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वफ़ा ना रास आई

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Archana

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मिस्टर रणविजय सिंह राणावत.... रॉयल राजपूताना के एमडी... पिछले करीब 5 साल से रॉयल राजपूताना के एमडी के पद पर  निर्विरोध चुने जा रहे हैं..... पहले तो इनकी रॉयल्स राजपूताना कंपनी केवल इंडिया के टॉप टेन में आती थी..... लेकिन जब से इन्होंने इस कंपनी का का...

Total Chapters (47)

Page 1 of 3

  • 1. वफ़ा ना रास आई - Chapter 1

    Words: 1320

    Estimated Reading Time: 8 min

    Hum bewafa hargiz Na thay....

    हम बेवफा हरगिज़ न थे.....



    रॉयल्स राजपूताना

    ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज का ऑफिस

    न्यूयॉर्क (अमेरिका)


    सुबह के दस बज रहे थे.... सभी एंप्लॉय आ चुके थे... और पूरी बिल्डिंग में अफरा तफरी मची हुई थी... जैसे कि कोई इंस्पेक्शन की टीम आने वाली हो। सब तेजी से अपना काम निपटाने पर पड़े थे .... सब अपना हंड्रेड परसेंट वर्क कंप्लीट करने पर जुटे थे। 

    कई टेबल पर वर्कर्स का भी झुंड जमा था.. यह वो थे.. जिनका काम लगभग पूरा हो चुका था.. सभी के चेहरे पर खुशी वाले भाव थे.... पिछले कई दिन से कंपनी के शेयर के भाव आसमान छू रहे थे.... यह जाहिर तौर पर एक अच्छा संकेत था.... पर ऑफिस वालों की असली मुश्किल आज उनके बॉस के आने को लेकर थी.... जिसके कारण पूरे ऑफिस में आर्मी रूल फॉलो किया जा रहा था। कहीं भी कोई गलती की गुंजाइश नहीं थी। कोई यह नहीं चाहता था कि उसके एक काम से सर का मूड बिगड़े और पूरे ऑफिस को इस खुशी में मिलने वाली दमदार बोनस का नुकसान हो। इस कारण पूरा ऑफिस एक ग्रुप की तरह काम कर रहा था। जिन लोगों के काम पूरे नहीं हुए थे.... दूसरे एम्प्लॉय उसमें उनकी मदद कर रहे थे।

    तभी एक चमचमाती हुई ब्लैक रॉयल गाड़ी आकर दफ्तर के सामने लगी। गाड़ी के गेट से इंटर होने से पहले ही ऑफिस में लगा हुआ अलार्म.... जोर जोर से बजने लगा... जो कि सारे एंपलॉयर्स को बताने के लिए काफी था कि कंपनी के मालिक आ रहे हैं .....अलार्म सुनकर सारे एंप्लॉयीज अपनी अपनी जगह पर बिल्कुल शांति से बैठ गए। सबके हाथों में कांग्रेचुलेशन कार्ड और एक फूल था... जिसको कि उन लोगों ने अपनी अपनी डेस्क के आगे रख दिया था।

    गाड़ी के दफ्तर के सामने रुकते ही गार्ड ने तेजी से बढ़ कर दरवाजा खोला और गाड़ी में से करीब पैंतीस या सैतिस साल का युवक निकला .. 6 फीट से कुछ अधिक हाइट.... मस्कुलर बॉडी ....थोड़ी हल्की बड़ी हुई सेव और दुनिया भर की कठोरता चेहरे पर थी....सर से पांव तक उसने ब्लैक कलर का ही कॉम्बिनेशन पहन रखा था। बस हाथ में चमचमाती हुई सोने की चेन वाली राडो घड़ी थी और ब्लैक सूट पर लगाया हुआ.... सोने का कलम.... जिसमें की हीरे जड़े हुए थे.... और उन हीरो से ही उस पर R लिखा हुआ था।

    युवक ने एक नजर सामने खड़ी दस मंजिला इमारत पर डाली और सीधे ऑफिस गेट से चला गया.... ड्राइवर ने गाड़ी ले जाकर पर्सनल पार्किंग में लगा दी।

     ऑफिस तक पहुंचने के लिए उस युवक ने पर्सनल लिफ्ट का यूज किया। लिफ्ट में जाते ही उसने अपना हाथ स्केनर पर रख दिया और 7th फ्लोर का बटन दबा दिया।

    यह है मिस्टर रणविजय सिंह राणावत.... रॉयल राजपूताना के एमडी... पिछले करीब 5 साल से रॉयल राजपूताना के एमडी के पद पर  निर्विरोध चुने जा रहे हैं..... पहले तो इनकी रॉयल्स राजपूताना कंपनी केवल इंडिया के टॉप टेन में आती थी..... लेकिन जब से इन्होंने इस कंपनी का कार्यभार संभाला है... तब से लेकर आज तक कंपनी ने केवल सफलता के ऊंचे मुकाम को ही छुआ है .....जिसका परिणाम है कि आज ये विश्व की प्रमुख कंपनियों में एक है.... पिछले एक सप्ताह से ये अपने वर्ल्ड टूर पर निकले हुए थे और इसी दौरान उन्होंने करीब चार कंपनियों को ओवरटेक किया था और कई कंपनियों को साथ अच्छे बिजनेस कॉन्ट्रैक्ट साइन किए थे... जिससे इस पूरे ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज को काफी फायदा होने वाला था। इस कारण इस टाइम मार्केट में इनकी कंपनी के शेयर इतनी तेजी से उछले थे कि इन्होंने पिछले बीस साल से लगातार.... शीर्ष स्थान पर रहने वाली कंपनी को भी पीछे छोड़ दिया था।

    इनकी यह पर्सनल लिफ्ट केवल इन्ही के स्कैनिंग से काम करती थी। इनके अलावा किसी को भी इस लिफ्ट को यूज करने की परमिशन नहीं थी। 7th फ्लोर पर इनका ऑफिस था..... लिफ्ट सीधे जाकर 7th फ्लोर पर रुकी ....गेट के ओपन होते ही दरवाजे के ठीक सामने.... इनकी सेक्रेटरी मिस एलिना उम्र 26 साल... खड़ी थी ।

    "गुड मॉर्निंग सर" एलिना ने सर झुका कर गुड मॉर्निंग विश किया। जवाब में रणविजय ने अपने सर को हल्का सा हिलाया और आगे बढ़ने लगा।

    "यहां ऑफिस में और सब कुछ कैसा चल रहा है ??" रणविजय ने एलीना से पूछा।

    " सब कुछ बढ़िया है सर.... कांग्रेचुलेशन.... हमारी कंपनी वर्ल्ड की टॉप कंपनी में आ गई है.... सारी इंप्लाइज इस चीज को लेकर बहुत उत्साहित हैं और आपको कांग्रेचुलेशन करना चाहते हैं।"एलीना तेजी से बोली।

      मिस्टर राणावत ने उनके बधाई का जवाब भी देना जरूरी नहीं समझा और तेजी से आगे अपने केबिन की तरफ बढ़ चले। एलिना उनके पीछे दौड़ती भागती हुई.... उनसे आज के शेड्यूल के बारे में जा रही थी। केबिन पर के दरवाजे पर पहुंचकर मिस्टर राणावत ने एलिना की तरफ देखा। एलिना उनके आंखों के इशारे को समझ गई और उसने तेजी से सिर हिला कर कहा," ओके सर , मैं लाती हूं।

    "सुनो..... जितने भी कांग्रेचुलेशन कार्ड हैं.... सबको कलेक्ट कर लो और सबको दो घंटे के बाद.... कॉन्फ्रेंस हॉल में इकट्ठे होने के लिए बोलो...." रणविजय ने ऑर्डर दिया।

    "ओके सर...."

    मिस एलिना एक गहरी सांस छोड़ी और मिस्टर राणावत की कॉफी बनाने के लिए चल दी। 

    मिस्टर राणावत अपने केबिन का दरवाजा खोलकर अपने केबिन के अंदर दाखिल हो गए। उन्होंने एक पूरी नजर अपने केबिन पर दौड़ाई.... सब कुछ बिल्कुल व्यवस्थित था ....नीले और सफेद रंग के कॉन्बिनेशन वाले इस केविन का इंटीरियर उनकी आंखों को सुकून पहुंचा रहा था.... उन्होंने अपना कोट खोलकर चेयर पर डाला और खुद चेयर पर रिलैक्स हो ... बैठकर आंखें मूंद ली । एक सप्ताह तक कि ये भागदौड़ वाकई थकान देने वाली थी.... पूरा समय उसका केवल उबाऊ बिजनेस मीटिंग्स में निकल गया था।

     एक सप्ताह के बाद वापस अपने ऑफिस में पहुंचकर रणविजय अब अपने आप को कुछ पूरसकून महसूस कर रहा था। उसने अपनी शर्ट का ऊपर वाला बटन खोला और टाई की नॉट थोड़ी ढीली की.... और अपना एक हाथ अपने आंखों पर रख लिया। लगातार जागते रहने के कारण आंखें बोझल हो रही थी और हल्का हल्का सर में दर्द भी हो रहा था।

     आंखें बंद करते ही उनकी आंखों के आगे एक खूबसूरत चेहरा लहराया.. यह चेहरा... उनकी ताकत... उनका प्यार... उनकी दुनिया.. उनका जहान... सब कुछ थी... ...इन्होंने हाथ आगे कर उस चेहरे को हाथ में लेने की कोशिश की.... उस चेहरे की मुस्कुराहट इतनी खूबसूरत थी कि रणविजय कि सारी थकान एक ही पल में दूर होने लगी.... चेयर पर बैठे ही बैठे रणविजय के होठ हल्के से मुस्कुराने के लिए फैले। उस चेहरे की आंखों में इतनी चमक थी.... जिसने रणविजय की जलती हुई आंखों को पल में ठंडा कर दिया था... मुस्कुराते हुए चेहरे के होठ गुलाब की पंखुड़ियों जैसे गहरी लाल थी । जैसे हवा चलने पर फूल की पंखुड़ियां कांपती हैं.... उसी तरह ये होठ हल्के हल्के कांप रहे थे ....जैसे अभी के अभी खुल कर रणविजय को उसकी कामयाबी के लिए कांग्रेचुलेशन कहने के साथ-साथ एक खूबसूरत इनाम भी देने वाले हैं.... रणविजय आगे बढ़कर पहले ही उन होठों के शब्द अपने होठों से चुरा लेना चाहता था......उस चेहरे की खूबसूरती पूरी तरह से डूब जाना चाहता था.... रणविजय का गला प्यास से सूखने लगा। रणविजय अपनी प्यास बुझाना चाहता था। चेयर पर बैठे-बैठे ही वह आगे उस चेहरे की तरफ झुकने लगा।

     तभी अचानक से उस खूबसूरत लड़की ने तेज आवाज में चिल्ला कर कहा," हां चाहिए मुझे पैसा.... हां मैं भागती हूं पैसे के पीछे.... अरे पैसों की बिना तो दुनिया ही नहीं चल सकती.... हमारी गृहस्थी क्या खाक चलेगी?? आज सामने जिस प्यार के बारे में .....खड़े होकर पूछ रहे हो ना.... खत्म हो जाता हमारा यह प्यार ......अगर यह पैसा नहीं होता तो.... कुछ नहीं रहता हमारे पास.... नहीं हमारा प्यार और ना ही हमारी जिंदगी. " रणविजय जैसे नींद से जागा....वह घबरा कर दो कदम पीछे होने लगा। वह अपनी चेयर से उठ कर खड़ा हो गया ।

    "नहीं" रणविजय जोर से बोला।


    to be continued.....



    हर हर महादेव 🙏

  • 2. वफ़ा ना रास आई - Chapter 2

    Words: 1397

    Estimated Reading Time: 9 min

    "सर के दिमाग में भी क्या चलता है क्या नहीं ??कुछ समझ नहीं आता.... सारे इंप्लॉयस की सारी सुविधा का ध्यान भी रखते हैं.... पर कुछ जताते नहीं.... जताते तो ऐसे हैं जैसे कि इनके जैसा इमोशन लेस और हार्ड लेस पर्सन दुनिया में कोई नहीं है..... दुनिया के सबसे खड़ूस और अकडू बॉस है.... पर हकीकत तो सिर्फ मैं ही जानती हूं.... नो नो एलिना.... सर के बारे में तुझे कुछ भी नहीं सोचना है..... अगर दो सेकंड की भी देरी हुई तो सर तुझे फायर करने में एक सेकंड भी नहीं लेंगे.... और इससे अच्छी जॉब इस पूरे वर्ल्ड में.... तुझे कहीं नहीं मिल सकती..... ना ही इतनी खूबसूरत सैलरी और ना ही इतनी फैसिलिटी.... इसलिए चुपचाप सारी बातों से ध्यान हटाकर.... फास्टली डू यौर वर्क एलिना..... ओह गॉड.... ऐसा इमोशनलेस हार्टलेस पर्सन मैंने अपनी पूरी लाइफ में कहीं नहीं देखा..."एलीना अपने ही मन में रणविजय के बारे में सोचती और बोलती हुई एक इमैजिनेशन बना रही थी। उसका पूरा ध्यान कॉफी बनाने में था..... क्योंकि अगर इस कॉफी के स्वाद में अगर थोड़ी सी भी रणविजय को कमी लगती तो फिर यह कॉफी सीधे फर्श पर टूटे हुए मग साथ.... अपनी किस्मत पर रो रही होती और साथ में एलीना भी।
    इस बात को सोचकर ही एलीना के पूरे बदन ने झुर्झुरी सी ली।


    " हाय मिस एलिना।" कॉफी लेकर जैसे ही वो मुड़ी उसके पीछे शिवम खड़ा था।
    " ओ हेलो शिवम। तुमने तो मुझको बिल्कुल डरा ही दिया था। " एलिना घबराती हुई बोली। किसी तरह से उसने मग में से कॉपी छलकने से बचाया था।
    " क्या हुआ मिस एलिना... सब सही है ना..." शिवम ने पूछा।
    जवाब में एलिना ने कंधे उचका दिए " बंदा अगर मुंह से कुछ ना बोले.... तो कैसे समझ में आएगा कि क्या ठीक है और क्या नहीं??"
    "मतलब??" शिवम को हैरानी हुई।
    "मैं अपने बॉस की बात कर रही हूं .....कितने हैंडसम है ना?? पर देखो लगता है जैसे गॉड इस खूबसूरत चेहरे को बनाने के बाद ....उसमें दिल डालना ही भूल गया है...." एलिना ने अदा के साथ अपने बालों को पीछे छोड़ते हुए कहा ।
    एलिना की बात सुनकर शिवम मुस्कुरा दिया।
    " दिल डालना भूल गया है या ....उस दिल में तुम्हारे लिए प्यार डालना भूल गया है??"शिवम ने मुस्कुराते हुए एलीना के कंधे पर हाथ रख कर पूछा।
    " नो ...नो ...सिर्फ मेरे लिए ही नहीं... किसी के लिए भी.... उस दिल में थोड़ा भी प्यार नहीं है। पता है शिवम ....आज पूरा स्टाफ सर के लिए कांग्रेचुलेशन कार्ड लेकर आया है ....पर मैं अच्छी तरह से जानती हूं कि सर इसे भी एक्सेप्ट नहीं करेंगे.... उन्होंने मेरा कांग्रेचुलेशन भी एक्सेप्ट नहीं किया.. उन्होंने कार्ड्स कलेक्ट करने को तो कह दिए हैं पर मैं अच्छी तरह से जानती हूं कि सारे कार्ड्स रीसाइक्लिंग फैक्ट्री में ही जाने वाले हैं... बस दिन-रात काम काम.... लगता नहीं कि बंदा इंसान है.... बिल्कुल मशीन.. जिसे कि मुस्कुराना भी नहीं आता।"एलिना मुंह बनाती हुई बोली।
    "ओ..हो..तो तुम इसलिए नाराज हो कि तुम्हारे बॉस ने तुम्हारी तरफ मुस्कुरा कर नहीं देखा। लो मैं हंसते हुए देखता हूं... अब खुश हो जाओ.... तुम वाकई में बहुत खूबसूरत हो।" शिवम ने हंसते हुए एलिना से कहा।
    " तुमको देखकर तो ऐसे ही मेरे चेहरे पर स्माइल आ जाती है ..... इस झूठी तारीफ की जरूरत ही नहीं थी शिवम..... दस महीनो में मैंने पहली बार ....तुम्हारे आने पर सर को मुस्कुराते हुए देखा... सिर्फ दो सेकेंड के लिए.... अदर वाइज आज तक मुस्कुराए भी नहीं.... ऐसा सिर्फ मैं नहीं कहती.... बल्कि सारा स्टाफ कहता है ....जो कि यहां पर पिछले दस सालों से काम कर रहा है।"एलिना ने मायूसी से कहा।
    "सच में ये बात पर मेरी भी समझ में नहीं आती.... कि कोई इंसान इतना चेंज कैसे हो सकता है??" शिवम धीरे से बोला।
    " कुछ कहा तुमने...." एलिना ने पूछा। जवाब में शिवम ने ना में सिर हिलाया।
    "पर शिवम तुम यहां आज कैसे ?? तुम्हारा कॉलेज तो अपोजिट साइड में है ना...." एलिना ने शिवम से पूछा।
    " यस कुछ पर्सनल काम है.. तुम्हारे बॉस के साथ......"शिवम ने बताया।
    " ओ...." एलिना ने सोचने वाले अंदाज में होठ गोल किए। "क्या काम है.... अगर तुम बताना चाहो तो.....??""
    " आदित्य चाचू ने यह कार्ड दिया है ....शायद कोई बिजनेस पार्टी का कार्ड है.... साथ में यह भी कहा है कि सीधे ले जाकर चाचू के हाथ में ही देना है।" शिवम ने एक कार्ड एलीना के आंखों के आगे लहराते हुए कहा।
    "पार्टी का कार्ड!!! मुझे नहीं लगता कि सर जाएंगे..." एलिना ने बुरा सा मुंह बनाया।
    " क्यों ??"शिवम ने एलीना की तरफ गहरी नजरों से देखते हुए पूछा।
    "सर को पार्टीज बिल्कुल नहीं पसंद ....तुमको पता है शिवम.... सर हर साल कई बिजनेस पार्टीज और इवेंट ऑर्गेनाइज करते हैं ...पर खुद किसी पार्टी में मुश्किल से दो मिनट से ज्यादा के लिए.... आज तक वहां नहीं पहुंचे।" एलिना ने बताया।
    "पता नहीं क्यों शिवम....कभी कभी मुझे ऐसा लगता है कि तुम्हारे और आदित्य सर के अलावा .....शायद सर का कोई दोस्त भी नहीं और ना ही उन्होंने आज तक किसी को दोस्त बनाया.. नहीं यहां, नहीं इंडिया में.. ओनली बिजनेस राइवल्स.... बिजनेस फ्रेंड.... तुम बहुत लकी हो... जिससे कि सर इतना नॉर्मल वे में बात करते हैं।" एलिना ने कॉरीडोर में चलते हुए शिवम से कहा।
    " यह बात तो सही है.... बचपन में उन्होंने मुझे अपनी साइकिल पर भी घुमाया है..." शिवम मुस्कुराया।
    "रियली??" एलीना सरप्राइस थी।
    "तुम्हें कोई शक लगता है क्या??" शिवम ने एक अदा के साथ अपने बालों पर उंगलियां करते हुए कहा ।
    एलिना ने हां में सिर हिलाया फिर ना।" मेरा कहने का यह मतलब है कि सर को बच्चे भी पसंद है?? यह बात मुझे आज पता चली.... अदर वाइज सर तो लड़कियों की तरफ ही नहीं देखते.... तो बच्चे कहां से पसंद होंगे?? शिवम.... तुम्हें पता है सर ने शादी क्यों नहीं की अब तक??" एलिना मिस्टर राणावत की निजी जिंदगी के बारे में कुछ जानना चाहती थी। जो कि बिल्कुल एक रहस्य थी उन लोगों के लिए।
    "क्यों चाचू से शादी करने का इरादा है क्या??" शिवम ने पूछा।
    " नो .....नो...... मेरा कोई ऐसा इरादा नहीं है.... वह तो मैंने ऐसे ही पूछ लिया.. मुझे मेरी जॉब कंटिन्यू करने का इरादा है..... सर से मत बताना.... वरना उन्हें मुझे यहां से उठा कर फेंकने में .... दो सेकंड भी नहीं लगेंगे.... लास्ट मंथ इनके पेरेंट्स आए थे.... तो वह भी सर पर शादी का दबाव बना रहे थे....मिस्टर राणावत ना सिर्फ गुड लुकिंग और हैंडसम है..... बल्कि वर्ल्ड के मोस्ट एलिजिबल बैचलर्स में से भी एक है.... इनके पीछे ए वन मॉडल से लेकर हाई प्रोफाइल बिजनेस वूमेंस की लाइन लगी रहती है.... पर मजाल है सर एक बार ही सही उनकी तरफ देख ले..... "


    एलिना की बात सुनकर शिवम सोच में डूबा हुआ था.... मिस्टर राणावत उसके नहीं..... उसके छोटे चाचू के बेस्ट फ्रेंड थे... दोनों की फैमिली में अच्छे बिजनेस रिलेशन होने के साथ-साथ.... फैमिली रिलेशन भी थे। शिवम उन बच्चों में से था.... जो मुंह में सोने का चम्मच लेकर पैदा ही होते हैं.. पढ़ाई लिखाई भी क्या करनी है? आखिर संभालना तो पेरेंट्स का लंबा चौड़ा बिजनेस ही है ना....वह अमेरिका भी पढ़ाई के लिए कम.... चाचू से सीखने के लिए ज्यादा आया था.... क्योंकि रणविजय चाचू उसके आइडियल भी थे.... बचपन से ही शिवम अपने पापा से ज्यादा अपने चाचू आदित्य प्रताप और रणविजय राणावत के नजदीक था और उन दोनो की कई स्वीट मेमोरीज उसके दिमाग में भी थी।



    वह अमेरिका आते वक्त भी बहुत खुश था कि बिजनेस स्टडी के साथ-साथ उसे जिसके अंडर उसे काम सीखना है... वह उसके फेवरेट चाचू हैं.... लेकिन यहां आकर उसने रणविजय को दूसरे ही रूप में देखा था..... हालांकि रणविजय अभी भी उसके साथ बहुत नरम था....पर हर वक्त होठों पर सजी रहने वाली मुस्कुराहट.... जो कि उसके फेवरेट चाचू की पहचान थी .... वह अब रणविजय के होठों से काफी दूर जा चुकी थी। पहले ही वो रणविजय के इस तरह से अमेरिका आने पर .... काफी उलझा हुआ था ......पर यहां आकर उसे और भी सब कुछ उलझा हुआ मिला था। जिंदगी के हर एक पल को जीने वाले उसके चाचू.... आज एक बिल्कुल मशीन बन कर रह गए थे.... खुशी से हर वक्त चमकता हुआ उनका चेहरा.... आज खोजने पर भी उनके चेहरे पर उसे दिखाई नहीं पड़ता था।
    पर किस से पूछता?? घर में भी कोई भी कुछ बताने को तैयार नहीं था।
    दोनों राणावत की केबिन की ओर बढ़ गए ।

    *******

  • 3. वफ़ा ना रास आई - Chapter 3

    Words: 1360

    Estimated Reading Time: 9 min

    एपिसोड 3 (बेस्ट ग्रुप की बर्बादी)

