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The Forced Vows

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Aarya Rai

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The Forced Vows "जब रिश्ता दिल से न जुड़ा हो... तो क्या मजबूरी उसे निभा सकती है?" वो लड़का... जिसे प्यार से नफरत थी, जिसके दिल में सिर्फ तन्हाई और ज़ख्म थे, और शरीर ने साथ छोड़ दिया था... व्हीलचेयर उसका सहारा बन गया था। और वो लड़की...

Total Chapters (71)

Page 1 of 4

  • 1. The Forced Vows - Chapter 1 अनचाही शादी

    Words: 1943

    Estimated Reading Time: 12 min

    दिल्ली, शांति निकेतन।

    दिल्ली के शांति निकेतन में बना एक सुंदर सा बंगला, जो काफी बड़े एरिया में फैला हुआ था और जितना वो बड़ा था उतनी ही खुबसूरती से बनाया गया था। वाइट संगमरमर से बना वो खूबसूरत विला किसी रॉयल पैलेस से कम नही लग रहा था। उसके बाहर के बड़े से काले गेट के साइड में लगी नेम प्लेट पर बड़ी ही खूबसूरती से सुनहरे अक्षरों में 'ममता निवास' लिखा हुआ था। ये पैलेस कम विला श्रीमती ममता राणा के स्वर्गीय पति अभिजित राणा ने बड़े ही शौक से बनवाया था।

    रात के अंधेरे में वो पैलेस रंगीन रोशनियों से ऐसे चमक रहा था जैसे आकाश ने घने काले बादलों के बीच चंद्रमा अपनी चाँदनी बिखेरती थी। विला के सामने से बड़ा सा गलियारा बनाया गया था जो बाहर वाले बड़े से गेट पर आकर खत्म होता था। उस गलियारे के दोनों तरफ लोन था जहाँ साइड में रंग बिरंगी फूलों की क्यारियाँ थी। उन खूबसूरत फूलों की खुशबु से वहां की हवा महक रही थी। लॉन में लगे बड़े बड़े पेड़ की शाखाएं हवा के वजह से ख़ुशी से झूम रही थी।

    अंदर वाले गेट के सामने लोन में बड़ा सा फव्वारा था जिसके चारों और हंस की खूबसूरत मूर्तियाँ बनी हुई थी। विला के पीछे पार्किंग बनाई हुई थी, वहां भी गार्डन बना हुआ था। चारों तरफ से हरियाली से घिरा वो विला एकदम पुराने ज़माने के महल जैसा लग रहा था, जिसकी चमक अब भी एकदम नए जैसी थी।

    एक्सटीरियर जितना आकर्षक था उस विला का इंटीरियर भी उतना ही लाजवाब था। खूबसूरत एंटीक चीजों और पेंटिंग से सजा बड़ा सा हॉल, रूफ पर हर कुछ दूरी पर लगे झुमरो से निकलती रंग बिरंगी रोशनी से पूरा विला जगमगा रहा था।

    हॉल ने बीचों बीच फूलों से सजा खूबसूरत मंडल बनाया हुआ था । विला की दीवारों लग रंग बिरंगी लाइट की लाड़ियाँ और सजी झलारें बेहद खूबसूरत लग रही थी। फूलों की लड़ियों से पूरे विले को सजाया गया था जैसे किसी नई नवेली दुल्हन को सजाया जाता है।

    मंडप मे अग्नि कुंज के पास केसरी वस्त्र पहने पंडित जी बैठे थे। नौकर यहाँ से वहा भागते हुए सब व्यवस्था देख रहे थे।

    पंडित जी के पास लाइट ब्लू कलर की सिल्क की बनारसी साड़ी पहने एक औरत बैठी थी, जिसकी उम्र यही कोई 50 के आस पास की लग रही थी। प्योर गोल्ड के हल्के गहने पहने हुए थे उन्होंने, देखने मे आज भी सुंदर लग रही थी, चेहरे पर अलग ही तेज चमक रहा था। ये थी श्रीमती ममता राणा इस विला की मालकिन।

    उनके पास एक और औरत बैठी थी जिन्होंने लाइट येल्लो कलर की सिंपल सी साड़ी पहनी हुई थी। कोई साज शृंगार नही था, फिर भी उनकी सूरत पर अलग ही नूर था । उम्र वही ममता जी के आस पास की लग रही थी। चेहरे पर खुशी झलक रही थी, वही आँखों मे अजीब सी उदासी ने अपना पहरा जमाया हुआ था।

    कुछ देर बाद पंडित जी ने सब व्यवस्था देखने के बाद ममता को वर और वधु को बुलाने को कहा तो उन्होंने पास खड़े नौकर को देखते हुए आदेश दिया,

    "रंजन जाकर नील और अनु को कहो कि अंगद और आकृति को लेकर नीचे आ जाए।"

    रंजन तुरंत ही सीढ़ियों के तरफ बढ़ गया। सीढियाँ ऊपर के फ्लोर तक जाती थी और साथ ही एक तरफ वुडेन रैंप बनाया गया था । वो नौकर ऊपर के फ्लोर पर बने रूम मे चला गया। पूरे विला का सबसे बड़ा और आलीशान चीजों से सजा रूम था वो, जिसमे मिस्टर अंगद राणा रहते थे।

    मिस्टर ऐंड मिसेस अभिजित राणा का एकलौता बेटा अंगद राणा, जिनका नाम एक अलग ही रुआब खुदमे समेटे हुए है, दुनिया के सामने इस नाम की इतनी पहचान है कि बड़े से बड़े पद पर मौजूद इंसान इस नाम के आगे सर झुकाता है। कंस्ट्रक्शन की दुनिया का बेताज बादशाह कहा जाता है उन्हें । उनके पिता ने जिस कंपनी को शुरू किया था उन्होंने अपने मेहनत और काबिलियत के दम पर उसको आसमान की बुलंदियों तक पहुँचाया है।

    25 की उम्र मे तीन बार यंग बिज़नेसमैन ऑफ द ईयर का अवार्ड अपने नाम कर चुके है, एशिया के सबसे बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनी के मालिक है ये और एशिया अवार्ड मे पिछले साल ही business leader अवार्ड उन्होंने अपने नाम किया था। पूरे एरिया मे इनकी कंपनी के ब्रांच फैले हुए है और हैड ऑफिस दिल्ली मे है जिसे कुछ ये वक़्त पहले तक ये खुद संभालते थे, बाकी ब्रांचेस् उनके मैनेजर संभालते है और ज़रूरत पड़ने पर वो खुद भी जाकर काम का जायज़ा लेते रहते है।

    जितना इनका नाम फेमस है उतने ही चर्चे उनके लूक्स और परस्नैलिटि के हुआ करते थे। लगभग छः फुट हाइट, दूध सा गोरा रंग, गहरी भूरि आँखे, आकर्षक फेशियल कट्स, जिम मे बनाई हीरो जैसे बॉडी और एब्स, चेहरे पर अलग ही तेज और उसपर उनका रौबदार अंदाज़। लड़कियाँ उनकी एक झलक की दीवानी है पर पिछले छः महीने से उन्हें किसी ने नही देखा।

    कुछ देर बाद उस बड़े से रूम का दरवाजा खुला और एक लड़का रूम से बाहर निकला। लगभग 5'9 हाइट, गठिला बदन, हैंडसम चेहरा और लबो पर सौम्य सी मुस्कान। उसने वाइट शर्ट के साथ ब्लैक थ्री पीस सूट पहना हुआ था। काफी हैंडसम लग रहा था वो, उसके हल्के साँवले रंग पर वो आउटफिट जच रहे थे।

    ये है अंगद के बचपन का दोस्त, उसका यार जो उसके लिए बिल्कुल भाई जैसा है, नील ओबरॉय । फैशन की दुनिया मे इनका अलग ही नाम है। इंडिया से लेकर एशिया की मार्केट मे सिर्फ उनके ब्रैंड का कबज़ा है। ये यहाँ नही रहते लंदन मे रहते है पर पिछले कुछ वक़्त से यही रह रहे है।

    नील ने मुड़कर देखा और अगले ही पल एक व्हीलचेयर उसके पीछे से निकलकर आगे आ गयी। उस व्हीलचेयर पर सुनहरे रंग की शेरवानी पहने एक लड़का बैठा था। पैरों मे जूती, सर पर साफा जिसपर सुंदर का ब्रुच लगा हुआ था। गले मे मोतियों की तीन लडी वाली माला, शेरवानी के पॉकेट पर रेड रोज़ लगा हुआ था।

    ये है मिस्टर अंगद राणा जो भले ही व्हीलचेयर पर थे पर उनके हैंडसम से चेहरे पर आज भी इतना तेज़ है की किसी को भी अपना दीवाना बना दे।

    दुल्हे के लिबाज़ मे सजे अंगद के चेहरे पर इस वक़्त कोई भाव नही थे। नील ने उसकी व्हीलचेयर पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया पर अंगद ने अपना हाथ आगे करके उसको रोक दिया और खुद ही आगे बढ़ गया। आधुनिक तकनीकों से लेस थी वो व्हीलचेयर और अंगद वो व्हीलचेयर पर होने के बावजूद किसी काम के लिए किसी पर आश्रित नही था।

    नील के भाव कुछ बदले फिर वो लबों पर मुस्कान सजाए उसके पीछे चला आया। दोनो नीचे लिविंग रूम मे पहुँचे तो ममता जी ने आगे आकर नील को सेहरा दे दिया जिसे उसने अंगद को पहना दिया। ममता जी ने अपने बेटे को दुल्हे के रूप मे देखा तो खुशी के आँसू आँखों मे झिलमिलाने लगे। उन्होंने झुककर उसकी नजर उतारी और प्यार से उसके माथे को चूमते हुए भावुक होकर बोली,

    "कितने सज रहे है आप दुल्हे के रूप मे। आज हमारा सालों का सपना पूरा हो गया। दिली इच्छा थी हमारी आपको दुल्हे के रूप मे सजे देखने की और आज आपने हमारी इस इच्छा को पूरा कर दिया।"

    अंगद के चेहरे पर अब भी कोई भाव नही थे। उसने बिना किसी भाव के जवाब दिया, "ये शादी मैं सिर्फ आपकी इच्छा पूरी करने के लिए ही कर रहा हूँ ये बात आप बखूबी जानती है, वरना शादी और प्यार जैसे किसी रिश्ते पर अब मुझे कोई विश्वास नही रहा।"

    उसका जवाब सुनकर एक पल को ममता जी के चेहरे पर मायूसी और चिंता के बादल घिर आए पर जल्दी ही उन्होंने खुदको संभाला और मुस्कुराकर बोली,

    "आपकी पसन्द ने आपका विश्वास प्रेम और शादी पर से उठाया है और हमें पूरा विश्वास है की जिसे हम आपकी ज़िंदगी मे शामिल करने जा रहे है वो फिरसे आपको शादी जैसे रिश्ते पर विश्वास करना सिखा देंगी और उन्हें देखने के बाद आप चाहे भी तो उनके प्यार मे पड़ने से खुदको रोक नही पाएंगे।"

    अंगद ने कोई जवाब नही दिया बस चेहरा फेर लिया। उसकी बातें पंडित जी के पास बैठी सुनंदा जी ने भी सुनी और उनके माथे पर चिंता की रेखाएँ उभर आई।

    अभी कुछ ही मिनट बीते थे कि सीढ़ियों के तरफ से आती छन छन की आवाज़ ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींच लिया।

    सीढ़ियों से एक लड़की जिसने पिंक कलर का लहंगा पहना हुआ था। हल्का मेकअप जो उसके गोरे रंग पर काफी जच रहा था, माथे पर बड़ा सा मांगटीका, कानों मे बड़े बड़े झुमके, गले मे चोकर जो उसकी ड्रेस पर मैच कर रहा था, राइट हैंड मे काँच की चूड़ियाँ और उल्टे हाथ मे डायमंड का सुंदर सा ब्रेसलेट, भूरि भूरि आँखों मे गहरा काजल और नाक में छोटी सी नोज़ रिंग, पैरों मे हिल्स।

    अलग ही जलवे थे उसके, चेहरे पर अलग ही कशिश थी और लबों पर गहरी मुस्कान छाई हुई थी। वो लड़की बहुत ही प्यारी लग रही थी। ये है अंगद राणा की छोटी बहन अन्वेशा राणा जो की नील के साथ पार्टनेरशिप मे काम करती है।

    अन्वेशा के साथ सुनहरे रंग ब्राइडल लहंगा पहने जिसपर लाल धागे से बारीक डिजाइन बनाए गए थे, एक और लड़की आ रही थी। अन्वेशा ने उसको थामा हुआ था। ममता जी और सुनंदा जी की नजर जैसे ही अन्वेशा के साथ दुल्हन का शृंगार किये आ रही लड़की पर पड़ी, दोनों के लबों पर मुस्कान फैल गयी।

    लाल बारीक कारीगरी वाला, सुनहरे रंग का लहंगा, उसपर लाल रंग की थ्री फोर्थ बाजु वाली एम्ब्रोइडेड चोली, जो खुद अन्वेशा ने अपनी होने वाली भाभी के लिए डिज़ाइन किया था। घने लंबे काले बालों को खूबसूरत से जुड़े मे बांधकर उसको गजरे से सजाया गया था और उसी से अटैच करके चटक लाल रंग की सितारों से सजी चुनरी को उसके सर पर सेट किया हुआ था।

    छोटे से गोल चाँद से सोणे मुखड़े पर ब्राइडल मेकअप जो देखने मे ज्यादा पता नही चल रहा था पर बहुत अलग लुक दे रहा था उसे। बीच की मांग सजा मंगतिका, उसके ठीक नीचे छोटी सी रेड बिंदी, गहरी काली बड़ी बड़ी आँखों मे सुर्मे की गहरी रेखा, हया के बोझ तले झुकी घनी पलकें, शर्म से गुलाबी मोटे मोटे गाल, नाक मे बड़ी सी नथ जिसपर हरे रंग का लगा नग बहुत प्यारा लग रहा था। नथ ने उसका गाल और सुर्ख लाल रंग मे रंगे पतले पतले लबों को आधा ढका हुआ था।

    दुल्हन मेहंदी लगी कलाइयों मे भरा भरा चूड़ा उस उसमे बंधे कलीरे, गले मे एक जड़ाऊ हार जो गले से एकदम चिपका हुआ था और साथ मे एक दो लेयर वाला बड़ा हार। कमर पर सुंदर सा मोतियों का बना कमरबंद सजा हुआ था। पैरों मे भारी भारी पायल जो उसके हर बढ़ते कदम के साथ अपनी छन छन कि आवाज़ से वहा खुशनुमा माहौल बना रही थी।

    ये है आकृति अवस्थी एक मिडल क्लास फैमिली मे पली बढ़ी सिंपल सी लड़की, जिसने bcom किया हुआ है जिसके ज्यादा बड़े सपने नही थे। उसका परिवार ही उसके लिए सब कुछ था और आज अगर वो यहाँ थी तो सिर्फ अपनी माँ के लिए।

    एक हादसे ने उससे उसके पापा और भाई को छीन लिया था अब सिर्फ माँ ही बची थी और उनकी खुशी के लिए वो इस बंधन मे बंधने जा रही थी।

    दुल्हन के लिबाज़ और ब्राइडल लुक मे उसकी खूबसूरती और ज्यादा निखरकर सामने आ रही थी। अन्वेशा आकृति को लेकर ममता जी के पास चली आई।

    आकृति ने तो निगाहें उठाकर देखने तक की ज़हमत नही उठाई थी और न ही अंगद को ही अपनी दुल्हन को देखने मे कोई दिलचस्पी थी, पर नील ने जब आकृति को देखा तो देखता ही रह गया।

    To be continued...

  • 2. The Forced Vows - Chapter 2

    Words: 2303

    Estimated Reading Time: 14 min

    दिल्ली, शांति निकेतन।

    In previous chapter, you saw that दिल्ली के शांति निकेतन में ‘ममता निवास’ नामक एक खूबसूरत विला का वर्णन किया गया है, जहाँ श्रीमती ममता राणा अपने स्वर्गीय पति अभिजित राणा के साथ रहती थीं। विला बहुत ही सुंदर था और उसे फूलों और रंगीन रोशनी से सजाया गया था, क्योंकि ममता जी अपने बेटे अंगद की शादी की तैयारी कर रही थीं। अंगद एक सफल व्यवसायी है, लेकिन एक दुर्घटना के कारण वो व्हीलचेयर पर है। उसकी शादी आकृति अवस्थी नामक एक साधारण लड़की से हो रही है, जो अपनी माँ की खुशी के लिए ये शादी कर रही है।

    Now Next

    --------

    नील ने जब आकृति को देखा तो देखता ही रह गया। इस वक़्त वो ऐसी लग रही थी जैसे स्वर्ग से कोई अप्सरा दुल्हन के लिबाज़ मे सजकर वहाँ आई हो।

    नील ने उसको देखा और मुस्कुराकर बोला, "मानना पड़ेगा भाभी, आपकी खुबसुरती का कोई जवाब नही, मैंने आज तक इतनी हसीन दुल्हन नही देखी। आपको देखकर ऐसा लग रहा है जैसे आप परियों से देश से आई एक पाक फरिश्ता है जो मेरे दोस्त की बेरंग दुनिया को अपने नूर से सजाने आई है। मैं तो आपका फेन हो गया।"

    उसकी तारीफ पर आकृति हौले से मुस्कुरा दी, इसके साथ ही उसके गालों पर डिम्पल उभर आए। अब तो उसकी खूबसूरती और ज्यादा बढ़ गयी थी, जो एक बार उसको देख ले उसकी छाप सारी ज़िंदगी खत्म होने के भी उसके दिल से न मिटे।

    शायद इसलिए भगवान ने उसके नजर का टिका लगाकर भेजा था। उसके लबों के ठीक ऊपर अपना अधिकार जमाए बैठे तिल से जहाँ उसकी खूबसूरती मे चार चाँद लगा रही थी वही उसको बुरी नजर से बचाने के लिए काले टिके का काम भी करती थी।

    अनु ने नील की बात सुनी तो खुदपर इतराते हुए बोली, "आखिर भाभी किसकी है।"

    "सही कहा अब मेरी भाभी है तो सुंदर तो होंगी ही," नील ने तुरंत ही जवाब दिया जिसे सुनकर अनु ने उसको घूरकर देखा।

    फिर मुँह बनाते हुए बोली, "मेरी भाभी है इसलिए इतनी प्यारी है समझे, बड़े आए अपनी तारीफ करने वाली।"

    "क्यों सिर्फ तेरी ही भाभी है क्या? वैसे भी तू कहाँ चुहिया जैसी शक्ल वाली और भाभी कहाँ परियों जैसी खूबसूरत, दोनों की कोई तुलना ही नही।"

    नील ने भी हाज़िर जवाबी दिखाई। उसकी बात सुनकर अनु चिढ़ गयी पर वो कुछ कहती उससे पहले ही ममता जी ने दोनों को डांट दिया, "बस कीजिये आप दोनों, इतने शुभ मौके पर झगड़ना शुरु कर दिया आप दोनों ने। अब अगर दोनों मे से किसी ने एक शब्द भी कहा तो हम उन्हें यहाँ से बाहर निकाल देंगे।"

    उन्होंने दोनों को धमकी दी और उनकी धमकी सुनकर दोनों ने एक दूसरे को घूरकर देखा फिर मुँह बना लिया। ममता जी ने अब आकृति के तरफ निगाहें घुमाई और उसकी बलाएँ लेते हुए बोली,

    "कितनी प्यारी लग रही है हमारी बच्ची, बिल्कुल गुड़िया जैसी लग रही है आज आप।"

    उन्होंने प्यार से उसके माथे को चूम लिया। आकृति निगाहें झुकाए खड़ी रही। सुनंदा जी भी उठकर आकृति के पास चली आई। अपनी बेटी को दुल्हन के रूप मे सजे देखने का ख्वाब उन्होंने उसके जन्म के साथ ही देखना शुरू कर दिया था फिर हालात ऐसे बने कि उन्हें लगने लगा कि अब ये सपना सपना बनकर ही रह जाएगा, वो कभी अपनी बच्ची को दुल्हन के रूप मे देख ही नही पाएंगी पर आज किस्मत ने उन्हें ये मौका दिया था कि उनकी छोटी सी बेटी दुल्हन बने उनके सामने खड़ी थी।

    उनकी आँखों मे खुशी के आँसू छलक आए, उन्होंने भी उसकी बलाएँ ली फिर प्यार से उसके माथे को चूमते हुए बोली,

    "हमारी कल्पना से कही गुना ज्यादा सुंदर लग रही है आप दुल्हन के जोड़े मे। अगर आप आपके बाबा और भाई होते तो आपको यूँ दुल्हन बने देख उन्हें बहुत खुशी होती।"

    ये बात कहते हुए उनके चेहरे पर दर्द की लहर दौड़ गयी, वही आकृति की आँखों मे भी नमी तैर गयी, जो उसके पलकों से होते हुए उसके गालों को भिगोने लगी।

    अनु ने तुरंत उसके आँसुओं को साफ करते हुए कहा,

    "नही भाभी, आपको बिल्कुल नही रोना है वरना आपका मेकअप खराब हो जाएगा, पूरे चार घंटे लगे है मुझे आपको तैयार करने मे , सब बर्बाद हो जाएगा। Please रोइये नही।"

    आकृति के चेहरे पर दर्द उभर आया, पर उसने अब आँसुओं को बाहर आने की इज़ाज़त नही दी। नील ने पहले उदास आकृति को देखा फिर सुनंदा जी को देखकर शिकायती लहज़े मे बोला,

    "आंटी ये गलत बात है, आप आजके शुभ मौके पर ऐसी बात करके खुदको दुख दे रही है और साथ मे भाभी को भी सैड कर रही है। आज तो खुशी का मौका है तो आपको मुस्कुराना चाहिए। मुझे विश्वास है अंकल और भाई भी भाभी को देखकर आज खुश हो रहे होंगे पर अगर आप और भाभी ऐसे उन्हें याद करके उदास होंगे तो उन्हें भी दुख होगा। फिर अब तो अंगद भी आपका बेटा ही है और मैं भी तो हूँ। चलिए अब उदासी छोड़िये और मुस्कुराकर दिखाइये ताकि भाभी के चेहरे पर से ये दर्द के बादल छँट सके।"

    उसकी बात सुनकर सुनंदा जी हौले से मुस्कुरा दी, फिर उन्होंने प्यार से आकृति के गाल को छूकर कहा, "बहुत नसीब वाली है आप बेटा जो आपको इतना अच्छा ससुराल और प्यार करने वाला परिवार मिलने जा रहा है। आज हम आपके लिए बेहद खुश है। बस अब महादेव से एक ही प्रार्थना है कि हमारी बच्ची की अब और परीक्षा ना ले, बड़ी मुश्किल से आपकी ज़िंदगी मे खुशियों ने दस्तक दी है, ये खुशियाँ सदा यूँ ही बनी रहे।"

    उनकी बात सुनकर बाकी सब मुस्कुरा दिये। अंगद के चेहरे पर अब भी कोई भाव नही थे। पंडित जी ने वरमाला के लिए कहा तो सबका ध्यान उनके तरफ गया।

    अनु ने आकृति को अंगद के सामने खड़ा कर दिया और नील के साथ वहाँ से गायब हो गयी। कुछ देर बाद चार नौकर हाथ मे चार थालियां लेकर वहा उपस्थित हो गए। दो बड़ी बड़ी थालियों मे फूलों की बनी भारी वरमाला था तो दो छोटी थालियों मे गुलाब के पंखुड़ियों के बीच एक एक रिंग चमक रही थी।

    पंडित जी ने मंत्र पढ़कर चारों पर गंगा जल छिड़का फिर रिंग वाले एक थाली लेकर नील अंगद के पास आकर खड़ा हो गया तो दूसरी थाल लेकर अनु आकृति के पास चली आई।

    अब समस्या ये थी कि अंगद खड़ा नही हो सकता था। सबकी परेशान निगाहें एकर दूसरे के तरफ घूम गयी । नील ने अंगद की चेयर को ऊपर करना चाहा पर उससे पहले ही आकृति अपने भारी भरकम लहंगे को संभालते हुए उसके सामने घुटनों के बल बैठ गयी।

    ये देखकर पहले तो सब चौंक गए फिर उनके लबों पर संतुष्टि भरी मुस्कान फैल गयी। सुनंदा जी अपनी बेटी की समझदारी और इस रिश्ते के, अंगद के प्रति उसका समर्पण देखकर भाव विभोर हो गयी।

    कही न कही उन्हें इस बात को लेकर चिंतित थी कि उनकी लाडली बेटी का पति पैर से विकलांग है जाने आकृति कैसे संभाल पाएंगी इस रिश्ते को, अंगद का साथ निभा पाएगी भी या नही? पर आकृति ने अपने उठाए कदम ने उन्हें आश्वस्त कर दिया था कि आकृति इस रिश्ते और अंगद दोनों को अपनी समझदारी और समर्पण भाव से बखूबी संभाल लेगी।

    ममता जी के चेहरे पर सुकून के भाव उभर आए थे और उन्हें अब अपनी पसन्द पर और ज्यादा विश्वास हो गया था। आकृति पर गर्व हो रहा था उन्हें। अपने बेटे के लिए आकृति को चुनने के अपने फैसले पर उनका विश्वास और ज्यादा दृढ़ हो गया था कि आकृति ही है जो उनके बेटे के लिए बनी है, जो उसको फिरसे जीना और मुस्कुराना सिखा सकती है।

    आकृति के अचानक सामने बैठने से अंगद की निगाहें न चाहते हुए भी उसपर पड़ गयी। मासूमियत से लब्रेज़ उस चाँद से सुंदर चेहरे पर उसकी निगाहें एक पल को ठहर सी गई, मन मे अनायास ही इच्छा जागी कि आकृति एक बार पलकें उठाए ताकि इस रूप की रानी ने नयनों का दीदार हो सके उसे पर जल्दी ही उसने इस ख्याल को अपने मन से निकाल फेंका।

    नील ने रिंग की प्लेट अंगद के तरफ बढ़ा दी। ममता जी के कहने पर अंगद ने रिंग अपनी उंगलियों मे थाम ली, अनु ने आकृति का हाथ उसके तरफ बढ़ा दिया तो ना चाहते हुए भी अंगद को उसकी हथेली थामनी पड़ी। जैसे ही उसकी उंगलियों ने आकृति की हथेली को स्पर्श किया, आकृति के मन के तार झनझना उठे, धड़कनें अनायास ही बढ़ गयी और पेट मे गुदगुदी सी होने लगी।

    ज़िंदगी मे पहली बार वो इन एहसासों से रूबरू हो रही थी और परिणाम वश उसके चेहरे पर उलझन भरे भाव उभर आए थे।

    अंगद ने उसकी रिंग फिंगर मे उस चमचमाती ब्लू डायमंड की हार्ट शेप वाली रिंग को पहनाने के बाद एक नाराज़गी भरी निगाह उसके हाथ पर डाली और उसके हाथ को छोड़ दिया।

    अब अनु ने आकृति के तरफ रिंग बढ़ा दी। सुनंदा जी ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए उसको रिंग पहनाने को कहा तो उसने हौले से उस रिंग को अपनी उंगलियों मे थाम लिया।

    अंगद तो अपना हाथ आगे ही नही कर रहा था ये देखकर नील ने उसका हाथ आकृति के आगे कर दिया। आकृति ने एक नजर उसकी हथेली को देखा फिर सकुचाते हुए उसकी रिंग फिंगर मे उस गोल सोने की रिंग को पहना दिया।

    रिंग सेरीमनि के बाद पंडित जी ने वरमाला का आदान प्रदान करने को कहा । अंगद ने पहले बिना आकृति के तरफ निगाहें उठाए, वरमाला उसके गले मे डाल दी।

    आकृति ने भी एक बार भी पलकें उठाकर अपने सामने बैठे अंगद को देखा तक नही और उसको वरमाला पहना दी। सब सर्वेंट्स ने उनपर फूल छिड़के उसके बाद दोनों को मंडप पर लेजाकर बिठाया गया।

    अंगद अपनी चेयर पर बैठा था तो आकृति के लिए भी एक लकड़ी का तख्त लाया गया। मंत्रों के बीच शादी की विधि प्रारंभ हुई । आकृति के पिता नही थे ऐसे मे उनको साक्षी मानते हुए सुनंदा जी ने ही अपनी लाडो का कन्यादान किया और इस वक़्त दोनों माँ बेटी की आँखों मे नमी उतर आई थी।

    जब पंडित जी ने भाई को बुलाने को कहा तो सुनंदा जी दुखी और परेशान हो गयी वही आकृति के आँसु उसके गालों पर लुढ़क गए , नील ने तुरंत आगे बढ़कर उसके आँसुओं को साफ करते हुए मुस्कुराकर कहा, "भाभी आपसे मेरा एक रिश्ता तो पहले ही फिक्स है पर अगर आपकी इज़ाज़त हो तो मैं आपको भाभी से पहले अपनी बहन बनाना चाहूंगा। कहिये भाई होने का फ़र्ज़ निभाने का हक देंगी अपने इस देवर को?"

    उसकी बात सुनकर सुनंदा जी ने कृतज्ञ भाव से उसको देखा तो नील हौले से मुस्कुरा दिया। भाई की रस्म नील ने पूरी की और उसके बाद आकृति के सर पर हाथ रखते हुए मुस्कुराकर बोला, "आजसे और अभी से मैं आपका भाई हुआ तो आपको जब भी अपने इस भाई की ज़रूरत पड़े बस एक बार मुझे याद कर लीजियेगा, मैं दुनिया मे कही भी रहूँ जल्द से जल्द आपके पास पहुँच जाऊंगा।"

    फिर उसने अंगद पर उड़ती निगाह डालते हुए कहा " और अगर इस साले।"

    उसने जैसे ही ये कहा अंगद की गुस्से भरी घूरती निगाहें उसपर पड़ गयी तो उसने तुरंत अपनी बत्तीसी चमकाते हुए कहा " अरे तू इतना भड़क क्यों रहा है ? मैंने तुझे कोई गाली थोड़े न दी है अब होने वाली बीवी का भाई तो साला ही लगता है ना? तो वही तो कहूंगा तुझे।"

    उसने धीरे से ये बात कही थी इसलिए आकृति और अंगद के अलावा कोई सुन नही सका । आकृति ने तो ध्यान नही दिया पर अंगद ने उसकी बात सुनकर उसको घूरते हुए उसपर से अपनी निगाहें हटा ली।

    नील ने एक बार फिर आकृति के तरफ रुख करते हुए कहा " हाँ तो मैं कह रहा था कि अगर आपके इस पति ने आपको ज़रा भी परेशान किया तो आप मुझे बेझिझक बता सकती है फिर मैं इसकी ऐसी क्लास लगाऊंगा की दोबारा कभी आपको तंग करने से पहले उसको मेरा चेहरा याद आएगा।"

    उसकी बात सुनकर अंगद ने एक बार फिर उसको घूरकर देखा, वही अनु ने फट से जवाब दिया " हाँ हाँ वो तो आएगा ही क्योंकि भाई की क्लास लगाने से पहले भाई तुम्हारी जो खातिरदारी करेंगे उसको कभी भूल थोड़े ही पाएंगे।"

    इतना कहकर वो खिलखिलाकर हंस पड़ी। अंगद के लबों पर कुटिल मुस्कान तैर गयी, जैसे अनु की बात पर मौन स्वीकृति ज़ाहिर कर रहा हो। नील ने दोनों भाई बहन को घूर कर देखा फिर वहाँ से चला गया और जाकर ममता जी के पास बैठ गया।

    कुछ मंत्रों के बाद पंडित जी के कहने पर अनु ने दोनों का गठबंधन कर दिया। शादी की विधि आगे बढ़ने लगी । आधी रात बीत गयी थी। आकाश मे सूरत अपनी लालिमा बिखेरने लगा था। दोनों ने मंत्रों के बीच सात फेरों के साथ सात वचन लिए। उसके बाद पंडित जी ने जिस थाल मे सिंदूर दान और चाँदी का सिक्के के साथ गोल्ड का छोटा सा प्यारा सा मंगलसूत्र रखा हुआ था उसे अंगद के तरफ बढ़ा दि।

    अनु ने आकर आकृति के माँगतिके को थोड़ा सा उठाया और पंडित जी के कहने पर अंदर ने उस सिक्के से सिंदूर देकर आकृति की मांग को सुर्ख सिंदूर से सजा दिया। सिंदूर के बाद उसने उसको मंगलसूत्र पहनाया इसके साथ पंडित जी ने शादी के संपन्न होने की घोषणा कर दी।

    आकृति अपनी आँखे बन्द किये, नाज़ुक सी गुड़िया जैसी वहाँ बैठी थी। सिंदूर के कुछ कण उसके सौभाग्य की निशानी के तौर पर उसके नाक पर सज चुके थे जिन्हे अनु ने साफ कर दिया और उसको खड़ा कर दिया। अब बारी थी आशीर्वाद लेने की। सबसे पहले पंडित का रुख किया गया। अंगद को वैसे ही ये सब झंझट सा लग रहा था पर ममता जी की खुशी के लिए वो सब खामोशी से कर रहा था ।

    अभी शादी संपन्न ही हुई थी कि किसी की गुस्से भरी आवाज़ वहाँ गूंजी...


    To be continued...

