसके सामने एक कार आकर रूकी। रूह ने डर से उस बिल्ली के छोटे से बच्चे को अपने सीने में छुपा लिया और कस कर अपनी आंखे बन्द कर ली। कैब ड्राईवर भी ये सीन देखकर डर गया।

    वहीं कार के अंदर बैठा शख्स ने जब ड्राइवर को ऐसे अचानक से कार रोकते देखा तो उसने अपनी सर्द नज़रों से ड्राईवर की ओर देखा जो खुद सामने की ओर देख रहा था। जब उस शख़्स ने सामने की ओर देखा तो उसकी आंखें गहरी हो गई। 

    उसके कार के सामने एक लड़की जिसने व्हाईट अनारकली सूट पहना हुआ था। उसका चेहरा बालों से पूरी तरह ढका हुआ था।

    तभी अचानक उस लड़की ने अपनें चेहरे से अपनी जुल्फों को हटाया तो ऐसा लगा मानों बदलो में छुपा चांद बाहर निकल आया हो।

    गोरा दमकता रंग, लंबी घनी पलके काली गहरी आँखें, हार्ट शेप नेचुरल गुलाबी होठ जिन पर हल्की सी पिंक लिपस्टिक लगी हुई थी, कानों पहनी चांद बालियां, खुले काले बाल  हाथों में पहनी सिल्वर चूड़ियां और छोटी सी नाक जिस पर उस लड़की ने नोज रिंग पहनी हुई थी। वो लड़की दिखने में बेहद खुबसूरत थी जिसे एक बार कोई देख ले तो उसपर से अपनी नज़रे न हटा पाए।

    ये लड़की और कोई नहीं रूह ही थी जिसे देख अंदर बैठा शख़्स जिसकी आंखे कुछ देर पहले गुस्से से लाल थी अब उसकी आंखें बिलकुल पानी की तरह शांत हो गई।

    रूह उस बिल्ली के बच्चे को अपनी गोद में अच्छे से एडजेस्ट कर उस कार की ओर देखकर अपना एक कान पकड़ कर सॉरी बोल दी। रूह ने इतना क्यूट सा चेहरा बनाया की अंदर बैठे शख़्स उस पर से अपनी नज़रे ही नहीं हटा पाया।

    रूह जानती थी की गलती उसकी थी वही अचानक गाड़ी के सामने आ गई थी वो तो वक्त रहते उस ड्राईवर ने ब्रेक लगा दिया वरना आज तो उसका एक्सीडेंट ही हो जाना था।

    रूह उस बिल्ली के बच्चे से प्यार से बात करती हुई अपने कैब की ओर चली गई। वहीं कार में बैठा शख़्स तो रूह के होठों पर जमी प्यारी सी स्माइल को देखता ही रह गया।


     
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  • 5. Junooniyat - Chapter 5

    Words: 1813

    Estimated Reading Time: 11 min

    अब आगे 
     
     
    "सॉरी सर वो एक लड़की आ गई थी" ड्राइवर ने डरते हुए कहा तो पीछे बैठ शख्स ने बस "हम्म" कहा

    वही ड्राइवर अपने बॉस के इतने ठंडे ज़वाब से एकदम हैरान रह गया। क्या ये उसका वही गुस्सैल बॉस नहीं था जो अभी उसकी इस छोटी सी गलती पे उसे सूली पे चढ़ा देता? ड्राइवर ने यही सब सोच राहत की सांस ली और कार आगे बढ़ा दी।

    वहीं पीछे बैठा शख्स जो अभी अपनें आई पैड में कुछ काम कर रहा था उसके हाथ अचानक रुक गए और उसकी आंखों के सामने दोबारा रूह का हसीन चेहरा आ गया।

    उस शख़्स ने अपने ख्यालों को झटका और दोबारा अपनें आई पैड में काम करने लगा।

    वहीं रूह की कैब एक शानदार बड़ी सी हवेली के सामने आ कर रूकी। जो काजमी पैलेस के जस्ट बगल में ही थी।

    उस हवेली के बाहर फारूखी हवेली लिखा हुआ था। रूह ने कैब ड्राइवर को पैसे दिए और कैब से उतरकर उस हवेली को देखने लगी।

    सफ़ेद रंग की वो हवेली दिखने में बेहद खुबसूरत थी। बड़ा सा लॉन, फाउंटेन, छोटा सा लेक जिसमें लोटस के बहुत से फूल खिले हुए थे। 

    रूह ने हवेली के नेम प्लेट पर अपने हाथ फिराए।

    उसने अपने बचपन के आठ साल यही बिताए थे फिर उसके बाद वो जब से मुम्बई गई थीं तो पीछले दस साल में वो सिर्फ़ दो बार ही भोपाल आई थी और वो भी चार साल पहले जब वो सिर्फ़ 13 साल की थी।

    दरवाज़े पे खड़े वॉचमैन ने जब वहा खड़ी रूह को देखा तो उसने उससे सवाल किया "मैडम आपको किससे मिलना है"

    वॉचमैन की बात सुनकर रूह ने उस ओर देखा जहा "खान चच्चा की जगह की जगह कोई कम उम्र लड़का खड़ा था जो उससे कुछ बड़ा ही था।

    "आप कौन हो? और खान चच्चा कहा है?" रूह ने उल्टा उसी वॉचमैन से सवाल किया।

    "मैं उन्हीं का बेटा शाहिद हू वो अब्बा की तबीयत ख़राब चल रही है तो मैंने ही नौकरी ज्वॉइन कर ली" उस वॉचमैन यानी शाहिद ने कहा 

    "अरे शाहिद ये तुम हो। तुमने हमें पहचाना मैं रूह" रूह ने मुस्कुराते हुए कहा तो शाहिद हैरानी से उसे देखने लगा।

    "रूह ये तुम हो तुम तो कितना बदल गई हो पहले तो बिलकुल फूले हुए गुब्बारे की तरह गोलू मोलू थी और अब कैसे हीरोइनों की तरह स्लिम ट्रिम हो गई हो" शाहिद ने रूह को टीज करते हुए कहा तो रूह उसे आँखें छोटी कर घूरने लगी।

    "तुम न ज़्यादा फालतू बकवास मत करों मैं उतनी भी मोटी नहीं थी हुऊऊ" रूह ने मुंह बनाते हुए कहा और अपना लगेज लेकर अंदर चली गई जिसे जल्द ही एक मुलाजिम ने थाम लिया।

    शाहिद उसकी इस हरकत पर बस हंसकर ही रह गया।
    रूह ने अपना बैग एक मुलाजिम को देकर उसे अपने कमरे में रखने को कहा और दबे पाव किचन में चली गईं जहा उसकी अम्मी सामिया बी खाना बना रही थी।

    ऐसा नहीं था की फारुखी हवेली में कोई कुक नहीं थे लेकिन सामिया बी अपने परिवार के लिए खाना हमेशा अपने हाथों से ही बनाती थी और इस काम में घर के मुलाजिम (सर्वेंट्स) उनकी हेल्प करते थे।

    रूह ने पीछे से जाकर अपनी अम्मी के आंखों को बन्द किया तो एक पल के लिए सामिया बी घबरा गई लेकिन कोई मां भला अपने औलाद के टच को कैसे नहीं पहचान सकती थी।

    "रूह ये आप है न" सामिया बी ने अपनें आंखों को ढकी हथेलियों को छू कर कहा तो रूह का मुंह बन गया।

    "अम्मी आप कैसे पहचान लेती है मैं तो मलीहा के ऐसा करने पर भी उसे नहीं पहचान पाती" रूह ने सामिया बी के गले लगते हुए कहा तो सामिया बी ने उसे कस कर अपनी बाहों में भर लिया।

    "बेटा जब तुम्हें खुद से ज़्यादा किसी शख्स से मोहब्ब्त हो जाएगी तो तुम उसे उसकी आहट से भी पहचान लोगी बिलकुल हमारी तरह" सामिया बी ने रूह के बालों में हाथ फेरते हुए कहा 

    "क्या अम्मी ऐसा थोड़ी ही होता है भला आहत से कैसे पहचान होगी की वो कौन है" रूह की बात सुन सामिया बी हंसने लगी।

    "मेरी बच्ची जब तू बड़ी हो जाएगी तब तूझे खुद सब समझ आ जाएगा" सामिया बी ने उसके सिर पर प्यार से चपत लगाते हुए कहा

    "अम्मी अब्बू कहा है" रूह ने चारों ओर नज़रे दौड़ाते हुए कहा 

    "वो कल सुबह आयेंगे इंदौर गए हुए है हमारी कपड़े की मील में कुछ अर्जेंट काम आ गया था तो आज सुबह ही जाना पड़ा"

    अपनी अम्मी की बात सुनकर रूह का चेहरा ही उतर गया जिसे सामिया बी ने अच्छी तरह से नोटिस कर लिया था।

    "बेटा तुम जाकर फ्रेश होकर आओ मैं तुम्हारे लिए खाना निकाल देती हू" सामिया बी ने बात बदलते हुए कहा

    "नहीं अम्मी हम फ्लाइट में लंच करके आए है। हमें बस सोना है आप प्लीज़ हमे तब तक मत उठाएगा जब तक हम न उठे" रूह ने अपनी नींद से भारी होती पलकों को जबरदस्ती खोलते हुए कहा और ऊपर अपने कमरे में चली गई।

    शाम के क़रीब सात बजे जब रूह की नींद खुली तो वो उठकर नीचे हॉल में आ गई। उसकी अम्मी वहा बैठी किसी से कॉल पर बात कर रही थी।

    "जी ठीक है" सामिया बी ने इतना कहा और कॉल कट कर दिया।

    "क्या हुआ अम्मी आपके चेहरे का रंग क्यू उड़ा हुआ है क्या कोई मसला हो गया है" रूह ने सामिया बी के चेहरे को अपनी हथेलियों में भरते हुए कहा तो सामिया बी की आंखों से आंसू बहने लगे।

    उन्हें रोता देख रूह बुरी तरह डर गई "क्या हुए अम्मी सब ठीक है न" रूह ने हड़बड़ाते हुए कहा 

    "हां बच्चा सब ठीक है वो बस तुम्हारे नानू की तबीयत थोड़ी नासाज है" सामिया बी ने अपनें आंसू पोंछते हुए कहा

    "क्या हुआ अम्मी नानू को"

    "तुम्हारे नानू के पैरों को लकवा मार दिया है अब वो चल नहीं पाते इसलिए तुमसे मिलने भी नहीं आए" सामिया बी ने उदास होते हुए कहा 

    तो रूह के चेहरे पर छोटी सी स्माइल आ गई "अम्मी आप भी ना कमाल करती है। क्या हुआ अगर नानू नहीं आ सकते, मैं ख़ुद चल दूंगी उनके घर वैसे भी अब क्या मसला वो बीस्ट तो आउट ऑफ़ कंट्री गया है न" रूह ने सामने टेबल पे रखे एप्पल का पहला बाइट लेते हुए कहा तो सामिया बी ने उसे आँखें दिखा दी" रूह  तमीज से वो तुम्हारे भाईजान है"

    "भाईजान या बीस्ट वाटेवर अम्मी और उसके लिए तमीज़ मैं अपनी कमीज़ में भी न रखूं हुउऊ भाईजान नहीं वो कसाईजान है" रूह ने मुंह बनाते हुए कहा फिर थोड़ा रूककर बोली "अभी तो शायद नानू सो रहे होंगे।

    इंशाल्लाह मैं कल सुबह जाती हू द काजमी पैलेस" रूह ने इतना कहा और खाने के टेबल की जानिब बढ़ गई।

    अपनी अम्मी के साथ डिनर करके रूह अपने कमरे में चली गई। उसने थोड़ी देर मलीहा और फुफाजान से वीडियो कॉल पे बात की फिर पूरे एक घंटे फारस से बाते की इसी बिच वो कब कॉल पे बात करतें करते सो गई उसे ख़ुद ही पता नहीं चला।

    फारस उसकी धीमी सांसों की आवाज़ सुन मुस्कुरा दिया। उसने अपनी मोबाइल की स्क्रीन को एक बार प्यार से किस किया फिर कॉल रख खुद भी सो गया।

    अगली सुबह करीब 9 बजे रूह रेडी होकर नीचे आई। उसने आज नियोन ग्रीन कलर का सूट पहना था जो स्लीवलेस था।

    गले से दुपट्टा डाले वो नीचे आ रही थी।

    काली गहरी सियाह आंखें जो काजल से सनी हुई थी बेबी पिंक लिपस्टिक और खुले बाल वो इस लुक में भी कहर ढा रही थी।

    "अम्मी हम नानू से मिलने जा रहें है इससे पहले की वो बीस्ट वापास आ जाए हम नानू से मिलकर आ जाते है फिर हमे वापस मुम्बई भी तो जाना है" रूह ने हवेली से बाहर जाते हुए कहा

    "अरे बेटा आप नाश्ता तो कर लो" किचन से निकलती सामिया भी ने फिक्रमंदी से कहा 

    "अम्मी हम आकर खा लेंगे अभी हमें बस नानू और कुबरा से मिलने की जल्दी है आप नाश्ता कर लीजिएगा हमारा वेट मत कीजिएगा" रूह इतना बोल वहा से चली गई।


    रूह ने काजमी पैलेस को बाहर से एक नज़र देखा और एक गहरी सांस लेकर वो अंदर की जानिब बढ़ गई।

    ये पैलेस पहले के मुकाबले थोड़ा बदल गया था लेकिन ये आज भी उतना ही बड़ा था जिसमे चार फारूखी हवेली आ जाए। 

    रूह ने पहरा दे रहें मुलाजिमों को खुद की पहचान बताई और पैलेस के अन्दर आ गई।

    पूरे दस साल बाद वो इस पैलेस के अन्दर आ है उसकी धड़कने बढ़ी हुई थी जैसे कोई खतरा उसका इंतज़ार कर रहा हो।

    रूह को हॉल में कोई घर का मेंबर दिखाई नहीं दिया तो वो सीधा ऊपर की जानिब बढ़ गई।

    रूह जिसकी पूरी तवज्जों (ध्यान) अपने मोबाईल की तरफ़ था, उसने लिफ्ट में जाकर गलती से एक की जगह चौथे फ्लोर का बटन प्रेस कर दिया।

    फारस से चैटिंग करते हुए मुस्कुरा रहीं रूह लिफ्ट के रुकने लिफ्ट के बाहर आ गई।

    रूह ने उस फ्लोर को देखा उसे वो फ्लोर कुछ जाना अनजाना सा लगा। वो सात साल की उम्र में उस पैलेस में आई थीं इसलिए वो नानू का कमरा भुल चुकी थी।

    अगर वो किसी मुलाजिम से पूछती तो कितनी बेज्जती होती उसकी की उसे अपने नानू का कमरा ही नहीं याद।

    रूह ने अपना दिमाग़ चलाया और एक कमरे की ओर बढ़ गई "ज़रूर यही है नानू का कमरा फ्लोर के बीचोबीच वाला" रूह ने खुद को शाबाशी दी और उस कमरे की ओर चली गई।

    दो तीन बार नॉक करने के बावजूद भी जब कोई ज़वाब नहीं मिला तो रूह को नानू की फिक्र होने लगी।

    "नानू ठीक तो होंगे न" रूह धीरे से बुदबुदाई। उसने जैसे ही कमरे के दरवाज़े को धक्का देना चाहा वो अपने आप ही खुल गया।

    "इस कमरे में इतना अंधेरा क्यू है?" रूह कमरे के अंदर आते हुए कहा और स्विच बोर्ड ढूंढने लगीं।

    रूह ने अंधेरे में अपने हाथों को इधर उधर घुमाकर स्विच बोर्ड ढूंढना चाहा तभी अचानक रूह का हाथ किसी मजबूत चीज से जाकर टकरा गया।

    "या अल्लाह ये दीवार कहा से आ गई बिच कमरे में लगता है नानू ने कमरे को नई दीवार से पार्टिशन कर दिया है" रूह ने उस दीवार को अपने दोनों हाथों से छूटे हुए कहा

    "बड़ा अजीब ऊबड़ खाबड़ वाला दीवार है फिशिंग ही नहीं है मिल गया लगता है ये है बटन" रूह ने अभी इतना ही कहा था की उसे मेहसूस हुआ की वो किसी की मज़बूत पकड़ में है जिससे वो चाह कर भी अलग नहीं हो सकती। 

    "अह्ह्ह्ह कौन हो" रूह ने अभी बस इतना ही कहा था की इतने में ही उस कमरे की सारी लाइटें जल गई।

    जिनके एक साथ ऑन होने से रूह की भी आँखें चौंधिया गई। लेकिन जब उसने अपनी आंखे खोलकर सामने की ओर देखा तो उसकी आँखें किसी की गहरी आंखों से जा टकराई जिसे देखकर रूह के पैरों तले ज़मीन ही खिसक गई।

     
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  • 6. Junooniyat - Chapter 6

    Words: 1035

    Estimated Reading Time: 7 min

     
    अब आगे 
     
     
    अपने सामने खड़े शख्स को देखकर रूह की तो मानों रूह ही बाहर आने वाली थी।

    वही उसे उलट उस शख़्स की आंखें रूह के सुंदर वजूद पर तो मानों जम सी गई।

    लेकिन जल्द ही उसने ख़ुद को नॉर्मल कर लिया और अपनी डरा देने वाली कर्कश आवाज़ में बोला "who are you?"

    उस शख़्स की आवाज़ सुन रूह अपने सेंस में आई और अपनी आंखों के इशारे से उसके हाथों की ओर इशारा करने लगीं मानो कह रही हो हाथ हटाओगे तभी तो बताऊंगी।

    वो शख़्स रूह के इशारे को बखूबी समझ रहा था। उसने रूह को वॉर्न करते हुए कहा "अगर चीखने चिल्लाने या मजबूर बनने का कोई ड्रामा किया तो मैं भुल जाऊंगा की तुम एक लड़की हो" उस शख़्स की रीढ़ की हड्डी तक ठंडी कर देने वाली आवाज़ सुन रूह का बदन डर से कांपने लगा।

    उस शख़्स ने रूह के मुंह से हाथ हटाया तो वो गहरी गहरी सांसें लेने लगी।

    रूह बार बार कुछ बोलने के लिए अपने होठ हिला रही थी लेकिन मानों आज उसकी आवाज को लकवा ही मार दिया था।

    उसने बड़ी मुश्किल से अपने टूटे फूटे लफ्जों में कहना शुरू किया "स सॉरी यारम भाईजान मैं आपके कमरे में गलती से आ गई।" 

    इतना बोल रूह शांत हो गई और उसने अपनी नज़रे नीचे की ओर झुका ली।

    वहीं यारम इस अंजान हसीन लड़की के मुंह से ख़ुद के लिए भाईजान सुन पता नहीं क्यूं लेकिन उसे अच्छा नहीं लग रहा था। लेकिन यारम तो ठहरा यारम वो हमेशा करता वही था जो उसका दिमाग़ उसे करने को बोलता था।

    "मुझे अपनी बाते दोबारा दोहराना नहीं पसंद" यारम ने अपनें एक एक अल्फाजों को चबाते हुए कहा रूह उसे डर और कन्फ्यूजन के मिले जुले एक्सप्रेशन के साथ देखने लगी।

    यारम ने उसके हैरान परेशान चेहरे को देखा जिसमें वो बेहद क्यूट लग रही थी।

    वो अपनी लंबी घनी पलकों को बार बार झपकाती हुई अपनी सुरमई आंखों से टुकुर टुकुर उसे ही देख रही थी।

    यारम को वो किसी बिल्ली के छोटे से बच्चे से कम नहीं लग रही थी। यारम जिसका चेहरा गुस्से से तप रहा था वो भी रूह का मासूम चेहरा देख अब पिघलने लगा था। 

    लेकिन जो आसानी से पिघल जाए वो यारम काज़मी कहा।

    "मैंने पूछा तुम हो कौन?" यारम ने इस बार अपने गुस्से को थोड़ा कम करते हुए सवाल किया

    "वो मैं रूह फारुखी, अज़ीज़ फारूखी की साहबजादी (बेटी)" रूह ने हकलाते हुए कहा और दोबारा अपनी नज़रे नीची कर ली।

    वही जब यारम ने रूह की असली पहचान जानी तो उसके एक्सप्रेशन एकदम सख्त हो गए। 

    जिस चेहरे पर अभी थोड़ी नर्मी आ गई थी अब वो हैंडसम चेहरा दोबारा सख्त हो गया था।

    "Get lost" यारम ने लगभग गुर्राते हुए कहा तो रूह अपनी जगह चिहुंक उठी।

    उसने एक नज़र यारम की ओर देखा जो अपने लाल हों चुकी हरी आंखों से उसे ही देख रहा था मानो आज उसका कत्ल ही कर देगा।

    रूह ने भी आव देखा न ताव उस कमरे से दौड़ते हुए बाहर निकल गई। उसने लिफ्ट से न जाकर सीढियों से जाना ही प्रेफर किया या वो डर में भुल ही गई थी की वहा लिफ्ट भी है।

    वो जैसे ग्राउंड फ्लोर पर पहुंची वो किसी से टकरा गई। 
    "अरे संभाल कर" उस लड़की ने कहा

    तभी उन दोनों की नज़रे आपस में टकरा गई।

    "कुबरा" स्वालेहा ने अपनी रुंधी हुई आवाज़ में कहा तो कुबरा घबरा गई।

    "क्या हुआ तूझे तू रो क्यू रही है" कुबरा ने रूह के आंसूओ को पोछते हुए कहा तो रूह डर गई। वो अपनी वजह से किसी को भी परेशान नहीं कर सकतीं थी।

    "वो एक्चुअली तुझसे मिले चार साल हो गए तो वहीं सब याद कर इमोशनल हो गई" रूह ने फेक स्माइल करते हुए 

    "तूने भी ना एक पल के लिए मुझे डरा ही दिया था" कुबरा ने राहत की सांस लेते हुए कहा 

    "तू वो सब छोड़, मुझे ये बता की नानू कहा है?" 