    एलिना ने केबिन के दरवाजे पर नॉक किया...
    "यस , कम इन..."मिस्टर राणावत ने बिना देखे ही एलिना को अंदर आने के लिए कहा.... वह अपना लैपटॉप खोले हुए अपना काम कर रहा था । साथ में उसकी एक निगाह दूसरे लैपटॉप पर चल रहे उसके ऑफिस की सीसीटीवी फुटेज पर भी था.... जो कि उसे पूरे ऑफिस में हो रहे.... उसके सारे एंप्लाइज की गतिविधियां बता रही थी। इसी बीच रहकर वह सामने लगी हुई एलईडी स्क्रीन पर भी नजर डाल लेता था। जहां उसकी कंपनी के शेयर की मार्केट वैल्यू दिखाई जा रही थी। साथ में हर एक कंपनी के साथ उसके कंपैरिजन भी चल रहे थे।
    एलिना कॉफी का मग उनकी टेबल पर रख कर वहीं सामने खड़ी हो गई.... मिस्टर राणावत उंगलियां तेजी से लैपटॉप पर चल रही थी और आंखें..... एक साथ तीन तीन जगहों पर नजर रखे हुए थे। रणविजय ने अपना काम करते हुए ही.... कॉफी का मग उठाया और होठों से लगा लिया.... एलिना चुपचाप खड़ी थी।
    पहला घूंट पीने के बाद..... मिस्टर राणावत ने एलिना की तरफ देखा.... रणविजय की आंखों में कुछ ऐसा था एलीना कांप गई।
    " शिवम सर आपसे मिलने आए हैं..." एलिना घबराती हुई बोली।
    "आदित्य हो या शिवम.... ऑफिस में कोई उन्हें नहीं रोकेगा.... यह बात कितनी बार बतानी पड़ेगी... मिस एलिना।" रणविजय ने कॉफी का मग टेबल पर रखते हुए एलीना से कड़े शब्दों में पूछा।
    " ओके सर.... ओके सर... भेजती हूं.... मैंने कहा था उन्हें आने के लिए.... पर उन्होंने ही आप से परमिशन लेने को कहा।" एलिना सर पर पैर रख करके बाहर भागी ।
    "तुम मुझे मरवा दोगे ।क्या मैं तुम्हें इस ऑफिस में अच्छी नहीं लगती ?? "एलिना ने बाहर निकल कर धीरे से शिवम से पूछा।
    "कहा था ना तुम्हें कि साथ चलो.... पर तुम तो ....अब खड़े होकर मेरा मुंह क्यों देख रहे हो?? जल्दी जाओ... वरना सर मुझ पर फिर चिल्लाएंगे... फायर."एलीना ने उंगली से इशारा करते हुए बताया।
    एलीना की इस हरकत और डर पर शिवम खुलकर मुस्कुरा दिया।
    " डोंट वरी... डोंट वरी... मेरे होते तुम्हें कुछ नहीं होगा.... तुम अपनी ड्यूटी करो.."
    अगले ही पल दरवाजे पर शिवम था।
    "पूछने की जरूरत नहीं है .....चुपचाप अंदर चले आओ.... " रणविजय राणावत का दमदार ऑर्डर सुनकर शिवम हल्के से मुस्कुराता हुआ .... केबिन में आकर खड़ा हो गया।
    " अब क्या बैठने के लिए भी पूछोगे? या फिर मुझे कहना पड़ेगा..." रणविजय ने शिवम की तरफ देखते हुए पूछा।
    " नो नो चाचू ....इट्स ओके....."शिवम सामने वाली चेयर पर चुपचाप बैठ गया।
    " चलो तुमने चाचू तो कहा.... वरना मुझे तो लगा था कि कही तुम भी सर बुलाना शुरू ना कर दो ... वैसे यह सर सर.... सुनते सुनते सच में ... सर में दर्द होना शुरू हो गया है मेरे...." रणविजय ने बहुत गौर से शिवम की आंखों में देखते हुए कहा। शिवम के आधे शब्द मुंह में और आधे गले में अटके थे.... रणविजय की दमदार पर्सनालिटी के आगे शिवम के होठों से भी आवाज बहुत मुश्किल से निकल रही थी...... हालांकि वह खुद एक दमदार पर्सनालिटी का बाइस या तेईस साल का युवक था और देखने में बिल्कुल रणविजय के छोटे भाई की तरह लग रहा था।
    शारीरिक बनावट में शिवम उन्नीस था तो रणविजय बीस।
    शिवम को जब कुछ देर तक कुछ नहीं समझ में आया कि वह क्या जवाब दे.. या फिर बातों का सिलसिला आगे कैसे बढ़ाए.. तो उसने कार्ड रणविजय के आगे कर दिया। एक नजर कार्ड पर डाली और शिवम से पूछा," ये तो घर पर भी दिया जा सकता था ना.... आदित्य ने कुछ बताया नहीं इस बारे में...."
    " सॉरी चाचू.... उन्होंने कहा था कि कार्ड आपके हाथ में ही देना है और आज आप वापस ऑफिस आ जाएंगे... मेरा हॉस्टल अपोजिट साइड में पड़ता है... आपके घर से.... इसलिए मैं ऑफिस में ही लेकर आ गया...."शिवम ने आंखें झुकाते हुए सफाई दी।
    " आपके घर से??? क्या मतलब है तुम्हारा?एक मिनट.... क्या कहा तुमने?? तुम्हारे हॉस्टल से..... कहीं तुम हॉस्टल में तो नहीं रह रहे?"रणविजय ने बिल्कुल डांटने वाले लहजे में शिवम से पूछा।रणविजय की डांट सुनकर शिवम को जवाब देते नही बन पा रहा था।
    " माना कि मैं उस वक्त यहां नहीं था ....जब तुम यहां रहने के लिए आए थे लेकिन.... घर को उठा कर मैं... अपने साथ लेकर... टूर पर नहीं गया था.. वह यहीं पर था.... ऑफिस में भी मैंने सब से कह रखा था और घर पर भी... तुम को घर जाना चाहिए था. "रणविजय ने गुस्से में अपना बोलना शुरू ही रखा।
    वही शिवम के मुंह से तो आवाज ही नहीं निकल पा रही थी ... पहले तो चाचू के पास आने को सुनकर ही खुश था.... लेकिन जब उसने चाचू का यह बदला हुआ रूप केवल आसपास के लोगों से सुना.... तो बिना बताए ही हॉस्टल में शिफ्ट हो गया और अब... अब शिवम के पास भागने का कोई रास्ता नहीं था । ना चाहते हुए भी उसे अब रण विजय के घर पर सिफ्ट होना ही पड़ेगा।
    "हे भगवान! डैड के जेल से ज्यादा बड़ी ना हो ...चाचू का घर..." शिवम ने बेबसी में अपनी आंखें बंद कर ली। रणविजय ने इंटरकॉम प्रेस किया.... सामने एलिना खड़ी थी।
    रणविजय एलिना से शिवम को गाड़ी की चाबी देने के लिए कहा..." सारा सामान लेकर शाम तक... सीधे घर पर मिलो....."रणविजय का नया ऑर्डर था.... शिवम के लिए।
    "थैंक्यू चाचू....." गाड़ी की चाबी देखकर शिवम ने एक जबरदस्त फ्लाइंग किस एलिना की तरफ उछालते हुए रणविजय से कहा।
    शिवम की ये हरकत रणविजय के आंखों से छुपी हुई नहीं रही।
    " शिवम....."रणविजय की धीर गंभीर आवाज केबिन में सुनाई पड़ी..
    "आई लव यू चाचू...."... शिवम मुस्कुराते हुए ...चाबी को गोल-गोल उंगलियों पर घुमाते हुए ... बाहर निकल गया... जाते-जाते उसने अपनी एक आंख एलीना के सामने दबा दी। जिसको देखकर अलीना भी मुस्कुरा उठी। वह ऐसा ही इंसान था हरफनमौला.....
    "मिस एलिना.... सत्यम ग्रुप को हैंड ओवर करने वाले सारे पेपर रेडी हो गए हैं??" रणविजय ने गुस्से में एलिना से पूछा।
    " यस सर, थोड़ा सा काम बाकी है। अभी पूरा करके.... लेकर आती हूं....." एलिना घबराती हुई बोली।
    "मैं आपको काम करने के पैसे देता हूं... फ्लर्ट करने के नहीं.... और सुनिए..... शिवम की हरकतों को ज्यादा नोटिस करने की जरूरत नहीं है ....बच्चा है वह....." रणविजय ने एक-एक शब्द चबाकर एलीना से कहा। एलिना चुपचाप सर झुका कर केबिन से बाहर निकल गई।
    रणविजय ने एक नजर शिवम के दिए हुए कार्ड पर डाली.... उस पर फ्रॉम द बेस्ट ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज लिखा था.... रणविजय ने दूसरी नजर अपने लैपटॉप पर डाली.... जहां पर उसके शेयर के मार्केट वैल्यू दिख रहे थे...... फिर उसने सामने लगी हुई एलईडी स्क्रीन पर एक नजर डाली। जल्दी से उसकी हाथों की उंगलियां लैपटॉप पर सर्च करने लगी।
    मार्केट में तो उनकी कंपनी के शेयर ने आग ही लगा दी थी..... उन्होंने बेस्ट ग्रुप की कंपनी के शेयर देखें । द बेस्ट ग्रुप ऑफ कंपनी आज उनसे बहुत पीछे थी.... मिस्टर राणावत ने झटके से लैपटॉप बंद किया और कहा,"तो यह है तुम्हारा ठिकाना..... द बेस्ट ग्रुप.... पर कल तक था.... कल नहीं रहेगा। क्योंकि कल सुबह तक तो इस कंपनी का नामोनिशान ही बाकी नहीं रहेगा। बर्बाद कर दूंगा मैं उन सब को..... जिन्होंने मुझको बर्बाद किया.... या फिर जिनका थोड़ा सा भी हाथ मेरी बर्बादी के पीछे था.... कुछ भी बाकी नहीं रहेगा।
    द बेस्ट ग्रुप .....मेरा नेक्स्ट टारगेट.... आज रात ही खत्म हो जाएगा.... फिर देखता हूं तुम कहां छुपती हो?? और कौन तुम्हें छुपा लेता है मेरी आंखों के घेरे से??
    पैसा.... पैसा चाहिए था तुमको..... प्यार का सौदा पैसों के लिए किया था ना तुमने..... आज तुम्हारी जरूरत और तुम्हारी उम्मीद से भी ज्यादा पैसा है मेरे पास.... आ रहा हूं मैं तुम्हारे पास..... लौटा देना मुझे ...मेरा प्यार और मेरी जिंदगी।"रणविजय ने गुस्से से लैपटॉप झटके से बंद किया। गुस्से और बेबसी की एक लहर ने उसे अपनी चपेट में ले लिया था। रणविजय ने कस कर अपनी आंखें बंद कर ली। आंखों के आगे फिर से वह हंसता मुस्कुराता साया लहरा गया..... जैसे कि रणविजय की हालत के मजे ले रही हो।
    "पहले ढूंढो तो मुझे......"
    "नही......."रणविजय गुस्से में अपनी टेबल पर हाथ रख कर उठ कर खड़ा हो गया।



    हर हर महादेव 🙏

  • 4. वफ़ा ना रास आई - Chapter 4

    Words: 1360

    Estimated Reading Time: 9 min

    एपिसोड 4
    कड़वी यादों का सामना

    पिछले कई दिनों से रणविजय की हालत ऐसे ही थी.... वह जब भी आंख बंद करके थोड़ा सा रिलैक्स होने के लिए सोचता था..... इसी तरह से इशानी आकर उसके सोए हुए जज्बातों को जगा देती थी और जैसे ही वह इन जज्बातों में डूबते जाता था..... उसे इशानी का दिया हुआ धोखा .... इशानी की कही हुई कड़वी बातें याद आने लगती थी। उसके कानों में गूंजने लगती थी रणविजय पागलों की तरह चिल्ला उठता था।
    इन सब चीजों से बचने के लिए रणविजय ने अपने आप को पूरी तरह से काम में डूबा दिया था । वह एक सेकंड भी खाली बैठा नहीं चाहता था। पर यह कैसे संभव हो पाता ?? दिन तो काम में उलझा हुआ बीत भी जाता था..... पर राते !!!! रातें नहीं कटती थी ... रात होते ही..... नींद से पहले उसकी आंखों में उसकी यादें अपना कब्जा जमा लिया करती थी। पूरी रात बिस्तर पर करवटें बदलते ही बीतती थी।
    इन्हीं यादों से बचने के लिए उसने दिन रात काम करना शुरू कर दिया था .....पर फिर भी यह यादें उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी।
    जलती हुई आंखों को ठंडक पहुंचाने के लिए जैसे ही वह अपनी आंखें बंद करता ... यह यादें ...... बिना कोई आवाज किए .....उसके जेहन में तैरने लगती थी और फिर इन बातों की कड़वी यादें.... उसकी आंखों को ठंडक क्या देती?? बल्कि उसके दिल का भी सुकून छीन लिया करती थीं।
    लैपटॉप बंद करके रणविजय ने द बेस्ट कंपनी का कार्ड अपने हाथों में उठा लिया । वह कार्ड उलट-पुलट कर देख रहा था.... तभी उसका मोबाइल बजने लगा। रणविजय ने एक बेहद अफसोस भरी नजर अपने मोबाइल पर डाली ....यहां आकर करीब एक सप्ताह के बाद उसने अपना पर्सनल मोबाइल ऑन किया था।काम के समय में उसका मोबाइल अधिकतर स्विच ऑफ ही रहता था... स्क्रीन पर नाम मॉम का नाम था। रणविजय ने एक गहरी सांस ली और फोन को उठा कर कान से लगा लिया....
    " यश मॉम... बोलिए कैसी हैं आप??" रणविजय ने पूछा।
    " जब फोन करो तो याद रहता है कि इस दुनिया में तुम्हारी मॉम भी है ....वरना यह तो कभी याद नहीं रहता कि कभी खुद से भी फोन करके अपनी मॉम का हालचाल ले लो। एक सप्ताह से तुम्हारा फोन बंद आ रहा था... कहां थे तुम??" उधर से साधना जी का प्यार भरा गुस्से वाला स्वर सुनाई पड़ा... जिसको सुनकर रणविजय के होठों पर हल्की सी मुस्कुराहट तैर गई।
    " जाऊंगा कहां मॉम... वही कुछ बिजनेस मीटिंग और डील्स थे..."
    " हां हां पता है... सुना मैंने तुम्हारे डैड से.... पर बेटा बिजनेस के अलावा भी एक दुनिया होती है... तुम्हारा एक घर भी है इस दुनिया में.... जिसमें तुम्हारी मॉम भी रहती है.... याद है ना...." साधना जी की बात सुनकर रणविजय चुप था।
    "अब कुछ बोलोगे भी.... खाली चुपचाप सुनने से बोलने वाले को शक होता है कि वह इंसान से ही बात कर रहा है या फिर दीवार से..." साधना जी बोली।
    " आप भी न मॉम.... डैड के साथ रहते रहते... आप भी बिल्कुल डैड के जैसी होती जा रही हैं.... मैं सुन रहा हूं आपकी बात.... कहीए क्या कहना चाहती हैं आप.."
    " मैंने तुम्हारे फोन पर कुछ लड़कियों की तस्वीर भेज रखी है.... इनको देखकर फाइनल कर देना।"साधना जी ने एक लाइन में अपनी बात कही।
    "मॉम प्लीज....." रणविजय के स्वर में रिक्वेस्ट था।
    " नो ......"साधना जी ने जैसे सीधे फैसला सुनाया।
    "मॉम प्लीज, आप तो मेरी बात सुनिए।" रणविजय ने कहना चाहा।
    " करीब बारह साल, बारह साल मैंने तुम्हारी बात सुनी... और अब नहीं... अब तुम ही मेरी बात ना सिर्फ सुननी पड़ेगी बल्कि माननी ही पड़ेगी। अब तुम्हें शादी करनी ही होगी..क्या चाहते हो तुम.... तुम्हारी शादी का अरमान लिए ही मैं मर जाऊं.??. तुम्हारी उम्र के सारे लड़के एक दो बच्चे के बाप बन चुके हैं और तुम.... तुम सिरे से शादी भी नहीं करना चाहते।"साधना जी ने गुस्से से कहा।
    "मैंने शादी की थी मॉम.... क्या नतीजा निकला उस शादी का??" रणविजय ने थके हुए अंदाज में कहा।
    " बेटा, दुनिया में भगवान ने हर चीज बनाई है ....अगर दुनिया में प्यार है तो... दुनिया में धोखा भी होता है.... जब हम रास्ते पर चलते हैं तो हमें ठोकर भी लगती है.... लेकिन ठोकर के डर से हम चलना नहीं छोड़ सकते।"साधना जी ने प्यार से समझाया।
    "उसने मुझे छोड़ा नहीं था मॉम.... मैंने उसे छोड़ा था... उसने मुझ पर बेवफाई का इल्जाम लगाया था... उसने मुझको बेवफा कहा था.... और जब सच्चाई सामने आई तो उसने सब कुछ यह सब पैसों के लिए किया था....." रणविजय के एक-एक शब्द में उसकी बेपनाह नफरत दिखाई पड़ रही थी।
    " भूल क्यों नहीं जाता ....बेटा ,इस बात को...." साधना जी धीरे से बोली।
    " कैसे भूल जाऊं मॉम.... कैसे भूल जाऊं मैं ?? सब कुछ भुला सकता हूं लेकिन अपने चरित्र पर उठी हुई उसकी उंगली मुझे नहीं भूलती.... नहीं भूल पाता मैं कि वह मेरे आंखों के सामने से..... मेरा प्यार ,मेरी जिंदगी मेरे हाथों से खींच कर ले गई थी।"
    "पर बेटा....."साधना जी उससे और भी बहुत कुछ समझाना चाहती थी।
    "बस एक महीना मॉम.... जैसे बारह वर्ष इंतजार किए ना..... वैसे ही सिर्फ एक महीना.... और इंतजार कर लो.... उसके बाद जो तुम चाहोगी... वही होगा... लड़की तुम पसंद कर लेना... मैं शादी कर लूंगा। अपनी पसंद का हश्र में देख चुका हूं...... तुम्हारा हर फैसला मुझे मंजूर है.... पर आगे से तुम इस मैटर में कुछ मत बोलना.... बस एक बार.... बस एक बार... मैं अपनी आखिरी कोशिश करना चाहता हूं.... अपने प्यार और अपनी जिंदगी को पाने का .....अगर मैं हासिल कर पाता हूं तब भी..... और नहीं कर पाऊंगा तब भी.... तुम्हारा जो भी फैसला होगा मुझे मंजूर होगा....."रणविजय ने फोन काटकर चेयर से टेक लगाकर आंखें मूंद ली।
    पर आंखें बंद करते ही.... हमेशा की तरह इशानी की यादों ने..... उसके जेहन पर अपना कब्जा जमा लिया।
    (फ्लैश बैक)
    "इशानी .....इतनी तेज मत दौड़ो... गिर जाओगी तुम.... तुम्हें चोट लग जाएगी.."इशानी के पीछे भागता हुआ रणविजय चिल्लाया।
    " उसकी चिंता तुम मत करो.... पहले मुझे पकड़ो..." खिलखिलाती हुई इशानी बोली।
    " सोच लो ....अगर मैंने तुम्हें पकड़ लिया तो फिर क्या होगा??" रणविजय उसके पीछे भागता हुआ बोला।
    " जो होगा सो देखा जाएगा.... पहले पकड़ो तो सही.. तुम, मुझे...."रणविजय के बिल्कुल बगल से होकर इशानी हवा की तरह निकल गई और रणविजय उसे नहीं पकड़ पाया। ईशानी ने खिल खिलाते हुए अपने हाथों से वी का साइन बनाकर रणविजय को चिढ़ाया।
    " इशानी, मैं थक गया... तुम जीती मैं हारा.... अब तो खुश हो ना...." रणविजय ईशानी के पीछे दौड़ता दौड़ता परेशान हो गया था... वह जहां इशानी को पकड़ने जाता... इशानी किसी भी तरह से बच कर निकल आती। अंत में थक हार कर रणविजय वही पार्क में एक बेंच पर बैठ गया और आंखें बंद करके सुसताने लगा। तभी उसके गले में पीछे से आकर इशानी ने अपनी बाहें डाल दी।
    " बहुत जल्दी थक जाते हो तुम... मान लो अगर इस जिंदगी की भीड़ में.... मैं कभी गुम हो गई... तो कैसे ढूंढोगे??"ईशानी ने शरारत से पूछा।
    रणविजय ने अपनी मजबूत हाथों से, इशानी के हाथ को पकड़ कर अपनी ओर खींचा.... इशानी सीधी उसकी गोद में आकर गिरी।
    " भीड़ में खोओगी तो तुम तब ना ...जब मैं तुम्हें खोने दूंगा... मैं तुम्हें कभी भी इस भीड़ का हिस्सा बनने ही नहीं दूंगा.... अपनी बाहों के मजबूत घेरे में इस कदर छुपा कर रखूंगा की तुम कभी मेरे पास से निकल ही नहीं पाओगी... चाहे तुम निकलने की कितनी भी कोशिश कर लो।"ईशानी रणवीर की गिरफ्त से छूटने की कोशिश कर रही थी.... पर रणविजय की पकड़ मजबूत थी....उसने एक हाथ से इशानी के दोनो हाथों को पकड़कर... दूसरे हाथों से उसके चेहरे पर आई हुई बालों की लट को किनारे करते हुए.... ईशानी की आंखों में गौर से देखते हुए कहा। रणविजय की इस हरकत से ईशानी ने अपनी कोशिश बंद कर दी थी।
    "अच्छा!!" ईशानी रणवीर के सीने से लग गई और उसके सीने में अपना मुंह छुपाए हुए बोली ।
    "चाहे कुछ भी हो जाए रणविजय.... मुझे अपने से दूर मत करना.... मर जाऊंगी मैं तुम्हारे बिना..."ईशानी तड़प कर बोली।
    " कभी नहीं...." रणविजय ने अपनी बाहों के घेरे को और मजबूत कर लिया।

  • 5. वफ़ा ना रास आई - Chapter 5

    Words: 1337

    Estimated Reading Time: 9 min

    तेरे बिना जिंदगी….



    इशानी को अपने यादों में.... अपने सीने से लगाए हुए रणविजय की आंखें बंद थी। चेयर पर बैठे-बैठे रणविजय ने अपने दोनों बाहों को अपने सीने के आसपास लपेट लिया था। जैसे कि इन बाहों के घेरे में इशानी खुद मौजूद हो। जाने कैसा सुकून था इस आलिंगन में??? रणविजय के रेगिस्तान जैसे जल रहे दिल को इशानी की छुवन से ही ठंडक मिल रही थी। रणविजय पूरी तरह से इस ठंडक को अपने में उतार लेना चाहता था। बरसों की तड़प धीरे-धीरे शांत हो रही थी। अभी वह इन जज्बातों में पूरी तरह से डूबता.... उसके पहले ही.... उसके कानों में दरवाजा नॉक करने की आवाज आई।
    रणविजय की यादों का सिलसिला टूट गया ।वह जैसे नींद से जागा।
    "यस कम इन...."केबिन के दरवाजे पर नॉक सुनकर रणविजय ने अपनी आंखें खोली।
    "यस कम इन....." रणविजय अपने चेयर पर सीधा होकर बैठ गया। थोड़ी ही देर में उसकी आंखों के आगे उसका एंप्लॉय सैम खड़ा था।
    " टेक योर सीट...."रणविजय ने उसे अपने सामने बैठने का इशारा किया।
    " थैंक यू सर ....."सैम अपनी कुर्सी पर बैठता हुआ बोला।
    "काम हुआ??"रणविजय ने पूछा।
    "नो सर..... आपके कहने के अनुसार मैंने द बेस्ट ग्रुप के पिछले बीस साल तक के सारे एंप्लॉय के पूरे वर्ल्ड में हिस्ट्री ज्योग्राफी खंगाल ली है..... पर उस में कहीं भी ईशानी सिंह नाम की लड़की है ही नहीं.... इनफैक्ट द बेस्ट ग्रुप की इंडिया में केवल एक ही ब्रांच है और वह भी नई दिल्ली में है और वहां पर भी इस ग्रुप में कोई भी एम्पलाई हिंदुस्तानी नहीं है। सारे एंप्लॉय अमेरिका से ही गए हुए हैं और उनमें से किसी की भी वाइफ तो दूर गर्लफ्रेंड का भी नाम ईशानी नहीं है ।"सैम ने अपनी पूरी रिपोर्ट रणविजय को दी। उसने कुछ पेपर के साथ एक तस्वीर रणविजय के आगे कर दी।
    रणविजय ने एक सरसरी सी निगाह उस तस्वीर पर डाली और सैम के आगे द बेस्ट ग्रुप का इन्विटेशन कार्ड कर दिया।
    " आवर नेक्स्ट टारगेट ......"
    सैम ने रणविजय के हाथ से कार्ड पकड़ लिया और उलट-पुलट कर देखा.....
    " द बेस्ट ग्रुप..... यह तो इसके एनुअल फंक्शन का कार्ड है..... और कल सुबह दस बजे इसका एनुअल डे मनाया जा रहा है......क्या करना है इसके साथ? "सैम ने पूछा।
    "दिवालिया...... कल सुबह दस बजे तक यह रोड पर आ जाना चाहिए....."रणविजय नपे तुले शब्दों में बोला।
    "जल्दी ही हो जाएगा और आसानी से हो जाएगा... सर... वैसे भी द बेस्ट ग्रुप हमारे से बहुत पीछे हैं...."सैम ने कहा।
    " आसानी से और जल्दी से ही होना चाहिए..... वरना मुझे कॉम्प्लिकेशंस पसंद नहीं..…." रणविजय ने हाथ में ली हुई पेन को गोल-गोल घुमाते हुए कहा।
    " मेरे रास्ते में जो कॉम्प्लिकेशन क्रिएट करता है...... मैं उसे फिर कंप्लीट भी नहीं रहने देता...." खट की आवाज के साथ रणविजय के हाथ में वो पेन टूट चुका था।
    " मैं समझ गया सर .....कल सुबह कि न्यूज की हेड लाइन में इसके रोड पर होने की खबर होगी। "
    "सुबह किसने देखी है सैम, मुझे आज शाम तक ....मार्केट बंद होने से पहले ....यह इस दौड़ से बाहर दिखना चाहिए...." रणविजय ने सामने लगी हुई एलईडी स्क्रीन पर इशारा करते हुए कहा... जहां कि द बेस्ट ग्रुप के शेयर के दाम ऊपर नीचे हो रहे थे।
    "ओके सर...."सैम तेजी से बाहर निकला।
    रणविजय ने हाथ में लिए हुए पेन के दोनों टुकड़ों को डस्टबिन में फेंक दिया और दूसरे हाथ से अपना माथा मसलने लगा.... पिछले कुछ दिनों से उसके सर का दर्द काफी तेज बढ़ रहा था.... जिसे कि वह अपने काम के चक्कर में सिरे से इग्नोर कर रहा था। तभी उसकी निगाह उस फोटो पर पड़ी जो कि सैम उसकी टेबल पर छोड़ कर गया था। रणविजय ने अपने हाथों में वो तस्वीर उठा ली... और गौर से देखने लगा।
    यह तस्वीर ईशानी की थी ....ईशानी.... जो कि उसका प्यार ....उसकी चाहत.... उसका जुनून.... सब कुछ थी। पागलों की तरह वह ईशानी को चाहता था... उसके पीछे अपनी सारी दुनिया.... सारी कायनात ... छोड़कर भागा था... और ईशानी उसे छोड़कर जाना चाहती थी....
    " घुटन होती है मुझे तुम्हारे प्यार से..... यह प्यार नहीं जंजीर है . जिसे तुम प्यार का बंधन कहते हो.... वह असल में एक जंजीर है.... जिसने मुझे जकड़ कर रखा है....मैं खुले आसमान में उड़ना चाहती हूं .....तुम्हारा प्यार मेरे पैरों की बेडियां बन गया है रणविजय..... मैं इसमें अपने आप को नहीं बांध सकती.... क्या मिला तुम्हारे साथ रहकर मुझे??? यह एक कमरे का मकान.... दम घुटता है मेरा इसमें..... यह भीड़ !!जो हर सुबह सिर्फ इसलिए कमाने के लिए निकलती है कि शाम तक इसे अपनी पेट भरने का इंतजाम करना है.... मैं भीड़ से भी आगे निकल कर अपना एक नया मुकाम चाहती हूं..... मैं सिर्फ पेट भरने के लिए कमाना नहीं चाहती..... बल्कि इसलिए कमाना चाहती हूं कि मैं अपने सारे सपनों को पूरा कर सकूं। मैं वह सब पा सकूं जो कि पाने का ख्वाब है मेरा..... जो कि तुम्हारे साथ रहते हुए मुझे नहीं मिल सकता। इसलिए अच्छा होगा कि हम दोनों अपना रास्ता यहीं पर अलग कर दें.... इस दुनिया में प्यार जैसी कोई वाहियात चीज है ही नहीं.... मुझे अफसोस होता है कि मैंने तुमसे प्यार किया.... इस दुनिया में सिर्फ एक ही चीज है.... जिसकी कीमत है.... वह है पैसा.... अगर पैसा तुम्हारे पास है.... तो इस तरह का प्यार..... जिसे तुम सच्चा प्यार कहते हो ....वह रास्ते में बिखरा हुआ मिल जाएगा और फिर मैं रास्ते में पड़ी हुई चीज नहीं उठाना चाहती .....मुझे वह चाहिए जो सच में , मैं हासिल करना चाहती हूं.... अपना नाम.... अपना मुकाम.... और ढेर सारा पैसा.... जो कि तुम मुझे बिल्कुल नहीं दे सकते... जिस दिन तुम खुद को इस भीड़ से किनारे कर पाओ ना .....उस दिन चले आना मेरे पास .....मिल जाएगा तुम्हें.... तुम्हारा प्यार और तुम्हारी जिंदगी।" रणविजय के कानों में ईशानी की बात गूंज रही थी और उसकी पकड़ उस फोटो पर मजबूत हो रही थी ....धीरे-धीरे उसने फोटो को अपनी मुट्ठी में भरकर...मसल दिया.... पर कानो में इशानी की बातें गूंज रही थी.... जो कि उसके दिमाग में हथौड़ी की तरह वार कर रही थी.... रणविजय से इतना दर्द बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा था.... वह गुस्से में चिल्ला उठा
    " ....नहीं..... "
    रणविजय ने अपने हाथों से ईशानी की फोटो को दूर कूड़े में फेंक दिया।
    " आगे निकल कर अपना मुकाम बनाना तो बहुत दूर की बात है ईशानी..... तुम तो मुझे इस भीड़ में भी कहीं नहीं दिखाई दे रही हो..... पर चिंता मत करो.... मैं तुम्हें ढूंढ लूंगा ....जरूर ढूंढ लूंगा.... क्योंकि मेरी एक चीज जो तुम्हारे पास रह गई है वह मुझे वापस चाहिए मेरा प्यार ....मेरी जिंदगी .....इसको लेकर तुम चैन से पताल में भी नहीं सकती.... मैं तुम्हें पाताल में से भी ढूंढ कर ले आऊंगा.... बस तुम देखती जाओ.... आज मैं उस भीड़ से आगे ही नहीं निकल चुका.... बल्कि बहुत ऊपर उठ चुका हूं.... इतना ऊपर कि तुम भी मुझे कहीं नहीं दिखाई पड़ रही..... इसमें भी तुम्हारे लिए खुश होने की कोई बात नहीं है क्योंकि मेरी नजरों से बच नहीं पाओगी तुम.... कहीं ना कहीं तो तुम मुझे जरुर मिलोगी... और मैं तब तुमसे सूद समेत वापस लूंगा .....अपना प्यार और अपनी जिंदगी....."रणविजय का गुस्सा बढ़ता जा रहा था और इस गुस्से के साथ-साथ उसके सर का दर्द भी।
    रणविजय ने अपने सर को अपनी दोनो हाथों में थाम लिया। लेकिन दर्द रुकने का नाम नहीं ले रहा था.... रणविजय ने तेजी से अपने पॉकेट में से एक दवा निकली.... और करीब चार गोलियां ....एक साथ पानी के साथ निगल गया..... अपने सर को वही पर अपने हाथों से पकड़े हुए टेबल पर सर झुका कर.... धीरे-धीरे अपने आप को रिलैक्स करने की कोशिश करने लगा। लेकिन एक साथ चार गोलियों को निगलने के कारण.... उसे ऐसा लग रहा था कि गोलियां कहीं गले में ही अटकी हैं। जो कि उसे सांस लेने भी में भी प्रॉब्लम क्रिएट कर रही थी।
    सर झुकाए हुए रणविजय अपनी उखड़ी हुई सांसो को काबू करने में लगा था।
    तभी उसके केबिन का दरवाजा तेजी से खुला। रणविजय ने अपना सर उठाया।
    " तुम....."रणविजय के होठों से निकला।