  • 3. The Forced Vows - Chapter 3

    Words: 2206

    Estimated Reading Time: 14 min

    आकृति अपनी आँखे बन्द किये, नाज़ुक सी गुड़िया जैसी वहाँ बैठी थी। सिंदूर के कुछ कण उसके सौभाग्य की निशानी के तौर पर उसके नाक पर सज चुके थे, जिन्हे अनु ने साफ कर दिया और उसको खड़ा कर दिया।

    अब बारी थी आशीर्वाद लेने की। सबसे पहले पंडित का रुख किया गया। अंगद को वैसे ही ये सब झंझट सा लग रहा था, पर ममता जी की खुशी के लिए वो सब खामोशी से कर रहा था।

    दोनों पंडित जी के पास पहुँचे तो आकृति तो झुक गयी, पर चेयर पर बैठे होने के वजह से अंगद को पूरी तरह से झुककर उनके पैर छूने मे दिक्कत हो रही थी। आकृति ने जब ये देखा तो अपने दूसरे हाथ से उसके हाथ को पकड़कर अपने हाथ पर रख दिया।

    उसके ऐसा करते ही अंगद की हैरानी भरी निगाहें उसके तरफ घूम गयी, पर आकृति ने उसके तरफ देखे बिना ही पंडित के चरण स्पर्श कर लिए। उसके हाथ को पकड़े होने के वजह से अनचाहे अंगद ने भी उनके पैर छूलिए, पंडित जी ने मुस्कुराकर दोनों को आशीर्वाद दे दिया।

    जहाँ आकृति की अचानक इस हरकत के वजह से अंगद हैरान था, वही बाकी सब उसकी समझदारी देखकर खुश हो गए थे।

    आकृति ने शादी मे अंगद का हर परिस्थिति मे साथ देने का वादा किया था, जिसे वो शादी से पहले से ही निभा रही थी और एक बार फिर आकृति ने अंगद का सहारा बनकर ये साबित कर दिया था कि वही सही मायनों मे अंगद की जीवनसंगिनी और हमसफर बनने के काबिल है।

    पंडित जी के बाद नील और अनु दोनों को साथ मे ममता जी के पास लेकर गए। एक बार फिर आकृति ने अंगद से अपना हाथ पकड़वाकर खुद ही उनके पैर छुए। उन्होंने भी दोनों को साथ और खुश रहने का आशीर्वाद दिया, आकृति को सदा सुहागन रहने का आशीर्वाद भी दिया।

    फिर आकृति को खड़ा किया और अपने गले से लगाते हुए मुस्कुराकर बोलीं, "हम जानते थे कि आपसे बेहतर जीवनसाथी और कोई हो ही नही सकता हमारे बेटे के लिए और आपने आज जैसे अंगद का साथ दिया, उनका सहारा बनी, आपने हमारे विश्वास को और भी पक्का कर दिया कि हमने अपने बेटे के लिए बिल्कुल सही चुनाव किया है।"

    उन्होंने बात जारी रखी, "परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही विकट हो आप कभी हमारे बेटे को अकेला नही छोड़ेंगी। उनकी सच्ची हमसफर बनकर न सिर्फ हमेशा उनका साथ निभाएंगी, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर उनकी ढाल बनकर उनके साथ खड़ी होंगी।

    आपके माँ बाप ने आपको बहुत अच्छे संस्कार दिये है। आप जिस घर मे जाती उसको स्वर्ग बना देती और आपके कदम हमारे घर मे पड़े, इसके लिए हम आजीवन महादेव के आभारी रहेंगे। हम बहुत खुशनसीब है जो हमें बहु के रूप मे आप मिली। महादेव आपको सदैव खुश रखे।"

    आकृति ने कुछ भी जवाब नही दिया, बस निगाहें झुकाए खड़ी रही। ममता जी ने प्यार से उसके माथे को चूम लिया। आज आकृति ने अपने काम से सुनंदा जी को अपने संस्कारों पर गर्व करने का अवसर प्रदान किया था। उनके लबों पर सुकून भरी मुस्कुराहट फैली हुई थी।

    अब दोनों को उनके पास लेकर जाया गया। अब जाकर आकृति ने अपनी निगाहें उठाई। उसकी आँखे आँसुओं से लबालब भरी हुई थी। ज़ाहिर सी बात थी, शादी हो चुकी थी तो अब उसको अपनी माँ से दूर जाना था, उसको अब यहाँ सबके साथ रहना था। अब वो अपनी मां के साथ नही रह सकती थी, अब उसकी मां एकदम अकेली हो जाएंगी, ये चिंता उसको सताने लगी थी।

    आकृति ने नम आँखों से उन्हें देखा फिर झुककर अंगद का हाथ पकड़कर उनके पैर छू लिये। उनकी आँखों मे भी नमी तैर गयी थी। उन्होंने दोनों को आशीर्वाद दिया फिर आकृति को अपने सीने से लगा लिया। दोनों ही की आँखे छलक आई।

    अंगद भावहीन सा वहा बैठा था। अजीब बात थी कि अंगद खामोशी से उसके हाथ को पकड़े हुए था। जिस इंसान को किसी का सहारा लेना कतई गवारा नही था वो आकृति के सहारे सबके पैर छू रहा था, वो भी खामोशी से। इस बात से अंगद खुद कुछ हैरान था।

    कुछ देर बाद सुनंदा जी ने आकृति को खुदसे अलग किया, फिर उसके आँसुओं को पोंछते हुए बोलीं, "नही बेटा। अब तो आपकी एक नई ज़िंदगी शुरु होने जा रही है, उसकी शुरुआत यूँ आँसू बहाकर नही मुस्कुराते हुए कीजिये। हम जानते है आप हमारे लिए परेशान है, आप चिंता मत कीजिये हम अपना ध्यान रखेंगे। आप बस अपने इस नई परिवार और इन रिश्तों पर ध्यान दीजिये।"

    वो बोलीं, "हम जानते है हमारी बेटी बहुत समझदार है। आप रिश्तों की एहमियत भी जानती है और उन्हें निभाना भी बखूबी आता है आपको, इसलिए हमें आपको ये कहने की ज़रूरत नही है कि अब आपको अपना जीवन इन नए रिश्तों को समर्पित करनी है। हम बस आपसे इतना कहेंगे की आजसे यही आपका घर है और जैसे आपने हमारे घर को संभाला था वैसे ही इस घर को भी संभालना है, हर रिश्ते को दिल से निभाना है।"

    वो उसे समझा रही थी, "किसी को शिकायत का मौका मत दीजियेगा बेटा, कितना ही मुश्किल वक़्त आए कभी हार मत मानना। इस रिश्ते को कभी टूटने मत दीजियेगा। हर रिश्ता अपने साथ बहुत सारे ज़िम्मेदरिया लाती है और अब आपको भी अपनी हर ज़िम्मेदारी को निभाना है, जैसे आज तक निभाती आई है। आप बहुत अच्छी बेटी और बहन साबित हुई है, अब आपको उतनी ही अच्छी बहु, पत्नी और भाभी बनकर दिखाना है।............ आप समझ रही है न हम आपको क्या समझाने की कोशिश कर रहे है?"

    आकृति जो सर झुकाए खामोशी से उनकी बात सुन रही थी, उसने धीरे से हा मे सर हिला दिया। सुनंदा जी ने आत्मीयता से उसके माथे को चूम लिया फिर ममता जी के तरफ घूमकर अपने हाथ जोड़ते हुए कहा, "अब हमें इज़ाज़त दीजिये समधन जी। शादी संपन्न हो गयी, आजसे आकृति आपकी हुई।"

    ममता जी ने उनके पास आकर उनके हाथ को नीचे कर दिया। उन्होंने आकृति के तरफ निगाहें घुमाई जो सर झुकाए सुबक रही थी, फिर सुनंदा जी को देखकर बोलीं, "आपको कही जाने की ज़रूरत नही है। हम आपसे पहले ही ये बात करना चाहते थे पर शादी की तैयारियों मे वक़्त ही नही मिला।"

    सुनंदा जी ने सवालिया निगाहों से उन्हें देखा। उनके माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई थी। ममता जी ने सहज भाव से आगे कहना शुरु किया, "हम जानते है आकृति के अलावा और कोई नही है। उनके जाने के बाद आप एकदम अकेली हो जाएंगी इसलिए हमने सोचा है कि आकृति के साथ आप भी यहाँ हमारे साथ ही रहे।

    वैसे भी इतने बड़े विला मे गिनती के दो लोग रहते है। उसमे ही अंगद तो काम मे व्यस्त रहते है और हम अकेले रह जाते है। अगर आप यहाँ हमारे साथ रहेंगी तो हमें भी साथी मिल जाएंगी और आकृति को भी आपसे दूर नही होना पड़ेगा। आप यहाँ रहेंगी तो वो निश्चिन्त और खुश हो पाएंगी, वरना उन्हें और हमें हमेशा आपकी चिंता लगी रहेगी।"

    उनकी बात सुनकर सुनंदा जी और ज्यादा परेशान हो गयी। शायद आकृति उनके जवाब को जानती थी, इसलिए उसने सर उठाकर उन्हें देखा तक नही था।

    सुनंदा जी परेशान सी उनकी बात सुनती रही और उनके चुप होते ही बड़ी ही विनम्रता पूर्वक बोलीं, "आपने हमारे बारे मे इतना सोचा ये बहुत बड़ी बात है। हम जानते है आपका दिल बहुत बड़ा है इसलिए आप ऐसा कह रही है। हम क्षमा चाहेंगे पर हम आपके सुझाव को नही मान सकते। ये हमारी बेटी का ससुराल है, हम यहाँ का पानी भी नही पी सकते। इसलिए हमें यहाँ से जाना ही होगा।"

    "आंटी ये आप इक्कीसवीं सदी मे कौनसी सदी की बात लेकर बैठ गयी? ये सब बहुत पुरानी बातें हो गयी है अब इन्हें कोई नही मानता तो आप भी इन बातों को छोड़िये और माँ की बात मानकर यही रुक जाइये।"

    अनु ने ममता जी के सुझाव का सपोर्ट किया। तो नील ने भी उनकी बात से सहमति जताते हुए कहा, "हाँ आंटी जी। आप यही रुक जाइये। इससे न आपको भाभी से दूर जाना पड़ेगा न आपसे दूर होने के गम मे भाभी रोएंगी। आप अगर यहाँ रहेंगी तो अपनी आँखों से अपनी बेटी को खुश देख सकेंगी इससे आप भी निश्चिंत रहेंगी और जब आप भाभी की आँखों के सामने रहेंगी तो भाभी भी चिंता मुक्त होकर यहाँ खुशी से रह सकेंगी।"

    सब एक तरफ हो चुके थे और सुनंदा दी दूसरे पाले मे खड़ी थी। उन्होंने सबको देखा तो सभी आस भरी नज़रों से उन्हें देख रहे थे। अब उन्होंने और भी ज्यादा परेशानी भरे लहज़े मे कहा, "हमें माफ कीजिये पर हम यहाँ नही रुक सकेंगे। हम जानते है ये बातें बहुत पुरानी है पर अगर बड़े बुजुर्गो ने कुछ कहा है तो उसकी कोई न कोई वजह ज़रूर रही होगी, इसलिए हम यहाँ नही रुक सकेंगे।"

    सब थोड़े निराश हुए। उन्होंने कहा, "वैसे भी अगर हम यहाँ रुकते है तो कृति का सारा ध्यान हमारी तरफ रहेगा और वो मन से इन नए रिश्तों को नही निभा पाएंगी। हम नही चाहते कि हमारे वजह से उनके वैवाहिक जीवन मे कोई समस्या उत्पन्न हो। आज तक वो बेटी होने का फ़र्ज़ बखूबी निभाती आई है और अब हम उन्हें पूरी निष्ठा और दिल से इन नई रिश्तों को निभाते देखना चाहते है। हमारा यहाँ से जाना ही बेहतर होगा, इसलिए अब हमें इज़ाज़त दीजिये।"

    ममता जी ने आकृति का उदास चेहरा देखा तो कुछ परेशान होकर बोलीं, "आप अपनी बेटी के ससुराल नही रुक सकती पर अपने बेटे के घर तो रुक सकती है न आप? .......... जैसे शादी के बाद आकृति हमारी बेटी बन गयी, वैसे ही अंगद भी अबसे आपका बेटा है। आपको उनके घर पर रहने मे तो कोई समस्या नही होगी? ............. और रही बात आकृति के ध्यान बँटने का तो आपको भले अपनी बेटी पर भरोसा ना हो पर हमें अपनी बहु पर पूरा विश्वास है कि वो हर रिश्ते को बखूबी संभाल लेंगी, किसी को शिकायत का मौका नही देंगी। इसलिए अब आप यहाँ से कही नही जा रही।"

    सुनदा जी धर्म संकट मे फंस चुकी थी। उनका दिल यहाँ ठहरने की गवाही नही दे रहा था और सबकी बात ठुकराकर वो उनका अनादर भी नही करना चाहती थी। वो चिंतित सी खड़ी रही, कुछ बोल ही न सकी। सबको उनके जवाब का इंतज़ार था। आकृति इतनी देर से खामोश खड़ी सब देख सुन रही थी, शायद वो अपनी माँ की मनोदशा समझ रही थी।

    सुनंदा जी के खामोश रहने पर इतनी देर मे पहली बार उसने अपना मुँह खोला, "रहने दीजिये माँ। मैं जानती हूँ आपका स्वाभिमान आपको यहाँ रहने की इज़ाज़त नही देगा और मैं नही चाहती की आप अपने आत्मसम्मान को ताक पर रखकर यहाँ मेरे साथ रहे।

    आपने हमेशा मुझे इज़्ज़त से सर उठाकर चलना सिखाया है, फिर मैं आपको कोई ऐसा फैसला लेने पर मजबूर कैसे कर सकती हूँ जिससे आपका सर किसी के भी आगे झुके। आप चिंता मत कीजिये मां, मैं आपकी परवरिश और आपके दिये संस्कारों पर कभी आंच नही आने दूँगी।"

    वो बोली, "ये रिश्ता और इससे जुड़े हर रिश्ते, हर ज़िम्मेदारी को पूरे ईमानदारी और निष्ठा से अपनी आखिरी सांस तक निभाऊँगी, पर इस ज़िम्मेदारी के आगे मैं आपके प्रति अपने कर्तव्यों से मुँह भी नही मोड़ सकती। मेरे अलावा आपका कोई नही इसलिए मैं आपका साथ नही छोड़ूंगी। आप घर जाइये माँ, जब भी आपको अपनी बेटी की ज़रूरत महसूस हो बस एक बार मुझे बता दीजियेगा, मैं पहुँच जाऊंगी अपनी माँ के पास।"

    उसने कहा, "मैं वहाँ नही रहूँगी इसका मतलब ये नही कि आप मुझसे अपनी प्रॉब्लम्स छुपाने लगे, अगर आपने ऐसा किया तो मैं आपसे नाराज हो जाऊंगी और फिर आपसे बात नही करूँगी। वादा कीजिये माँ आप मुझे पराया नही करेंगी, अपनी कोई समस्या ये सोचकर मुझसे नही छुपाएंगी की अब मैं आपकी बेटी के साथ इस घर की बहु भी हूँ।

    भले ही आज मुझसे बहुत से नए रिश्ते जुड़े है पर उन सभी रिश्तों से उपर वो रिश्ता है जो मेरे जन्म से भी पहले से जुड़ा था। मैं सबसे पहले आपकी बेटी हूँ, उसके बाद किसी की बहु, पत्नी या भाभी हूँ। इसलिए आज यहाँ से जाने से पहले आपको वादा करना होगा की जब भी कोई समस्या आए या आपको आपकी बेटी कि याद आए, उसकी ज़रूरत महसूस हो तो आप बेझिझक मुझे बताएंगी।"

    आकृति की बातें सुनकर सभी भावुक हो गए थे। एक बार फिर उसने दिखा दिया था कि कितना साफ दिल है उसका, कितना सम्मान करती है वो रिश्तों का।

    सुनंदा जी उसकी बातें सुनकर भावुक हो गयीं। उन्होंने हामी भरते हुए उसको अपने सीने से लगाकर कहा, "हाँ मेरे बच्चे आप हमारी बेटी ही नही, हमारा बेटा भी है। हमारे जीने की वजह है आप। हम वादा करते है कि हम आपसे कभी कुछ नही छुपाएंगे, पर उसके बदले आपको भी वादा करना होगा कि हमसे जुड़े रिश्ते को निभाने के लिए तुम इन नई रिश्तों को नज़रंदाज़ नही करोगी।"

    वो बोलीं, "बेटा जो रिश्ते आज आपसे जुड़े है आपको उन्हें अपने प्यार और समर्पण भाव से इतना मजबूत करना है जितना मजबूत आपका हमसे रिश्ता है। अभी आपको उन रिश्तों पर ज्यादा ध्यान और वक़्त देने कि ज़रूरत है। अभी आपके लिए सब नया होगा तो आपको धैर्य से काम लेना होगा, सबको समझने की कोशिश करनी होगी। हमें शिकायत सुनने का मौका मत दीजियेगा बेटा कि हमारी बेटी को रिश्ते निभाने नही आते, उनका मान करना नही आता।"

    To be continued....

  • 4. The Forced Vows - Chapter 4

    Words: 2051

    Estimated Reading Time: 13 min

    आकृति अपनी आँखे बन्द किये बैठी थी। अनु ने उसके नाक पर लगे सिंदूर के कण को साफ किया। आशीर्वाद लेने की बारी आई, तो आकृति ने अंगद का हाथ पकड़कर पंडित के चरण स्पर्श कराए।

    जहाँ आकृति की इस हरकत से अंगद हैरान था, वही बाकी सब उसकी समझदारी देखकर खुश थे। आकृति ने शादी मे अंगद का साथ देने का वादा किया था, जिसे वो शादी से पहले से ही निभा रही थी।

    नील और अनु दोनों को ममता जी के पास लेकर गए। आकृति ने फिर से अंगद का हाथ पकड़वाकर खुद उनके पैर छुए। ममता जी ने आकृति को गले लगाया और कहा कि उन्हें विश्वास है कि उसने उनके बेटे के लिए सही चुनाव किया है।

    अब दोनों को सुनंदा जी के पास लेकर जाया गया, आकृति ने नम आँखों से उन्हें देखा और झुककर अंगद का हाथ पकड़कर उनके पैर छु लिये।

    सुनंदा जी ने आकृति को समझाया कि अब उसकी एक नई ज़िंदगी शुरू होने जा रही है और उसे अपने नए रिश्तों को समर्पित करना है।

    ममता जी ने सुनंदा जी से आकृति के साथ उनके घर में रहने का आग्रह किया, लेकिन सुनंदा जी ने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। अनु और नील ने भी सुनंदा जी को समझाने की कोशिश की, लेकिन वो अपनी बात पर अड़ी रहीं।

    अंत में, आकृति ने अपनी माँ से कहा कि वह उनके फैसले का सम्मान करती है और उन्हें अपने आत्मसम्मान को ताक पर रखकर उसके साथ रहने की ज़रूरत नहीं है। उसने अपनी माँ से वादा किया कि वह हमेशा उनके लिए मौजूद रहेगी और उन्हें कभी पराया नहीं करेगी। सुनंदा जी ने आकृति को गले लगाया और कहा कि वह हमेशा उनकी बेटी रहेगी।

    Now Next


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    "अभी आपको उन रिश्तों पर ज्यादा ध्यान और वक़्त देने कि ज़रूरत है। अभी आपके लिए सब नया होगा तो आपको धैर्य से काम लेना होगा, सबको समझने की कोशिश करनी होगी। हमें शिकायत सुनने का मौका मत दीजियेगा बेटा कि हमारी बेटी को रिश्ते निभाने नही आते, उनका मान करना नही आता।"

    "मैं ऐसा कभी नही होने दूँगी मां। मैं आपके और पापा के दिये संस्कारों पर कभी एक उंगली भी नही उठने दूँगी।" आकृति उनके गले लगे सिसक पड़ी। सब खामोशी से उन्हें देख रहे थे।

    कुछ देर बाद सुनंदा जी ने आकृति को खुदसे अलग किया फिर ममता जी को देखकर बोलीं, "माफ कीजिये पर हम आपकी बात नही मान सकते। हमारा ज़मीर हमें इसकी इज़ाज़त नही देता। हमें यहाँ से जाना ही होगा। आप सब हमारी चिंता मत कीजिये, बस हमारे जाने के बाद कृति को संभाल लीजियेगा। कभी हमसे दूर रही नही है वो, बहुत नाज़ुक दिल है उनका। हमने अपनी बेटी आपको सौंप दी है, हो सके तो उन्हें कभी हमारी काम महसूस मत होने दीजियेगा।"

    ममता जी ने आगे आकर उन्हें गले लगाते हुए कहा, "आकृति अबसे हमारी ज़िम्मेदारी है। हम उन्हें मां का प्यार देंगे, उनकी हर खुशी का ध्यान रखेंगे। आपने हमपर विश्वास करके अपनी बेटी हमें सौंपी है और हम आपके विश्वास को कभी ठेस नही पहुँचने देंगे।"

    उनकी बात से सुनंदा जी आश्वस्त हो गयी कि उनकी बेटी यहाँ खुश रहेंगी। उन्होंने फिरसे जाने की इज़ाज़त मांगी तो ममता जी ने इंकार करते हुए कहा, "यहाँ रुक नही सकती आप पर कम से कम अपनी बेटी की शादी के बाद वाली रस्में तो देख सकती है? अभी यही रुक जाइये शामको चली जाइयेगा।"

    उनकी बात सुनकर सुनंदा जी ने इंकार करते हुए कहा, "नही समधन जी। हम यहाँ शादी के लिए आए थे। शादी निर्विघ्न संपन्न हो गयी। अब हमारा हमारी बेटी से विदा लेने का वक़्त आ गया है। आप अपने बहु बेटे का स्वागत और बाकी रस्में धूमधाम से कीजिये और हमें इज़ाज़त दीजिये।"

    सुनंदा जी के आगे आखिर ममता जी को ही झुकना पड़ा। एक बार फिर आकृति और अंगद ने उनके पैर छुए। अनु और नील ने भी आदर सहित सर झुकाकर उन्हें नमस्ते किया। सुनंदा जी को गले लगाकर ममता जी ने उनसे विदा किया। जाने से पहले उन्होंने आकृति को अपने सीने से लगा लिया।

    आकृति उनके सीने से लगी फफक कर रो पड़ी। उनकी आँखे भी छलक आई, इतना आसान नही था अपने कलेजे के टुकड़े को खुदसे जुदा करना। उसको रोते बिलखते देख उनका सीना दर्द से फटने लगा था, पर उन्होंने अपने दिल पर पत्थर रखकर अपने सीने से लगे बिलखती कृति को खुदसे दूर कर दिया।

    नील सुनंदा जी को बाहर तक छोड़ने गया और उन्हें गाड़ी मे बिठाकर वहाँ से रवाना कर दिया। कृति आँसुओं से भीगी आँखों से अपनी माँ को खुदसे दूर जाते देखती रही। आँखों से आँसू बह रहे थे। रोना अब सिसकियों मे बदल चुका था, ममता जी ने उसको यूँ बिखरते देखा तो उसे अपने सीने से लगा लिया। ममतव्य का एहसास था उनके स्पर्श मे जिसे पाकर कृति उनसे लिपटकर बच्चों के तरह रो पड़ी।

    अनु जी आँखों मे भी नमी तैर गयी थी। नील जो अभी अभी सुनंदा जी को छोड़कर आया था, आकृति को यूँ रोता देख वो भी भावुक हो गया था। पर अंगद अब पत्थर के तरफ भावहीन सा वहाँ मौजूद था।

    वो दिखा नही रहा था, पर आकृति के आँखों से बहते आँसू, उसकी सिसकियों की आवाज़ कही न कही उसे भी बेचैन कर रही थी। अब ऐसा क्यों था ये वो भी नही जानता और इस बिन बुलाए एहसासों के वजह से उसको चिढ़ महसूस होने लगी थी। अपनी भावनाओं को समझ ना पाने के वजह से उसको खींझ महसूस होने लगी थी।

    उसने ममता जी से लिपटकर रोती आकृति को देखा और खींझते हुए बोला, "जब दूर होने से इतनी ही तकलीफ हो ररही है तो शादी की ही क्यों थी? किसी ने सर पर बंदूक रखकर तो शादी के लिए मजबूर नही किया था। प............."

    अंगद की बात सुनकर सभी हैरानी से उसे देखने लगे थे। आकृति भी उसकी बेरुखी भरी बातें सुनकर अचंभित सी उसको देख रही थी।

    अंगद आगे कुछ कह पाता उससे पहले ही ममता जी जो उसकी बात सुनकर अब तक हैरानी से उसे देख रही थी, उन्होंने उसकी आगे की बात को समझते हुए उसकी बात काटते हुए गुस्से मे कहा, "अंगद............"

    उनके गुस्से से पुकारने पर अंगद खामोश हो गया और धीरे से बुदबूदाया, "आपके गुस्सा करने या चिल्लाने से सच बदल नही जाएगा। मुझ जैसे लड़के से शादी करने की पैसों के अलावा और कोई वजह हो ही नही सकती। ये रोना धोना सब नाटक है ताकि आपको अपने जाल मे फंसा सके पर इन सबका अंगद राणा पर कोई असर नही होगा।"

    वो अपने ही सोच मे गुम था तभी ममता जी की आवाज़ ने उसका ध्यान अपनी तरफ खींचा, "अंगद आज आपने जो बोल लिया सो बोल लिया पर ध्यान रहे आगे हम आकृति के प्रति आपकी कोई बतदमिज़ी बर्दाश नही करेंगे। वो अब इस घर की बहु और आपकी पत्नी है। उनकी इज़्ज़त आपकी इज़्ज़त से जुड़ी है, अगर आपने उनके मान सम्मान को ठेस पहुँचाने की कोशिश भी की तो हम भूल जाएंगे कि आप हमारे अपने बेटे है।"

    उनकी बात सुनकर अंगद ने अविश्वास भरी निगाहों से उन्हें देखते हुए सवाल किया, "आप दो दिन पहले आई इस मामूली सी लड़की के लिए अपने बेटे को धमकी दे रही है?"

    "धमकी नही दे रहे। आपको आगाह कर रहे है कि आकृति अब इस घर की बहु और आपकी पत्नी है तो आगे से उनसे कुछ भी कहने से पहले इस बात का ध्यान रखे। आकृति को हमने अपनी ज़िम्मेदारी पर इस रिश्ते मे बांधा है इसलिए उनके सम्मान की रक्षा करने के लिए अगर हमें अपने बेटे के खिलाफ भी जाना पड़े तो हम पीछे नही हटेंगे।"

    उन्होंने अपना फैसला उसे सुना दिया, जिसे सुनकर अंगद ने नफरत भरी निगाहों से आकृति को एक नजर देखा और फिर उसपर से निगाहें फेर ली। आकृति तो स्तब्ध सी खड़ी सब देख सुन रही थी।

    अंगद के बर्ताव और ममता जी की बातों से उसको ये भलीभाँति समझ आ चुका था कि शादी अंगद की मर्ज़ी के खिलाफ हुई है और अब उसको अपने पति के विश्वास और प्यार को पाने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़नी है जो बिल्कुल भी आसान नही होने वाली, क्योंकि किसी के दिल मे जगह बनाना फिर भी आसान है पर किसी के मन से अपने लिए बदगुमानी को निकालकर उसको खुदपर विश्वास करवाना बेहद मुश्किल काम है।

    ये नया रिश्ता एक नई चुनौती बनकर आया है उसकी ज़िंदगी मे जिसका सामना करने और उससे जीतने के अलावा और कोई रास्ता नही है उसके पास। किस्मत एक बार फिर उसकी परीक्षा लेने की तैयारी कर चुकी है। सुकून के पल शायद उसे अभी नसीब नही होंगे। ये सब सोचते हुए उसकी आँखों मे नमी तैर गयी तो उसने अपनी पलकें झुका ली।

    ममता जी के कहने पर अनु और नील दोनों को घर के चौखट के बाहर लेकर चले गए। अनु और नील वापिस अंदर चली आई। कुछ देर बाद वो दोनों ममता जी के साथ वहाँ आए।

    ममता जी ने दोनों की नजर उतारकर उनकी आरती उतारी, तिलक लगाकर उनका स्वागत किया। अनु ने चावल से भरा कलश आकृति के पैर के आगे रख दिया और नील ने उसके ठीक सामने आलते की थाल रख दी। दोनों ने मिलकर एक सफेद कपड़ा थाल के आगे बिछा दिया।

    ममता जी ने बड़े प्यार से आकृति को दाएं पैर से कलश गिराकर अपना पहला कदम इस घर मे रखने को कहा तो आकृति ने वैसा ही किया। कलश को अपने दाएं पैर से हल्का सा धक्का देकर अंदर के तरफ गिराकर उसने अपने नए घर मे गृह प्रवेश किया। उसके बाद कुमकुम की थाल मे अपने पैर डालकर उस सफेद कपड़े पर अपने कदमों की छाप छोड़ते हुए आगे बढ़ गयी। बेमन से ही सही पर अंगद ने भी उसके साथ गृह प्रवेश किया।

    अंदर आने के बाद ममता की दोनों को लेकर दूसरे तरफ चली आई, जहाँ सुंदर सा मंदिर था। फूलों से सजा और वहाँ लगी लाइटों से झिलमिलाता वो मंदिर बहुत सुंदर लग रहा था। अंदर महादेव की बड़ी सी मूर्ति रखी हुई थी। दोनों ने आकर उनका आशीर्वाद लिया, उसके बाद वही पास मे लगी एक तस्वीर के आगे आकर सभी रुक गए।

    ये अभिजित जी की जवानी की तस्वीर थी, जब वो अंगद की उम्र के थे और दोनों बाप बेटों की शकल काफी हद तक मिलती थी। ममता जी ने आकृति को उनके बारे मे बताया और अपने आने वाले जीवन के सुखमय होने के लिए अपने ससुर से आशीर्वाद लेने को कहा ताकि उनके रिश्ते पर उनका आशीर्वाद भी बना रहे।

    आकृति ने उनके आगे रखे दिये को जला दिया फिर अपने हाथ उनके आगे जोड़ते हुए आँखे बन्द कर ली। पहले तो ममता जी हैरान हुई फिर मुस्कुरा दी। आकृति को ये सब आता था क्योंकि अपने घर पर वही रोज़ सुबह शाम अपने पापा और भाई की तस्वीर के आगे दिया प्रजवलित करती थी।

    दोनों ने उनका आशीर्वाद लिया फिर उन्हें हॉल मे लाया गया। शादी के बाद की रस्में शुरु हुई जिसमे अंगद की मर्ज़ी न होते हुए भी हिस्सा लेना पड़ा। इन्ही सब मे दोपहर से उपर का वक़्त हो गया। शादी की तैयारियों और फिर सुबह से काम के वजह से सभी थक चुके थे। उन्होंने अभी तक कुछ खाया भी नही था तो सब रस्म होने के बाद ममता जी ने अनु को आकृति को अपने रूम मे लेकर जाने को कह दिया। नील भी अंगद को लेकर उसके कमरे मे चला गया और ममता जी किचन के तरफ बढ़ गयी।

    कुछ देर बाद दोनों कमरों मे सवेंट खाना लेकर चले गए। आकृति खामोश सी बेड पर बैठी हुई थी। उपर से वो जितना खामोश और शांत लग रही थी, उसके मन मे उतना ही भयंकर तूफान उठ रहा था, कुछ देर पहले अंगद की कही बातें उसके कानों मे गूंज रही थी और आँखों के सामने शादी का एक एक पल और अंगद के भाव घूम रहे थे।

    वो जानती थी कि इस बेमेल के रिश्ते को निभाना आसान नही होगा पर उसने सपने मे भी नही सोचा था कि इस शादी मे अंगद की मर्ज़ी शामिल नही होगी। उसने इस बात की कल्पना भी नही की थी कि इस शादी मे उसको, न पत्नी का हक मिलेगा और न ही वो इज़्ज़त मिलेगी जो उसको मिलनी चाहिए थी। उसको अपने हक के लिए अपने ही पति से लड़ना होगा। उसके दिल मे अपने लिए जगह बनानी होगी वो भी तब जब वो शायद उससे नफरत करता है और वो इस नफरत की वजह भी नही जानती थी।

    To be continued....

  • 5. The Forced Vows - Chapter 5

    Words: 2135

    Estimated Reading Time: 13 min

    कुछ देर बाद दोनों कमरों मे सवेंट खाना लेकर चले गए। आकृति खामोश सी बेड पर बैठी हुई थी। उपर से वो जितना खामोश और शांत लग रही थी, उसके मन मे उतना ही भयंकर तूफान मचा हुआ था, कुछ देर पहले अंगद की कही बातें उसके कानों मे गूंज रही थी। और आँखों के सामने शादी का एक एक पल और अंगद के भाव घूम रहे थे।

    वो जानती थी कि इस बेमेल के रिश्ते को निभाना आसान नही होगा पर उसने सपने मे भी नही सोचा था कि इस शादी मे अंगद की मर्ज़ी शामिल नही होगी। उसने इस बात की कल्पना भी नही की थी इस शादी मे उसे, न पत्नी का हक मिलेगा और न ही वो इज़्ज़त मिलेगी जो उसको मिलनी चाहिए थी। उसको अपने हक के लिए और किसी से नही बल्कि अपने ही पति से लड़ना होगा। उसके दिल मे अपने लिए जगह बनानी होगी, वो भी तब जब वो शायद उससे नफरत करता है और वो इस नफरत की वजह भी नही जानती थी।

    आकृति इन्ही सब ख्यालों मे खोई हुई थी जब अचानक ही उसको अपनी हथेली पर किसी का स्पर्श महसूस हुआ और वो चौंक कर अपने ख्याल से बाहर आई। उसने घबराकर निगाहें उठाकर देखा तो सामने बैठी अनु उसको परेशान निगाहों से देख रही थी।

    "भाभी आप ठीक है? मतलब आप काफी परेशान लग रही है मैं इतनी देर से आपको बुला रही हूँ पर आप जाने कहा गुम है।"

    अनु का सवाल सुनकर आकृति ने अपने भाव नॉर्मल करते हुए धीमी आवाज़ मे कहा, "नही वो बस माँ के बारे मे सोच रही थी।"

    आकृति ने बात का रुख मोड दिया। उसकी बात सुनकर अनु ने उसके सामने खाने की ट्रे रखते हुए कहा, "भाभी आंटी ठीक होंगी आप चिंता मत कीजिये। माँ ने खाना भेजा है, आपने सुबह से कुछ खाया नही है चलिए अब थोड़ा सा खा लीजिये।"

    आकृति का मन नही था पर उसने कुछ कहा नही। अनु भी उसके साथ खाने बैठ गयी थी। आकृति ने बेमन से कुछ निवाले खाए फिर पेट भर गया कहकर साइड हो गयी।

    अनु ने भी उसको फोर्स करना ठीक नही समझा क्योंकि वो जानती थी कि आकृति सुनंदा जी से दूर होने के वजह से इस वक़्त उदास थी।

    आकृति बेड के क्राउन से सर टिकाकर बैठ गयी। अनु ने खाना खाया फिर सवेंट को बुलाकर ट्रे वापिस भेज दी और आकृति के पास आकर बैठ गयी।

    दूसरे तरफ अंगद अपने रूम मे जाकर चेंज करने जाने लगा पर नील ने उसको रोक दिया। अंगद ने उसको घूरकर देखा तो नील उसके पास बैठ गया और शांति से उसको समझाते हुए बोला,

    "देख अंगद मैं जानता हूँ जो प्राची ने तेरे साथ किया उसके वजह से अब तुझे प्यार, शादी जैसे शब्दों से नफरत हो चुकी है पर यार दुनिया मे सारी लड़कियाँ प्राची जैसे मौकापरस्त नही होती है। सबके लिए पैसा और लूक्स ही सब नही होते है। सब सिर्फ सामने वाले के शरीर उसकी तागत से प्यार नही करती बल्कि दुनिया मे कुछ ऐसी लड़कियाँ भी मौजूद है जिनका दिल एक बच्चे के तरह साफ होता है।"

    वो आगे बोला, "जो किसी की खूबियों से नही उसकी कमियों से प्यार करती है। जो ये नही देखती की सामने वाले मे क्या कमी है वो ये देखती है कि उस कमी के बावजूद उस इंसान मे ऐसी कौन सी खूबी है जो उसे औरों से अलग बनाती है। और भाभी उन्ही मे से एक है। उन्होंने तेरी कमी देखकर तुझे ठुकराया नही है बल्कि तेरी इस कमी के साथ तुझे अपनाया है।

    तू बेवजह प्राची के किये गुनाह की सज़ा उन्हें दे रहा है। वो उसके जैसी बिल्कुल नही है। उनकी सच्चाई उनकी आँखों मे नजर आती है। बहुत ही साफ दिल है उनका जिसमे सबसे लिए प्यार, मोहब्बत और सम्मान है अगर तूने अपने गुस्से मे उनके साथ गलत किया तो आगे जाकर बहुत पछताएगा।

    तू भले ही शादी नही करना चाहता था पर अब तेरी शादी हो चुकी है उनसे, वो पत्नी है तेरी और अब उनका हक है तुझपर। और कुछ नही दे सकता उन्हें तो कम से कम उन्हें वो इज़्ज़त दे दे जिसपर उनका हक है।"

    नील ने पल भर रुकते हुए आगे कहा, "तू बिना उन्हें जाने और समझे उनके बारे मे गलत धारणा बना रहा है जो सरासर गलत है। उन्हें बेवजह अपने गुस्से और नाराज़गी का शिकार बना रहा है जबकि उनकी तो कही कोई गलती है ही नही। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि तु जैसा उन्हें समझ रहा है वो वैसी नही है।

    भाभी वो लड़की है जो हर सिचुएशन मे बिना अपना फ़ायदा और नुकसान की परवाह किये तेरी हिम्मत बनकर हर कदम पर तेरा साथ देंगी। उनसे बेहतर हमसफर तुझे कोई दूसरा नही मिलेगा। बहुत मानता है न तु महादेव को तो सोच न उन्होंने क्यों प्राची से तेरा रिश्ता तोड़कर तेरा नाम भाभी के साथ जोड़ दिया?