    "चल उन्हीं से मिलकर पूछ ले" कुबरा ने रूह का हाथ पकड़ते हुए कहा और उसे लेकर नानू के कमरे की जानिब बढ़ गई।

    वो दोनों स्वालेहा के नानू जो की कुबरा के दादाजान थे। "शाहमीर काजमी" उस घर के सबसे बुजुर्ग शख़्स थे। 

    कुबरा और रूह जब शाहमीर साहब के कमरे में आई तो वो बेड पर सोए हुए थे।

    "नानू" रूह ने नानू के हथेली पर हाथ रखते हुए कहा तो उनकी आंखें झटके से खुल गई।

    वो कहते है न शेर बूढ़ा और घायल ही क्यू न हो अपना रुतबा नहीं भूलता बस यहीं हाल शाहमीर साहब का भी था। उनकी आंखों में वो ठंडक वो औरा वो रुतबा अभी भी साफ़ देखा जा सकता था।

    रूह को अपने सामने देख उनकी बुढ़ी आंखें चमक उठी। उन्होंने अपनें कमज़ोर हाथों से रूह के सिर पर हाथ फेरा।

    रूह अपनें नानू की ऐसी हालत देख इमोशनल हो गई। उसकी आंखें नम हो चुकी थी जिसे उसने जल्द ही छुपा लिया। वो अपने नानू के सामने रोकर उन्हें और ज़्यादा परेशान नहीं करना चाहती थी।

    उसके नानू ही एक मात्र वाहिद शख़्स थे जो उससे मिलने हर साल भोपाल से मुम्बई आते थे। लेकिन पिछले दो सालों से वो उससे मिलने मुंबई नहीं आए थे।

    उसकी उनसे बस वीडियो कॉल में बाते होती थी वो भी तब जब उसकी नानीजान नायला बी उनके आस पास मौजूद न हो तब।

    काफ़ी देर अपने नानू और कुबरा से हसी मजाक और बाते कर रूह उस रूम से बाहर निकल गई।

    रूह अभी घर के बाहर जा ही रही थी की अचानक उसका पैर मुड़ गया इससे पहले रूह जमीन पे गिरती किसी ने अपनी मजबूत बाहों में उसे थाम लिया।

    रूह ने जब उस शख़्स के चेहरे की ओर देखा तो वो हैरान रह गई।
    उसकी उनसे बस वीडियो कॉल में बाते होती थी वो भी तब जब उसकी नानीजान नायला बी उनके आस पास मौजूद न हो तब।

    काफ़ी देर अपने नानू और कुबरा से हसी मजाक और बाते कर रूह उस रूम से बाहर निकल गई।

    रूह अभी घर के बाहर जा ही रही थी की अचानक उसका पैर मुड़ गया इससे पहले रूह जमीन पे गिरती किसी ने अपनी मजबूत बाहों में उसे थाम लिया।

    रूह ने जब उस शख़्स के चेहरे की ओर देखा तो वो हैरान रह गई।
     
     
     

  • 7. Junooniyat - Chapter 7

    Words: 1231

    Estimated Reading Time: 8 min

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    "अहद भाई आप" रूह ने ख़ुद को संभालते हुए कहा और ठीक से खड़े हो गई।

    अहद काजमी यारम काज़मी का छोटा भाई था। जिसकी उम्र 23 साल थी और ये अभी भोपाल के सबसे बड़े कॉलेज में M.sc Computer Science के लास्ट ईयर में था। ये दिखने में बेहद हैंडसम था लेकिन यारम से कम ही था। 

    अहद से तीन साल छोटी उसकी बहन कुबरा काजमी थी जो घर में सबसे छोटी थी। जिसमें उसके दोनों भाइयों की जान बसती थी।

    कुबरा गोरा रंग तीखे नैन नक्श की खुबसूरत लड़की थी। जिसके बाल थोड़े कर्ल थे।

    कुबरा ने इंटर तक पढ़ाई की थी और अब वो उर्दू में अपना ग्रेजुएशन कंप्लीट कर रही थी। उसे शेरो शायरी, नज़्म गज़ल और नॉवेल लिखना बेहद पसन्द था।

    किसी को नहीं पता था की वो एक फेमस नॉवेल की राइटर भी है। कुबरा हमेशा अपने सिर पर हमेशा स्कार्फ ओढ़कर रखती थी।

    Back to the story......

    "अरे मोटी तू भोपाल कब आई तूने बताया भी नहीं?" अहद से रूह के गालों को पिंच करते हुए कहा तो रूह उसे बुरी तरह घूरने लगी।

    "अब्बू की सालगिरह है कल, बस इसीलिए भोपाल आई हू परसो वापस मुंबई चली जाऊंगी" रूह ने इतना कहा और काजमी पैलेस से बाहर निकल गई।

    अहद भी अपने कंधे उचका कर वहा से चला गया। 

    वो दोनों इस बात से अंजान थे की दो हरी आंखें इस सारे मंज़र को अपनी जलती हुई निगाहों से देख रही थी। उसे पता नहीं क्यूं लेकिन अहद का रूह को छूना बिलकुल भी पसन्द नहीं आया। उसे उन दोनों की करीबी देखकर अपने सीने में जलन हो रही थी लेकिन वो इस बात को मानना नहीं चाहता था।

    ये शख्स और कोई नहीं बल्कि यारम था। जो अपने फ्लोर की रेलिंग से टिककर ये नज़ारा अपनी हरी आंखों से देख रहा था।

    रूह जब अपने घर आई तो उसे उसके अब्बू अज़ीज़ फारूखी हॉल में ही बैठे दिखाई दिए। रूह दौड़कर उनके गले लग गई।

    "अस्लामो अलैकुम अब्बू कैसे हो आप मैंने आपको बहुत मिस किया" रूह खुश होकर अज़ीज़ फारूखी के गले लगे हुए बोली।

    "वालेकुम अस्सलाम बेटा" अजीज फारूखी ने रूह को ख़ुद से अलग करते हुए कहा 

    "बेटा आप अभी कमरे में जाइए क्योंकि हम थोड़ा busy है हम फ्री होकर आपसे बात करतें है" अजीज फारूखी ने अपने P.A. हाशिम के साथ स्टडी रूम की ओर जाते हुए कहा तो रूह बस फीका सा मुस्कुरा दी।

    अज़ीज़ फारूखी का ये रवैया उसके लिए भले नया नहीं था। उसे लगा था की शायद चार साल बाद अपनी बेटी को देखकर वो भी उसकी तरह खुश हो जायेंगे लेकिन आज भी वो वैसे ही थे जिन्हें अपनी औलाद से ज्यादा अपनी सियासत और रुतबा प्यारा था।

    किचन के दरवाज़े पर खड़ी सामिया बी ने ये सारा नज़ारा देख लिया था जिसे देखकर उन्हें अपनी इकलौती औलाद रूह के लिए बुरा लग रहा था।

    "अरे बेटा तुम आ गई चलो नाश्ता कर लो मैंने तुम्हारे फेवरेट आलू के पराठे बनाए है" समिया बी ने रूह का मुड ठीक करने के इरादे से कहा तो रूह भी मुस्कुराकर नाश्ता करने बैठ गई।

    "वैसे अम्मी आपने हमे अच्छा धोखा दिया शेर की मौजूदगी में उसके गुफा के अंदर भेज दिया" रूह ने खाने का पहला बाइट खाते हुए कहा तो सामिया बी उसे कनफ्यूजन से देखने लगी।

    रूह ने अपनी प्यारी अम्मी का मासूम चेहरा देखा फिर अपने मुंह के निवाले को गटक कर बोली "अम्मी वो बीस्ट पैलेस पर ही थे" रूह ने यारम का कोल्ड फेस याद करते हुए कहा फिर अपने सिर को झटक दिया।

    रूह की बात सुनकर सामिया बी की भी आँखें बड़ी हो गई "क्या कहा बेटा यारम घर पर ही थे?" अपनी अम्मी का सवाल सुन रूह ने रोनी सूरत बनाकर हां में अपना सिर हिला दिया।

    "या अल्लाह कहीं उसने तुम्हें कुछ कहा तो नहीं" सामिया बी ने परेशान होते हुए कहा तो रूह के खाते हुए हाथ रुक गए।

    "अगर अम्मी को पता चला की उस बीस्ट ने हमे कितनी बुरी तरह डांटा है तो वो खाम खा परेशान हो जायेंगी। वैसे भी कौनसा वो एरोगेंट बीस्ट अम्मी से कुछ बोलेगा या अम्मी अपने उस प्यारे भतीजे से कुछ पूछेंगी" रूह ने सोचा फिर एक गहरी सांस लेकर अपनी अम्मी से बोली "अम्मी आप न कुछ ज़्यादा ही सोच रही हो ऐसा कुछ नहीं है। हमने उस बीस्ट को सिर्फ़ उसके उस आलीशान गुफ़ा में देखा और ज़्यादा कुछ नहीं" रूह की बात सुन सामिया बी ने राहत की सांस ली।

    सामिया बी को आज भी याद था की किस तरह दस साल पहले यारम और ने रूह को डांटा था और किसी ने भी उस मासूम सी सात साल की लड़की का यकीन नहीं था।

    उन सब में सबसे बुरी जो चीज़ थी वो ये थी की अज़ीज़ फारूखी ने बेकसूर रूह को सबके सामने थप्पड़ मार दिया था जिस वजह से roob डिप्रेशन में चली गई थी।


    रूह का डिप्रेशन इतना बढ़ चुका था की अगर वो और ज़्यादा दिनों तक उसी कंडीशन में रहती तो वो मेंटली डिस्टर्ब हो जाती।

    रूह को डिप्रेशन से निकालने के लिए ही जमाल साहब और अफसाना बी उसे अपने साथ मुम्बई लेकर चलें गए थे।

    मलीहा और फारस की दोस्ती में रूह धीरे धीरे नॉर्मल हो गई। उन्हें याद था की रूह कितनी मन्नतों मुरादों से शादी के दस साल बाद उनके यहां पैदा हुई थी। 

    सामिया बी आज भी अपनी बेटी की वो हालात याद कर बहुत डर जाती थी। 

    "अम्मी हमारा हो गया" रूह अपनी चेयर से उठते हुए बोली और अपने कमरे की ओर चली गई।

    अगले दिन स्वालेहा जब काजमी पैलेस अपने नानू से मिलने गई तो उसने पहले कुबरा को कॉल करके यारम की मौजूदगी के बारे में पूछ लिया था।

    जब वो कन्फर्म हो गई की यारम पैलस में नहीं है तब ही वो काजमी पैलेस गई। 

    रूह की मुलाकात आज अपनी नानी जान नायला बी से हो गई जो उसे और उसकी अम्मी को कुछ ख़ास पसन्द नहीं करतीं थी।

    रूह को समझ ही नही आता था की कैसे कोई मां अपनी बेटी और नातिन को इतनी नापसंद कर सकती है। वैसे भी उसे काजमी पैलेस में अपने नानू, कुबरा और अहद भाई के अलावा ना कोई पसन्द था न उसे इन तीनों के अलावा कोई पसन्द आता था।

    दो घंटे अपने नानू और कुबरा के साथ मस्ती मज़ाक कर रूह कुबरा के साथ नानू के कमरे से बाहर निकल गई।

    "यार कुबरा तुम आज शाम अब्बू की सालगिरह के जश्न में आओगी न?" रूह ने कुबरा से पूछा

    "हां इंशाल्लाह हम जरूर आयेंगे" कुबरा ने ज़वाब दिया ठीक है फिर मिलते है शाम को।" रूह इतना बोल पैलेस से निकल गई।

    शाम का वक्त

    फारुखी हवेली 

    फारूखी हवेली रोशनी और डेकोरेशन लाइटो से जगमगा रही थी। पूरी हवेली को बहुत सुंदर तरीके से सजाया गया था। 

    इस वक्त उस हवेली में भोपाल के सारे बिजनेसमैन बिल्डर्स राजनीति नेता मौजूद थे।

    लाइट पिस्ता कलर के कुर्ते पैजामे के साथ डार्क ग्रीन कोट पहने अज़ीज़ फारूखी के चेहरे पर आज अलग ही चमक थी। वो सारे मेहमानों से मुलाकात कर रहें थे।

    सामिया बी ने भी अज़ीज़ साहब के कपड़े से मैचिंग का सूट पहना हुआ था।

    जमाल साहब को वायरल फीवर हो जानें की वजह से मलीहा आज पार्टी में नहीं आ पाई थी जिस वजह से रूह का मुड ऑफ़ था। 

    वो बेमन से तैयार हो रही थी इस बात से अंजान की आज की पार्टी से उसकी ज़िंदगी में बहुत कुछ बदलने वाला था।

     
     
     
     
     
     
     
     

  • 8. Junooniyat - Chapter 8

    Words: 1325

    Estimated Reading Time: 8 min

     
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    अभी पार्टी अपने उरूज़ पर थी के तभी उस हवेली के इंट्रेंस से एंट्री होती है एक ऐसे शख्स की जिसे जिसके आते ही वो पार्टी का सेंटर ऑफ अट्रैक्शन बन गया।

    जिसका सिक्का पूरे भोपाल तो क्या पूरे एशिया में चलता था। ये शख्स कोई और नहीं बल्कि यारम काज़मी था।

    ब्लैक टक्सिडो पहने यारम काज़मी बेहद हैंडसम दिख रहा था। प्रॉपर जेल से सेट बाल जिसकी उसने पीछे एक चोटी बनाई हुई थी, सेट की हुई बियर्ड, हाथों में पहनी महंगी रिस्ट वॉच, कॉस्ट्ली लेदर शूज पहने वो बेहद अट्रैक्टिव दिख रहा था जिसे हर एक लड़की पाना चाहेगी।

    वहीं जब अज़ीज़ फारुखी की नज़र यारम पे गई तो उनकी आंखें चमक उठी। वो अपने गेस्ट से एक्सक्यूज बोल यारम की ओर बढ़ गए।

    "अस्लामों अलैकुम यारम तुमने इस पार्टी में आकर पार्टी में जान डाल दी। मैं और तुम्हारी फूफी तुम्हारे ही मुन्तजिर थे।" अजीज साहब ने यारम से हैंड शेक करते हुए कहा

    यारम ने बस "वालेकुम अस्सलाम" में ज़वाब दिया।

    "वैसे तुम भोपाल कब आए"

    "कुछ दिन पहले ही" यारम ने सपाट लहज़े में जवाब दिया।

    अज़ीज़ साहब जान गए थे की यारम उनकी बिना सर पैर की बातों का जवाब देने में बिलकुल भी इंटरेस्टेड नहीं है इसीलिए वो भी उसे पार्टी एंजॉय करने का बोल वहा से चले गए।

    वहीं जब हया की नज़र यारम पे गई तो उसने उसके बगल में खड़ी अपनी अम्मी को पिंच किया तो उनकी नज़र भी यारम पे चली गई।

    ठीक उसी पल उसके करीब ही खड़ी ताहिरा बी और कुबरा की नज़रे भी यारम की ओर चली गई। 

    वो सब उसे वहा देख हैरान हों गई क्यूंकि उन्हें इतना मालूम था की यारम को इस तरह किसी की सालगिरह पार्टी में जाना बिलकुल भी पसन्द नहीं। उनके लिए यारम का वहा होना किसी शॉक्ड से कम नहीं।

    "अरे भाई आप यहां आए कहीं आज सूरज ईस्ट के जगह वेस्ट से तो नहीं निकल आया" यारम के पास आते अहद ने अपनें बिग ब्रदर को टीज करते हुए कहा

    लेकिन यारम की शार्प नजरों की तपिश से बेचारे के बाकी अल्फाज़ उसके मुंह के अन्दर ही रह गए।

    "सॉरी भाई मैं तो बस मज़ाक ही कर रहा था" अहद से खिसियानी हसी हस्ते हुए कहा और बिना देरी किए वहा से नौ दो ग्यारह हो गया।

    पार्टी में शाहमीर काज़मी और उनकी बेगम नाइला काज़मी भी नहीं आई थी और जहां तक बात है अफसाना बी (फारस की अम्मी) वो जमाल साहब की तबीयत का सुन वापस मुम्बई जा चुकी थी।

    अभी यारम कुछ बिजनेसमेंस से बाते ही कर रहा था के तभी उसने उन लोगों को पीछे की ओर देखते हुए देखा उन सबके ऐसा एक ओर देखने से यारम को थोड़ा अजीब लगा

    जब उसने भी उन लोगों की नज़रों का पीछा किया तो उसकी नज़रे भी उसी ओर जम सी गई।

    पार्टी लॉन में आती रूह जिसने पिस्ता कलर का ऑफ शोल्डर फूल लेंथ गाउन पहना हुआ था। उसने अपने बालों का बेहद खूबसूरत फ्रेंच बन बनाया हुआ था उसके बालों की कुछ काली स्याह जुल्फे उसके गालों को चूम रही थी।


    आँखें में हल्का स्मोकी शिमर आई मेकअप, होठों पर लगी न्यूड लिपस्टिक और गले में पहना एक डार्क ग्रीन डायमंड का पेंडेंट इस लुक में रूह बेहद खुबसूरत दिख रही थी।

    जिस पर से लोग चाह कर भी अपनी नज़रे नहीं हटा पा रहें थे। यारम का भी हाल कुछ ऐसा ही था। उसकी एमरल्ड ग्रीन आंखें रूह को ही निहार रही थी।

    वहीं जब हया और नाजिया बी ने रूह को देखा तो उसका मुंह बन गया। वो दोनों ही उसे रत्ती भर भी पसन्द नहीं करते थे। जिसका पहला रीजन था रूह हद से ज्यादा हसीन होना और दूसरा शाहमीर साहब का रूह को हद से ज़्यादा प्यार करना।

    ऐसा नहीं था की शाहमीर साहब अपने पोते पोतियों में भेदभाव करते थे वो तो रूह उनकी सबसे छोटी और एकलौती नातिन थी इसलिए वो उनके लिए बेहद ख़ास और अज़ीज़ थी।

    वहीं जब हया में यारम की ओर देखा तो उसका चेहरा गुस्से से लाल हों गया क्योंकि यारम भी स्वालेहा को ही देखे जा रहा था। हया को अपना बुरा सपना सच होता सा मेहसूस हो रहा था। 

    असल में हुआ में बचपन में एक सपना देखा था की शाहमीर साहब अपने सबसे बड़े पोते यारम की शादी अपनी चहीती नातिन रूह से करवा रहें है।

    इस सपने को देखने के बाद कई रातों तक तो हया को नींद ही नहीं आई।

    जब उसने अपनी अम्मी नाजिया को इस बुरे ख़्वाब के बारे में बताया तो उसने उसे समझाना छोड़ उल्टा उसे रूह के बारे में ही भड़काना शुरू कर दिया।

    समय के साथ हया के मन में रूह के खिलाफ़ नफ़रत इतनी बढ़ गई के उसने रूह को ऐसे जाल में फसा दिया जिस वजह से यारम उससे नफ़रत करने लगा।

    यहां तक की उसके ख़ुद के अब्बू ने उस पर न यकीन कर उसे सबके सामने थप्पड़ मार दिया।

    आज भी हया जब रूह का रोता हुआ चेहरा याद करती थी तो उसे अलग ही सुकुन मिलता था।

    हया ने अपनें ख्यालों को झटका और यारम की ओर देखते हुए खुद से बोली "वो बस एक ख़्वाब था बुरा ख़्वाब जो कभी हकीकत में नहीं बदल सकता। यारम सिर्फ़ मेरे थे मेरे है और मेरे ही रहेंगे।

    हमारे बिच में कभी कोई नहीं आ सकता। अगर किसी ने भी हमारे बिच आने की कोशिश की तो मुझे ख़ुद नहीं पता मैं क्या कर जाऊंगी" हया ने बेहद सर्द लहज़े से कहा और यारम की ओर बढ़ गई। 

    वहीं यारम की नज़रे तो सिर्फ़ और सिर्फ़ रूह पर ही जमी थी जिसे अज़ीज़ फारुखी अपने बिज़नेस पार्टनर्स और पॉलिटिशंस से इंट्रोड्यूस करवा रहें थे। तभी अचानक यार्न की नज़रे गहरी हो गई।

    "बेटा इनसे मिलो ये है फिरोज़ मलिक और ये है इनके साहबजादे फैजान मालिक" अज़ीज़ फारूखी ने रूह को अपनें पार्टी के बड़े नेता और उनके बेटे से मिलाते हुए कहा तो रूह बस फीका सा मुस्कुरा दी।

    उसे उनसे मिलने में ज़रा सा भी इंट्रस्ट नहीं था लेकिन आज पहली बार उसके अब्बू ने उसे इतना स्पेशल फील कराया था इसलिए वो थोड़ी खुश भी थी।

    वो फैजान की नज़रों से थोड़ी अनकम्फर्टेबल हो रही थी। क्यूंकि वो उसे अजीब नज़रों से देख रहा था। 

    "मिस फारुखी वुड यू लाइक टू डांस विथ मि" फैजान ने अपना हाथ रूह की ओर बढ़ाते हुए कहा तो रूह एक पल के लिए हैरान हों गई।

    उसने अपने अब्बू की ओर देखा तो उन्होंने उसे आंखों से ही हां कहने का इशारा किया।

    रूह को फारस के अलावा किसी के साथ डांस करना बिलकुल भी गवारा न था लेकिन अपने अब्बू की बात को नकारना उसकी फितरत न थी। मन मारकर रूह ने फैजान के बढ़े हुए हाथ पर अपनें हाथ रख दिए। जिसे फैजान ने तुरन्त अपनी मज़बूत हथेली में भर लिया।


    उसके ऐसा करते ही दूर खड़े यारम की पकड़ अनजाने में ही अपने हाथ में रखे ग्लास पर कस गई।

    वो बस अपनी जलती हुई निगाहों से फैजान के उस हाथ को ही घूर रहा था जिससे उसने रूह की मुलायम नाजुक कलाई को पकड़ा हुआ था।

    वो दोनों ही डांस फ्लोर पर चले गए। रूह ने बेमन से अपना एक हाथ फैजान के कंधे पर रख लिया।

    फैजान का एक हाथ जहां रूह की उंगलियों में उलझा हुआ था तो वहीं उसका दुसरा हाथ रूह की पतली कमर पे था।

    फैजान रूह की कमर को डांस के बहाने अजीब तरीके से छू रहा था जिससे रूह अनकम्फर्टेबल हो रही थी।

    अगर वो अभी मुम्बई में रहती या यहां इस वक्त उसके अब्बू मौजुद नहीं होते तो वो इस अमीर बाप की बिगड़ी औलाद को अच्छा सबक सिखाती। 

    जब यारम ने फैजान को रूह को गलत तरीके से छूते हुए देखा तो उसकी एमरल्ड ग्रीन आंखों में मानो आग ही दहक उठी।

    उसने अपने हाथ में पकड़े गिलास को वहीं काउंटर पर रख दिया और अपने कदम स्वालेहा की ओर बढ़ा दिए।

    वहीं उसके बगल में खड़ी हया तो जाते हुए सिकंदर की पीठ ही देखती रह गईं।



     
     
     

  • 9. Junooniyat - Chapter 9

    Words: 1363

    Estimated Reading Time: 9 min

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    यारम सीधा डांस फ्लोर पर गया और उसने झटके से रूह का हाथ पकड़ उसे अपने करीब खींच लिया।

    एक "अह्ह्ह्ह्ह" के साथ रूह यारम के मज़बूत सीने से जा लगीं।

    जब यारम ने रूह की गर्म सांसे अपने शर्ट के ऊपर मेहसूस की तो आज पहली बार उसे अपना दिल यूं ज़ोरो से धड़कता हुआ।

    रूह यारम से अलग हुई और जैसे ही उसने यारम के चेहरे की ओर देखा उसकी आंखें तो लगभग बाहर ही आने को थी। 

