"Rebirth: : एक नया सफ़र - किस्मत का खेल या नई उम्मीद?** मयंक... नाम तो बस एक, लेकिन सपने आसमान छूने वाले। एक ऐसा लड़का जो अपनी मेहनत और लगन से दुनिया जीतने का हौसला रखता था। पढ़ाई में अव्वल, दिल का साफ़, और रिश्तों का पक्का। लेकिन किस्मत को शायद... "Rebirth: : एक नया सफ़र - किस्मत का खेल या नई उम्मीद?** मयंक... नाम तो बस एक, लेकिन सपने आसमान छूने वाले। एक ऐसा लड़का जो अपनी मेहनत और लगन से दुनिया जीतने का हौसला रखता था। पढ़ाई में अव्वल, दिल का साफ़, और रिश्तों का पक्का। लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था। गरीबी के बोझ तले दबा, परिवार के तानों से घायल, और सबसे बड़ा ज़ख्म – अपने सबसे करीब के इंसान का धोखा। विश्वास की नींव ऐसी टूटी कि हर रिश्ता बेमानी लगने लगा। ज़िन्दगी एक अंधेरी सुरंग में तब्दील हो गई थी, जहाँ उम्मीद की एक किरण भी नज़र नहीं आ रही थी। जब ज़िन्दगी से उम्मीद का आख़िरी धागा भी टूट गया, तो वो काली रात आई जिसने सबकुछ बदल दिया... एक भयानक हादसा... दो ज़िन्दगियाँ हमेशा के लिए उलझ गईं... और एक ऐसी शुरुआत हुई जिसकी मयंक ने कभी सपने में भी कल्पना नहीं की थी। एक ऐसा मोड़ जिसने उसकी दुनिया को पूरी तरह से पलट दिया। क्या ये सिर्फ़ एक संयोग था, या भगवान का लिखा हुआ कोई खेल? क्या ये एक नई शुरुआत है, या फिर किस्मत का एक और क्रूर मज़ाक? क्या मयंक अपने जीवन का असली मक़सद खोज पाएगा, या ये "नई शुरुआत" भी सिर्फ़ एक और इम्तिहान साबित होगी? अब मयंक को तय करना है कि क्या वो इस नई ज़िन्दगी को गले लगाएगा, या अपने अतीत के बोझ तले दबा रहेगा। यह कहानी है उसकी खोज की, उसकी उम्मीद की, और उसकी पुनर्जन्म की। एक ऐसे सफ़र की, जहाँ हर कदम पर एक नई चुनौती है, और हर चुनौती उसे अपने असली रूप से मिलाने का वादा करती है।
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रात का सन्नाटा पूरे मोहल्ले पर पसरा हुआ था। ऊपर आसमान में हल्के-हल्के बादल बह रहे थे, और बीच-बीच में चाँद झाँक कर फिर छुप जाता। पुरानी, टूटी-फूटी चारपाई पर मयंक छत पर लेटा था, आँखें खुली हुईं। नींद का नामो-निशान नहीं था।
उसकी नज़र आसमान पर नहीं, बल्कि कहीं दूर थी… उस दूर जहाँ उसकी सोच हर रात भटक जाया करती थी—मेरी ज़िन्दगी ऐसी क्यों है ! क्या मेरी इस बेमतलब की ज़िन्दगी में भी प्यार अपनापन, सम्मान आयेगा ? क्या मेरी भी ज़िन्दगी दूसरों की तरह नॉर्मल हो पाएगी ?
वो अभी अपनी ही सोच में खोया था कि ..
नीचे से आवाज़ आई—
"अरे ओ मयंक बाबू ! अपने मरे हुए बाप की कमाई पर ऐश करना हो गया हो तो , थोड़ा काम भी कर लो !" कब तक ऐसे ही भिखारियों की तरह दूसरों की रोटी पे जाओगे
ये आवाज़ उसके चाचा की थी, जो हर रोज़ किसी न किसी बहाने उसे ताना दे देते थे ।
मयंक ने करवट बदल ली, पर आवाज़ें कानों में चुभ गईं।
" इतना बड़ा हो गया, कॉलेज भी आख़िरी साल में है, लेकिन कमाई का कोई नाम नहीं । जब देखो तब सिर्फ़ पढ़ाई-पढ़ाई… पढ़ाई से पेट भरता है क्या?"
वही नीचे आँगन में उसकी माँ चुपचाप बैठे बर्तन धो रही थी। उसके पिता के जाने के बाद वो कभी कुछ कहती नहीं, यहां तक कि उसकी तरफ़ देखती तक नहीं थी ।
मयंक बड़बड़ाया,
पता नहीं कब तक यह सब ऐसा ही चलने वाला है ! बस मेरी पढ़ाई जल्दी खत्म होते ही एक जॉब लग जाए तब शायद मेरी इस ज़िन्दगी में थोड़ी सुकून आए ...
उसकी आवाज़ में थकान थी, ग़ुस्सा भी, और थोड़ा-सा वो दर्द जिसे वो किसी से कह नहीं पाता था।
उसकी छत पर रखी पुरानी किताबें हवा में पन्ने पलट रही थीं।
उसने उनमें से एक को उठाया और आँखों के सामने रख लिया। पन्नों पर लिखे शब्दों के बीच भी वो सिर्फ़ अपनी हालत के बारे में सोच रहा था—
"मेरे पास क्या है? न घर का प्यार, न पैसे, न अपना कोई…"
ऐसे ही यह रात भी बीत गया ...