    अगर भाभी तेरे लिए सही नही होती तो महादेव कभी तेरा रिश्ता उनसे नही जोड़ते, और किसी पर नही तो महादेव पर विश्वास करके भाभी को एक मौका दे। उन्हें समझने की कोशिश की, जान उन्हें और उन्हें भी मौका दे तेरे दिल तक पहुँचने का।

    ये हक है उनका अपनी तकलीफ मे खोकर उन्हें वो दर्द मत दे जो आगे चलकर तुझे उनसे कही गुना ज्यादा तकलीफ दे। क्योंकि आज नही तो कल भाभी तेरी सोच को गलत साबित कर ही देंगी, वो तेरे दिल मे वो जगह बनाएंगी जो कभी प्राची भी नही बना सकी और उस वक़्त तुझे खुदपर गुस्सा आएगा। आज तुझे अपनी गलती का भले एहसास न हो पर तब तुझे नफरत होगी खुदसे लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।

    Please एक मौका दे खुदको इस रिश्ते को और भाभी के लिए, शायद महादेव ने कुछ अच्छा ही सोचा ही तेरे लिए। तो उनपर विश्वास करके भाभी को एक मौका दे खुदको साबित करने का।"

    उसकी बात अंगद ने खामोशी से सुनी और उसके चुप होते ही उसने गंभीरता से कहा, "मतलब मैं जो उस लड़की के बारे मे सोच रहा हूँ वो गलत है, तो ठीक है हूँ। मैं गलत हूँ, सबको गलत समझता हूँ क्योंकि मैं खुद गंदा हूँ। पर तुम तो बहुत अच्छे हो न? तो बताओ मुझे कि अगर वो पैसों के लालच मे इस शादी के लिए तैयार नही हुई है तो और ऐसी कौनसी वजह है जिसने उसको एक ऐसे लड़के से शादी करने पर मजबूर कर दिया जो अपने पैरों पर खड़ा तक नही हो सकता।

    जिसको खुद अपने काम के लिए दूसरों के सहारे की ज़रूरत पड़ती है जो दूसरों पर हर चीज़ के लिए निर्भर। उसे ही क्यों उसने अपने पति के रूप मे चुना जबकि मैं न तो उसकी सुरक्षा कर सकता हूँ और न ही उसको एक पति होने का सुख दे सकता हूँ। मैं आम पति के तरह उसके लिए कुछ नही कर सकता फिर उसने मुझे ही क्यों चुना?"

    उसका सवाल सुनकर नील ने भी गंभीरता से जवाब दिया, "तेरे इस सवाल का जवाब भाभी बेहतर तरीके से दे सकती है और इस सवाल का जवाब लेने के लिए तुझे उनके दिल मे इतनी जगह बनानी होगी कि वो बेझिझक अपने दिल की बात तुझे बता सके।

    मैं नही जानता कि भाभी ने ये फैसला क्यों लिया? पर मैं इतना ज़रूर जानता हूँ कि तू आकाश मे चमकता वो चाँद है। जिसे देख तो सब सकते है पर उसपर हक सिर्फ उसकी चाँदनी का है। देखने वाले लोग उस चाँद मे भी दाग ढूंढ लेते है वही कुछ लोग ऐसे भी होते है जो चाँद मे अपना सुकून ढूंढ लेते है क्योंकि वो जानते है कि कमियां सबमे होती है और हमें उन कमियों को पकड़कर किसी को जज नही करना चाहिए।"

    नील ने आगे कहा, "तेरी कमी तो दूर हो सकती है फिर तू अपने लिए इतना नैगेटिव क्यों सोचता है? तुझमे कोई कमी नही है यार, जैसे तू लकी है की भाभी जैसी हमसफर तुझे मिली है। वैसे ही भाभी भी लकी है जो उन्हें जीवनसाथी के रूप मे तु मिला है।

    मुझे नही लगता की भाभी ने तुझसे शादी तेरे पैसों के लिए की होगी क्योंकि अगर ऐसा होता तो वो खुद अपनी माँ को यहाँ से जाने को नही कहती। शादी की शॉपिंग मे भी उन्होंने कुछ पसन्द नही किया था क्योंकि वो उन महंगी चीजों के साथ कम्फरटेबल नही थी। उनके लिए कपड़े लोकल मार्केट से लिए गए है, अगर वो पैसों के लिए ही सब कर रही होती तो ये मौका अपने हाथ से जाने नही देती, जमके तेरे पैसे उड़ाती पर उन्होंने ऐसा नही किया।

    अब तू कहेगा कि उन्होंने जानबूझ कर ये किया होगा ताकि हमें अपने जाल मे फंसाकर अपनी मासूमियत पर विश्वास करवा सके तो मेरे यार, इंसान की पहचान है मुझे और मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की भाभी बिल्कुल वैसी नही है जैसा तु उन्हें समझने की भूल कर रहा है।

    वो और लोगों के तरह दो चेहरे लेकर नही घूमती। उनके दिल मे क्या है ये उनके चेहरे पर झलकता है बस एक बार अपनी आँखों पर लगाई नफरत और गहतफहमी कि पट्टी को हटाकर उन्हें देख, तू खुद समझ जाएगा कि भाभी क्या है?

    भाभी किसी मतलब के लिए तेरे साथ नही है, अगर तेरे पास ये पैसे ना भी रहे, महादेव ना करे अगर सारी उम्र भी तू अपने पैरो पर खड़ा नही हो पाता, उन्हें प्यार नही भी देता तब भी वो खामोशी से सारी उम्र तेरा साथ निभाएंगी वो भी बदले मे बिना किसी चीज़ के उम्मीद के।

    अगर अब भी तुझे लगता है कि भाभी ने तुझसे रिश्ता तेरे पैसों के लिए जोड़ा है तो परख ले उन्हें, देखना वो तेरी सोच को गलत साबित कर देंगी।"

    नील अब खामोश हो गया। इतने मे रूम का डोर नॉक हुआ। सामने सवेंट हाथ मे खाने कि ट्रे लिए खड़ा था। नील खाना लेकर नील के पास चला आया। दोनों के बीच अब कोई बात नही हुई। उन्होंने खामोशी से डिनर किया फिर नील ने अंगद को आराम करने के लिए बगल वाले रूम मे छोड़ दिया। अंगद सब जानते हुए भी खामोश रहा।

    शाम से रात हो चुकी थी, थकान और चिंता के वजह से आकृति की आँख लग गयी थी। उसके सोने के कुछ देर बाद ही अनु वहाँ से गायब हो गयी थी। आकृति अब भी सो रही थी। ममता जी ने रूम मे कदम रखा तो आकृति को बैठे बैठे सोते देख मुस्कुरा उठी।

    वो उसके पास आकर बैठ गयी और प्यार से उसके सर पर हाथ फेरा तो उनके ममतामयी स्पर्श को महसूस करते हुए आकृति उनके सीने से किसी छोटे बच्चे की तरह लिपट गयी, अगले ही पल उसके अंकोंसियस दिमाग मे उसकी शादी फिर सुनंदा जी के जाने का। उसके इस रूम मे आने का सीन घूम गया और उसने झटके से आँखे खोली फिर सामने ममता जी को देख धीमी आवाज़ बोली घबराकर बोली, "सॉरी आंटी वो मैंने ध्यान नही दिया गलती से आँख लग गयी।"

    उसकी बात सुनकर ममता जी के भाव बदल गए उन्होंने हल्के से उसके गाल पर हल्के से थप्पड़ मारते हुए नाराज़गी से कहा, "अभी आप हमसे पिटाई खाएंगी। माँ है हम आपकी और आप हमें आंटी कह रही है।"

    आकृति को एहसास हुआ कि उसने हड़बड़ाहट मे क्या कह दिया तो उसने अपना सर झुकाते हुए कहा, "सॉरी माँ वो बेख्याली मे निकल गया।"

    आकृति ने अपना सर झुका लिया था। उसका उदास मुरझाया चेहरा देखकर ममता जी प्यार से उसके गाल को छूकर कहा, "बेटा हमने आपको बहु नहीं अपनी बेटी माना है और हम पूरी कोशिश करेंगे कि आपकी मां बन सकें। हम जानते है नई जगह, नए लोग आपको असहज महसूस हो रहा होगा पर बेटा अबसे ये भी आपका अपना ही परिवार है।"

    उन्होंने आगे कहा, "आपको किसी बात के लिए परेशान होने की ज़रूरत नही है यहाँ कोई आपको कुछ नही कहेगा,जैसे आप अपने घर मे रहती थी वैसे ही यहाँ रहिये। जैसे हम अंगद और अनु की माँ के वैसे ही अबसे आप भी हमारी बेटी है और हमें बेहद खुशी होगी अगर आप भी इस घर और इस परिवार को खुले दिल से अपना ले। इस घर को अपना ससुराल और हमें अपनी सास न समझकर, माँ समझे हमें अपनी और इस घर को अपना घर।"

    "जी माँ" आकृति ने सर झुकाए हुए ही छोटा सा जवाब दिया। ममता जी कुछ देर खामोश रही फिर उन्होंने आकृति की हथेली को अपनी हथेलियों मे थामते हुए कहा, "बेटा हम आपसे एक बहुत ज़रूरी बात करने आए थे।"

    वो इतना कहकर चुप हो गयी। आकृति ने निगाहें उठाकर उन्हें देखा तो वो कुछ परेशान लग रही थी। उनके माथे पर चिंता की लकीरें देखकर आकृति ने उनकी हथेली को कसके थामते हुए कहा, "माँ आपको जो भी कहना है बेझिझक कहिये मैं सुन रही हूँ। आपने मुझे अपनी बेटी कहा फिर बेटी से कुछ बात करने के लिए माँ को कबसे इतने सोचने की ज़रूरत पड़ने लगी?"

    To be continued....

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  • 6. The Forced Vows - Chapter 6

    Words: 2146

    Estimated Reading Time: 13 min

    "जी माँ" आकृति ने सर झुकाए हुए ही छोटा सा जवाब दिया। ममता जी कुछ देर खामोश रही फिर उन्होंने आकृति की हथेली को अपनी हथेलियों मे थामते हुए कहा, "बेटा हम आपसे एक बहुत ज़रूरी बात करने आए थे।"

    वो इतना कहकर चुप हो गयी। आकृति ने निगाहें उठाकर उन्हें देखा तो वो कुछ परेशान लग रही थी। उनके माथे पर चिंता की लकीरें देखकर आकृति ने उनकी हथेली को कसके थामते हुए कहा, "माँ आपको जो भी कहना है बेझिझक कहिये मैं सुन रही हूँ। आपने मुझे अपनी बेटी कहा फिर बेटी से कुछ बात करने के लिए माँ को कबसे इतने सोचने की ज़रूरत पड़ने लगी?"

    उसकी बात सुनकर उनकी चिंता कुछ कम हुई और उन्होंने बोलना शुरू किया, "बेटा हम यहाँ आपसे अंगद के बारे मे बात करने, उनके व्यवहार के लिए आपसे माफी मांगने आए है।"

    अंगद का ज़िक्र होते ही आकृति कुछ परेशान हो गयी। ममता जी ने आगे कहना जारी किया, "बेटा हम जानते है उन्होंने नीचे जिस तरह से आपसे बात की उससे आपको गहरा आघात पहुँचा होगा। उनके तरफ से हम आपसे माफी मांगते है।"

    ममता जी ने उसके आगे जैसे ही हाथ जोड़ने चाहे आकृति ने तुरंत उनके हाथ को नीचे कर दिया।

    "नही मां आप मुझसे बड़ी है। आपको मुझसे माफी मांगने की ज़रूरत नही है। मुझे उनकी बात का बिल्कुल बुरा नही लगा, आप माफ़ी मांगकर मुझे शर्मिंदा मत कीजिये।"

    ममता जी ने उससे अपना हाथ छुड़ाते हुए आगे कहा, "नही बेटा, हमारे बेटे ने जिस तरह से आपसे बात कि वो गलत था और उनकी गलती की माफी उनकी माँ होने के नाते हमें ही मांगनी होगी क्योंकि अभी उन्हें एहसास नही है कि उन्होंने क्या गलत किया है।

    आप उनकी पत्नी है उन्हें कोई हक नही आपसे ऐसे बात करने का पर इस वक़्त उनके लिए ये रिश्ता एक समझौते से ज्यादा कुछ भी नही है और ये समझौता उन्होंने हमारी खुशी के लिए किया है।"

    वो बोली, "इस वक़्त हम आपको ज्यादा कुछ तो नही बता सकते पर इतना ज़रूर कहना चाहेंगे कि अंगद बिल्कुल अपने नाम के मतलब को सार्थक करते है पर वो बाहर से जितने सख्त है अंदर से उससे कही गुना ज्यादा कोमल है। रिश्तों की उनकी नज़रों मे बहुत एहमियत है। वो खुदको जैसा दिखा रहे है असल मे वैसे नही है, वक़्त और हालात ने उन्हें वैसा बना दिया है और जब आप उनके साथ रहेंगी तो धीरे धीरे उन्हें समझने लगेंगी फिर आपको खुद एहसास होगा कि अंगद से बेहतर इंसान और जीवनसाथी शायद ही कोई हो।"

    उनका समझाना जारी था, "वो जब रिश्ते को दिल मे जगह देते है तो उनके लिए खुशी खुशी अपनी जान भी न्यौछावर कर देते है। अभी वो इस रिश्ते को नही मानते, शादी और प्यार जैसे रिश्ते पर से उनके विश्वास को बड़ी ही बेदर्दी से तोड़ा गया है और हमें पूरा विश्वास है की आप उन्हें फिरसे शादी पर विश्वास करना सिखा देंगी। आप बस जैसी है वैसी ही रहिये उनके साथ फिर देखियेगा कैसे वो फिरसे मोहोब्बत करने पर विवश होते है।

    आप दोनों को अभी एक दूसरे को समझने और धैर्य से काम लेने की ज़रूरत है। वो आपको समझेंगे, आप उन्हें समझेंगी तो ये रिश्ता मजबूत होगा और आपसी समझ से आप इसे सरलता से निभा पाएंगी।

    हम जानते है आप अब कभी अंगद का साथ नही छोड़ेंगी फिर भी हम आपसे कहना चाहते है कि अंगद कितना ही कहे पर उनसे दूर मत जाइयेगा, इस रिश्ते को दिल से निभाइये, धीरे धीरे वो भी बंध जाएंगे इस बंधन मे आपके साथ। बस आपको पूरी निष्ठा से इस रिश्ते को निभाना है और धैर्य से काम लेना है।

    हम आपके हर कदम पर आपके साथ रहेंगे पर अपने पति के दिल मे जगह बनाने के लिए कोशिश आपको करनी होगी, आप समझ रही है न हम क्या कहना चाह रहे है?"

    आकृति जो बड़े ध्यान से उनकी कही हर बात को सुन रही थी उसने उनके सवाल पर हाँ मे सर हिलाते हुए कहा, "जी माँ, मैं आपकी बात समझ रही हूँ और आप चिंता मत कीजिये, मेरे जीतेजी मैं इस रिश्ते को कभी टूटने नही दूँगी। मुझे नही पता कि क्यों वो मुझसे खफ़ा है जबकि हम तो आजसे पहले मिले भी नही पर मैं आपसे वादा करती हूँ कि मैं उनकी नाराज़गी को दूर कर दूँगी, वो भी दिल से इस रिश्ते को अपनाएंगे, मैं पूरी कोशिश करूँगी उनके मन मे अपने और इस रिश्ते के लिए जगह बनाने की। आपने जिस विश्वास से मुझे उनकी ज़िंदगी मे शामिल किया है मैं उसे कभी टूटने नही दूँगी और अपनी आखिरी सांस तक जीवन के हर उतार चढ़ाव मे उनकी हिम्मत बनकर उनके साथ खड़ी रहूँगी।"

    आकृति की बात से ममता जी पूरी तरह से संतुष्ट और अंगद को लेकर निश्चिंत हो गयी। उन्होंने प्यार से उसके माथे को चूमते हुए कहा, "जीती रहो मेरी बच्ची। महादेव आपको लंबी आयु दे और ये कुमकुम सदैव यूँही आपकी मांग की शोभा बढ़ाती रही।"

    उन्होंने उसके सर पर हाथ फेरते हुए उसको आशीर्वाद दिया फिर आराम करने का कहकर वहाँ से चली गयी। उनके जाते ही अनु वहाँ आ गयी और उसके मेकअप ड्रेस वगैरह को ठीक करने लगी।

    दूसरी तरफ यहाँ से निकलने के बाद ममता जी उस रूम मे गयी जहाँ इस वक़्त अंगद बेड पर आँखे बन्द किये बैठा था। रूम के दरवाजे के खुलने की आवाज़ सुनकर अंगद ने अपनी आँखे खोली तो सामने ममता जी का नाराज़गी भरा चेहरा आ गया।

    अंगद ने कुछ नही कहा बस निगाहें फेर ली। ममता जी उसके पास आकर बैठ गयी और उसके चेहरे को देखते हुए बोली, "हम जानते है आप अभी हमसे नाराज़ है क्योंकि हमने आपको ये शादी करने के लिए मजबूर किया पर आपने हमारे पास कोई और रास्ता छोड़ा भी तो नही था। हम पिछले छः महीने से आपको घुट घुटकर जीते देख रहे है। खुद सोचिये आप, हम मां है आपकी, अपने बेटे को यूँ पल पल जिंदगी से हार मानते हम कैसे देख सकते थे?"

    ममता जी बोली, "हमने भी कभी नही सोचा था कि आपको यूँ शादी के लिए मजबूर करेंगे पर आप सीधे से हमारी बात मानने को तैयार ही नही थे। एक प्राची ने आपका दिल क्या तोड़ा आपने दुनिया की हर लड़की को धोखेबाज समझ लिया। अपने दिल के दरवाजे हमेशा के लिए बन्द कर दिये ताकि दोबारा कोई वहाँ अपनी जगह ना बना सके पर बेटा अगर तालाब की एक मछली गंदी है इसका मतलब ये तो नही की हम हर मछली को घिन भरी निगाहों से देखे।"

    आपने बिना आकृति को जाने, उन्हें समझे पहले ही अपने मन मे धारणा बना ली है कि उन्हें बस आपके पैसों से मतलब है पर बेटा आकृति ऐसी नही है। हमने बहुत सोच समझने और उन्हें अच्छे से परखने के बाद उन्हें आपके लिए चुना है।

    हम माँ है आपकी, किसी भी गलत लड़की को आपकी ज़िंदगी मे लाकर हम अपने बेटे की ज़िंदगी बर्बाद नही करना चाहेंगे। आकृति मे हमें वो सभी गुण नजर आए है जो एक लड़की मे होने चाहिए तब जाकर वो किसी भी रिश्ते को निभा पाती है।

    पहली नजर मे हमें आपके लिए पसन्द आ गयी थी पर हमने उनकी परीक्षा ली ये देखने के लिए कि वो सही मायनों मे आपकी हमसफर बनने के काबिल है या नही और उन्होंने हर कदम पर ये साबित किया है कि अगर दुनिया मे कोई है जो आपके लिए बनी है तो वो वही है।

    आप दोनों एक दूसरे के पूरक है और आगे चलकर आप दोनों एक दूसरे को संपूर्ण करेंगे। हम ये नही कहते कि उनमे कोई कमी नही होगी, कमी हर इंसान मे होती है उनमे भी होगी पर जैसे उन्होंने आपकी कमी को नही आपकी खूबियों को देखा है वैसे ही आपको भी उनकी खूबियों को देखने की कोशिश करनी है।"

    वो रुकी फिर गंभीरता से बोली, "बेटा भले ही इस शादी मे आपकी मर्ज़ी नही थी पर अब आपका नाता जुड़ चुका है उनसे, वो अर्धांगिनी है आपकी मतलब समझते है इसका? आजसे वो आपका अभिन्न अंग है, उनके बिना अब आप अधूरे है बिल्कुल वैसे जैसे माता पार्वती के बिना महादेव अधूरे थे।

    अबसे वो आपकी सुख दुख की बराबर ही हिस्सेदार है आपके प्रेम पर, आपके जीवन पर उनका हक है। हम जानते है एक पल मे किसी को अपने दिल मे जगह देना आसान नही है वो भी तब जब आपके दिल मे आज भी प्राची बसी है पर बेटा वो आपका गुजरा हुआ कल थी और आकृति आपका आज और आने वाला कल है।

    वो आपकी पत्नी है तो भले अभी आप उन्हें वो प्यार न दे सके पर कम से कम उन्हें वो सम्मान तो दीजिये जिसकी हकदार है वो। एक बार अपनी माँ पर विश्वास करके अपने दिमाग मे बनाई उन धारणाओं को भुलाकर उन्हें खुले दिल से अपनाने की, उन्हें समझने की कोशिश कीजिये।

    वो बच्ची इतनी प्यारी है कि आप कब उनसे प्रेम करने लगेंगे, कब वो आपके दिल पर अपना एकाधिकार कर लेंगी आपको एहसास भी नही होगा।

    बेटा जब कोई इंसान आसमान की बुलंदियों पर होता है न तो बहुत से लोग उसके आस पास घूमते है पर जब वही शक्स ज़मीन की खाक छानता है न तो वो लोग जो कभी उससे प्यार का दावा किया करते थे उसके हितैषी बना करते थे, वो सबसे पहले उस इंसान से दूर चले जाते है और ये आपने खुद देखा है।

    उस वक़्त जब आप मुश्किल मे होते है आपका खुदपर से विश्वास उठने लगता है, ज़िंदगी से हार मानने लगते है तब जो शक्स आगे आकर हमपर विश्वास जताता है, हमें सहारा देकर फिरसे खड़े होने की, ज़िंदगी से लड़ने की और फिरसे आकाश की उन बुलंदियों को छूने का हौसला देता है वही इंसान हमारा सच्चा साथी होता है।

    आप खुद जानते है कि इस वक़्त आप खुदसे और ज़िंदगी से हार चुके है, ऐसे वक़्त मे आकृति ने आकर आपका हाथ थामा है इसलिए अपने अतीत की कड़वी यादों के वजह से उस मासूम का दिल मत दुखाइयेगा। बहुत प्यारी बच्ची है, हमने अपनी ज़िम्मेदारी पर आपकी ज़िंदगी मे उन्हें शामिल किया है अगर आपने उनके साथ कुछ भी गलत किया तो आपकी माँ की इज़्ज़त पर बात आएगी।

    अगर उन्हें ज़रा भी तकलीफ हुई तो हम उसके ज़िम्मेदार माने जाएंगे इसलिए जो भी कीजियेगा सोच समझकर कीजियेगा। उम्मीद करते है आप अपने अतीत से सीख लेकर सही फैसला लेंगे, किसी और की करनी की सज़ा उस मासूम को नही देंगे जो अभी अभी आपकी ज़िन्दगी का हिस्सा बनी है।"

    उन्होंने उसको बड़े प्यार से सब समझाया फिर उसके माथे को प्यार से चूमते हुए बोली, "आकृति के रूप मे आपका सुनहरा भविष्य आपकी राह देख रहा है, अपने अतीत की काली यादों के वजह से इस प्रकाश को अनदेखा मत कीजियेगा क्योंकि अगर आपने अपनी बेवकूफी के वजह से आकृति को खो दिया तो आगे चलकर पछताने के अलावा और कुछ नही कर सकेंगे आप।

    एक बार गलत इंसान पर भरोसा करके, दिल टूटने के दर्द को महसूस कर चुके है आप। उम्मीद करते है कि इस बार सही इंसान को शक की नज़रों से देखकर उनके दिल को नही दुखाएंगे। सही वक़्त पर सही फैसला लेकर अपनी बिखरी ज़िंदगी को संवार लेंगे।"

    इतना कह कर वो वहा से चली गयी। उनके जाने के कुछ देर बाद नील ने वहाँ कदम रखा और उसको वापिस उसकी चेयर पर बिठाते हुए बोला,

    "आजसे तेरी नई ज़िंदगी शुरू होने जा रही है जिसपर प्राची का नही भाभी का अधिकार है। तो अब प्राची को भूल जा, वैसे भी वो तेरे लायक नही थी। अगर उसको सच मे तुझसे मोहब्बत होती तो ऐसे वक़्त पर जब तुझे सबसे ज्यादा उसके प्यार और सपोर्ट की ज़रूरत थी वो तुझसे सारे रिश्ते तोड़कर तुझे अकेला छोड़कर नही जाती।

    तेरे और तेरी आने वाली ज़िंदगी के लिए यही बेहतर होगा कि अब तू उसे और उससे जुड़े अपने अतीत को भूलकर भाभी के साथ एक नई शुरुआत करे। उन्हें समझने की कोशिश कर और उनके साथ अपनी ज़िंदगी मे आगे बढ़ क्योंकि उनसे बेहतर हमसफर तुझे सारी दुनिया ढूँढने पर भी नही मिलेगी।"

    नील उसको उसके कमरे के तरफ लेकर बढ़ गया। अंगद ने इस बार पलटकर एक शब्द तक नही कहा।

    दूसरी तरफ अनु आकृति को तैयार करके उसको अंगद के कमरे मे ले आई जिसको नील और उसने नौकरों की मदद से उनकी शादी की पहली रात के लिए फूलों और कैंडलेस से बड़ी ही खूबसूरती से सजाया हुआ था।

    उस किंग साइड बेड के चारों और सफेद पर्दों के ऊपर फूलों की लाड़ियाँ लटक रही थी। लाइट ऑफ थी और रूम वहाँ जलती फ्रेग्रेंट कैंडेल्स अपनी झिलमिलाती रोशनी से जगमगा रहा था।

    बेड के बीच मे गुलाब की पंखुड़ियों से बड़ा सा हार्ट बना हुआ था जिसके बीच मे सफेद टोवेल के बने दो हंस बैठे थे, उनके दोनों और अंगद और आकृति का नाम फ़ुलो की पंखुड़ियों से बड़ी ही खूबसूरती से लिखा हुआ था। उन कैंडलेस की भीनी भीनी खुशियों हवाओं मे घुलकर वहाँ खुशनुमा माहौल बना रही थी। फर्श पर जगह जगह गुलाब की पंखुदियाँ बिखरी हुई थी।

    To be continued....

  • 7. The Forced Vows - Chapter 7

    Words: 1847

    Estimated Reading Time: 12 min

    अनु आकृति को तैयार करके उसको अंगद के कमरे मे ले आई जिसको नील और उसने नौकरों की मदद से उनकी शादी की पहली रात के लिए फूलों और कैंडलेस से बड़ी ही खूबसूरती से सजाया हुआ था। उस किंग साइड बेड के चारों और सफेद पर्दों के ऊपर फूलों की लाड़ियाँ लटक रही थी। लाइट ऑफ थी और रूम वहाँ जलती फ्रेग्रेंट कैंडेल्स अपनी झिलमिलाती रोशनी से जगमगा रहा था।

    बेड के बीच मे गुलाब की पंखुड़ियों से बड़ा सा हार्ट बना हुआ था जिसके बीच मे सफेद टोवेल के बने दो हंस बैठे थे, उनके दोनों और अंगद और आकृति का नाम फ़ुलो की पंखुड़ियों से बड़ी ही खूबसूरती से लिखा हुआ था। उन कैंडलेस की भीनी भीनी खुशियों हवाओं मे घुलकर वहाँ खुशनुमा माहौल बना रही थी। फर्श पर जगह जगह गुलाब की पंखुदियाँ बिखरी हुई थी।

    आकृति जिसने ज़िंदगी मे पहली बार इतना बड़ा और आलीशान रूम देखा था, ये साज सजावट देख उसके माथे पर पसीने की बूँदें झिलमिलाने लगी। वो जानती थी ये बस एक रस्म के तहत किया गया है क्योंकि जिसके लिए इस आलिशान रूम को इतनी खूबसूरती से सजाया गया है वैसा रिश्ता नही है अभी उसके और अंगद के बीच।

    फिर भी उस रूम मे हुई सजावट देखकर उसकी धड़कनें उसके अख्तियार से बाहर जा चुकी थी, दिल ऐसे धड़क रहा था मानो बस अब बाहर ही निकल आएगा। शरीर मे अजीब सी हलचल हो रही थी। मन बेचैन हो उठा था। चेहरे पर सिंदूरी आभा बिखर गयी थी और शर्म के बोझ तले उसकी पलकें झुक चुकी थी।

    आकृति ने अपने लहंगे को अपनी मुट्ठियों मे भींच लिया और किसी तरह खुदको काबू करने की कोशिश करने लगी। अनु ने उसको लेजाकर उस किंग साइड बेड के बीच मे बिठा था। उसके लहंगे को चारों और फैलाने के बाद दुपट्टे को हल्का सा नीचे कर दिया फिर मुस्कुराकर बोली,

    "परफेक्ट...... चलिए अब आप यहाँ आराम से बैठकर अपने पिया जी का इंतज़ार कीजिये मैं ज़रा जाकर अपने हाथ गर्म करने का इंतज़ाम कर लूँ।"

    उसकी बात सुनकर आकृति की असमंजस भरी निगाहें उसके तरफ घूम गयी तो अनु ने हँसते हुए कहा, "ओफ्फो भाभी आपको नही पता आज तो भाई को आपको देखने के लिए और अपने रूम मे आने के लिए अपनी जेब ढीली करनी होगी। और ये नेक काम मुझे ही तो करवाना है, आखिर एकलौती बहन हूँ उनकी तो अपनी चाँद सी सुंदर भाभी को उन्हें यूँही देखने तो नही दे सकती।"

    उसने इतराते हुए कहा फिर उठकर कमरे के बाहर चली आई और पहरेदार के तरफ कमर के बाहर खड़ी हो गयी। अंदर रूम मे आकृति ने उसकी बात सुनी तो मन ही मन बोली, "उन्हें कौनसा मेरी सूरत देखने का शौक है जो वो मेरे लिए आपको कुछ दे, हाँ अपने कमरे मे आने के लिए ज़रूर दे सकते है।"

    उसके चेहरे पर गहरी मायूसी छाई हुई थी।

    अनु दरवाजे के बाहर खड़ी बड़ी ही बेसब्री से नील और अंगद के आने का इंतज़ार कर रही थी और जल्दी ही उसका इंतज़ार खत्म हुआ जब उसकी नजर सामने से आते नील और उसके आगे अपनी व्हीलचेयर पर मौजूद अंगद पर पड़ी।

    अंगद को व्हीलचेयर पर देखकर एक पल को उसके चेहरे पर भी मायूसी छा गयी पर जल्दी ही उसने अपनी मुस्कान के पीछे अपनी उदासी को छुपा ली और कमरे के दरवाज़े के ठीक सामने उसका रास्ता रोककर खड़ी हो गयी।

    अंगद ने उसके ठीक सामने अपनी व्हीलचेयर रोकी और भौंह सिकोड़कर उसको देखते हुए बोला, "मेरे ही रूम मे जाने से मुझे रोकने की वजह?"

    "बस इतनी कि अगर आपको अंदर जाना है तो पहले मुझे द्वार छिकाई का नेग देना होगा, मुझे माँ ने आज सुबह ही बताया था कि जब शादी के बाद भाई पहली बार अपने रूम मे जाता है जहाँ उसकी नई नवेली दुल्हन उसका इंतज़ार कर रही होती है तो उसकी बहनों को उसको अंदर जाने देने के बदले उससे नेग मिलता है।

    अब यहाँ तो मैं एकलौती ही आपकी बहन हूँ इसलिए आप अगर अंदर जाना चाहते है तो आपको अपनी जेब ढीली करनी होगी। ............ पहले मुझे मेरा नेग मिलेगा उसके बाद ही आप अपने रूम मे कदम रख सकेंगे।"

    अनु ने मुस्कुराकर सारी बात उसको बता दी और फिर इतराते हुए अपना हाथ उसके आगे बढ़ा दिया। अंगद अब भी आँखे छोटी छोटी करके उसको घूर रहा था, वही नील उसने जैसे ही अनु का आगे बढ़ा हाथ देखा, उसका मज़ाक उड़ाते हुए झट से बोला,

    "हद होती है लालच की, खुद कमाती है फिर भी अपने भाई के आगे हाथ फैलाकर खड़ी है। लगता है अपने पैसों से तेरा गुज़ारा नही चलता है इसलिए नेग के नाम पर अपने भाई को लूटने आ गयी है।"

    उसकी बात सुनकर अनु ने तुरंत ही चिढ़कर जवाब दिया, "हाँ नही चलता गुज़ारा तुम्हे क्यों प्रॉब्लम हो रही है? तुमसे तो नही मांगने गयी ,अपने भाई से मांग रही हूँ और ये हक है मेरा।............... खैर मेरे भाई के पास तो पैसे है इसलिए वो मुझे नेग ज़रूर देंगे पर मुझे तुम्हारी बहनों पर दया आ रही है, बेचारी ऐसे फटीचर आदमी की बहने है कि जब तुम्हारी शादी होगी तो उन बेचारियों को इस रस्म मे कही 25 पैसे से गुज़ारा न करना पड़े जो अब चलता भी नही है।"

    अनु ने उसका ही मज़ाक उड़ा दिया जिसे सुनकर नील चिढ़ उठा पर दोनों की बहस छिड़ती उससे पहले ही अंगद बीच मे आ गया और अनु को देखकर बोला, "उससे लड़ना छोड़ और बता क्या चाहिए मेरी बहन को अपने भाई से?"

    अनु अब उसके सामने घुटनों के बल बैठ गयी और अपनी हथेली उसके सामने करके सौम्य सी मुस्कान के साथ बोली, "भाई मुझे आपसे पैसे नही चाहिए, वो मेरे पास बहुत है फिर आप वक़्त वक़्त पर मुझे पैसे भेजते ही रहते है और अगर कभी मुझे ज़रूरत पड़ेगी तो मैं हक से आपसे मांग लूँगी ।

    आज इस रस्म मे मुझे आपसे नेग के रूप मे एक वादा चाहिए जिसे आपको ताउम्र निभाना होगा। बोलिये आप मुझे ऐसा वादा दे पाएंगे जिसे सारी ज़िंदगी निभाना पड़े? अगर हाँ कहेंगे तभी मैं आपको बताऊंगी कि मुझे आपसे क्या वादा चाहिए। अगर आप इंकार करते है तो भी कोई बात नही, मैं इसके अलावा आपसे कुछ नही माँगूँगी और आपको अंदर जाने से रोकूंगी भी नही।"

    कुछ सेकंड पहले तो जो अनु चिढ़ी हुई थी और बच्चों के तरह नील से झगड़ रही थी अब वो एकदम संजीदा हो गयी थी।

    अंगद ने उसको देखा फिर मुस्कुराकर बोला, "बोल क्या वादा चाहिए तुझे अपने भाई से? आज तक तूने जो मांगा है मैंने तुझे वो हर चीज़ देने की कोशिश की है फिर आज तो ये तेरा हक है तो मैंने कैसे अपनी बहन का दिल दुखा सकता हूं? तू बोल मैं पूरी कोशिश करूँगा की तुझसे किया वादा ताउम्र निभा सकूँ।"

    उसकी बात सुनकर अनु के लबों पर प्यारी सी मुस्कान फैल गयी।

    "भाई आई नो शायद आपके लिए इस प्रोमिस को निभाना मुश्किल हो पर मैं चाहती हूँ कि आप मुझे वादा करे कि आप अतीत मे जो भी हुआ उसका असर अपने और भाभी के इस रिश्ते पर नही पड़ने देंगे। भाभी बहुत अच्छी है भाई, प्योर हार्ट है उनका जिसमे सबके लिए सिर्फ प्यार और सम्मान है और मैं चाहती हूँ कि आप कभी उनका दिल न दुखाए, उन्हें वो प्यार और सम्मान दे जो आपकी पत्नी होने के नाते वो डिज़र्व करती है।

    किसी तीसरे के किये गुनाहों के वजह से आप please भाभी को तकलीफ मत पहुँचाइयेगा। उन्होंने दिल से इस रिश्ते को स्वीकार किया है, अब आपको भी कोशिश करनी होगी अपने दिल से अतीत की उन बुरी यादों को निकालकर भाभी को अपने दिल मे जगह दे।

    सच कहूँ मैं पहले सोचती थी कि वो लड़की बहुत खुशनसीब होगी जिसे मेरे भाई की ज़िंदगी मे उनकी हमसफर बनकर शामिल होने का मौका मिलेगा पर जबसे मे भाभी से मिली हूँ और जितना मैंने उन्हें समझा है, आप उनसे कही गुना ज्यादा लकी है क्योंकि भाभी जैसी लड़की जिनका चेहरा जितना ज्यादा सुंदर है मन उससे भी कही गुना ज्यादा साफ है। जिन्हे अपनी सुंदरता पर ज़रा भी घमंड नही है, जो रिश्तों की एहमियत भी समझती है और उसे निभाना भी बखूबी जानती, जिसके दिल मे अपने हो या पराए सबके लिए सिर्फ प्यार बसा है, जो अपने दुख मे भी दूसरों की मुस्कान की वजह बन जाती है, ऐसी लड़की इस दुनिया मे शायद ही दूसरी कोई हो। इतनी सिंपल है वो फिर भी सबसे जुदा है। मैंने आज तक ऐसी लड़की नही देखी।

    उन्हें आपके पैसों मे रत्ती भर दिलचस्पी नही है भाई, अगर आपको विश्वास न हो तो बस एक बार उनसे पूछकर देखियेगा कि अगर आपके पास ये पैसा, बिजनेस इतना आलीशान घर ना हो तब भी क्या वो आपके साथ अपनी ज़िंदगी बितानी चाहेंगी?... पूछियेगा उनसे कि अगर आप कभी दोबारा अपने पैरों पर खड़े न हो सके तब भी क्या वो आपकी हिम्मत बनकर आपको संभालने के लिए आपके पास ज़िंदगी भर मौजूद रहेंगी?