  • 6. वफ़ा ना रास आई - Chapter 6

    Words: 1361

    Estimated Reading Time: 9 min

    राणावत पैलेस

    नई दिल्ली

    "तब क्या कहा साहबजादे ने.... काम के अलावा कुछ और याद भी है कि सब कुछ भूल चुके हैं?" मिस्टर रणधीर सिंह राणावत ने अपने पास बैठी हुई अपनी पत्नी साधना जी से पूछा।

    जवाब में साधना जी ने उन्हें गौर से देखा।

    " ऐसे क्या देख रही हो मुझे?? बस यही तो पूछा हैं कि क्या कहा तुम्हारे बेटे ने..... याद भी है कि इस दुनिया में उनके मां-बाप जिंदा है या फिर तुमने फोन करके उन्हें याद दिलाया है कि तुम उनकी मां हो??......" रणधीर सिंह थोड़े गुस्से में बोले।

    "यही तो सबसे बड़ी परेशानी है कि उसे सब कुछ याद है .....हम भी और वह भी...." साधना जी उदास उदास गहरे शब्दो में बोली।

    " कब तक आने को बता रहे हैं??"साधना जी के शब्द की गहराई समझकर.... रणधीर सिंह ने उस टॉपिक को बंद करना ही ज्यादा उचित समझा।

    "अगले महीने में...."एक गहरी सांस लेकर साधना जी ने अपने हाथ का फोन साइड टेबल पर रखते हुए कहा।

    रणधीर सिंह राणावत के चेहरे पर एक हल्की सी व्यंग भरी मुस्कुराहट तैर गई।

    " आप ऐसे क्यों मुस्कुरा रहे हैं?" साधना जी को उनकी मुस्कुराहट चुभ गई।

    " अगले महीने..... अगले महीने.... सुनते हुए बारह साल हो गए.... पता नहीं यह अगला महीना हमारी जिंदगी में आएगा भी कि नहीं??" रणधीर सिंह पलंग पर लेटते हुए बोले।

    "इस बार पक्का है.... उसने हमसे कहा है..." साधना जी तेजी से बोली।

    "कहने को तो उन्होंने बहुत कुछ कहा था.... उस वक्त भी हमसे कहा था कि उनकी आगे की जिंदगी का फैसला ....हम जैसे चाहे ले सकते हैं.... पर क्या हम हम ले पाए कभी?? आज तक सिर्फ और सिर्फ अपनी मर्जी चलाते आए हैं .... और पता नहीं कब तक अपनी ही मर्जी के मालिक बने बैठे रहेंगे.." रणधीर सिंह गुस्से में बोले।

    " आप ऐसा क्यों बोलते हैं??"साधना जी परेशान हो कर बोली।

    "तो फिर क्या बोलूं ?? इंसान से गलतियां होती रहती है.... लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं है कि हम अपनी गलतियों को पकड़ कर बैठे रहे.. "

    "तो हमारा रणविजय कहां रुका हुआ है?? बारह साल में उसने दिन रात मेहनत करके रॉयल राजपूताना जैसी इतनी बड़ी कंपनी खड़ी कर ली है .....जिसके अंदर में आप के राणावत ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज चल रही है... अब इससे ज्यादा आप क्या चाहते हैं उससे ??"साधना जी बोली।

    "वही जो तुम चाहती हो .....भले इस बारह साल में उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा .... दिन-रात आगे बढ़ता ही चला गया है.... लेकिन ..... बाप हूं मैं उसका.... कोई दुश्मन नहीं.... आजकल के बच्चों को तो सबसे बड़े दुश्मन उनके मां-बाप ही दिखाई पड़ते हैं ....यह कभी नहीं समझते कि मां-बाप कभी भी उनका बुरा नहीं चाहेंगे...... मुझे तो वो आज भी वहीं खड़ा दिखाई पड़ता है..... जहां आज से बारह साल पहले खड़ा था..... आखिर कब तक वह उस भूल को पकड़ कर बैठे रहेगा??"रणधीर सिंह थोड़े हताश होकर बोले।

    "ज्यादा चिंता और गुस्सा मत कीजिए... आपका ब्लड प्रेशर फिर बढ़ जाएगा।" साधना जी ने मिन्नत भरे स्वर में कहा।

    "हूं....." रणधीर सिंह ने छोटा सा जवाब दिया और अपने बांह फैला कर साधना जी को भी वही लेटने का इशारा किया।

    "आपको पता है रणविजय शादी के लिए मान गया..!!." रणधीर सिंह के पास लेटते हुए साधना जी खुश होकर बोली।

    रणधीर जी ने हैरानी में साधना जी की तरफ देखा...

    " हां, उसने मुझसे कहा है कि हम उसके लिए लड़की पसंद कर ले.... और अगले महीने जब वह आएगा तो शादी करेगा..... वह भी हमारी पसंद से......"साधना जी ने कहा।

    "अगला महीना ....यही महीना तो कभी नहीं आता..." रणधीर सिंह कुछ सोचते हुए बोले।

    " अंतिम बार उसने ने रिक्वेस्ट की है बस एक महीना... बस एक महीना.... वह अपनी जिंदगी ,अपने प्यार को ढूंढना चाहता है.... तो क्या उसे इतना भी नहीं दे सकते?"साधना जी बोली।

    " क्या??? जिंदगी को ढूंढना चाहता है.... क्या मतलब तुम्हारा.... किस जिंदगी और किस प्यार को वह ढूंढना चाहता है...... वह प्यार !! जो उसे उसके सबसे कठिन समय में छोड़ कर चली गई..... वह जिंदगी!!! जो उसे जिंदगी और मौत के बीच में झूलते हुए छोड़ कर चली गई?? मैं तो समझा समझा कर हार गया हूं साधना... मुझसे उसका दर्द नहीं देखा जाता..... यह नहीं समझता कि उसे दर्द में देखकर हमें कितना दर्द होता है?? वह तो जवान खून है.... बर्दाश्त कर भी लेता है.... पर मुझसे बर्दाश्त नहीं होता। डर लगता है कि इस दर्द को अपने सीने में लिए ही.... कहीं मेरी आंखें बंद ना हो जाए?? फिर क्या होगा मेरे बेटे का?? अब तुम ही कोशिश करो....समझाओ साधना... अपने बेटे को समझाओ... वह लड़की उसका प्यार और उसकी जिंदगी नहीं थी.... वह सिर्फ और सिर्फ एक छलावा थी.... जिसने रणविजय का उपयोग सिर्फ.... अपने आगे बढ़ने के लिए किया और जब उसे ऐसा लगा कि रणविजय को पाकर भी.... वो अपने अमीर बनने सपनों को पूरा नहीं कर सकती है..... तो वह उसे छोड़कर निकल गई.." रणधीर सिंह ने एक एक शब्द जोर देकर कहा।

    "वह सिर्फ उस लड़की को इसलिए ढूंढना चाहता है कि उसके पास उसका प्यार और जिंदगी है.....उसने कभी भी ये नहीं कहा कि वो लड़की उसकी जिंदगी है...." साधना जी ने गुस्से में कहा।"मैने कहा भी था आपसे.... किसी तरह से उसका पता लगाइए....आखिर कहां जा सकती है..... वो इस तरह से...?? सिर्फ हमारे बेटे का ही नही... हमारी जिंदगी का भी सारा सुकून ले कर वो लड़की गायब हो चुकी हैं....."

    " तुम्हें क्या लगता है कि मैंने पता लगाने की कोशिश नहीं की होगी?? समझ में नहीं आता कि आखिर वो गई तो गई कहां?? आसमान खा गया.... या जमीन निगल गई दोनो को... और क्या था उस लड़की के पास?? ले गई तो ले गई ....अब जो बचा है उसको तो यह समेट ले.." रणधीर सिंह ने अपनी आंखों पर अपना रखते हुए कहा।

    "यह दिल है.... आपका बिजनेस का डील नही..... जहां इस कंपनी के साथ कॉन्ट्रैक्ट नहीं हुआ तो.... उसको दूसरे कंपनी के साथ .....उससे भी ज्यादा फायदे में हम कोई दूसरा कॉन्ट्रैक्ट करेंगे.... यह दिल के मामले हैं ....इसमें तू नहीं तो और कोई नहीं का सिद्धांत चलता है..... ना कि बिजनेस का .....कि तू नहीं तो कोई और सही....." साधना जी गुस्से में बोली।" लेकिन नहीं..... आपको तो कुछ सुनना ही नहीं है... एक वह है जो दिल का रोग लगा कर बैठा है ....और एक आप है जो अपनी अकड़ के कारण झुकने को तैयार नहीं... ऊपर से बेटा बोलता है कि डैड के साथ रहते रहते आप भी ......डैड जैसी होती जा रही है." रणधीर सिंह को आराम से सोता हुआ देखकर साधना चिढ़ती हुई बोली.... जबकि वह सोए नहीं थे.... उनके दिमाग में भी बहुत कुछ चल रहा था..... बीते दिनों का फ्लैशबैक.... उनके दिल और दिमाग में इस तरह से चल रहा था कि जो कि उनको सुकून ही नहीं लेने देता था.... उन्होंने करवट बदल कर सोने की कोशिश की।

    ..... छपाक ........तभी उनकी आंखों के आगे एक साया लहराया....… जो कि देखते ही देखते.... उनकी आखों के सामने ही....जिसने पहले उनकी तरफ मुस्कुराते हुए देखा और फिर अपने हाथ में लिए हुए एक गठरी की तरफ...... जाने कितना जहर बुझा था इस मुस्कुराहट में...... रणधीर सिंह उसे पकड़ने के लिए आगे बढ़ते कि उससे पहले ही वह साया...... ओवरब्रिज से सामने वाली नदी में कूद गया था।

    " पकड़ो उसे....." रणधीर सिंह चिल्लाए.... पर साया तब तक गायब हो चुका था।

    रणधीर सिंह राणावत घबराते हुए उठे और अपने बाएं हाथ से अपना सीना मिलने लगे।

    " क्या हुआ आपको??" इस तरह से रणधीर सिंह को अचानक से उठकर बैठते हुए देखकर साधना जी ने घबराते हुए पूछा। उन्होंने साइड टेबल से पानी का ग्लास उठा कर रणधीर सिंह की तरफ बढ़ाया। रणधीर सिंह ने एक ही झटके में गिलास खाली कर दिया और साधना जी की तरफ देखते हुए बोले," कुछ नहीं.... तुम सो जाओ.... मैं अभी आता हूं ......" रणधीर सिंह अपने कमरे से निकल गए।

    "तबीयत तो ठीक है ना आपकी??" साधना ने फिक्र से पूछा।

    " हां-हां.... मैं बिल्कुल ठीक हूं.... मेरी चिंता मत करो..." रणधीर सिंह गुस्से से बोले।

    " इनका भी कुछ पता नहीं चलता.... "साधना जी करवट बदल कर सोने की कोशिश करने लगी।

    वही रणधीर सिंह अपनी स्टडी पर बैठे हुए अपने लैपटॉप पर तेजी से उंगलियां चला रहे थे।

  • 7. वफ़ा ना रास आई - Chapter 7

    Words: 1384

    Estimated Reading Time: 9 min

    साथी और भी है...

    अपने दर्द को काबू में कर के…. दरवाजे पर हुई नॉक को सुनकर….. रणविजय ने अपना सर उठाया।
    "तुम.... आ जाओ...." रणविजय ने जब अपनी टेबल से सर उठाया.... तो सामने आदित्य खड़ा था। आदित्य रणविजय का बचपन का दोस्त था।प्ले स्कूल से लेकर कॉलेज तक का सफर और उसके बाद बिजनेस.... हर कुछ इन दोनों ने साथ ही किया था। रणविजय के हर सुख दुख का सच्चा साथी।
    " वह तो मैं आऊंगा ही ...इसके लिए मुझे तुम्हारी परमिशन की जरूरत नहीं है...." आदित्य आराम से आकर रणविजय के सामने वाली चेयर पर बैठ गया।
    " क्या हुआ तुम्हारी आंखें लाल क्यों है?" आदित्य ने गौर से रणविजय की आंखों में देखते हुए पूछा।
    " कुछ नहीं ऐसे ही....."रणविजय तेजी से नजरें चुराते हुए कहा।
    " कहीं कोई नशा वसा तो नहीं कर रहे हो??" आदित्य ने जांचती हुई निगाहों से रणविजय की चेहरे पर कुछ खोजते हुए कहा।
    तब तक रणविजय ने खुद को काफी हद तक संभाल लिया था । "मैं सस्ते नशे नहीं करता...."
    " यह भी बात है..... बड़े लोग बड़ी बातें...." आदित्य कंधे उचकाते हुए बोला।
    " यह बड़े लोगों का ताना किसको दिया ?" रणविजय ने पूछा।
    " जाहिर सी बात है तुम्हारे अलावा इस केबिन में और कोई नहीं है.... जिससे मैं बात कर रहा हूं... पहले प्यार का नशा करता था और अब दौलत का नशा..." आदित्य ने साफ-साफ कहा ।
    "दौलत का नशा मैं नहीं करता.... यह तो हाथ का मैल है .. लेकिन एक बात तुमने ठीक कही.... पहले उस औरत के प्यार का नशा था मुझ पर और अब...नफरत का नशा चढ़ा है मुझे ....सब कुछ बर्बाद करने का नशा.." रणविजय सीधा होते ही बोला।
    "क्या हुआ? कुछ पता चला उसका??" आदित्य ने पूछा।
    " नहीं.... मैंने पता लगाया था... द बेस्ट ग्रुप ऑफ़ कंपनीज में कोई भी एंप्लॉय इंडियन नहीं है ...."रणविजय ने बताया।
    " ऐसा हो सकता है?? गायब होने से दो दिन पहले इशानी द बेस्ट ग्रुप ऑफ कंपनी के डायरेक्टर से मिलने गई थी ।"आदित्य हैरान होते हुए बोला।
    " यही बात तो मेरी समझ में नहीं आ रही है कि आखिर वह गई तो कहां गई?" रणविजय भी काफी परेशान था।
    "कहीं अंकल सच तो नहीं कह रहे हैं कि इशानी ने सुसाइड कर लिया?" आदित्य ने रणविजय की तरफ देखते हुए कहा।
    " इंपॉसिबल सी बात है .... इस बार मैंने ऐसा दांव खेला है कि चाहे वह किसी भी बिल में क्यों न छुपी हो... उसे निकाल कर आना ही होगा... जिस जिस ने इस मामले में इशानी की मदद की है.... मैं उनमें से किसी को भी नहीं छोडूंगा.... कल सुबह तक द बेस्ट ग्रुप भी रोड पर होगा।" रणविजय अपनी चेयर पर से उठते हुए बोला।
    "ओके ....ओके.... तू उसे मत छोड़ना.... पर फिलहाल मेरे साथ चल.... वरना अंजलि मेरे साथ-साथ तुझे भी नहीं छोड़ेगी... फिर मत कहना कि बताया नहीं था ।" आदित्य ने हाथ खड़े किए।
    " क्या मतलब तेरा??? अब ऐसा क्या कर के आया है तू ??" रणविजय ने पूछा।
    " मैंने कुछ नहीं किया भाई.... मैं भला इनोसेंट सा लड़का..... आज तक तो पेरेंट्स से भी एक चॉकलेट की फरमाइश नहीं की... बस उसने इन चीजों की फरमाइश की है।" आदित्य ने अपने फोन की स्क्रीन सामने कर दी ।
    " हां तो जाना ले ले । किसने रोका है तुझे?? कार्ड चाहिए??" रणविजय ने पूछा।
    " कार्ड मेरे पास भी है भाई...... पर वह क्या कहते हैं?? टैलेंट नहीं है.... मुझे पसंद नहीं करना आता.." आदित्य ने आंखें बंद करते हुए कहा।
    जैसे कि रणविजय के अगले रिएक्शन का इंतजार कर रहा हो पर जब देर तक रणविजय ने कुछ नहीं कहा तो उसने अपनी आंखें खोली।
    " मदद कर दे मेरे भाई.... वरना बीवी सिर्फ कमरे से बाहर नहीं निकालेगी.... बल्कि अपनी जिंदगी से बाहर निकाल कर फेंक देगी ।" आदित्य बेचारगी से हाथ जोड़ते हुए बोला।
    " तेरा कुछ नहीं हो सकता..... चुपचाप यहीं बैठा रहा... काम पूरा करके चलता हूं...."अपने ही काम में मगन रणविजय ने मजबूरी में कहा ।
    " जियो मेरे भाई "आदित्य खुश हो गया।
    रणविजय की हाथों की उंगलियां लैपटॉप पर हरकत कर रहे थे और आंखें सामने स्क्रीन पर लगे हुए हैं शेयर के वैल्यू पर।

    शाम के समय में रणविजय और आदित्य न्यूयॉर्क सबसे बड़े मॉल में घूम रहे थे। आदित्य को अपनी बीवी और अपने लिए कुछ कपड़े लेने थे और वो जबर्दस्ती रणविजय को भी खींचकर लाया था। अभी फिलहाल दोनों मेल सेक्शन में आदित्य और शिवम के लिए कपड़े पसंद कर रहे थे।
    " यह देख ना कैसा है?" आदित्य ने एक टी-शर्ट आगे करते हुए पूछा।
    " कुछ अच्छा नहीं रहा मुझे... बहुत पुराना कलेक्शन है."रणविजय ने बुरा सा मुंह बनाया।
    " मुझे भी कुछ ऐसा ही लगता है.... इसका कलर भी ठीक नहीं है.... कुछ दूसरा दिखाओ...." आदित्य ने सेल्समैन से कहा।
    तभी अचानक रणविजय नजर सामने लगे हुए परी ड्रेस पर पड़ी। रणविजय उस ओर बढ़ गया। रणविजय के आंखों के आगे ....इस परी ड्रेस में सुंदर नाक नक्श.... बड़े-बड़े आंखों वाली... सजीली सी... एक 3 साल की प्यारी सी लड़की घूम गई। उसकी कल्पना करते ही रणविजय के होठ हल्के से मुस्कुरा दिए।
    " यह ड्रेस मेरी जिंदगी के लिए ही बनी है...."रणविजय ने मन ही मन सोचा।
    " सुनो.... यह ड्रेस पैक करो.... और साथ में इस ड्रेस से मैचिंग जो कुछ भी तुम्हारे पास है.... जूते ...छड़ी वगैरह ....सब कुछ पैक कर देना।" रणविजय ने सेल्समैन को वह ड्रेस पैक करने के लिए कहा।
    "सर बच्ची का साइज क्या होगा??" सेल्स मैन ने पूछा।
    " तीन साल की है... मेरी जिंदगी... यह ड्रेस उसे परफेक्ट आएगी..... बस इसी का सारा कॉमिनेशन दे देना।" रणविजय ने सेल्स मैन से कहा ।
    "सर , और कोई कलर नहीं...."सेल्समैन ने पूछ कर चॉइस को कंफर्म किया।
    " नहीं.... दिस कलर इज बेस्ट....." रणविजय सेल्स मैन की बात काटते हुए बोला ।
    "ओके सर......" सेल्समैन ने ड्रेस निकाल ली।
    इधर काफी देर तक रणविजय को अपने आसपास ना देखकर.... आदित्य थोड़ा परेशान हो गया.... वह अब रणविजय को मॉल में ढूंढने लगा.... तभी उसकी नजर बच्चो के सेक्शन में कपड़े पसंद करते हुए रणविजय पर पड़ी।
    "यहां बच्चो के सेक्शन में क्या कर रहा है??" आदित्य ने रणविजय के कंधे पर हाथ रख कर पूछा ।
    "कुछ नहीं.... जिंदगी के लिए कपड़े ले रहा था.... अच्छा है ना?? मेरी जिंदगी बिल्कुल परी लगेगी इसमें...." रणविजय ने अपनी आंखों की नमी छुपाते हुए.... सामने लगी हुई बेबी पिंक कलर के ग्राउन पर उंगली से इशारा करते हुए कहा। जो कि अब सेल्समैन फोल्ड कर रहा था।
    "पर यार... ये ड्रेस तो अपनी शिवी को आएगा ही नहीं...." आदित्य ने सेल्समैन को रोक दिया।
    "चल लेडीस सेक्शन में अपनी शिवी के लिए कुछ दूसरा अच्छा देखते हैं....."आदित्य रणविजय का हाथ पकड़कर उसे लेडीस सेक्शन की ओर ले जाने लगा। रणविजय ने हैरानी में आदित्य की तरफ देखा।
    " तूने अपने लिए समय रोक दिया है भाई ....पर सबके लिए समय रुका नहीं ......अब तक तो अपनी शिवी बड़ी हो गई होगी। तूने अपनी जिंदगी के साल रोक लीए है भाई.... पर तेरी जिंदगी.... धीरे धीरे अपने जिंदगी के हर एक साल को बढ़ा रही है..... तेरी प्रिंसेस......तेरी जिंदगी..... अब बड़ी हो गई होगी....." आदित्य ने धीरे से कहा।
    आदित्य की बात सुनकर रणविजय का दर्द छलक आया.....दर्द और बेबसी से.... रणविजय ने अपनी आंखें बंद कर ली।
    " कितना बदनसीब हूं मैं ....जब प्यार था तो पैसा नहीं... और आज पैसा है तो प्यार नहीं... जिस प्यार को पाने के लिए मैंने पैसे को ठोकर मारी थी.... वही प्यार मुझे पैसों के लिए छोड़ कर चली गई......"रणविजय ने बेबसी से रुकते हुए.... अपने आप को संभाल कर आदित्य से कहा। उसकी आवाज में उसकी थकान.... उसका दर्द.... सब कुछ साफ साफ महसूस हो रहा था..... जिसने आदित्य के दिल को भी काट कर रख दिया था। वह रणविजय के हर एक दर्द को अपने सीने में उतरता हुआ महसूस कर रहा था।
    " सब ठीक हो जाएगा भाई.... सब ठीक हो जाएगा... हम ढूंढ लेंगे ..... जिंदगी को .... वो इस तरह से नहीं छुप सकती...." आदित्य ने रणविजय को गले से लगा लिया।
    तभी अचानक रणविजय को ऐसा लगा कि किसी ने उसका पैर पकड़कर खींचा। रणविजय आदित्य से अलग होकर नीचे देखने लगा.... वहां एक खूबसूरत मासूम सी चार साल की लड़की रणविजय का पैंट पकड़ कर खींच रही थी। रणविजय ने झुक कर उसे गोद में उठा लिया।

  • 8. वफ़ा ना रास आई - Chapter 8

    Words: 1357

    Estimated Reading Time: 9 min

    बीते हुए दिनों की यादें इतनी कड़वी थी कि रणविजय का दिल डूब रहा था..... उसकी बेटी ....उसकी जिंदगी..... ना जाने कहां और किस हाल में होगी??
    बेटी से बिछड़ने के दर्द की..... एक लहर ने रणविजय को अपनी चपेट में ले रखा था। आदित्य के गले से लगा हुआ रणविजय..... किसी तरह से अपने इस बेकाबू दिल को शांत करने की कोशिश में लगा हुआ था। आंखों में भर रहे आंसू को अंदर धकेलने का प्रयास कर रहा था। तभी अचानक रणविजय को ऐसा लगा कि किसी ने उसका पैर पकड़कर खींचा। रणविजय आदित्य से अलग होकर नीचे देखने लगा.... वहां एक खूबसूरत मासूम सी चार साल की लड़की रणविजय का पैंट पकड़ कर खींच रही थी। रणविजय ने झुक कर उसे गोद में उठा लिया।
    " क्या है बेटा??"
    " अंकल मुझे वह परी ड्रेस चाहिए थी ....पर वह अंकल बोल रहे हैं कि वह ड्रेस आप ने ले ली ...मुझे वह ड्रेस चाहिए ....."लड़की ने उस फ्रॉक की तरफ इशारा करते हुए कहा। रणविजय ने सेल्समैन को वो ड्रेस, उस बच्ची को दे देने के लिए कहा। तब तक उस बच्ची की मां भी वहां आ गई थी।
    " सॉरी सर.... यह बहुत जिद्दी है... जो चीज एक बार पसंद कर लेती है.... इसे वही चीज चाहिए होती है...." उस महिला ने अपनी बेटी को समझाना चाहा।" बेटा ,अंकल ने अपनी बेटी के लिए लिया है आप इस तरह से नहीं कर सकते। चलिए हम आपके लिए दूसरा ले लेते हैं...."
    " नो नो ...इट्स ओके... वैसे भी यह ड्रेस मेरे किसी काम के लायक नहीं...."रणविजय ने महिला से कहा और बच्ची के सर पर हाथ फेरते हुए वहां से बाहर निकल गया।