    वहीं यारम भी रूह के चेहरे के उड़े हुए रंग को ही देख रहा था।

    "भ भा भाईजान आप" रूह ने अपनें कपकपाते होठों से कहा 

    जब यारम ने रूह के मुंह से ख़ुद के लिए दोबारा भाईजान सुना तो उसकी एमरल्ड ग्रीन आंखें बिलकुल डार्क हो गई। 
    उसकी पकड़ अचानक ही रूह की पतली नाज़ुक कमर पर कस गई जिससे रूह की अह्ह्ह्ह निकल गई।

    पता नहीं क्यूं उसे रूह के मुंह से ख़ुद के लिए भाईजान सुनना इतना नागवार क्यूं गुजर रहा था।

    "भाईजान प्लीज़ छोड़ दीजिए हमें दर्द हो रहा था" ये बोलते हुए रूह की आंखों में नमी आ गई थी जिसे देख पता नहीं क्यूं यारम की आंखें बिलकुल किसी दरिया की तरह शांत हो गई।

    वो एक टक रूह की उन सियाह काली आंखों में देखने लगा जहां उसे उसके लिए डर के सिवा कुछ नहीं दिख रहा था।

    लेकिन वो उसकी आंखों में ये तो नहीं देखना चाहता था।

    वहीं फैजान तो यारम को देखकर ही डांस स्टेज़ से नीचे उतर गया था।

    वो जानता था रूह उसकी cousin है और यारम ऑलरेडी इंगेज्ड है इसलिए उसे यारम के इस बिहेव से कोई फ़र्क नहीं पड़ा।

    लेकिन वहां कई चेहरे ऐसे थे जिनके लिए यारम का ऐसा बिहेवियर किसी सदमे से कम नहीं था।

    अजीज साहब, सामिया फारुखी, ताहिरा बी, अहद, कुबरा के लिए ये किसी आठवें अजूबे से कम नहीं था तो वहीं नाजिया बी और हया का चेहरा तो गुस्से से तमतमा गया।

    उन्हें यारम की ये हरक़त बिलकुल नहीं पसन्द आई।

    हया ने तो अपने हाथों की मुट्ठी इतनी ज़ोर से कसी हुई थी की उसके नाखून भी उसके हथेलियों में चुभ रहें थे।

    उन दोनों का तो बस चलता तो रूह को यारम से एक झटके में ही अलग कर देते और साथ ही रूह का गाल थप्पड़ से लाल भी कर देते।

    लेकिन यारम की मौजूदगी में अपने इस ख़्वाब को पूरा करने की न उनमें हिम्मत थी और न ही उसकी इतनी औकात थी।

    वहीं डांस फ्लोर पर यारम अभी भी रूह के हसीन चेहरे में खोया हुआ था जिसे देख एक पल के लिए रूह भी उसे देखती ही रह गई।

    हुआ है आज पहली बार
    जो ऐसे मुस्कुराया हूँ
    तुम्हें देखा तो जाना ये
    के क्यों दुनिया में आया हूँ
    हुआ है आज पहली बार
    जो ऐसे मुस्कुराया हूँ
    तुम्हें देखा तो जाना ये
    के क्यों दुनिया में आया हूँ

    यारम ने अपनें हाथ को आगे बढ़ा कर रूह के बन से पिन निकाल दिया जिससे रूह की काली रेशमी जुल्फें उसके खुले पीठ पर बिखर कर उसे ऐसे कवर कर ली जैसे चांद को बादल ने ढक दिया हो।

    ये जान लेकर के जा मेरी
    तुम्हे जीने में आया हूँ
    मैं तुमसे इश्क़ करने की
    इजाज़त रब से लाया हूँ

    यारम रूह के कान पर झुककर अपनी सरगोशिनुमा आवाज़ में बोला "Dove मुझे आइंदा से तुम इतने बेहूदा कपड़ो में नहीं दिखनी चाहिए"

    यारम की गर्म सांसे अपने कान पर मेहसूस कर जहां रूह एक पल के लिए सिहर उठी थीं अब वो सिकंदर की पुरी बात सुन उसे अपनी काली आंखों को बड़ी बड़ी कर देखने लगी। 

    ज़मीन से आसमान तक हम
    ढूंढ आये जहाँ सारा
     पाया नहीं अब तक
     तुमसे कोई प्यारा

    रूह को पता नहीं था की उसकी ये हरकते उसे इस वक्त कितना ज्यादा क्यूट बना रही है। 

    ज़मीन से आसमान तक हम
    ढूंढ आये जहाँ सारा
     पाया नहीं अब तक
    तुमसे कोई प्यारा

    यारम ने रूह की कमर पर अपनें दोनों हाथ रख दिए तो मजबूरन रूह ने भी अपने दोनों हाथ यारम के सीने पर रख दिए। वो दोनों इसी तरह एक दूसरे के साथ डांस करने लगे।

    बातों में तेरी हैं बदमाशियां
    सब बेवजह की हैं तरीफियां
    मैं लिख दूँ आसमान पर ये
    के पढ़ लेगा जहाँ सारा
    आ ना हो अब कोई
    यहाँ हम दो सा दोबारा

    यारम ने रूह को टर्न करके उसे पीछे से अपनी बाहों में कुछ इस क़दर भरा की देखने वालों को महज़ डांस स्टेप लगा लेकिन असल में ये यारम के अन्दर उठ रही फीलिंग्स थीं जिन्हें अब वो चाहकर भी रोक नहीं पा रहा था।

    मैं दुनिया भर की तारीफें
    तेरे क मों में लाया हूँ
    मैं तुमसे इश्क़ करने की
    इजाज़त रब से लाया हूँ
    रब्ब से लाया हूँ

    "Dove" यारम की आवाज़ पे रूह ने सिर्फ़ "हम्मम" में ज़वाब दिया, क्यूंकि वो तो यारम को देखकर ही खौफ खा जाती थी और यहां वो अपने उस खौफ के साथ डांस कर रही थी।

    तू है जो रूबरू मेरे
    बड़ा महफूज रहता हूँ
    तेरे मिलने का शुकराना
    ख़ुदासे रोज करता हूँ
    तू है जो रूबरू मेरे
    बड़ा महफूज रहता हूँ
    तेरे मिलने का शुकराना
    ख़ुदा से रोज करता हूँ

    "तुमने उसे खुदको क्यूं छूने दिया" ये बोलते वक्त यारम की आवाज़ में कोल्डनेस साफ़ मेहसूस की जा सकती थी।

    लेकिन इन सब से अंजान रूह अपनी कन्फ्यूजन भरी आंखों से टुकुर टुकुर उसे ही देख रही थी।

    यारम समझ गया की उसकी Dove को उसकी बातें बिलकुल भी समझ नहीं आई। 

    हमको पता है ये नादानियाँ हैं
    आवारा दिल की है आवारियां
    ये दिल पागल बना बैठा
    इसे अब तू ही समझा दे
    दिखे तुझमें मेरी दुनिया
    मेरी दुनिया तू बनजा रे

    "वहीं लड़का जिसके साथ तुम अभी डांस कर रही थी" यारम ने अपनें एक एक अलफाजों को चबाते हुए कहा

    रूह डर से कांपने लगी उसे आज भी दस साल पहले का वो मंज़र याद था जब यारम उसपर बेवजह गुर्राया था।

    "व वो अब्बू ने कहा" रूह अभी अपनी कपकपाती आवाज़ में इतना ही बोल पाई थी की यारम उसकी बात बिच में ही काटते हुए बोला "तुम्हारे अब्बू ने कहा और तुमने उसे ख़ुद को छुने दिया Dove" यारम ने रूह की कमर को बेदर्दी से मसलते हुए कहा तो स्वालेहा की आंखों में ठहरे आंसू बाहर निकल आए।

    हूँ खुशकिस्मत जो किस्मत से
    तुम्हे ऐसे मैं पाया हूँ
    मैं तुमसे इश्क़ करने की
    इजाज़त रब्ब से लाया हूँ

    यारम ने जब रूह को सुबकते हुए देखा तो उसकी अंगार बरसाती आंखे दोबारा बर्फ की तरह ठंडी हो गई।

    इससे पहले की वो रूह से कुछ कहता रूह उसकी गिरफ्त से छूटकर डांस फ्लोर के नीचे उतर गई।

    यारम बस जाती हुई रूह को ही देखता रहा जिसकी जुल्फें हवा में उड़ रही थी फिर अपने खाली हाथ को देखने लगा जिससे उसने कुछ देर पहले अपनी Dove को होल्ड किया था और यहीं सब याद कर उसके हाथों की मुट्ठियां कस गई।

    "ये तुमने सही नहीं किया Dove" यारम ने अपनी लाल आंखो से रूह की ओर देखते हुए कहा जिसे फैजान ने दोबारा छू लिया था। 

    असल में रूह हवेली के अन्दर ही जा रही थी के अचानक पीछे से फैजान ने उसकी कलाई को पकड़ लिया।

    भले ही रूह ने तुरन्त उसके हाथ को अपनी कलाई से हटा दिया था मगर यारम की नज़र तो अभी भी उसी सीन में अटक कर रह गई थी।

    फैजान उसे बेवजह की बातों में उलझा रहा था जिसमें रूह को रत्ती भर भी इंट्रस्ट नहीं था।

    वो फैजान से एक्सक्यूज मि बोल हवेली के अन्दर चली गई।

    उसने जाते हुए अपनी अम्मी से अपनी तबियत का हवाला देकर थोड़ा रेस्ट करने का बोल दिया था।

    कमरे में पहुंचकर रूह ने सबसे पहले फारस को कॉल लगाया जो की आउट ऑफ़ नेटवर्क बता रहा था।

    उसे इस वक्त किसी की ज़रूरत थी जिससे वो अपनी बाते शेयर कर सके और वो इस वक्त मलीहा को कॉल करके उसे और परेशान नहीं करना चाहतीं थी।

    अभी वो फ्रस्टेट होकर सोफे के हेडरेस्ट से आंखें बन्द कर सिर टिकाए बैठी हुई ही थी के तभी किसी ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया।

    अचानक ने किसी का हाथ अपनें कंधे पर मेहसूस कर रूह चौंक गई। उसने जब मुड़कर देखा तो उसके मुंह से बस इतना निकला "तुम"


     

  • 10. Junooniyat - Chapter 10

    Words: 1227

    Estimated Reading Time: 8 min

    अब आगे 
     
     
     
    "हा मैं नहीं तो और कौन" उस लड़की ने रूह के करीब बैठते हुए कहा

    "हयात तुमने तो मुझे डरा ही दिया था" रूह ने अपनें सीने पर हाथ रखते हुए कहा तो हयात हंसने लगी।

    बदामी रंग और सुनहरे बालों वाली हयात रूह की बचपन की दोस्त और उसकी पड़ोसी भी थी।

    जब रूह मुम्बई नहीं गई थी तो वो दिन भर हयात के साथ ही मस्तियां किया करती थी। हयात के पापा भोपाल के जानें माने बिल्डर थे। 

    "मैं तूझे नीचे पार्टी लॉन में ढूंढ रही हू और मैडम यहां आराम फरमा रही है" हयात ने मुंह बनाते हुए कहा

    "अरे कुछ नहीं यार बस headache हो रहा था इसलिए रूम में आ गई वैसे तू ये बता तू इतनी लेट क्यू आई" रूह ने एक आईब्रो रेस करते हुए कहा तो हयात ने अपनी बत्तीसी चमका दी।

    "अरे तू वो सब छोड़ और तू रही है न मेरी शादी के लिए" हयात ने अपनी अपनी आंखें टिमटिमाते हुए कहा

    रूह की आंखें बड़ी हो गई "तेरे कहने का क्या मतलब है शादी और वो भी तेरी?"

    "हां अगले हफ़्ते मेरा निकाह है और सब आज ही फाइनल हुआ इसलिए मुझे यहां आने में देरी हो गई वो Zayn का अचानक USA से ज्वॉइन लेटर आ गया और उसे urgently वहा जाना होगा और एक बार वो वहा गए तो एक साल से पहले उनका आना नई होगा।

    मुमानी चाहती है की हमारा निकाह जैन के USA जाने से पहले हो ताकी वो मुझे लेकर वहा जाए" हयात ने एक ही सांस में रूह से कहा तो वो उसे आँखें छोटी कर घूरने लगी।

    "तू उन्हें मना नहीं कर सकतीं थी? अभी तेरी उम्र ही क्या है महज़ 18 साल इतनी कम उम्र में निकाह कौन करता है"

    "मैं!!!" हयात ने फटाक से कहा

    "मैं कुछ नहीं जानती तूझे मेरे साथ शादी की शॉपिंग भी करनी पड़ेगी और मेरे शादी में मस्ती भी" हयात ने रूह को गले लगाते हुए कहा तो रूह भी उसे बैक हग करके हां में अपना सिर हिला दी।

    थोड़ी मस्ती मज़ाक कर हयात भी अपने घर चली गईं और रूह भी अपने कपड़े चेंज कर बेड पर लेट गई।

    हयात से मिलकर उसका मूड दोबारा अच्छा हो गया था। यारम की हरकते तो लगभग वो भुल ही चुकी थी।

    आधी रात हो चली थी, अभी रूह अपने बिस्तर पर करवटें ही बदल रही थी की उसे बाहर बादल के गरजने के साथ तेज़ बारिश के गिरने की आवाज़ सुनाई दी। जिसे सुनकर रूह की आंखों से नींद पल भर में ही गायब हो गईं।

    रूह दौड़ते हुए अपने कमरे से बाहर निकल गई और छत पर जाकर बारिश में भीगने लगी।

    रूह को बचपन से बारिश बहुत ही पसन्द थी। वो अकसर बारिश में भीग जाया करतीं थी जिस वजह से वो हमेशा बीमार हो जाया करतीं थी।

    लेकिन दुनियां की कोई बीमारी भी रूह को बारिश में भीगने से नहीं रोक सकती थी।

    वहीं यारम जिसकी आंखों से नींद कोसों दूर थी वो अपने कमरे की बालकनी में आकर सिगरेट का कश ले रहा था।

    रह रह कर उसकी आंखों के सामने रूह का हसीन चेहरा, उसकी लंबी घनी झुकी पलकें, उसका उसके बालों को खोलना और रूह की मदहोश कर देने वाली खुशबू

    लेकिन जब उसे फैजान का रूह को छूना याद आ रहा था तो उसके माथे की नशे तन जाया कर रही थी।

    अभी यारम सिगरेट का कश ले ही रहा था की उसे सामने फारूखी हवेली की छत पर कोई बारिश में भीगता हुआ नज़र आया उसे समझने में देर नहीं लगी की ये शख्स कौन है।

    चेहरे में तेरे
    खुद को मैं ढूँढू
    आँखों के दरमियाँ
    तू अब है इस तरह
    ख़्वाबों को भी जगह ना मिले

    यारम अपने कमरे में जाकर एक एडवांस दूरबीन ले आया और उसी डायरेक्शन में देखने लगा उसे खुद ही नहीं पता था की वो ऐसा क्यूं कर रहा है।

    ये मौसम की बारिश
    ये बारिश का पानी
    ये पानी की बूँदें
    तुझे ही तो ढूँढें
    ये मिलने की ख्वाहिश
    ये ख्वाहिश पुरानी
    हो पूरी तुझी से
    मेरी ये कहानी

    रूह अपनी ही धुन में मदहोश बरसती हुई बारिश की बूंदों के बिच अपने दोनों हाथ फैलाकर उन्हें मेहसूस कर रही थी और उसकी इन सारी हरकतों को देखता हुआ यारम अपने दिल में उठ रहे एहसासों से घिरा हुआ था।

    कभी तुझसे उतरूं
    तो साँसों से गुजरूँ
    तो आये
    दिल को राहत
    मैं हूँ बेठिकाना
    पनाह मुझको पाना है
    तुझमें दे इजाज़त
    ना कोई दरमियाँ
    हम दोनों हैं यहाँ
    फिर क्यूँ है तू बता
    फासले

    रूह ने जो कुर्ती और पैजामा पहना हुआ था वो भी उसके बदन से चिपककर उसके हर एक कर्व को बखूबी दिखा रहा था।

    वो इस वक्त यारम को किसी रैन ब्यूटी से कम नहीं लग रही थी। उसके खुले गीले काले सियाह बाल जो उसके चेहरे और कंधों से होते हुए उसकी पुरी पीठ पर चिपके हुए थे

    इन सब में वो खुबसूरत हसीना यारम के दिल में कहर ढा रही थी।

    ये मौसम की बारिश
    ये बारिश का पानी
    ये पानी की बूँदें
    तुझे ही तो ढूँढें
    ये मिलने की ख्वाहिश
    ये ख्वाहिश पुरानी
    हो पूरी तुझी से
    मेरी ये कहानी
    हवाओं से तेरा
    पता पूछता हूँ
    अब तो आजा
    तू कहीं से
    परिंदों की तरह
    ये दिल है सफ़र में
    तू मिला दे
    ज़िन्दगी से

    रूह को ऐसा लग रहा था की जैसे कोई तपिश भरी निगाहें उसे ही देख रही हो।

    रूह ने अपने चारों ओर नज़रे घुमा कर देखा तो उसे दूर दूर तक कोई नज़र नहीं आया।

    क्यूंकि यारम उसके देखने से पहले ही छुप गया था।

    आज ज़िंदगी में पहली बार यारम किसी से छुपा हुआ था। लेकिन वो अब तक ये ख़ुद ही नहीं समझ पाया था की आख़िर ऐसा वो कर ही क्यूं रहा है।

    बस इतनी इल्तेज़ा
    तू आके इक दफ़ा
    जो दिल ने ना कहा
    जान ले
    ये मौसम की बारिश
    ये बारिश का पानी
    ये पानी की बूँदें
    तुझे ही तो ढूँढें
    ये मिलने की ख्वाहिश
    ये ख्वाहिश पुरानी
    हो पूरी तुझी से
    मेरी ये कहानी

    रूह ने एक नज़ाकत के साथ अपनें एक तरफ़ किए हुए बालों को झटका और गुनगुनाते हुए अपने कमरे में चली गई।

    रूह के जाते ही यारम को ऐसा लगा जैसे उसकी सांसे ही अब रुक जाएगी वो उसे थोड़ी देर और देखना चाहता था मगर क्यूं? किस हक़ से? ये सवाल उसके ज़हन को छलनी कर रहा था।

    "मुझे ये तो नहीं पता Dove की तुममें ऐसा क्या है जो मुझे अपने करीब खींच रहा है। लेकिन अब यारम इस करीबी को मेहसूस करना चाहता है।

    मेरे इस दिल ने (अपनी दिल वाली जगह पर प्वाइंट करके) आज तक कभी किसी लड़की के कुछ महसूस नहीं किया मगर पता नहीं क्यूं तुम्हें देखने के बाद ये धड़कने लगा है जिसकी हर धड़कन अब तुम्हारा ही ज़िक्र करती है।

    मुझे अब तुम हर हाल में अपनी ज़िंदगी में चाहिए। तुम अब से रूह फारूखी नहीं बल्कि यारम काज़मी की मिल्कियत हो।

    जिसपर सिर्फ़ यारम काज़मी का हक़ है। तुम्हें देखने छूने मेहसूस करने और अपने पास रखने का हक़ सिर्फ़ मेरा है।" यारम ने जिस सनक से कहा इस वक्त वो किसी साइको से कम नहीं लग रहा था।

    जिसके आंखों में रूह को पाने का ज़िद और जुनून साफ़ देखा जा सकता था।

    अपने कमरे में नींद के आगोश में सोई हुई रूह है इस बात से अंजान की आने वाला वक्त हर दिन उसकी ज़िंदगी बदलने वाला है।

     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     

  • 11. Junooniyat - Chapter 11

    Words: 1639

    Estimated Reading Time: 10 min

     
     
    अब आगे 
     
    फारूखी हवेली 
     
    अगली सुबह रूह की नींद उसके mobile की रिंग से खुली रूह ने नींद में ही आंखें बन्द किए कॉल उठाया

    "हेलो" रूह ने अलसाई आवाज़ में कहा
    "अस्लामो अलैकुम मेरी फ्यूचर शरीक ए हयात (वुड बी वाइफ)" दुसरी तरह से किसी की अट्रैक्टिव मेनली वॉइस सुन रूह की नींद झटके से गायब हो गई।

    "वालेकुम अस्सलाम आप कहा थे कल से ? आप जानते भी है मैं आपको कितना कॉल कर रही थी जाइए मुझे आपसे बात नहीं करनी और आपकी फ्यूचर शरीक ए हयात मैं नहीं आपकी नौकरी है" रूह ने मुंह बनाते हुए कहा तो दूसरी तरफ़ फारस हसने लगा।

    रूह उसकी हसी सुन बुरी तरह चिढ़ गई।

    "क्या हुआ जान आप ऐसे गुस्सा क्यू हो रही है?" फारस ने अपनी मुस्कुराहट छुपाए हुए कहा

    "कुछ नहीं बस कल आपसे बात करनी थी मन कर रहा था आपकी आवाज़ सुनने को" रूह ने पिछली रात की बात फारस से छुपाते हुए कहा

    "अच्छा तो मेरी जान को मेरी याद आ रही है। मैं तो कहूंगा तुम दो चार दिन और वहां रुककर ही आओ क्यूंकि मैं नेक्स्ट मंथ मामू जान से बात करके हमारा निकाह कुछ ही महीनों में करने का बोलने वाला हूं इसलिए तुम्हें अगर वहां रुकना है तो रुक सकती हो"

    "क्या पता हम हमेशा के लिए यहीं रुक जाए और कभी वापस ही न आए" इतना बोलकर रूह हसने लगीं तो वहीं फारस का दिल धक्क से रह गया।

    "खबरदार रूह अगर तुमने आइंदा से ऐसे बकवास बात की तो हम जो चीज़ सपने में भी होने का नहीं सोच सकते तुम ऐसा बोल भी कैसे सकती हो" फारस की सीरियस वॉइस सुन रूह की हसी तुरन्त रफू चक्कर हो गई।

    "अरे अरे अफ़सर साहब हम तो सिर्फ़ मज़ाक ही कर रहें थे आप इतना सीरियस क्यूं हो रहे हो" रूह ने फारस का मुड लाइट करते हुए कहा लेकिन अब तो उसका मूड रूह की बात सुनकर ही ख़राब हो चुका था।

    फारस भी रूह से थोड़ी देर बाद कॉल में बात करने का बोल कॉल रख दिया।

    "ये फारस भी न! मज़ाक को भला कौन इतना सीरियसली लेता है" रूह ने अपनें मोबाइल स्क्रीन की ओर देखते हुए कहा और उठकर बाथरूम में फ्रेश होने चली गई।

    क़ाजमी पैलेस 

    सारे घर वाले डाइनिंग टेबल पर बैठकर नाश्ता कर रहे थे के तभी नाईला बी को नाजिया बी ने कुछ इशारा किया तो उन्होंने अपनी पलकें झपका दी।

    "मैं ये सोच रही थी अब तो यारम भी भोपाल वापस आ गए है तो क्यू न हम अब हया और यारम की मंगनी करवा दे और उसके कुछ दिनों बाद निकाह" दादी नायला बी ने शाहमीर साहब की ओर देखते हुए कहा तो शाहमीर साहब के चेहरे पर नागवारी के तासुरात बिखर गए।