    उनका जवाब हाँ होगा क्योंकि उनके लिए इन चीजों के कोई मायने नही है। आप किसी भी हालत मे हो वो कभी आपका साथ नही छोड़ेंगी इसकी गारंटी मैं ले सकती हूँ।

    उन्होंने आपकी कमी के साथ आपको पूरी इज़्ज़त के साथ स्वीकारा है इसी से पता चलता है कि वो कितनी अच्छी है। उन्होंने तो आपको अपने पति के रूप मे स्वीकार लिया है अब आपकी बारी है उन्हें वो इज़्ज़त देने की वो प्यार देने की जिसपर उनका हक है पर वो कभी सामने से उसे ज़ाहिर नही करेंगी क्योंकि उनके लिए दूसरों की खुशी उनकी अपनी खुशियों से कही गुना ज्यादा मायने रखती है।

    Please भाई अपने पास्ट के एस्पिरिएंस के वजह से बिना भाभी को जाने उनके बारे मे कोई राय मत बनाइये। उन्हें एक मौका दीजिये खुदको साबित करने का। किसी और के किये गुनाह की सज़ा उन्हें मत दीजियेगा, वो खुद दर्द से लड़ती आई है, उनके लिए और मुश्किलें पैदा मत कीजियेगा। उनकी तकलीफ को और मत बढाईयेगा, please उनके साथ गलत मत करियेगा।

    वादा कीजिये भाई की आप भाभी को और इस रिश्ते को दिल से एक मौका देंगे। उनको कभी तकलीफ नही पहॅुचाएंगे। अपने अतीत की बुरी यादों को मिटाकर उनके साथ इस रिश्ते की खूबसूरत शुरुआत करेंगे। उनको वो हक वो सम्मान देंगे जो आपकी पत्नी होने के नाते उन्हें मिलना चाहिए। उन्हें मौका देंगे अपने दिल तक पहुँचने की। उन्हें समझने और जानने की कोशिश करेंगे। उन्हें उस गलती की सज़ा बिल्कुल नही देंगे जो उन्होंने की ही नही।

    आपके तरह भाभी ने भी अपनी ज़िंदगी मे बहुत कुछ सहा है अब उन्हें और तकलीफ नही होने देंगे, उन्हें हर दर्द से बचाकर रखेंगे। उनका साथ कभी नही छोड़ेंगे। उनको अपनी पत्नी का अधिकार और मान देंगे। बोलिए क्या सारी उम्र आप इस वादे को निभा सकेंगे?"

    अनु अब खामोश हो गयी और उसकी उम्मीद भरी निगाहें अंगद पर टिकी थी। नील भी अंगद के फैसले का बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था। वही अंगद के दिमाग मे ममता जी, नील और अनु की कही बातों के साथ कुछ और आवाज़ें और कुछ चेहरे घूम रहे थे। चेहरे पर पल पल भाव बदल रहे थे इसलिए ये समझ पाना मुश्किलों था कि वो क्या सोच रहा है।

    To be continued....

  • 8. The Forced Vows - Chapter 8

    Words: 1525

    Estimated Reading Time: 10 min

    अनु अब खामोश हो गयी थी और उसकी उम्मीद भरी निगाहें अंगद पर टिकी थीं। नील भी अंगद के फैसले का बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था। वहीं अंगद के दिमाग में ममता जी, नील और अनु की कही बातें गूंज रही थीं, साथ ही कुछ और आवाज़ें और चेहरे भी उसकी आँखों के सामने घूम रहे थे। उसके चेहरे पर हर पल बदलते भाव देखकर ये समझना नामुमकिन हो रहा था कि वो आखिर सोच क्या रहा है।

    कुछ देर तक वहाँ गहरी खामोशी छाई रही। अंगद अपने अतीत की कड़वी यादों और वर्तमान की परिस्थितियों के बीच बुरी तरह उलझा हुआ था। तभी अचानक उसकी आँखों के सामने आकृति का मासूमियत से भरा चेहरा उभर आया, उसका उसके सामने बैठ जाना, झुकने में दिक़्क़त होने पर उसका हाथ थाम लेना।

    शादी के हर पल में आकृति ने उसकी ढाल बनकर उसका साथ दिया था। जहाँ-जहाँ उसकी कमी थी, आकृति ने अपनी समझदारी से उसे पूरा कर दिया था। ये सब याद आते ही जैसे अंगद की सारी उलझनें सुलझ गईं। अब तक जिसके दिल में तूफ़ान मचा हुआ था, आकृति के ख्याल मात्र से उसका मन एकदम शांत हो गया।

    उसने नज़र घुमाकर देखा तो नील और अनु दोनों आस भरी आँखों से उसे देख रहे थे। अंगद ने गहरी सांस छोड़ी, फिर अनु के हाथ पर अपनी हथेली रखते हुए बोला,

    "मैं नहीं जानता कि एक बार प्यार में धोखा खाने और दिल को बेरहमी से टूटने के बाद मैं दोबारा कभी प्यार कर सकूँगा या नहीं। न ही ये जानता हूँ कि किसी पर किया गया विश्वास टूटने के बाद किसी और लड़की पर दोबारा विश्वास कर पाऊँगा या नहीं। लेकिन आज मैं तुझसे इतना वादा करता हूँ कि मेरी वजह से तेरी भाभी को कोई दुख या तकलीफ़ नहीं होगी। पत्नी होने का अधिकार दे पाऊँगा या नहीं, ये नहीं जानता, पर सम्मान उन्हें पूरा मिलेगा।"

    वो आगे बोला,

    "मैं उसके दर्द की वजह नहीं बनूँगा। बल्कि, अगर कर सका तो उसके लबों पर मुस्कान लाने की वजह बनने की पूरी कोशिश करूँगा। आसान नहीं है मेरे लिए, लेकिन मैं दिल से इस रिश्ते को स्वीकारने और निभाने की कोशिश करूँगा। कोशिश करूँगा उसे समझने की।

    किसी और के गुनाहों की सज़ा उसे नहीं मिलेगी। लाख इंकार के बावजूद ये रिश्ता जुड़ चुका है, तो अब जब तक मेरी सांसें चलेंगी, मैं इसे निभाने की पूरी कोशिश करूँगा। अतीत की यादों को मिटाकर उसमें जगह देना आसान नहीं होगा, पर मैं कोशिश करूँगा।"

    उसकी आँखों में एक ठहराव आया और उसने दृढ़ स्वर में कहा,

    "आज मैं तुझसे वादा करता हूँ कि जब तक अंगद राणा है, उसके तन और मन पर सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही लड़की का हक होगा और वो आकृति अंगद राणा होगी। समय लगेगा, लेकिन मैं उसे वो हर खुशी देने की कोशिश करूँगा, जिस पर उसका पूरा अधिकार है।"

    उसकी बात सुनकर नील और अनु के चेहरे खुशी से खिल उठे। अनु भावुक होकर उसके गले से जा लिपटी और मासूमियत से बोली,

    "Ooooo भाई, आई लव यू! यू आर द बेस्ट ब्रदर इन द होल वर्ल्ड। मुझे पूरा यकीन है कि भाभी जल्द ही आपके दिल में अपनी जगह बना लेंगी। आप फिर से प्यार करने लगेंगे और इस बार आपको प्यार के बदले सिर्फ़ बेशुमार प्यार मिलेगा, दर्द या तिरस्कार नहीं। देखना, आपके और भाभी की ज़िंदगी खुशियों से भर जाएगी। आप दोनों एक-दूसरे के लिए ही बने हैं और जल्द ही इस रिश्ते को दिल से स्वीकार कर एक-दूसरे को बेशुमार प्यार करेंगे।"

    अनु की उत्सुकता और बचपना देखकर नील और अंगद दोनों मुस्कुरा उठे। कुछ देर नील उसकी खुशी देखकर मुस्कुराता रहा, फिर छेड़ते हुए बोला,

    "अब चुड़ैलों की तरह बेचारे मेरे दोस्त के गले से टंगी ही रहेगी या उसे आज़ाद भी करोगी?"

    अनु तुरंत अलग हुई और घूरते हुए बोली,

    "अपना सड़ा हुआ मुँह बन्द रखो, वरना किसी दिन सच में चुड़ैल बनकर तुम्हारा खून पी जाऊँगी।"

    "ओ बंद-बुद्धि औरत, चुड़ैलें खून नहीं पीतीं। खून पीने वालों को वैम्पायर कहते हैं।"

    नील कहाँ पीछे रहने वाला था। उसने फिर चिढ़ाया तो अनु गुस्से से उसकी तरफ लपकी,

    "रुको, आज बताती हूँ कि कौन खून पीता है और कौन तुम्हें कच्चा चबाने वाला है। हमेशा बेताल की तरह मेरे पीछे पड़े रहते हो। आज तो तुम्हें छोड़ूँगी नहीं।"

    नील झट पीछे हट गया और हँसते हुए बोला,

    "हा… हा… यही उम्मीद थी मुझे। चुड़ैलों की सरदारानी और कर भी क्या सकती है? पर मैं इतना आसान शिकार नहीं हूँ। जा, किसी और को ढूँढ ले अपनी भूख मिटाने के लिए।"

    अनु उसकी बात से चिढ़ गयी और मुँह बिचकाकर अंगद से शिकायत करने लगी,

    "भाई, देखो ना, ये चिंपैंजी कैसे आपकी मासूम बहन को चुड़ैल कहकर परेशान कर रहा है।"

    उसकी मासूम शक्ल देखकर अंगद मुस्कुरा उठा, जबकि नील ने चिढ़कर कहा,

    "तु और मासूम? चल हट! चुड़ैल कहीं मासूम होती है? जाने कितने शैतान मरे होंगे तब तेरा जन्म हुआ है।"

    अनु बच्चों की तरह पैर पटकते हुए रुआंसी होकर बोली,

    "भाई…!"

    नील कुछ और कहता, लेकिन अंगद की घूरती निगाहें देखकर चुप हो गया। नाक सिकोड़ते हुए बोला,

    "सही है, उसका भाई है तो हमेशा उसी की साइड लेता है। उसको कुछ नहीं कहता, बस मुझे घूरता रहता है।"

    अनु इतराकर बोली,

    "हा, तो मेरे भाई हैं तो मेरा ही साथ देंगे ना!" और फिर से अंगद से लिपट गयी।

    ये देखकर नील ने मुँह बना लिया। अनु मुस्कुराकर बोली,

    "चलिए भाई, अब अंदर जाइए। भाभी आपका इंतज़ार कर रही होंगी।"

    अंगद ने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरा। अनु के लिए ये सिर्फ़ भाई का नहीं बल्कि पिता-सा स्नेह था। उसके माथे पर अंगद के चुंबन ने उसे वही सुकून दिया जो हमेशा देता था। जाते-जाते उसने नील की तरफ़ विजयी मुस्कान डाली और अंगद को गुड लक कहकर चली गयी।

    अंगद ने अब नील की तरफ देखा और कहा,

    "क्यों उसे इतना परेशान करता है?"

    नील ने तुरंत जवाब दिया,

    "तो क्या वो मुझे परेशान नहीं करती? बचपन से मेरी जान खा रही है। ये हमारे रिश्ते की पहचान है। जब तक मेरी चुड़ैल मुझसे लड़ न ले, मुझे यकीन नहीं होता कि वो मेरी ही झल्ली है। और मुझे तंग किये बिना उसका दिन पूरा नहीं होता। तो तुझे इसमें टांग अड़ाने की ज़रूरत नहीं है।"

    अंगद ने उसे घूरते हुए चेताया,

    "ध्यान रहे, वो मेरी बहन है। तमीज़ में रह, वरना सारी उम्र कुँवारा ही रहना पड़ेगा।"

    नील बेफिक्र हँस पड़ा,

    "चल, बड़ा आया मुझे धमकी देने वाला। तेरी बहन को मेरा ही होना है। तू मेरी रिस्पेक्ट करने की प्रैक्टिस शुरू कर दे। आखिर जीजा बनूँगा तेरा, तो इज़्ज़त तो करनी ही पड़ेगी।"

    दोनों कुछ पल तक एक-दूसरे को घूरते रहे और फिर अचानक मुस्कुरा उठे। अंगद ने गंभीर होकर पूछा,

    "तु उसे अपने दिल की बात बताता क्यों नहीं? अगर किसी और ने प्रपोज़ कर दिया और अनु ने हाँ कह दी, तो मैं भी तेरे लिए कुछ नहीं कर पाऊँगा।"

    नील ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा,

    "ऐसी नौबत कभी नहीं आने दूँगा। पहले मुझे ये यकीन हो जाए कि अनु भी मुझे प्यार करती है। अगर उसने हाँ कहा तो तुरंत शादी करूँगा। और अगर उसके दिल में सिर्फ दोस्ती है, तो उसकी मर्ज़ी। जिससे चाहे शादी करे। मैं कोई बंदिश नहीं डालूँगा। खैर, तू ये सब छोड़ और अपनी ज़िंदगी पर ध्यान दे। चल, अब अंदर जा। भाभी कब से तेरी राह देख रही हैं।"

    नील ने दरवाज़ा खोला, गुड नाइट कहा और चला गया। अंगद ने मन ही मन दोनों की खुशियों की दुआ की और व्हीलचेयर अंदर बढ़ा दी।

    आकृति कब से दरवाज़े की ओर देख रही थी। झीने दुपट्टे के पीछे से जब उसने अंगद को अंदर आते देखा तो उसका दिल ज़ोरों से धड़क उठा।

    उसकी चुनरी से आधा चेहरा ढका था। गुलाबी होंठ सुर्ख लाल रंग में रंगे हुए थे, और उनके ठीक ऊपर बैठा तिल उनकी खूबसूरती को और बढ़ा रहा था। फूलों से सजी सेज पर बैठी आकृति एक नाज़ुक कली-सी लग रही थी। अंगद की नज़रें कुछ पल के लिए उसके चेरी जैसे रसीले लबों और उस तिल पर ठहर गईं।

    दिल में अजीब-सी हलचल उठी। गला सूखने लगा, मानो कोई प्यास लग गयी हो। लेकिन ये प्यास पानी की नहीं थी। ये प्यास आकृति के कोमल होंठों को छूने की थी।

    ये एहसास होते ही अंगद ने झट से नज़रें फेर लीं। उसने चेयर घुमाई, दरवाज़ा लॉक किया और वार्डरोब की ओर बढ़ गया। आकृति अब भी घूँघट के नीचे से घबराई निगाहों से उसे देख रही थी।

    अंगद ने टी-शर्ट और ट्राउज़र निकाला, एक नज़र आकृति की ओर डाली और फिर चेंजिंग रूम में चला गया। कुछ देर बाद बदलकर लौटा और बेड की ओर बढ़ा। ये देखकर आकृति की धड़कनें और तेज़ हो गयीं।

    वो बेड के पास रुका और खुद से बेड पर चढ़ने की कोशिश करने लगा। आकृति ने झट से घूँघट हटाया और उसकी मदद के लिए हाथ बढ़ाया। लेकिन अंगद ने सख़्ती से उसे रोक दिया।

    "न मुझे अपने कामों के लिए किसी के सहारे की ज़रूरत है और न दूसरों पर निर्भर होने का कोई शौक़। अपने हर काम को मैं खुद से करना जानता हूँ। मुझे न तुम्हारी मदद चाहिए और न ही तरस या सहानुभूति की कोई ज़रूरत है। I can manage."

    To be continued....

  • 9. The Forced Vows - Chapter 9

    Words: 1932

    Estimated Reading Time: 12 min

    अंगद ने बिना उसको देखे ही सख्त लहज़े में कहा, "न तो मुझे अपने कामों के लिए किसी के सहारे की ज़रूरत है, न दूसरों पर निर्भर होने का कोई शौक है। मुझे अपने हर काम को खुद से करना बहुत अच्छे से आता है। मुझे न तुम्हारी मदद की ज़रूरत है और न ही सहारे की इच्छा। I Can Manage."

    आकृति एकटक उसके चेहरे को देखती रही, फिर आगे बढ़कर उसके चेहरे को देखते हुए गंभीरता से बोली, "जानती हूँ, आपको मेरे सहारे या मदद की ज़रूरत नहीं है। मेरे यहाँ आने से पहले भी आप अपने सब काम खुद से ही करते होंगे तो अब भी कर सकते हैं। पर अगर मेरे होते हुए आपको हर चीज़ के लिए खुद से परेशान होना पड़े, तो मेरे होने का तो कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा।"

    उसकी बात ने अंगद को मजबूर कर दिया उसके तरफ देखने पर। आकृति ने अब उसके हाथ को अपने कंधे पर रखकर संभालते हुए उसको व्हीलचेयर से उठाकर बेड पर ठीक से बिठा दिया और पीछे हट गयी।

    अंगद उसके मुकाबले भारी और लंबा था। अच्छी-खासी बॉडी, उस पर उसकी हाइट। बेचारी आकृति उसके कंधे पर बड़ी मुश्किल से पहुँची थी और फिर उसको उठाकर बेड पर बिठाना भी आसान नहीं था।

    आकृति की साँसें तेज़ चलने लगी थीं, माथे पर पसीने की बूँदें चुहचुहा रही थीं। वो पीछे हटकर गहरी साँसें लेने लगी। अंगद अब भी उलझा हुआ-सा उसके चाँद से चेहरे को देख रहा था, जिस पर शिकन की एक रेखा तक नहीं थी। उसकी आँखों में उसकी सच्चाई झलक रही थी। शायद अंगद उसे समझने की कोशिश कर रहा था।

    आकृति ने अपनी धड़कनों को सामान्य किया, फिर जाने के लिए मुड़ गयी। पर कुछ कदम चलकर ही वो रुक गयी और अंगद की तरफ मुड़ते हुए बोली, "आपने कहा आपको किसी के सहारे या मदद की ज़रूरत नहीं है। तो राणा साहब, दुनिया में किसी को किसी की ज़रूरत नहीं होती। हर इंसान हर सिचुएशन में खुद को संभालना सीख जाता है, पर वो उसकी चाहत नहीं, मजबूरी होती है।

    किसी के सहारे, किसी के साथ की ज़रूरत नहीं, चाहत होनी चाहिए। अगर कोई दर्द में मुस्कुराना सीख गया, इसका मतलब ये नहीं कि वो खुश है या उसको अब दर्द नहीं होता। बल्कि अब वो अपना दर्द किसी को दिखाना नहीं चाहता। ये उसकी मजबूरी है कि उसके पास कोई ऐसा नहीं, जिसे वो अपना दर्द दिखा सके, जिससे वो अपना दर्द बाँट सके। वैसे ही आपने इस परिस्थिति में भी खुद को संभालना सीख लिया है, पर वो आपकी मजबूरी है।

    आप खुद को किसी के सामने कमज़ोर नहीं दिखाना चाहते, इसलिए सख्ती का मुखोटा ओढ़ा हुआ है आपने। आप किसी को अपनी मदद नहीं करने देना चाहते क्योंकि आपको लगता है कि सामने वाला आपकी कमी का मज़ाक उड़ाएगा। अगर आपको किसी के सहारे की ज़रूरत पड़ी और तब उस इंसान ने अपने हाथ पीछे खींच लिए, तो आप बेबस महसूस करेंगे उसके सामने।

    आप किसी को अपनी कमज़ोरी, अपनी ज़रूरत नहीं बनने देना चाहते, उसके सामने बेबस नहीं बनना चाहते। नही चाहते कि कोई आपकी हालत का मज़ाक उड़ाए इसलिए आपने बिना किसी की मदद के खुद को संभालना सीख लिया है। पर दुनिया में हर कोई ऐसा नहीं होता जो सामने वाले की मजबूरी का मज़ाक बनाए, ज़रूरत पड़ने पर उसको बेसहारा छोड़ दे।

    ओरो का तो मुझे पता नही लेकिन कम से कम मैं तो ऐसी नहीं हूँ। मैं जानती हूँ कि आपको ज़रूरत नहीं मेरी, पर मैं आपकी ज़रूरत नहीं, चाहत बनना चाहती हूँ। क्योंकि ज़रूरत वक़्त के साथ खत्म हो जाती है और हमारा रिश्ता तो जन्मों का है। मैं आपकी मदद करना चाहती हूँ इसलिए नहीं कि मुझे आप पर या आपकी हालत पर तरस आ रहा है, बल्कि इसलिए क्योंकि मेरा फ़र्ज़ है आपके मुश्किल में आपका साथ देना, आपका सहारा बनकर आपको संभालना।

    मैं आपका कभी मज़ाक नहीं उड़ाऊंगी, कभी आपको मुसीबत में अकेला छोड़कर नहीं जाऊंगी, कभी आपको कमज़ोर नहीं पड़ने दूँगी। जब भी आपको सहारे की ज़रूरत होगी, मैं आपको आपके पास नज़र आऊँगी। मैं दिल से आपके लिए कुछ करना चाहती हूँ। कोई सहानुभूति नहीं है ये और न मैं आप पर कोई एहसान कर रही हूँ।

    आप शायद नहीं मानते, पर मैं आपकी पत्नी हूँ और मरते दम तक आपका साथ निभाना मेरा धर्म है।

    मुझे नहीं पता कि आप क्यों मुझे ग़लत समझ रहे हैं। मैं तो आज पहली बार आपसे मिली हूँ, फिर पता नहीं मैंने ऐसा क्या किया है कि आप ख़फ़ा हैं मुझसे। इसके लिए मैं आपसे कुछ भी नहीं कहूँगी। पर मैं एक बात कहना चाहती हूँ—अगर कर सके तो एक बार मुझ पर भरोसा करके देखिए। मैं मरते दम मर जाऊंगी, पर कभी आपका भरोसा नहीं तोड़ूंगी।

    मौका दीजिए मुझे। मैं आपके मन से अपने लिए हर बदगुमानी को मिटा दूँगी। एक मौका दीजिए मुझे। मैं नहीं थी तब की बात और थी, पर अब तो मैं हूँ। मैं नहीं देख सकती आपको अकेले सफ़र करते हुए। मैं साथ देना चाहती हूँ आपका।

    मैं आपसे और कुछ नहीं माँग रही। बस आपका, आपकी ज़रूरतों का ध्यान रखने का हक दे दीजिए मुझे। कोई और हक नहीं माँग रही। बस अपना पत्नी धर्म निभाने की इज़ाज़त चाहती हूँ आपसे। अगर आप मुझ पर इतना विश्वास कर सके कि ज़रूरत पड़ने पर मेरा सहारा ले सके, तो मैं समझूँगी कि मुझे मेरे आज तक के सभी अच्छे कर्मों का फल मिल गया। और अगर आप मुझ पर विश्वास नहीं कर सके, तो ये मेरी बदकिस्मती होगी कि मैं अपने पति का विश्वास तक हासिल नहीं कर सकी।"

    आकृति ने संजीदगी से अपनी बात कही और बेड के दूसरे तरफ चली गयी। वो जाकर ड्रेसिंग टेबल के सामने बैठ गयी। उसने धीरे-धीरे अपने सभी गहने उतारे, फिर वहीं साइड में रखे अपने बैग से अपने कपड़े निकालकर बाथरूम में चली गयी।

    अंगद के दिमाग में अब भी उसकी बातें घूम रही थीं। कहीं न कहीं आकृति की बातों ने उसके दिल पर दस्तक दे दी थी। वो एकटक बाथरूम के बंद दरवाज़े को देखे जा रहा था।

    जैसे ही उसके कानों में दरवाज़े के खुलने की आवाज़ पड़ी, उसने झट से अपनी निगाहें फेर लीं और बेड पर लेटकर अपनी बाँह को मोड़कर अपनी आँखों पर रख लिया।

    आकृति ने अब सिंपल-सा सूट सलवार पहना हुआ था, गले में दुपट्टा लटका हुआ था। बाल अब भी जुड़े में बंधे, जिनसे निकलती लटें उसके गालों पर झूल रही थीं। चेहरे पर से मेकअप साफ़ कर लिया था उसने और उस धीमी रोशनी में उसके चाँद-से मुखड़े पर अलग ही कशिश नज़र आ रही थी।

    माँगटीके के हटने की वजह से माँग में भरा सुर्ख सिंदूर अपनी मौजूदगी पर इतरा रहा था। गुलाब की पंखुड़ियों-से लब अब गुलाबी रंग में रंगे थे, जो उनका खुद का रंग था। दुपट्टे के नीचे से झलकता गले में पहना मंगलसूत्र अलग ही चमक रहा था। मेहँदी लगे हाथों में अब भी भरा-भरा चूड़ा पहना हुआ था, पर पायल खोल चुकी थी।

    वो बेड की तरफ बढ़ गयी। जल्दबाज़ी में अंगद यूँही चादर के ऊपर ही लेट गया था, तो आकृति ने उसके पास आकर उसके नीचे से चादर निकाली और उसको अच्छे से ढक दिया। उसको तो लगा कि वो सो रहा है, तो वो वहीं खड़ी होकर उसको देखने लगी और खुद से ही बात करने लगी।

    "पता नहीं आप किस बात पर मुझसे नाराज़ हैं। अगर मुझे पहले पता होता कि आप मुझसे शादी नहीं करना चाहते, तो मैं माँ के लाख कहने पर भी इस रिश्ते के लिए हाँ नहीं कहती। मुझे तो लगा था कि आप राज़ी होंगे, तभी आपकी माँ ने मेरी माँ से हमारे रिश्ते की बात की होगी।

    पता है, जब उन्होंने बताया था कि एक एक्सीडेंट में आपने अपने चलने की शक्ति को खो दी है और उसके बाद से आपने खुद को इस महल में कैद कर लिया है, एकदम तन्हा हो चुके हैं। तब मैं आपको जानती नहीं थी, फिर भी मुझे पता नहीं क्यों, पर बहुत बुरा लगा था आपके लिए।

    जब मैंने शादी के लिए मना किया था, तो अजीब-सी बेचैनी हो रही थी, जैसे कुछ ग़लत हो रहा है। ऐसा नहीं था कि मुझे आपसे कोई दिक्कत थी या मुझे आपकी इस कमी की वजह से रिश्ते से इंकार था। मैं बस अपनी माँ से दूर नहीं होना चाहती थी, क्योंकि उनके अलावा मेरा कोई नहीं है और मेरे जाने के बाद वो एकदम अकेली हो जाएँगी। लेकिन फिर माँ के आगे मेरी नहीं चली।

    जब मेरा रिश्ता आपसे जुड़ा था, मैंने तभी ये फैसला कर लिया था कि चाहे कितना ही मुश्किल हो, पर मैं इस रिश्ते को निभाऊँगी। जानती थी कि आपके और मेरे क्लास में बहुत बड़ा डिफरेंस है और मुझे बहुत दिक्कत होती खुद को आपके हिसाब से ढालने में। पर मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे अपने हक के लिए आपसे ही लड़ना होगा। मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि जिनके लिए मैं अपनी माँ, अपनी ज़िंदगी छोड़कर आ रही हूँ, उनके भरोसे को हासिल करने के लिए भी मुझे मेहनत करनी पड़ेगी।

    मैंने तो सोचा था कि मैं आपकी ताक़त बनूँगी, आपको जब-जब ज़रूरत पड़ेगी, मैं आपको संभाल लूँगी। कभी आपको एहसास नहीं होने दूँगी कि आपके अंदर कोई कमी है। जब-जब आप कमज़ोर पड़ेंगे, मैं आपका सहारा बनूँगी, आपके मन में फिर से जीने की चाह जगाऊँगी। पर यहाँ तो सब उलट-पुलट हो गया।

    आपने तो मुझे आपको छूने से ही रोक दिया था। आपने तो एक झटके में मुझसे मेरे सारे हक छीन लिए। पर मैं आपके दिल और आपकी ज़िंदगी में जगह ज़रूर बनाऊँगी। चाहे कितना ही मुश्किल हो, पर मैं इस रिश्ते को निभाऊँगी और अपने तरह से पूरी कोशिश करूँगी कि आपके विश्वास को हासिल कर सकूँ। आपकी ज़रूरत नहीं, चाहत बन सकूँ।

    जब आपको ज़रूरत पड़े, तो आप हक से मुझे पुकारें। मेरा सहारा लेने में आपको शर्मिंदगी का एहसास न हो। आप खुद को कमज़ोर न समझें, क्योंकि आप कमज़ोर नहीं हैं। आपको लगता है कि किसी का सहारा लेने से आप उसके सामने कमज़ोर लगेंगे। पर आपने कभी उस फीलिंग को महसूस ही नहीं किया, जब ज़रूरत पड़ने पर आपका कोई अपना हाथ बढ़ाकर आपको थाम ले।

    तब आप कमज़ोर महसूस नहीं करते, बल्कि खुद को लकी समझते हैं कि आपके पास कोई है जो आपके सुख-दुख में आपके साथ खड़ा है। मैं आपको इस फीलिंग को महसूस करने का मौका ज़रूर दूँगी।

    मैं आपकी कमज़ोरी नहीं, आपकी ताक़त बनूँगी। परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, मैं हमेशा आपका साथ निभाऊँगी। अब कभी आप खुद को तन्हा महसूस नहीं करेंगे क्योंकि मैं रहूँगी आपके पास। आप जिसे अपनी कमज़ोरी समझ रहे हैं और जिसके वजह से आपने खुद को दुनिया से अलग कर लिया है, यहाँ चारदीवारी के बीच खुद को कैद कर लिया है, वो आपकी कमज़ोरी नहीं है। आपने उसे अपनी कमज़ोरी बनाया हुआ है।

    माँ बता रही थीं कि आप ठीक हो सकते हैं, पर होना नहीं चाहते। मैं आपके अंदर इच्छा जगाऊँगी फिर से अपने पैरों पर खड़े होने और चलने की। आप ठीक ज़रूर होंगे और उसके बाद आपको कभी मेरे सहारे की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

    तब शायद आपकी ज़िंदगी में मेरी कोई अहमियत न बचे, पर मैं इंतज़ार करूँगी उस दिन का, जब मैं आपके दिल में वो जगह बना लूँगी कि उसके बाद आपको मेरे साथ की ज़रूरत नहीं, चाहत होगी। आप चाहेंगे कि मैं आपके साथ रहूँ। जब आप कमज़ोर पड़ें, तो आप मेरे साथ को महसूस करना चाहेंगे।

    तब मेरी मौजूदगी आपको सुकून देगी। मैं हमेशा आपका साथ निभाऊँगी और ये कोई मजबूरी नहीं, चाहत है मेरी कि मैं आपकी ज़िंदगी का अभिन्न अंग बनकर हमेशा आपके साथ रहूँ। I Wish कि जल्दी ही आपकी नाराज़गी दूर हो जाए, ताकि मैं अपना फ़र्ज़ निभा सकूँ और आप मुझे रोके न।"

    To be continued....