    ******

    राजपूताना पैलेस
    न्यू यॉर्क अमेरिका


    रणविजय के आर्डर के अनुसार शिवम अपना सारा सामान लेकर राजपूताना पैलेस में शिफ्ट हो गया था। शिवम के पहुंचने से पहले ही नौकरों ने उसका कमरा तैयार कर दिया था। अपने कमरे में पहुंच कर एक बुरी नजर कमरे पर डाली। सब कुछ उसी की पसंद और उसी के टेस्ट का था।
    "बेस्ट...."शिवम के होठों से निकला। अपनी बुक्स निकालने के लिए.... शिवम ने जैसे ही अपना बैग खोला। उसके हाथ एक गुड्डे गुड़िया की जोड़ी लगी। राजस्थानी राजसी दूल्हे की पोशाक में सजा हुआ यह गुड्डा और राजस्थानी दुल्हन रानी की पोशाक में सजी हुई इस गुड़िया ने..... शिवम को बारह साल पहले की पुरानी यादों में पहुंचा दिया था। शिवम ने अपने हाथों में गुड़िया उठा ली .... और उसे एकटक देखे जा रहा था। दिमाग में पुरानी यादें किसी फिल्म की तरह चल रही थी।
    (फ्लैश बैक)
    मुझे भी खेलना है......" एक गुड़िया जैसी मासूम सी करीब तीन साल की लड़की...... अपने दोनों हाथों में अपनी गुड़िया पकड़े हुए.... अपनी सहेलियों के पास आकर बोली। उसके सारी सहेलियां घर घर खेल रही थी और आज उन लोगों की गुड़िया की शादी भी थी। सबकी गुड़िया को लगभग पार्टनर मिल गए थे..... अब यह छोटी सी लड़की चुपचाप अपनी गुड़िया पकड़ कर वही खड़ी थी। वैसे इस मासूम सी लड़की का नाम शिवी था और वह खेल रही बाकी लड़कियों से छोटी भी थी.... बाकी लड़कियों की उम्र पांच साल से ऊपर थी।
    "सोच लो अगर तुमने अपनी गुड़िया की शादी मेरे गुड्डे के साथ की.... तो तुम्हारी गुड़िया को.. मेरे गुड्डे के साथ आकर... मेरे घर पर रहना पड़ेगा... फिर मत रोना की मैं अपनी गुड़िया नहीं दूंगी।" साथ खेल रही बड़ी लड़की ने शिवी को समझाते हुए कहा।
    "इसीलिए तो कह रही हूं कि तुम अभी अपनी गुड़िया अपने पास ही रखो ....जब तुम बड़ी हो जाओगी... अपनी गुड़िया को मेरे गुड्डे के साथ मेरे घर भेजने के लिए तैयार हो जाओगी... तब अपनी गुड़िया का ब्याह रचाना.... तुम्हारी गुड़िया के लिए मैंने बहुत खूबसूरत गुड्डा रख रखा है ...."उस बड़ी लड़की जिसका नाम शिवानी था उसने शिवी को प्यार से समझाया।
    "पर मुझे अपनी गुड़िया की शादी अभी करनी है... सबकी गुड़िया की शादी हो रही है..." सबको खेलता हुआ देख शिवी को भी खेलने का मन हो रहा था।
    "तो लो यह मेरा गुड्डा..... तुम अपनी गुड़िया की शादी मेरे इस गुड्डे के साथ कर दो और अपनी इस गुड़िया के साथ-साथ मेरे इस गुड्डे को भी अपने पास ही रख लेना.... क्योंकि तुम्हारी गुड़िया के बगैर मेरे गुड्डे को भी नींद नहीं आएगी ।" एक दस साल के लड़के ने शिवि के आगे एक खूबसूरत गुड्डा लहराते हुए कहा। गुड्डे को देखकर शिवि के आंखों में खुशी से चमक आ गई... गुड्डा सच में बहुत खूबसूरत था और उसने दूल्हे की राजसी पोशाक पहन रखी थी।
    "पक्का ना.... फिर तुम अपने गुड्डे के लिए नहीं ना लड़ोगे.... मुझे ये गुड़िया पापा ने दी है.... मुझे इसके बिना नींद नहीं आती.... तुम मेरी गुड़िया अपने घर ले नहीं जाओगे ना??" शिवि ने मासूमियत से पूछा।
    " बिल्कुल नहीं.... क्योंकि मेरी गुड्डे को इतनी प्यारी गुड़िया जो मिल जाएगी..तुम ही मेरे गुड्डे को भी अपनी गुड़िया के साथ रख लेना." लड़के ने हंसते हुए कहा।
    " यह तो ठीक नहीं है शिवम भैया... हमने कई बार आपसे आपका गुड्डा मांगा... लेकिन आपने यह कह कर देने से इंकार कर दिया कि मामा की शादी में सहबाला बनने के नेग में आपको यह गुड्डा मिला है... और इससे आप दुनिया की सबसे खूबसूरत गुड़िया को देंगे और आज शिवि को ऐसे ही दे दिया।"ना चाहते हुए भी शिवम की छोटी बहन शिवानी के होठों पर शिकवा आ ही गया। जिसकी नजर काफी दिनों से शिवम के गुड्डे पर थी.... लेकिन शिवम उसे छूने भी नहीं देता था।
    "ऐसे कहां दिया?? हमारी शिवि के पास ही तो इतनी खूबसूरत गुड़िया है और मेरी शिवि भी तो खुद दुनिया की सबसे खूबसूरत गुड़िया है । अब भला हमारे गुड्डे को एक साथ इतनी खूबसूरत खूबसूरत दो दो गुड़िया मिले तो मैं अपने गुड्डे को शिवि को क्यों ना दूं... तेरी नकचढ़ी गुड़िया के लिए तो पापा लाए हैं ना ये नकचढ़ा गुड्डा।" शिवम ने शिवानी के गुड्डे गुड़िया का मजाक बनाते हुए कहा।
    " शिवम भैया, यह ज्यादा हो रहा है.... अपना गुड्डा नहीं देना है तो मत दो... पर मेरे गुड्डे और गुड़िया को ऐसे मत बोलो... मैं पापा से बोल दूंगी..." शिवानी ने गुस्से में शिवम से कहा।
    " जाकर बोल देना.... मेरा गुड्डा तो शिवि की गुड़िया के पास ही जाएगा । क्यों शिवि?? है ना" शिवम की बात सुनकर मासूम शिवि ने मासूमियत से हां में सिर हिलाया... जोकि शिवम के गुड्डे को देखकर बहुत खुश थी और अब खुशी खुशी शिवम के गुड्डे के साथ अपनी गुड़िया का ब्याह रचाने में मगन हो गई थी।
    शिवम वहीं बैठकर अपनी बहनों और उसकी सहेलियों का खेल देख रहा था । अचानक से शिवि की मम्मी ने उसे बुलाया और शिवि वहीं पर अपनी गुड़िया भी शिवम के हाथों में देकर तेजी से अपने घर चली गई।
    "मेरी गुड़िया का ध्यान रखना... जब मैं वापस आऊंगी तो तुम्हारे गुड्डे के साथ अपनी गुड़िया को अपने घर लेकर जाऊंगी..." जाती हुई शिवि ने याद से शिवम को अपनी गुड़िया का ध्यान रखने के लिए कहा था। गुड्डे गुड़िया का यह व्याह आधा ही रह गया था।
    (प्रेजेंट टाइम)
    "कहां हो तुम शिवि... कहां ढूंढू मैं तुमको.... कब मिलोगी मुझको?? जब मैं यह तुम्हारी अमानत.. तुम्हें लौटा पाऊंगा??" शिवम प्यार से इस गुड्डे गुड़िया की जोड़ी को देखते हुए बोला। वह अपने समान में इंडिया से यह गुड़िया और गुड्डा लेकर आया था... ताकि शिवि को दे सके... पता नहीं शिवि को अपनी यह गुड़िया याद है भी या नहीं?? अब तो शिवि बहुत बड़ी हो गई होगी... क्या पता उसे पहचान पाएगी भी की नहीं.... पर वह है कहां ?? गुड़िया को सीने से लगाए हुए शिवम सोच रहा था ।
    शिवि उसके रणविजय चाचू की बेटी थी.... उनकी जिंदगी और शिवम की बेस्ट फ्रेंड।
    यहां राणावत हाउस में आने के बाद भी उसे शिवि कहीं नहीं दिखाई पड़ी थी... शिवम की उम्मीद के विपरीत राणावत हाउस बिल्कुल खाली था.... यहां पर सिर्फ रणविजय सिंह राणावत के अलावा कोई नहीं रहता था। बस नौकरों की लंबी चौड़ी फ़ौज थी।
    "आखिर तुम यहां आ ही गए.... मेरे कहने पर तो नहीं आया.... लेकिन रणविजय की डांट खाकर तो आना ही पड़ा।"दरवाजे पर से एक आवाज आई। शिवम की यादों और सोचों का सिलसिला टूट गया। उसने मुस्कुराते हुए दरवाजे पर देखा।

  • 9. वफ़ा ना रास आई - Chapter 9

    Words: 1312

    Estimated Reading Time: 8 min

    लौट आओ जिंदगी…..




    "आखिर तुम यहां आ ही गए.... मेरे कहने पर तो नहीं आया.... लेकिन रणविजय की डांट खाकर तो आना ही पड़ा।"आदित्य की आवाज सुनकर शिवम अपनी यादों के घेरे से बाहर आया। दरवाजे पर रणविजय और आदित्य दोनों ही खड़े थे।
    "चाचू..... बाहर क्यों खड़े हैं ?अंदर चले आइए... आपका ही घर है.... " शिवम मुस्कुराते हुए बोला।
    "ओह थैंक यू... बताने के लिए ...वरना हमें तो लगा था कि हम कहीं दूसरी जगह चले आए हैं...." रणविजय ने एक नजर शिवम के कमरे पर डाली। शिवम ने कमरे की सेटिंग अपने अनुसार चेंज कर दी थी।
    "पूरे कमरे का तो नक्शा ही बदल दिया तुमने...." आदित्य ने हैरानी से कमरे की ओर देखते हुए कहा।" रणविजय ने तुम्हारे लिए स्पेशली इंटीरियर डेकोरेटर्स से डेकोरेट करवाया था कमरा .....पर अब तो उसके नामोनिशान भी नहीं दिख रहे हैं मुझे यहां...."आदित्य बोला।
    "सॉरी चाचू... मुझे पता नहीं था... मुझे थोड़ा अनकंफरटेबल फील हो रहा था.... शुरू से जिस माहौल में रहने की आदत है.... वही मुझे ज्यादा सूट करता है...." शिवम ने धीरे से रणविजय से कहा।
    "इसमें सॉरी कहने की क्या बात है.... यह काम तुमने बहुत बढ़िया किया है.... वरना मैं तो सोच कर परेशान हो रहा था कि कहीं तुम्हें घर पसंद नहीं आया.... तो कैसे रहोगे?? अपनी आदतें कभी भी.... किसी के लिए भी नहीं बदलनी चाहिए.... तुम जैसे हो... जो हो.. वैसे ही रहो... क्योंकि यही तुम्हारी सही पहचान है... कभी भी किसी के लिए... खुद को बदलने की कोशिश मत करना क्योंकि अगर तुमने थोड़ा सा भी झुकाव दिखाया... तो फिर वह चीज अपने वजूद को दिखाने में.... तुम्हारे वजूद को पूरी तरह से मिटा देगी..कोई इंसान हो या माहौल ....दोनों को अपने अनुसार बदलने फिर कोशिश करना.... कभी भी उनके अनुसार बदलने की कोशिश भी मत करना... वरना दोनों तुम्हें इस तरह से बदल कर रख देंगे कि तुम खुद को ही नहीं पहचान पाओगे.." रणविजय बेड पर बैठता हुआ बोला। रणविजय की बातें बहुत गंभीर थी.... शिवम समझ नहीं पा रहा था लेकिन आदित्य बखूबी उसका इशारा समझ रहा था... रणविजय अपनी बातों में अपना पिछला एक्सपीरियंस शिवम को बता रहा है। आदित्य ने रणविजय के कंधे पर हाथ रखा और उसके बगल में बैठ गया।
    " वैसे यह बताओ... यह कमरा ठीक है या फिर इसके बगल वाला कमरा भी खाली है..... वैसे तो पूरा घर ही खाली है.... तुम जहां चाहो... वहां रह सकते हो..." रणविजय सिंह ने शिवम को देखते हुए कहा।
    "ऐसा कुछ नहीं है चाचू... अपना तो सिंपल सा फंडा है... रहने के लिए सिर्फ दिल में जगह होनी चाहिए... घर में जगह तो आसानी से बन जाती है और वैसे भी आपका घर तो बहुत बड़ा और बहुत खूबसूरत है..." शिवम उन दोनों के पास बैठते हुए बोला।
    "और सब बताओ ....घर में सब कैसे हैं... भैया भाभी?शिवानी??" रणविजय ने शिवम से पूछा।
    " सब मस्त हैं और आपको बहुत याद करते हैं...." शिवम ने बताया। फिर दोनों आपस में बात करने लगे। तभी आदित्य की नजर बेड पर रखे हुए गुड्डे गुड़िया की जोड़ी पर पड़ी।
    "तुम अपनी हरकतों से बाज नहीं आओगे ना ....शिवानी को परेशान करने के लिए ...उसके खिलौने यहां तक ले कर आ गया?? उधर वह बेचारी ढूंढते ढूंढते परेशान हो रही होगी..." आदित्य ने गुड्डे गुड़िया की जोड़ी को हाथ में लेते हुए कहा।
    " अरे नहीं चाचू.... ये उसके खिलौने नहीं है... यह तो किसी और के खिलौने हैं.. जिसको वापस करने के लिए मैं इन्हें इंडिया से अमेरिका लेकर आया हूं और वह मुझे अभी तक दिखाई नहीं पड़ी। रही बात शिवानी के खिलौनों की.. शिवानी के खिलौने मैं तो भूल कर भी नहीं छूता.... इतनी बड़ी हो गई है लेकिन अपने गुड्डे गुड़िया को अभी भी ताला लगा कर रखती है..."शिवम ने आदित्य के हाथ से गुड़िया लेकर कहा।
    " किस के खिलौने हैं?? जिसको वापस करने के लिए तुमने इस गुड़िया के साथ... सात समंदर पार का सफर तय किया है।" आदित्य ने हंसते हुए शिवम से पूछा।
    "सम वन स्पेशल.... चाचू....यह गुड़िया भी और वह लड़की भी....." शिवम ने बालों पर हाथ में उंगलियां चलाते हुए कहा ।
    " वह तो दिख ही रहा है .....बेटा बड़ा हो गया है...." आदित्य हंसते हुए बोला।
    " नो ... नो चाचू..... आप जैसे समझ रहे हैं.... वैसा कुछ भी नहीं है .....यह गुड़िया तो....."शिवम अभी सफाई दे ही रहा था कि
    " यह गुड़िया मेरी जिंदगी की है ....." रणविजय के होठों से निकला। उसने शिवम के हाथों से वह गुड़िया लेकर अपने सीने से लगा लिया।
    "शिवि की??"आदित्य को हैरानी हुई।
    " हां...यह मेरी शिवि की गुड़िया हैं... मैंने खुद उसे उसके तीसरे बर्थडे पर ये गुड़िया गिफ्ट की थी.... एक पल के लिए भी मेरी बेटी इसको अपने से दूर नहीं करती थी... इस गुड़िया के बिना तो उसे नींद भी नहीं आती थी.... पता नहीं कैसे अब सो पाती होगी???. जाने कहां होगी.. इस वक्त.. किस हाल में होगी ?? मेरी मासूम सी प्यारी जिंदगी... चली आओ बेटा.... पापा के पास.... कहां हो?? पापा बहुत याद करते हैं आपको..... हर जगह ढूंढ कर मैं तुम्हें हार गया....।"रणविजय ने गुड़िया को अपने सीने से लगाए हुए कहा। रणविजय ने अपने आपको अकेलेपन के इस दर्द से बचाने के लिए.... खुद को बुरी तरह से काम में झोंक दिया था.... लेकिन फिर भी ऐसा कुछ ना कुछ उसके साथ जरूर हो जाता था.... जिससे कि उसका दिल का दर्द फिर से हरा हो जाता था। ना चाहते हुए भी..... बीते दिनों की परछाई उसकी आंखों से आगे घूमने लगती थी। और आज फिर इस गुड़िया ने उसके जख्म को बुरी तरह से कुदेर दिया था। दर्द और तड़प बर्दाश्त से बाहर हो रहा था .....रणविजय के होठों से टूटे-फूटे शब्द निकलने लगे..... वह चाह कर भी अपने आप पर काबू नहीं कर पा रहा था।
    "पता है आदित्य.... मेरी जिंदगी.. मेरे साथ हमेशा लुका छुपी खेलती थी... मैं उसे ढूंढ लेता था... पर फिर भी मैं अपनी हार स्वीकार करके उस से रिक्वेस्ट करता था कि वह मेरी आंखों के सामने आ जाए... अब मुझे उसको ढूंढा नहीं जा रहा... मैं थक गया.... और मेरी जिंदगी हंसती खिलखिलाती मेरे आंखों के सामने आ जाती थी... पापा.. आपसे इतना सा भी काम नहीं होता... आप मुझे ढूंढ भी नहीं पाते.... आप हार गए.... लेकिन आज देखो बारह साल से लगातार.... दिन रात में अपनी बेटी को ढूंढ रहा हूं.... हर जगह ढूंढ लिया... कितनी बार रोया चिल्लाया.... जिंदगी मैं हार चुका हूं.... बेटा कहां छुपी हो आप ??मेरे आंखों के सामने आ जाओ..... पर वह नहीं आती सामने.... कहां ढूंढू मैं अपनी बेटी को ??कहां जाकर में छिप गई है..... नहीं खेलना मुझे ऐसा कोई खेल..... प्लीज बेटा.. अब तो पापा के पास आजाओ..." दर्द की इंतहा के कारण.... उसके होठों से आवाज नहीं निकल रही थी।
    आदित्य ने आगे बढ़कर रणविजय को संभालना चाहा। लेकिन रणविजय ने हाथ से इशारों से उसे वहीं रोक दिया और बहुत ध्यान से शिवि की गुड़िया को देखने लगा.... जैसे वह गुड़िया ना होकर खुद शिवि हो।
    "आई लव यू जिंदगी....." रणविजय को अचानक से ऐसा महसूस हुआ कि यह कोई एक गुड़िया ना हो बल्कि उसकी हाथों में उसकी मासूम सी बेटी हो..... रणविजय ने उसे पकड़ कर अपने सीने से लगा लिया.... पर अचानक से ही ऐसा एहसास हुआ..... उसने एक बेजान खिलौने को लिया है। क्योंकि अब तक तो उसकी जिंदगी रिप्लाई में.... आई लव यू पापा बोल चुकी रहती। अपने से दूर करते हुए रणविजय ने बेयकिनी से गुड़िया को देखा।
    अचानक से दर्द का तीखा लहर उसके सर में उठना शुरू हुआ....... रणविजय जो कि अभी भी यकीन नहीं कर पा रहा था कि उसके हाथों में उसकी जिंदगी नहीं बल्कि उसकी गुड़िया है.... दर्द से कांप उठा.... उसकी आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा.."..ईशानी...जिंदगी...."..रणविजय धीरे से बोला..... गुड़िया उसके हाथों से छूट गई। रणविजय वहीं पर अचेत होकर गिर गया ।
    "चाचू ....."शिवम चिल्लाया।
    "रणविजय...."आदित्य ने रणविजय को संभालना चाहा.... पर रणविजय बेहोश.... पलंग पर गिरा था।
    आदित्य और शिवम दोनों परेशान हो उठे।

  • 10. वफ़ा ना रास आई - Chapter 10

    Words: 1254

    Estimated Reading Time: 8 min

    दर्द अब रुकने का नाम नहीं लेता….


    मंडी
    हिमाचल प्रदेश
    सुबह के दस बजे...
    बाजार की भीड़भाड़ से दूर हिमाचल की सुरम्य वादियों के बीच बना हुई लकड़ी का मकान बहुत ही खूबसूरत था..... इसके आसपास और कोई घर नहीं था... कॉटेज के चारों ओर काले कपड़ों में प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड हथियारों के साथ मुस्तैदी से अपना काम कर रहे थे। दिसंबर का महीना था.... पहाड़ों पर कड़ाके की ठंड पड़ने शुरू हो गई थी... धुंध और कोहरे में लिपटा हुआ कॉटेज बड़ा ही खूबसूरत लग रहा था।
    तभी एक ब्लैक कलर की मार्सिडिज आकर वहां पर रुकी.... उसके पीछे दो गाड़ी सिक्योरिटी की और भी थी.... गाड़ी को देखते ही सिक्योरिटी गार्ड तुरंत हरकत में आए और उनमें से एक ने जाकर गाड़ी का दरवाजा खोला... सर से पांव तक काले सूट में एक रौब दार व्यक्ति... उम्र करीब 40 साल... गाड़ी से बाहर निकला.. गार्ड ने एक जोरदार सैलूट आदमी को मारा... पर वह आदमी बिना कुछ बोले ही... लंबे-लंबे डग भरता हुआ.... कॉटेज के अंदर चला गया।
    "गुड मॉर्निंग सर....."अंदर करीब पचास साल की एक महिला... जो कि इस कॉटेज की केयरटेकर लग रही थी... उसने आदमी को गुड मॉर्निंग विश किया। आदमी ने बिना उसके गुड मॉर्निंग का जवाब दिए हुए ही सपाट भाव में पूछा," क्या कंडीशन है मार्था..... वह औरत तैयार हुई कुछ बताने के लिए??"
    "नो सर... वह अपना मुंह खोलने को तैयार ही नहीं है।" मार्था ने मायूसी से कहा।
    "कहां है वह??" आदमी ने पूछा।
    "अपने कमरे में...." मार्था ने कमरे की तरफ इशारा करते हुए कहा।
    आदमी तेजी से कमरे की ओर बढ़ गया... उसने कमरे का दरवाजा खोला.... अंदर करीब पैंतीस साल की औरत ....खिड़की के पास खड़ी.... खिड़की से पहाड़ों का खूबसूरत नजारा देख रही थी .... दूर बर्फ में लिपटे हुए पहाड़ों पर सूर्योदय हो गया था और बहुत खूबसूरत नजारा खिड़की से दिखाई पड़ रहा था...उसकी आंखें बिल्कुल खाली थी.... जैसे उगते हुए सूरज कि किरने भी इस औरत के मन में आशा का सवेरा... भरने में नाकाम हो रही थी।
    वो आदमी औरत को देखकर व्यंग से मुस्कुराया।
    " तो फिर क्या सोचा है तुमने.... तुम हमें उसका पता नहीं बताओगी।" आदमी की आवाज सुनकर औरत पीछे मुड़ी।
    "मैं पहले भी तुमसे कह चुकी हूं कि मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता....."औरत ने साफ कहा।
    "अच्छा तो फिर किसको पता है ??"आदमी व्यंग से बोला।
    " मुझे नहीं पता...." औरत ने तो जैसे साफ सोच रखा था कि वह इस आदमी की किसी भी सवाल का जवाब नहीं देगी।
    "कमाल की बात है... तुम्हें पता ही नहीं... उसे पता ही नहीं..... तो फिर किसको पता है?? वह पूरे दुनिया की खाक छान रहा है सिर्फ और सिर्फ तुम्हें ढूंढने के लिए.... ताकि वह तुम्हारे थ्रू उसका पता जान सके और उसके वहां पहुंचने से पहले मैं उसका पता जानना चाहता हूं क्योंकि वही हमारे सारे तालों की चाबी है .....और मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि तुमने उसे कहीं छुपा रखा है..... तुम राणावत को बेवकूफ बना सकती हो कि तुमने उसे अपने साथ-साथ मार दिया है। पर तुम जिंदा हो.... यह बात सिर्फ मैं जानता हूं.... लेकिन वह भी जिंदा है.... यह बात सिर्फ तुम जानती हो.... अच्छा होगा कि तुम हमें.... उसका पता बता दो... वरना हमें तुम्हारे मुंह से उसका पता निकलवाने के और भी तरीके पता है....." आदमी ने कहा।
    "मेरा यकीन करो.... अगर वह जिंदा है तो इस खबर को सुनकर मुझसे ज्यादा खुशी किसी को नहीं होगी...." औरत धीरे से बोली।
    "पर मुझे एक बात समझ में नहीं आ रही कि तुम्हारा उस मासूम पर इतना इंटरेस्ट क्यों है....?" औरत ने पूछा..... जवाब में आदमी मुस्कुराया।
    "बता तो चुका ही हूं जिस तरह रानी मैं पद्मावती की जान तोते में थी.... उसी तरह से राणावत की जान... उसमें मैना के अंदर है और इस टाइम राणावत दुनिया के गिने-चुने अमीरों में से एक है.... मैंने तो तुम्हें साफ साफ कह दिया है मुझसे शादी कर लो और उस मैना का पता.... मुझे बता दो.... वादा करता हूं तुमसे ....एक अच्छा पति और एक अच्छा पिता.... बन कर दिखाऊंगा... उस राणावत की तरह तो बिल्कुल नहीं ...." आदमी औरत के नजदीक होता हुआ बोला।
    " दूर रहो मुझसे.... मैं पहले ही कह चुकी हूं तुमसे इस तरह के सपने देखना छोड़ दो.... मैं मर जाऊंगी.... लेकिन तुमसे शादी नहीं करूंगी.... और रही बात राणावत की तो तुम चाहे लाख कोशिश कर लो.... तुम उसकी तरह कभी बन भी नहीं सकते...." औरत नफरत से बोली।
    "रस्सी जल गई लेकिन बल नहीं गया.... जानती हो तुम जितना उससे प्यार करती हो... उतना ही वो तुमसे नफरत करता है....."
    "उसकी नफरत भी मेरे लिए मेरे प्यार का इनाम ही है.... जो कि तुम कभी भी नहीं समझ सकते।" औरत ने कहा।
    "ठीक है तो फिर यह देख लो .....अगर तुमने दस दिनों के अंदर मुझे उसका पता नहीं बताया तो फिर इसके साथ क्या होगा तुम सोच भी नहीं सकती हो...."आदमी ने कुछ फोटोग्राफ्स औरत की ओर उछाल दिया.... और बाहर की ओर निकलने लगा.... दरवाजे के पास पहुंचकर वह पीछे मुड़ा और वार्निंग देने वाले लहजे में उंगली दिखाते हुए बोला," दस दिन...… दस दिन के बाद..... इन सब की मौत का जिम्मेदार तुम होगी।" तेजी से डग भरता हुआ आदमी कॉटेज के बाहर निकला और गाड़ी में बैठ कर निकल गया। उसके पीछे पीछे सिक्योरिटी की दोनो गाड़ियां भी वैसे ही निकल गई जैसे की आई थी। औरत ने तेजी से उन फोटोग्राफ्स को उठाया...... और सीने से लगा लिया। यह फोटोग्राफ्स रणविजय के साथ-साथ इशानी और उसकी तीन साल की छोटी सी बेटी शिवि के थे। रणविजय और शिवि के फोटो पर क्रॉस का निशान बनाया हुआ था।
    ,"कुछ समझ नहीं आ रहा.... मैं क्या करूं... किस को बचाऊं?? अपने प्यार को... या अपने प्यार की निशानी को..." इशानी बेबसी से रो पड़ी।
    अपनों को खो देने के डर से..... कुछ भी ना कर पाने की बेचैनी से .....दर्द की एक लहर ने इशानी के दिल को अपनी चपेट में ले लिया था... शायद इसी दिल के दर्द को अमेरिका में रणविजय ने भी महसूस किया था।

    राजपूताना पैलेस
    न्यूयॉर्क अमेरिका


    अपनी यादों के भवर में झूलते हुए रणविजय का जब दर्द बर्दाश्त के बाहर हो गया..... तो अपनी बेटी की गुड़िया सीने से लगाए..... रणविजय बेहोश होकर गिर गया।
    बेहोशी के आलम में उसके मुंह से निकला था.... "इशानी.... जिंदगी...."
    उसे बेहोश होते देख आदित्य और शिवम बुरी तरह से घबरा गए।
    "शिवम फास्ट.... पानी लाओ...." आदित्य ने शिवम से कहा। शिवम तेजी से पानी का जग लेकर आया। दोनों ने रणविजय के चेहरे पर पानी के छींटे मारे। लेकिन रणविजय के शरीर में कोई भी हरकत नहीं हुई । शिवम ने रणविजय की नब्ज चेक की....उसकी पल्स रेट भी बहुत लो जा रही थी....
    " चाचू इनका पल्स रेट बहुत लो है।" शिवम ने घबराते हुए बताया।
    आदित्य ने रणविजय के कोट के बटन खोल दिए "इस की धड़कन भी बहुत धीमी चल रही है ...."आदित्य परेशान हो उठा। शिवम ने रणविजय के जूते उतारकर उसके पैरों के तलवों को मलना शुरू किया। आदित्य उसकी हथेली को मल रहा था।
    " शिवम डॉक्टर को फोन लगाओ... फास्ट..."किसी भी तरीके से रणविजय को होश में ना आता हुआ देखकर आदित्य घबरा रहा था और शिवम की हालत तो उससे भी बुरी हो रही थी।
    " कितनी बार मना किया है ना.... स्ट्रेस मत लो ....इतना स्ट्रेस मत लो... लेकिन तुम मेरी बात कभी नहीं सुनते ....." आदित्य घबराते हुए रणविजय की हथेली को मल रहा था और साथ में बोलता भी जा रहा था। इन दोनों की घबराई हुई आवाज सुनकर तब तक घर के नौकर भी जमा हो गए थे।

  • 11. वफ़ा ना रास आई - Chapter 11

    Words: 1358

    Estimated Reading Time: 9 min

    कैसी है तेरी बेवफाई….