    शाहमीर साहब और उनके मरहूम बेटे शदाब काजमी (यारम के अब्बू) की दिली ख्वाहिशात थी की यारम का निकाह रूह से हो।

    जब नायला बी हो शाहमीर साहब और अपने बेटे की इस ख्वाहिश का पता चला तो उन्होंने खाने पीने से दूरी बना ली और बुरी तरह ख़ुद को बीमार कर लिया था मजबूरन शाहमीर साहब और शदाब हदीद की ये ख्वाहीश ख्वाहिश ही रह गई जिसका पता आज तक उस घर में उन तीनों के अलावा किसी को नहीं चला।

    असल में रूह की अम्मी सामिया बी शाहमीर साहब के दोस्त की बेटी थी। अपनें दोस्त के इंतेकाल के बाद जब सामिया बी और उनकी अम्मी को उनके ससुराल वालों ने दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर कर दिया था तब शाहमीर साहब उन दोनों को ही काजमी पैलेस ले आए।

    लेकिन सामिया बी की अम्मी भी अपने स्वाभिमान की पक्की औरत थी वो काजमी पैलेस में रहने और खाने के बदले यहां खाना बनाने का काम करती थी।

    शाहमीर साहब उन्हें अपनी भाभी जान का मुकाम दिए थे मगर सामिया बी की अम्मी ने कभी अपने आपको काजमी पैलेस के सर्वेंट्स से कम नहीं समझा जो उनकी अना (इज़्जत) के लिए सही भी था।

    लेकिन नायला बी उन्हें कभी पसन्द नहीं करतीं थी वो हमेशा शाहमीर साहब की गैरमौजूदगी में उन्हें परेशान करना और सबके सामने इनकी इंसल्ट करती थी।

    क्युकी वो नायला बी से ज़्यादा हसीन और जवां थी इसलिए नायला बी को हमेशा डर लगा रहता था की कहीं वो शाहमीर साहब को अपने हुस्न के जाल में ना फसा ले।

    लेकिन उनका ये डर तब खत्म हुआ जब एक दिन सामिया बी की अम्मी का है हार्टअटैक से इंतेकाल हो गया।

    तब सामिया बी की उम्र महज़ 10 साल थी। उस दिन के बाद से शाहमीर साहब ने सामिया बी को अपनी बेटी की तरह पाला क्यूंकि उनकी ख़ुद की कोई बेटी नहीं थी।

    लेकिन नायला बी की परेशानियां तब बढ़ गई जब सामिया बी के सत्रह साल होते ही उन्होंने सामिया बी और अपने बड़े बेटे शादाब के निकाह की ख्वाहिशात ज़ाहिर की।

    नायला बी जिस औरत को देखना भी गवारा नहीं करती थी तो वो उसकी बेटी जिसका कोई ऊंचा खानदान भी नहीं था भला उससे अपने बेटे की शादी थोड़े ही होने देती।

    वहीं शादाब काजमी भी सामिया बी के खुबसूरती के कायल थे और उन्होंने ही अपनें अब्बू से सामिया बी के साथ निकाह की ख्वाहिश जाहिर की थी।

    जब नायला बी को इस बारे में पता चला तो उन्होंने घर में कोहराम मचा दिया और सामिया बी को अकेले में खूब बुरा भला कहा यहां तक की उन्हें अहसान फरामोश, लड़को को अपने हुस्न के जाल में फसाने वाली, मनहूस बेगैरत और न जानें क्या क्या नामों से नवाजा जिससे सामिया बी का दिल हज़ार टुकड़ों में बट गया।

    भला उन्होंने तो कभी शादाब हदीद को नज़र उठाकर देखा भी नहीं था तो वो कैसे उस पर इतना घाटियां इल्ज़ाम लगा सकती थी।

    इसका अंजाम ये हुआ की सामिया बी ने ख़ुद ही निकाह से मना कर दिया। मजबूरन शाहमीर साहब ने अपनें भाई की बेटी ताहिरा से शादाब का निकाह करवा दिया।

    जिससे शादाब बिलकुल भी ख़ुश नहीं थे। लेकिन ताहिरा बी अच्छी खातून थी इसलिए चंद दिनों में ही उन्होंने उन्हें एक्सेप्ट कर लिया।

    वहीं शाहमीर साहब के दोस्त कमाल फारूखी जिनकी हवेली काजमी पैलेस के सामने ही थी उनके बेटे अज़ीज़ फारूखी जो सालो बाद अपनी पढ़ाई कंप्लीट कर लखनऊ से भोपाल आए थे जब उन्होंने शादाब काजमी के निकाह में सामिया बी को देखा तो वो उस पर से अपनी नज़रे भी ना हटा पाए।


    जब उन्होंने अपनी दिल की बात कमाल फारूखी को बताई तो वो भी बहुत ज़्यादा खुश हो गए क्योंकि उन्हें सामिया बी पहले से ही अपने बेटे के लिए पसन्द थी।


    इसलिए उन्होंने उसे बहाना बनाकर लखनऊ से भोपाल बुलाया, वो जानते थे की सामिया बी की मासूमियत किसी को भी अपना कायल कर सकती है।

    कमाल फारूखी ने जब शाहमीर काजमी से सामिया बी का हाथ मांगा तो वो तो मना करना चाहते थे क्यूंकि वो चाहते थे की सामिया का निकाह भले ही शादाब से ना सही लेकिन उनके अपने छोटे बेटे हन्नान से हो जाए लेकिन वो जानते थे की नायला बी कभी ऐसा होने नहीं देंगी और अगर इस बार उन्होंने ज़िद करके भी उनका निकाह हन्नान से करवा दिया तो नायला बी उसकी ज़िंदगी जहन्नुम बना देंगी। 

    अज़ीज़ फारूखी पढ़ा लिखा अच्छी शख्सियत का नौजवान था इसलिए शाहमीर साहब ने सामिया से उसकी मर्ज़ी का पूछ कमाल फारूखी को हा बोल दिया जिसके बाद कुछ ही दिनों में अज़ीज़ फारूखी और सामिया बी का निकाह हो गया।

    भले ही नायला बी इस बात से खुश नहीं थी की फारूखी फेमिली जैसी नामी फैमिली में सामिया जैसी यतीम और फटीचर लड़की का निकाह कैसे हो गया लेकिन को खुश थी की कम से कम उनके बेटों का तो उस बला से पीछा छूटा।

    जल्द ही उन्होंने अपनें छोटे बेटे हन्नान हदीद का निकाह अपनी बहन की बेटी नाजिया से करवा दिया।

    नायला बी ने ताहिरा बी के मन में हमेशा सामिया बी के खिलाफ़ ज़हर भरा की कैसे वो उसके शौहर को अपने हुस्न के जाल में फसाना चाहती थी। इसका असर ये हुआ की ताहिरा बी भी सामिया बी को नापसंद करने लगी।

    नायला बी के साथ ताहिरा बी और नाजिया बी की सामिया बी से बेरुखी का असर ये हुआ की सामिया बी ने काजमी पैलेस आना लगभग बंद ही कर दिया अब वो किसी ख़ास मौके पर ही वहा आया करती थी वो भी चंद मिनटों के लिए ही।

    जब शादी के कई सालों बाद भी सामिया बी की कोई औलाद नहीं हुई तो नायला बी अक्सर कमाल फारूखी और अज़ीज़ फारूखी को अज़ीज़ के दुसरे निकाह के लिए सजेस्ट करती थी जिसे वो दोनों ही साफ़ साफ़ मना कर देते थे। 

    असल में नायला बी और नाजिया दोनों ही नाजिया बी की छोटी बहन नजमा से अज़ीज़ फारूखी का निकाह करवाना चाहती थी ताकी वो भी उनकी नज़र के सामने ही रहे लेकिन उनके इरादों पर पानी फेरते हुए कमाल फारूखी और अज़ीज़ फारूखी हमेशा सामिया को तलाक देने वाली बात को नकार देते थे।

    कई बार सामिया बी ने भी अज़ीज़ फारूखी के दूसरे निकाह की बात कमाल फारूखी और अज़ीज़ फारूखी से की लेकिन वो इस बात को सुनकर सामिया को ही डांट लगा देते थे।

    ख़ुद के लिए अपने शौहर और अपने अब्बू की तरह ससुर का प्यार देख सामिया बी अक्सर रब का शुकराना करती थी और अपने लिए एक नेक औलाद की दुआ करती थी।


    लेकिन कहते है न रब के यहां देर है लेकिन अंधेर नहीं तो ऐसा ही हुआ शादी के दस साल बाद बहुत सारी दुवावो और मन्नतों के बाद सामिया बी की कोख से रूह की पैदाइश हुई जिसकी खुशी में कमाल फारूखी ने कितने ही दिनों तक गरीबों में खाना तकसीम किया। 

    Back to the story......

    वहीं जब यारम ने अपनी दादी के मुंह से अपनी और हया के सगाई और निकाह की बात सुनी उसके खाते हुए हाथ रुक गए और उसकी पकड़ अपने स्पून पर कस गई।


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  • 12. Junooniyat - Chapter 12

    Words: 1161

    Estimated Reading Time: 7 min

     
     
    अब आगे 
     
    "दादी जान मेरा अभी ऐसा कोई इरादा नहीं है तो आप सब इस टॉपिक पर बात करना बंद कीजिए" यारम ने सपाट लहज़े में कहा 

    यारम की बात सुनकर हया और नाजिया बी का चेहरा लटक गया। 

    "ऐसे कैसे यारम क्या आप जानते नहीं की दो दिन बाद ही हया 25 की हो जाएंगी और हमारे यहां इतने उम्र में लड़कियों के बच्चे भी हों जाते है वैसे भी तुम्हारी भी शादी की उम्र हो गई है" दादी जान ने इस बार कड़े लहज़े से कहा तो यारम ने अपने जबड़े भींच लिए।

    "हा यारम अम्मी जान सही कह रही है तुम्हें अब हया से निकाह कर लेनी चाहिए" ताहिरा बी ने नायला बी को सपोर्ट करते हुए कहा तो नाजिया बी के चेहरे पर शातिर मुस्कुराहट तैर गई 

    "अगर आपको लगता है की मेरी वजह से हया के शादी की उम्र निकलती जा रही है तो आप उसकी शादी किसी और लड़के से करवा सकती है और मेरा यकीन मानिए मुझे इस बात का रत्ती भर भी बुरा नहीं लगेगा" यारम ने टिश्यू से अपने होठों को साफ़ करते हुए कहा तो सबके चहरे का रंग ही उड़ गया।

    यारम की बात सुनकर नाजिया बी का चेहरा काला पड़ गया उन्होंने अपनें बगल में आराम से नाश्ता कर रहें अपनें शौहर हन्नान को देखा उनके एक्सप्रेशन ऐसे थे मानों उन्हें इस बात से ज़रा भी फ़र्क नहीं पड़ा हो।

    "यारम आप ऐसा कैसे बोल सकते है आप जानते है न हमारे घर का रिवाज़ है की हम अपने बच्चों की शादी खानदान में ही करते है तो आप इस रिवाज़ को दरकिनार करने के बारे में सोच भी कैसे सकते है" नायला बी ने अपनें एक एक अल्फाजों पर ज़ोर देते हुए कहा 

    पता नहीं क्यूं लेकिन खानदान में ही शादी की बात सुनकर यारम के आंखों के सामने अनायास ही रूह का चेहरा आ गया।

    "आप फिकर मत कीजिए दादी जान हमारा निकाह खानदान की ही लड़की से होगा" यारम ने खोए हुए लहज़े से कहा तो हानी के चेहरे पर मुस्कुराहट तैर गई

    वहीं यारम की बात सुनकर ताहिरा बी नाजिया बी और नायला बी के चेहरे पर भी सुकुन भरे एक्सप्रेशन आ गए।

    उन सब ने यारम के बोलने का मतलब हया से लगाया था। लेकिन यहीं उन सबकी सबसे बड़ी भुल साबित होने वाली थी।

    "अगर यारम अभी निकाह नहीं करना चाहते तो अब कोई भी उनसे इस मसले पर बात नहीं करेगा सब ख़ामोशी से नाश्ता करें।" शाहमीर साहब की कड़क आवाज़ सुन सब शांत हो गए।

    वहीं दूसरी ओर हयात के घर के बाहर अपनी कार से टेक लगाकर रूह हयात का इंतज़ार कर रही थी तभी उस बंगले के अन्दर से हयात हड़बड़ाते आई 



                                 रूह फारूखी

    "सॉरी सॉरी यार बस इत्तू सा लेट हो गई" हयात ने अपनें दोनों घुटनो पर हाथ रखते हुए कहा

    "हां वो तो तू मुझे बता ही मत! पूरे आधे घण्टे लेट आई है तू" रूह ने आई रोल करते हुए कहा और बैक सीट का दरवाज़ा खोलकर अंदर बैठ गई।



                                  हयात

    हयात भी उसके बगल की पैसेंजर सीट पर आकर बैठ गई और वहा से शॉपिंग मॉल की ओर चली गई।

    वहीं दूसरी ओर काज़मी पैलेस में अपने कमरे में पेन को अपने उंगलियों पर घूमती हुई कुबरा किसी के ख्यालों में गुम थी।

    मरीज ए मोहब्ब्त हूं, इक तेरा दीदार काफ़ी है
    हर एक दवा से बेहतर, निगाह ए यार काफ़ी है!!!
    कुबरा ने ख्यालों में खोए हुए ही अर्ज़ किया।

    इसी के साथ उसके आंखों के सामने एक हसीन नौजवान का चेहरा आ गया जो किसी लड़की को हाथ बढ़ाकर उसे उसे ऊपर की ओर खींच रहा था।

    तेज़ बारिश में वो लड़की चट्टान से नीचे फिसल गई थी जिसे वो लड़का बचा रहा था। उस लड़के की उम्र क़रीब 23 साल रही होगी। उस लड़की को बचाते हुए उस लड़के के हाथ नुकीले पत्थरों से छिल गए थे। 

    उस लड़के ने बड़ी मुश्किल से उस लड़की को ऊपर खींचा और वहीं पर पीछे की ओर हाथ टिकाए आधा लेट गया।
    "शुक्र है अल्लाह का तुम बच गई" उस लड़के ने आंखें बन्द करते हुए कहा तो वो लड़की अपनी आंखें बड़ी बड़ी कर उसे देखने लगी।

    "शुक्रिया आपका आपने मुझे बचा लिया" उस लड़की ने अपने सिर पर दुप्पटा रखते हुए कहा तो वो लड़का उसे आँखें छोटी कर देखने लगा।

    "क्या तुम पागल हो जो इतनी बरसात में इतनी खतरनाक जगह आ गई। छोटी बच्ची तो नहीं लगती 19-20 की तो लगती ही हो" उस लड़के ने थोड़ा झुंझलाते हुए कहा तो उस लड़की की निगाह शर्म से नीची हो गई।

    इससे पहले की वो लड़की उस लड़के से उसका नाम पूछती वहा उस लड़की के कैंप वाले उसे ढूंढते हुए आ गए जिन्हें देख वो लड़का भी उसे अल्लाह हाफिज बोल वहा से चला गया।

    उस मंज़र को याद करती कुबरा के होठों पर इस वक्त बेशकीमती स्माइल थी।

    "पुरे एक साल हो गए आपको मसूरी में देखे हुए पता नहीं अब ये इंतज़ार और कितने दिनों का और होगा" कुबरा ने सफ़ेद कागज़ पर नज़्म लिखते हुए कहा 

    वही दूसरी मॉल में रूह और हयात ने ढेर सारी शॉपिंग कर ली थी और वो दोनों मॉल में बने एक रेस्टोरेंट में बैठे जंक फ़ूड खा रहे थे।

    "यार तू मेरा वेट कर मैं वॉशरूम से आती हू" रूह ने अपनी चेयर से उठते हुए कहा 

    अभी वो कैफे से बाहर ही आई थी की वो किसी से टकरा गई। रूह उस शख़्स को सॉरी बोल वहा से आगे बढ़ गई।

    वही अपने कॉल पर बात कर रहे शख़्स ने जब जानी पहचानी आवाज़ सुनी तो उसने मुड़कर पीछे की ओर देखा जहां उसे कोई नहीं दिखाई दिया।

    वो शख़्स अपनी एमरल्ड ग्रीन आंखों से चारों ओर देखने लगा तभी अपने असिस्टेंट सोहेल की आवाज़ से वो होश में आया "सर फिफ्थ फ्लोर" उस शख़्स यानी यारम ने हम्मम कहा और लिफ्ट की ओर बढ़ गया।

    जब एक घंटे बाद भी रूह वापस नहीं आई तो किसी अनहोनी के डर से हयात के चेहरे पार परेशानी तारी हो गई वो अपना सामान वहीं छोड़ बॉथरूम की ओर बढ़ गई।

    कुछ ही मिनटों में हयात ने पुरा मॉल छान मारा लेकिन उसे रूह कहीं नहीं मिली। रूह का नंबर भी नॉट रिचेबल बता रहा था। अब हयात की आंखों में आंसू आ गए।

    तभी उसने कुछ लोगों की बाते सुनी "यार ये लिफ्ट एक घंटे से एक ही जगह अटकी हुई है सबको कितनी परेशानी हो रही हैं" एक आदमी को शायद वहा किसी शॉप का मालिक था वो दूसरे आदमी से बोला तो हयात का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

    हयात दौड़ते हुए उनके करीब आई उस लिफ्ट के अन्दर आवाज़ देने लगी। "रूह क्या तू अन्दर है? प्लीज़ रिप्लाई दे यार। रूह" हयात ने लगभग रो देने वाली आवाज़ में कहा 

    वहीं दुसरी ओर यारम जो अपनी मीटिंग ओवर कर वही से गुज़र रहा था जब उसने किसी के मुंह से रूह का नाम सुना तो उसके क़दम वहीं ठहर गए।

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  • 13. Junooniyat - Chapter 13

    Words: 1074

    Estimated Reading Time: 7 min

     
     
    अब आगे 
     
     
    यारम ने उस ओर देखा तो उसे हयात नज़र आई। वो हयात को अच्छी तरह से जानता था। ये लड़की उसके पड़ोस में ही रहती है और ये अक्सर बचपन में रूह के साथ उसके घर भी आया करती थी कुबरा के साथ खेलने के लिए।

    यारम जब हयात के क़रीब आया तो वो बुरी तरह रो रही थी। जिसे देख यारम के माथे पर भी बल पड़ गया।

    यारम वहा मौजूद मॉल स्टॉफ के ऊपर बुरी तरह गुर्राया तो वो सभी मकैनिक को बुलवाकर जल्दी लिफ्ट को ठीक कराने लगे।

    क़रीब दस मिनट बाद जब लिफ्ट का दरवाज़ा खुला तो सबकी आंखें फटी की फटी रह गई। लिफ्ट के एक कोने में रूह फ्लोर पर बेजान से पड़ी हुई थी मानों उसमें कोई जान ही ना हो।

    हयात उसे देख बुरी तरह घबरा गई और दौड़कर उसके करीब चली गई वहीं यारम को तो ऐसा लगा मानों किसी ने उसका दिल निकाल कर उसके हथेली पर ही रख दिया हो।

    यारम दो सेकेंड बाद अपने सेंस में आया और सारी भीड़ को साइड कर बिना किसी देरी के रूह को अपनें बाहों में उठाए वहा से तेज़ी से निकल गया।

    हयात भी यारम के पिछे पिछे चली गई क्यूंकि वो जानती थी की रूह यारम रिलेटिव है इसलिए उसे यारम के ऐसे बिहेवियर से कोई फ़र्क नहीं पड़ा।

    यारम रूह को लेकर कार की बैक सीट पर बैठ गया तो हयात भी ड्राइव कर रहे सोहेल के बगल की पैसेंजर सीट पर बैठ गई।

    अगर ये किसी नॉर्मल डे होता तो यारम हयात के इस डेयरिंग हरकत पर उसे ज़रूर फटकार लगाता लेकिन वो ये भी जानता था की हयात का अभी उसके साथ चलना ज़रूरी भी है।

    थोड़ी ही देर में उनकी कार दिल्ली के एक बहुत बड़े हॉस्पिटल के सामने आकार रूकी। सोहेल ने पहले ही एक पुरा फ्लोर रूह के लिए खाली करवा दिया था।

    यारम रूह को बाहों में उठाए हॉस्पिटल के अन्दर चला गया। क्यूंकि वो पूरा फ्लोर यारम के लिए खाली कराया गया था इस वजह से किसी ने भी यारम को एक लड़की को बाहों में उठाए नहीं देखा। वरना देखने वालों को heartattack जरूर आ जाना था।

    इस वक्त यारम के चेहरे पर परेशानी साफ़ देखी जा सकती थी। जिसे देख हयात को भी काफ़ी अजीब लगा उसने आज तक यारम के चहरे पर किसी के लिए भी फिक्र या परेशानी के एक्सप्रेशन नहीं देखे थे।

    लेकिन जल्द ही उसने अपनें ख्यालों को झटका और रूह की सलामती के लिए दुआ करने लगी।

    डॉक्टर्स ने रूह की कंडीशन देखी तो उसे तुरन्त इमरजेंसी में एडमिट कर दिया। यारम वार्ड के बाहर ही डॉक्टर्स के बाहर आने का इंतज़ार करने लगा।

    जब उसने हयात की ओर देखा तो वो वहा रखी वेटिंग चेयर पर बैठ तसवीह पढ़ रही थी। यारम ने अपनें असिस्टेंट सोहेल को कुछ इशारा किया तो उसने तुरन्त हां में अपना सिर हिला दिया।

    "मिस हयात आप चाहें तो घर जा सकती है" सोहेल ने politely कहा तो हयात के चेहरे पर नगावरी वाले तासुरात बिखर गए।

    "आर यू आउट ऑफ़ योर माइंड यहां मेरी बहन से भी ज़्यादा अज़ीज़ दोस्त इतनी क्रिटिकल कंडीशन में है और आप मुझे घर जानें की हिदायत दे रहे है" हयात ने चिढ़ते हुए कहा तो सोहेल का मुंह बन गया।

    "ठीक है आपको अगर यहां रुकना है तो बेशक रुकिए मगर यहां की इनफॉर्मेशन बाहर लीक्ड नहीं होनी चाहिए" सोहेल ने सपाट लहज़े में कहा तो हयात की नज़रे तीखी हो गई।

    "शुक्रिया आपने बता दिया वर्ना मैं तो कल के न्यूजपेपर में इस ख़बर का इस्तेहार दे देती" हयात ने सार्केस्टिकली कहा तो सोहेल की भौंहे तन गई।



                             सोहेल & हयात ❤️‍🔥

    "क्या इस लड़की को किसी सवाल का सीधा सीधा ज़वाब देना नहीं आता" सोहेल ने मन ही मन सोचा तो अपना सर झटक कर वहा से चला गया। अब वो और इस मुंहफट लड़की के मुंह नहीं लग सकता था।