  • 10. The Forced Vows - Chapter 10

    Words: 1924

    Estimated Reading Time: 12 min

    "मैं हमेशा आपका साथ निभाऊँगी और ये कोई मजबूरी नहीं, चाहत है मेरी कि मैं आपकी ज़िंदगी का अभिन्न अंग बनकर हमेशा आपके साथ रहूँ। आई विश कि जल्दी ही आपकी नाराज़गी दूर हो जाए, ताकि मैं अपना फ़र्ज़ निभा सकूँ और आप मुझे रोके न।"

    आकृति को लगा कि अंगद सो चुका है और वो उसको देखते हुए अपने दिल की बात उसके सामने बयाँ करने लगी, जो वो उसके जागते हुए कहना चाहती थी पर कह न सकी। उसको सोता समझ उसने अपना दिल खोलकर उसके सामने रख दिया था।

    वो ये तो पहले भी जानती थी कि इस रिश्ते को निभाना उसके लिए आसान बिल्कुल नहीं होगा। शादी के बाद उसकी ज़िंदगी आम शादीशुदा लड़कियों के तरह बिल्कुल नहीं होगी। उसे इस माहौल में खुद को ढालने में, खुद को अंगद के हिसाब से बदलने में बहुत दिक्कतों का सामना करना होगा। इस रिश्ते को निभाने के लिए उसको बहुत-सी मुश्किलों को पार करना होगा।

    पर उसको ये अंदाज़ा ज़रा भी नहीं था कि उसको अपने ही पति के दिल से उसके लिए पहले से मौजूद बदगुमानी को भी दूर करना होगा। नहीं जानती थी वो कि इस रिश्ते के वजूद को बनाए रखने के लिए उसको इतना संघर्ष करना होगा, अपने अधिकार के लिए अपने पति से लड़ना होगा, उसकी बेरुख़ी सहनी होगी। उसके दिमाग से अपने लिए बनी उस ग़लत धारणा को मिटाकर उसको विश्वास दिलाना होगा अपनी सच्चाई पर।

    वो आज के अंगद के बर्ताव से समझ गई थी कि अंगद उसको ग़लत समझ रहा था और अब उसको उसकी नज़रों में खुद को सही साबित करना था। जानती थी कि आगे का रास्ता आसान नहीं होगा, पर अब पीछे हटने का कोई चांस ही नहीं था। हर मुश्किल को पार करके उसको इस रिश्ते को निभाना ही था।

    अंगद ने मन में अपने लिए जगह बनानी ही थी। उसके लाख इंकार के बाद भी उसको अपना पत्नीधर्म निभाना ही था और इसके लिए वो खुद को मानसिक तौर पर तैयार भी कर चुकी थी। उसने दृढ़ संकल्प लिया था कि अंगद आज जिस शादी के वजूद को स्वीकारने से इंकार कर रहा है, उसकी नज़रों में इस शादी की अहमियत जगानी है।

    उसने अपने दिल की बात सोते हुए अंगद को साफ-साफ बता दी। फिर रूम में जल रहे कैंडल्स को बुझाने के बाद उसने बेड के बीच में टॉवल के बने उस हंसों के जोड़े को हटाया और वहाँ बिखरे फूलों को वहाँ से हटा दिया।

    आकृति ने अब सोते हुए अंगद को एक नज़र देखा, फिर बेड के दूसरे कोने में जाकर खुद में सिमटकर लेट गई। एक तो अंजान जगह, उस पर पहली बार किसी लड़के के साथ बेड शेयर कर रही थी, तो दिल घबरा रहा था उसका। हालाँकि बेड बहुत बड़ा था और उसको अंगद पर विश्वास भी था, फिर भी उसको बहुत अजीब लग रहा था।

    कुछ देर वो यूँही अपनी उलझनों में गुम लेटी रही, फिर कल से शादी की रस्मों में बिज़ी रहने के वजह से थकान के मारे उसकी आँखें लग गईं।

    बेड के दूसरे तरफ लेटा अंगद जो सोया ही नहीं था, बस खामोशी से लेटा आकृति की बातें सुन रहा था। आकृति की बातें, जो उसके दिल से निकल रही थीं, सीधे अंगद के दिल तक पहुँच रही थीं।

    वो ऐसे उसकी बात सुनना नहीं चाहता था, पर आकृति जो बातें कह रही थी, अंगद चाहकर भी उसको ये न बता सका कि वो जाग रहा है और सोने का नाटक करते हुए उसकी बातें सुनने लगा। क्योंकि उसके जागते हुए आकृति अगर कुछ कहती तो मतलब हो सकता था कि वो उसको सुनाने के लिए जानबूझकर ऐसी बातें कह रही हो ताकि अंगद को अपनी बातों में फँसा सके। पर उसके सोते हुए उसका ये सब कहना, जबकि उसके हिसाब से तो अंगद कुछ सुन ही नहीं रहा होगा, उसकी सच्चाई को दर्शा रहा था कि वो कोई नाटक नहीं कर रही।

    जैसे ही अंगद को विश्वास हो गया कि आकृति सो चुकी है, उसने अपनी आँखें खोल दीं। कुछ पल एकटक निगाहें घुमाकर आकृति को देखता रहा, जिसकी पीठ उसके तरफ थी। उसके दिमाग में आकृति की कही बातें घूम रही थीं, जिन पर उसका दिल विश्वास करना चाहता था, पर दिमाग, जो पहले ही धोखा खा चुका था, वो उस पर विश्वास करने से कतरा रहा था।

    ठीक ही कहते हैं लोग, जब एक बार किसी के भरोसे को तोड़ा जाता है, तो उस इंसान के लिए फिर से किसी पर भरोसा करना बहुत मुश्किल हो जाता है, और वही अंगद के साथ हो रहा था इस वक़्त।

    वो कुछ पल खामोशी से उसको देखता रहा, फिर कुछ सोचकर उसने आगे बढ़कर उसको ब्लैंकेट से अच्छे से कवर कर दिया और वापस अपनी जगह लेट गया।

    आकृति की कही बातों के बारे में सोचते-सोचते ही कब उसकी आँख लग गई, उसको एहसास ही नहीं हुआ।

    अभी उसकी आँख लगे कुछ वक़्त ही हुआ था कि उसको अपने गाल पर किसी की गर्म हथेली का एहसास हुआ और इसके साथ ही उसने चौंक कर अपनी आँखें खोल दीं। उसने झट से सर घुमाकर देखा और जैसे ही उसकी नज़र सामने पड़ी, उसकी आँखें हैरानी से फैल गईं। वजह बस इतनी थी कि आकृति नींद में उसके बेहद क़रीब आ गई थी और उसी का हाथ उसके गाल को सहला रहा था।

    अंगद को कुछ अजीब-सा एहसास हुआ। उसने झट से हड़बड़ाहट में उसके हाथ को अपने गाल पर से हटाया, इतने में आकृति ने अपने पैर के नीचे उसके पैर को दबा दिया और वापस अपनी बाँह उसके ऊपर रख दी।

    अंगद ने तीन-चार बार उसके हाथ-पैर को हटाने की कोशिश की, पर आकृति हर बार उसके ऊपर चढ़ जाती। बेचारा अंगद बुरा फँसा था। आखिर में हार मानकर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और कुछ ही देर में उसको नींद आ गई।

    अगली सुबह

    देर रात जागने के वजह से अंगद अब भी गहरी नींद में सो रहा था। कुछ देर बाद आकृति ने मिचमिचाते हुए अपनी उनींदी आँखों को हल्के से खोला और जैसे ही उसकी नज़र उसके बगल में सो रहे अंगद पर पड़ी, उसकी आँखें हैरानी से फैल गईं।

    अब भी आकृति का हाथ उसके ऊपर था और पैरों ने अंगद के पैरों पर क़ब्ज़ा किया हुआ था। अंगद ने नींद में अपनी बाँह को उसकी कमर पर लपेट दिया था।

    आकृति की साँसें अटक गईं। वो कुछ पल आँखें फाड़े अंगद को देखती रही, फिर उसने अंगद के हाथ को अपने ऊपर से हटाया और झट से उठकर बैठ गई और अपने सीने पर हाथ रखकर गहरी-गहरी साँसें लेने लगी। फिर उसने खुद को ही डाँटते हुए कहा,

    "कृति, ये क्या किया तूने? तू भूल भी कैसे सकती है कि अब तू अपने घर में माँ के साथ नहीं है, बल्कि यहाँ इनके साथ है। नींद में कैसे उनसे चिपककर सो रही थी? जागते में वो तुझे अपने आस-पास भी न आने दें, देखा नहीं था कल कैसे तुझे छूने से रोक रहे थे और तू उनके ऊपर चढ़कर सो रही थी। वो तो अच्छा हुआ कि वो सो रहे थे। अगर जाग गए होते तो तुझे सीधे बेड से नीचे ही फेंक देते।

    अगर उन्होंने तुझे ऐसे देख लिया होता तो क्या सोचते तेरे बारे में? कैसी लड़की है तू, कि उनसे लिपटकर सो रही थी! कृति बेटा, अपने हाथ-पैर को काबू में रखना शुरू कर दे, वरना वो दिन दूर नहीं कि तेरे खडूस पति तुझे उठाकर सीधे कमरे से बाहर फेंक देंगे।

    तुझे थोड़ा एहतियात करने की ज़रूरत है, वरना तू बात बनने से पहले ही सब बिगाड़ देगी। अभी तो वो तुझसे ख़फ़ा है, कहीं तेरी बेवकूफ़ी इस नाराज़गी को नफ़रत में न बदल दे। पर मैं क्या करूँ? बचपन की आदत है ऐसे सोने की। अब आदत थोड़े न बदल सकती हूँ, वो भी तब जब मुझे सोने के बाद एहसास ही नहीं होता कि मैं नींद में कैसे सो रही हूँ।

    लेकिन कुछ तो करना होगा कृति। आज तो महादेव की कृपा थी जो उन्होंने नहीं देखा, अगर कल को उन्होंने तुझे ऐसे सोते देख लिया तो कहीं वो तेरे बारे में कुछ ग़लत न सोचने लगें। ऐसे काम नहीं चलेगा कृति, इस प्रॉब्लम का कुछ परमानेंट सॉल्यूशन ढूँढना ही होगा।"

    वो गहरी सोच में डूब गई, तभी अचानक उसका ध्यान सामने लगे सोफा सेट पर गया। उस किंग साइज सोफे पर कोई भी आराम से सो सकता था। ये देखकर उसकी आँखों में चमक आ गई और उसने मुस्कुराकर खुद से कहा, "अब से मैं इसी सोफे पर सोऊँगी। न जगह होगी, न मैं फैलूँगी, और अगर वहाँ हाथ-पैर चलाया भी तो ज़्यादा से ज़्यादा नीचे ही गिरूँगी न? कम से कम राणा साहब के ऊपर तो नहीं चढूँगी। मेरे वजह से उन्हें तो कोई प्रॉब्लम नहीं होगी।"

    आकृति ने खुद से ही फ़ैसला कर लिया। फिर मुस्कुराकर अंगद के तरफ निगाहें घुमाई तो उसकी निगाहें उसके चेहरे पर ठहर-सी गईं। वो सोते हुए बेहद मासूम लग रहा था। उसके सिल्की बाल उसके माथे पर लहरा रहे थे और चेहरे पर सुकून पसरा हुआ था। बिल्कुल किसी छोटे बच्चे जैसा मासूम लग रहा था वो इस वक़्त।

    आकृति कुछ पल उसको देखती रही, फिर हल्की मुस्कान के साथ बोली, "आप बहुत हैंडसम हैं। लगता ही नहीं कि इसी दुनिया से हैं। ऐसा लगता है जैसे किसी दूसरी दुनिया से आए राजकुमार हैं आप। पता नहीं आप मुझे कैसे मिल गए। मैंने तो कभी ऐसा कोई ख़्वाब देखा ही नहीं था और उस रात ने तो मुझसे ऐसे ख़्वाब देखने का हक भी छीन लिया था।

    मैंने अपनी किस्मत के साथ समझौता कर लिया था कि मेरे नसीब में किसी का प्यार नहीं है। मैंने मान लिया था कि अब मैं कभी किसी की ज़िंदगी का हिस्सा नहीं बन सकती।मेरी दुनिया मेरी माँ के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गई थी, पर आप किसी जादू के तरह मेरी ज़िंदगी में आए और मुझे अपनी ज़िंदगी में शामिल कर लिया।

    आपके वजह से मुझे अपनी माँ से दूर होना पड़ा, इसके लिए मैं आपसे नाराज़ हूँ, पर थोड़ा खुश भी हूँ। खुश हूँ कि मुझे आपके लिए कुछ करने का मौक़ा मिलेगा। और मैं कोशिश करूँगी कि आपके दिल में थोड़ी-सी जगह बना सकूँ। पर सबसे पहले मुझे आपके अंदर ठीक होने की इच्छा जगानी है, ताकि आप फिर से अपने पैरों पर खड़े हो सकें।"

    आकृति ने मुस्कुराकर उसको देखा, फिर बेड से नीचे उतर गई। उसने कबर्ड से अपने कपड़े निकाले, जो शादी से पहले उसको दिलाए गए थे, और बैग से अपना बाकी सामान लेकर बाथरूम में चली गई।

    कुछ देर बाद वो नहाकर चेंजिंग रूम में चली गई, क्योंकि उसको साड़ी पहननी थी, जो बाथरूम में नहीं पहन सकती थी और रूम में अंगद सोया हुआ था।

    कुछ आधे घंटे की मेहनत के बाद आकृति ने साड़ी पहनी और रूम में चली आई। ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़े होकर उसने अपने बालों को टॉवल से आज़ाद किया और उन्हें पोंछने लगी। उसके हाथों के हिलने के वजह से हाथ में पहने चूड़े की खनखनाहट मधुर संगीत के तरह हवाओं में घुल रही थी।

    अंगद के कानों तक भी ये आवाज़ पहुँच रही थी और अब उसके भाव कुछ बदलने लगे थे। आकृति ने अपने बालों को पोंछते हुए उन्हें दूसरी तरफ झटका, तो उसके गीले बालों से कुछ पानी की बूँदें आज़ाद होकर अंगद के चेहरे पर जाकर ठहर गईं।

    अगले ही पल अंगद ने झटके से अपनी आँखें खोल दीं और आँखें खोलते ही उसकी नज़र सामने खड़ी आकृति पर पड़ी। पहले तो वो अपने रूम में किसी लड़की को देखकर हैरान हो गया, फिर जल्दी ही उसको याद आया कि अब वो सिंगल नहीं है, शादी हो चुकी है, तो अब उसको इन चीज़ों की और शायद रोज़ सुबह ऐसे ही उठने की आदत डालनी होगी।



    To be continued....

  • 11. The Forced Vows - Chapter 11

    Words: 1970

    Estimated Reading Time: 12 min

    पिछली बार आपने देखा कि आकृति अंगद को अपने दिल की बात बता रही थी, ये सोचते हुए कि वो सो रहा है, जबकि अंगद जाग रहा था और सुन रहा था। वो इस रिश्ते को निभाने के लिए दृढ़ संकल्पित थी, चाहे उसमें कितनी भी कठिनाई क्यों न हो। उसने अपने पति का दिल जीतने का संकल्प लिया था। वो इस बात से भी चिंतित थी कि वो नींद में अंगद से सटकर सो गई थी। अगले दिन, आकृति ने फैसला किया कि वो सोफे पर सोएगी ताकि अंगद को असुविधा न हो। उसने सोते हुए अंगद को देखा और अपने दिल की बात कही, कि वो कितना सुंदर और खास है। उसने ये भी कहा कि वो उसे फिर से चलने लायक बनाने की कोशिश करेगी। वो तैयार होकर कमरे में वापस आई, जिससे अंगद की नींद खुल गई।

    अब आगे

    --------

    अंगद की निगाहें एकटक आकृति को निहारने लगीं। आकृति ने बन्द गले का, फुल स्लीव गोल्डन ब्लाउज पहना हुआ था और उसके साथ गहरे नीले रंग की कांजीवरम साड़ी थी, जिस पर गोल्डन कलर के थ्रेड वर्क का चौड़ा बॉर्डर था। साड़ी को बड़े ही सलीके से बांधा हुआ था, जिसने उसके पूरे कमर को कवर किया हुआ था। जिस तरफ से अंगद उसे देख पा रहा था, उस तरफ आकृति ने अपने बाल किए हुए थे, जिससे उसका चेहरा तो नहीं दिख रहा था, पर कमर से नीचे तक लहराते काले रेशमी बालों ने अंगद की निगाहों को अटकाया हुआ था।

    शायद उसने पहली बार इतने अच्छे और लंबे बाल देखे थे। कुछ पल वो एकटक उसे देखता रहा, फिर जैसे ही उसे आभास हुआ कि आकृति पलटने वाली है, उसने तुरंत उस पर से अपनी निगाहें हटा लीं और उठकर बैठ गया।

    उसका अंदाज़ा बिल्कुल ठीक निकला। आकृति किसी की निगाहों के खुद पर टिके होने का एहसास पाकर झटके से उसकी तरफ पलट गई थी। जब उसने अंगद को देखा तो वो बेड से उतरने जा रहा था। ये देखकर आकृति ने घबरा गयी।

    "आप मत उतरिए, रुक जाइए।"

    उसके अचानक तेज आवाज़ से रोकने पर अंगद ने हैरानी से उसकी तरफ निगाहें घुमाईं। उसके कानों में किसी की आवाज़ गूंज उठी, "रुक जाइए।" यही वो शब्द थे जो उसके कानों में गूंज उठे थे और निगाहें हैरानी से आकृति को देखने लगी थीं।

    आकृति ने घबराकर आगे कहा, "बस एक मिनट रुकिए, मैं अभी आई।"

    इतना कहकर वो झट से ड्रेसिंग टेबल की तरफ घूम गई। उसने सिंदूर दान उठाया और चुटकी भर सिंदूर अपनी मांग में सजाकर तुरंत अंगद के पास चली आई।

    अंगद हैरान-परेशान सा उसे देख रहा था। आकृति के चेहरे पर उसकी निगाहें ठहर गईं।

    दूध से भी गोरा रंग, जिस पर हल्की गुलाबी रंगत छाई हुई थी, प्यारा सा छोटा सा गोल, मासूमियत से भरा चेहरा, जिस पर उसकी काली-काली बड़ी-बड़ी कजरारी आँखें थीं, जिनमें उसे अपने लिए परवाह नजर आ रही थी, पतले-पतले गुलाबी लब और उनके ठीक ऊपर मौजूद वो तिल, जो उसकी खूबसूरती पर चार चाँद लगा रहा था, दोनों तरफ से कमर से नीचे तक लहराते बाल, बीच की मांग में हक से अपनी मौजूदगी जाहिर करता सुर्ख सिंदूर, गले में छोटा सा मंगलसूत्र, मेहंदी लगी कलाइयों में भरा-भरा चूड़ा, तराशे गए बदन पर और गोरे रंग पर वो साड़ी बहुत जंच रही थी।

    आज बिना किसी साज-श्रृंगार के वो सादगी में भी कहर ढा रही थी। अगर इस वक्त कोई उसे देख ले तो अपना दिलो-जान उसकी सादगी पर हार जाए। शायद अंगद पर भी उसके रूप का जादू चलने लगा था और सबसे ज्यादा जो चीज उसे आकृति की तरफ आकर्षित कर रही थी, वो थी उसकी सादगी और मासूमियत, आँखों में झलकती सच्चाई और उसका यूँ उसकी परवाह करना।

    आकृति उसके पास चली आई। उसने उसके दोनों पैरों को बेड से नीचे किया, फिर उसके कंधों को थामते हुए उसे बड़े ध्यान से व्हीलचेयर पर बिठा दिया। उसे बिठाते वक्त आकृति उसके तरफ झुकी हुई थी, जिस वजह से उसका चेहरा अंगद के चेहरे के बेहद करीब था।

    उसके बाल, उसके लंबे बाल चेहरे को ढकने लगे थे, साथ ही उन काले घने बादलों के बीच अंगद का चेहरा भी छुप गया था। जहाँ आकृति का सारा ध्यान अंगद को ठीक से व्हीलचेयर पर बिठाने पर था, वहीं अंगद एकटक उसकी काली बड़ी-बड़ी कजरारी आँखों को देख रहा था, जो उसको कुछ याद दिला रही थीं।

    आकृति ने उसे ठीक से बिठाया, फिर अपने बालों को समेटकर कान के पीछे खोंसते हुए पीछे हट गयी, "सॉरी, आपसे बिना पूछे आपको छुआ।"

    अंगद ने अपने मन के ख्यालों को झटकते हुए गंभीर अंदाज़ में कहा, "थैंक्स, बट तुम्हें ये सब करने की ज़रूरत नहीं है।"

    उसकी बात सुनकर आकृति ने बेहद संजीदगी से जवाब दिया, "जानती हूं आपको मेरी कोई ज़रूरत नहीं, पर मैं ये करना चाहती हूं। ये मेरी मजबूरी नहीं, चाहत है। हमसफर हूं मैं आपकी, तो इस सफर को साथ मिलकर तय करने की इच्छा है मेरी।

    पति-पत्नी का फर्ज होता है एक दूसरे के मुश्किल के वक्त एक दूसरे का सहारा बनें। जब उनका जीवनसाथी कमजोर पड़ने लगे तो उसकी ताकत बढ़ाए और मैं उन वचनों को दिल से निभाना चाहती हूं जो शादी के वक्त मैंने आपको दिए थे।

    Don't worry, मैं ये सब किसी के दबाव में आकर या किसी मजबूरी की तरह नहीं कर रही और न ही आप पर तरस खाकर ऐसा कुछ करने की मैं कभी सोच सकती हूं, क्योंकि तरस उन पर खाया जाता है जो हालात के आगे बेबस, लाचार और कमजोर पड़ जाते हैं।

    मेरी नज़र में आप एक फाइटर हैं, मैं आपकी दिल से इज्जत करती हूं और अब आपका साया बनकर आपके साथ रहना चाहती हूं। जो रिश्ता मेरा आपसे जुड़ा है, उसको निभाना चाहती हूं। इतना हक तो आप मुझे दे ही सकते हैं।"

    आकृति की बात सुनकर अंगद बिना कुछ कहे बाथरूम की तरफ बढ़ गया। आकृति कुछ पल मायूस निगाहों से उसे देखते हुए पीछे से बोली, "मैं आपके कपड़े निकाल दूं? अगर आप कहें तो?"

    उसकी आवाज़ में हिचकिचाहट साफ झलक रही थी, जिसे अंगद ने भी महसूस किया और आगे बढ़ते हुए बिना किसी भाव के बोला, "Hmm।"

    उसका जवाब सुनकर आकृति का चेहरा खिल उठा। वो जल्दी से कबर्ड की तरफ भाग गई। कबर्ड खोलकर देखा तो एक तरफ बढ़िया-बढ़िया बिजनेस सूट रखे थे, दूसरी तरफ कैजुअल शर्ट-पैंट और कुछ टी-शर्ट भी रखी थीं।

    इतने सारे कपड़े देखकर पहले ही आकृति का सर घूम गया, फिर उसने अपना सर झटका और उन कपड़ों को देखते हुए तेज आवाज़ में बोली, "राणा साहब, आप क्या पहनेंगे? टी-शर्ट और ट्राउज़र निकाल दूं या फिर आप शर्ट-पैंट पहनेंगे? वैसे टी-शर्ट और ट्राउज़र ज्यादा कंफर्टेबल रहेंगे।"

    वो बस बोले जा रही थी और अंदर बाथरूम में मौजूद अंगद खामोशी से उसकी बात सुन रहा था। थोड़ा हैरान भी था वो ये देखकर कि आकृति उसके साथ इतना सहज कैसे है? तो खुद पर भी हैरानी हो रही थी कि वो क्यों उसकी हर बात मान रहा है? क्यों उसकी उदासी उसे चुभ रही थी?

    उसने कभी किसी सर्वेंट को भी अपनी चीजों को हाथ नहीं लगाने दिया था, कभी किसी और की पसंद के कपड़े नहीं पहनता था। वही पहनता जो वो चाहता, वही करता जो करने की इच्छा उसकी होती। फिर कल की आई इस लड़की में ऐसा क्या था कि वो उसकी बात भी सुन रहा था, मान रहा था और उसे अपने कपड़े छूने का हक भी दे दिया था।

    वो खुद में ही उलझा हुआ था, तभी एक बार फिर उसके कानों में आकृति की मीठी सी उलझन भरी आवाज़ पड़ी, "राणा साहब, बताइए न क्या पहनेंगे आप?"

    अंगद जैसे किसी गहरी सोच से बाहर आ चुका था, उसने रौबदार आवाज़ में जवाब दिया, "आज मेरी मीटिंग है, तो बिजनेस सूट निकाल दो।"

    उसकी बात सुनकर आकृति की आँखें बड़ी-बड़ी हो गईं और उसने हैरानी से पूछा, "आप ऑफिस जाने वाले हैं? पर माँ तो कह रही थीं कि आप घर से कहीं बाहर नहीं जाते।"

    "वीडियो कॉल पर मीटिंग है।" अंदर से अंगद की आवाज़ आई, तो आकृति ने अपने होंठों को गोल करते हुए खुद से ही कहा, "Oooo, आप वीडियो कॉल पर मीटिंग करेंगे, मैं तो भूल ही गई थी कि अब ये भी होता है।"

    उसने सारे सूट देखने के बाद ग्रे कलर का बिजनेस सूट निकालकर बेड पर रख दिया और खुद रेडी होने लगी। कुछ देर बाद अंदर से अंगद की आवाज़ आई, "रूम से बाहर जाओ तुम।"

    उसकी बात सुनकर आकृति तुरंत कमरे से बाहर भाग गई। वो नीचे आई और मंदिर की तरफ बढ़ गई। वहां ममता जी पहले ही पूजा की तैयारी कर रही थीं।

    आकृति ने जाकर उनके पैर छूकर उन्हें गुड मॉर्निंग विश किया। ये देखकर उनके लबों पर गहरी मुस्कान ठहर गई। उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया, फिर प्यार से उसके गाल को छूकर बोलीं, "बहुत प्यारी लग रही हैं आप।"

    आकृति उनकी बात सुनकर हल्के से मुस्कुरा दी और पूजा की तैयारी में उनकी मदद करवाने लगी। कुछ देर बाद ममता जी ने रंजन को अनु और नील को बुलाने को कहा और आकृति को अंगद के पास भेज दिया।

    आकृति खुशी-खुशी कमरे की तरफ बढ़ गई। भले ही वो अपनी मां से दूर थी, पर ममता जी का होना काफी हद तक उस कमी को पूरा कर रहा था। फिर सुनंदा जी ने भी उससे यही कहा था कि अब से ये उसका घर है और उसे इस घर और इन रिश्तों को दिल से संभालना है।

    नए माहौल में खुद को ढालने की कोशिश वो शुरू कर चुकी थी। अंगद के साथ सहज होने की कोशिश कर रही थी वो ताकि दोनों के बीच अंडरस्टैंडिंग बने और अंगद की नाराजगी को वो दूर कर सके।

    आकृति ने जैसे ही रूम का दरवाजा खोलकर अंदर कदम रखा, उसके कदम जहाँ के तहां जम गए और निगाहें एकटक सामने मौजूद अंगद को निहारने लगीं। ग्रे कलर का बिजनेस सूट, जिसके नीचे ब्लैक ट्राउज़र पहना हुआ था, क्योंकि वीडियो कॉल में ऊपर का हिस्सा ही दिखता था। जेल लगाकर सलीके से ऊपर की तरफ सेट किए बाल। दाएं हाथ की चौड़ी कलाई पर ब्रांडेड वॉच, जो उसके पर्सनालिटी से मैच हो रही थी। पैरों में घर के स्लीपर्स ही पहने हुए थे।

    हैंडसम से चेहरे पर अलग ही तेज झलक रहा था, उसका रुतबा ही कुछ अलग था, चेहरे पर जो रुआब झलक रहा था, वो उस पर सूट करता था। कमाल की पर्सनालिटी का मालिक था वो, देखने में किसी हीरो से कम नहीं था, शायद तभी लड़कियाँ उसकी एक झलक की दीवानी थीं। व्हीलचेयर पर बैठा था, पर उसकी ये कमी उसके चार्म को ज़रा भी कम नहीं कर पा रही थी।

    आकृति ने पहली बार इतने हैंडसम लड़के को अपने सामने देखा था, इस वक्त अंगद बहुत अलग और चार्मिंग लग रहा था और आकृति खोई हुई सी एकटक उसे देखे जा रही थी।

    अंगद ने जब उसकी निगाहों को खुद पर टिका देखा तो भौंह सिकोड़ते हुए बोला, "यहां क्या कर रही हो? और मुझे ऐसे क्यों देख रही हो जैसे पहले कभी किसी लड़के को न देखा हो?"

    उसके सवाल ने आकृति को होश में लौटने पर मजबूर कर दिया, उसने तुरंत उस पर से अपनी निगाहें हटाते हुए हड़बड़ाहट में कहा, "नहीं, ऐसा नहीं है। लड़के तो बहुत देखे हैं, पर आप जितना हैंडसम लड़का आज तक नहीं देखा।"

    आकृति ने ये कहते ही अपनी जीभ को दांतों तले दबा लिया, साथ ही बेबसी से अपनी आँखें भींच लीं। अंगद ने उसका जवाब सुना तो आँखें बड़ी-बड़ी करके उसे देखते हुए बोला, "What?"

    आकृति ने झट से आँखें खोलकर उसे देखा और सफाई देते हुए बोली, "मेरा मतलब था कि मैंने पहले कभी किसी हीरो को अपनी आँखों से नहीं देखा ना, और आप एकदम हीरो जैसे लग रहे हैं, बस इसलिए।"

    "इसलिए मौका मिलते ही तुमने मुझे ताड़ना शुरू कर दिया," अंगद भौंहें उचकाकर उसे देखने लगा।

    उसका सवाल सुनकर आकृति ने तुरंत इनकार में सिर हिलाते हुए कहा, "नहीं, नहीं, मैं आपको ताड़ नहीं रही थी, वो तो बस।"

    To be continued....

  • 12. The Forced Vows - Chapter 12

    Words: 1970

    Estimated Reading Time: 12 min

    "इसलिए मौका मिलते ही तुमने मुझे ताड़ना शुरू कर दिया," अंगद भौंह उचकाकर उसे देखने लगा।

    उसका सवाल सुनकर आकृति ने तुरंत इनकार में सर हिलाते हुए कहा, "नहीं, नहीं, मैं आपको ताड़ नहीं रही थी। वो तो बस..."

    कहते-कहते वो खामोश हो गई। आगे क्या कहे, समझ ही नहीं आया, क्योंकि सच तो वही था जो अंगद ने अभी-अभी कहा था, इसलिए उसने अपना सिर झुका लिया और निचले होंठ को बाहर निकालकर मासूम सी शक्ल बना ली। उसकी इस अदा को देखकर जाने क्यों, अंगद के लबों पर मुस्कान ठहर गई। जिसे उसने बड़ी ही आसानी से छुपाते हुए, सख्त लहजे में उससे फिर सवाल किया, "यहाँ क्यों आई थी?"

    उसका सवाल सुनकर आकृति ने सिर झुकाए हुए ही जवाब दिया, "माँ ने आपको पूजा के लिए बुलाया है।"

    "ठीक है, तुम चलो, मैं आता हूँ कुछ देर में।" अंगद ने जैसे ही ये कहा।

    आकृति ने तुरंत नज़र उठाकर उसे देखते हुए कहा, "नहीं, माँ ने कहा है कि आपको अपने साथ ही लेकर आऊँ, वरना आप आएँगे नहीं।"

    उसकी बात सुनकर अंगद की भौंहें सिकुड़ गईं। उसने आँखें छोटी करके उसे घूरा, "ये माँ ने कहा तुमसे?"

    आकृति ने मासूमियत से हाँ में सर हिलाते हुए जवाब दिया, "हाँ, माँ ने कहा है कि आप ऐसे ही बहाना बनाकर पूजा में आने की बात टाल देते हैं, और आज शादी के बाद मैं पहली बार पूजा करने वाली हूँ, इसलिए आपको भी मेरे साथ पूजा करनी है। इसलिए, अगर आप कहें तो मैं आपको नीचे ले चलूँ?"

    अंगद ने कुछ नहीं कहा, तो उसकी खामोशी को उसकी सहमति समझकर आकृति उसके पास चली गई और व्हीलचेयर को संभालते हुए आगे बढ़ते हुए बोली, "वैसे, मैं आपसे कुछ पूछना चाहती हूँ, पूछूँ?"

    "हमम।"

    "आप महादेव से रुष्ट हैं?" आकृति का सवाल सुनकर अंगद खामोश रह गया।

    तो आकृति ने ही आगे कहना शुरू किया, "मतलब, आप सच में किसी बात पर उनसे रुष्ट हैं। पर वो तो भगवान हैं, आपको उनसे नाराज नहीं होना चाहिए, क्योंकि वो जो करते हैं, उसके पीछे हमारे लिए कुछ अच्छा ही छुपा होता है, जो हमें उस वक्त समझ नहीं आता। इसलिए हम उन्हें गलत समझ लेते हैं, उनके फैसले पर सवाल भी उठाते हैं, कभी-कभी उनसे नाराज होकर उन्हें कोसते भी हैं कि उन्होंने हमारे साथ ही ऐसा क्यों किया? पर तब हम हमारे लिए उनके बनाए प्लान से अनजान होते हैं।

    मेरे पापा कहते थे कि एक पल को इस धरती पर हमें लाने वाले हमारे माता-पिता गलत हो सकते हैं, पर महादेव कभी गलत नहीं होते। उन्हें अपने हर बच्चे का, उनके दुख का, उनकी तकलीफ का एहसास होता है। वो जो करते हैं, उसके पीछे हमारे लिए कुछ न कुछ अच्छा ही छुपा होता है, इसलिए हमें उन पर सवाल उठाने की जगह, उन पर विश्वास करना चाहिए। उनके फैसले का सम्मान करना चाहिए और बाकी सब उन पर छोड़कर, बस उनके दिखाए रास्ते पर चलते जाना चाहिए, उसके बाद हमें एक बेहतर मंजिल तक वो खुद पहुँचा देते हैं।"

    अंगद चुपचाप सुन रहा था। जिससे आकृति को हिम्मत मिली।

    "अगर आप भी किसी बात पर उनसे नाराज हैं, तो एक बार उस नाराजगी की वजह के बारे में अच्छे से सोचिये। क्या सच में उसके पीछे कुछ अच्छा नहीं छुपा था? हो सकता है आप सिर्फ उसके एक पहलू को देखकर महादेव को गलत ठहरा रहे हों और अब तक आपने उसके अच्छे पहलू पर गौर ही न किया हो।"

    बातों-बातों में आकृति ने बहुत गहराई की बात कह दी थी, और उसकी बात ने अंगद को सोचने पर मजबूर कर दिया था। वो अपने एक्सीडेंट और प्राची को खोने की वजह से महादेव से नाराज था। पर शायद सब अच्छे के लिए ही हुआ था।

    अगर उसका एक्सीडेंट न हुआ होता, अगर वो पैरालाइज्ड न होता, तो शायद वो कभी ये जान ही नहीं पाता कि जिसे वो अपनी जान से ज्यादा प्यार करता था, जिसको अपनी वाइफ बनाकर अपनी ज़िंदगी में शामिल करना चाहता था, वो एक मौकापरस्त, खुदगर्ज इंसान थी।

    जब तक वो ठीक था, वो उसके साथ रही और जैसे ही उस पर मुसीबत आई, सबसे पहले उसने ही उससे ये कहकर कन्नी काट ली कि वो उसके लायक नहीं है, वो एक ऐसे इंसान के साथ ज़िंदगी नहीं बिता सकती जो खुद अपने कामों के लिए दूसरों पर निर्भर हो।

    इस एक्सीडेंट ने उसको लोगों के असली चेहरे दिखा दिए कि कौन उसके अपने हैं, कौन उसे सच में प्यार करते हैं, और कौन सिर्फ मतलब के लिए उसके साथ थे।

    अगर ये एक्सीडेंट न हुआ होता, तो वो प्राची से शादी कर चुका होता और आगे जब उस पर कोई प्रॉब्लम आती, तब प्राची उससे अपना रिश्ता तोड़कर चली जाती। उस वक्त शायद उसको ज्यादा तकलीफ होती।

    इस एक्सीडेंट ने उसका रिश्ता एक गलत साथी के साथ जुड़ने से बचा लिया था। हाँ, वो अभी इस बात के लिए श्योर नहीं था कि आकृति उसके लिए सही जीवनसाथी है या नहीं, वो ज़िंदगी के हर उतार-चढ़ाव में उसके हमसफर के तौर पर उसका साथ निभा पाएगी या नहीं, पर इतना समझ गया था कि आकृति प्राची से बहुत अलग है।

    दोनों में कोई तुलना ही नहीं थी, क्योंकि प्राची जहाँ एक शातिर दिमाग की चालाक लड़की थी जो हर चीज़ में, हर रिश्ते में फायदा ढूंढती थी, वहीं आकृति साफ दिल की, मासूम सी लड़की थी जो बस रिश्तों को दिल से निभाना जानती थी।

    शायद उसका एक्सीडेंट होना ठीक ही था, वो एक गलत रिश्ते से आज़ाद हो गया और शायद एक बार धोखा खाने के बाद ही सही, पर अब उसने सच्चे हमसफर को पा लिया है। अंगद अपनी सोच में गुम था, तभी उसके कानों में अनु की अचरज भरी आवाज़ पड़ी, "भाई!"

    अनु की आवाज़ ने उसको अपनी सोच से बाहर ला दिया था। उसने सामने देखा तो ममता जी के साथ अनु और नील खड़े थे। जहाँ ममता जी और नील उसे देखकर मुस्कुरा रहे थे, वहीं अनु आँखें फाड़े उसको देख रही थी।

    अंगद को उसकी हैरानी की वजह समझ नहीं आई, तो वो कंफ्यूज निगाहों से उसको देखते हुए बोला, "क्या हुआ? ऐसे आँखें फाड़े क्यों देख रही है मुझे?"

    "हैरानी की ही तो बात है भाई। मैंने तीन साल पहले आपके लिए ये सूट डिज़ाइन किया था, पर आपने मुझे ये कहकर इस सूट को पहनने से इनकार कर दिया था कि आपको ये कलर पसंद नहीं है, और आज आपने वही सूट पहना हुआ है।

    इतना ही नहीं, आपने भाभी को अपनी चेयर पुश करने दिया, जबकि आप किसी को अपनी हेल्प नहीं करने देते, और सबसे बड़ी हैरानी की बात है कि आप मंदिर में आए हैं। पिछले छह महीनों में ये दूसरी बार है जब आप यहाँ आए हैं। कल तो आपकी मजबूरी थी, इसलिए आपने मंदिर में कदम रखा था, पर आज..."