    रणविजय की हालत देखकर सब परेशान हो गए थे। घर के सारे नौकर दरवाजे पर हाथ बांधे खड़े थे।
    आदित्य और शिवम ने रणविजय की बेहोशी तोड़ने की हर कोशिश कर ली थी। लेकिन वह दोनों सफल नहीं हुए .... डॉक्टर भी आ चुका था.... पर रणविजय की क्रिटिकल सिचुएशन को देखते हुए..... उसने बिना देर किए रणविजय को हॉस्पिटल में शिफ्ट करने के लिए कहा...फिर उन लोगों ने झटपट नौकरों की मदद से रणविजय को एंबुलेंस में डाला और तुरंत हॉस्पिटल की तरफ भागे....
    "शिवम, तुम राणावत पैलेस में फोन करो और अंकल आंटी से रणविजय की सिचुएशन बताओ। उन लोगों को जल्दी न्यूयॉर्क पहुंचने को बोलो। तब तक मैं रणविजय के साथ हॉस्पिटल जाता हूं।" आदित्य ने शिवम से कहा।
    " चाचू प्लीज... मैं भी आपके साथ ही जाऊंगा।" शिवम ने रिक्वेस्ट किया।
    " ओके ...ठीक है.... मैं खुद अंकल आंटी से बात करता हूं.... तुम रणविजय की एंबुलेंस के पीछे पीछे जल्दी जाओ...." आदित्य गाड़ी में बैठते हुए बोला। उसने अपनी जेब में से अपना फोन निकाला और रणधीर जी का नंबर डाल कर दिया।
    "अंकल रणविजय की हालत खराब हो गई है. ऐसा लगता है कि सर के दर्द फिर से शुरू हो गया है। उसे पैनिक अटैक फिर से आया है। मैं उसको लेकर हॉस्पिटल जा रहा हूं ।" आदित्य ने कहा।
    " ठीक है.... कितना मना करता हूं इस लड़के को कि बिजनेस की टेंशन मत लिया करो..... लेकिन यह मेरी बात बिल्कुल नहीं सुनता.. मैं भी यहां से निकलता हूं...."रणधीर जी ने कहा।
    "नो नो अंकल ....चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है.... मैं यहां पर हूं साथ में शिवम भी है। रणविजय की फिक्र मत कीजिए.... मैं उसका यहां अच्छे से ध्यान रखूंगा... आप वहां देखिए...."आदित्य ने गाड़ी को टर्न देते हुए कहा।
    " तुम्हारे होते हुए मुझे किसी चीज की चिंता नहीं ... रणविजय की तो बिल्कुल भी चिंता नहीं। जैसा होगा वैसा मुझे इन्फॉर्म करते रहना। डॉक्टर के इंस्ट्रक्शंस मुझसे मत छुपाना।" रणधीर जी ने कहा।
    " ओके अंकल...." आदित्य में कहकर फोन काट दिया।
    अपना फोन अपने हाथ में पकड़े हुए रणधीर जी चिंता में डूबे थे। आज करीब 12 साल के बाद रणविजय की तबीयत इस कदर बिगड़ी थी। कहीं ये फिर से किसी गंभीर बीमारी के संकेत तो नहीं है??
    " क्या हुआ क्या सोच रहे हैं ??" साधना जी ने उनके कंधे पर हाथ रखा ।
    रणधीर जी ने गौर से साधना जी की तरफ देखा।
    " कुछ बिजनेस प्रॉब्लम है...."रणधीर जी ने छोटा सा जवाब दिया और अपनी स्टडी की ओर बढ़ गए।
    जाने क्यों उनके दिल ने साधना जी को कुछ भी बताने से मना कर दिया।


    अमेरिका...
    रणविजय को तुरंत ही हॉस्पिटल में एडमिट कर लिया गया था। स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की एक पूरी टीम उसके सारे टेस्ट ले रहे थे। बात किसी साधारण इंसान की नहीं थी .....रणविजय सिंह राणावत ....अमेरिका के टॉप मोस्ट बिजनेसमैन में से एक था..... बिजनेस वर्ल्ड का जाना पहचाना नाम था। उसकी कंपनी वर्ल्ड में तीसरे नंबर पर आती थी " रॉयल राजपूताना...."
    डॉक्टरों के हिसाब से उसकी सिचुएशन बहुत क्रिटिकल थी। लगातार काम करते रहने से दिमाग की नसों में तनाव भर गया था। डॉक्टरों की काफी कोशिश के बाद... बहुत मुश्किल से उसे कुछ देर के लिए होश आया था.... मुश्किल से 2 या 3 मिनट के लिए.... इतनी देर में उसके सर का दर्द बहुत तेज था और इस दर्द की बेचैनी में रणविजय ने आस पास रखे हुए मशीनों को बुरी तरह से तोड़ दिया था। वह पागल जैसा बाहर कर रहा था.... दर्द और गुस्से के आलम में वह सिर्फ एक ही बात चिल्ला रहा था...." इशानी प्लीज मेरी बात तो सुनो... बात तो सुनो इशानी मेरी.... प्लीज इशानी मुझे एक मौका तो दो.... तुम्हारे बिना मैं नहीं जी पाऊंगा...."
    डॉक्टरों की पूरी टीम ने किसी तरह से उस पर काबू पाया था और अब उसे बेहोशी का इंजेक्शन दे दिया गया था।
    इस समय आदित्य डॉक्टर के केबिन में बैठा हुआ था। और डॉक्टर ने जो रणविजय की सिचुएशन उसे बताइ थी... वह सचमुच परेशान करने वाली थी।
    "देखीए मिस्टर आदित्य सिंह राठौर... हमने पहले भी रणविजय सर से कह रखा था कि काम का इतना अधिक स्ट्रेस उनके सेहत के लिए ठीक नहीं है .....उनकी दिमाग की नसें पहले ही क्षतिग्रस्त हो चुकी थी.... शायद वह कुछ महीने कोमा में भी पहले रह चुके हैं...."डॉक्टर ने आदित्य से रणविजय के केस की गंभीरता बताइ।
    "मैं जानता हूं... इस बात को... यह करीब आज से बारह साल पहले की बात है.... उस समय उसका एक मेजर एक्सीडेंट हुआ था ....पर इस एक्सीडेंट के बाद जो उसका ऑपरेशन हुआ था ....उसके बाद तो वह बिल्कुल ठीक था...." आदित्य ने कहा।
    "कोई भी चीज एक बार अगर डैमेज हो जाती है ...तो हम उस चीज से पहले जैसा काम नहीं ले सकते है...यह बात हमने उन्हें समझाइ थी... इस कारण हमने उन्हें ज्यादा स्ट्रेस लेने से मना किया था.... पर उन्होंने हमारी बात अनसुनी कर के केवल पेन कलर का यूज किया है.... इस कारण यह स्थिति बन चुकी है.... हमने उनसे कहा था कि हमें उनके इलाज के लिए उनका पिछला रिकॉर्ड देखना है.... पर अफसोस की बात है कि तीन महीने बीत जाने के बाद भी.... उन्होंने अपना पिछला रिकॉर्ड नहीं हमें नहीं दिया। इस टाइम उनके दिमाग की कई नसे बिल्कुल ब्लॉक हो गई है..."डॉक्टर ने बड़े अफसोस से कहा।
    " इसका कोई इलाज नहीं है...."आदित्य ने पूछा।
    " इलाज क्यों नहीं है.... आज के जमाने में मेडिकल साइंस के लिए निनानवे फीसदी बीमारियों का इलाज संभव है।पर इलाज के लिए बहुत ज्यादा जरूरी है ....हम उनका पिछला रिकॉर्ड देखें..... अदर वाइज हम आगे का इलाज शुरू नहीं कर पाएंगे। हमें यह देखना है कि उनके दिमाग में पिछले बार किन किन चीजों का ऑपरेशन हुआ था और डॉक्टर ने कौन-कौन सी मेडिसिन उनको पहले ही चलाई थी। यह चीज हमने पहले ही क्लियर कर दी थी.... बिना बीमारी की जड़ तक गए हुए ....आगे का इलाज बहुत मुश्किल है.... आप जितनी जल्दी हो सके उनका पिछला रिकॉर्ड हम अवेलेबल करवाए.... ताकि हम समय रहते हुए इन ब्लॉकेज को खोल सके ....अदर वाइज क्या हो सकता है ??मुझे आपको बताने और समझाने की जरूरत नहीं है.... आप खुद समझ सकते हैं.... दिमाग की नसें फट सकती हैं या तो मिस्टर रणविजय हमेशा के लिए पागल हो सकते हैं या फिर मर भी सकते हैं।" डॉक्टर ने साफ-साफ आदित्य से रणविजय सिंह की सिचुएशन बताइ।
    " ओके डॉक्टर.... दरअसल उसका पहला ऑपरेशन इंडिया में हुआ था... मैं देखता हूं कि पिछला रिकॉर्ड वहां पर है या नहीं ?? मैं उस हॉस्पिटल से कांटेक्ट करके पिछला रिकॉर्ड निकलवाने की कोशिश करता हूं। मैं उसके पेरेंट्स को भी कांटेक्ट करता हूं... शायद उनके पास रणविजय का पिछला रिकॉर्ड हो। तब तक आप कोशिश कीजिए कि उसकी सिचुएशंस सटेबल रहे "आदित्य ने कहा।
    " जी जरूर... लेकिन जितनी जल्दी हो सके... हमारे पास समय बहुत कम है...." डॉक्टर ने आदित्य को बताया।
    डॉक्टर के केबिन से निकलने के बाद आदित्य बहुत परेशानी में पड़ गया था । रणधीर सिंह ने उसके पिछले ऑपरेशन के रिकॉर्ड के बारे में पूरी तरह से अनभिज्ञता जाहिर कर दी थी.. उनके हिसाब से सब कुछ इशानी के पास था.. यह तो भला हो कि जिस हॉस्पिटल में उसका ऑपरेशन हुआ था... उनके रिकॉर्ड में सब कुछ डिटेल वगैरह मिल गया था..... आदित्य ने उस हॉस्पिटल कांटेक्ट करके.... वहां से जल्दी पिछले रिकॉर्ड के इस हॉस्पिटल में ट्रांसफर करने के लिए कहा था... फिर वह रणविजय को देखने के लिए आईसीयू की तरफ निकल गया।
    इधर शिवम बेचैनी सी कॉरिडोर में टहल रहा था... उससे रणविजय की हालत देखी नहीं जा रही थी... शिवम की बेचैनी कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी.... उसे सब कुछ जानने की उत्सुकता हो रही थी.... शिवम के दिमाग में अनगिनत प्रश्न चल रहे थे.... "आखिर रणविजय चाचू की हालत ऐसी कैसे हुई?? उसके रणविजय चाचू तो हर पल जिंदगी को जीने वाले इंसान थे। आखिर ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई आदमी अपने आप को पूरी तरह से बदल दे और काम का इतना अधिक स्ट्रेस ले ले कि उसके सर में इतना तेज दर्द उभर आए...... या फिर वह आदमी खुद को जिंदगी से दूर मौत की दहलीज पर लाकर खड़ा कर दें??"

  • 12. वफ़ा ना रास आई - Chapter 12

    Words: 1321

    Estimated Reading Time: 8 min

    बीते हुए लम्हों का दर्द
    "शिवम बेचैनी से कॉरिडोर में टहल रहा था... उससे रणविजय की हालत देखी नहीं जा रही थी... शिवम की बेचैनी कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी.... उसे सब कुछ जानने की उत्सुकता हो रही थी.... आखिर रणविजय चाचू की हालत ऐसी कैसे हुई?? उसके रणविजय चाचू तो हर पल जिंदगी को जीने वाले इंसान थे। आखिर ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई आदमी अपने आप को पूरी तरह से बदल दे और काम का इतना अधिक स्ट्रेस ले ले कि उसके सर में इतना तेज दर्द उभर आए.... उसे अच्छी तरह से याद है की रणविजय चाचू ,शिवम के पापा को भी समझाते थे कि इतना पैसा कमाकर आखिर कीजिएगा क्या?? ना ही कब्र में अलमारी है... और ना ही कफन में जेब.... सब कुछ तो यही छोड़ कर जाना है.... तो क्यों नहीं जिंदगी के मजे खुलकर लिए जाए.... कम से कम यह तो अफसोस नहीं होगा कि हमने जिंदगी नहीं जिया .. हंसते खेलते दो पल जीना ही जिंदगी है.....कागज के टुकड़ों में आखिर रखा ही क्या है?? तो फिर आखिर खुद रणविजय चाचू क्यों पैसे कमाने की मशीन बन गए??. ईशानी आंटी और शिवि कहां है?? जहां तक उसे याद था .....रणविजय चाचू और इशानी आंटी एक दूसरे को बहुत प्यार करते थे.... और शिवि में तो इन दोनों की जान बसती थी। आखिर ऐसा क्या हुआ कि हंसता खेलता परिवार पल भर में बिखर गया.... क्यों इशानी आंटी.... चाचू को छोड़कर चली गई और अभी वह फिलहाल कहां है?? शिवि किसके पास है?? क्यों चाचू ने ऐसा कहा कि वो शिवि और इशानी आंटी को खोजते खोजते थक चुके हैं... आखिर दोनों कहां जा सकती हैं ?? जो उनका पता मिलना भी मुश्किल हो रहा है.... सवाल बहुत सारे थे .....लेकिन जवाब कहीं नहीं मिल पा रहा था ....सोचते सोचते जब शिवम का सर दुखने लगा तो वह बाहर पड़ी हुई बेंच पर बैठ गया.... लेकिन फिर भी उससे रहा नहीं जा रहा था ...वह धीरे से चलता हुआ आईसीयू के बाहर आया और शीशे से अंदर देखने लगा। अंदर रणविजय का पूरा शरीर मशीन से जकड़ा हुआ था ....शिवम ने रणविजय के दर्द को महसूस करते हुए अपनी आंखें बंद कर ली।तभी उसे अपने कंधे पर आदित्य के हाथों का दबाव महसूस हुआ। शिवम तेजी से आदित्य की तरफ मुड़ा और सवालों की झड़ी लगा दी।
    "क्या हुआ चाचू डॉक्टर ने क्या कहा?? रणविजय चाचू जल्दी से ठीक हो जाएंगे ना..." शिवम ने बेसब्री में पूछा।
    आदित्य ने एक गहरी सांस ली और कहा," डॉक्टर का कहना है कि उसके दिमाग की नसों में ऑक्सीजन बहुत कम मात्रा में पहुंच रहा है .. कारण की नसों में कुछ ब्लॉकेज दिख रहे हैं....उसका जो पिछला एक्सीडेंट हुआ था... वह पहले उसको स्टडी करेगें... उसके बाद ही आगे का इलाज करेंगे.... "आदित्य ने बताया।
    "पिछला एक्सीडेंट!! क्या चाचू का इससे पहले भी कोई एक्सीडेंट हो चुका है ??" शिवम ने हैरानी से पूछा।
    " हां... इससे पहले भी उसका एक मेजर एक्सीडेंट हो चुका है.. लगातार दो या तीन ऑपरेशन उस समय भी रणविजय के हुए थे.... डॉक्टर ने उस टाइम रणविजय की सिचुएशन को देखते हुए लगभग हाथ खड़े कर दिए थे.... यह तो इशानी का प्यार और भगवान का कोई चमत्कार ही था... जिसने रणविजय की जान बचाई थी.... उस टाइम के सारे ऑपरेशन के पेपर इशानी के पास ही थे। इस कारण डॉक्टर्स को नए सिरे से इलाज करने प्रॉब्लम हो रही है। तुम घबराओ मत... मैंने उस हॉस्पिटल से बात की है... जहां पहले रणविजय का ऑपरेशन हुआ था... उन लोगों ने जल्द ही सारी रिपोर्ट इस हॉस्पिटल में ट्रांसफर करने की बात कही है.. कल तक हो सकता है कि रणधीर अंकल और साधना आंटी भी यहां चले आए...." आदित्य ने शिवम को समझाते हुए कहा।
    " एक बात पूछूं.... चाचू..." शिवम ने धीरे से कहा।
    " हां बोलो....." आदित्य शिवम के पास ही बेंच पर बैठ गया था.
    " ईशानी आंटी और शिवि कहां है??" शिवम ने पूछा।
    " यह तो मुझे खुद नहीं पता बेटा। रणधीर अंकल की प्रॉब्लम मैं समझ सकता हूं... अगर इशानी और शिवि नहीं मिली या फिर उनके जीवित होने के प्रमाण भी नहीं मिले तो सारी प्रॉपर्टी ट्रस्ट तो चली जाएगी... उसमें भी आंटी रणविजय की दूसरी शादी को लेकर उत्साहित है ....अंकल ने आंटी से कुछ भी बताने से मना किया है... पता नहीं क्या समझा कर अंकल आंटी को लेकर यहां आएंगे.."आदित्य थके थके शब्दों में बोला।
    "पर ऐसा कैसे हो सकता है?? यह सारी दौलत तो रणविजय अंकल ने अपनी मेहनत और बलबूते पर कमाई है...." शिवम हैरान था।
    " पर इन सब के पीछे तो रॉयल राजपूताना की प्रोपर्टी ही बेस में है ना.... यह सब कुछ रणविजय के दादाजी का किया धरा है...." रणविजय को इशानी से शादी करनी ही नहीं चाहिए थी.... विश्वास नहीं होता कि इशानी जैसे समझदार लड़की.... प्रॉपर्टी के लिए ऐसा कुछ करेगी.... अपने बदले की आग में इतना गिर जाएगी कि पूरे परिवार को तबाह करके रख देगी।" आदित्य गुस्से में बोला।
    "बदले की आग....!! चाचू और इशानी आंटी तो एक दूसरे से प्यार करते थे ना.... तो फिर रणविजय चाचू से इशानी आंटी बदला क्यों लेना चाहती हैं?? आखिर ऐसा क्या हुआ जिसके कारण रणविजय चाचू और इशानी आंटी अलग हो गए .....यह सब कैसे हुआ ...प्लीज मुझे बताइए .....आखिर बात क्या है ऐसी.... जो कोई भी इस मैटर में बात नहीं करना चाहता.... जहां तक मुझे पता है... याद है.... रणविजय चाचू और इशानी आंटी का रिश्ता बहुत मजबूत था.... फिर ऐसा क्या हो गया जो एक ही पल में यह रिश्ता टूट गया? और इशानी आंटी ने अपने बदले की आग में सब कुछ तहस-नहस कर दिया।" शिवम ने बड़ी आशा के साथ आदित्य से पूछा।
    "सारी बातें तो मुझे भी पता नहीं है शिवम.... पर मैं इतना जानता हूं जब यह प्रेम कहानी शुरू हुई थी.... मैं रणविजय और इशानी एक ही कॉलेज में पढ़ते थे। यह प्रेम कहानी शुरू से ही मुश्किलों से भरी थी .....इस प्रेम की डगर तो बिल्कुल आसान नहीं थी....... जिस दिन रणविजय ने अपने प्यार को हम लोगों के सामने स्वीकार किया था .....उस दिन तो हम लोगों के सर पर हैरतो का पहाड़ टूट पड़ा था .....एक उत्तरी ध्रुव था तो दूसरा दक्षिणी ध्रुव ......इन दोनों ध्रुव का मिलन भी होगा..... ऐसा तो सोचना भी..... नामुमकिन तो नहीं... पर मुश्किल जरूर था... नामुमकिन इसलिए नहीं था क्योंकि हम सब रणविजय की तबीयत से परिचित थे.... वह जो चीज एक बार ठान लेता था .....वह किसी भी हाल में कर लेता था। लेकिन मुश्किल इसलिए था कि रणविजय जैसा लड़का ईशानी के प्यार में पड़ जाएगा ...... हमने तो सपने में भी नहीं सोचा था... रणविजय जहां राणावत का इकलौता बेटा था.... तो एक अमीरी और पैसे का घमंड.... उसके हर एक लाइफस्टाइल से लेकर.... बात वयवहार हर चीज में झलकती थी..... बिल्कुल हंसमुख, जिंदगी के हर पल को जीने वाला ,लेट नाइट पार्टीज ,मस्ती, लोंग ड्राइविंग, फास्ट ड्राइविंग, कॉलेज की फुटबॉल और बास्केटबॉल दोनों टीम का टॉप मोस्ट प्लेयर था.... लेकिन पढ़ाई लिखाई और इसका दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था.... इसका ही क्यों ???हम चार लड़कों का ग्रुप था.... मैं रणविजय ,अभिनव और अदम्य.... अभिनव और अदम्य को तुम जानते ही हो। यह आहूजा ग्रुप के लड़के हैं .....हम चारों की फैमिली बिजनेस की दुनिया में अपना अच्छा खासा नाम और रुतबा रखती है...... कॉलेज के ट्रस्टी हमारा रॉयल्स राजपूताना ग्रुप था.... इसलिए हमें एग्जाम की तो बिल्कुल चिंता नहीं होती थी..... किसकी हिम्मत थी कि हमें फेल करता? हमेशा अच्छे नंबरों से पास हो जाते थे.... इसलिए अपना सारा टाइम हम केवल मस्ती में ही निकालते थे ....कॉलेज हमारे लिए एक पिकनिक स्पॉट से ज्यादा नहीं था और ठीक इसके विपरीत इशानी एक लोअर मिडल क्लास फैमिली से बिलॉन्ग करती थी... जिसका हमारे राजपूत कॉलेज में एडमिशन..... सिर्फ और सिर्फ के स्कॉलर होने की वजह से हुआ था.. इशानी हमारे क्लास के सबसे खूबसूरत और सबसे तेज लड़की थी। सारे टीचर्स की प्यारी..... कॉलेज के हर एक लड़के की धड़कन..... बिल्कुल मासूम.... पारियों सी...