    थोड़ी देर बाद इमरजेंसी रूम का दरवाज़ा खुला और डॉक्टर मेनका उस रूम से बाहर आई।

    "सर अभी पेसेन्ट की कंडीशन नॉर्मल है शाम तक उन्हें होश आ जाएगा। आप चाहें तो उनसे मिल सकते है लेकिन अभी वो मेडिसिन की वजह से बेहोश है" Dr मेनका ने कहा और वहां से चली गई।

    "अलहम्दुलिल्लाह" हयात ने अपने चेहरे पर हाथ फेरते हुए कहा और उठकर इमरजेंसी रूम की ओर चली गई।

    हयात ने पेशेंट बेड पर लेटी रूह को देखा जिसके एक हाथ पर ड्रिप लगी हुई थी।

    थोड़ी देर रूह के पास बैठकर हयात कमरे से बाहर निकल गई। वो अब बाहर बैठकर रूह के होश में आने का इंतज़ार ही कर सकती थी। 

    हयात के बाहर जाते ही यारम जो अभी तक ऑनलाइन मीटिंग अटेंड कर रहा था वो अपनी मीटिंग ओवर कर रूह के कमरे में आ गया।

    यारम ने रूह का मुरझाया हुआ चेहरा देखा जो की पीला पड़ा हुआ था लेकिन वो इस वक्त भी बेहद खुबसूरत ही दिख रही थी। यारम एक स्टूल लेकर रूह के क़रीब बैठ गया।

    वो एक टक रूह के मासूम चेहरे को देख रहा था। वो अपनें अन्दर अजीब सी फीलिंग को मेहसूस कर रहा था। वो चाहता था की रूह जल्दी से होश में आ जाए और वो ये भी चाहता था की वो उससे दूर भी ना जाए।

    अपने जज्बातों में उलझे यारम ने अपनें दो उंगलियों से रूह के चहरे पर आए बालों को हटा दिया।

    तभी उसे रूह की पलके फड़फड़ाती हुई दिखाई दी। रूह को जागते देख यारम ने अपनें हाथ को पीछे की ओर खींच लिया।

    रूह ने अपनी अधखुली आंखों से यारम की ओर देखा और उसके चेहरे पर प्यारी सी स्माइल आ गई।

    उसे इस तरह मुसकुराते देख यारम को अजीब से फीलिंग्स ने घेर लिया। 

    "मुझे पता था आप ज़रूर आओगे। आप मूझसे ज़्यादा वक्त तक नाराज़ नहीं रह सकते। आई लव यू" रूह ने अपनी तारों की तरह चमकदार आंखों को टिमटिमाते हुए कहा और यारम के एक हाथ को पकड़ दोबारा सो गई।

    वहीं यारम ने जब रूह के मुंह से ख़ुद के लिए ऐसे प्यार भरे अल्फाज़ सुने तो वो तो अपनी जगह बर्फ़ की तरह जम सा गया।

    उसे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था की वो रिएक्ट करे तो करे क्या लेकिन उसे अपनें दिल में रूह की बाते सुन खुशी हो रही थी। 

    "अब मैं जल्द ही हमारे बिच के फासले को मिटा दूंगा Dove बस कुछ दिनों का इंतज़ार और तुम मेरी बाहों में होगी वो भी पूरे हक़ से" यारम ने इतना बोल रूह के माथे को चूम लिया।

  • 14. Junooniyat - Chapter 14

    Words: 1518

    Estimated Reading Time: 10 min

    अब आगे करीब रात के आठ बजे रूह की नींद खुली। रूह ने जब छत की सीलिंग को देखा तो उसने एक दो बार अपने आंखों को मला। रूह ने नज़रे घुमा कर देखा तो उसे उस वार्ड में रखे सोफे पर हयात बैठी नज़र आईं जो शायद बैठे हुए ही सो चुकी थी। रूह को समझने में देर नहीं लगीं की वो इस वक्त हॉस्पिटल के किसी रूम में है।  रूह फारुखी रूह ने याद किया की कैसे वो वॉशरूम से वापस लौट रहीं थी की लिफ्ट अचानक ही बंद हो गई। उसके मोबाइल पे नेटवर्क भी नहीं आ रहा था की वो किसी को कॉल कर पाती। घुटन और घबराहट से वो लिफ्ट में बेहोश हो गईं थी। ये सब याद कर वो एक बार को डर से कांप गई। रूह ने सामने घड़ी पर टाईम देखा तो उसकी आंखें हैरानी से बड़ी हों गई। उसने बड़े ही एहतियात से ड्रिप को निकाला और हयात के पास जाकर उसे उठाने लगी। "अरे यार सोने दे न" हयात ने अलसाई हुई आवाज़ में कहा तो रूह ने उसे झकझोर कर उठा दिया। "क्या हुआ यार सोने" अभी हयात ने इतना ही कहा था की रूह को अपनें सामने देख उसकी नींद एक सेकेंड में ही गायब हो गई। "अरे यार तू होश में आ गई" इतना बोल उसने रूह को कस कर गले लगा लिया। "हां वो सब तो ठीक है लेकिन तूने घर वालों को तो बताया है क्या आज के बारे में?" रूह की सवाल सुन हयात का मुंह बन गया। "क्या यार क्या सबको मैं मोहल्ले की चुगलखोर आंटी लगती हूं जो सबको लगता है मैं बात को इधर से उधर कर दूंगी" हयात ने मुंह फुलाते हुए कहा "सबको मतलब? और किसने तुझसे ऐसा कहा" "तेरे उस बीस्ट ने" हयात ने तपाक से कहा तभी उसे समझ आया की अभी उसने क्या कहा हयात ने तुरन्त अपने मुंह पर हाथ रख दिया और अपनी आंखें बड़ी बड़ी कर आस पास देखने लगी की किसी ने उसकी बात ना सुनी हो। वहीं हयात का जवाब सुन रूह को तो मानों सांप सूंघ गया। "क क्या तू मेरे पड़ोस में रहने वाले बीस्ट की बात कर रही है?" रूह ने अटकते हुए कहा तो हयात ने बेचारगी से हां में अपना सिर हिला दिया। "क्या वो बीस्ट मुझे यहां लेकर आया है?" रूह ने रोनी सी सूरत बनाते हुए कहा तो हयात ने हां में अपना सिर हिला दिया। "चल जल्दी यहां से इससे पहले की वो यहा आकार हमें लेक्चर दे हमें यहां से भागना ही होगा" रूह ने हयात का हाथ पकड़ कर ऐसे कहा मानों वो किसी दुश्मन के कैंप में फस गई हो। हयात भी रूह की हड़बड़ाहट बखूबी समझती थी इसलिए वो भी अपनी जगह से खड़ी हो गईं। रूह और हयात यारम और उसके गार्ड्स से छुपते छुपाते उस हॉस्पिटल से बाहर आ गए। उन्होंने उन सबको धोखा देने के लिए चेहरे पर मास्क और ग्रीन कलर की ऑपरेशन थिएटर यूनिफॉर्म भी पहन ली थी। जिसमें देखने वालों को भी उन पर शक नहीं हुआ। उन दोनों के हॉस्पिटल से निकलने के करीब दस मिनट बाद सोहेल ने उस कमरे के अंदर बाहर लगीं कांच की खिड़की से देखा तो वहा उसे पेशेंट बेड और सोफ़ा दोनों ही खाली दिखा। सोहेल ने कमरे में आकर वॉशरूम भी चेक किया लेकिन उसे हयात और रूह कहीं नज़र नहीं आई। अब सोहेल के माथे पर पसीना आ गया। उसे डर था की जब यारम को इस बारे में पता चलेगा तो पता नहीं वो कैसे रिएक्ट करेगा। लेकिन उसे इस न्यूज़ को यारम तक पहुंचाना ही था वरना उसकी खैर नहीं थी। सोहेल ने डरते हुए दूसरे कमरे में बैठे सिकंदर का डोर नॉक कर कमरे में एंटर हुआ। यारम ने जब सोहेल का परेशान चेहरा देखा तो उसके माथे पर बल पड़ गया। सोहेल ने एक गहरी सांस ली और रट्टू तोते की तरह यारम को पूरा माजरा बता दिया। जैसे जैसे सोहेल यारम को अपनी बात बताते जा रहा था वैसे वैसे यारम के एक्सप्रेशन डार्क हो रहें थे। यहां वो पुरे पांच घंटे से उसके होश में आने का इंतज़ार कर रहा था वहां उसकी Dove उसकी सिक्योरिटी को चकमा देकर गायब हो गई। यारम का गुस्सा तब हद से पार हो गया जब सोहेल ने उसे उस फ्लोर की सीसीटीवी फुटेज दिखाई जिसमें रूह और हयात साफ़ साफ़ छुपते छुपाते भागते नज़र आए। जब सोहेल ने यारम के चेहरे की ओर देखा तो उसके माथे पर ठंडा पसीना आ गया क्यूंकि इस वक्त यारम के होठों पर एक डेविल स्माइल थी जिसका मतलब साफ़ था की उसके दिमाग़ में कुछ तो खतरनाक चल रहा था।  यारम काज़मी वहीं दूसरी ओर हयात और रूह सबसे पहले मॉल गई वहा से उन्होंने अपने शॉपिंग बैग्स कलेक्ट किए। पार्किंग में पार्क अपनी कार लेकर वो दोनों अपने घर की ओर चले गए। रूह ने पहले हयात को उसके घर ड्रॉप किया फिर को फारुखी हवेली की ओर निकल गई। हयात ने पहले ही सामिया बी को घर देरी से आने का मैसेज रूह के मोबाईल से कर दिया था इसलिए उन्होंने भी रूह से कोई सवाल नहीं किया। अपने कमरे में पहुंचकर रूह ने राहत की सांस ली और बिना डिनर किए ही बेड पर सो गई। ऑलरेडी आज उसने खौफ ही इतना खा लिया था की उसे डिनर की नीड ही नहीं थी। इसी तरह तीन दिन बीत गए। इन तीन दिनों में रूह सिर्फ़ एक बार ही हदीद पैलेस गई थी वो भी अपने बीस्ट की गैरमौजूदगी में। इन तीन दिनों में उसने हयात की बाकी शॉपिंग भी कंप्लीट कर ली। शाम का वक्त आज हयात की हल्दी थी। इसलिए रूह ने येलो कलर का लहंगा पहना हुआ था। येलो सीक्वेंस लहंगा, स्लीवलेस ब्लाउज और मैचिंग दुपट्टा रूह के गोरे बदन पर बेहद दमक रहा था। खुले बाल, कानों में बड़े बड़े झुमके, छोटी सी नाक में पहना नोज रिंग, काली गहरी आंखों में लगाया गाढ़ा काजल, होठों पर लगी पिंक लिपस्टिक, हाथों में पहनी मैचिंग चूड़ियां और पैरों में पहनी पायल आज रूह को जो भी देखता उस पर से अपनी नज़रे ही नहीं हटा पाता।  रूह अपने कान में पहने झुमके को ठीक करती हुई अपने हवेली की सीढ़िया उतर रही थी की उसका पैर आखिरी की दूसरी सीढ़ी पर फिसल गया। "अह्ह्ह" एक चीख के साथ जैसे ही रूह गिरने को हुई किसी की मज़बूत बाहों ने उसे थाम लिया। रूह को जब दर्द का एहसास नहीं हुआ तो उसने अपनी आंखें खोल उसे थामे शख़्स की ओर देखा जिसे देख उसकी आंखें लगभग बाहर ही आने वाली थी। रूह उस शख़्स की बाहों में छूटने के लिए कसमसाने लगी तो वही वो शख़्स उस पर अपनी पकड़ और ज़्यादा टाईट किए जा रहा था। "छ छोड़िए मुझे भ भाईजान" रूह ने अपनी कपकपाती आवाज़ में कहा लेकिन उसे पकड़े यारम को तो उसके खुबसूरत चेहरे के सिवा कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा था। उसने कभी नहीं सोचा था की वो गोलू मोलू आठ साला लड़की बड़ी होकर इतनी हसीन हो जाएगी जिसकी छाप सीधा यारम काज़मी के दिल पर जा लगेगी। रूह को डर था की कहीं यारम उसकी उस दिन हरकत के बारे में उसके घर वालों को न बता दे। "भाईजान छोड़िए न" रूह ने इस बार थोड़ी तेज़ आवाज़ में कहा तो मानो यारम अपनी नींद से जागा। यारम ने रूह को आज़ाद किया तो वो तुरन्त वहा से जानें लगी इससे पहले की वो आगे बढ़ पाती यारम ने उसकी कलाई पकड़ ली। उसके ऐसा करते ही रूह की जान मानों उसके हलक में ही अटक गई। रूह ने मुड़कर यारम की ओर देखा जो अपनी जलती हुई निगाहों से उसे ही देख रहा था। यारम की लाल आंखें देख रूह एक पल के लिए डर से कांप गई। "ये बीस्ट अपनी कंची आंखों को लाल कर मुझे ऐसे क्यूं घूर रहा है जैसे मैंने इनका पर्स चोरी कर लिया हो" रूह ने सोचा और डर से अपना स्लाइवा गटक लिया। अब रूह को कौन बताए उसने तो यारम की उसके पर्स से भी ज़्यादा अज़ीज़ बेशकीमती चीज़ चोरी कर ली है जिसका खामियाजा उसे ज़िंदगी भर भुगतना होगा। "ये किस तरह के घटियां कपड़े पहनें है तुमने" यारम की कर्कश आवाज़ सुन रूह चिंहुक उठी। "क्या इस 6 फुटिया बीस्ट ने उसके डिजाइनर कपड़ो को घाटियां कहा" ये सोचकर ही रूह की आइब्रोज आपस में सिकुड़ गई। भला दुनियां में कोई भी लड़की कभी अपने लुक और कपड़ों पर कोई नेगेटिव कमेंट पसन्द करती है जो रूह करती। इस बार उसने अपने डर को थोड़ा साइड किया और तुनककर बोली "भाईजान ये कोई घटियां कपड़े नहीं है इंडिया के टॉप डिजाइनर के डिज़ाइन किए कपड़े है" रूह ने अपनें कपड़े को देखकर कहा वहीं रूह ने आज कई सालों बाद यारम से नॉर्मली कोई जवाब दिया था जिसे सुनकर यारम के चेहरे पर ना बयां करने वाली चमक आ गई। लेकिन जब उसने रूह के अल्फाजों पर गौर किया तो उसकी आंखे सख्त हो गई। आख़िर इस छोटी सी लड़की की हिम्मत कैसे हुईं उसे बार बार भाईजान कहने की। रूह अपना ज़वाब देकर जैसे ही वहा से जानें को हुई तभी यारम ने कुछ ऐसा किया की रूह की आंखें हैरानी से फैल गई

  • 15. Junooniyat - Chapter 15

    Words: 1587

    Estimated Reading Time: 10 min

        अब आगे      यारम ने रूह के बाल को पकड़ लिया जिसे देखकर रूह की आँखें हैरानी से फैल गई। उसे डर था की कहीं यारम उसके बाल न काट दे।  "ये बीस्ट अब चोटी चुड़ैल भी बन गए है क्या?" रूह धीरे से बुदबुदाई  "Dove तुम ख़ुद मेरे पास आती हो या मैं तुम्हारी लगाम खींचकर तुम्हें अपने क़रीब करूं" यारम ने अपनें हाथ में पकड़े रूह के बाल की ओर इशारा करते हुए कहा तो रूह जल्दी से उसके करीब आ गई। रूह अपनी लंबी घनी पलकों को बार बार झपकाते हुए यारम को ही टुकुर टुकुर देख रही थी। इस वक्त वो यारम इतनी ज्यादा मासूम और प्यारी लग रही थी की उसका मन कर रहा था की वो उसे अपनी बाहों में भर ले। लेकिन बिना किसी हलाल रिश्ते के को ऐसा कर भी नहीं सकता था। इससे पहले की वो रूह से कुछ कहता उन्हें पिछे से सामिया बी की प्यारी आवाज़ सुनाई दी "अरे यारम बेटा आप कब आए?"  रूह ने जब अपनी अम्मी को देखा तो उसने अल्लाह का शुक्र मनाया की उन्होंने आज उसे इस बीस्ट से बचा लिया। "बस फूफी सोचा आज आपसे मिलता जाऊ वैसे क्या मैं आपके यहां बेवजह नहीं आ सकता" यारम ने इतनी मासूमियत से सामिया बी से सवाल किया की रूह का मुंह खुला का खुला ही रह गया। "क्या ये बीस्ट सच में इतना मासूम है जितना ये इस वक्त मुझे नज़र आ रहा है" रूह ने सोचा और अपने ख्यालों को झटक कर यारम से थोड़ा दूर खड़ी हो गई। उसे यारम की करीबी से भी बेचैनी महसूस होती थी मानों उसे सांस लेने में दिक्कत हो रही हो। "अरे बेटा आप ऐसे क्यूं बोल रहें हो ये आपका ही घर है इनफैक्ट आज तो आप रात का खाना भी हमारे घर ही खाकर जाइएगा" सामिया बी ने यारम के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा तो यारम के होठ के कोने ऊपर की ओर उठ गए। "अम्मी मैं जाती हू मुझे वैसे भी लेट हो गया है आप मेरा इंतजार मत करना" इतना बोल रूह तेज़ कदमों से बाहर की ओर जानें लगी तभी उसे यारम की कोल्ड वॉइस सुनाई दी "स्टॉप!!!" उसकी आवाज़ सुन रूह ने कस कर अपनी आंखें बंद कर ली। आख़िर ये बीस्ट चाहता क्या है? क्यूं उसे चैन से जीने नहीं देता। रूह ने यारम को मन में कोसा और मुड़कर उसे सहमी हुई निगाहों से देखने लगी। वहीं सामिया बी भी कनफ्यूजन से यारम को ही देख रही थी। "तुम इतनी रात गए कहा जा रही हो" यारम ने उससे ऐसे सवाल किया जैसे वो उस पर पूरा हक़ रखता हो। रूह ने अपनी मासूम निगाहों से सामिया बी की ओर देखा जैसे कह रही हो "अम्मी प्लीज़ इस बीस्ट से मुझे बचा लीजिए" सामिया बी भी अपनी बेटी की हालात बखूबी समझ रही थी उन्होंने उसे आंखों ही आंखों में दिलासा दिया और यारम की ओर देखकर बोली "वो असल में बेटा पड़ोस के खान मिया की बेटी हयात की हल्दी है आज शायद ताहिरा भाभी और तुम्हारे घर की औरतें भी गई होंगी बस रूह भी वहीं जा रही है। जाओ बेटा वरना तुम्हें देरी हो जायेगी" आखिरी की लाइनें सामिया बी ने रूह को इशारा करते हुए कहा जिसे सुनकर उसकी काली आंखें चमक उठी और वो बिना एक पल गवाए वहा से ऐसे भागी जैसे उसके पीछे कोई कुत्ता पड़ा हो। रूह को ऐसे भागते देख यारम के हाथों की मुट्ठियां कस गई।  रूह फारूखी हवेली से निकलकर एक घर छोड़ खान मंज़िल में एंटर हो गई जो बाहर से जगमगाया हुआ दिखाई दे रहा था। रंग बिरंगी लाइटों से रोशन वो बंगला आज बेहद खुबसूरत दिख रहा था। फंक्शन का अरेंजमेंट आज अंदर हॉल में किया था। हॉल महंगे कपड़े और मैकअप से सजी औरतों से भरा हुआ था।  वहीं सामने लगे सोफे पर बैठी ताहिरा बी और नाजिया बी हयात की अम्मी जमीला खातून से बात कर रही थी। हाथ में सॉफ्ट ड्रिंक का ग्लास घुमाते हुए हया अपनी नज़रे आस पास घुमा ही रही थी की उसकी नज़र सामने से आती लड़की के ऊपर थम गई। जब बाकी सबने उस ओर देखा तो उनका भी हाल कुछ ऐसा ही था। आख़िर रूह दिख भी इतनी सुंदर रही थी।  लेकिन उसका ये हुस्न हया और नाजिया बी के आंखों में कांटे की तरह चुभ रहा था। लेकिन ताहिरा बी को कोई फ़र्क नहीं पड़ा उन्हें ना रूह से कोई शिकायत थी न ही वो उसे पसन्द करती थी। रूह सबको सलाम कर दुल्हन के बगल में जाकर बैठ गई और हयात और उसके cousin's से बाते करने लगी। "यार ये फंक्शन कितना बोरिंग लग रहा है लगता ही नहीं की हल्दी का फंक्शन है" हयात की एक cousin रमशा ने बोरियत भरे लहज़े से कहा तो बाकी लड़कियों ने भी हां में अपना सिर हिला दिया। "तो क्यूं न आज कुछ तड़कता भड़कता किया जाए आफ्टरॉल हमारी हयात खान की जो हल्दी है" रूह ने उन्हें आई विंक करते हुए कहा तो उन सबके चेहरे चमक उठे। रूह ने रमशा के कान में कुछ कहा तो वो हा में अपना सिर हिलाकर वहा से चली गई। इसी के साथ एक फोकस लाइट सबकी ओर पीठ किए खड़ी रूह पर पड़ी तो सब उसकी ओर देखने लगें। कोई सहरी बाबू दिल-लहरी बाबू हाय रे पग बाँध गया घुँघरू मैं छम-छम नचदी फिराँ  - रूह ने बेहतरीन स्टेप्स करते हुए डांस स्टार्ट किया तो रमसा और उसकी दो बहने भी उसके साथ डांस करने लगी। रूह ने अपनें लहंगे को हौले से उठाकर चलते हुए आगे के लियरिक्स गुनगुनाए। मैं तो चलूँ हौले-हौले फिर भी मन डोले हाय रे मेरे रब्बा मैं की कराँ मैं छम-छम नचदी फिराँ कोई सहरी बाबू दिल-लहरी बाबू हाय रे पग बाँध गया घुँघरू मैं छम-छम नचदी फिराँ  रूह फारस को अपने ख्यालों में याद करते हुए शर्माने लगी।  पनघट पे मैं कम जाने लगी नटखट से मैं शरमाने लगी  - धड़कन से मैं घबराने लगी दरपन से मैं कतराने लगी मन खाये हिचकोले ऐसे जैसे नैया डोले हाय रे मेरे रब्बा मैं की कराँ रूह अपनें पायलों को बजाते हुए अपने दोस्तों के साथ डांस कर रही थी। मैं छम-छम नचदी फिराँ कोई सहरी बाबू दिल-लहरी बाबू हाय रे पग बाँध गया घुँघरू मैं छम-छम नचदी फिराँ रूह ने जैन की फ़ोटो दिखाते हुए हयात की ओर इशारा किया तो उसने शरमा कर अपनी नज़रे नीचे झुका ली। सपनों में चोरी से आने लगा रातों की निंदिया चुराने लगा   नैनों की डोली बिठा के मुझे ले के बहुत दूर जाने लगा रूह ने अपनें चेहरे पर ओढ़े घूंघट को ऊपर करते हुए अपने दोस्तों को आई विंक किया और आगे के लिरिक्स गुनगुनाकर डांस करने लगी। मेरे घुँघटा को खोले मीठे-मीठे बोल बोले हाय रे मेरे रब्बा मैं की कराँ मैं छम-छम नचदी फिराँ रूह अपनी मस्ती में इतनी खोई हुई थी की उसे एहसास ही नहीं हुआ की कोई शख्स कब से उसे अपनी कशिश भरी निगाहों से देख रहा है।  वो शख्स कोई और नहीं यारम ही था जो Mr खान से एक बिल्डिंग के कॉन्ट्रैक्ट के सिलसिले में बात करने आया था। कोई सहरी बाबू दिल-लहरी बाबू हाय रे पग बाँध गया घुँघरू मैं छम-छम नचदी फिराँ असल में यारम के लिए उस कॉन्ट्रैक्ट पर बात करना इतना भी इंपॉर्टेंट नहीं था वो तो यहां बस रब का दीदार करने आया था जो उसने बखूबी कर लिया था। लेकिन जब उसकी नज़र वहा कैटरिंग वाले और फ़ोटो वीडियो बनाने वाले लड़को पर गई तो उसका खून खौल उठा। आखिर उसे कैसे बर्दाश्त होता की कोई उसकी मिल्कियत को आंख उठाकर देखता। क्या उसे उन सबकी आंखें नहीं निकाल देनी थी। वो उन सभी आदमियों की आंखों में रूह के लिए चमक साफ़ देख सकता था जो उसके गुस्से को हवा देने के लिए काफ़ी थी। लेकिन उसे इस वक्त उन सबसे ज्यादा रूह पर गुस्सा आ रहा था। उसका स्लीवलेस ब्लाउज़ जो पीछे से लगभग बैकलेस ही था जिसमें से उसके गोरी बाजुए और पीठ साफ़ दिखाई दे रहे थे। ऊपर से उसके डांस करने उसका मखमली पेट भी बिच बिच में नज़र आ जा रहा था। क्या उसे इस चीज़ का इल्म भी था की उसे वो आदमी किस नज़र से देख रहें थे। भले वहा हॉल में सब औरतें ही मौजुद थी मर्दों का इंतज़ाम बाहर आउट हाउस में किया गया था लेकिन कैटरिंग वाले और फोटोग्राफर भी तो मर्द ही थे। यारम का बस चलता तो वो अभी इसी वक्त रूह को अपनी बाहों में इस क़दर छुपा लेता की किसी को उसके नाखून भी नज़र नहीं आते और वो ऐसा कर भी सकता था लेकिन उसे रूह को इज़्जत का ख्याल भी था। आख़िर वो अपनी Dove को सारे जमाने के सामने रुसवा तो नहीं कर सकता था। वो थी उसी की और रहेगी भी उसी की, इसलिए उसे ये सब करने की ज़रूरत नहीं थी। लेकिन अब उसे अपनी Dove को भी ये बताना था की वो अब उसकी मिल्कियत है। इसी तरह हल्दी का फंक्शन भी ख़त्म हो गया और सब अपने अपने घर चलें गए। यारम को भी ज़रूरी मसला पेश आ गया था इसलिए वो भी जल्दी ही वहा से चला गया था। रूह और हयात के cousin's ने मिलकर मेंहदी नाइट को भी यादगार बना दिया था। चूंकि यारम को किसी सिलसिले में लखनऊ जाना पड़ा था इसलिए उसने हयात की मेंहदी में की गई रूह की बदमाशियों को मिस कर दिया था।  लेकिन वो दोनों ही इस बात से अंजान थे की आने वाला कल उनके लिए बहुत ज़्यादा ख़ास होने वाला है।   My Instagram I'd - Jhalliladkiii मेरी इंस्टा id पर आपको मेरे WhatsApp Channel का link मिल जाएगा।