    वो अब भी हैरानी से आँखें फाड़े उसको देखे जा रही थी। उसकी बातें सुनकर आकृति भी कुछ हैरानी से अंगद को देखने लगी थी, वहीं अंगद खुद हैरान था कि आज उसने यही कलर बिना कुछ कहे कैसे पहन लिया? कैसे आकृति के कहने पर इनकार नहीं कर सका और उसको अपनी व्हीलचेयर पुश करने दिया, जबकि उसको ये बिल्कुल पसंद नहीं था।

    अंगद के चेहरे पर आए हैरानी और उलझन भरे भावों को देखकर नील ने आगे बढ़ते हुए, मुस्कुराकर कहा, "चल, इन बातों को छोड़। ये अच्छी बात है कि तू बदल रहा है, वक़्त के साथ बदलाव ज़रूरी होता है। वैसे भी, ये रंग तुझ पर सूट कर रहा है।"

    उसकी बात सुनकर अनु ने भी उसकी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, "हाँ भाई, वैसे तो आपका ये बंदर दोस्त कभी कोई ढंग की बात करता नहीं है, पर आज वो ठीक कह रहा है। आप पर ये सूट बहुत जँच रहा है। जब मैंने इसे डिज़ाइन किया था, तब मैंने नहीं सोचा था कि आप पर इतना जँचेगा। बहुत हैंडसम लग रहे हैं आप इसमें। अगर अभी कोई लड़की आपको देख ले तो खड़े-खड़े आप पर फ़िदा हो जाए।"

    उसकी बात सुनकर अंगद के भाव कुछ बदले, साथ ही आकृति भी कुछ असहज हो गई। कुछ देर पहले उसका भी तो यही हाल था।

    ममता जी ने आगे आकर प्यार से अंगद के सर पर हाथ फेरते हुए कहा, "अब हमें लग रहा है कि जल्दी ही हमें हमारा बेटा वापस मिल जाएगा, और हम जानते हैं कि कहीं न कहीं ये चमत्कार आकृति ने किया है कि आज आप अपनी इच्छा से यहाँ आए हैं। और आकृति ही आपको फिर से जीना सिखाएंगी। हमने आपके लिए बिल्कुल सही हमसफर का चुनाव किया है।"

    ममता जी ने प्यार से आकृति को देखते हुए आखिरी बात कही तो सबकी नज़रें आकृति की तरफ घूम गईं। सच ही कहा था उन्होंने, अंगद में आया बदलाव आकृति की वजह से ही था।

    अनु झट से आगे बढ़कर आकृति के गले से लगते हुए मुस्कुराकर बोली, "थैंक यू भाभी। आप सच में कोई परी हैं। आपके वजह से भाई फिर से नॉर्मल होने लगे हैं, बदलने लगे हैं वो। थैंक यू भाभी। आप हमेशा यूँही भाई के साथ उनकी हिम्मत बनकर रहिएगा।"

    आकृति ने हौले से हाँ में सर हिला दिया। नील तो अंगद को देखकर मुस्कुरा रहा था, शायद उसकी उलझन को समझ रहा था वो। बातों के बाद, आकृति ने महादेव की स्तुति करके पूजा शुरू की और उसकी मीठी आवाज़ में शिव स्तोत्र सुनकर सभी मंत्रमुग्ध से हो गए।

    अंगद भी अनायास ही उसके साथ मिलकर शिव स्तोत्र गाने लगा, तो जहाँ आकृति और बाकी सब हैरान हुए, वहीं उनके लबों पर मुस्कुराहट भी खिल गई।

    पूजा के बाद आकृति ने अंगद के साथ मिलकर महादेव की आरती की, फिर उन्हें प्रसाद चढ़ाने के बाद सबको प्रसाद और आरती दी। पूजा के बाद आकृति को ममता जी ने उसकी पहली रसोई के लिए कुछ मीठा बनाने को कहा, तो वो किचन में चली गई।

    अनु नील के साथ बाहर गार्डन में चली आई। आज सबके लबों पर सुकून भरी मुस्कान फैली हुई थी। शादी के बाद एक ही दिन में अंगद में जो बदलाव आए, वो उन्हें अच्छे कल की उम्मीद दे रही थी।

    अंगद अपने स्टडी रूम में जाकर अपना काम करने लगा था। एक्सीडेंट के बाद से उसने अपना ऑफिस अपने स्टडी रूम में शिफ्ट कर लिया था और वहीं से अपना सब काम संभाल रहा था।

    कुछ एक घंटे बाद सभी डाइनिंग एरिया में मौजूद थे। अंगद भी वहाँ आ चुका था। सब अपनी-अपनी चेयर पर बैठ गए तो आकृति ने खाना सर्व करने लगी। ये देखकर अनु ने उसको रोकते हुए कहा, "भाभी, रहने दीजिए। खाना तो आपने बना ही दिया है, सर्व रंजन कर देगा। आप भाई के पास बैठकर हमारे साथ ब्रेकफास्ट कीजिए।"

    आकृति ने उसकी बात सुनी तो निगाहें उठाकर उसको देखते हुए मुस्कुराकर बोली, "खाने का स्वाद सिर्फ नमक, मिर्च, मसालों से नहीं बनता, बल्कि बनाने वाले की नियत भी उसमें झलकती है। अगर खाने को प्यार से बनाया जाए, तो उसका स्वाद अलग ही आता है, और जब उसको उतनी ही प्यार से परोसकर खिलाया जाए, तो उसका स्वाद दोगुना हो जाता है। जितना ज़रूरी अच्छे से, प्यार से खाना बनाना है, उतना ही इंपॉर्टेंट है उसको प्यार से परोसकर सबको खाना खिलाना।

    खाना बना तो कोई भी लेता है, पर गृहणी जब खुद अपने हाथों खाना बनाकर, उसको परोसकर प्यार से खिलाती है, उसमें जो सुकून होता है, वो किसी और के खाने को सर्व करने में नहीं होगा। वैसे भी, मैं घर पर भी पहले सबको खाना सर्व करती थी, फिर ही खाती थी। मुझे अच्छा लगता है सबको खाना खिलाना। तो आप सब खाइए, मैं आप सबके बाद खा लूंगी।"

    आकृति की बात सुनकर ममता जी मुस्कुरा उठीं। एक बार फिर आकृति के संस्कार उनके दिल में उतर गए थे। अनु के तो सर के ऊपर से उसकी बात गुज़र गई थी, वहीं नील गौर से अंगद के चेहरे को देख रहा था, शायद वो जानता था कि अब आगे क्या होने वाला है।

    जैसे ही आकृति चुप हुई, वहाँ अंगद की रौबदार आवाज़ गूंज उठी।

    To be continued....

  • 13. The Forced Vows - Chapter 13

    Words: 1612

    Estimated Reading Time: 10 min

    जैसे ही आकृति चुप हुई, वहाँ एक रौबदार आवाज़ गूंज उठी।

    "चुपचाप साथ बैठकर खाना खाओ। सर्व करने का बहुत शौक है, तो एक बार सर्व करो और फिर चुपचाप आकर बैठकर सबके साथ नाश्ता करो। अगर किसी को कुछ चाहिए होगा, तो खुद ले लेगा या फिर सर्वेंट है इस काम के लिए, तो वो कर देंगे। तुम्हें सबके खाने तक इंतज़ार करने की कोई ज़रूरत नहीं है। ऐसा तो है नहीं कि तुम सर्व नहीं करोगी, तो खाना अच्छे से बेकार हो जाएगा या तुम्हारे सर्व करने से उसमें एक्स्ट्रा स्वाद मिल जाएगा, तो ये नाटक करने की कोई ज़रूरत नहीं है।"

    ये अंगद की आवाज़ थी। उसकी बात सुनकर नील के लबों पर रहस्यमयी मुस्कान फैल गई। अनु भी मुस्कुरा उठी।

    आकृति ने हैरानी से आँखें बड़ी-बड़ी करके अंगद को देखा, तो उसने उसकी तरफ निगाहें घुमाते हुए कहा, "सुनाई नहीं दिया क्या कहा है मैंने?"

    अंगद ने आँखें छोटी करके उसे घूरा, तो आकृति हड़बड़ाहट में बोली, "नहीं, मतलब हाँ, मैं बस सर्व करके बैठ ही रही हूँ, आप खाइए न।"

    उसने तुरंत छोटे से बाउल में हलवा डालकर उसे उसकी तरफ बढ़ा दिया और जैसे ही दूसरी तरफ जाने को मुड़ी, उसके कानों में नील की आवाज़ पड़ी।

    "भाभी, आपने गलत इंसान को गलत चीज़ सर्व कर दी है।" आकृति ने घूमकर सवालिया निगाहों से उसे देखा, जैसे पूछना चाह रही हो कि उसकी बात का मतलब क्या है? उसके सवाल को समझते हुए नील ने आगे कहा, "अंगद मीठा नहीं खाता।"

    उसने जैसे ही ये कहा, आकृति के मुँह से हैरानी से तेज़ आवाज़ में निकला, "क्या, ये मीठा नहीं खाते?"

    नील ने मुस्कुराकर इंकार में सिर हिला दिया, तो आकृति ने हैरानी से निगाहें अंगद की तरफ घुमाई, जो उसके रिएक्शन को देखकर आँखें छोटी-छोटी करके उसे ही घूर रहा था। उसके गुस्से भरे भाव देखकर आकृति ने जबरदस्ती बत्तीसी चमकाते हुए कहा, "Ohhh, सॉरी, मुझे पता नहीं था कि आपको मीठा खाने से एलर्जी है।"

    "एलर्जी नहीं है, बस मुझे मीठा पसंद नहीं है," अंगद ने उसे घूरते हुए उसकी गलती दिखाई।

    तो आकृति ने तुरंत अपनी गलती सुधारते हुए कहा, "हाँ, मेरा मतलब वही था कि मुझे नहीं पता था कि आपको मीठा पसंद नहीं है। वैसे एक बात बताइए, आपको मीठा नहीं पसंद, तो क्या कड़वा करेला पसंद है? तभी मैं सोचूँ कि आप इतना कड़वा क्यों बोलते हैं। करेला खाते हैं न, इसलिए जब मुँह खोलते हैं, तो कड़वी बात ही बोलते हैं।"

    आकृति एक बार फिर अपने में ही शुरू हो चुकी थी। उसका आज का व्यवहार कल से अलग था, इसलिए सब थोड़ा हैरान थे। वही, उसकी बात सुनकर अनु की तो हँसी छूट गई थी। नील भी मुस्कुरा रहा था और ममता के लबों पर भी प्यारी सी मुस्कान काबिज थी।

    अंगद पहले ही आकृति की बातों से चिढ़ा हुआ था। उसमें एक ही दिन में आए बदलाव देखकर वो हैरान भी था। पर फिर उसने सोचा, शायद कल परिस्थितियाँ ही गंभीर थीं, उसी हिसाब से उसका व्यवहार था और आज वो अपना असली नेचर दिखा रही थी। थोड़ी समझदार, थोड़ी चंचल और बातूनी। या शायद नर्वसनेस में वो उलटी-सीधी बातें कर रही थी, जिसका एहसास उसे खुद को भी नहीं था।

    अंगद पहले ही चिढ़ा हुआ था, जब उसके कानों में अनु की हँसने की आवाज़ पड़ी, तो उसने गुस्से भरी निगाहें उसकी तरफ घुमा लीं। अनु ने तुरंत अपने मुँह पर अपनी हथेली रख दी।

    अंगद ने अब घूरकर आकृति को देखा, तो उसने तुरंत अपने लबों पर उंगली रख ली और मासूम सी शक्ल बनाकर धीरे से बोली, "सॉरी, वो ये मेरी बचपन की आदत है। जब मैं परेशान या नर्वस होती हूँ, तो यूँ ही बकबक करती हूँ। पर उस बकबक का कोई मतलब नहीं होता, तो आप बुरा मत मानिए। आगे से मैं आपके सामने अपना मुँह नहीं खोलूँगी।"

    आकृति अपनी बड़ी-बड़ी पलकों को झपकाते हुए उसे देखने लगी। वो बेहद मासूम लग रही थी इस वक्त। अंगद चाहकर भी उस पर गुस्सा नहीं कर सका और उसने उस पर से निगाहें हटाते हुए कहा, "अगर बकवास से पेट न भरा हो, तो बैठकर खाना खाओ और अगर भर गया हो, तो हमें शांति से खाना खाने दो।"

    उसकी बात सुनकर आकृति तुरंत हामी भरकर उसके पास बैठ गई। जैसे ही सबने खाना शुरू किया, इसके साथ ही उनके लबों पर मुस्कुराहट फैल गई। सबने खाने की तारीफ की, पर अंगद खामोशी से खाना खाता रहा।

    आकृति की उम्मीद भरी निगाहें उसी पर टिकी थीं। ये देखकर नील ने अंगद से सवाल किया, "अंगद, तुझे खाना पसंद नहीं आया?"

    उसका सवाल सुनकर अंगद ने उसकी तरफ निगाहें उठाकर सहजता से कहा, "ठीक है, इंसान खा सकता है, इस लायक है।"

    उसका जवाब सुनकर आकृति का मुँह छोटा सा हो गया। नील भी खामोश हो गया। आकृति सिर झुकाए खाना खाने लगी और अंगद भी खामोशी से खाना खाने लगा।

    कुछ देर बाद आकृति ने सिर उठाकर अंगद को देखा और हाथ बढ़ाकर उसके आगे से हलवे की कटोरी हटाने लगी, पर अंगद ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    आकृति ने हैरानी से उसे देखा, वहीं अंगद ने बिना कुछ कहे उसके हाथ से कटोरी ले ली और एक स्पून हलवा खाने के बाद कटोरी उसकी तरफ बढ़ा दी।

    आकृति अपनी काली कजरारी आँखों को और बड़ा-बड़ा करके उसे देखने लगी, तभी उसके कानों में अंगद की धीमी सी आवाज़ पड़ी, "अच्छा खाना बनाती हो तुम।"

    उसके कहे ये चंद शब्द जहाँ आकृति की हैरानी की वजह थे, उसका मतलब समझने के बाद वो उसके लबों पर छाई मुस्कान का सबब बन चुके थे।

    अंगद ने दिखाया नहीं था, पर उसने आकृति के चेहरे पर छाई उदासी देखी थी और उसकी वजह से भी वाकिफ था। जाने कैसा रिश्ता जुड़ गया था उसका उससे कि उससे उसकी उदासी पल भर भी बर्दाश्त नहीं की गई और जब तक उसने उसके लबों पर पहले वाली मुस्कुराहट को नहीं देखा, उसका दिल बेचैन ही रहा।

    नील की तेज़ निगाहें उन दोनों पर टिकी थीं और वो आकृति के प्रति अंगद के झुकाव को बखूबी महसूस कर पा रहा था, जिसके वजह से उसके लबों पर संतुष्टि भरी मुस्कान थी।

    आकृति ने उसकी बात सुनी, तो मुस्कुराकर हल्के से हलवे की कटोरी को उसके तरफ बढ़ा दिया और फुसफुसाते हुए बोली, "अगर अच्छा है, तो पूरा फिनिश कीजिए। चिंता मत कीजिए, एक दिन मीठा खाने से न आपको डायबिटीज होगी, न ही आप फूलकर गुब्बारे बनेंगे।"

    उसकी बात सुनकर अंगद ने फिर से उसे घूरकर देखा, तो आकृति ने अपनी जीभ को दाँतों तले दबाकर मासूम सी शक्ल बनाकर उसे देखा और अपनी पलकें झपकाने लगी। उसकी शरारत समझते हुए अंगद को देर नहीं लगा। उसने बाउल वापस उसकी तरफ सरका दिया और मुँह फेर लिया, तो आकृति का मुँह छोटा सा हो गया।

    अगले ही पल अंगद ने कटोरी वापस अपनी तरफ खींच ली और खामोशी से हलवा खाने लगा। आकृति ये देख मुस्कुरा उठी और उसकी ये मुस्कुराहट अंगद के दिल को सुकून दे गई।

    ममता जी ने अंगद को हलवा खाते देखा, तो मुस्कुरा उठीं। अनु की नज़र भी खाते हुए अंगद पर पड़ी, तो वो फिर से कुछ बोलने ही वाली थी कि नील ने उसके हाथ को पकड़ लिया, तो अनु ने चौंककर उसकी तरफ निगाहें घुमाईं।

    नील ने धीमी आवाज़ में कहा, "अभी कुछ मत बोलो, वरना अंगद के लिए सिचुएशन अजीब हो जाएगी। पहले ही वो मुश्किल से अपने भाव दिखाता है। अगर यूँ बार-बार उसे टोकोगी, तो वो फिर से खुद को पत्थर का बना लेगा। बड़ी मुश्किल से वो सॉफ्ट पड़ रहा है, बदलने की कोशिश कर रहा है, तो जो जैसा चल रहा है, उसे वैसे ही चलने दो।"

    अनु उसकी बात समझ गई और मुस्कुराकर खाना खाने लगी।

    खामोशी से सबने ब्रेकफास्ट किया। उसके बाद रंजन हमेशा की तरह अंगद की दवाइयाँ लेकर वहाँ आ गया। ममता जी ने जैसे ही दवाइयाँ उसकी तरफ बढ़ाईं, अंगद ने अपनी चेयर पीछे करते हुए कहा,

    "माँ, मैंने आपको कितनी बार कहा है, ये दवाइयाँ मेरे सामने मत लाया कीजिए। मैं इन्हें नहीं खाऊँगा। कुछ नहीं होता है उनसे। अगर होना होता, तो मैं इस हालत में नही पहुँचा होता। मैं ठीक नहीं हो सकता, ये बात मैं बहुत अच्छे से समझ चुका हूँ। बेहतर होगा कि आप भी इस सच्चाई को अपना लें। झूठी उम्मीद लगाएँगी, तो उनसे टूटने पर बहुत तकलीफ होगी आपको। इसलिए जितनी जल्दी आप ये बात एक्सेप्ट कर लेंगी कि मैं सब ऐसे ही रहूँगा, उतना अच्छा होगा आपके लिए। प्लीज़, ये कोशिशें करना छोड़ दीजिए, इससे आपके साथ-साथ मुझे भी तकलीफ होती है।"

    अंगद के चेहरे पर दर्द उभर आया और वो अपनी चेयर घुमाकर वहाँ से चला गया। ममता जी भी कुछ उदास हो गईं। अनु ने अपना सिर झुका लिया, नील भी परेशान हो गया। एक पल में वहाँ का माहौल एकदम बदल गया था।

    आकृति परेशान-सी सबको देख रही थी। अंगद की बातें कुछ समझ आईं, तो कुछ उसके सिर के ऊपर से गुज़र गईं। उसने कुछ पल सोचने के बाद ममता जी को देखते हुए अपने मन में चल रहे सवाल को उनके सामने रख दिया।

    "माँ, आपने शादी से पहले बताया था कि एक एक्सीडेंट में उन्होंने अपनी चलने की शक्ति खो दी है और अब वो ठीक नहीं होना चाहते। अभी उन्होंने दवाइयाँ लेने से भी इंकार कर दिया। क्या वजह है उनके इस बर्ताव के पीछे? उनका एक्सीडेंट कैसे हुआ? जब वो फिर से अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं, चल सकते हैं, तो फिर वो ठीक क्यों नहीं होना चाहते? अभी तक तो वो ठीक थे, फिर दवाइयों का ज़िक्र होते ही उनका मन कड़वाहट से क्यों भर गया?"

    उसके सवाल सही थे और वो अंगद की पत्नी थी, तो उसे उसके बारे में सब जानने का हक था। यही सोचकर ममता जी ने एक गहरी साँस छोड़ी और कहना शुरू किया...


    To be continued....

  • 14. The Forced Vows - Chapter 14

    Words: 2158

    Estimated Reading Time: 13 min

    "बेटा, अंगद हमेशा से इतना सख्त नहीं था। बचपन से बहुत ही शांत और समझदार बच्चा था वो। अपने डैड का लाडला। मोम के तरह नाज़ुक दिल था उसका, किसी को तकलीफ में नहीं देख पाता था। मुझसे ज़्यादा अपने डैड से जुड़ा था।

    हमेशा से लोगों से जुड़ना उसके लिए मुश्किल होता था। जल्दी से अपने दिल की बात किसी को बताता नहीं था। नील के अलावा कोई दोस्त नहीं उसका, क्योंकि वो जल्दी से किसी से बात ही नहीं करता था, पर जब तक उसके डैड थे, वो उन्हें अपने दिल की हर बात बताता था।

    जब अंगद 15 साल का था, तब एक कार एक्सीडेंट में हमने उनके डैड को खो दिया। वो वक्त हमारे लिए बहुत मुश्किल रहा था। उनके अचानक जाने का असर सबसे ज़्यादा अंगद पर पड़ा। हमने तो रोकर अपना दुख ज़ाहिर कर लिया, पर अंगद ने एक आँसू नहीं बहाया। उसके बाद वो कभी नहीं रोया और ज़्यादा अंतर्मुखी हो गया। फिर भी, तब उसकी ज़िंदगी में नील था, तो वो संभल गया।

    अंगद के डैड ही हमारा सहारा थे। जब तक वो थे, सब बहुत अच्छा था। उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से वो कंपनी खड़ी की थी, जिसे आज अंगद चला रहा है। पर उस वक्त वो इस लायक नहीं था कि कंपनी संभाल सके।.... अंगद के डैड ने कई बार हमें कहा था कि ऑफिस का काम सीख ले, ज़रूरत पड़ने पर काम आएगा। हमने हर बार उनकी बात को मज़ाक में टाल दिया। लेकिन जब वो हमें छोड़कर चले गए, तब हमें एहसास हुआ कि वो क्यों ऐसा कहा करते थे?

    जब तक हम उनकी बात के महत्व को समझे, बहुत देर हो चुकी थी। अंगद के डैड के जाने के बाद कंपनी चलाने वाला कोई नहीं था। सारे प्रोजेक्ट जो अधूरे थे, वो बीच में ही बंद हो गए। इनवेस्टर्स अपने पैसे माँगने लगे, कंपनी को घाटे पर घाटा होने लगा। कोई देखने वाला नहीं था, तो कर्मचारियों ने अपनी मनमानी की। धीरे-धीरे कंपनी बंद होने की कगार पर आ गई।

    इनवेस्टर्स के पैसे देने के लिए और बैंक से लिए लोन को चुकाने के लिए ये घर, जहाँ हम खड़े हैं, और वो कंपनी, जो अब अंगद चलाता है, सब बिक गए थे।"

    आकृति ध्यान से सुन रही थी। ममता जी ने अपने आँसू साफ करते हुए आगे कहा, "पल में हम महलों से सड़क पर आ गए थे। घर में एक ही कमाने वाला था और उनका यूँ अचानक हमें छोड़कर चले जाना बहुत बड़ा सदमा था हमारे लिए। उस पर गरीबी हम पर कहर बनकर बरसी।

    नील के पेरेंट्स अमीर नहीं थे, फिर भी उन्होंने उस वक्त हमारा बहुत साथ दिया था। जब हमारे सिर पर रहने के लिए छत और खाने को खाना नहीं था, तब उन्होंने हमें और हमारे बच्चों को सिर छुपाने की जगह दी। पर किसी के एहसानों पर पलना अंगद को मंज़ूर नहीं था।

    वो अपने डैड की तरह खुद्दार थे। मेहनत की एक रोटी मंज़ूर थी उन्हें, पर किसी की दया से दिया तीन वक्त का खाना मंज़ूर नहीं था। इसलिए उन्होंने उनसे कोई भी मदद लेने से इंकार कर दिया था। बहुत समझाने पर वो वहाँ रहने को राज़ी हुए थे, वो भी इस शर्त पर कि वो उस घर का किराया देंगे और बाकी सब खर्च खुद उठाएँगे।

    हमारे और बच्चों के अकाउंट में कुछ ही पैसे थे, जो उन्होंने ज़रूरत के वक्त के लिए फिक्स करवाए थे। शुरू के दिन उनके सहारे कटे। पर बैंक में जो पैसे थे, वो भला कब तक चलते? वो भी खत्म होने के कगार पर आ गए।

    15 साल की छोटी-सी उम्र में अंगद पर हमारी और अनु की ज़िम्मेदारी आ गई थी और उस ज़िम्मेदारी को निभाने के लिए वो सुबह जल्दी उठकर घरों में अखबार डालने जाते थे, लोगों की गाड़ियों को धोते थे, उसके बाद स्कूल जाते थे। स्कूल से आकर गैरेज में काम करते और देर रात तक जागकर पढ़ाई करते।

    अंगद के जीवन का लक्ष्य था वो सब वापस हासिल करना, जो उनके डैड ने अपनी खून-पसीने की कमाई से कमाया था। चाहे ये घर हो, हमारी कंपनी हो, या लोगों की नज़रों में इज़्ज़त, उन्हें सब वापस पाना था, जिसके लिए वो दिन-रात मेहनत करते थे।

    हमने देखा है कि कैसे हमारी और अनु की छोटी-से-छोटी ज़रूरत को पूरा करने के लिए वो अपनी ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ करते थे। अपने डैड के जाने के बाद अंगद ने सारी ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली। उस एक हादसे ने वक्त से पहले हमारे बेटे को बड़ा कर दिया था। जिसकी एक पुकार पर उसके डैड उसके सामने महँगी-से-महँगी चीज़ लाकर रख देते थे, वो छोटी-छोटी चीज़ों के लिए तरसता था। अपनी और हमारी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए हर पल जीवन से संघर्ष करता था।"

    उनकी आँखें नम थीं, लेकिन फिर भी वो बोलीं, "वो वक्त हम कभी नहीं भूल सकते। हमने अंगद को दिन-रात मेहनत करते देखा है। तब जाकर आज वो इस मुकाम पर हैं कि लोग उनके नाम पर ही इज़्ज़त से सिर झुकाकर उन्हें सलाम करते हैं। बहुत मेहनत की है उन्होंने। स्कूल पूरा होने के बाद कॉलेज के साथ बच्चों को कोचिंग देते थे, काम करते थे।

    बिज़नेस संभालने का हुनर उन्हें अपने डैड से विरासत में मिला था। बहुत तेज़ दिमाग था उनका, बहुत जल्दी सब सीख जाते थे। उन्होंने न दिन देखा, न रात, बस मेहनत करते गए। कॉलेज पूरा होने के साथ उन्होंने वापस कंपनी शुरू की। बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ा था उन्हें।

    कंपनी को शुरू करने से पहले कई कंपनियों में काम किया, ताकि अनुभव और पैसे जमा कर सकें। उसके बाद उन्होंने कंपनी फिर से शुरू की। पहला प्रोजेक्ट बड़ी मुश्किल से मिला था उन्हें, वो भी बहुत छोटा। पर उन्होंने अपनी जी-जान लगा दी थी उस पर, क्योंकि वो जानते थे कि ये उनकी सफलता की पहली सीढ़ी है।

    उसके बाद काम बढ़ता गया और उनका नाम बनने लगा। जब पैसे इकट्ठे हो गए, तो उन्होंने हमारे इस आशियाने को खरीदकर हमें सरप्राइज़ दिया था। उस पल ऐसा लगा मानो उनके डैड वापस मिल गए हों। आज आकाश की जिन बुलंदियों पर वो हैं, वहाँ पहुँचने के लिए उन्होंने बहुत संघर्ष किया है और वक्त और हालातों ने उन्हें और ज़्यादा अंतर्मुखी बना दिया।

    मुश्किलों के आगे टूट न जाएँ, इसलिए खुद को सख्त बनाते चले गए वो। अनु पर वो अपनी जान देते हैं। अनु 10 साल की थी, जब उनके डैड हमें छोड़कर गए थे। अंगद ने उन्हें एक भाई नहीं, बाप बनकर पाला है। उनकी हर इच्छा पूरी की, चाहे उसके लिए उन्हें अपनी ज़रूरतों को अनदेखा क्यों न करना पड़ा हो। उन्होंने भाई के साथ-साथ बाप होने का फ़र्ज़ भी निभाया था और इसके लिए उन्होंने अपनी नादानियों को छोड़ दिया और गंभीर बन गए। उनकी सारी शैतानियाँ जैसे उनके डैड के साथ ही चली गई थीं।

    शांत तो पहले भी रहते थे, पर अपने डैड के सामने वो हँसते-बोलते थे, शैतानियाँ भी करते थे। पर उनके जाने के साथ जैसे अंगद भी चले गए थे। अचानक उनके सिर पर आई ज़िम्मेदारियों ने उन्हें गंभीर और कठोर बना दिया था। उन्होंने यहाँ तक पहुँचने के लिए बहुत मुश्किलों का सामना किया है, पर कभी ज़िंदगी के आगे हारे नहीं थे। पर उनके साथ हुए इस हादसे ने उनकी हिम्मत को तोड़ दिया।"

    आकृति बड़े ध्यान से उनकी बात सुन रही थी। कहीं न कहीं अंगद के दर्द, उसकी तकलीफ को समझ भी रही थी और महसूस भी कर रही थी।

    आज उसे एहसास हो रहा था कि जो तकलीफ उसने सही थी, उससे कहीं गुना ज़्यादा दर्द और मुश्किलों का सामना अंगद ने किया है, वो भी बहुत छोटी उम्र में। शायद वक्त उसके लिए भी चुनौती भरा रहा था, पर जो संघर्ष अंगद ने किया, उसके आगे उसकी तकलीफ बहुत कम लग रही थी उसे।

    सब बताते हुए ममता जी की आँखें जाने कितनी ही बार छलक आई थीं। वो एक बार फिर उनकी आँखों के सामने घूम गया था और दर्द चेहरे पर पसर गया था।

    अनु की आँखें भी नम हो गई थीं। नील उस वक्त का गवाह था, तो वो सब महसूस कर पा रहा था। उसने अनु के कंधे पर हाथ रखा, तो अनु उसके सीने से लगकर सुबकने लगी। पहले तो नील चौंक गया, फिर अनु अभी भावुक है, ये समझते हुए वो प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरने लगा।

    ममता जी आगे बोल न सकीं। गला भर आया, तो वो खामोश हो गईं। आकृति उनके आगे कहने का इंतज़ार कर रही थी। कुछ गहरी साँसें छोड़ने के बाद ममता जी ने अपनी भावनाओं को संयमित किया, फिर अपने आँसुओं को साफ करते हुए आगे कहना शुरू किया,

    "अंगद बचपन से अकेला रहता था। नील और अपने डैड के अलावा न किसी से दोस्ती की थी उसने, न ही किसी से ज़्यादा बात करता था। उनके जाने के बाद उसने अपनी ज़िंदगी को अनु और हमारे बीच सिमटा लिया था और आँखों में बस एक सपना था, हमारे प्यार के इस आशियाने को फिर से बसाना, अपने डैड की कंपनी को फिर से शुरू करना, और उसे उस मुकाम तक पहुँचाना, जिसका सपना उनके डैड ने देखा था। उस खोई इज़्ज़त को पाना, जो उसके डैड के नाम की लोगों की नज़रों में थी।

    उन्होंने कभी इन चीज़ों के अलावा किसी चीज़ के बारे में सोचा तक नहीं था। जब उनका कॉलेज का दूसरा साल चल रहा था, तब उनकी ज़िंदगी में एक लड़की ने कदम रखा था। प्राची सक्सेना। अंगद तो उन पर भी ध्यान नहीं देते थे, पर वो अंगद को पसंद करने लगी थी। पहले दोनों की दोस्ती हुई, फिर धीरे-धीरे रिश्ता आगे बढ़ने लगा।

    वक्त के साथ अंगद उनसे घुलने-मिलने लगे, उनके सामने अपने ज़ज़्बातों को ज़ाहिर करने लगे। दोस्ती का रिश्ता प्यार के रंग में रंगने लगा। अंगद के सपनों को पूरा करने में उन्होंने अंगद का साथ दिया था और अंगद उन्हें चाहते थे। वो पहली लड़की थी, जिसे अंगद ने अपने करीब आने की इजाज़त दी थी।

    अंगद की खुशी के लिए हमने इस रिश्ते के लिए मंज़ूरी दे दी। मना करने की कोई वजह भी नहीं थी हमारे पास। क्योंकि उस वक्त प्राची ने हर कदम पर अंगद का साथ दिया था। उनका रिश्ता तय हो गया था। अंगद उनका साथ पाकर खुश थे। उन्होंने अपने लक्ष्य को पूरा कर लिया था और उनकी मोहब्बत भी मुकम्मल होने वाली थी, इसलिए वो खुलकर मुस्कुराने लगे थे।

    सालों बाद अपने बेटे को इतना खुश देखा था हमने और उनकी खुशी में हम भी खुश थे। पर किस्मत को शायद ये भी मंज़ूर नही था।

    लगभग छह महीने पहले अंगद एक रात घर लौट रहा था, तभी उनकी गाड़ी को एक तेज़ रफ्तार ट्रक ने टक्कर मार दी। वो एक्सीडेंट इतना भयंकर था कि अंगद के सिर पर गहरी चोट आई थी। पैरों पर भी ज़ख्म था।

    सीट के नीचे पैर दब गया था उनका, जिस वजह से डॉक्टर ने कहा था कि फ्रैक्चर आ गया है। गाड़ी के शीशे टूट गए थे और उनके कीचड़ उसकी पीठ में धँस गए थे। गंभीर स्थिति थी उनकी, बचना नामुमकिन था। पर महादेव की कृपा से उनकी जान बच गई। उन्होंने हमारे पति को तो हमसे छीन लिया था, पर हमारे बेटे को उन्होंने हमें लौटा दिया था।

    पहले तो डॉक्टर ने बस फ्रैक्चर का कहा था और उनकी दवाइयाँ चल रही थीं। एक महीने वो हॉस्पिटल में रहे थे। पर उस एक महीने में प्राची एक बार भी उन्हें देखने नहीं आई। ये देखकर हमें हैरानी हुई कि उनका प्यार ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रहा था और उन्हें उनकी इतनी भी फिक्र नहीं थी कि आकर एक बार उन्हें देखें, उनकी खबर लें।

    एक महीने बाद जब अंगद को डिस्चार्ज मिलने वाला था, तब हमें पता चला कि उन्होंने उस एक्सीडेंट में अपनी चलने-फिरने की शक्ति खो दी है। उनके कमर से नीचे का भाग पैरालाइज़ हो गया था। ये हमारे लिए किसी सदमे से कम नहीं था।

    उस दिन अंगद को गहरा आघात पहुँचा था। पर उनकी हिम्मत उस दिन टूटी, जब प्राची ने ये कहकर उनसे अपना रिश्ता खत्म कर लिया कि अब वो उनके काबिल नहीं हैं।

    अंगद ने अपने डैड के जाने पर भी अपना दर्द अपने दिल में दफन कर लिया था, पर प्राची के इंकार ने उन्हें इस कदर तोड़ दिया था कि वो हार गए ज़िंदगी से। हमने उस दिन उन्हें रोते देखा था। पर उसके बाद अंगद ने एक बार फिर से अपने दर्द को अपने अंदर ज़फ्त कर लिया।

    इलाज और दवाइयों के चलते हुए भी उनकी पैरों की शक्ति चली गई। ये बात उनके दिल में बैठ गई और उन्होंने मान लिया कि इन दवाइयों से अब कुछ नहीं होगा। इसलिए उन्होंने दवाइयाँ लेनी छोड़ दी।

    जहाँ उनकी हेल्थ कंडीशन ने मेडिकल साइंस पर से उनका विश्वास उठा दिया, वहीं प्राची की बातों ने खुद पर से उनके विश्वास को तोड़ दिया। उन्होंने मान लिया कि अब वो कभी फिर से अपने पैरों पर खड़े नहीं हो पाएँगे। वो ज़िंदा होकर भी ज़िंदा नहीं हैं। साँसें चल रही हैं उनकी, क्योंकि उनके ऊपर अब भी हमारी और अनु की ज़िम्मेदारी है। पर आत्मा मर चुकी है उनकी।"

    To be continued....