  • 13. वफ़ा ना रास आई - Chapter 13

    Words: 1237

    Estimated Reading Time: 8 min

    उस लड़की पर दिल आया है।
    इशानी हमारे क्लास के सबसे खूबसूरत और सबसे तेज लड़की थी। सारे टीचर्स की प्यारी..... कॉलेज के हर एक लड़के की धड़कन..... बिल्कुल मासूम.... पारियों सी... कॉलेज में पढ़ाई के अलावा क्या हो रहा है क्या नहीं??.. इशानी का कॉलेज के इन सब झमेले से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था .....वह कॉलेज के कल्चर प्रोग्राम में पार्टिसिपेट करती थी या फिर इसके बाद का उसका पूरा टाइम सिर्फ और सिर्फ लाइब्रेरी और क्लास में बितता था..... इशानी की फ्रेंड सर्किल भी बहुत छोटी थी क्योंकि राजपूत कॉलेज..... दिल्ली का सबसे महंगा कॉलेज था और इसमें अधिकतर स्टूडेंट्स हाई-फाई फैमिली से बिलॉन्ग करते थे..... ज्यादातर लड़के और लड़कियां कॉलेज में अपने पैसों का शो ऑफ करने हीं आते थे। फैशनेबल कपड़े, महंगे जूते ,ब्रांडेड घड़ियां, ब्रांडेड गाड़ियां लगभग सभी स्टूडेंट्स यूज करते थे। ऐसे में इशानी एक सिंपल सूट .... लगातार तीन-चार दिन तक पहन कर आती थी पर फिर भी ईशानी के चेहरे पर आत्मविश्वास की एक अलग चमक रहती थी...... हमें तो पता ही नहीं चला ....हर वक्त किताबों में अपना सर झुकाइ हुई ये लड़की.... कब रणविजय के दिल में उतर गई.... इसकी खबर तो रणविजय को भी नहीं लगी थी.....
    एक बार सर ने रणवीर और इशानी को एक ग्रुप में करके के असाइनमेंट दिया था..... हमेशा की तरह रणविजय अपने असाइनमेंट को लेकर लापरवाह था..... इशानी ने अपने असाइनमेंट के चलते रणविजय से कई बार बात करने की कोशिश भी की थी.... लेकिन रणविजय के पास पढ़ाई-लिखाई के लिए टाइम कहां था? लेकिन इशानी ने समय पर अपने साथ-साथ रणविजय के भी हिस्से का काम करके.... जमा करवा दिया था..... उसके साथ-साथ हमारे ग्रुप के लड़कों का भी असाइनमेंट जमा करना था.... जो कि समय पर तो क्या?? समय बीतने के बाद भी बिल्कुल नहीं हो पाया था और इस बार कॉलेज की अथॉरिटी से भी हमें मदद नहीं मिली थी..... क्योंकि असाइनमेंट ....यूनिवर्सिटी में जा रहा था..... ऐसे में हमारे मार्क्स तो जीरो हो गए थे.... प्रोफेसर ने हमें पहले ही इस मैटर में कह दिया था.... लेकिन अगर हम सुन जाए फिर तो हमारा प्रोफाइल लो नहीं हो जाता?? हमें ना सुनना था ना हमने सुना..... जिसका नतीजा यह हुआ कि हमारी मार्कशीट सीधे हमारे पेरेंट्स के पास गई थी... और इसके लिए हमें अपने पैरंट्स से अच्छा खासा डांट सुनना पड़ा था... लेकिन रणविजय इशानी की इस मदद के कारण अपने सेमेस्टर में सेकंड टॉप था।
    उस दिन पहली बार रणविजय ने पूरे कॉलेज में इशानी को ढूंढा था..... जो कि उसे अपनी आदत के अनुरूप लाइब्रेरी में किताबों में सर दिए हुए मिली थी ....रणविजय चुपचाप इशानी के सामने जाकर बैठ गया और किताबों में सर डाली हुई इशानी को गौर से देखने लगा। जैसे इशानी को अपने दिल तक उतार रहा था..... इधर इशानी को किसी की नजर अपने ऊपर महसूस हुई तो कुछ देर के बाद इशानी ने अपना सर उठाया... जैसे पूछ रही हूं कि वह इस तरह से से क्यों देख रहा है? ईशानी के नजरों की बात समझ कर रणविजय झेंप सा गया। वह मुस्कुराते हुए बोला," तुम यहां आकर लाइब्रेरी में बैठी हो.... मैंने तुम्हारी तलाश में पूरा कॉलेज ढूंढ मारा.."
    " क्यों?? आपको कुछ काम था..मुझसे?.." ईशानी ने घबराते हुए पूछा। उसने देख लिया था कि पूरे लाइब्रेरी की नजर रणविजय और इशानी पर ही थी । जहां लड़कियां इशानी को जलन से देख रही थी क्योंकि अपना रणविजय किसी भी लड़की को लिफ्ट नहीं देता था और लड़कियां रणविजय के स्मार्ट पर्सनालिटी और बेशुमार दौलत के पीछे हमेशा ही भागती थी। वही लड़के हैरान होकर देख रहे थे कि किसी से भी बात ना करने वाली यह सिंपल सी लड़की रणविजय से क्या बोलती है??
    " नहीं.... नही.... रिलैक्स.... बस मैं... वह ...."रणविजय को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या बोले । इशानी ने फिर से अपना ध्यान किताबों में लगा लिया.... चुपचाप पढ़ने लगी और रणविजय उसके सामने बैठा हुआ उसके चेहरे को पढ़ने लगा । कुछ देर के बाद इशानी को फिर वैसा ही फील हुआ तो उसने अपनी नजर ऊपर उठाई। ईशानी से नजर मिलते ही इस बार रणविजय ने अपने आंखें फेर ली थी और लाइब्रेरी में इधर-उधर देखने लगा था।
    इशानी हैरान होकर उसकी तरफ देखने लगी.... फिर इस तरह की सिचुएशन से बचने के लिए ईशानी ने अपनी किताबें समेटी और लाइब्रेरी से बाहर क्लास रूम की तरफ जाने लगी।
    " वन मिनट ....प्लीज वेट.... मुझे तुमसे कुछ बात करनी है रणविजय ने इशानी से कहा। जाती हुई इशानी के कदम रुक गए..... रणविजय भी अपना बैग संभालते हुए ईशानी के पास दौड़ता हुआ आया और उसे लाइब्रेरी से बाहर चलने का इशारा किया । ईशानी धीरे-धीरे रणविजय के साथ बाहर आई। इन दोनों के लाइब्रेरी से निकलते ही लाइब्रेरी में बाते चालू हो गई थी। लेकिन लाइब्रेरी के बाहर आते ही इशानी रुक कर खड़ी हो गई और उसने कुछ गुस्से में रणविजय से पूछा," ऐसी क्या बात करनी थी जो आप लाइब्रेरी में नहीं बोल सकते थे?"
    रणविजय इधर उधर देखा और फिर एक गहरी सांस ली ।" इशानी थैंक यू......"
    " थैंक यू..... किसलिए??"इशानी ने हैरानी में रणविजय से पूछा ।
    " वह मेरे झिड़कने और रूडली बिहेव करने के बाद भी तुमने मेरा भी असाइनमेंट कंप्लीट करके जमा करवाया था ना इसलिए..... आई एम रियली सॉरी फॉर दैट एंड थैंक यू फॉर योर हेल्प। " रणविजय ने कहा।
    रणविजय की बात सुनकर इशानी को पिछला याद आ गया.... जब वह असाइनमेंट कंप्लीट करवाने के लिए रणविजय के पीछे पीछे दौड़ रही थी. लेकिन रणविजय उसकी कोई बात सुनने को तैयार नहीं था और एक दिन रणविजय ने इशानी को बुरी तरह से डाटा भी था कि उससे इस असाइनमेंट से कोई मतलब नहीं है। वह चाहे तो करें और ना चाहे तो आराम करें। पर उसका पीछा ना करें।"इशानी आज सब बराबर करने के मूड में आ गई थी..... ईशानी ने फुल कॉन्फिडेंस के साथ होठों को गोल करते हुए कहा," इस गलतफहमी में तो आप मत रहिए कि मैंने आप के लिए..... आप का असाइनमेंट कंप्लीट करके जमा करवाया था..... आप अमीर घर की लड़के.... पूरा कॉलेज ही खरीद सकते हैं..... आपके लिए भले ही असाइनमेंट कोई मायने नहीं रखता था लेकिन अगर मेरे मार्क्स कम आते.... तो मेरी स्कॉलरशिप बंद हो जाती.... इसलिए मुझे मजबूरी में आपके हिस्से का भी असाइनमेंट करके जमा करवाना पड़ा और प्लीज..... आगे से इस तरह से मुझसे बात करने के लिए.... इस तरह की जगह मत चुना करें.... आपके लिए कॉलेज केवल एक पिकनिक स्पॉट है और मौज मस्ती की जगह..... लेकिन मेरे लिए मेरा सारा फ्यूचर इस कॉलेज से जुड़ा हुआ है..... और मैं ऐसा कोई काम नहीं करना चाहती.... जिसकी वजह से मैं सबकी नजरों में बेवजह आऊं।" इशानी ने आसपास देखते हुए कहा.... आसपास गुजर रहे हर एक स्टूडेंट का ध्यान इशानी और रणविजय पर ही था।
    "ऐसी बात नहीं है.... इशानी। मैं समझता हूं ....आई एम सॉरी फॉर दैट.... आइंदा से ऐसा नहीं होगा।" रणविजय ने इशानी से कहा।
    " आइंदा से ऐसा होगा या नहीं ..... यह तो मुझे पता नहीं ???पर फिलहाल का तो मुझे इतना जरुर पता है.... अगर आप और दो मिनट भी मेरे साथ खड़े रहे तो कल पूरे कॉलेज को एक नया रिसर्च का टॉपिक मिल जाएगा। इसलिए प्लीज मुझे जाने दीजिए ।" ईशानी ने कहा ।
    रणविजय ने अपने आसपास देखा सब मुड़कर उन्हीं की ओर देख रहे थे।
    रणविजय ने जब उन्हें आंखें दिखलाइ तो वह चुपचाप सर झुका कर वहां से निकल गए..... लेकिन तब तक इशानी भी जा चुकी थी।

  • 14. वफ़ा ना रास आई - Chapter 14

    Words: 1416

    Estimated Reading Time: 9 min

    रणविजय ने बेहद अफसोस के साथ जाती हुई इशानी को देखा।
    इशानी कभी भी फैशनेबल लड़कियों की तरह शॉर्ट्स पहनकर कॉलेज में नहीं आती थी । बल्कि अधिकतर लॉन्ग स्कर्ट, कुर्ती या फिर सूट में ही आती थी । सादगी से सजी हुई इशानी..... हर जवां दिल की धड़कन थी। पर उसका किसी को लिफ्ट ना देने वाला रवैया.... लड़कों के इगो को चोट करता था... और उसमें भी उसका टॉपर होना..... सोने में सुहागा था। हर कोई उसे अपनी गर्लफ्रेंड बनाना चाहता था लेकिन ईशानी अपने आप में मगन रहती थी और बात वही होती है अंगूर खट्टे हैं। जब सब लोग उसे इस तरह से परेशान नहीं कर पाते थे .....तो उन्होंने दूसरा तरीका अपना लिया था।
    रणविजय जानता था की इशानी अपने ड्रेस सेंस और पढ़ाई को लेकर पहले ही स्टूडेंट्स के ज्यादा ट्रोल की जाती है.....इसलिए वह चुपचाप वहां से हट गया.... पर पता नहीं इशानी की बातों ने.... रणविजय पर क्या जादू किया था.... इस घटना के बाद रणविजय बिल्कुल बदल सा गया था..... उसने पढ़ाई पर भी ध्यान देना शुरू किया था और इशानी को लेकर भी बहुत पॉजिटिव हो गया था अब तो कॉलेज में हर एक असाइनमेंट में रणविजय और इशानी को एक साथ ही रखा जाने लगा था और रणविजय ईशानी के साथ मिलकर अपना असाइनमेंट खुद पूरा करने लगा था। इतना ही नहीं अधिकतर बिना किसी की जानकारी में आए हुए .....वह इशानी की मदद कर देता था.... चाहे लाइब्रेरी से महंगे बुक इशू करवाने की बात हो या फिर इशानी के लिए कैंटीन फ्री करवाने की बात ।
    रणविजय ने इशानी के लिए सब कुछ किया था ....लेकिन कॉलेज के स्टूडेंट और इशानी से छुपकर.... कॉलेज अथॉरिटी से कहकर.... उसने इशानी की स्कॉलरशिप की राशि बढ़वा दी थी। इस बात की जब भनक..... जब हम लोगों को लगी थी तो मैंने रणविजय से इस मामले में पूछा था। उस दिन रणविजय यह कह कर हंस कर टाल गया," अरे यार, राणावत के पास इतना पैसा है कि वह कई अनाथ आश्रम से लेकर कॉलेज, हॉस्पिटल चलाते हैं । इसमें उन लोगों की मदद होती है ...जिनको हम जानते भी नहीं हैं.... पर यह लड़की तो सामने से दिखाई पड़ती है और इतनी मेहनती है.... इसने मेरी मदद की है और ठाकुर रणविजय सिंह राणावत किसी का एहसान उधार नहीं रखता....." उसका यह अजीबोगरीब लॉजिक हमारे समझ में तो नहीं आया था.... पर हमने भी ज्यादा ध्यान नहीं दिया था।
    हमारे कॉलेज में कुछ लड़कों का और एक ग्रुप था जो केवल लड़कियों को परेशान करने के लिए आता था.... ऐसा तो लगभग हर कॉलेज में होता है..... कोई नई बात नहीं थी..... पर वह ग्रुप हमारे ग्रुप से दूर रहता था। ना हम उनके मैटर में इंटरफेयर करते थे और ना वह हमारी में करते थे..... लेकिन एक दिन क्लास में उस ग्रुप के लड़कों का सीधा टारगेट इशानी बनी थी और उस दिन जो हुआ.... उस घटना ने तो लगभग हमारे पैरों के नीचे से जमीन ही खींच ली थी।
    हमेशा की तरह इशानी के नंबर सबसे अच्छे आए थे.... और टीचर ने कॉपी चेक करके एक स्टूडेंट दिया था.... पर क्लास में मार्क्स सुनाते समय प्रोफेसर ने जहां इशानी को शाबाशी दी थी..... वहां कम मार्क्स लाने वाले स्टूडेंट्स को जी भर के लताड़ा भी था.... उस बदमाश ग्रुप के लड़के कम नंबर पाने वालों में सबसे आगे थे..... जितनी देर प्रोफ़ेसर बोल रहे थे..... वह आंखों ही आंखों से इशानी को ऐसे घूर रहे थे जैसे कि कच्चा खा जाएंगे..... प्रोफेसर के सामने तो उन लोगों ने कुछ नहीं कहा लेकिन प्रोफ़ेसर के निकलते ही वह अपनी लय में आ गए थे। इस ग्रुप के लड़कों का सॉफ्ट टारगेट काफी दिनों से इशानी थी। वो इशानी को परेशान करने से कभी भी बाज नहीं आते थे..... इशानी अधिकतर चुप रह कर या फिर उन लोगों को वार्न करके निकल जाती थी। पर आज तो उन लोगों ने हद कर दी थी। सारे स्टूडेंट धीरे-धीरे टेबल पर से अपनी कॉपी लेकर अपनी जगह पर वापस आ रहे थे ....पर इन लड़कों का ग्रुप एक साथ.... अपनी कॉपी लेने के लिए गया.... एक् ने इशानी की कॉपी टीचर्स टेबल से उठाकर जोर जोर से पढ़नी शुरू कर दी...
    ". मेहरबानो.... कदरदानों ..... जरा गौर से सुनिए.... हमारे क्लास की सबसे जहीन लड़की ने क्या लिखा है??"
    "क्या लिखा है??" एक साथ बाकी लड़कों ने कहा।
    "लिखा है कि .....मोहतरमा अर्ज फरमाती है कि....." इसके बाद वाह आंसर की जगह ईशानी के बारे में उल्टा सीधा बोलना शुरू कर दिया।
    " मैं इशानी भारद्वाज...... क्लास की सबसे खूबसूरत लड़की..... सिर्फ अपनी खूबसूरती की कशिश पर ना सिर्फ स्टूडेंट को.... बल्कि टीचर को भी इंप्रेस करने में सक्षम हूं और इसीलिए प्रोफ़ेसर मुझे टेस्ट में अच्छे मार्क्स देते हैं......" इतना कहकर वह लड़का बेहूदगी से हंस पड़ा।
    " बस इतना ही लिखा है..... इसमें और जोड़ना चाहिए था ना ......मेरे चेहरे पर इतनी मासूमियत भरी हुई है कि कोई भी मुझे सीधा साधा भोला भाला..... समझकर मेरे इस मासूम खूबसूरती के जाल में फंस जाता है..... और मैं फिर उससे अपना फायदा निकालने में जुट जाती हूं।" दूसरे ने टुकड़ा जोड़ा। इशानी चुपचाप गुस्से में उन लड़कों की तरफ देख रही थी। वह जानती थी कि कुछ बोलने से बात ज्यादा बिगड़ सकती है.... वैसे भी कॉलेज अथॉरिटी इन लोगों के खिलाफ तो कोई एक्शन लेगा नही। लेकिन उन लड़कों की अनाप-शनाप बातों पर जब पूरा क्लास हंसने लगा तो रणविजय गुस्से में अपनी मुठिया बंद कर उठने को हुआ लेकिन अदम्य ने उसका हाथ पकड़ कर रोक लिया," देख रणविजय, कोई झगड़ा मत करना.... इस ग्रुप के साथ हमारा पहले ही कमिटमेंट है हम ना इन के मैटर में बोलेंगे ना यह हमारे मैटर में। बर्दाश्त तो हमसे भी नहीं हो रहा है... अच्छा होगा कि हम सब क्लास से बाहर चले .....वैसे भी तू अच्छी तरह से जानता है कि कॉलेज में झगड़ा करने का रिजल्ट क्या होगा?? बात सीधा पेरेंट्स तक जाएगी..... इनके पेरेंट्स हमारे पेरेंट्स के बिजनेस राइवल हैं.... पिछली बार का झगड़ा इतना बढ़ गया था की उसकी तपिश..... आज भी हमारी पेरेंट्स के बिजनेस राइवल देखी जा सकती है.... रणविजय ने एक कहर भरी नजर अदम्य की तरफ डाली और कुछ बोलने को हुआ कि उससे पहले ही इधर इशानी अपनी जगह से उठी और सीधे उस लड़के के सामने खड़ी हो गई।
    " मेरी कॉपी वापस करो....." एक लाइन में ही कड़े शब्दों में इशानी ने उस लड़के से कहा।
    " अरे मेरी जान .....इतनी भी क्या जल्दी है??? पहले जरा उसको भी पढ़कर सुना दूं...... जो तुमने.... उस बूढ़े प्रोफेसर के लिए अपनी इस कॉपी में लव लेटर लिखा है..... हां तो मेहरबानो.... कादरदानों.... जरा गौर से सुनिए .....मोहतरमा ने आगे गौर फरमाया है...." लड़का बोलने लगा...... इशानी ने पूरी क्लास की तरफ देखा जो मुंह दबाए हुए इस सारे घटना का मजा ले रहे थे।
    इशानी ने गुस्से में उस लड़के के हाथ से अपनी कॉपी छीन ली और एक जोरदार चांटा..... उस लड़के के गाल में मारा। जोरदार चाटे की गूंज इतनी तेज थी कि पूरे क्लास में एक पल के लिए शांति पसर गई थी।
    ईशानी ने लड़के को वार्न करने के अंदाज में अपनी आग उगलती हुई आंखों से उसकी तरफ देखा और फिर अपनी कॉपी लेकर अपने बेंच की तरफ बढ़ने लगी।
    इधर वह लड़का जिसका नाम निशांत मलिक था .....एक पल के लिए ईशानी के इस एक्शन से शॉक्ड रह गया था। लेकिन दूसरे ही पल वो तेजी से इशानी के पीछे लपका और उसका दुपट्टा पकड़ लिया।
    दुपट्टा खींचे जाने पर इशानी ने पलट कर उसकी तरफ देखा।
    " तुमको क्या लगता है??? मुझे मार कर तुम आसानी से निकल जाओगी..... आज तक किसी की भी हिम्मत नहीं हुई कि वह निशांत मलिक की आंखों में आंखें डाल कर भी बात कर सके और तुम मुझे इस तरह से चांटा मार कर निकल जाओगी?? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई??" निशांत अपनी बाजू लपेटा हुआ बोला। उसके ग्रुप के लड़कों ने इशानी को क्लासरूम में ही चारों तरफ से घेर लिया था। एक्स्ट्रा जितने भी स्टूडेंट क्लास में थे..... वह सब निशांत के मार खाने के बाद ही धीरे से क्लास से बाहर निकलने लगे थे। उन सब को भी आने वाली इस सिचुएशन का कुछ कुछ अंदाजा हो गया था..... इशानी ने कसकर अपना दुपट्टा पकड़ा हुआ था..... उसे निशांत और उसके ग्रुप के तेवर अच्छे नहीं लग रहे थे..... इशानी खुद भी ऐसा कुछ करना नहीं चाहती थी.... लेकिन निशांत की हरकतों ने आज उसे बिल्कुल मजबूर कर दिया था..... निशांत ने इशानी के दुपट्टे को अपनी और खींचा।
    इशानी खींचती हुई उसके पास जाने ही लगी थी की तब तक......

  • 15. वफ़ा ना रास आई - Chapter 15

    Words: 1278

    Estimated Reading Time: 8 min

    इस तरह आशिकी का असर छोड़ जाऊंगा….


    " निशांत की हरकतों ने आज इशानी को बिल्कुल मजबूर कर दिया था..... निशांत ने इशानी के दुपट्टे को अपनी और खींचा।
    इशानी खींचती हुई उसके पास जाने ही लगी थी की तब तक..... रणविजय दुपट्टे को बीचो-बीच पकड़ कर उसे निशांत की ओर से झटका दिया। निशांत अचानक से मिले इस झटके के लिए तैयार नहीं था.... दुपट्टा उसके हाथ से छूट गया और वह क्लासरूम में दूर जाकर गिरा..... रणविजय ने इशानी को उसका दुपट्टा वापस करते हुए हाथ के इशारे से.... बिना पीछे मुड़कर इशानी की तरफ देखे हुए... हाथ के इशारे से इशानी को पीछे हटने के लिए कहा और खुद निशांत की तरफ बढ़ गया। निशांत जमीन पर गिरा हुआ ही पीछे की ओर खिसकने लगा... रणविजय बड़े ही खतरनाक तेवरों से निशांत को घूर रहा था.... रणविजय का गुस्सा इतना ज्यादा था कि निशांत ग्रुप के किसी भी लड़के की हिम्मत नहीं हो रही थी..... रणविजय के पास जाने की या फिर निशांत को उठाने की। इधर निशांत रणविजय के आंखों में उतरे हुए खून को देखकर अपने आप को बचाने के लिए जमीन पर पीछे की ओर खींचा जा रहा था और अपनी नजर इधर उधर दौड़ा रहा था कि कोई रणविजय को रोक ले या फिर कुछ ऐसा मौका मिले कि वह उठ कर भाग जाए.... लेकिन रणविजय ने किसी को बिना कोई मौका दिए हुए अपने दोनों हाथों से निशांत को पकड़कर उठाया और बिल्कुल हवा में उठाते हुए ले जाकर दीवार से चिपका दिया।
    " क्या समझता है अपने आपको.... कॉलेज क्या तेरे बाप का है?? जो जी चाहे करेगा??? तेरी हिम्मत कैसे हुई इशानी के दुपट्टे को पकड़ने की या फिर उसकी कॉपी उठाने की??" रणविजय ने गुस्से में कहा और बिना निशांत का जवाब सुने ही उस को पीटने लगा.. आज रणविजय का गुस्सा बहुत खतरनाक था .....ऐसा लग रहा था कि वह जैसा निशांत की जान ही ले लेगा। इधर निशांत अपने आपको रणविजय से बचाने के लिए और लड़कों की मदद मांगते हुए चिल्लाने लगा ......लेकिन किसी की भी हिम्मत रणविजय के पास जाने की नहीं हो रही थी।
    रणविजय ने सच में, बहुत ज्यादा निशांत को मार दिया था। किसी तरह से अभिनव, अदम्य और आदित्य ने मिलकर..... रणविजय की गिरफ्त से निशांत को छुड़ाया।
    " अरे यार.... बस कर.... अब क्या उसकी जान ले लेगा??" अभीनव ने निशांत की तरफ देखते हुए कहा। जिसके होठों के किनारे से खून निकल रहा था और अब वह बिल्कुल अपने पैरों पर खड़ा होने लायक भी नहीं बचा था।
    " बिल्कुल ले लूंगा....." रणविजय जोर से दहाड़ा। "अगर इस ने इशानी की तरफ.... नजर उठाकर भी देखने की कोशिश की तो मैं इसकी आंखें निकाल लूंगा.... याद रखना.... ईशानी सिर्फ मेरी है.... और अब की बार तुमने या इस कॉलेज के किसी भी लड़के ने..... इशानी की तरफ उंगली उठाने की भी कोशिश की.... तो उसका सामना सीधे मुझसे होगा।" कहकर रणविजय ने झटके से निशांत के हाथ को मरोड़ दिया.... हाथ तड़ की आवाज के साथ टूट गया.... और इसी के साथ निशांत की एक दर्द भरी चीख पूरे क्लासरूम में गूंज गई..... अधिकतर स्टूडेंट्स ने निशांत के दर्द को समझते हुए अपने आंख बंद कर लिए लेकिन रणविजय को तो जैसे इस चीज से.... या निशांत के दर्द से कोई मतलब नहीं था।
    "आज तेरे हाथ इशानी के दुपट्टे तक पहुंचे थे इसलिए आज तो बस हाथ तोड़ा है.... लेकिन याद रखना.... अगर अगली बार तूने इशानी के आसपास भटकने की भी कोशिश की.... तो तेरे पैर उखाड़ कर फेंक दूंगा.... पूरे शरीर के इतने टुकड़े करूंगा कि मां-बाप भी पहचानने से इंकार कर देंगे कि यह मेरे बेटे की शरीर के टुकड़े हैं।" रणविजय ने गुस्से में निशांत की तरफ देखते हुए कहा..... जो कि दर्द से बिलबिला रहा था ....इसके बाद रणविजय क्लास के बाहर निकल गया।
    रणविजय यह बात सुनकर ईशानी सिर्फ मेरी है..... पूरे क्लास के स्टूडेंट के मुंह हैरत से खुले रह गए थे .....वहीं इशानी कोने में सर झुकाए हुए इस झगड़े के परिणाम के बारे में सोच रही थी। चलते हुए अभिनव ने अपनी गर्लफ्रेंड नव्या को इशानी को संभालने का इशारा किया..... नव्या ने सर हिला दिया और वह तेजी से इशानी के पास जाकर उसे समझाने लगी। रणविजय के इस शब्द.... ईशानी सिर्फ मेरी है..... के कहने के बाद सबकी नजरों में इशानी के लिए मौजूद .....दृष्टिकोण में काफी कुछ बदल गया था.... कुछ के दिल में उसके लिए नफरत और जलन ज्यादा भर गई थी...... तो कुछ अब उससे दोस्ती करने के लिए भी बेकरार हो गई थी।
    रणविजय के वहां से हटते ही निशांत ग्रुप के लड़कों ने किसी तरह से सहारा देखकर निशांत को मेडिकल रूम में पहुंचाया और इस झगड़े की खबर डीन को दे दी गई थी।
    पिछली बार जैसा कोई हंगामा ना हो यह सोच कर.... College administration ने इस घटना पर तुरंत एक्शन लिया। सीधे इन दोनों ग्रुप के लड़कों के पैरंट्स को कॉलेज में बुलावा भेज दिया गया। इससे पहले भी फर्स्ट ईयर में यह लोग कैंटीन में आपस में भिड़े थे और उसका यह नतीजा हुआ था कि करीब तीन महीने तक कॉलेज केंपस उस आग में जल रहा था। अंत में कॉलेज प्रशासन और पेरेंट्स के हस्तक्षेप के बाद.... यह मामला दबा था.... और तब से यह दोनों ग्रुप.... एक दूसरे के मैटर में आने से परहेज कर रहे थे.... जिसके कारण कॉलेज में शांति थी.... लेकिन आज रणविजय ने फिर से वही झगड़ा शुरू कर दिया था.... जोकि दीनी के लिए काफी बड़ा सरदर्द थी। दोनों की फैमिली कॉलेज एडमिनिस्ट्रेशन में भी अच्छा खासा दबदबा रखती थी..... मिस्टर मलिक अपने बेटे की चोट देख कर गुस्सा गए थे और तुरंत ही कॉलेज में पहुंचे।
    क्लास रूम के बाहर..... अदम्य, अभिनय और आदित्य ने रणविजय को समझाया। जिसका गुस्सा कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था।
    " मानता हूं निशांत की गलती थी...... लेकिन तुझे याद है ना..... पिछली बार क्या हुआ था?? उस बार तो हम लोगों ने इतना मारा भी नहीं था... इस ग्रुप को... जितना की कोहराम मिस्टर मलिक ने मचाया था..... तेरी इस हरकत के बाद मलिक चुप नहीं बैठेगा.... वह फिर से हमें टारगेट करेगा...." अभिनव बोला। जिसको डर था कि मलिक, आहूजा का सबसे बड़ा बिजनेस राइवल हैं... और मलिक हमेशा ही आहूजा को नीचा दिखाने के लिए.... बिजनेस के दांव पेज के साथ-साथ... गलत रास्ते भी अपनाता था.।
    " तो करने दे ना टारगेट .....डरता कौन है उसके बाप से??" रणविजय ने लापरवाही से कहा ।"अगर इस बार उसने इशानी को कुछ भी ट्रोल करने की कोशिश की ना.... तो मां भवानी की सौगंध मैं सच में उसे वही चीर फाड़ के सुखा दूंगा।" रणविजय ने गुस्से में कहा।
    " वह सब तो ठीक है.... लेकिन यह बता ....तूने ऐसा क्यों कहा कि इशानी सिर्फ तेरी है??" आदित्य ने रणविजय के कंधे पर हाथ रखते हुए रणविजय से पूछा। उसके होठों पर एक मुस्कुराहट खेल रही थी। आदित्य की बात सुनकर बाकी दोनों भी मुस्कुराने लगे।
    " वही तो इस आग के धुआं की सुगंध तो पहले ही हमारे नाक तक आ पहुंच चुकी थी.... लेकिन हम बोलने से पहले डर रहे थे कि तू हमें छोड़ेगा नहीं....पर अब जब तूने अपने मुंह से एक्सेप्ट कर ही लिया है तो साफ-साफ बता दे..... कब से चल रहा है यह सब??" अभिनव ने अपनी भावे उठाते हुए पूछा।
    " मुझे नहीं पता....." रणविजय ने नजर चुराते हुए... इधर उधर देखते हुए कहा।
    " क्या नहीं पता??? यह कि तू उससे प्यार करता है या फिर यह की इशानी के कारण.... आज तूने मलिक के बेटे की सारी हड्डियां तोड़ डाली है.... बिना किसी के रिएक्शन की चिंता किए हुए...."आदित्य हंसते हुए बोला।
    " मुझे कुछ नहीं पता.. तुम सब मेरा दिमाग मत खाओ..."रणविजय अपनी जगह से उठता हुआ बोला।

  • 16. वफ़ा ना रास आई - Chapter 16

    Words: 1529

    Estimated Reading Time: 10 min

    आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे….