  • 16. Junooniyat - Chapter 16

    Words: 1664

    Estimated Reading Time: 10 min

     
     
    अब आगे 
     
     
     
    "माशाअल्लाह आज तो तू कतई ज़हर लग रही है" हयात के कमरे के अन्दर आती हुई रूह ने हयात को देखते हुए कहा 

    पेस्टल कलर के ब्राइडल कपड़ो में हयात बेहद खुबसूरत लग रही थी। मैचिंग ज्वेलरी और परफेक्ट मैकअप सब हयात पर खुब जम रहा था।



                           हयात का ब्राइडल लुक
    "शुक्रिया मोहतरमा रूह फारूखी साहिबा। मैं तो रेडी हो गई मगर आप क्या इन्हीं कपड़ों में निकाह में शामिल होंगी?" हयात ने रूह को ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा तो रूह का मुंह बन गया।

    शिन चैन टी शर्ट और पैजामा पहने बालों का मैसी बन बनाए रूह बिलकुल जोकर लग रही थी। जिसे देख हयात की हसी छूट गई।

    "बड़ी ज़ालिम दोस्त है तू एक तो सुबह से तेरे निकाह की तैयारियों में मशरूफ (Busy) थी ऊपर से तू मेरा ही मज़ाक उड़ा रही है। रुक बेटा मैं तैयार होकर आती हू फिर देखती हू तू मेरा कैसे मज़ाक उड़ाती है" रूह ने अपने कपड़े सोफे से उठाते हुए कहा और अपने पैर पटकते हुए बाथरुम के अन्दर चली गई।

    हयात बस हस्ते हुए उसकी बचकानी हरकते ही देख रही थी।

    हयात अपने मोबाइल को चेक करने लगीं इसी के साथ उसके चहरे पर उदासी तारी हो गई।

    "जब से निकाह की डेट फिक्स हुई है तब से Zayn मूझसे बात क्यूं नहीं कर रहें है पहले तो रोज़ घंटों बातें किया करते थे। न जानें इन्हें अब क्या हो गया है" हयात ने अपने मोबाइल की स्क्रीन पर नज़रे गढ़ाए हुए कहा फिर एक गहरी सांस लेकर सोफे से सिर टिकाए बैठ गई।

    थोड़ी देर बाद निकाह का टाईम हो गया तो रूह हयात को लेकर बाहर लॉन में आ गई जहां निकाह का इंतज़ाम किया गया था।

    जब वो दोनों वहा आई तो सबकी नज़रे बस उन्हीं दोनों पर जम सी गई। हयात तो आज सेंटर ऑफ अट्रैक्शन थी ही मगर रूह की खुबसूरती से लोग अपनी नज़रे ही नहीं हटा पाए।

    Celadon ग्रीन कलर के हेवी वर्क वाले अनारकली सूट जिसका दुपट्टा उसने अपने दोनों हाथों में स्टाइल से थामा हुआ था। खुले बाल लाइट मेकअप न्यूड लिपस्टिक कानो में मैचिंग इयररिंग पहने इस लुक में रूह बेहद हसीन दिख रही थी।



                               रूह का लुक
    रूह ने हयात को दुल्हन के सोफे पर बैठाया और ख़ुद भी उसके पीछे खड़ी हो गई। सामिया बी ने तो दूर से ही हयात और रूह की बालाइयां ले ली।

    वहीं हया और ताहिरा बी का तो मुंह ही बना हुआ था। कुबरा और रूह हयात से बात कर रही थी ताकी वो ज़्यादा नर्वस मत हो।

    तभी जमीला खातून (हयात की अम्मी) के कान में आकर उनकी किसी रिश्तेदार ने कुछ कहा जिसे सुनकर वो अपने जगह से खड़ी हो गई।

    उनके चेहरे पर परेशानी और डर साफ़ देखा जा सकता था। जमीला बी ने एक नज़र अपनी दुल्हन बनीं बेटी को देखा जो उन्हीं की ओर अपनी खाली आंखो से देख रही थी जैसे वो अपनी अम्मी के परेशानी की वजह जान लेना चाहती हो।

    जमीला बी ने उसे एक झुटी मुस्कान पास की और वहा से अपने बंगलो के अंदर चली गईं। 

    जब बहुत देर तक काज़ी साहब और दुल्हन अकेले ही वहा बैठे रहें तो अब मेहमानों के बिच भी खुसुर फुसुर स्टार्ट हो गई। 

    अब रूह और कुबरा को भी कुछ गड़बड़ लगने लगी। उन्होंने एक दूसरे की ओर देखा फिर हयात की ओर जिसकी आंखों में बेचैनी और घबराहट साफ़ देखी जा सकती थी।

    आखिर एक लड़की जो स्टेज़ पर दुल्हन के लिबास में पिछले एक घण्टे से बिना दूल्हे के बैठे हुई है और उसके परिवार के चहरे पर परेशानी का भाव देखना ऊपर से रिश्तेदारों की शक भरी नज़रे और इनडायरेक्टली ताने ये सब कितना बूरा था हयात के लिए।

    "तुम यहीं हयात के पास रुको मैं आती हू" रूह ने कुबरा से कहा तो उसने हां में अपना सिर हिला दिया।

    रूह जब घर के अन्दर जा ही रही थी तो रास्ते में वो किसी से टकरा गई। "माफ कीजिएगा" इतना बोल वो जैसे ही आगे बढ़ने लगीं किसी ने उसे उसकी बाजुओं से पकड़ लिया।

    रूह ने हैरानी से अपने सामने खड़े शख्स को देखा तो वो यारम काज़मी था।

    "कहा जा रही हो? और इतनी परेशान क्यू हो" यारम जो एक पल के लिए रूह की खुबसूरती में खो गया था उसने उससे सवाल किया।

    "कुछ नहीं भाईजान बस" रूह अभी इतना ही बोली थी की उसे हयात के घर के अन्दर से किसी चीज़ के टूटने की आवाज़ सुनाई दी।

    रूह ने अपना हाथ यारम के हाथों से छुड़ाया और अपने कपड़े को संभालते हुए बंगलो के अन्दर चली गई।

    अंदर का नज़ारा देख रूह की आंखें हैरानी से चौड़ी हों गई।

    जमीन पर अपने गाल पर हाथ रखे बैठा जैन जिसने दूल्हे का लिबास पहना हुआ था। पास में टूटा वाज़ उसके पीछे खड़ी एक प्रेगनेंट लड़की जिसकी उम्र करीब 23 साल रही होगी।

    जमीला खातून के आंखो से निकलते आंसू और खान अंकल की लाल अंगारों जैसी आंखें, रूह को कुछ न पता होते भी कुछ कुछ समझ आ गया था।

    "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुईं अपने गंदी जबान से हमारी हयात का नाम भी लेने की। तुमने क्या सोचा तुम अपनी अय्याशी करते रहोगे और किसी को इस बारे में पता नहीं चलेगा। हमने कभी किसी के साथ बुरा नहीं किया तो मेरा रब मेरी फूल सी बच्ची के साथ कैसे बुरा होने दे सकता है।


    ये सब जानते हुए की तुम्हारा बेटा किसी बच्ची की ज़िंदगी बर्बाद कर उसे हमीला (प्रेगनेंट) कर चूका है तुम्हारा दिल पसीज" mr खान (हयात के अब्बू ने) जैन और उसके पैरेंट्स की ओर गुर्राते हुए कहा तो उन्होंने अपनी नज़रे नीची कर ली।

    "अब बच्चा है गलती हो जाती है अब इसे कुछ थोड़े ही समझ आया होगा। आप खाम खा बात का बतंगड़ बना रहें हैं। बाहर मेहमान भरे हुए हैं अपना न सही लेकिन अपनी बेटी का तो ख्याल कीजिए जो अकेली बाहर सारे मेहमानों के सामने बैठी है" जैन की अम्मी जुलैखा बेगम ने इतनी बेशर्मी से कहा की mr खान तो उनका मुंह ही देखते रह गए।

    "आपको शर्म भी आती है अपने बेटे को चार थप्पड़ लगाने के बजाए आप उसकी गलतियों पर पर्दा डाल रहें है। मेरा बस चले तो I'll kill him" अन्दर आती रूह ने दांत पीसते हुए कहा 

    "तुम होती कौन हो हमारे परिवार के मसले में दखल देने वाली" जुलैखा बेगम ने रूह को आंखें तरेरते हुए कहा
    "मैं जो भी हू मगर आपकी तरह बेशर्म तो कतई नहीं हूं" रूह ने आई रोल करते हुए कहा 

    "तुम बत्तमीज़ लडकी। मेरे भाई भाभी को भड़काने की कोशिश मत करो। लगता है तुम चाहती हो की हयात का निकाह ही न हो और वो पुरे जमात (समाज) के सामने रुसवा हो जाए" जुलैखा बेगम ने इस लहज़े से कहा की mr खान और जमीला खातून के चेहरे का रंग फीका पड़ गया।

    "आपके घटिया बेटे से निकाह से बेहतर मेरी दोस्त आज रुसवा ही हो जाए" रूह ने नफ़रत से जैन और जुलैखा बेगम को देखते हुए कहा 

    "मगर रूह अगर आज मेरी बेटी का निकाह नहीं हुआ तो वो टूट जाएगी" जमीला भी इतना बोल फफक कर रो पड़ी तो mr खान के माथे पर बल पड़ गया।

    "आपकी बेटी का निकाह आज ही होगा" पीछे से आती मर्दाना आवाज़ सुन सबने दरवाज़े की ओर देखा जहां अपने कुर्ते के पॉकेट में हाथ डाले यारम खड़ा था।

    उसे वहां देख सब अपनी जगह जम से गए। भले खान साहब भी अच्छी रसूख वाले उम्दा शख्सियत के मालिक थे मगर यारम काज़मी की हैसियत के आगे वो दूर दूर तक कहीं नहीं थे। यारम का ऐसे उनके घर के मसलों में बोलना उन्हें हैरान करने वाला था।

    "Mr काज़मी आप" 

    "आप सब बाहर आइए और हयात के निकाह में शिरकत कीजिए" यारम ने शांत लहज़े से कहा तो रूह की आंखें छोटी हो गई।

    "भाईजान आप कैसी बातें कर रहें है मैं कभी अपनी दोस्त का निकाह इस गंदे लड़के से नहीं होने दूंगी" रूह ने अपने दोनों हाथों को फोल्ड करते हुए कहा तो यारम के होठ के कोने ऊपर की ओर मुड़ गए।

    यारम ने एक नज़र Mr and Mrs खान की ओर देखा फिर अपने लंबे कदम भरता हुआ वहा से चला गया।

    रूह तो मुंह खोले यारम की ओर देखते ही रह गई जिसने उसे बुरी तरह इग्नोर किया था।

    जब वो सब बाहर आए तो सामने का नज़ारा देख उन सबकी आंखें हैरानी से बड़ी हो गई। क्यूंकि स्टेज़ पार दुल्हन की जानिब जहा हयात बैठी थी वही परदे के दुसरी तरफ ब्लैक पैंट और व्हाईट शर्ट पहने अपने सिर पर नमाज़ वाला कैप पहने सोहैल बैठा हुआ था।

    रूह ने मुड़कर यारम की ओर देखा जो जस्ट उसके बगल में ही खड़ा था था उसे अचानक से अपने इतने क़रीब देख रूह हड़बड़ा गई। लेकिन यारम ने उसकी कमर को पकड़ उसे थाम लिया।

    रूह ने जल्दी ही ख़ुद को यारम की ग्रिप से छुड़ा लिया। "वैसे तुमने बताया नहीं की ये नया दुल्हा तुम्हारी दोस्त के लिए सही लगा या नहीं" यारम ने रूह की ओर देखते हुए उससे सवाल किया।

    रूह जानती थी की सोहैल जैन से लाख क्या करोड़ गुना बेहतर है। न सिर्फ़ दिखने में बहुत हैंडसम है बल्कि उसकी एक मंथ की सैलरी भी जैन के वन ईयर के जॉब पैकेज से ज्यादा है और उसने एक दो बार कुबरा और अहद से सोहैल के बारे में सुन रखा था की वो सिर्फ अपने job और अपनी बेवा (विधवा) अम्मी से मतलब रखने वाला अच्छा लड़का है। 

    रूह ने एक नज़र सोहैल और हयात की ओर देखा जिनका अब निकाह होना शुरू हो गया था फिर वो यारम की ओर देखकर हां में सिर हिलाते हुए मुस्कुरा दी।

    आज पहली बार रूह यारम की ओर देखकर मुस्कुराई थी। जिसे देखकर यारम के दिल में घंटियां बजने लगी।

    उसे ऐसा लगा की बस एक इसी चीज़ की कमी थी जो को अपनी ज़िंदगी में मेहसूस करता था। रूह के होठों की वो मुस्कुराहट सीधा उसके दिल में उतर रही थी।


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  • 17. Junooniyat - Chapter 17

    Words: 2079

    Estimated Reading Time: 13 min

     
     
    अब आगे 
     
     
    यारम तो बस रूह की काली गहरी सुरमई आंखों में खोया हुआ था। जब रूह ने अपनी नज़रे उससे हटा ली तब जाकर वो अपने सेंस में आया।

    वहीं उनसे कुछ दूर बैठी ताहिरा बी नाजिया बी और हानी ने जब यारम को रूह को इस क़दर देखते पाया तो उन्हें बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा।

    आख़िर वो हया का मंगेतर था तो फिर वो कैसे रूह को ऐसे देख सकता है।

    "भाभी जान आप बुरा मत मानिए लेकिन उस दिन यारम का फारुखी साहब की पार्टी में जाना फिर रूह के साथ डांस करना और अब" इतना बोलकर नाजिया बी खामोश हो गई क्यूंकि ताहिरा बी उसे अपनी तीखी नज़रों से घूर रही थी।

    "आपको हमें बताने की ज़रूरत नहीं है की हमारा बेटा कैसा है और क्या कर रहा है। हम अच्छी तरह से जानते है की हमारा बेटा कैसा है। वो वही करेंगे जो हम उनसे कहेंगे और अगर हमने एक बार कह दिया की हया ही हमारे यारम की बीवी बनेंगी तो बस यहीं होगा। हमारे बेटे ने आज तक हमारी मुखालफत नहीं की है तो वो अब भी नहीं करेंगे" ताहिरा बी ने रौबीले अंदाज़ से कहा मानों उन्हें अपने कहे एक एक अल्फाज़ पे पूरा यकीन है की उनका बेटा वही करेगा जो वो कहेंगी। लेकिन ये तो वक्त ही बताएगा की आगे क्या होगा।

    थोड़ी देर में ही निकाह की सारी रस्में मुकम्मल हो गई और रूखसती का टाईम भी आ गया। चूंकि सोहैल की अम्मी अपने भाई भाभी के साथ उमराह पर गई हुई थी इसलिए वो निकाह में शरीक नहीं हो पाई थी।

    रूखसती के वक्त जहां हयात और उसके पैरेंट्स के आंखों में आसूं थे तो वहीं कुबरा और रब की भी आँखें नम थी।


    रूह ने हयात को गले लगाया और उसके कान में धीरे से बोली "तू अपना ख्याल रखना और मुम्बई ज़रूर आना मेरे होने वाले ससुराल। मैं भी कोशिश करूंगी की भोपाल बिच में आऊ मगर तू जानती है न मुझे यहां आने में हेसीटेशन होती है अब ज़्यादा रो मत वरना तेरा मैकअप ख़राब हों जाएगा तो जीजू ने तूझे पहचानना ही नहीं है" रूह ने ये आखिरी लाइन जान बूझ कर हयात को चिढ़ाने के लिए कहीं थी जिसे सुन रोती हुई हयात भी हस दी।

    कुबरा ने भी हयात को गले लगा लिया और उसे अपना ख्याल रखने का बोल वो उससे दूर हट गई क्यूंकि काफ़ी सारे लोगों को अभी भी हयात से मिलना था।

    सोहैल तो हयात को रोते हुए देख हैरान था जो लड़की एक हफ़्ते पहले तक जंगली बिल्ली बने उसे काट खाने को दौड़ रही थी वो इस वक्त कितनी मासूम दिख रही थी और अब तो वो इसकी बीवी थी और वो उसका सरपरस्त था।

    सच में किस्मत के आगे इन्सान का बस नहीं कहा आज वो इस मुंहफट लड़की के निकाह में शरीक होने आया था और कहा आज वो उसकी बेगम बन गई।

    "लेकिन जो भी कहो मेरी बेगम है तो बड़ी खुबसूरत" सोहैल ने ख़ुद से कहा और मुस्कुरा दिया।

    रूखसति के बाद सभी अपने अपने घर चलें गए। चूंकि निकाह जल्दबाजी में हुआ था तो दुसरे दिन वलीमा सिर्फ घर वालों के लिए ही रखा गया था। ग्रैंड रिसेप्शन सोहैल की अम्मी के वापसी पर होना था।

    वलीमें की दावत में हयात ने जहां फारुखी हवेली वालों और कुबरा को इन्वाइट किया तो वहीं सोहैल ने भी यारम और उसकी फैमिली को इन्वाइट किया था। 

    वलीमे में काज़मी पैलेस से सिर्फ़ यारम कुबरा और अहद शामिल हुए थे तो वहीं फारूखी हवेली से रूह ही शामिल हुईं थीं क्युकी सामिया बी को अज़ीज़ फारूखी के साथ आउट ऑफ़ सिटी जाना पड़ा था।

    सोहैल का रिसेप्शन भोपाल के एक महंगे फाइव स्टार होटल में रखा गया था आफ्टरॉल वो भी अच्छी खासी रसूख वाला था। सोहैल वालीमे की तैयारी में इतना बिजी था की को उसे हयात से बात करने का मौक़ा भी नहीं मिला।

    यारम ने सोहैल के वालीमे के लिए urgently पार्टी ऑर्गनाइजर वालों का इंतज़ाम करवा दिया था। इसलिए सोहैल को ज़्यादा परेशानी नहीं हुई।

    रूह ने वालीमे के लिए रेड रोज़ कलर का पार्टी गाउन पहना हुआ था। बालों की हेयर स्टाईल कर उसे एक साईड किया हुआ था। 

    जब यारम ने रूह को देखा तो वो उसे कल से भी ज़्यादा हसीन लगी। वो जब भी उसे देखता था वो उसे पहले से भी ज़्यादा खुबसूरत ही लगती थी। 

    रूह ने अब तक यारम को नहीं देखा था तो वहीं दूसरी ओर यारम की तो उससे नज़रे ही नहीं हट पा रही थी। 

    वो आज इस वालीमे में सिर्फ़ रूह के लिए ही आया था वरना उसे कभी इस तरह की gethering पसन्द नहीं थी।

    अभी वो रूह से बात करने जानें ही वाला था की अहद ने उसे रोक लिया वो उससे किसी मसले पर मशवरा ले रहा था क्यूंकि उसे घर में कभी यारम से बात करने का मौक़ा ही नहीं मिलता था। 

    यारम ने जब तक उसके डाउट्स क्लियर किए तब तक रूह वहा से जा चुकी थी। यारम ने उसे सारे हॉल में देखा मगर वो उसे कहीं नज़र नहीं आई।

    "वो इतनी जल्दी कैसे जा सकती है अभी थोड़े देर पहले ही तो आई थी" यारम ने सोचा फिर दोबारा उसे ढूढने लगा। मगर वो सच में जा चुकी थी। 

    उसने सोचा की वो आज शाम या कल किसी बहाने से फारूखी हवेली जाकर उससे मिल लेगा। 

    पैलेस जाकर भी जब यारम को चैन नहीं मिला तो को फ्रेश होकर अज़ीज़ फारूखी से किसी मसले पर डिस्कशन करने के बहाने फारूखी हवेली चला गया।

    यारम जब फारूखी हवेली में एंटर हुआ तो उसे हॉल में ही सोफे पर बैठे अज़ीज़ फारूखी और सामिया बी नज़र आ गए।

    "अस्लामो अलैकुम" यारम की गहरी आवाज़ सुन उन दोनों ने ही उसकी ओर देखा जो सफ़ेद कुर्ते पैजामे पहने उनके घर में एंटर हो रहा था।

    "वालेकुम अस्सलाम यारम आप अन्दर आइए" अज़ीज़ फारूखी ने गर्मजोशी से उसका इस्तकबाल किया। तो यारम आकार उनके सामने सोफे पर बैठ गया।

    वही सामिया बी को आजकल यारम का मिजाज़ काफ़ी बदला बदला सा लग रहा था। कहा यारम तीन चार सालों में एक बार उनकी हवेली आता था और कहा वो अब एक ही हफ़्ते में तीन बार आ गया। लेकिन उन्होंने ज्यादा इस बात पे गौर नहीं किया और अपनें ख्यालों को झटक दिया।

    काफ़ी देर बिज़नेस और पॉलिटिक्स से रिलेटेड बात करने के बाद भी जब यारम को रूह कहीं नज़र नहीं आई तो उसे बेचैनी सी होने लगी।

    लेकिन तभी उसने इंडिरेक्टली उनसे जानना चाहा "वैसे आप में से कोई आज हयात और सोहैल के वालीमे में क्यू नहीं आया?"