सुबह का उजाला फैला तो मोहल्ले के बच्चे पतंग उड़ा रहे थे, लेकिन मयंक के लिए सुबह बस एक और दिन थी जो बीतेगी और लोगों की बातें फिर चुभेंगी।
नीचे आते ही उसकी माँ ने बिना देखे कहा,
"चाय गरम है, पी ले और निकल जा कॉलेज।"
कोई 'गुड मॉर्निंग' नहीं, कोई मुस्कान नहीं। बस वही औपचारिकता।
चाचा अख़बार के पीछे अपना चेहरा छुपाए , फिर एक बार उसको सुनने लगे
"आज फिर देर मत करना, और हाँ… अपने बाप का पैसा समझ कर मेरे पैसे यूं ही मत उड़ाना।"
वो यह बातें इतनी आसानी से कह रहे थे , मानो यह तो उनका रोज का काम हो ! जिसके बिना उनके दिन की अच्छी शुरुआत ही न होती हो ।
मयंक ने चुपचाप कप उठाया।
"बाप का पैसा…"
उसने धीरे से अपने आप से कहा, " कितनी आसानी से ये सब यही बातें बार बार दोहराते रहते है ! जैसे कि मैं अपने बाप के पैसे से ऐश करता फिर रहा हु । जब की असलियत तो यह है उन्होंने जाते जाते मेरे लिए सिर्फ अपने कर्ज और यह बिना गलती के सुनने वाले ताने ही छोड़ा है
यही सब सोचते हुए बिना किसी से कुछ कहे वो घर से निकल गया
कॉलेज का रास्ता लंबा था। पुराने जूतों से धूल उड़ती रही।
बस स्टॉप पर खड़ा था कि पीछे से एक आवाज़ आई—
"अरे ओ मिस्टर उदासी, आज फिर सोचों में खोए हो?"
ये आरती थी—उसकी क्लासमेट और हालफिलहाल में बनी उसकी गर्लफ्रेंड।
उसकी आवाज सुन आज की सुबह मयंक ने पहली बार मुस्कुराया।
"तुम आ गईं? अच्छा हुआ, वरना आज का दिन भी बेमन से गुजरता मेरा ।"
आरती ने हल्के-से उसके कंधे पर हाथ रखा,
"आज फिर से तानों के पेट भर आया है क्या ?
मयंक ने नज़रें झुका लीं।
" हां , अब उसके अलावा मेरी ज़िन्दगी में है ही क्या ? वही… रोज़ की तरह चलता रहता है ।"
बस में दोनों खिड़की वाली सीट पर बैठ गए। हवा बालों में उलझ रही थी, लेकिन मयंक की नज़रें बाहर कहीं खोई थीं।
आरती ने धीरे से कहा,
"देखो मयंक, तुम्हारी मेहनत एक दिन सबको जवाब देगी। तब वही लोग तुम्हें गर्व से देखेंगे जो आज ताना मारते हैं।"
कॉलेज में दिन भर क्लास, असाइनमेंट, प्रोजेक्ट—सब चलता रहा, लेकिन मयंक का मन पढ़ाई में उतना नहीं था जितना अपने हालात से बाहर निकलने में।
लंच टाइम में कैंटीन के एक कोने में दोनों बैठ गए।
आरती ने नोटबुक खोलते हुए कहा,
"ये फाइनल प्रोजेक्ट है, अगर हम इसे अच्छे से कर लें तो प्लेसमेंट में फायदा होगा।"
मयंक ने सिर हिलाया, "हाँ, यही तो उम्मीद है…"
दिन ढलने लगा। कॉलेज से निकलकर दोनों एक छोटे पार्क की तरफ़ चल पड़े। वहाँ कम लोग थे। ठंडी हवा और पेड़ों की सरसराहट में एक अजीब-सा सुकून था।
मयंक ने बेंच पर बैठते हुए कहा,
"तुम्हें पता है, बचपन में मैंने सोचा था कि बड़ा होकर अपने लिए एक छोटी-सी दुनिया बनाऊँगा, जिसमें न ताने होंगे, न अकेलापन । बस कुछ सुकून भरे पल जिसके सहारे यह ज़िन्दगी मैं आसानी से गुजर पाऊं "
आरती ने मुस्कुराकर उसकी तरफ़ देखते हुए कहती है , " जरूर , मुझे तुम पे इतना भरोसा है कि ! मुझे पता है अपनी सपनों की दुनिया तुम एक दिन जरूर बनाओगे … और उस वक्त मैं तुम्हारे साथ ऐसे ही रहूँगी। चाहे कुछ भी हो "
मयंक ने उसकी आँखों में देखा,
" क्या सच में ! तुम हमेशा मेरे साथ रहोगी ? मेरे पास तो तुम्हे देने को कुछ नहीं है । फिर भी ?"
आरती ने मुस्कुरा कर उसका हाथ पकड़ लिया,
"तुम हो ना , मेरे लिए वही काफी है । " तुम्हारी मुस्कान , तुम्हारा प्यार यही मेरे लिए काफी होगा यह ज़िन्दगी सुकून से गुजर ने केलिए ।
दोनों कुछ देर खामोश बैठे रहे। दूर से किसी बच्चे की हँसी गूँजी। और उसकी के साथ मयंक के होंठों पर हल्की सी मुस्कान तेर गई — आरती की यह बात सुन शायद पहली बार उसे लगा कि कोई सच में उसका है। जो हर पल उसके साथ खड़ा है ।