  • 15. The Forced Vows - Chapter 15

    Words: 1924

    Estimated Reading Time: 12 min

    "हम पिछले छह महीनों से अपने बेटे को घुट-घुटकर जीते देख रहे हैं। प्राची ने उनके विश्वास और दिल के साथ-साथ उन्हें भी तोड़ दिया था। हमें इस बात की खुशी थी कि वक्त पर हमारे सामने उनका असली चेहरा आ गया और अंगद का उनसे रिश्ता जुड़ने से पहले ही हमें पता चल गया कि वो हमारे बेटे के लिए सही नहीं हैं। वरना अगर शादी के बाद ये होता, तो अंगद शायद बर्दाश्त नहीं कर पाते।"

    उन्होंने आकृति की ओर देखा और बोलना जारी रखा, "हम समझ चुके थे कि प्राची हमारे बेटे के लिए नहीं बनी थी और अंगद के मन को देखते हुए हमें तलाश थी ऐसी लड़की की, जो उनकी इस कमी के बारे में जानने के बाद भी उन्हें मन से अपनाए। जिन्हें उनके पैसों से नहीं, उनसे रिश्ता जोड़ना हो। जो उनका साथ हर अच्छे-बुरे वक्त में निभा सके।

    जो अंगद की इस एक कमी के आगे उनकी बाकी खूबियों को अनदेखा न करे और उनकी खूबियों के साथ-साथ कमियों से भी मोहब्बत करे। जो एक अच्छे हमसफर की तरह हर कदम पर उनका साथ दे। जब-जब अंगद कमज़ोर पड़ें, तो वो उनका सहारा बने। जो उन्हें फिर से खुद पर विश्वास करना सिखाए, जो उन्हें उन अंधेरों से बाहर निकाल सके, जहाँ उन्होंने खुद को कैद कर लिया है।

    हमें उनके लिए ऐसी लड़की की तलाश थी, जो उन्हें फिर से जीना और प्यार करना सिखा सके। जो उन्हें उनके अतीत को भुलाकर आगे बढ़ने की वजह दे सके। और हमारी वो तलाश आप पर आकर खत्म हुई।"

    आकृति का चेहरा दर्द से सना था। आँखों में अजीब सी तड़प नज़र आ रही थी। उसका पति किसी और को चाहता था, ये बात उसके लिए बेहद तकलीफदेह थी। ये सच्चाई उसके दिल में छलनी कर रही थी। बिखर गया था उसका मासूम-सा दिल और किसी को इसकी खबर तक नहीं हुई थी। पर नील शायद उसकी भावनाओं को समझ रहा था।

    ममता जी ने अब उसे देखते हुए हल्की मुस्कान के साथ कहना शुरू किया, "जब हमने आपको पहली बार महादेव के चरणों के पास बैठे देखा था, तभी हमें एहसास हो गया था कि हमारी तलाश खत्म हो गई है। आपके चेहरे पर सच्चाई का तेज़ झलक रहा था। आपकी मासूमियत आपके निश्छल मन को दर्शा रही थी।

    जब आपने रिश्ते के लिए ये कहकर इंकार कर दिया था कि आप अपनी माँ को नहीं छोड़ सकतीं, तब हमारा विश्वास और पक्का हो गया था कि आपसे बेहतर जीवनसाथी अंगद के लिए कोई हो ही नहीं सकता। जो लड़की अपनी माँ के लिए अपने भविष्य को ठुकराने को तैयार थी, उससे बेहतर न तो कोई रिश्तों की अहमियत समझ सकता था और न ही उसे निभा सकता था।

    अंगद के बारे में सब जानने के बाद भी आपने अपनी माँ के कहने पर इस रिश्ते के लिए हाँ कहकर ये साबित कर दिया था कि आपके लिए पैसों का नहीं, रिश्तों का मोल है। आपने अंगद की कमी को अपनाया और उन्हें पूरी इज़्ज़त से स्वीकार किया। जिस तरह से आपने शादी के दिन हर मोड़ पर अंगद का साथ निभाया, जैसे उनका सहारा बनकर उनके साथ खड़ी हुईं, हमारा विश्वास और भी पक्का हो गया कि आप ताउम्र अंगद का साथ निभाएँगी। परिस्थितियाँ चाहे जितनी ही विकट क्यों न हों, आप उनका साथ कभी नहीं छोड़ेंगी। उनकी हमसफर बनकर जीवन के इस सफर में हर कदम पर उनकी शक्ति बनकर उनके साथ खड़ी रहेंगी।

    हम जानते हैं कि ये जानते हुए कि अंगद के दिल में कोई और है, हमने आपको उनकी ज़िंदगी में शामिल करने का फैसला लिया और आपको ये बात नहीं बताई, ये गलत था। पर हमने जो किया, बहुत सोच-समझकर किया है, बेटा।

    अंगद भले ही प्राची से प्यार करते थे, पर वो उनका अतीत है और आप ही उन्हें उस अतीत से बाहर निकाल सकती हैं। आप इतनी प्यारी हैं कि अंगद कब आपको चाहने लगेंगे, इसकी खबर उन्हें भी नहीं होगी। आपकी सच्चाई और सादगी उनके दिल में वो जगह बनाएगी, जो कभी कोई और नहीं बना सका।

    आप हमारी उम्मीद हैं, बेटा। बहुत मन से हमने आपका रिश्ता अपने बेटे से जोड़ा है और हमें पूरा विश्वास है कि बहुत जल्दी अंगद की ज़िंदगी के साथ-साथ उनके दिल में भी बस आप होंगी।

    अंगद बुरे नहीं हैं, बेटा। आप बस उनके तरह कदम बढ़ाइए। प्यार में उनके विश्वास को बड़ी बेदर्दी से तोड़ा गया है। एक बार आपने उनके विश्वास को फिर से जोड़ दिया, तो फिर अंगद आपको दुनिया की हर खुशी देंगे। इतना प्यार करेंगे आपको कि आप बाकी सब बातें भूल जाएँगी। जैसे माता पार्वती महादेव की शक्ति हैं, वैसे ही आपको अंगद की शक्ति बनकर उन्हें अतीत के अंधेरों से बाहर निकालना है, उनका विश्वास उन्हें लौटाना है, फिर से जीना सिखाना है उन्हें।

    आप ये कर सकती हैं, बेटा। आप उन्हें फिर से प्यार और शादी पर विश्वास करना सिखा सकती हैं। आपको ज़्यादा कुछ नहीं करना होगा, बस उनके विश्वास को हासिल कर लीजिए, फिर वो आपसे बेइंतहा मोहब्बत करेंगे। उन्होंने अपने मन में बहुत प्यार छुपाया हुआ है और आपको बस उन्हें उसे ज़ाहिर करने की वजह देनी है।"

    वो आगे बोलीं, "भले ही अंगद का अतीत रहा है, उन्होंने किसी से सच्ची मोहब्बत की थी, पर वो उनकी पहली मोहब्बत थी, जो मुकम्मल न हो सकी। याद रखिएगा, बेटा, कि अंगद का वर्तमान और भविष्य दोनों आप हैं। आपको उनकी आखिरी मोहब्बत बनना है, जो उनकी आखिरी साँस तक उनके दिल में मौजूद रहे।

    शादी हो चुकी है आपसे। अब आपके अलावा वो किसी और के बारे में गलती से भी नहीं सोचेंगे। अब उन पर सिर्फ़ आपका हक है और उस हक को आपका कमाना है। जानते हैं, बहुत से सपने रहे होंगे आपके और यहाँ आपको अपने पति के प्यार को पाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ेगा। पर बेटा, इस संघर्ष का परिणाम बहुत सुखद होगा। क्योंकि अंगद जैसा चाहने वाला आपको शायद दूसरा कहीं नहीं मिलेगा। वो जिससे प्यार करते हैं, उन पर अपनी खुशियाँ तो क्या, अपनी ज़िंदगी भी न्योछावर कर देते हैं। बस आपको उनके तरफ़ कदम बढ़ाना है, फिर वो खुद सामने आकर आपका हाथ थामकर आपको अपनी ज़िंदगी में शामिल कर लेंगे।"

    आकृति खामोशी से उनकी बातें सुन रही थी। ममता जी अब खामोश हो गईं। शायद वो उसके कुछ कहने का इंतज़ार कर रही थीं, पर आकृति ने एक शब्द तक नहीं कहा। उसे यूँ खामोश देखकर नील ने कहना शुरू किया, "भाभी, मैं जानता हूँ कि ये सच्चाई स्वीकार करना कि आपका पति किसी और को चाहता था, आसान नहीं है आपके लिए। पर भाभी, वो अंगद का अतीत थी और अतीत हर इंसान का होता है, जिसे भुलाकर हमें ज़िंदगी में आगे बढ़ना होता है।

    हाँ, ये सच है कि अंगद प्राची को बहुत चाहता था। उसने उससे सच्ची मोहब्बत की थी। पर जितना बड़ा सच ये है, उससे भी बड़ा सच ये है कि अब अंगद की ज़िंदगी में उसका कोई वजूद नहीं है।

    पहले प्यार को भुलाना आसान नहीं होता। शायद अंगद के दिल के किसी कोने में वो मौजूद हो, पर उसने जो अंगद के साथ किया, उसके बाद वो अंगद के दिल से उतर चुकी है। अब उसके दिल में उसके लिए कोई एहसास नहीं है। अब उसका दिल एक कोरा कागज़ है, जिस पर आपको अपना नाम लिखना है।

    अंगद अब उसके लिए कुछ फील नहीं करता। उसे उससे रत्ती भर फर्क नहीं पड़ता। अभी भी वो कुछ भूला नहीं है, पर अब उसकी यादों को भी अपने ज़हन में नहीं आने देता वो। आपको उसके दिल में अपने लिए जगह बनानी है, जो अब एकदम खाली है। अगर आप उसके दिल में झाँककर देखती हैं, तो उसमें सिर्फ़ दर्द और खालीपन ही मिलेगा आपको और उसी खालीपन को आपको अपने प्यार के एहसासों से भरना है।"

    "गीली मिट्टी की तरह है मेरा दोस्त अभी। आप प्यार से उसे जिस आकार में ढालेंगी, वो उसी आकार में ढल जाएगा। उसकी ज़िंदगी सूनी है और आप उसकी ज़िंदगी को खुशियों और प्यार के एहसासों से बसाकर उसके सूनेपन का अंत कर सकती हैं। सब आपके हाथ में है, भाभी। वो आपका ही है। बस आपको अपने प्यार से उसे अपना बनाना है। उसकी ज़िंदगी पर तो आपका हक है ही, अब आपको उसके दिल पर अपना एकाधिकार करना है।"

    नील ने भी उसे समझाने की और उसका हौसला बढ़ाने की कोशिश की। उसने उसे वजह देनी चाही, ताकि वो अंगद के अतीत के आगे हार मानने की जगह उससे लड़कर उसके वर्तमान और भविष्य को अपने साथ और प्यार से संवार सके। और शायद आकृति उसकी बातों को समझ भी गई थी।

    आकृति ने नम आँखों से पहले नील को, फिर ममता जी को देखते हुए कहना शुरू किया, "मुझे नहीं पता कि मैं इस लायक हूँ भी या नहीं, पर आप सबने मुझ पर जो विश्वास किया है, मैं उस पर खरी उतरने की पूरी कोशिश करूँगी। नहीं जानती कि मैं कभी उनके दिल में जगह बना पाऊँगी या नहीं, पर जब तक मेरी साँसें चल रही हैं, मैं उनका साथ निभाऊँगी। मेरे होते हुए वो कभी कमज़ोर नहीं पड़ेंगे। मैं कभी उन्हें मुश्किलों से हारने नहीं दूँगी।

    जब-जब वो कमज़ोर पड़ेंगे, मैं उनकी ताकत बनकर उनके साथ खड़ी रहूँगी। मैं उनके विश्वास को जोड़कर उनके मन में फिर से जीने की इच्छा पैदा करूँगी। उन्हें विश्वास दिलाऊँगी कि उनमें कोई कमी नहीं। कमी तो उस इंसान की मानसिकता में है, जिसने महज़ शरीर को देखकर उन्हें, उनके दिल और सच्चे प्यार को ठुकरा दिया। वो आज भी परफेक्ट हैं।

    मैं कोशिश करूँगी कि उनके अंदर ठीक होने की इच्छा पैदा हो और वो फिर से अपने पैरों पर खड़े हो सकें। उन्हें किसी काम के लिए किसी की ज़रूरत या सहारे की ज़रूरत न पड़े। मैं उनका साथ निभाऊँगी और ये साथ कभी नहीं छूटेगा।"

    आकृति की बातों ने सबके लबों पर सुकून भरी मुस्कान ला दी थी। उसने अपने आँसुओं को पोंछा और दवाइयाँ लेकर अंगद की स्टडी की तरफ़ बढ़ गई। ये देखकर बाकी सब मुस्कुरा उठे।

    आज उनकी बहुत बड़ी चिंता खत्म हो गई थी। आकृति ने अंगद को न सिर्फ़ उसकी कमी, बल्कि उसके अतीत के साथ अपना लिया था और ये बात उनके लिए सुकूनदायक थी।

    आकृति अंगद के स्टडी रूम के बाहर जाकर रुक गई। कुछ पल खुद को शांत करने के बाद उसने गेट नॉक किया, तो अंदर से अंगद की सख्त आवाज़ आई, "कौन है?"

    उसका सवाल सुनकर आकृति कुछ सेकंड चुप रह गई। फिर उसने गहरी साँस छोड़ते हुए सधी हुई आवाज़ में जवाब दिया, "मैं हूँ, आकृति। क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?"

    पहले तो आकृति की आवाज़ सुनकर अंगद चौंक गया। उसे ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि बाहर आकृति हो सकती है। आकृति का यहाँ आना उसके मन में बहुत से सवालों को जन्म दे रहा था, पर उसने अभी के लिए उन सभी सवालों को साइड किया और उसी सख्त लहजे में बोला, "आ सकती हो तुम अंदर।"

    उसके परमिशन देने पर आकृति ने गेट खोलकर जैसे ही अंदर कदम रखा, इसके साथ ही अंगद की आवाज़ उसके कानों में पड़ी, "यहाँ आने की कोई खास वजह?"

    आकृति ने आवाज़ की दिशा में सिर घुमाया, तो गेट के दूसरी तरफ़ लगे टेबल के पास ही अंगद अपनी व्हीलचेयर पर बैठा हुआ था। उसके सामने एक लैपटॉप, कुछ फाइल्स वगैरह रखी थीं।

    आकृति ने पूरे रूम में नज़रें घुमाईं, तो वो पूरी जगह बुक शेल्फ से भरी हुई थी और उनमें कहीं किताबें, तो कहीं फाइल्स रखी हुई थीं। वहीँ एक किंग साइज़ सोफा और उसके सामने काँच का टेबल रखा हुआ था, जिस पर शोपीस सजाया हुआ था। वो जगह बहुत प्यारी लग रही थी। वहाँ फैली शांति मन को अलग ही सुकून पहुँचा रही थी।

    To be continued....

  • 16. The Forced Vows - Chapter 16

    Words: 2170

    Estimated Reading Time: 14 min

    "यहाँ आने की कोई खास वजह?"

    आकृति ने आवाज़ की दिशा में सर घुमाया तो गेट के दूसरे तरफ लगे टेबल के पास ही अंगद अपनी व्हीलचेयर पर बैठा हुआ था। उसके सामने एक लैपटॉप, कुछ फाइल्स वगैरह रखी थीं।

    आकृति ने पूरे रूम में नज़रें घुमाईं तो वो पूरी जगह बुकशेल्फ से भरी हुई थी और उनमें कहीं किताबें तो कहीं फाइल्स रखी थीं। वहीं एक किंग-साइज़ सोफ़ा और उसके सामने काँच का टेबल रखा हुआ था, जिस पर शोपीस सजाया हुआ था। वो जगह बहुत प्यारी लग रही थी। वहाँ फैली शांति मन को अलग ही सुकून पहुँचा रही थी।

    आकृति सब देखने में इतना खो गई थी कि उसने अंगद के सवाल पर कुछ रिस्पॉन्स ही नहीं किया। उसका जवाब न पाकर अंगद ने फिर से उसे देखते हुए भौंहें उचकाकर सवाल किया, "मैंने पूछा यहाँ क्यों आई हो तुम?"

    उसकी आवाज़ ने आकृति का ध्यान अपनी तरफ खींचा। आकृति मुस्कुराकर उसके पास चली आई। उसने उसी टेबल पर रखे जग से पानी ग्लास में डाला, फिर ग्लास उसके तरफ बढ़ाते हुए अपने दूसरे हाथ की मुट्ठी उसके सामने खोल दी, जिसमें दवाइयाँ रखी हुई थीं।

    अंगद पहले तो कन्फ्यूज्ड निगाहों से उसे देख रहा था, पर जब उसकी निगाहें उन दवाइयों पर पड़ीं, तो उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।

    "इसका क्या मतलब हुआ? मैं तुम्हारे सामने दवाई लेने से मना करके आया हूँ न? फिर दवाइयाँ लेकर मेरे सामने आकर क्यों खड़ी हो गई हो? कहीं तुम्हें ऐसा तो नहीं लगने लगा कि सुबह से मैंने तुम्हारी हर बात खामोशी से मान ली, तो तुम अपनी ये बात भी मुझसे मनवा लोगी?"

    अंगद आँखें छोटी-छोटी करके आकृति को घूरने लगा। आकृति ने उसका सवाल सुना तो मुस्कुराकर बोली, "उहुं! मैं ऐसा सोच भी कैसे सकती हूँ? जब मैं बहुत अच्छे से जानती हूँ कि आप वही करते हैं, जो आप करना चाहते हैं। मैं यहाँ आपसे अपनी कोई बात मनवाने नहीं आई हूँ, बल्कि आपको बस इतना बताने आई हूँ कि आपकी ज़िंदगी से आपकी माँ, बहन, दोस्त और अब आपकी पत्नी की भी ज़िंदगी जुड़ी है और खुद को तकलीफ़ देकर आप उन्हें दर्द दे रहे हैं।

    आप ठीक हो सकते हैं, आपका परिवार फिर से आपको आपके पैरों पर खड़ा देखना चाहता है, उसके बाद भी आपका ये ज़िद ठानकर बैठना कि आप दवाइयाँ नहीं लेंगे, खुद ही मान लेना कि ठीक नहीं होंगे, गलत है और आप खुद के साथ-साथ बाकी सबके साथ भी गलत कर रहे हैं।"

    उसकी बात सुनकर अंगद ने व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ उसे देखते हुए कहा, "सबके साथ या तुम्हारे साथ?"

    आकृति उसके सवाल और उस मुस्कान की वजह नहीं समझ सकी और कन्फ्यूज्ड निगाहों से उसे देखते हुए बोली, "आप कहना क्या चाहते हैं? मैं कुछ समझी नहीं।"

    अंगद के भाव एकदम से बदल गए। उसने सख्त निगाहों से उसे घूरते हुए सवाल किया, "तुम चाहती हो कि मैं ठीक हो जाऊँ?"

    उसका सवाल सुनकर आकृति ने कन्फ्यूज्ड निगाहों से उसे देखते हुए जवाब दिया, "हाँ, मैं क्या, घर में सभी यही चाहते हैं।"

    "मैं सबकी नहीं, तुम्हारी बात कह रहा हूँ। तो तुम अपनी बात बताओ कि तुम चाहती हो कि मैं ठीक हो जाऊँ या नहीं?"

    अंगद ने एक बार फिर सख्त लहज़े में उससे सवाल किया। आकृति ने उलझी निगाहों से उसे देखते हुए हाँ में सिर हिला दिया तो अब अंगद का चेहरा कड़वाहट से भर उठा, जिसकी वजह से आकृति अंजान थी। वो अब भी कन्फ्यूज सी उसे देख रही थी।

    अंगद ने उसका जवाब देखकर कड़वाहट भरे लहज़े में कहा, "क्यों ठीक करना चाहती हो मुझे? शादी से पहले भी जानती थी न कि मैं चल-फिर नहीं सकता, पैरालाइज़्ड हूँ, फिर भी मुझसे शादी करने के लिए हाँ कह दिया, तब नहीं सोचा था कि एक ऐसे आदमी के साथ ज़िंदगी बितानी पड़ेगी जो अपने पैरों पर खड़ा तक नहीं हो सका?

    तब तो दौलत और शानो-शौकत देखकर इस रिश्ते के लिए हाँ कह दिया, पर अब एहसास हो रहा होगा कि मेरे साथ तुम्हारी ज़िंदगी बर्बाद हो जाएगी, अब पता चल रहा होगा कि शादी के नाम पर तुमने मुसीबत अपने सर पर ले ली है, एहसास हो रहा होगा कि इस बोझ को ज़िंदगी भर उठाना बहुत मुश्किल है, दुख हो रहा होगा न कि एक अपाहिज इंसान के साथ रिश्ता जोड़कर बहुत बड़ी गलती कर दी है तुमने।"

    वो रुका और व्यंग्य भरे लहज़े मे बोला, "तुम तो दावा कर रही थी कि ज़िंदगी भर मेरा साथ निभाओगी, पर सच्चाई से रूबरू होते ही इरादे बदल गए तुम्हारे। एक ऐसे आदमी के साथ रहकर अपनी ज़िंदगी और खुशियों को तबाह नहीं कर सकती न, जो पैरों से लाचार है? इसलिए अब मुझे ठीक करने की कोशिश कर रही हो, पर नहीं होना मुझे ठीक।

    अगर नहीं निभा सकती तो चली जाओ मेरी ज़िंदगी से दूर। मैंने तुम्हें इस बेमेल रिश्ते के बोझ से आज़ाद किया। मैं जैसा हूँ, वैसा ही ठीक हूँ, नहीं चाहिए मुझे किसी का एहसान और न ही मुझे किसी के सहारे की ज़रूरत है।

    नहीं होना है मुझे ठीक, जाओ! आज़ाद हो तुम इस रिश्ते के बोझ से, तुम्हें इस मुसीबत से छुटकारा मिल गया, जाओ चली जाओ यहाँ से और भूल जाना कि हम कभी मिले थे। जाओ, अपनी ज़िंदगी खुशी से जियो, ऐसे इंसान का हाथ थामो जो तुम्हारा सहारा बन सके। मेरे साथ रहोगी तो मुझे पल-पल सहारा देना पड़ेगा, एक नॉर्मल इंसान से शादी करो। अगर मेरे साथ रही तो तुम्हारी ज़िंदगी मुश्किलों से भर जाएगी।

    अगर तुम्हें उम्मीद है कि मैं ठीक हो जाऊँगा, तो इस झूठी उम्मीद के सहारे अपनी ज़िंदगी बर्बाद करने की या इस रिश्ते के बोझ तले घुट-घुटकर जीने की कोई ज़रूरत नहीं है तुम्हें। नहीं हो सकता मैं कभी ठीक, और इस सच्चाई को मैं मान चुका हूँ, तुम भी मान लो और आज़ाद हो जाओ इस रिश्ते के बोझ से।"

    अंगद का चेहरा दर्द से सना था, उसकी बातों में मायूसी और तड़प झलक रही थी, जिसे आकृति बखूबी महसूस कर पा रही थी और उसके इस रिएक्शन की वजह भी समझ रही थी।

    जैसे उसके साथ हुए हादसे के बाद उसकी मोहब्बत ने उसको धुतकारकर खुद से दूर कर दिया, अंगद के मन में ये बात गहराई से बैठना लाज़मी था। उसकी सोच गलत नहीं थी, वो गलत नहीं था, फिर भी उसके साथ बहुत गलत हुआ था। बाहर से वो सामान्य नज़र आता था, पर अंदर ही अंदर वो टूटकर बिखर चुका था।

    उसकी बातें सुनकर और उसके दर्द को महसूस कर, आकृति की आँखों में नमी तैर गई थी। अंगद की आँखें जलते लावे सी धधक रही थीं। उसके साथ अतीत में जो हुआ, उसे वो सब याद आ चुका था और उसने आकृति को ही गलत समझ लिया था।

    आकृति खामोशी से उसकी बात सुन रही थी। अंगद जैसे ही चुप हुआ, आकृति ने भीगी निगाहों से उसको देखते हुए, दर्द से लिपटे स्वर में कहना शुरू किया, "आप मुझे गलत समझ रहे हैं। मेरे लिए ये रिश्ता कोई बोझ नहीं, बल्कि मेरी ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत सच्चाई है कि मुझे आपकी ज़िंदगी में शामिल होने का मौका मिला है। आप मेरे लिए कोई मुसीबत नहीं, बल्कि मेरे पति हैं, जिनके लिए मैं खुशी-खुशी अपनी जान भी दे सकती हूँ।

    हाँ, ये बात सच है कि मैं चाहती हूँ कि आप ठीक हो जाएँ, क्योंकि मैं आपको आपके पैरों पर खड़े होते देखना चाहती हूँ, इसलिए नहीं कि अभी मैं आपसे खुश नहीं हूँ या आप मुझे बोझ लगते हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि मैं आपको खुश देखना चाहती हूँ और अभी आप खुश नहीं हैं।

    अगर आप ठीक हो सकते हैं, तो मैं एक कोशिश करना चाहती हूँ ताकि आप पहले जैसे अपनी ज़िंदगी बिता सकें, खुद को इस घर की चारदीवारी में कैद करके न रखें। मैं चाहती हूँ कि आपने खुद को जिन अंधेरों में कैद किया हुआ है, आप वहाँ से बाहर निकलें। हाँ, मैं चाहती हूँ कि आप ठीक हो जाएँ, पर इसका मतलब ये नहीं कि अगर आप ठीक नहीं हुए, तो मैं आपको छोड़कर चली जाऊँगी।

    आप सबको एक पैमाने से नहीं माप सकते, राणा साहब, क्योंकि हर इंसान एक जैसा नहीं होता। कोई एक लड़की अपनी बेवकूफी में आप जैसे हीरे को ठुकराकर चली गई, इसका मतलब ये नहीं कि दुनिया में हर लड़की अंधी है, जो आपका मोल नहीं समझ पाएगी।

    मैं जानती हूँ, जो आपके साथ हुआ, वो गलत था, पर उसकी सज़ा आप मुझे क्यों दे रहे हैं? मैंने तो आपके साथ कुछ गलत नहीं किया। मैंने आपको अपने ऊपर बोझ कभी नहीं माना, बल्कि मैं तो सारी ज़िंदगी खुशी-खुशी आपका सहारा बनने को तैयार हूँ।

    ठीक कहा था आपने, मैं जानती थी कि आप चल-फिर नहीं सकते, ये भी जानती थी कि इस रिश्ते को निभाना आसान नहीं होगा, बहुत सी मुश्किलों का सामना करना होगा, शायद मैं एक आम शादीशुदा लड़की जैसी ज़िंदगी नहीं जी सकूँगी, पर फिर भी मैंने आपसे शादी के लिए हाँ कहा, इसलिए नहीं कि आप अमीर हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि मेरी माँ ये चाहती थी।

    मैंने खुद को अपनी आने वाली ज़िंदगी के लिए तैयार कर लिया था कि चाहे कितनी ही मुश्किलों का सामना क्यों न करना पड़े, मैं इस रिश्ते को दिल से निभाऊँगी। अपनी आखिरी साँस तक आपका साथ दूँगी।

    तब तो मैं आपके बारे में ज्यादा कुछ जानती भी नहीं थी, पर इतना जानती थी कि आपको मेरी ज़रूरत है और मुझे आपकी। अब मैं आपके बारे में सब जान गई हूँ और यकीन मानिए, मेरा, मैं पहले भी आपकी इज़्ज़त करती थी और अब तो मेरी नज़रों में आपकी इज़्ज़त और ज़्यादा बढ़ गई है।

    आप चल नहीं सकते, तो आपने इसको अपनी कमी मानकर खुद को इस घर में कैद कर लिया, एक लड़की ने कह दिया और आपने मान लिया कि अब आप किसी के लायक नहीं है, ये तो गलत है न? आप कमज़ोर नहीं हैं, ज़िंदगी की हर मुश्किल का आपने डट कर सामना किया है, तब जाकर इस मुकाम तक पहुँचे हैं और आज इतनी छोटी सी मुसीबत के आने पर आपने अपने घुटने टेक दिए? आप जिसे अपनी कमजोरी समझकर खुद को हीन दृष्टि से देख रहे हैं, वो आपकी कमजोरी नहीं, बल्कि आपकी ताक़त है।

    जो आपके साथ हुआ, अगर वो किसी और के साथ हुआ होता, तो उसने ज़िंदगी से हार मानकर अपनी जान दे दी होती, पर आपने ऐसा नहीं किया। आप हर दर्द और तकलीफ़ सहकर भी हर परिस्थिति में आगे बढ़ते रहे। आज भी आप सब कुछ संभाल रहे हैं, किसी चीज़ के लिए किसी पर निर्भर नहीं हैं, अपने सब काम खुद से करते हैं, फिर आप कैसे खुद को मुझ पर या किसी पर बोझ समझ सकते हैं?

    मुझे नहीं पता कि आपके पहले प्यार ने क्या सोचकर उस वक़्त आपका साथ छोड़ दिया, जब आपको सबसे ज़्यादा उनके साथ और प्यार की ज़रूरत थी, पर मैं इतना जानती हूँ कि उन्हें आपसे कभी मोहब्बत थी ही नहीं, उन्होंने कभी आपको अपना माना ही नहीं था। अगर ऐसा होता, तो कभी आपको उस वक़्त छोड़कर नहीं जाती। वो आपके लायक ही नहीं थी, इसलिए महादेव ने आपको उनके झूठे प्यार से आज़ाद करवा दिया।"

    अंगद उसे देख रहा था। वो बोले जा रही थी, "मैंने आपको दिल से अपनाया है, जैसे आप हैं, वैसे ही आपको अपनाया है और मैं एक सच्चे हमसफ़र की तरह ज़िंदगी के इस सफर को आपके साथ तय करना चाहती हूँ। आपके साथ कदम से कदम मिलाकर न चल सकूँ, तो कोई गम नहीं, मैं आपका सहारा बनकर आपको आगे बढ़ने में मदद कर सकूँ, इसमें भी मुझे बहुत खुशी होगी।

    आप कोशिश नहीं करना चाहते, तो मैं आपको मजबूर भी नहीं करूँगी, क्योंकि मुझे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आप खुद से चल सकते हैं या नहीं, आप मेरे साथ हैं, मुझे बस इस बात से मतलब है। जब तक आप हैं, मैं खुश हूँ, जब-जब आपको मेरी ज़रूरत पड़ेगी, मैं रहूँगी आपके पास, ये वादा है मेरा खुद से। ज़िंदगी के इस सफर में चाहे कितनी ही मुश्किलें आएँ, पर मैं कभी उनसे घबराकर आपका साथ नहीं छोड़ूँगी। अगर मैं आपके किसी काम आ सकी, तो इससे बड़ी खुशी की बात और कुछ नहीं होगी मेरे लिए।"

    उसने साँस ली और कहा, "मैंने आपसे जो रिश्ता जोड़ा है, उसे मैं कभी टूटने नहीं दूँगी। अभी तो आप सब कुछ खुदसे करते हैं, महादेव न करे, पर अगर आप बिस्तर से खुद से उठ भी न पाते, तब भी मैं आपका साथ छोड़कर नहीं जाती। आपकी सेवा करती, जब तक बन पड़ता आपका साथ निभाती, आपकी हर ज़रूरत का ध्यान रखती। कभी आपको अकेला छोड़कर नहीं जाती।

    आपने प्यार किया और निभाया भी, पर अभी तक आप पति-पत्नी के रिश्ते को समझ नहीं सके। यूँ ही पत्नी को अर्धांगिनी नाम से संबोधित नहीं किया जाता। अर्धांगिनी का अर्थ होता है आधा अंग, वो अपने पति के वाम भाग में विराज करती है, उसका आधा अंग कहलाती है, पति के हर सुख-दुख में उसका भी आधा हिस्सा होता है।

    कभी आपने सुना है कि किसी इंसान का आधा शरीर उसको छोड़कर चला गया हो? नहीं, ऐसा कभी नहीं होता, वैसे ही मैं भी कभी आपको छोड़कर नहीं जा सकती। अब मेरा अस्तित्व आपसे जुड़ चुका है, जब तक ज़िंदा हूँ, आपका साथ निभाऊँगी।"

    To be continued....