    यारम का सवाल सुन सामिया जी तुरंत बोली "नहीं बेटा ऐसा नहीं है, असल में अभी कुछ देर पहले ही हम दोनों भोपाल वापास आए है और जहां तक बात है वालीमे में जानें की तो हमारे जानिब से रूह गई थी लेकिन उसे भी urgently काम से आज ही मुम्बई जाना पड़ा" 

    सामिया की बात सुनकर यारम को ऐसा लगा मानों किसी ने उससे उसकी सबसे अज़ीज़ चीज़ छीन ली हो।

    लेकिन तभी उसे फारूखी साहब की आवाज़ सुनाई दी "उसके कालेज की मेरिट लिस्ट जारी हो गई है इसलिए वो एडमिशन लेने चली गई अब पता नहीं कब आयेगी शायद ग्रेजुएशन के बाद ही आए" अज़ीज़ फारूखी ने थोड़ा अफ़सोस जताते हुए कहा

    आखिर वो उसके अब्बू थे भले ही वो उस पर ध्यान नहीं देते थे लेकिन थी तो वो उनकी एकलौती शहजादी।

    वहीं जब यारम ने अज़ीज़ फारूखी की बाते सुनी तो उसका चेहरा डार्क हो गया। भला वो उससे दूर कैसे जा सकती थी वो भी उसकी बिना इजाज़त के। उसे किसने हक़ दिया यारम से दूर जानें का।

    थोड़ी देर बात कर यारम भी वहा से चला गया। 

    पैलेस पहुंचते ही यारम जब अपने रूम में गया तो उसने दरवाज़े के पास रखें वास को ज़मीन में पटक चकनाचूर कर दिया।

    "आआआआआआआ" यारम ज़ोर से चीखा।

    "तुमने गलत किया Dove!!! तुम्हें इसकी सज़ा ज़रूर मिलेगी" यारम ने अपनी गर्दन पर अज़ीब तरह से हाथ फेरते हुए कहा और तिरछा मुस्कुरा दिया। 

    इन सबसे अंजान रूह मुम्बई में फारस और उसकी फैमिली के साथ डिनर कर रही थी। क्युकी कल उसे सुबह जल्दी उठकर कॉलेज जो जाना था।

    वहीं दूसरी ओर सोहैल के फ्लैट पर हाल इन सब से जुदा था। बेड के दोनों तरफ़ एक दूसरे की तरफ़ पीठ किए हयात और सोहैल की आंखों से नींद कोसों दूर थी। 

    हयात जो सोहैल के अचानक कमरे में आ जानें की वजह से वालीमे के हेवी कपड़ों में ही सो गई थी उसे अब इतने भारी कपड़ो में नींद नहीं आ रही थी।

    जब हयात को लगा की सोहैल सो चुका है तो वो उठकर अपने लगेज से नाइट गाउन निकाल बॉथरूम के अन्दर चली गई।

    बॉथरूम के डोर बंद होने की आवाज़ सुन सोहैल ने अपनी आंखें खोल लीं जिसे बंद कर वो कब से सोने की एक्टिंग कर रहा था।

    जब सोहैल को लगा की अब वो सो नहीं पाएगा तो वो उठकर सोफे पर बैठ गया और एक बिज़नेस बुक निकाल कर उसे रीड करने लगा। 

    जब सोहैल ने बॉथरूम के डोर खुलने की आवाज़ सुनी तो उसकी नज़रे ख़ुद ब ख़ुद उस ओर चली गई। इसी के साथ उसकी नज़रे उस ओर जम सी गई।

    हयात जो जस्ट शॉवर लेकर बाहर आई थी ब्लैक नाइट गाउन जो उसके घुटनों के नीचे तक था उसे पहने बॉथरूम से बाहर आई। वो जल्दबाजी में अपने गाउन का श्रग लेजाना भुल गई थी।

    जब हयात ने ख़ुद के उपर किसी के गहरी नज़रों की तपिश महसूस की तो उसने अपने सिर घुमाकर उस ओर देखा जहां सोहैल मुंह फाड़े उसे ही देख रहा था।

    सोहैल को इस तरह अपनी ओर हैरानी से देखता देख हयात हड़बड़ा गई और इसी वजह से उसका पैर वहा बिछी कालीन में फस गया।

    "अह्ह्ह्ह्ह" जैसे ही हयात गिरने को हुई वो चीख पड़ी लेकिन इससे पहले की वो गिरती सोहैल ने फुर्ती दिखाते हुए उसे थाम लिया। 

    हयात जिसने अपनी आंखें गिरने के डर से बन्द कर लीं थी जब उसे एहसास हुआ की वो गिरी नहीं है तो उसने अपनी आंखें खोल सोहैल की ओर देखा जो उसके मासूम से चेहरे को ही देख रहा था।

    सोहैल तो बस हयात की हिरनी जैसी आंखों में कहीं खो सा गया था। हयात उसकी ज़िंदगी में आने वाली पहली और आखिरी लड़की थी जो उसके इतने करीब आई थी।

    अब ये उसकी मिल्कियत थी और वो उसका मेहरम। उसका अपनी बेगम पर पुरा हक़ था और हयात का भी उस पर उतना ही हक था।

    उन दोनों की ही धड़कने बुलेट ट्रेन की स्पीड से चल रही थी जिनका शोर वो दोनों ही सुन सकते थे। 

    हयात ने आज पहली बार सोहैल को इतने करीब से देखा गोरा चिट्टा सोहैल हल्के बियर्ड में बहुत ज्यादा हैंडसम दिख रहा था। 

    हयात तो अपनी लंबी घनी पलकों को झपकाते हुए उसे ही देख रही थी। वहीं सोहैल का ध्यान तो हयात के लि प के जस्ट ऊपर बने तिल पर था। 

    अब बंदे की वाइफ इतनी खुबसूरत हो और वो उसकी बाहों में हो तो भला बंदा कंट्रोल करें तो करे कैसे।

    "May I?" सोहैल ने हयात की हिरनी जैसी आंखों में देखते हुए सवाल किया तो उसने अपनी नज़रे झुका ली। जिसे देखकर सोहैल के होठों के कोने ऊपर की ओर मुड़ गए।

    आखिर वो उसे मना करती तो करती क्यू? वो उसका शौहर था जिसने न सिर्फ़ उसे और उसके परिवार वालों को रुसवा होने से बचाया बल्कि उसे उसकी पिछली बत्तमीजियों के लिए कुछ कहा भी नहीं। 

    भला वो उस मिट्टी के ढेर के लिए अपनें हीरे जैसे शौहर के ख्वाहिशों को मना क्यूं करती। और शायद आज हयात भी चाहती थी की सोहैल और उसका रिश्ता एक कदम आगे बढ़ जाए।

    सोहैल ने हयात को अपनी बाहों में उठाया और उसे बेड पर किसी सॉफ्ट डॉल की तरह लेटा दिया।

    सोहैल ने अपनी टी शर्ट निकाल कर वहीं साइड में फेक दिया हयात तो सोहेल की मस्क्युलर बॉडी देख उसे देखती ही रह गई।

    सोहैल हयात के ऊपर आया और उसने प्यार से उसका माथा  लिया जिसे फील कर हयात की आंखें ख़ुद ब ख़ुद बंद हो गई।

    सोहैल ने झुककर हयात के होठों के ऊपर बने उस तिल को किस कर लिया और उसके बाद उसके होठों को कैप्चर कर लिया।

    जैसे जैसे रात गहराते जा रही थी उन दोनों का ही इश्क़ आज परवान चढ़ते जा रहा था। वो दोनों ही एक दूसरे के बदन पर अपनी मोहब्ब्त की मुहर लगाते जा रहें थे।

    पूरी रात ना सोहैल सोया न ही उसने हयात को सोने दिया। आज वो दोनों अपने रिश्ते को पूरी तरह से अपना लिया था। 
     

  • 18. Junooniyat - Chapter 18

    Words: 1852

    Estimated Reading Time: 12 min

    अब आगे

    बीस दिन बाद 
     
    अपने कमरे में आईने के सामने खड़ा यारम अपने अपने कफलिंक्स सेट कर रहा था। उसने अपने मोबाईल की जानिब देखा जिसके वॉलपेपर पर रूह की तस्वीर थी जो की हयात के हल्दी वाले दिन की थी जिसमें उसने येलो लहंगा पहना हुआ था।

    रूह की मुस्कुराती हुई तस्वीर देख यारम के चेहरे पर भी ख़ुद ब ख़ुद स्माइल आ गई। 

    "मैं जल्द ही आ रहा हूं Dove तुमसे मिलने। मेरा इंतज़ार करना" यारम ने रूह की तस्वीर से बात करतें हुए कहा 

    यारम ही जानता था की उसने इतने दिन रूह के बिना कैसे काटे है उसने रूह के भोपाल वापस आने का तो इंतज़ाम कर दिया था लेकिन फिर भी आज वो उसके सालगिरह पर उसे सरप्राइस देना चाहता था।

    अब भला यारम को कौन बताए की उसका सरप्राइस रूह के लिए किसी न्यूक्लियर बॉम्ब से कम नहीं होता। आख़िर अपने बीस्ट को अपने बर्थडे के दिन कौन देखना चाहेगा।

    इन बीस दिनों में यारम अपने बिज़नेस के काम में बेहद मशरूफ था इसलिए वो इस बिच अलग अलग देशों में जाकर मीटिंग्स अटेंड कर बड़ी बड़ी डील्स क्रैक कर रहा था।

    यारम जब सीढियों से नीचे आया तो उसे सीढ़ियों के निचे ही उसका इंतज़ार करती हुईं हया नज़र आईं। जो की हमेशा की तरह बड़े सलीके से तैयार होकर यारम का ही इंतज़ार कर रही थी।

    उसने अपनी आवाज को और भी ज्यादा स्वीट बनाते हुए यारम से सलाम किया तो हमेशा की तरह यारम ने उसे देखे बिना ज़वाब दे दिया।

    लेकिन जब से हया ने यारम और रूह की करीबी देखी थी उसे यारम का ख़ुद को यूं इग्नोर करना अच्छा नहीं लगता था। 

    "तुम्हें जितना एटिट्यूड दिखाना है दिखा लो यारम लेकिन जल्द ही मैंने तुम्हें अपने हुस्न का गुलाम नहीं बना लिया तो मेरा नाम भी हया काजमी नहीं" हया ने अपनें चेहरे पर दुनियां जहां का तकब्बुर (घमंड) ख़ुद से कहा और अदा से चलती हुई डाइनिंग टेबल पर आ गई।

    हया ने अपनी दादी नायला बी को देखकर रोनी सी शक्ल बना ली जिसे देख नायला बी को समझ आ गया की ज़रूर हया यारम की वजह से उदास है।

    नायला बी ने एक गहरी सांस ली और शाहमीर साहब की ओर देखा जो की आराम से अपना नाश्ता कर रहें थे।
    "यारम तुमने निकाह के बारे में क्या सोचा है? कब की तारीख निकलवाए?" नायला बी ने यारम की ओर अपना सवाल दागा। तो यारम के खाते हुए हाथ रुक गए।

    वहीं पूरे घर वालों की तवज्जों भी यारम की जानिब चली गई।

    यारम ने अपनी आंखे बन्द की और एक गहरी सांस लेकर नायला बी को जवाब दिया "दादी जान हमे जब निकाह करना होगा हम कर लेंगे। बेहतर होगा की आप हमसे बार बार इसी सवाल को न दोहराए वर्ना हम भुल जायेंगे की आप हमारी दादी है जिनकी हम दिलों जान से चाहते है" यारम की धीमी मगर गहरी आवाज़ सुन दादी भी सक्ते में आ गई।

    वहीं शाहमीर साहब और हन्नान काजमी के चेहरे के तासुरात ही बता रहें थे की उन्हें नायला बी का इस तरह बार बार यारम को परेशान करना अच्छा नहीं लगा।

    ऐसा नहीं था की हन्नान क़ाजमी नही चाहते थे की उनकी एकलौती बेटी हया का निकाह यारम से न हो लेकिन उन्होंने आज तक यारम की आंखों में हानी के लिए जर्रा बराबर भी इमोशंस नहीं देखे थे और वो ये कभी नहीं चाहते थे की उनकी बेटी का निकाह ऐसे शख़्स से हो जो उसे पसन्द ही ना करता हो। 

    असल में हन्नान काजमी अपने कॉलेज की क्लासफेलो से मोहब्ब्त करते थे लेकिन अपने बेटे की ख्वाहिशात जानते हुए भी नायला बी ने हन्नान काजमी का निकाह उनकी पसन्द की लड़की से ना करके अपनी बहन की बेटी नाजिया से कर दिया। 

    मजबूरन हन्नान काजमी को नाजिया बी से निकाह करना पड़ा क्युकी नायला बी ने उन्हें साफ साफ़ धमकी दे दी थी की अगर वो नाजिया बी से निकाह नहीं करेंगे तो नायला बी अपनी जान दे देंगी फिर उसके बाद चाहें तो वो अपनी पसन्द से निकाह कर ले।

    हन्नान काजमी ने तो अपनी मोहब्ब्त को कुर्बान कर दिया था लेकिन उन्होने ख़ुद से वादा कर लिया था की कभी वो अपने घर के बच्चों के साथ ये ज्याद्दति नहीं होने देंगे। इसलिए वो यारम और हया के निकाह में कभी इंवॉल्व नहीं हुए।

    यारम ने अपना नाश्ता कंप्लीट किया और सबको अल्लाह हाफिज बोल पैलेस के बैकयार्ड में खड़े अपने प्राइवेट जेट में बैठकर मुम्बई के लिए निकल गया।

    वहीं दूसरी ओर अंसारी मंज़िल में माहौल कुछ अलग ही था। सारे घर वाले रूह को मना रहे थे मगर मोहतरमा तो अपने बर्थडे के दिन मुंह फुलाए बैठी हुई थी। क्यूंकि फारस ने उसे विश जो नहीं किया था।

    सब घर वालों से छुपकर वो एक दो बार रो भी ली थी। मगर सुबह से ही फारस का नंबर ऑफ आ रहा था। 

    जैसे तैसे दिन तो कट गया मगर शाम को रूह और मलीहा के फ्रेंड्स उन्हें क्लब साथ जाने के लिए ले आए। रूह का रत्ती भर भी मन नहीं था बाहर जानें का लेकिन अफसाना बी और जमाल साहब के इंसिस्ट करने पर फाइनली वो भी तैयार हो गई। ।

    मलीहा ने अपनें दोस्तों को देखकर थम्स अप किया मानों वो सभी अपने किसी प्लैन में सक्सेसफुल हो गए हो। 

    मलीहा ने आज रेड कलर की की-होल नेक ड्रेस पहनी थी जो की उसके घुटनों तक थी। खुले कर्ली बालों से वो काफ़ी खुबसूरत लग रही थी।



                          Maliha's Dress
    मलीहा बाहर आकर अपने दोस्तो से बाते करने लगी थी के तभी उसे किसी के हील्स की टक टक की आवाजे सुनाई दी।

    सबने उस ओर देखा तो उन सबकी निगाहें वहीं जम सी गई। 

    Biscay ब्लू कलर की रफल्ड लेयर्ड ए लाइन ड्रेस पहने रूह किसी बार्बी डॉल की तरह दिख रही थी। उसकी ड्रेस उसके घुटनों तक आ रही थी।



                           Rooh's Dress

    खुले सिल्की स्ट्रेट हेयर, कानों में पहने डायमंड इयररिंग जो आज अफसाना बी और जमाल साहब ने उसे गिफ्ट की थी, एक हाथ में पहना खुबसूरत ब्रेसलेट, लाइट मेकअप, न्यूड लिपस्टिक और हाई हील्स पहनी रूह आज बेहद खुबसूरत दिख रही थी जिस पर से कोई चाह कर भी अपनी नज़रे नहीं हटा सकता था।

    "चले" रूह ने बेमन से अपने दोस्तों की ओर देखकर कहा तो वो सभी अपनी अपनी कार में बैठकर वहा से क्लब की ओर चले गए।

    थोड़ी देर में उनकी कार मुम्बई के सबसे बड़े फेमस क्लब के बाहर आकर रूकी। सब अपनी कार पार्क कर क्लब के अन्दर चले गए।

    रूह जब क्लब के अन्दर आई तो वो पुरा क्लब अंधेरे में डूबा हुआ था। रूह को ये सब काफ़ी अजीब लगा जब उसने मुड़कर अपने दोस्तों को देखना चाहा तो वो हैरान रह गई क्यूंकि उसके पिछे कोई नहीं था। 

    तभी उस क्लब में एक फोकस लाइट ऑन हुई जो रूह के ऊपर फोकस थी। इसी के साथ वहा म्यूजिक स्टार्ट हो गया और एक सेकेंड फोकस लाइट ऑन हो गई जिसके निचे एक लड़का उसकी तरफ़ पीठ करके खड़ा हुआ था।
    जिसे देखकर रूह की सुनी आंखें चमक उठी भला वो इस शख़्स को कैसे नहीं पहचानती।

    वो लड़का रूह की ओर टर्न हुआ उसके चेहरे पर एक फेस कवर मास्क था। स्वालेहा उस शख़्स की सुनहरी आंखों में अपने लिए बेइंतहा मोहब्ब्त साफ़ देख सकती थी। ये फारस ही था। जो रूह को सरप्राइस देने आया था।

    मैं वहाँ, जहाँ पे तू है, मेरा इश्क़ तो जुनूँ है
    ओ, जाना, ओ, जाना
    मैं वहाँ, जहाँ पे तू है, मेरा इश्क़ तो जुनूँ है
    ओ, जाना
    हर वक्त तू ही तू है, हर सिम्त तू ही तू है
    ओ, जाना
    तू साथ मेरे हरदम, चाहे कहीं भी हूँ
    ओ, जाना

    फारस ने रूह का हाथ पकड़ उसे अपनी ओर खींचा जिससे रूह उसके सीने से जा लगीं। फारस उसकी आंखों में देख आगे की लिरिक्स गुनगुनाया तो रूह के होठों पर दिलकश मुस्कुराहट छा गई।

    दिन-रात सोचता हूँ
    तुझे इतना प्यार मैं दूँ
    जो कभी उतर ना पाए
    तुझे वो खुमार मैं दूँ
    मुझे ऐसे तू कुछ मिला है
    जैसे की कोई दुआ है
    तुझपे कोई आँच आए
    तो मैं खुद को भी जला लूँ
    हर दिन मुझी में तू है, हर शब मुझी में तू है
    हर दिन मुझी में तू है, हर शब मुझी में तू है
    ओ, जाना
    मैं वहाँ, जहाँ पे तू है, मेरा इश्क़ तो जुनूँ है
    ओ, जाना, ओ, जाना

    फारस ने रूह के हाथ को थाम उसकी हथेली को चूम लिया।

    हर पल तुझे संभालूँ
    तेरे सारे गम उठा लूँ
    मेरा दिल तो ये ही चाहे
    तुझे रूह में सजा लूँ
    तेरा अक्स नूर सा है
    तू एक सुरूर सा है
    दिलकश तेरी अदा का
    हर लम्हा मैं चुरा लूँ
    हरदम खुदी में तू है, मेरी बेखुदी में तू है
    हरदम खुदी में तू है, मेरी बेखुदी में तू है

    रूह के सारे दोस्त फारस के साथ आ गए और उन सबने फारस के साथ मिलकर सॉग के आखिर के स्टेप्स किए जिसे देखकर रूह के चेहरे पर बड़ी सी स्माइल आ गई।

    ओ, जाना
    मैं वहाँ, जहाँ पे तू है, मेरा इश्क़ तो जुनूँ है
    ओ, जाना, ओ, जाना

    सॉन्ग खत्म होते ही फारस ने रूह को लिफ्ट कर लिया और उसे राउंडली घुमाने लगा, रूह खिलखिलाकर हसने लगी।

    वहीं दूसरी ओर यारम जो भोपाल से मुम्बई रूह से मिलने आया था उसे अर्जेंटली कुछ फॉरेनर इन्वेस्टर्स की मीटिंग अटेंड करनी पड़ी जो की मुंबई के किसी क्लब के प्राइवेट रूम में ही रखनी पड़ी थी। 

    जिसका एक दीवार ग्लास का बना हुआ था जिससे नीचे क्लब का सारा नज़ारा देख सकते थे। 

    यारम जो अपनी मीटिंग के बिच ब्रेक लेकर सिगरेट का कश ले रहा था क्यूंकि उसका मूड इस sudden मीटिंग से ऑफ हो गया था आखिर इस मीटिंग की वजह से वो अपनी Dove से मिलने जानें के लिए लेट हो चुका था। 

    सिगरेट का कश लेते यारम की नज़रे नीचे क्लब में खड़े लड़के लड़की पर थी। लड़का जिसके चेहरे पर मास्क था और लड़की की पीठ यारम की तरफ थी।

    पता नहीं क्यूं लेकिन यारम को इस लड़की का अक्श देख कुछ अजीब सा लग रहा था जैसे वो उसे जानता हो ये पहले देख चूका हो।

    यारम ने अपने ख्यालों को झटका और जैसे ही वो वहां से मुड़कर जानें को हुआ उसने कुछ ऐसा देखा की उसके कदम अपनी जगह पर ठहर गए।

    यारम ने बिना एक पल गवाए पीछे मुड़कर ग्लास वॉल से नीचे की ओर देखा जहां को लड़का उस लड़की को उठाए उसे गोल गोल घुमा रहा था और वो लड़की खिलखिलाकर हंस रही थी।