    " हां हम तुम्हारा दिमाग थोड़ी खा रहे हैं..... वैसे भी दिमाग कोई खाने की चीज थोड़ी है ??खाने को तो हमें अब तेरे शादी की रिसेप्शन पार्टी में मिलेगा......"अदम्य ने कहा।
    " वही तो.... अब तो हम तेरे शादी की पार्टी खाने वाले हैं। पेट में उसके लिए जगह बचा कर रखी है हमने। तू बस इतना बता दे.... इस प्यार के कीड़े ने तुझे कब काटा?? ताकि तेरी शादी में जी भर के नाच सकूं...."आदित्य खुश होते हुए बोला।
    " मैं भी यही सोच रहा हूं ....इतना कुछ हो गया और हमें खबर तक नहीं लगी....." अदम्य ने सोचते हुए कहा। तीनों दोस्त अपनी अपनी बातों से रणविजय की खिंचाई कर रहे थे और रणविजय उनकी यह हरकत बड़े अच्छे से समझ रहा था। उसने तीनों को झिड़कते हुए कहा।
    " अरे चुप हो जाओ कमीनो..... प्यार क्या कोई सर्दी बुखार है??? होगा तो पता चलेगा.... छींक आई तो पता चला कि सर्दी हुई और शरीर गर्म हुआ तो पता चला बुखार हुआ...... मुझे खुद नहीं पता इस बारे में कुछ ......मुझे पता रहता तो मैं पहले ही इस निशांत के बच्चे का कुछ ना कुछ उपाय कर चुका रहता। वैसे तू बता ना ....तुझे कब पता चला कि तुझे नव्या से प्यार है?" रणविजय ने अभिनव की तरफ देखते हुए पूछा। रणविजय की बात सुनकर अभिनव मुस्कुरा दिया।
    लेकिन रणविजय यही नहीं रुकने वाला था। उसने आदित्य से पूछा," तू बता ना जरा मुझे.... सब के मना करने के बावजूद भी तुझे अंजली से प्यार कैसे हो गया?? और कब हुआ ...और तू अदम्य ..... शालू के बारे में तेरा क्या ख्याल है ??तुम सबके कच्चे चिट्ठे.... मैं जानता हूं मेरा मुंह मत खुलवाओ......" रणविजय ने कहा। रणविजय की बात सुनकर तीनों मुस्कुरा दिए और चारों ने एक ग्रुप हग किया।
    "बात तो सही है तेरी.... अब जो होगा सो देखा जाएगा..." चारों मुस्कुराते हुए एक दूसरे से बोले। अभी इन दोस्तों की बातें चल ही रही थी। तभी एक स्टूडेंट ने इन लोगों को डीन का मैसेज दिया।
    " सर ने आप लोगों को अपने ऑफिस में बुलाया है..."
    खबर सुनकर जहां और लड़के परेशान हो गए थे.... वहां रणविजय के माथे पर एक भी शिकन नहीं थी।
    रणविजय के साथ-साथ उसके दोस्त भी डीन के ऑफिस में जाने के लिए उठ गए थे। लेकिन रणविजय उन लोगों को वही रोकते हुए कहा," तुम सब यहीं रुको झगड़ा सिर्फ मैंने किया है.... इसलिए सिर्फ मैं ही जाऊंगा.... मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण फिर से मालिक और आहूजा आपस में भिड़े.. और अंकल जी बेवजह तुम दोनों को टारगेट करें.. "
    " सॉरी सर, डीन सर ने आप चारों को बुलाया है । आप चारों के पेरेंट्स भी सर की ऑफिस में है।" इंफॉर्मेशन लाए हुए जूनियर ने कहा।
    मामला गंभीर था.... चारों लड़के डीन के ऑफिस की ओर चल पड़े। वहां डीन के केबिन में मिस्टर राणावत, मिस्टर राठौर, मिस्टर आहूजा, मिस्टर मलिक समेत कॉलेज के डीन और प्रोफेसर, प्रिंसिपल और साथ में निशांत मलिक भी एक चेयर पर बैठा था क्योंकि रणविजय ने उसे अपने पैरों पर खड़ा होने लायक भी नहीं छोड़ा था।रणविजय ने एक कहर भरी नजर निशांत पर डाली और चुपचाप जाकर डीन के चेयर के सामने खड़ा हो गया।
    निशांत मलिक के चेहरे का नक्शा बिगड़ चुका था.... पूरे चेहरे में जबरदस्त सूजन थी और नीले काले निशान से उसका पूरा शरीर भरा हुआ था। जगह-जगह पर बैंडेज लगी हुई थी और उसके हाथ में प्लास्टर चढ़ा हुआ था।
    "बोलिए मिस्टर आहूजा इस बारे में क्या कहेंगे ??"मिस्टर मलिक ने गुस्से में आहूजा की तरफ देखा और आहूजा ने अपने बेटों की तरफ.....
    "हम जितना पोलाइटली अपने बीच के मैटर को शॉट आउट करना चाहते हैं.... उतना ही आप की तरफ से हर बार कोई ना कोई ऐसी हरकत की जाती है कि हमें फिर से अपना पुराना रवैया अपनाना पड़ता है...." मलिक ने गुस्से में चबाते हुए एक-एक शब्द कहा ।
    "अच्छा!!" आहूजा को मलिक की बात का जवाब ना देता हुआ देखकर मिस्टर राठौर बीच में बोले।
    " मैं मानता हूं कि बच्चों ने आपस में मारपीट करके गलती की है..... लेकिन आप दावे के साथ कैसे कह सकते हैं कि इसमें मिस्टर आहूजा के ही बच्चों की गलती है और आपका बेटा इनोसेंट है??" मिस्टर राठौर ने मिस्टर मलिक से पूछा।
    " वह तो साफ दिख रहा है.... मिस्टर आहूजा के दोनों बेटों को एक चोट भी नहीं आई है ...इसका मतलब है कि मेरे बेटे ने डिफेंस में भी इन लोगों को नहीं मारा है..." मिस्टर मलिक बोले । मिस्टर राणावत सब की बात सुनकर की तीखी मुस्कुराहट छोड़ रहे थे..... उनकी मुस्कुराहट में छिपा हुआ उनका गुस्सा सिर्फ रणविजय समझ रहा था क्योंकि प्रिंसिपल ने फोन करके उन्हें पहले ही बता दिया था कि मार पीट रणविजय ने की है लेकिन फिर भी मलिक का सीधा टारगेट आहूजा थे..... क्योंकि वह राणावत को ट्रोल नहीं कर पाता था...... आहूजा, राणावत के पार्टनर थे... और मलिक रॉयल राजपूताना में आहूजा को हटाकर अपनी जगह बनाना चाहता था.... इसके लिए रॉयल राजपूताना में सबसे बड़े शेयर होल्डर राणावत का सपोर्ट चाहिए था उसे.. इसलिए उसने रणविजय की गलती का ठीकरा आहूजा ब्रदर्स पर छोड़ दिया था.... लेकिन रणविजय के लिए मलिक की बात सुनना बिल्कुल बर्दाश्त से बाहर था...... उसके लिए उसके दोस्त उसके दिल के पास रहते थे और उस के दिल में जगह किसी बिजनेस डील से नहीं बनती थी.... उसने अपने पापा की तरफ देखा .....जो कि आंखों ही आंखों में उसे चुप रहने का इशारा कर रहे थे.... लेकिन रणविजय ने उन्हें सीरियस से इग्नोर करते हुए कहा,
    " मिस्टर मलिक, जस्ट ए मिनिट कुछ भी बोलने से पहले एक बार सही बात जान लीजिए.... आपके बेटे की यह हालत नाही आहूजा ब्रदर्स ने की है और ना ही राठौर ने...... इसको सिर्फ और सिर्फ मैंने मारा है ...."
    "तुम दूसरों की गलती अपने ऊपर क्यों ले रहे हो बेटा??" मिस्टर मलिक ने जितना मीठा बोला जा सकता था..... उतने मीठे शब्दों में रणविजय से कहा।
    " यह तो मैं आपको तुरंत ही क्लियर कर देता हूं....... कि गलती किसकी है और आई होप कि.... उसको देखने के बाद आप भी सही डिसीजन लेंगे....." और उसने सीधे के केबिन में लगे हुए स्क्रीन पर अपने क्लास रूम की सीसीटीवी फुटेज दिखानी शुरू कर दी। सीसीटीवी फुटेज में आवाज तो आ नहीं रही थी.... लेकिन निशांत की हरकत साफ दिखाई पड़ रही थी कि उसने पहले इशानी की कॉपी के साथ खिलवाड़ किया.... फिर उसके दुपट्टे को पकड़कर खींचा.... जिसको देखते ही मिस्टर राणावत की नसें गुस्से में तन गई थी ।मिस्टर राठौर के भी तेवर कम खतरनाक नहीं थे। उन लोगों ने गुस्से में निशांत मलिक की तरफ देखा जैसे कि आंखों से ही कह रहे हो कि ,"रणविजय ने तो कम किया है ....हम तो इससे भी ज्यादा पटक कर मारते.... शुक्र मनाओ कि तुम हमारे बेटे नहीं हो.... वरना इलाज करवाने की बजाय हम तुम्हें नदी में ही फेंक देते ।"
    " यह वह कारण है जिसके कारण मैंने रणविजय सिंह राणावत ने आपके बेटे की यह दुर्दशा की है और इस चीज के लिए मुझे बिल्कुल अफसोस .......नहीं है...."रणविजय ने बिल्कुल खतरनाक तेवर में नहीं शब्द पर जोर देकर कहा।
    " तुमने मेरे बेटे को एक दो कौड़ी की लड़की के कारण मारा?? देख रहे हैं मिस्टर राणावत....."मलिक ने आशा भरी नजरों के साथ राणावत की तरफ देखा ।उसे लगा था कि उसके बिजनेस की दुनिया में बढ़ते हुए कद के कारण .....राणावत उसका साथ देंगे ....लेकिन ऐसा नहीं था..... मिस्टर राणावत के कुछ बोलने से पहले ही रणविजय बोल उठा," राणावत अपनी या दूसरों की बहू बेटियों की इज्जत करना अच्छे से जानते हैं..... ठाकुरों के लिए महिलाओं का सम्मान सबसे ऊपर रहता है और इसके लिए वह अपनी जान देने से भी नहीं चूकते...... और ना ही उनकी इज्जत की तरफ बढ़े हुए हाथ को उखाड़ कर फेंकने से पीछे हटते हैं.. यह चीज मुझे मेरे पापा और दादाजी ने बचपन से सिखाई है... जिसे आप दो कौड़ी की बोल रहे हैं उसकी कीमत आपके बेटे या हम सबसे ज्यादा है क्योंकि वह कॉलेज में सिर्फ और सिर्फ अपने टैलेंट के बल पर पढ़ती है .....ना कि हमारी तरह और आपके बेटे की तरह अपने बाप के पैसों के दम पर..... प्रतिभा से पैसे कमाए जा सकते हैं लेकिन पैसों से प्रतिभा नहीं खरीदा जा सकता और ऐसा मुझे इसी कॉलेज में सिखाया गया है....." रणविजय ने डीन पर अपनी नजर डालते हुए कहा। जोकि रणविजय के इतने खतरनाक तेवर देखकर मुंह बाए.... आंखें फाड़े.... उसकी तरफ देख रहा था कि आगे कौन सा अभी तूफान आने वाला है? वही रणविजय की बात सुनकर रणधीर राठौर मुस्कुरा दिए।
    "आपका जवाब मिल गया होगा मिस्टर मलिक.... मुझे अपने बेटे के काम पर कोई भी अफसोस नहीं है आगे जो भी फैसला कॉलेज प्रशासन लेगा... उसे हम एक्सेप्ट करेंगे।"रणधीर राणावत ने बिल्कुल शांत और गंभीर शब्दों में मिस्टर मलिक से कहा। राणावत की बात सुनकर मलिक का चेहरा झुक गया था...... वही डीन ने पूरे मामले में निशांत को ही दोषी मानकर उसे बीस दिन के लिए कॉलेज से सस्पेंड कर दिया था।
    " तुम चारों घर चलो .....हम तुम लोगों से घर पर बात करेंगे।" मिस्टर राणावत ने चारों लड़कों की तरफ देखते हुए कहा।
    चारों चुपचाप जाकर गाड़ी में बैठ गए।

  • 17. वफ़ा ना रास आई - Chapter 17

    Words: 1398

    Estimated Reading Time: 9 min

    यह कहां फंस गए हम.....

    "एक बात बता..... क्या तुझे भी ऐसा लग रहा है कि हम जितने आसानी से बच गए हैं..... इतनी आसानी से हम बच जाएंगे....या बच चुके हैं...." अभिनव, आदित्य के कान में कुछ घुस आया था।
    " पता नहीं......मुझे तो इतना तो जरूर लग रहा है कि हम बचे ,नहीं बल्कि फंसे हैं.... अब तो यह हमारे पिताश्री ही जानेंगे..... उन्होंने हमारे लिए कौन सी सजा सोच रखी है ....तुझे कुछ अंदाजा है...." अभिनव ने अपने आगे बैठे हुए रणविजय को केहुनी से हिलाते हुए पूछा।
    "चुपचाप शांति से दो मिनट नहीं बैठ सकते ...अगर इन लोगों ने हमारे लिए कोई सजा नहीं सोच कर ही रखी होगी तो तुम्हारी हरकतों से यह हमें सजा देने के लिए मजबूर हो जाएंगे....." रणविजय में थोड़े गुस्से वाले स्वर में आदित्य और अभिनव से कहा । रणविजय की बात सुनकर दोनों चुपचाप मुंह पर उंगली रखकर अच्छे बच्चों की तरह बैठ गए। उधर अदम्य पहले ही गौर से.. दरवाजे की तरफ देख रहा था। यह चारों राणावत हाउस में बैठे हुए...... अपने अपने पिताश्री के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे..... इंतजार की घड़ियां लंबी हो रही थी क्योंकि इन चारों को पूरा भरोसा था कि वहां पर तो इन लोगों ने हमें बचाकर निकाल लिया है.... लेकिन अब घर पर इन तीनों से हमें कौन बचाएगा?? लेकिन इन सबके बीच में रणविजय बिल्कुल शांत था जैसे कि उसे अंजाम की कोई परवाह ही नहीं थी। जो होगा सो देखा जाएगा..... तभी मिस्टर राणावत, मिस्टर राठौर और मिस्टर आहूजा एक साथ दरवाजे से अंदर आए।
    इन तीनों को देखते ही चारों लड़के अपनी जगह से उठकर खड़े हो गए..... जैसे कि क्लास रूम में टीचर के इंटर करने पर स्टूडेंट रिस्पेक्ट में खड़े हो जाते हैं। इन चारों की हरकत देखकर मिस्टर राणावत ने मिस्टर राठौर और मिस्टर आहूजा की तरफ देख कर मुस्कुरा दिया। जवाब में वह दोनों भी मुस्कुरा दिए।
    " बैठ जाओ बच्चो... तुम्हारा ही घर है..... कॉलेज का क्लासरूम नहीं......" मिस्टर राठौर मुस्कुराते हुए बोले।
    " कॉलेज के क्लास रूम को तो तुम लोगों ने जंग का मैदान बना दिया है.... अभी यहां घर पर अच्छे बच्चे बनकर क्या प्रूफ करना चाहते हो??" मिस्टर आहूजा ने गुस्से में अपने दोनों बेटों की तरफ देखते हुए कहा।
    " कूल डाउन आहूजा.... बच्चे हैं...." मिस्टर रणधीर राणावत धीर गंभीर शब्दों में बोले ।
    यह चारों तब तक चुपचाप खड़े थे.... जब तक कि ये तीनों अपनी अपनी जगह पर बैठ नहीं गए। इन तीनों के बैठने के बाद ही यह चारों अपने सोफे पर बैठ गए।
    कुछ देर तक बिल्कुल पेन ड्रॉप साइलेंट पसरा रहा ..... और मिस्टर राणावत गौर से इन चारो के चेहरे को देख रहे थे.... जैसे कि पूरी तरह से इन चारों के मन में चल रही उथल-पुथल को पढ़ना चाह रहे हो ।
    "आज सुबह जो कुछ भी कॉलेज में हुआ... उसके लिए सॉरी ....पर हम सच कहते हैं... इसमें हमारी कोई गलती नहीं थी.... वह लोग इसी तरह से क्लास में लड़कियों को छेड़ा करते हैं... जानता हूं कि आप लोगों ने हमें वार्निंग दी थी....मालिक के कामों से दूर रहने की..... रणविजय को उन्हें पीटना नहीं चाहिए था... लेकिन क्या हम भी क्या करें??? बात हमेशा ही बर्दाश्त से बाहर निकल जाती है......" अदम्य से जब चुप्पी बर्दाश्त नहीं हुई तो उसने अपनी बात जल्दी से कह दी। उसकी बात सुनकर मिस्टर राणावत हल्के से मुस्कुरा दिए।
    " जो बीत गई सो बात गई...... रणविजय की भी बात सही है ....मैं समझता हूं हम जिस समाज में रहते हैं... वहां हम गूंगे और बहरे बन के तो रह नहीं सकते... गूंगे और बहरे बन भी जाए तो.... आंखों से तो सब कुछ दिखता ही है ना.... लेकिन अब जो प्रॉब्लम सामने आई है.... अब आगे क्या करना है यह बताओ ??" मिस्टर राणावत एक गहरी सांस छोड़ते हुए इन चारों से पूछा। मिस्टर राणावत की बात किसी को समझ नहीं आई थी। यह चारों एक दूसरे का मुंह देखने लगे..... अब कौन सी प्रॉब्लम है?? जो भी प्रॉब्लम थी.... कॉलेज में थी... जो कि इन लोगों ने सॉल्व कर दी.... तो अब किस मुसीबत की बातें कर रहे हैं??
    "मतलब?? आप कहना क्या चाहते हैं??" आदित्य सोचते हुए बोला।
    " मेरी बात बिल्कुल क्लियर है..…हमने तुम्हें उन लोगों से उलझने से मना किया था.... क्योंकि वह गिरे पड़े लोग हैं .....अपने इंतकाम की आग में ये मालिक ग्रुप वाले इतने अंधे हो जाते हैं कि किसी की जान लेने से भी परहेज नहीं करते और तुम चारों..... हमारे लिए हमारे जान से भी ज्यादा कीमती हो..... तो यह कारण था कि हमने तुम लोगों को चुप रहने के लिए कहा था.... लेकिन यह नहीं कहा था कि तुम हमारे दिए हुए संस्कार भूल जाओ। अगर कोई सामने से तुम्हें या तुम्हारे संस्कारों को चुनौती दे...... तो उसको चुप कराना..... तुम्हारी सबसे पहले जिम्मेवारी है.... पर बात यहां यह है कि इस घटना के बाद..... मलिक भी चुप बैठेगा नहीं और तुम अच्छे से जानते हो वह हमारा बिज़नेस राइवल हैं.... वह पहले ही रॉयल्स राजपूताना को बर्बाद करने की सारे दांव पेज खेल चुका है ..…. कई बार हम लोगों पर जानलेवा हमला भी करवाया.....पर अब जब तुमने.... उसके बेटे को ही बेड पर पहुंचा दिया है तो जाहिर सी बात है कि वह अपना गुस्सा हमारी कंपनी को घाटे में पहुंचा कर ही निकालेगा..... या फिर......" रणधीर राणावत ने गौर से रणविजय के चेहरे को देखते हुए कहा ।"या फिर उसका अगला कदम.... हम में से किसी एक को अपने टारगेट पर लेना होगा । हम लोगों से सीधे तौर पर उलझने की वह हिम्मत नहीं करेगा। क्योंकि जनरली हमारे साथ हमारे बॉडीगार्ड होते हैं.... जो कि अलर्ट मोड पर चले आएंगे। पर तुम चारों ...उसके सॉफ्ट टारगेट हो सकते हो.... और उसमें भी हमारी एक बेटी भी है...."
    "आंखें निकालकर हाथ में रख दूंगा .....अगर उसने मेरी नव्या की तरफ देखने की हिम्मत भी की तो.... उसी कॉलेज में पढ़ते हुए .....आज तक उसकी हिम्मत नहीं हुई ....तो अब भी नहीं होगी... और रही बात हम सब की उसके यह हवाई इरादे कभी भी धरातल पर नहीं आएंगे..... अगर वह हमारे रास्ते में आए या हमारे रास्ते को रोकने की उन्होंने कोशिश भी की तो फिर..... इस बार तो सिर्फ हाथ पैर तोड़ कर बिस्तर पर पहुंचाया है ....अगली बार सीधा ऊपर पहुंचा दूंगा.... "रणविजय ने दृढ़ता से कहा.... वह मिस्टर राणावत की छोड़ी हुई आधी बात का अर्थ समझ चुका था।
    " ऐसा हम भी चाहते हैं....." मिस्टर राठौर ने कहा।
    " लेकिन इस तरह के काम को करने के लिए कोई आईडिया है तुम लोगो के पास??" मिस्टर आहूजा ने चारों से पूछा।"या फिर तुम लोग भी हवा में ही किले बना रहे हैं??"मिस्टर आहूजा ने एक मजाक उड़ाती हुई नजर अपने बेटों पर डाली।
    " हम हवा में किले नहीं बनाते..... बल्कि हम पहाड़ों को काटकर भी अपना रास्ता बनाने वालों में से हैं... आप बस हमें ये बताइए कि हमें क्या करना है? जो कुछ भी करना होगा.... आप लोगों ने तो पहले ही सोच रखा ही होगा......" रणविजय ने दो टूक शब्दों में कहा।
    मिस्टर राणावत ने एक फाइल रणविजय के आगे कर दी।
    " तुम लोगों की पढ़ाई लगभग पूरी हो गई है.... तीन महीने बाद तुम्हारे फाइनल एग्जाम हो जाएंगे..... वैसे तो हम लोगों ने सोचा था की पढ़ाई पूरी करने के बाद ही तुम चारों को इस प्रोजेक्ट कंपनी के काम में लगाएंगे.... और उसमें भी यह प्रोजेक्ट कंप्लीट करके तुम लोगों को एक प्लेटफार्म देंगे..... ताकि आगे की तुम्हारी लाइफ से सुरक्षित रहे..... लेकिन मालिक के साथ हुए झगड़े के बाद..... हमारा कुछ डिसीजन बदल गया है। जब तुम लोग मलिक के बेटे से सीधे इस तरह से उलझ सकते हो.... तो हमें लगता है कि इस प्रोजेक्ट के लिए भी तुम लोग कुछ ना कुछ अपना दम दिखा ही सकते हो..... ऐसा समझ लो कि एक टास्क है.... इस प्रोजेक्ट के लिए मलिक भी लगा हुआ है और हम भी ........तुम चारों को यह प्रोजेक्ट अपने दम पर पाना है और अपने ही दम पर पूरा करना होगा। बाकी तुम्हारे सारे काम के लिए ...मैन पावर से लेकर इकोनॉमिक सपोर्ट के लिए रॉयल राजपूताना का सपोर्ट होगा। लेकिन मेहनत तुम लोगों को करनी होगी।"मिस्टर रणधीर रानावत ने अपनी बात कही।
    " हमें मंजूर है ....."कह कर रणविजय ने मिस्टर राणावत के हाथ से वह फाइल ले ली।
    "खुद तो डूबेंगे ही.... तुम्हें भी ले डूबेंगे सनम..... चलो कोई बात नहीं.... साथ जिएंगे.... साथ मरेंगे... यही है फसाना..... "आदित्य सर पकड़ते हुए धीरे से बोला।

  • 18. वफ़ा ना रास आई - Chapter 18

    Words: 1198

    Estimated Reading Time: 8 min

    बुरे फंसे हम..