    अब जाकर यारम ने उस लड़की का चेहरा देखा जिसे देख उसकी आंखें मानों अंगार उगलने लगी। उसके माथे की नीली नसें उभर आई। उसने अपने हाथ में ही जलते हुए सिगरेट को मसल कर हाथों की मुट्ठियां बना ली। 

    उसका चेहरा हद से ज़्यादा डार्क हो गया। इस वक्त उसका औरा इतना डरावना हो गया था की पास खड़े सोहैल के माथे पर ठंडा पसीना आ गया।

    यारम अपनी लाल हो चुकी मर्डरिंग आईज से उस लड़के के हाथों को देख रहा था जिससे उसने रूह को थामा हुआ था। 

    "मीटिंग ओवर!!!" यारम ने अपनी बर्फ से ठंडी आवाज़ में कहा और बिना एक पल गवाए उस कमरे से बाहर निकल गया।

  • 19. Junooniyat - Chapter 19

    Words: 1553

    Estimated Reading Time: 10 min

    अब आगे          "सर रुकिए!" यारम का रास्ता रोकते सोहैल ने कहा तो यारम उसे अपनी जानलेवा नजरों से घूरने लगा उसे देखकर सोहैल ने डर से अपना स्लाइवा घटका और अपनी बात आगे एक्सप्लेन करते हुए कहा "आई मीन सर अभी सही टाईम नहीं है आज रूह मैम का b'day हैं और क्या पता जो जैसा दिख रहा हो वो वैसा हो न" सोहैल की पूरी बात सुन यारम के माथे पर बल पड़ गया  "क्या तुम्हें मैं अंधा दिखता हूं या तुमने मुझे बेवकूफ समझ रखा है? उस लड़के ने जिस तरह Dove को आज स्पेशल फील कराया वो नॉर्मल दोस्त कभी नहीं कर सकता। बेहतर होगा की तुम मुझे मैनिपुलेट करना छोड़ उस लड़के के बारे में पता करों की वो कौन है और उसका Dove से क्या रिश्ता है" यारम की बर्फ से ठंडी आवाज़ सुन सोहैल के रीढ़ की हड्डी में सिहरन दौड़ उठी। यारम जब नीचे फ्लोर पर आया तो उसे रूह अकेले कहीं जाती हुईं दिखाई दी शायद वो वॉशरूम जा रही थी। रूह जब वॉशरूम से फ्रेश होकर बाहर आई तो किसी ने उसे एक ओर खींच लिया। रूह जाकर सीधा उस शख़्स के सख़्त सीने से जा लगी। "आउच!!!" रूह ने अपनी छोटी सी लाल हों चुकी नाक को सहलाया और जैसे ही सामने की ओर देखा उसकी गहरी काली आंखें यारम की एमरल्ड ग्रीन आंखों से जा टकराई। यारम को वहा देख रूह को मानों 440 वाट का झटका ही लग गया। उसे एक ही पल में अपनी दुनियां घूमती सी नज़र आईं। रूह को पता ही नहीं चला की कब वो बेहोश होकर यारम की बाहों में जा गिरी। रूह ने सुबह से गुस्से में होने की वजह से कुछ नहीं खाया था इसलिए वो काफी वीकनेस फील कर रही थी, ऊपर से यारम का उसके सामने अचानक से आ जाना उसके दिमाग़ के फ्यूज उड़ाने के लिए काफ़ी था। यारम ने रूह को गिरने से पहले ही थाम लिया उसे काफ़ी हैरानी हुई की कैसे किस तरह उसे देखने बस से ही रूह बेहोश हो गई। यारम ने रूह का खुबसूरत चेहरा अपने एक हाथ में थामा और उसके सियाह बालों की लेटो को उसके कान के पीछे करते हुए कहा "तुम बहुत ही ज़्यादा नाजुक हो माय Dove और शायद इसी लिए मुझे पसन्द हो" इतना बोलकर उसने हौले से उसके माथे को चूम लिया और अपने ब्राउन ब्लेजर को उतारकर रूह के कमर पर बांध दिया जिससे रूह की ड्रेस के नीचे का हिस्सा अच्छे से कवर हो जाए। यारम ने रूह को ब्राइडल स्टाइल में उठा लिया और उसे लेकर क्लब से बाहर चला गया। मलीहा जो क्लब के अन्दर डांस कर रही थी उसके मोबाइल जब वाइब्रेट हुआ तो उसने देखा तो वो रूह का मैसेज था। "मेरी तबियत ठीक नहीं लग रही और तुम सब अच्छे मूड में थे इसलिए मैं तुम सब को बिना बताए घर आ गई। अब मेडिसिन लेकर आराम कर रही हू आई होप तुम मुझे डिस्टर्ब न करो"  रूह के भेजे इस मेसेज को पढ़ मलीहा एक पल के लिए हैरान रह गई आफ्टरॉल आज तक रूह ने ऐसा कभी नहीं किया था लेकिन मलीहा ने भी ज़्यादा माइंड नहीं किया। क्यूंकि वो भी जानती थी रूह की तबियत आज सुबह से ही ठीक नहीं थी।  वहीं दूसरी ओर जब रूह की नींद खुली तो वो उसकी नज़र सबसे पहले सीलिंग पर गई जो की उसे काफ़ी अनजाना सा लगा। रूह ने एक दो बार अपनी पलकों को झपकाया लेकिन जब उसे यकीन हो गया की ये उसका सपना नहीं है तो वो हड़बड़ा कर बेड पर बैठ गई। जब रूह ने अपनें चारों ओर देखा तो उसकी आंखे हैरानी से बड़ी हों गई। रूह इस वक्त किसी बड़े से बेडरुम के किंग साइज़ बेड पर बैठी हुईं थी। और उस कमरे की हर दीवार पर रूह के बचपन से लेकर आज तक की बहुत सारी तस्वीरें लगी थी। जो की हर साइज़ की थी। वहीं वो पूरा बेडरूम रोज़ फ्रेगरेंस के गोल्डन एंड व्हाइट कॉम्बिनेशन के कैंडल्स से डेकोरेटेड था। जमीन पर बिछी रोज पेटल्स और उस कमरे में बिखरे ब्लूंस जिन पर "Happy Birthday Rooh" लिखा हुआ था ये सब देख एक पल के लिए रूह हैरान रह गई। लेकिन दूसरे ही पल फारस का ख्याल दिमाग में आते ही उसके होठों पर दिलकश मुस्कुराहट तैर गई। इस बिच वो यारम को पूरी तरह भुल चुकी थी। तभी उस कमरे का दरवाज़ा खुला और रूह ने जैसे ही उस ओर देखा उसकी मुस्कुराहट एक सेकेंड में ही बूझ गई। कमरे के दरवाज़े से ब्राउन पैंट और ब्लैक टी शर्ट पहने पैंट की पॉकेट में एक हाथ डाले यारम आ रहा था। जेल से प्रॉपर सेट बाल और हाथो में पहनी लिमिटेड एडिशन की रिस्ट वॉच वो एस ऑलवेज हैंडसम और चार्मिंग ही दिख रहा था।  "तुम उठ गई" यारम ने अपनें एक्सप्रेशन लेस फेस के साथ रूह की ओर कदम बढ़ाया तो रूह अपनें सेंस में आई और हड़बड़ाकर अपने बेड से उतरकर खड़ी हो गईं। "भाईजान आप.. मै यहां क्या कर रही हूं"  "तुम क्लब में अचानक बेहोश हो गई तो मुझे कुछ समझ नहीं आया की क्या करू तो मैं तुम्हें यहां लेकर आ गया फिर पता चला आज तुम्हारा b'day हैं तो ये" यारम ने आखिरी लाइन उस कमरे की डेकोरेशन को देखते हुए कहा तो रूह के चेहरे पर थोड़े राहत के भाव आ गए। लेकिन वो अभी भी शॉक्ड ही थी की आखिर ये कड़वा करेला यू मीठा रसगुल्ला कैसे बन गया। "अब तुम्हारी तबियत कैसी है?" यारम ने रूह का माथा छूते हुए पूछा तो रूह के बदन में एक झुरझुरी सी दौड़ उठी। रूह ने अपनें कदम पीछे ले लिए तो यारम ने अपने बढ़े हुए हाथों की मुट्ठियां कस ली। उसे इस वक्त सिर्फ़ फारस और रूह की करीबी और फारस का उसे छूना लिफ्ट करना ये सब ही याद आ रहा था। आखिर तब इस लड़की ने उस लड़के को क्यू मना नहीं किया तब इसके पैरों ने क्या लकवा मार दिया था जो ये अपनी जगह से हिली भी नहीं। आखिर कैसे ये किसी गैर मर्द को खुदको छूने दे सकती है जबकि इस पर सिर्फ उसका हक है सिर्फ़ यारम काज़मी का। ये सब सोच यारम के माथे पर बल पड़ गया।  यारम ने अपनी दो उंगलियों से माथे की नसों को हल्का प्रेस किया और अपनी लाल हो चुकी एमरल्ड ग्रीन आंखों से रूह की ओर देखा जो अपनी लंबी घनी पलकों को झपकाते हुए टुकुर टुकुर उस कमरे को ही देख रही थी। अनजाने में ही सही क्यूरोसिटी से उसने अपने होठों का पाउट बनाया गया था। रूह इस वक्त यारम को इतनी ज़्यादा प्यारी और मासूम लग रही थी की वो इसी पल उसे अपना बना लेना चाहता था मगर बिना निकाह के वो ऐसा कभी नहीं कर सकता था। यारम ने एक गहरी सांस ली और रूह से बोला "Dove क्या तुम्हें ये सरप्राइस पसन्द आया?" यारम का सवाल सुन एक पल के लिए रूह खामोश ही रह गई आखिर वो बोलती ही क्या को सरप्राइस पसन्द आया मगर आप पसन्द नहीं आए या मैं आपकी जगह किसी और को एक्सपेक्ट कर रही थी। नहीं ये दोनों ही बाते बोलना काफ़ी रुड हो जायेगा रूह ने अपने ख्यालों को झटका और फेक स्माइल करते हुए बोली "अच्छा लगा मुझे ये सब"  रूह की स्वीट वॉइस सुन यारम के चेहरे के तासुरात थोड़े नॉर्मल हुए। "तो केक कट करें?" यारम ने कमरे के बीचोबीच कांच की बेहद खुबसूरत टेबल की ओर इशारा करते हुए कहा जिसपर एक हार्ट शेप का चॉकलेट केक रखा गया था जिसपर "Happy 18th B'day Dove" लिखा हुआ था। उस केक को देखकर रूह के चहरे पर छोटी सी स्माइल आ गई क्यूंकि चॉकलेट फ्लेवर उसका फेवरेट था। रूह ने हां में अपना सिर हिलाया और जैसे ही केक काटने को हुई उसे फारस और अपने दोस्तों का ख्याल आया। रूह ने अपनी आंखों में झिझक लिए जब यारम की जानिब देखा तो शायद यारम समझ गया की रूह क्या कहना चाहती है। जिसे सोचकर पहले तो उसे बेपनाह गुस्सा आया लेकिन अपने गुस्से को कंट्रोल करते हुए वो आगे बोला "मैंने तुम्हारी दोस्त को मैसेज कर दिया है तो फिकर मत करों"  "हम्म्म" रूह ने बस इतना कहा और केक कट करने लगी क्यूंकि उसे कैसे भी करके जल्द से जल्द यहां से जाना था यारम की नज़रों की तपिश से दूर जाना था।  रूह ने केक कट किया और एक छोटा सा पीस कट कर यारम की ओर बढ़ाया जो अपने दोनों हाथ फोल्ड कीए रूह को ही देख रहा था। उसका चेहरा हमेशा की तरह इमोशनलेस था मगर आज उसकी आंखों में कुछ तो अलग था। "ये बीस्ट ने ऐसा चेहरा क्यूं बनाया हुआ है जैसे ये बर्थडे में ना आकार किसी की मय्यत में आया हुआ हो। अरे अगर मन नहीं था तो काहे ये सब अरेंज किया" रूह ने मन ही मन यारम के कोसा लेकिन जब उसे अपने हाथ पर किसी के रूखे हाथ मेहसूस हुए तो रूह अपने सेंस में आई। यारम ने रूह का हाथ उसी की ओर टर्न कर केक का पहला बाइट रह की जानिब बढ़ाया जिसे रूह ने न चाहते हुए भी थोड़ा सा खा लिया। रूह की आंखें हैरानी से तब चौड़ी हो गई जब यारम ने रूह का जूठा केक का टुकड़ा खा लिया। रूह के लिए ये सब ही किसी झटके से कम नहीं था की यारम ने कुछ ऐसा किया की वो अपनी जगह जम सी गई।

  • 20. Junooniyat - Chapter 20

    Words: 1391

    Estimated Reading Time: 9 min

     
     
    अब आगे 
     
     
     
    यारम ने रूह के तीन उंगलियों को लीक कर लिया। वो उसकी उंगलियों में लगी क्रीम को लिक कर जैसे ही रूह की ओर देखा वो शॉक्ड एक्सप्रेशन के साथ उसे ही देख रही थी। मानों उसे किसी ने 440 वाट का करंट लगा दिया हो।

    जब यारम ने रूह के सफ़ेद पड़ चुके चेहरे को देखा तो वो उसकी कान में सरगोशी करता हुआ बोला "क्या बात है  Dove तुम्हारा चेहरा इतना लाल क्यूं हो रहा है" यारम ने अपनी गर्म सांसें रूह के कान पर छोड़ते हुए कहा तो एक पल के लिए रूह अन्दर तक सिहर उठी लेकिन जल्द ही वो अपने सेंस में आ गई और उसने अपने कदम पीछे ले लिए।

    "कुछ नहीं भाईजान वो शायद मेरी तबियत बिगड़ रही है मुझे अब जाना चाहिए" रूह ने अपने माथे पर आए पसीने को साफ़ करते हुए कहा और बेड के साईड पड़े अपने बैग को उठाने लगी।

    जब रूह अपने बैग को उठाने के लिए नीचे झुकी तो उसके खुले सिल्की बाल सरककर उसके गले के दोनों तरफ़ आ गए।

    तब जाकर यारम की नज़र रूह की ड्रेस पर पड़ी जो की पूरा बैकलेस था। अब बस यहीं देखना था की यारम का हैंडसम चेहरा गुस्से से तमतमा गया।

    जिस पर वो किसी गैर शख्स की नज़र भी बर्दास्त नहीं कर सकता था वो ख़ुद के बदन की नुमाइश कर रही थी। न जानें किस किस लोगों ने उसे किन नज़रों से देखा होगा शायद उनकी नज़रों में रूह का अक्श बस भी गया होगा आख़िर वो है ही इतनी खुबसूरत।

    रूह ने अपने बालों को पीछे किया और अपना पर्स लेकर यारम के सामने खड़ी हो गई।

    "भाईजान मैं कैब बुक कर रही हू थोड़े ही देर में मेरी कैब आ जाएगी। इन सब के लिए शुक्रिया। अल्लाह हाफिज" रूह ने हेसिटेट होकर यारम से कहा और जैसे ही बाहर जानें को हुई यारम ने उसके बाजुओं को पकड़ खुद के सामने कर लिया।

    रूह ने मासूम नज़रों से यारम की ओर देखा जिसकी आंखें दहकते हुए अंगार की तरह सुर्ख हो चुकी थी।

    यारम को ऐसे देख रूह को 10 साल पहले का वो मंज़र आंखों के सामने याद आ गया जिसे याद कर रूह पैनिक होने लगी।

    जब यारम ने रूह को तेज़ तेज़ सांसे लेते हुए देखा तो वो घबरा गया। रूह के कदम लड़खड़ा रहे थे और उसका पूरा बदन कांप रहा था। रूह ने गिरने के डर से यारम के टी शर्ट को अपनी मुट्ठी में भर लिया। 

    यारम ने भी रूह को अपनी बाहों में भर लिया। यारम ने रूह को 10 साल बाद उससे इस तरह डरकर कांपते हुए देखा था। उसे लगा था की दस साल पहले रूह आठ साला बच्ची थी इसलिए वो पैनिक हो गई थी,

    लेकिन रूह की आज की हालत देख यारम समझ गया की रूह  आज भी उससे उतना ही डरती है भले उसने इस बात को हाइड करना सीख लिया हो मगर उसका फोबिया आज भी वैसा ही है।

    यारम के अपने बाहों में भरने और लगातार रूह के बालों में हाथ फिराने से रूह थोड़ी ही देर में नॉर्मल हो गई।

    "डरो मत Dove वो बस मेरी आंखों में कुछ चला गया था बस इसलिए वो इतने लाल हो गए है" यारम ने जितना हो सके उतने सॉफ्ट आवाज़ में रूह से कहा तो रूह ने धीरे से हां में अपना सिर हिला दिया।

    "भ भाई भाईजान मुझ मुझे घर जाना है" रूह ने अपनी कपकपाती आवाज़ में कहा 

    "ठीक है मैं तुम्हें तुम्हारे घर ड्रॉप कर देता हू और तुम भी घर जाकर सीधा रेस्ट करोगी लेकिन उससे पहले तुम्हें यहां मेरे साथ डिनर करना होगा क्या तुम मेरी बात मानोगी?" यारम ने रूह का चेहरा ऊपर कर उसकी आंखों में देखते हुए सवाल किया तो रूह ने ना चाहते हुए भी अपनी लंबी घनी पलकों को हौले से झपका दिया। 

    यारम ने बेड के साइड रखा बेल प्रैस किया तो एक मुलाजिम कमरे में खाने की ट्रॉली ले आया। 

    रूह ने एक नज़र खाने को देखा जिसमें सारी चीजें उसकी मनपसंद की ही थी। रूह को ये सब देख काफ़ी हैरानी हुई लेकिन उसका दिमाग इस पल इतना थका हुआ था की उसने अपने दिमाग़ के घोड़ों को ज़्यादा दौड़ना सही नहीं समझा।

    यारम ने रूह का हाथ पकड़ उसे सोफे पर बैठा दिया और ख़ुद उसके लिए प्लेट में खाना सर्व कर दिया।

    रूह ने अपने कपकपाते हाथों से खाने की प्लेट को पकड़ा तो वो उसके हाथों से छूट के गिरने को हुआ। इससे पहले की वो प्लेट जमीन पर गिरता यारम ने उसे थाम लिया।

    "तुम्हें काफ़ी वीकनेस है लगता है तुम ढंग से खाना नहीं खाती रुको मैं खिला देता हू"

    "न नहीं भ भाईजान मैं खा लूंगी" रूह ने खाने की प्लेट को पकड़ते हुए कहा 

    तो यारम ने उस प्लेट को अपनी ओर खींच लिया "मैं खिला देता हूं और ये मैं पूछ नहीं रहा बता रहा हूं" यारम ने डोमिनेंस के साथ कहा तो रूह का मुंह देखने लायक रह गया।

    उसे न चाहते हुए भी ये ख्याल आ रहा था की इस पल उसकी हालत कुरबानी के उस जानवर की तरह है जिसे अच्छे से खाना खिलाकर जबाह (कुर्बान) करने के लिए तैयार किया जा रहा हो। उसे इस वक्त वो किसी मेमने और यारम किसी कसाई से कम नहीं लग रहा था जो पैदा ही उसे काटने के लिए हुआ हो।

    रूह ने डर से अपना थूक निगला और यारम के हाथ से खाना खाने लगीं। जब जब रूह के मुलायम चेरी जैसे होठ यारम की उंगलियों को छूते थे यारम के बॉडी में एक करेंट सा दौड़ जाता था।

    "ब बस भ भाईजान मैं अब और नहीं खा सकती" रूह ने अपने मुंह पर हाथ रखते हुए कहा तो यारम उसे घूरने लगा आख़िर रूह ने सिर्फ एक रोटी ही खाई थी।

    "अगर तुमने एक रोटी और नहीं खाई तो मैं तुम्हें घर नहीं जानें दूंगा" यारम ने सपाट लहज़े में कहा तो रूह का मुंह खुला का खुला रह गया। 

    "आखिर इस बीस्ट की हिम्मत कैसे हुईं की वो रूह फारुखी को धमकी दे" रूह ने मन ही मन सोचा

    इसी तरह यारम ने ज़िद कर रूह को एक और रोटी खिला दी। यारम ने अपनी एक उंगली से रूह के होठों के कोने पर लगे खाने को टुकड़े को साफ किया और उसे ख़ुद खा लिया। जिसे देख रूह का सिर चकरा गया।

    आज यारम उसे एक के बाद एक झटके जो दिए जा रहा था। पहले क्लब में मिलना, फिर surprise देन उसका झूठा खाना एंड अगेन ये सब देख रूह ने एक गहरी सांस ली और इन सारी बातों को इग्नोर करना ही बेहतर समझा।

    रूह को खिलाते खिलाते यारम ने भी उसी प्लेट में खाना खा लिया फिर कार ख़ुद ड्राइव कर रूह को अंसारी मंज़िल तक छोड़ने गया।

    कार से निकलकर रूह यारम के पास गई और उसका कोट वापस कर उसने उसे थैंक यू कहा फिर उसे अल्लाह हाफिज बोल अंसारी मंज़िल के अन्दर चली गई।

    यारम बस इस शॉर्ट ड्रेस पहनी लड़की के जाते हुए देखता रह गया जिसने न सिर्फ़ उस नींद चैन सुकुन चुराया बल्कि उसका दिल भी चूरा ले गई थी।

    रूह के पास घर की ऑलरेडी एक्स्ट्रा की थी इसलिए वो किसी को बिना डिस्टर्ब किए उस घर के अन्दर चली गई।

    जब रूह ने अपने कमरे में जाकर लाइट ऑन किया तब जाकर यारम ने अपनी कार चालू की।

    अगली सुबह रूह की नींद मलीहा के आवाज़ से खुली जो उसका दरवाज़ा पिट रही थी।

    रूह ने जाकर दरवाज़ा खोला तो उसे मलीहा नाइट ड्रेस पहने हुए ही दिखाई दी।

    "यार अब तेरी तबियत कैसी है?" मलीहा ने रूह का फीवर चेक करते हुए कहा तो रूह के एक्सप्रेशन अजीब हो गए।

    "शुक्र है अल्लाह का तेरी तबियत अब ठीक ही लग रही है वर्ना कल तेरा मैसेज देख मैं तो घबरा गई थी मगर तूने डिस्टर्ब करने से मना किया था तो मैंने तेरा डोर नॉक नही किया" 

    मलीहा की बाते रूह के दिमाग़ के ऊपर से जा रही थी मगर जब उसने उसकी पूरी बात सुनी तो उसे भी कुछ कुछ समझ आ गया।

    अभी वो दोनों बाते कर ही रहे थे की रूह का मोबाइल रिंग हुआ। रूह ने कॉलर आईडी देखी तो किसी अननोन नंबर का कॉल था।

    जब रूह ने कॉल उठाया तो दूसरे तरफ की बात सुन उसके पैरों तले ज़मीन ही खिसक गई और वो हड़बड़ाते हुए बोली "आप मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकते है!"