    "हमें मंजूर है .... हम इस डील को अपने दम पर ही हासिल करेंगे और अपने दम पर ही पूरा करना चाहेंगे."कह कर रणविजय ने मिस्टर राणावत के हाथ से वह फाइल ले ली।
    "मुझे तुमसे यही उम्मीद थी ....."मिस्टर राणावत बिल्कुल पुर सकून थे.... लेकिन उनकी यही सुकूनता मिस्टर आहूजा और मिस्टर राठौर को परेशानी में डाल रही थी।
    " एक बार जान भी तो लो कि इस प्रोजेक्ट में क्या है?? और मलिक क्यों इस प्रोजेक्ट के पीछे सिर्फ हाथ धोकर नहीं नहा धोकर पड़ा हुआ है....."मिस्टर राठौर ने कहा।
    " वह हम इस फाइल की स्टडी करके भी समझ जाएंगे... और बाकी कुछ ब्रीफिंग जो है सो ...आप बता दीजिए...." रणविजय ने मिस्टर राठौर की तरफ देखते हुए कहा।
    मिस्टर राठौर ने बिजनेस लाइन की कॉम्प्लिकेशन रणविजय से बताइ.. साथ में मिस्टर आहूजा भी थे जो पहले ही मिस्टर मलिक के इन उल्टे सीधे दांव पेचों का कई बार शिकार बन चुके थे.. जो भी बात थी.... वह इन चारों को परेशान करने के लिए काफी थी.... उनकी बात सुनकर पहले ही अभिनव बोल उठा," तो आप हमें बलि का बकरा बनाना चाहते हैं.... बाप है या कसाई.... जो सीधे-सीधे अपने बेटे को अपने ही हाथों जल्लाद के आगे कर रहे हैं।"
    अभिनव की बात सुनकर रणविजय ने घूर कर उस की तरफ देखा।
    " तो तू क्या चाहता है कि तेरी जगह... वह अपने को बलि चढ़ा दें?? मुझे तो हैरानी इस बात की है कि आज से पहले आप लोगों के बिजनेस लाइन में इतने कॉम्प्लिकेशन थे तो..... आप लोगों ने कभी इस चीज का जिक्र भी हम लोगों से क्यों नहीं किया?" रणविजय ने उन तीनों से पूछा।
    " हम तुम लोगों को एक सुरक्षित भविष्य देना चाहते थे.... हम नहीं चाहते थे कि जो चीज हम झेल रहे हैं.... वह चीज तुम लोग भी झेलो।" मिस्टर राठौर ने अपनी मजबूरी बताई।
    " आप निश्चिंत रहें...... हम टेंशन देने वालों में से हैं लेने वालों में से नहीं.... हम इस पूरे मामले को ऐसा शॉट आउट करेंगे की इसके बाद मलिक हमारी तरफ देखने की भी हिम्मत नहीं करेगा।" रणविजय ने साफ-साफ कहा।" पर पापा.... इस प्रोजेक्ट में हम अपने दो तीन दोस्तों को और रखना चाहते हैं... हमें उनकी मदद की जरूरत पड़ सकती है.... दर असल हम लोगों की टीम कुछ अलग है....." रणविजय ने अपने पिता मिस्टर राणावत से कहा।
    "एस यू विश.... तुम इस प्रोजेक्ट के हेड हो.... जैसे चाहो... जो चाहो... डिसीजन ले सकते हो ...यह सब कुछ तुम पर निर्भर करता है... और जब हमारी सपोर्ट की जरूरत होगी तो बेहिचक कहना।" मिस्टर राणावत ने कहा। उसके बाद यह तीनों उठ गए और जाते-जाते रणविजय बोले.... जो फाइल को लेकर आगे की रणनीति में कि सोच में डूबा हुआ था ""तुम चारों आज रात का खाना यहीं खाना.... हम लोगों के साथ.... क्योंकि कल सुबह ही तुम चारों ....हैदराबाद के लिए निकल जाओगे ....इस प्रोजेक्ट की मीटिंग के सिलसिले में।"
    "ओके... डैड।" आदित्य मुंह बिसोरते हुए बोला।
    उसकी यह हरकत देखकर तीनों मुस्कुरा दिए ।
    "तेरा दिमाग खराब हो गया है क्या?? कोई जानबूझकर इस तरह से शेर के मुंह में हाथ डालता है क्या??" इन तीनों के जाते ही आदित्य रणविजय पर लगभग टूट पड़ा। रणविजय हैरानी में उसकी तरफ देखा।
    " उसकी तरफ क्यों देख रहा है?? हम दोनों का भी यही विचार है.... अरे जो इंसान डेड और चाचू पर इस तरह के हमले करवाने से पीछे नहीं हटता.... जबकि वो भी जानता है कि कितनी हाई सिक्योरिटी लेकर चलते हैं ये लोग.. पर फिर भी उसकी हिम्मत देख सारी सिक्योरिटी को धता बताते हुए उसने कई बार डेड और चाचू पर जानलेवा हमला करवाएं... तो हम लोगों को छोड़ेगा.??.. हम लोगों को तो वैसे भी लेट नाइट पार्टी करने की आदत है। "
    "कहीं ना कहीं तो हम उनके सामने आ ही जाएंगे.... फिर सोचा भी है कि वह हम लोगों के साथ क्या करेगा?? सीधे हमारी हड्डियों का चूरमा बनाकर अपने पालतू कुत्तों के आगे डाल देगा...." अभिनव और अदम्य ने भी अपनी राय रखी।
    " अरे चुप करो..... हो गया तुम तीनों का.... हड्डियों का चूरमा बनाकर कुत्तों के आगे डाल देगा..... मैं उसकी लाश ही नहीं गायब करवा दूंगा..... मेरी बात ध्यान से सुनो.... मैं उन लोगों को बिना ऐसा कुछ मौका दिए ही यह सारा काम कर लूंगा.... जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी नहीं टूटेगी..... डरपोक कहीं के.... ठीक ही कहती है इशानी.... जब देखो तब बाप के पैसों और उनके दम पर ही उड़ना पसंद करते हैं.... अरे! कभी अपने पैरों पर भी खड़ा होने की सोच लिया करो....." रणविजय के चेहरे पर मुस्कुराहट थी। वही रणविजय की बात सुनकर तीनों मुंह खोले। उसकी तरफ देखने लगे।
    "हां... अब तो तुझे केवल इशानी की बात है अच्छी लगेगी.... बाकी हम सबकी जान की तो कोई कीमत नहीं.... उसके लिए तुम मलिक से बैर ले कर बैठ गया और अब चारा बनाकर हमें परोसना चाहता है।"अदम्य ने मुंह बनाते हुए कहा।
    " दोस्त कमीने होते हैं सुना था.... लेकिन तू तो सच का निकला...." अभिनव ने कहा।
    " गर्लफ्रेंड मिलते ही ....भाई जैसे दोस्तों को भूल गया.. अब अपनी तो कोई वैल्यू ही नहीं रही तेरी जिंदगी में..." आदित्य ने टुकड़ा जोड़ा।
    " अरे चुप करो ....साले इधर आओ...". रणविजय ने तीनों को अपने नजदीक आने का इशारा किया और उसके बाद अपना प्लान समझाया।
    " देख भाई.... तेरा प्लान तो बड़ा सॉलिड है... पर फिर भी मुझे डर लग रहा है.... लेकिन अब हम कर भी क्या सकते हैं? यहां से भागने का कोई रास्ता भी तो नहीं है.. हमारे पास..." अभिनव ने कहा। जो कि रणविजय की बात सुनकर पूरी तरह से तो नहीं .....लेकिन काफी हद तक निश्चिंत हो गया था।
    "खुद तो डूबेंगे ही.... तुम्हें भी ले डूबेंगे सनम..... चलो कोई बात नहीं.... साथ जिएंगे.... साथ मरेंगे... यही है फसाना..... अब जब ओखली में सर डाल ही दिया है... तो दो-चार चोट अधिक लगे या कम.... क्या फर्क पड़ता है??"आदित्य सर पकड़ते हुए बोला।
    "तो बस समझ जा.... जब कोई रास्ता ना हो तो मुसीबत के सामने डट कर खड़े हो जाना ही अंतिम ऑप्शन होता है..... या तो खुद टूट कर बिखर जा या फिर प्रॉब्लम की जड़ को ही तोड़ दे.... क्योंकि दूसरा मौका जिंदगी हर किसी को नहीं देती।" रणविजय ने गहरे शब्दों में अपने दोस्तों से कहा।
    "अभी खाना खाते हैं ... उसके बाद निकलने की भी तैयारी करनी होगी...."आदित्य ने कहा।
    "हां हां... ठूंस ले भुख्खड.... तू तो बस खाने के लिए ही पैदा हुआ है.... यहां अपनी जान के लाले पड़े हुए हैं... और तुझे खाने की सूझ रही है।" अदम्य ने कहा।
    "और उन दोनों को भी तू बता देना.... कल साथ में चलना होगा...." अभिनव ने कहा। उसकी बात सुनकर रणविजय ने मुस्कुराते हुए हां में सिर हिला दिया।
    उसने इस काम के लिए इशानी और नीतीश सक्सेना को भी अपने साथ लेने का डिसीजन लिया था..... यह दोनों इन लोगों के क्लास में ही पढ़ते थे और दोनों ही स्कॉलर थे।
    अब इंतजार थी कल के ट्रिप की.... जो कि इनकी जिंदगी को ही बदल कर रखने वाला था। किसी की जिंदगी फूलों से सजने वाली थी तो.... किसी के हिस्से में कांटों का ताज आने वाला था।
    और सब कुछ वक्त के हाथों में ही छुपा हुआ था......

  • 19. वफ़ा ना रास आई - Chapter 19

    Words: 1351

    Estimated Reading Time: 9 min

    आ गए पास हम....

    "अरे वाह मिसेज राणावत..... आपने तो कमाल कर दिया..... लोग कहते हैं कि खूबसूरत लड़कियां अब्बल दर्जे की बेवकूफ होते हैं लेकिन आप तो खूबसूरत होने के साथ-साथ जहीन भी हैं.... Beauty with brain... पहले तो आप के इस छोटे से दिमाग के आशिक केवल हम ही थे.... पर अब तो आपके ससुर जी भी आपकी तारीफ करते हुए नहीं अघाते...." इशानी की गोद में सर रख कर लेटे हुए रणविजय ने इशानी की आंखों में गौर से देखते हुए कहा। जवाब में इशानी ने हल्के से उसके सर पर अपने हाथों से मारते हुए कहा," होश में आ जाइए मिस्टर राणावत... मैं मिसेज राणावत नहीं हूं..... मेरा नाम इशानी भारद्वाज है।"
    " अरे नहीं हो... तो क्या हुआ?? अब जल्दी तुम मिस इशानी भारद्वाज से मिसेज इशानी रणविजय सिंह राणावत बन जाओगी..."रणविजय अपनी बांहों को इशानी के कमर के अगल-बगल लपेटा हुआ बोला।
    " तुम्हारे सपनों में....." इशानी की आवाज उदासी से भरी थी.... जिसको रणवीर ने तुरंत महसूस किया... वह तुरंत ही उठ कर बैठ गया और उसे अपने गले से लगाते हुए बोला," तुम भी ना .....कभी-कभी तुम्हारी यह उल्टी उल्टी बातें मेरी बिल्कुल समझ में नहीं आती...... कितना कॉम्प्लिकेटेड यह प्रोजेक्ट था.... जिसको करने के लिए सीनियर रॉयल्स राजपूताना ने हाथ खड़े कर दिए थे ....लेकिन तुमने इसे चूटकी में सॉल्व कर दिया। इस काम के लिए तुम एक जगह भी निराश नहीं हुई... बल्कि जब हम चारों प्रोजेक्ट छोड़कर भाग रहे थे ....तब भी तुम मजबूती से न केवल खुद खड़ी रही..... बल्कि हमें भी खड़ा रखा और अब जबकि सब कुछ सही हो गया है तो.... तुम खुद निराशा वाली बात कर रही हो....."
    " मैं इस प्रोजेक्ट को लेकर या फिर कोई रॉयल्स राजपूताना के बिजनेस को लेकर कोई निराशा वाली बात नहीं कर रही...... मैंने हमेशा वही कहा है जो कि सच है..... तुम एक दिन इस रॉयल्स राजपूताना को वर्ल्ड की टॉप कंपनीज में लेकर जाओगे ....तुम देख लेना... यह सच्चाई है... ऐसा एक ना एक दिन जरूर होगा और सबसे बड़ा सच यह भी है कि मिस्टर रणविजय सिंह राणावत .....तुम वह आकाश हो और मैं यह धरती..... दूर उस क्षितिज पर यह दोनों मिलते हुए दिखते जरूर है..... लेकिन सच्चाई यह है कि यह कभी नहीं मिल सकते.... और इसी तरह से तुम्हारा और मेरा मिलन कभी नहीं हो सकता.... "ईशानी ने कहा। दोनों इस वक्त नर्म मुलायम घास पर एक ऊंची पहाड़ी पर बैठे हुए थे.... जहां से डूबते हुए सूरज का बड़ा खूबसूरत नजारा दिख रहा था.... दूर सूरज डूब रहा था और उसकी सिंदूरी आभा.... पूरे शाम को खुशगवार बना रही थी.... रणविजय प्रकृति के इस नजारे में डूब रहा था लेकिन इशानी अभी भी सच्चाई के धरातल पर खड़ी थी।
    इशानी की बातें रणविजय को दिल पर चोट जैसी लगी... उसने पूरी दृढ़ता से हटाने के हाथों को थामते हुए कहा," मैं इतना कुछ नहीं जानता.... यह धरती क्या है और यह आकाश क्या है मैं बस इतना जानता हूं कि मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं और तुम्हारे बिना एक पल नहीं रह सकता और हमारे प्यार के रास्ते में जो कोई भी आएगा उसका वही हश्र होगा जो मलिक एंड संस का हुआ है।"
    रणविजय की बात सुनकर ईशानी हल्के से मुस्कुरा दी। जैसे इशानी को उसकी बात पर भरोसा नहीं था.... या फिर अपनी किस्मत पर भरोसा नहीं था..... अब इशानी के दिल में क्या था ??वह तो इशानी ही जाने... लेकिन रणविजय अपना दिल और दिमाग बिल्कुल मजबूत कर चुका था और इतनी मजबूती से उसने मन ही मन एक फैसला भी ले लिया था....ईशानी को किसी भी हाल में अपनी जिंदगी में शामिल करने का।
    वह गौर से इशानी के चेहरे को देख रहा था.... लेकिन अपने आपको इन सब चीजों से बचाने के लिए इशानी रणविजय पर से अपनी नजर हटा.... डूबते हुए सूरज का खूबसूरत नजारा देखने लगी थी.... लेकिन रणविजय का मूड उखड़ चुका था .....उसने हाथ पकड़कर इशानी को उठाते हुए कहा," चलो... काफी देर हो गई है... कल सुबह हमें यहां से वापस दिल्ली के लिए भी निकलना है।"
    " रहने दो ना रणविजय.... थोड़ी देर के लिए देख लेने दो... पता नहीं फिर इतना सुकून भरा खूबसूरत नजारा फिर देखने को मिले या ना मिले... मैं इस नजारे और तुमको.... दोनों को ही अंदर तक महसूस करना चाहती हूं...." ईशानी ने रिक्वेस्ट भरे लहजे में कहा।
    "मैं सर से पांव तक सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा हूं ....इसमें तुम्हें कुछ भी महसूस करने वाली चीज नहीं है क्योंकि यह एक सच्चाई है.... और रही बात इस खूबसूरत नजारे की ....तो अब मैं तुम्हारी जिंदगी की हर सुबह और हर शाम.... इस से भी ज्यादा खूबसूरत नजारों से भर दूंगा.... इस चीज को भी तुम मान लो क्योंकि यह भी कल से तुम्हारी जिंदगी की ही सच्चाई होगी।" रणविजय ने थोड़े गुस्से में कहा ।
    "अकडू कहीं का....." मुंह बनाती हुई इशानी चुपचाप रणविजय के पीछे उठ कर चल दी।
    "जो भी हूं... जैसा भी हूं..... मुझे झेलने की आदत डाल लो क्योंकि मैं तो बदलने वाला नहीं.... पर इतना जान लो कि यह सारी कायनात भी अगर मेरी दुश्मन हो जाए.... तब भी मैं तुम्हारा हाथ कभी नहीं छोडूंगा.... तुम सिर्फ और सिर्फ मिसेज इशानी रणविजय सिंह राणावत ही बनोगी और मेरी आखरी सांस तक तुम यही रहोगी... यही तुम्हारी पहचान होगी..... चाहे इसके लिए मुझे कुछ भी करना क्यों ना पड़े?? मैं अपना घर परिवार यहां तक कि यह दुनिया भी छोड़ दूंगा.... लेकिन तुम्हें नहीं छोड़ सकता.... हो सकता है कि कभी जिंदगी में ऐसा दिन आए कि मैं अपना नाम भूल जाऊं.... पर मैं तुम्हें नहीं भूल सकता.... मरते दम तक नहीं..... आई लव यू.... इशानी." रणविजय ने पीछे मुड़कर इशानी की उंगलियों में अपनी उंगलियां फंसा कर उसके हाथ को मजबूती से पकड़ते हुए कहा। इशानी रणविजय के सीने से लग गई।
    रणविजय कि इस इकरार और इजहार से....भले ही इन दोनों के दिल का बिगड़ा हुआ मौसम बन गया था... पर अचानक से मौसम का मिजाज बिगड़ गया था। अभी तक जो पहाड़ के ऊपर लटके हुए काले बादल खूबसूरत लग रहे थे.... अचानक से उन्होंने अपना रंग बदल लिया था.... रणविजय के मुंह से इकरार और इजहार के इन शब्दों को सुनकर जिस तरह से इशानी का मन मयूर नाच उठा था। उसकी की खुशी संभाले ना संभली जा रही थी। उसी तरह से शायद इन बादलों को भी इन दो प्रेमियों को देखकर.... अब अपने अंदर समेटे हुए पानी का बोझ संभाले नहीं संभल रहा था। इन दोनों की खुशी में बादल झूम कर नाच उठे..... बड़ी-बड़ी बूंदों के रूप में बरसने लगे थे।
    " यह क्या हो गया ??" रणविजय ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा।
    " जल्दी चलो इशानी.... यहां से निकलने में भी पन्द्रह मिनट का समय लगेगा। अभी हमें पहाड़ी से नीचे भी उतरना है ।" रणविजय में मौसम के बदलते हुए मिजाज को देखकर कहा ।
    पर इशानी थी कहां?? रणविजय ने इशानी की तलाश में आसपास नजर दौड़ाई।
    तभी उसकी नजर सामने बारिश का मजा लेती हुई इशानी पर गई। इस समय इशानी दुनिया जहान की सारी फिक्र से फ्री होकर.... बिल्कुल बच्चों की तरह... अपने दोनों हथेलियों में पानी की इन बड़ी-बड़ी बूंदों को लेकर खेल रही थी। बच्चों जैसी एक निश्चल मुस्कुराहट उसके चेहरे पर फैली थी। रणविजय बेखुद सा..... उसे देखे जा रहा था।
    इशानी उसे सीधे अपने दिल तक ....उतरती हुई महसूस हो रही थी..... बेखुदी में रणविजय के कदम .....इशानी की ओर बढ़ने लगे। रवि जाने पीछे से जाकर इस आने को अपने बाहों में समेट लिया और उसके कंधे पर अपने चीन टिका दी और धीरे से उसके चेहरे पर आए हुए पानी की एक बूंद को....अपने होठों से चुन लिया। रणविजय की इस हरकत से इशानी पूरी तरह सिहर उठी और रणविजय ने भी अपने पूरे बदन में एक मीठा सा तनाव महसूस किया । रणविजय ने कंधो से पकड़ कर इशानी को अपने सामने किया। दोनों की नजरें मिली। दोनों ने ही अपनी आंखों से एक दूसरे को अपने दिल में उतरने का रास्ता दे दिया था।
    बरसात इतनी तेज थी कि इशानी पूरी तरह से भीग गई थी और उस को देखता हुआ रणविजय को भी ध्यान नहीं रहा ... वह खुद ही बुरी तरह से भीग चुका था।

  • 20. वफ़ा ना रास आई - Chapter 20

    Words: 1265

    Estimated Reading Time: 8 min

    मिट गई दूरियां



    रणविजय ने कंधो से पकड़ कर इशानी को अपने सामने किया। दोनों की नजरें मिली। दोनों ने ही अपनी आंखों से एक दूसरे को अपने दिल में उतरने का रास्ता दे दिया था। जाने कब से दोनों एक दूसरे को देखते ही रहे । दोनों की आंखें दोनों के दिल के जज्बात बयान कर रही थी। रणविजय के आंखों में उसके जज्बातों की लौ पूरे शबाब पर थी.... उसके आंखों में उसके जज्बातों की चमक अधिक थी कि उन्होंने आंखों के रास्ते इशानी के दिल में.... हलचल मचानी शुरू कर दी थी.... रणविजय के दिल के जज्बात..... उसकी आंखों से ईशानी साफ-साफ पढ़ पा रही थी। रणविजय पूरी तरह से इशानी को अपनी बाहों में समेट लेना चाहता था और इशानी पूरी तरह से उसकी बाहों में टूट कर बिखर जाना चाहती थी। रणविजय के जज्बातों की तपिश ..... इशानी के बर्दाश्त से बाहर हो चुकी थी .. इशानी ने रणविजय थोड़ा दूर होकर अपनी आंखें झुका ली।


    अपने और इशानी के बीच आए हुए.... इस दो कदम के फासलों को समेटता हुआ रणविजय इशानी के बिल्कुल पास आकर पीछे से उसके कानों में कहा।
    "किसी ने पूछा था हमसे.....
    क्या है आप के दिल की कहानी??
    हमने भी दिया जवाब....
    कि जनाब....
    आप धड़कते होंगे हजारों दिल में.....
    पर इस राजा की तो सिर्फ एक रानी है।
    आप पर ठहरती होंगी करोड़ों आंखें....
    पर अपनी तो...
    दो झुकी पलकों में ही सारी कहानी है।"
    इशानी ने रणविजय की गर्म सांसों को अपने कंधे पर महसूस किया।
    कुछ रणविजय के गर्म जज्बातों की तपिश थी. तो कुछ अरमान जगाते हुए इस मौसम की कहानी। रणविजय की गर्म सांसे ने इशानी के खुले हुए गले पर हरकत कर दी थी। रणविजय की सांसों की गर्मी अपने वतन में महसूस करते हुए ईशानी तेजी से पीछे मुड़ी और रणविजय के सीने से लग गई।
    रणविजय ने भी एक सेकंड की देरी ना करते हुए इशानी को अपनी बाहों में समेट लिया। रणविजय ने अपने होंठ इशानी के माथे पर रख दिए। रणविजय के होठों को अपने माथे पर महसूस करते हुए ....इशानी ने अपना चेहरा ऊपर उठाया। दोनों की आंखों में एक दूसरे के लिए बेपनाह प्यार था। रणविजय की आंखें अब इशानी के आंखों से नीचे उतर कर उसकी होठों की तरफ देखने लगी । इशानी की प्यास जगाती हुई इन होठों ने ....को देखते हुए रणविजय का गला इस भीगते हुए मौसम में भी सूखने लगा था।
    जोर से प्यास लग रही थी। रणविजय ने अपना एक हाथ इशानी की गले की पीछे रखते हुए.... उसके होठों को अपने होठों में ले लिया। बारिश के कारण गिरती हुई बूंद जो इशानी की होठों के आसपास लगी थी. रणविजय ने अपने होठों से छू लिया। ईशानी के हाथ रण विजय के शर्ट पर कस गए।रणविजय के होठों ने इशानी के होठों को पूरी तरह से अपनी गिरफ्त में ले लिया। कुछ देर तक वह उस को पॉलिटली किस करता रह गया.... रणविजय की बेताबियों ने इशानी को भी बेकाबू कर दिया था.... इशानी ने अपने होठों की पंखुड़ियों को खोल दिया था
    रणविजय धीरे-धीरे इशानी में डूबने लगा.... उसके बेताबी अब खुलकर बाहर आने लगी थी.. रणविजय धीरे धीरे उन्माद की तरफ बढ़ रहा था..... इशानी की सांसे उखड़ने लगी। उसने धीरे से रणविजय को अपने से अलग किया।
    " रणविजय हमें चलना चाहिए ....." इशानी आंखें झुकाए हुए बोली।रणविजय जो कि अब तक दिलकश लम्हों में डूबा हुआ था..... आधा प्यासा ही रह गया था। उसने ना समझी से इशानी की तरफ देखा। तभी उसे जगह और स्थिति का ध्यान आया।
    " हां आओ.... जल्दी चलते हैं।" रणविजय इशानी का हाथ पकड़ कर बोला। अब उस समझ में आ रहा था कि वह क्या करने जा रहा था?? इशानी की आंखें शर्म से पूरी तरह सूखी हुई थी। हया के बोझ तले दबी हुई उसकी पलकें ....पैरों को बढ़ने की इजाजत भी नहीं दे रही थी। वह खींची हुई चली जा रही थी।
    गाड़ी तक आते-आते दोनों पूरी तरह से भीग गए थे।
    " अब यहां से तो हम अपने होटल नहीं जा सकते ....ऐसा करते हैं कि यही पास ही किसी होटल में आज नाइट स्टे ले लेते हैं....." रणविजय ने कहा। खिड़की की तरफ देखती हुई इशानी ने धीरे से हां में सिर दिया। रणविजय की नजर उसकी पीठ पर गई। गहरे गले का सूट भीगने के कारण पूरी तरह से बदन पर चिपक चुका था।रणविजय के दिल को कुछ होने लगा ।उसने जल्दी से अपना कोट उतारकर इशानी को दे दिया।
    " इसे पहन लो।"
    इशानी ने झुकी हुई पलको के साथ धीरे से कोट उसके हाथों से ले लिया ... और अपने आप को समेटते हुए कोट तेजी से पहन लिया। इशानी की इस हरकत को देखकर रणविजय मुस्कुरा दिया।
    दोनों काफी भींग चुके थे। ऊपर से मौसम का मिजाज इतना खराब हो गया था कि आगे ड्राइविंग करके जाना भी मुश्किल था। रणविजय ने पास में ही एक अच्छा सा होटल देखकर अपने और ईशानी के के लिए कमरा बुक कर लिया। बड़ी मुश्किल से उन्हें एक ही कमरा मिला था क्योंकि सीजन होने के कारण इस समय कमरा मिल पाना संभव नहीं था ।
    यह तो होटल राणावत के ही एक सहयोगी कंपनी का था। इस कारण होटल मैनेजर ने ...रणविजय का कार्ड देखते हुए हुए उन्हें एक पर्सनल कमरा दे दिया।
    " सॉरी सर इस टाइम हमारे पास कोई कमरा अवेलेबल नहीं है ....आपको रात यही बितानी पड़ेगी... पर इस रूम का हीटर प्रॉपर वर्क नहीं कर रहा है। वी आर रियली सॉरी। आप पहली बार हमारे होटल में आए... और हम...." मैनेजर ने सर झुका लिया।
    " इट्स ओके..... एक कप चाय और आप हमारे लिए कुछ कपड़ों का अरेंजमेंट कर सकते हैं??" इशानी को भीगे हुए देखकर रणविजय ने कहा।
    " ओके सर मैं देखता हूं और चाय भी भिजवा देता हूं।"मैनेजर ने कहा ।
    रणविजय और इशानी कमरे में आए।
    रात काफी हो गई थी। मजबूरी में दोनों को एक ही कमरे में एक ही बिस्तर पर रात बितानी पड़ी । कमरे का हीटर वर्क नहीं कर रहा था। इस कारण रुम को बुक नहीं किया गया था... तो एक बेड के अलावा कुछ भी नहीं था।
    दोनों बेड के दो कोने पर सोए थे । पर आज जो हिलपॉइंट पर हुआ था......उस समय ईशानी के होठों का स्वाद रणविजय के होठों पर अभी भी था। उसके गले में इशानी के होठों को फिर से अपने होठों में लेने की प्यास जग रही थी। उसका गला सूख रहा था। रणविजय तेजी से करवट बदलने लगा। इशानी के बदन से उठ रही भीनी भीनी खुशबू उसको बेचैन कर रही थी। यही हाल इशानी का भी था । रणविजय ने आगे बढ़कर झटके से इशानी को अपनी बाहों में खींच लिया।
    " नहीं रणविजय यह गलत है...."ईशानी ने धीरे से कहा।
    " कुछ गलत नहीं है..... हम एक दूसरे से प्यार करते हैं और जल्दी शादी कर लेंगे।" रणविजय ने अपनी मजबूत बांहों में इशानी को भर लिया। ईशानी मना कर रही थी लेकिन रणविजय बेखुद सा हो रहा था।ईशानी कुछ कहना चाहती थी.... लेकिन रणविजय ने अपने होठों से उसके होठ बंद कर दिए। कुछ देर के बाद इशानी ने भी प्रोटेस्ट करना छोड़ दिया।ईशानी ने कस कर रणविजय को पकड़ लिया।
    रणविजय अपनी सारी बेचैनी इशानी केअंदर उतार देना चाहता था तो अब इशानी भी उसके एहसास को अपने में समेट लेना चाहती थी। रणविजय ने तेजी से अपने नाइट सूट के शर्ट को उतार दिया... अब उसकी उंगलियां... ईशानी के टॉप के अंदर हरकत कर रही थी।कुछ ही देर में...
    दोनों कपड़ों के बंधन से आजाद हो कर.... एक हो चुके थे। कमरे के बाहर माहौल ठंडा था ....पर कमरे के अंदर दोनों की गर्म सांसे साफ-साफ सुनाई पड़ रही थी।