  • 17. The Forced Vows - Chapter 17

    Words: 1689

    Estimated Reading Time: 11 min

    "कभी आपने सुना है कि किसी इंसान का आधा शरीर उसको छोड़कर चला गया हो? नहीं, ऐसा कभी नहीं होता, वैसे ही मैं भी कभी आपको छोड़कर नहीं जा सकती। अब मेरा अस्तित्व आपसे जुड़ चुका है, जब तक ज़िंदा हूँ, आपका साथ निभाऊँगी।"

    आकृति ने आगे कहा, "ये मत सोचिएगा कि मैं आप पर कोई एहसान कर रही हूँ या मजबूरी में इस रिश्ते के बोझ को ढो रही हूँ, क्योंकि ये रिश्ता मेरे लिए मेरी साँसों जितना अहम है। इसको बोझ कहकर मैं आपकी साँसों को बोझ नहीं कह सकती। अगर ये रिश्ता टूट गया, तो मेरी साँसों की डोर भी टूट जाएगी, क्योंकि मैं आपके बिना ज़िंदगी जीने से आपकी सुहागन बनकर मरना बेहतर समझूँगी।

    मैंने आप पर कोई एहसान नहीं किया, बस जिस रिश्ते को महादेव ने जोड़ा है, उसको निभाने की कोशिश कर रही हूँ और आप किसी सूरत में किसी आम आदमी से कम नहीं हैं। मैं बहुत खुशकिस्मत हूँ कि मुझे पति के रूप में आप मिले। आप मेरे लायक हैं, पर मैं आपके काबिल नहीं हूँ। कमी आपमें नहीं है, पर मुझसे बहुत बड़ी कमी है। हाँ, हमारा कोई मेल नहीं, पर महादेव ने हमें इस पवित्र बंधन में बांधा है, ये मेरी खुशनसीबी है।"

    अंगद उसे देख रहा था और आकृति की आवाज़ मे आ ब नमी घुलने लगी।

    "मैंने कभी शादी के बारे में सोचा तक नहीं था। मेरी ज़िंदगी में एक ऐसा तूफ़ान आया कि उसने मुझसे इन सपनों को देखने तक का हक़ छीन लिया। मैंने इस सच्चाई को स्वीकार कर लिया था कि मेरी माँग हमेशा सूनी ही रहेगी, मुझे अपनी ज़िंदगी अकेले बितानी होगी। मान लिया था मैंने कि मेरे नसीब में किसी का प्यार और साथ नहीं है, पर फिर आप मेरी ज़िंदगी में किसी फ़रिश्ते के तरह आए।

    आपने मुझे अपनी ज़िंदगी में शामिल करके मुझे उस जिल्लत भरी ज़िंदगी से छुटकारा दिलाया। मेरी सूनी माँग को आपने सिंदूर से सजाकर, मेरी सूनी ज़िंदगी में खुशियों के रंग भर दिए। मैंने तो ख्वाब में भी ये सोचना छोड़ दिया था कि मेरी माँग में भी वो कुमकुम सजेगा, कभी मैं किसी की पत्नी बनूँगी, पर आपने मुझे अपनी ज़िंदगी में शामिल करके, मुझे और मेरी माँ को एक नई ज़िंदगी दे दी।"

    आकृति की आँखे छलक आई, "मैंने तो फिर भी लोगों के तानों को सुनकर जीना सीख लिया था, अपनी माँ को अपनी दुनिया बना लिया था, मुश्किलों से लड़ना सीख गयी थी, मेरी किस्मत में लिखे अकेलेपन को स्वीकार कर लिया था, पर माँ मुझे तन्हा नहीं देख पा रही थी। लोगों के नाते और घर पर बैठी जवान बेटी की चिंता उन्हें जीने नहीं दे रही थी।

    आपने मुझसे शादी करके मेरी माँ को एक नई ज़िंदगी दी है। कितनी चिंता थी उन्हें कि अब कोई उनकी बेटी का हाथ नहीं थामेगा, हर वक़्त इसी फिक्र में घुलती रहती थी कि अगर उन्हें कुछ हो गया तो मेरा क्या होगा? मेरे सर पर न पिता का साया था, न भाई का हाथ, सहारा देने वाला कोई नहीं था।"

    वो दर्द से मुस्कुराई और कहा, "ये दुनिया बहुत निर्दयी है। अकेले लड़की को न चैन से जीने देती है, न मरने का रास्ता छोड़ती है। अगर लड़की को इज़्ज़त की ज़िंदगी जीनी है, तो उसके साथ किसी न किसी मर्द का होना ज़रूरी है, चाहे वो उसका पिता हो, भाई हो या पति। किसी न किसी रूप में उसके सर पर किसी मर्द का सुरक्षा भरा हाथ होना ज़रूरी है, वरना इस समाज में मौजूद गिद्ध उसको नोच कर खाने में एक सेकंड का वक़्त नहीं लगाते, उसको इज़्ज़त की नज़रों से नहीं देखते।"

    आज आकृति जैसे सब कह देना चाहती थी। उसने आगे कहा, "आपने मुझे अपनी पत्नी बनाकर मुझे उनकी नज़रों से बचा लिया। मेरी माँ हमेशा परेशान रहती थी कि कौन थामेगा ऐसी लड़की का हाथ, जिसका रिश्ता उसकी शादी के दिन टूट गया हो, जिसके होने वाले पति ने जिसका फ़र्ज़ था उसके मान की रक्षा करना, उसने भरी महफ़िल में उसकी इज़्ज़त का तमाशा बना दिया हो।

    मुझे लोगों की नज़रों से बचाने वाला कोई नहीं था और मेरी माँ इसी चिंता में घुली जा रही थी कि कहीं मेरी इज़्ज़त पर कोई दाग न लग जाए, उनकी बेटी किसी दरिंदे के हाथ न लग जाए, उसकी ज़िंदगी बर्बाद न हो जाए, कहीं संरक्षण मिल जाए उसे, बस यही चाहती थी वो और आपने उनकी चिंता ख़त्म कर दी।

    आप मेरी ज़िंदगी में महादेव के भेजे फ़रिश्ते जैसे आए हैं, मेरी सालों की भक्ति के बदले उन्होंने प्रसाद के रूप में मुझे आपको दिया है और मैं अपने इष्ट के दिए प्रसाद का निरादर कभी नहीं कर सकती।

    आपको लगता है अगर आप ठीक नहीं हुए, तो मैं आपको छोड़कर चली जाऊँगी? मेरे एक सवाल का जवाब दीजिए, क्या कभी अपने आराध्य पर मुश्किल आते देख उनका भक्त उनका साथ छोड़कर भागा है?..... नहीं, वो अपनी आख़िरी साँस तक उनको दिल से पूजता है, उनकी निस्वार्थ भक्ति करता है और मैं भी निस्वार्थ भाव से आजीवन अपने पत्नी धर्म का निर्वाह करना चाहती हूँ।

    इससे ज़्यादा मैं और कुछ नहीं कह सकूँगी। अगर अब भी आपको मेरी नीयत पर शक है, तो बेशक आप मुझे बेरुखी दिखाइए, पर मैं आपका साथ अपने जीते जी तो नहीं छोड़ने वाली। हाँ, अगर मर गई तो शायद आपकी बात सच हो जाए।"

    आकृति ने कुछ सेकंड रुकते हुए आगे कहा, "अबसे मैं न तो अपनी सच्चाई पर आपको विश्वास दिलाने की कोशिश करूँगी और न ही आपको दवाइयाँ खाने को कहूँगी। अगर आप ठीक नहीं होना चाहते, तो ठीक है, मुझे इससे कोई आपत्ति नहीं, मैं तो हर हाल में आपका साथ निभाऊँगी, पर किसी भी फ़ैसले पर पहुँचने से पहले एक बार अपनी माँ, बहन और दोस्त के बारे में सोच लीजिएगा।

    मैं तो आपकी कोई नहीं, कोई महत्व नहीं मेरी इच्छाओं का आपकी नज़र में, आप तो इस रिश्ते को भी नहीं मानते, पर बाकियों से तो आपका रिश्ता जुड़ा है, वो तो अहम होंगे आपके लिए, उनकी इच्छा का मान तो रख ही सकते होंगे आप।

    आपके अपने आपको फिर से अपने पैरों पर खड़े होते और खुलकर ज़िंदगी जीते देखना चाहते हैं। अब फ़ैसला आपके हाथों में है, आपके लिए वो परिवार और उनकी खुशी ज़्यादा मायने रखता है, जो हर हाल में आपके साथ खड़े रहते हैं, या वो लड़की, उसकी कही कड़वी बातें और उसका दिया दर्द ज़्यादा महत्व रखता है, जो आप पर मुसीबत आते ही आपसे दूर चली गई। दवाइयाँ यहीं रखी हैं, अगर मन करे तो खा लीजिएगा, वरना कूड़े में डाल दीजिएगा।"

    आकृति ने दवाइयों को ग्लास के कवर प्लेट पर रखा और अपने आँसुओं को पोंछते हुए वहाँ से जाने लगी। उसने अपना दिल उसके सामने खोलकर रख दिया था। पहले भी उसको अपनी सच्चाई पर विश्वास दिलाने की कोशिश कर चुकी थी और आज उसने आख़िरी कोशिश की थी। उसको सब कुछ बता दिया था। अपने अतीत के दर्द को भी कुछ हद तक उससे बाँट दिया था। उसके बाद उसके पास कहने को कुछ बचा ही नहीं था, इसलिए उसने खामोशी से जाना ही ठीक समझा।

    अंगद के दिमाग में उसकी कही बातें घूम रही थी। उसकी बातों से उसको भी अपना अतीत याद आ गया था और वो समझ गया था कि आकृति को उसके बारे में सब पता चल चुका है।

    आकृति की बातों में उसके दर्द को भी महसूस किया था, उसकी आँखों में सच्चाई देखी थी। उसके अतीत में कुछ उलझ सा गया था वो, क्योंकि वो इस बारे में कुछ भी नहीं जानता था।

    वो कुछ पल खामोशी से उसकी कही बातों के बारे में सोचता रहा, फिर सर घुमाकर देखा तो आकृति दरवाज़े के पास पहुँच चुकी थी। जैसे ही आकृति ने दरवाज़ा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया, उसके कानों में अंगद की आवाज़ पड़ी, "आकृति!"

    शायद ये पहली बार था जब अंगद ने उसे उसके नाम से पुकारा था। जाने क्यों, पर उसके मुँह से अपना नाम सुनकर आकृति की धड़कनें शोर करने लगीं, हाथ हवा में ही रुक गए। उसने मुड़कर सवालिया नज़रों से उसको देखते हुए कहा, "जी।"

    अंगद ने गंभीर निगाहों से उसको देखते हुए सवाल किया, "तुम्हारे अतीत में क्या हुआ था?"

    उसका सवाल सुनकर आकृति एक पल को स्तब्ध सी उसको देखती रह गई, फिर परेशान निगाहों से उसको देखते हुए बोली, "आप मुझसे क्यों पूछ रहे हैं? जब माँ ने आपके रिश्ते की बात मेरी माँ से की थी, तो उन्होंने माँ को सब कुछ सच-सच बताया था और सब जानने के बाद भी माँ ने हमारे रिश्ते को जोड़ने का फ़ैसला किया, तो उन्होंने आपको मेरे बारे में सब बताया होगा न? तभी तो आपने रिश्ते के लिए हाँ कहा होगा, फिर अब आप ऐसे क्यों बिहेव कर रहे हैं, जैसे आपको कुछ पता ही नहीं कि मेरे अतीत में क्या हुआ था?"

    अब चौंकने की बारी अंगद की थी। उसने हैरानी से उसको देखते हुए कहा, "मुझे तुम्हारे बारे में बस इतना बताया गया था कि तुम अपनी माँ के साथ अकेली रहती हो। कुछ महीनों पहले एक हादसे में तुमने अपने पापा और भाई को खो दिया था। जॉब करके अपना और अपनी माँ की ज़िम्मेदारी उठा रही हो और माँ को तुम मेरे लिए पसंद हो। इससे ज़्यादा मुझे कुछ नहीं पता, तो तुम कौनसे अतीत की बात कर रही हो?"

    आकृति बोली, "शायद माँ ने सोचा होगा कि सब जानने के बाद आप मुझे नहीं अपनाएंगे, पहले ही आप इस शादी के लिए तैयार नहीं थे, कहीं मेरी सच्चाई जानने के बाद इंकार न कर दे, यही सोचकर उन्होंने आपको कुछ नहीं बताया होगा, पर आप चिंता मत कीजिए, मैं आपको धोखे में रखकर आपसे कोई रिश्ता नहीं जोड़ूँगी।

    मैं अभी कुछ बताने की हालत में नहीं, बाद में मैं खुद आपको सब सच-सच बता दूँगी। सच्चाई जानने के बाद अगर आप मुझे स्वीकार कर सके, तो ये मेरी खुशनसीबी होगी और अगर आपने भी मुझे ठुकरा दिया, तो इसे मैं अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लूँगी। आपका हर फ़ैसला मुझे मंज़ूर होगा, बस मुझे थोड़ा वक़्त दे दीजिए खुद को संभालने के लिए।"

    इतना कहकर वो वहाँ से चली गई और अंगद उसकी बातों में उलझ गया। आकृति वहाँ से जा चुकी थी, पर उसका दर्द से सना चेहरा और बेबसी से लाल आँखें अब भी अंगद की आँखों के सामने घूम रही थी।

    To be continued....

  • 18. The Forced Vows - Chapter 18

    Words: 1894

    Estimated Reading Time: 12 min

    आकृति अपनी बात कहकर वहाँ से चली गई, और अंगद उसकी बातों में उलझ गया। आकृति वहाँ से जा चुकी थी, पर उसका दर्द से सना चेहरा और बेबसी से लाल आँखें अब भी अंगद की आँखों के सामने घूम रही थीं।

    अंगद ने आकृति की बातों में उलझे हुए ही निगाहें सामने की तरफ घुमाईं, तो नज़रें सामने रखी दवाइयों पर चली गईं। ज़हन में आकृति की कही बातें घूमने लगीं, और उसने कुछ सोचकर उन दवाइयों को खा लिया। करीब पाँच महीने में पहली बार उसने दवाइयों को खाया था, वो भी आकृति की वजह से।

    अंगद अपने ही व्यवहार को देखकर हैरान था, और समझ नहीं पा रहा था कि आखिर उसके साथ हो क्या रहा है? वो अपने ही एहसासों में उलझने लगा था। क्यों आकृति के तरफ अलग सा खिंचाव महसूस कर रहा है? क्यों उसकी सूनी उदास आँखें उसके मन को कचोटती हैं? क्यों उसका दर्द उसे खुद में महसूस होता है? क्यों उसकी बातें मान जाता है? क्यों उसके बारे में सोचने से खुद को रोक नहीं पाता?

    आखिर क्यों उसने उसके सामने ये बातें कहीं? क्यों उसको जाने को कहते हुए खुद को कमज़ोर और बेबस महसूस कर रहा था? क्यों उसको गलत ठहराते हुए उसे तक़लीफ हो रही थी? जब आज तक उसने किसी के सामने अपने दर्द को ज़ाहिर नहीं किया, तो उसके सामने इतना कुछ कैसे बोल गया? चंद घंटों के साथ ने उसको बदलने पर क्यों मजबूर कर दिया था, ये वो समझ नहीं पा रहा था।

    सवालों का एक तूफान सा उठ रहा था दिल में, और उनके जवाबों की तलाश थी उसे। उन सवालों में उलझा, काफ़ी देर तक वो इन सबके बारे में सोचता रहा, फिर अपना दिमाग झटककर काम करने लगा, पर आकृति का ख़याल अब भी उसके ज़हन पर हावी था। वो जानना चाहता था कि उसके अतीत में क्या हुआ था। कुछ-कुछ अंदाज़ा तो उसकी कही बातों से लगा चुका था, पर पूरी बात जानने की इच्छा उसके मन में सर उठाने लगी थी।

    कभी-कभी आकृति की आँखें देखकर उसको लगता था कि उसने पहले भी कहीं उन्हें देखा है, कुछ याद दिलाती थीं उसकी काली-काली आँखें उसे, पर उसके दिमाग से जैसे वो बात मिट चुकी थी। अजीब सा जाना-पहचाना सा एहसास था उसकी मौजूदगी में, जिसे समझने में अंगद नाकामयाब हो रहा था। लाख कोशिश करने पर भी काम में ध्यान नहीं लगा पाया वह, तो आखिर में उसने चेयर से सर टिकाते हुए अपनी आँखें बन्द कर लीं।

    आकृति की कही बात उसके कानों में गूंज उठी कि वो हर परिस्थिति में उसका साथ निभाएगी। उसकी कही इस बात को याद करते हुए उसके लबों पर कब सुकून भरी मुस्कुराहट तैर गई, उसको इस बात का एहसास ही नहीं हुआ।

    आकृति बाहर सबके पास चली आई। लबों पर फीकी मुस्कान बिखेरते हुए अपनी उदासी को छुपाने की कोशिश करने लगी, पर उसकी आँखों में ठहरी नमी और चेहरे पर झलकती उदासी को सबने महसूस कर लिया था। वो समझ भी गए थे कि ज़रूर उसके और अंगद के बीच कुछ हुआ है, शायद अंगद ने कुछ कहा होगा, जिसके वजह से आकृति उदास है। उसकी उदासी को समझते हुए सब खामोश रहे, किसी ने इस बात का ज़िक्र नहीं किया, क्योंकि जो भी बात थी, वो उन दोनों के बीच की थी, और पति-पत्नी के मामलों में तब तक बीच में नहीं पड़ना चाहिए, जब तक बहुत ज़रूरी न हो बीच में बोलना।

    उन्होंने अपनी तरफ़ से अंगद और आकृति दोनों को समझाया था, और अब ये रिश्ता जिनका था, उन्हें खुद इस रिश्ते और एक दूसरे को समझने की ज़रूरत थी। उन्हें वक़्त की ज़रूरत थी, और अब वो उन्हें वो वक़्त दे रहे थे ताकि इस रिश्ते की उलझनों को वो मिलकर सुलझा सकें।

    अनु की बातें आकृति के लबों पर मुस्कान तो ले आईं, पर आँखों में गहरी उदासी छाई हुई थी, जिसको महसूस करके भी कोई उसे दूर करने के लिए कुछ नहीं कर सकता था।

    अंगद पूरा टाइम अपने स्टडी रूम में ही रहा। लंच के वक़्त सबने साथ में लंच किया, तब भी वहाँ खामोशी छाई हुई थी। ऐसे ही रात का वक़्त हो गया। दोपहर के बाद आकृति ने सुनंदा जी से भी बात की थी, क्योंकि अब वो वहाँ अकेली रह गई, तो आकृति को उनकी चिंता हो रही थी।

    सुनंदा जी के बहुत समझाने के बाद आकृति ने फोन रखा था। आकृति लगभग सारे दिन खाली बैठी हुई थी, तो रात के वक़्त ममता जी के बहुत मना करने के बावजूद उसने ज़िद करके खुद सबके लिए डिनर बनाया।

    डिनर भी खामोशी से हुआ। डिनर के बाद हमेशा की तरह ममता जी ने इस उम्मीद के साथ अंगद के तरफ़ दवाइयाँ बढ़ा दीं कि अब वो उन्हें खा लेगा, और इस बार उनके हाथ नाउम्मीदी नहीं आई।

    अंगद ने खामोशी से उन दवाइयों को लेकर खा लिया। ये देखकर सभी आँखें फाड़े हैरानी से उसको देखने लगे, पर अंगद ने किसी पर ध्यान नहीं दिया, और खामोशी से वहाँ से चला गया। अब सबकी हैरानी भरी निगाहें आकृति के तरफ़ घूम गईं, जो खुद उलझी हुई सी अंगद को देख रही थी।

    उन्हें ये समझते देर नहीं लगी कि आज ये चमत्कार किसके वजह से हुआ है? और बात समझते ही उनके लबों पर मुस्कान ठहर गई।

    अनु झट से आकर आकृति के गले से लग गई, जो अब भी उलझी निगाहों से जाते हुए अंगद को देख रही थी। अनु उससे अलग हुई और उत्सुकता से बोली, "Wow भाभी, आज तो आपने मिरेकल कर दिया। सच में आप कोई परी हैं। मैं तो आपकी फैन बन गई हूँ, आप कैसे भाई से अपनी बात मनवा लेती हैं? सच में आप ही भाई के लिए बनी हैं, उन्हें सिर्फ़ आप ही सम्भाल सकती हैं।"

    उसकी बात सुनकर आकृति ने उसके तरफ़ निगाहें घुमाईं, तो अनु लबों पर बड़ी सी मुस्कान सजाए उसे ही देख रही थी।

    आकृति अभी कुछ रिएक्ट भी नहीं कर सकी थी कि उसको अपने सर पर प्यार भरे स्पर्श का एहसास हुआ। उसने निगाहें घुमाईं, तो ममता जी ने उसके सर पर प्यार से हाथ फेरते हुए मुस्कुराकर कहा,

    "हमारे पास शब्द नहीं आपकी प्रशंसा के लिए। हर बीतते पल के साथ आप हमारे विश्वास को और दृढ़ करती जा रही हैं कि हमने अपने बेटे के लिए बिल्कुल सही जीवनसाथी को चुना है। हम आपसे ज़्यादा कुछ नहीं कहेंगे, बस इतना कहना चाहते हैं कि यूँ ही हमेशा हमारे बेटे का साथ दीजियेगा।"

    आकृति ने सहमति में अपना सर हिला दिया। नील ने भी मुस्कुराकर कहा, "भाभी, सच में आप कोई मोहिनी मंत्र जानती हैं, तभी उस बब्बर शेर को भी आपने अपने आगे झुकने पर मजबूर कर दिया। आप सही मायनों में उसकी हमसफ़र कहलाने के क़ाबिल हैं। यूँ ही मेरे यार का साथ दीजियेगा, आपका साथ उसको फिर से जीना सिखा देगा।"

    आकृति बस मुस्कुराकर रह गई। कुछ तो चल रहा था उसके दिमाग में, जो उसने किसी से कहा नहीं था। सब अब अपने-अपने कमरों में चले गए, तो आकृति ने कुछ सोचते हुए अपने कदम ग्राउंड फ़्लोर पर बने अंगद के स्टडी रूम के तरफ़ बढ़ा दिए।

    थोड़ा हिचकिचाते हुए उसने दरवाज़ा खोला और अंदर चली आई। टेबल पर जाकर उसने देखा, तो दवाई नहीं थी वहाँ, डस्टबिन में भी जब उसको दवाई नहीं मिली, तो वो समझ गई कि अंगद ने दवाई खा ली थी।

    सुबह से अब जाकर उसके लबों पर रियल मुस्कान खिली थी। उसने अंगद को याद करते हुए खुद से ही कहा, "तो आपने मेरी बात मानकर दवाइयाँ खा ली थीं। चलिए, कम से कम आपने क़दम आगे तो बढ़ाया। देखिएगा, मैं आपको आपके अतीत के अंधेरों से बाहर ज़रूर निकालूँगी, कितना ही मुश्किल क्यों न हो, पर मैं आपको विश्वास दिलाऊँगी कि आपमें कोई कमी नहीं। मेरा दिल कहता है, आप ज़रूर ठीक होंगे।

    महादेव ने आपकी बहुत परीक्षाएँ ली हैं, बहुत संघर्ष किया है आपने, कभी मुश्किलों के आगे हार नहीं मानी, इस बार भी आपकी हार नहीं होगी। महादेव अब आपको और तक़लीफ़ नहीं देंगे। आप फिर से अपने पैरों पर खड़े ज़रूर होंगे, फिर से अपने क़दमों पर चलेंगे, और जिसने आपको ये कहकर धूतकारा था, उसको अपनी ग़लती का एहसास ज़रूर होगा। उसको एहसास होगा कि उसने अपनी बेवक़ूफ़ी में क्या खो दिया है।"

    उसने सोचा, "मुझे नहीं पता कि मैं कभी आपके दिल में जगह बना पाऊँगी भी या नहीं, पता नहीं आप मेरे बारे में सब जानने के बाद दुनिया वालों की तरह बेगुनाह होते हुए मुझे ही दोषी ठहराएँगे, या फिर मेरी सच्चाई और बेगुनाही पर विश्वास करके मुझे अपनी ज़िंदगी में जगह देंगे। पर आपका फैसला जो भी हो, मुझे मंजूर होगा। जब तक मैं हूँ, मैं आपका साथ ज़रूर निभाऊँगी।"

    वो जैसे खुद से ही बात कर रही थी, "आप ठीक हो जाइये, फिर मैं आपको अपने बारे में सब कुछ सच-सच बता दूँगी। उससे पहले नहीं बताऊँगी, क्योंकि अगर सब जानने के बाद आपने मुझे खुद से दूर कर दिया, तो मैं आपके लिए कुछ नहीं कर सकूँगी, और अभी मेरा आपके साथ होना बहुत ज़रूरी है। अगर ये बात सच है कि आप मेरी बात मानते हैं, तो मैं तब तक आपसे दूर नहीं जा सकती, जब तक आप ठीक नहीं हो जाते, और मेरा दिल कहता है कि बहुत जल्द आप फिर से ठीक हो जाएँगे।"

    आकृति ने मन ही मन फ़ैसला किया, और वहाँ से चली गई। जब तक वो रूम में पहुँची, अंगद चेंज करके अपनी जगह बैठ चुका था। सुबह के बाद से दोनों में कोई बात नहीं हुई थी।

    अंगद बेड के क्राउन से पीठ लगाए बैठा था और फ़ोन में कुछ कर रहा था। आकृति ने एक नज़र उसको देखा, फिर अपने बैग के पास चली गई। ज़्यादातर चीज़ें ख़रीदी थीं, पर कुछ सामान और कपड़े अपने घर से भी लाई थी, जो अब तक उस बैग में ही रखा हुआ था।

    आकृति ने सामान निकालकर उसको सेट किया, फिर रात के लिए सिंपल से सूट लेकर चेंजिंग रूम में चली गई। दरवाज़े के बन्द होने की आवाज़ सुनकर अंगद ने निगाहें उठाकर चेंजिंग रूम के बन्द दरवाज़े को एक नज़र देखा, फिर वापिस फ़ोन पर निगाहें गड़ा लीं।

    कुछ देर बाद आकृति चेंजिंग रूम से बाहर आई, फिर बाथरूम में जाकर हाथ-मुँह धोया, और रूम में आकर ड्रेसिंग टेबल के तरफ़ बढ़ गई। अंगद भले दिखा नहीं रहा था, पर उसका सारा ध्यान आकृति पर ही था।

    आकृति ने इयररिंग्स और पायल को खोलकर टेबल पर रख दिया, फ़ेस और हाथों पर क्रीम लगाई, फिर एक नज़र बेड पर बैठे अंगद को देखने के बाद सोफ़े के तरफ़ बढ़ गई।

    ये देखकर अंगद की भौंहे तन गईं, पर वो बोला कुछ नहीं। आकृति जाकर सोफ़े पर लेट गई, और अपनी बाँह को मोड़कर उसने अपनी आँखों को ढक लिया।

    अंगद जो तब से खामोशी से सब देख रहा था, अब उसने आँ...आँखें छोटी-छोटी करके आकृति को घूरते हुए कहा, "इस नाटक का क्या मतलब है?"

    उसकी गुस्से भरी आवाज़ सुनकर आकृति ने अपनी आँखों पर से अपनी बाँह हटाकर निगाहें उसके तरफ़ घुमाईं, और असमंजस भरी निगाहों से उसको देखते हुए बोली, "अब मैंने क्या किया है? मैंने तो आपको कुछ कहा तक नहीं, फिर आप किस बात पर भड़क रहे हैं?"

    अंगद ने उसका सवाल सुना, तो एक बार फिर उसको घूरते हुए बोला, "जब मैंने तुम्हें कुछ कहा तक नहीं, तुम्ही अपनी बात कहकर वहाँ से निकल गई थीं। फिर उसके बाद सारे दिन तुमने मुझे नज़रअंदाज़ किया, और अब...अब यहाँ सोने की जगह सोफ़े पर जाकर लेट गई, ये नाटक नहीं, तो और क्या है?"

    To be continued....

  • 19. The Forced Vows - Chapter 19

    Words: 2020

    Estimated Reading Time: 13 min

    अंगद जो तब से खामोशी से सब देख रहा था, अब उसने आँखें छोटी-छोटी करके आकृति को घूरते हुए कहा, "इस नाटक का क्या मतलब है?"

    उसकी गुस्से भरी आवाज़ सुनकर आकृति ने अपनी आँखों पर से अपनी बाँह हटाकर निगाहें उसके तरफ़ घुमाईं, और असमंजस भरी निगाहों से उसको देखते हुए बोली, "अब मैंने क्या किया है? मैंने तो आपको कुछ कहा तक नहीं, फिर आप किस बात पर भड़क रहे हैं?"

    अंगद ने उसका सवाल सुना, तो एक बार फिर उसको घूरते हुए बोला, "जब मैंने तुम्हें कुछ कहा तक नहीं, तुम्ही अपनी बात कहकर वहाँ से निकल गई थीं। फिर उसके बाद सारे दिन तुमने मुझे नज़रअंदाज़ किया, और अब...अब यहाँ सोने की जगह सोफ़े पर जाकर लेट गई, ये नाटक नहीं, तो और क्या है?"

    उसकी बात सुनकर आकृति की आँखें बड़ी-बड़ी हो गईं। उसने हैरानी से कहा, "आप फिर से मुझे ग़लत समझ रहे हैं। सुबह के बाद मैंने आपसे बात नहीं की, क्योंकि मैं समझ नहीं पा रही थी कि आपसे क्या बात करूँ? आप इतने सीरियस थे कि मैं कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं कर सकी। मैंने आपको इतना कुछ कह दिया था, तो मुझे लगा आप गुस्सा होंगे मुझपर, और मैं आपके गुस्से को नहीं बढ़ाना चाहती थी, इसलिए मैं चुप थी।

    और अभी तो मैं यहाँ सोने आई हूँ, क्योंकि मुझे आदत है, मैं आड़े-टेढ़े तरीक़े से सोती हूँ, जिसके वजह से आपको परेशानी हो सकती है, और मैं आपकी तकलीफ़ की वजह नहीं बनना चाहती थी। मैंने सोचा कि मैं यहाँ सो जाऊँगी, तो आप आराम से सो पाएँगे। इसलिए मैं यहाँ सोने चली आई। जैसा आप सोच रहे हैं, वैसा तो कुछ भी नहीं है।"

    आकृति घबराई निगाहों से उसको देखने लगी। अंगद ने उसकी बात सुनी, तो उसका गुस्सा कुछ कम हुआ, और उसने बिना किसी भाव के कहा, "तुम कैसे सोती हो, ये मैं कल रात देख चुका हूँ, और ये जानते हुए कि तुम नींद में एक जगह टिककर नहीं सो सकतीं, तुमने सोफ़े पर सोने का फ़ैसला लिया, वो भी मेरे लिए, ये बात कुछ हैरानी भरी है, क्योंकि जैसे तुम सोती हो, सोने के आधे घंटे के अंदर तुम सोफ़े से गिरकर ज़मीन पर नज़र आओगी।

    उसके बावजूद तुमने सोफ़े पर सोने का फ़ैसला लिया, ताकि मुझे तकलीफ़ न हो, तो मैं तुम्हें साफ़-साफ़ शब्दों में बता रहा हूँ कि तुम्हें मेरे लिए खुद को तकलीफ़ देने की ज़रूरत नहीं है। तुम यहाँ बेड पर सो सकती हो, मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी। अगर फिर भी तुम सहज नहीं हो, तो इतना बड़ा बेड है, बीच में तकिया लगाकर तुम दूसरी तरफ़ सो जाओ।"

    उसकी बात आकृति को कुछ ठीक लगी, उसके भाव देखकर इनकार करके वो उसको और नाराज़ नहीं करना चाहती थी, इसलिए उसने उसकी बात मान ली और बेड के तरफ़ बढ़ गई। उसने बेड के बीच में पिलो से लाइन बनाई, और दूसरी तरफ़ आकर लेट गई।

    अंगद ने गहरी साँस ली और खुद भी लेट गया। आकृति को दूसरे पर पैर चढ़ाकर सोने की आदत थी, तो आज फिर नींद में उसके पिलो को इंसान का पैर समझकर उसपर अपने पैर चढ़ाकर, और उसको अपनी बाँहों में भरकर सो गई। आज वो अंगद पर नहीं चढ़ी, और दोनों ही आराम से सोए।

    अगले कुछ दिन यूँ ही बीते। आकृति और अंगद के बीच कभी थोड़ी बहुत बातें हो जातीं, वरना दोनों ही खामोश रहते। आकृति ने किचन की ज़िम्मेदारी संभाल ली थी, जिसपर ममता जी ने उसको मना करने की कोशिश की, पर वो नहीं मानी।

    अंगद इस मामले में खामोश ही रहा। अब वो वक़्त पर दवाइयाँ ले लेता था, पर अजीब बात ये थी कि जबसे दवाइयाँ लेने लगा था, उसको अपना शरीर पहले से ज़्यादा कमज़ोर महसूस होता था, पर अभी उसने इस बारे में किसी को कुछ नहीं बताया था।

    आकृति अंगद की हर ज़रूरत का ध्यान रखने लगी थी, उसकी थोड़ी बहुत मदद भी कर दिया करती थी, जिसपर अंगद उसको मना भी नहीं करता था। कहीं न कहीं उसका यूँ परवाह करना अंगद को अच्छा लगने लगा था।

    अंगद और उसके बीच ज़्यादा बात नहीं होती थी, पर दोनों एक दूसरे के साथ सहज होने लगे थे। आकृति के प्रति अंगद के झुकाव को सभी महसूस कर रहे थे, और कहीं न कहीं वो खुश थे।

    आकृति की सुनंदा जी से रोज़ ही बात होती थी, और आकृति उन्हें लेकर थोड़ी परेशान भी थी, क्योंकि अब वहाँ कमाने वाला कोई नहीं था। पर अभी तक उसने ये बात अपने तक ही रखी थी। वो फिर से जॉब करना चाहती थी, पर कहे कैसे, ये समझ नहीं पा रही थी।

    सुनंदा जी ने भी उसको रोका हुआ था, इसलिए भी आकृति कुछ वक़्त के लिए खामोश रह गई कि सही वक़्त देखकर इस बारे में सबसे बात करेगी।

    वो उनसे मिलने भी नहीं जा सकी थी, क्योंकि सुनंदा जी ने उसको कहा था कि अभी उसे अंगद के पास रहना चाहिए, और आकृति भी उनकी बात मान गई कि अभी उसको अंगद पर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए। बड़ी मुश्किल से वो दवाई के लिए माना है, धीरे-धीरे सॉफ़्ट पड़ रहा है, अगर वो चली गई, और फिर से उसने दवाई लेनी बन्द कर दी, तो दिक़्क़त हो जाएगी।

    अंगद के कहने के बाद से आकृति बेड पर ही सोती थी, कभी-कभी वो पिलो को फलांगकर अंगद तक भी पहुँच जाती थी, जिसपर सुबह वो अंगद के सामने आने से बचती, ताकि उसको फ़ेस न करना पड़े। अंगद को इससे कोई दिक़्क़त नहीं थी, उल्टा जब आकृति उसके पास सोती, तो उसको सुकून का एहसास होता था, जिसके होने की वजह वो समझ नहीं पा रहा था।

    जहाँ अनु ममता जी से आकृति को माँ का स्नेह और प्रेम मिल रहा था, वहीं अनु के रूप में उसे एक नंद, बहन और दोस्त मिल गई थी, जो हमेशा अपनी बातों से उसको हँसाती रहती थी।

    अंगद से तो आकृति की बातें नहीं होती थीं, पर अनु के साथ वो घुल-मिल गई थी। अच्छी बॉन्डिंग हो गई थी दोनों के बीच। अक्सर आकृति उसको अपने बचपन और परिवार के बारे में बताया करती थी।

    नील और आकृति का रिश्ता भाई-बहन वाला ही था। नील ने उसकी ज़िंदगी में उसके बड़े भाई के जाने से जो जगह खाली हुई थी, उसको काफ़ी हद तक भर दिया था। अनु और नील का रिश्ता अब भी नोक-झोंक से भरा था। अनु उससे ज़रा-ज़रा सी बातों पर चिढ़ जाती, और नील जानबूझकर उसको चिढ़ाता। दोनों की नोक-झोंक से घर में रौनक रहती थी।

    आकृति के मन में अंगद के लिए सम्मान था, वो उसको अपना पति मानती थी, और दिल से अपना पत्नी-धर्म निभा रही थी। उसका पूरा ख़्याल रखती थी। उसके बारे में सब जानने के बाद आकृति के मन में उसके लिए एक सॉफ़्ट कॉर्नर बन चुका था, वो उसको खुश और पहले जैसे स्वस्थ देखना चाहती थी। वो अंगद की परवाह तो बहुत करती थी, पर अभी तक उसके लिए उसके मन में प्यार के एहसास नहीं पनपे थे।

    वही अंगद के मन तो आकृति के लिए अजीब से जो एहसास थे, अब वो और स्ट्रांग होते जा रहे थे। कुछ तो बदल रहा था, पर क्या, ये उसे समझ नहीं आ रहा था। अपने ही एहसासों के बीच उलझता जा रहा था वो, पर किसी परिणाम तक नहीं पहुँच पा रहा था।

    कुछ तो था आकृति में, जो वो उसके तरफ़ खींचता चला जा रहा था। मन में जो एहसास जन्म लेने गए थे, उन्हें न पहचान पा रहा था, न ही पनपने से उन्हें रोकने में ही सक्षम था। जिन एहसासों को वो महसूस करता था, वो बहुत अलग और ख़ास थे, जिन्हें उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था, इसलिए वो इन एहसासों के भँवर में उलझता जा रहा था।

    कल सुबह ही फ्लाइट से नील के साथ अनु को वापिस लंदन जाना था, क्योंकि काफ़ी लंबी छुट्टी ले ली थी उन्होंने, तो अब काम पर लौटना था उन्हें। उनके जाने की बात से आकृति थोड़ा उदास ज़रूर थी, पर वो जानती थी कि एक न एक दिन तो उन्हें वापिस जाना ही होगा, क्योंकि वही उनका काम है, इसलिए उसने उन्हें जाने से रोका नहीं। उन्होंने भी आते रहने का वादा किया, फिर फ़ोन तो था ही।

    रात गुज़र चुकी थी, और अगली सुबह सूरज देवता आकाश में अपने प्रकाश को फैलाते हुए सबको सवेरे के होने की सूचना दे रहे थे।

    अंगद दवाइयों के वजह से अब थोड़े देर से उठता था, और आकृति रोज़ सुबह साढ़े छह से सात के बीच उठ जाती थी। नहाकर खुद तैयार होती, उसके बाद अंगद के कपड़े और ज़रूरत की चीज़ें निकालकर उन्हें बेड पर रख देती। नीचे जाकर ममता जी के साथ पूजा करती, उसके बाद आरती लेकर कमरे में चली आती। उसी वक़्त उसकी पायल की छन-छन की आवाज़ से अंगद की नींद खुलती। आकृति उसको आरती देकर व्हीलचेयर पर बिठाती, फिर अंगद बाथरूम में चला जाता।

    उसके बाद सब साथ में नाश्ता करते, और अंगद का दिन काम में, तो बाक़ी सबका बातों में गुज़र जाता। आज भी सुबह रोज़ सी हुई। आकृति ने अपनी अलसाई आँखों को मलते हुए खोला, और अधखुली आँखों से उसको अपने सामने अंगद का चेहरा नज़र आया। इसके साथ ही उसने हड़बड़ाहट में अपनी आँखों को बड़ा-बड़ा करके देखा, तो आज फिर वो नींद में अंगद के पास पहुँच गई थी।

    ये देखकर आकृति ने बेबसी से अपनी आँखें बन्द करते हुए मन ही मन कहा, "तेरा कुछ नहीं हो सकता, तू ना बिल्कुल कुत्ते की दुम है, जिसको अगर सौ साल नली में रखने के बाद भी बाहर निकालो, तो वो टेढ़ी की टेढ़ी ही रहती है। तुझे तो अगर अच्छे से बाँधकर भी सुलाया जाए, तब भी तू जब तक सोते हुए भरतनाट्यम न कर ले, तुझे चैन ही नहीं आएगा। तेरी ये बुरी आदत किसी दिन तेरी जान लेकर ही रहेगी।

    शुक्र मना कि अभी तक राणा साहब ने तुझे यूँ सोते नहीं देखा, वो देर से उठते हैं, बस इसलिए अभी तक बची हुई है तू, क्योंकि जिस दिन उन्होंने तुझे ऐसे उनके करीब, उनके ऊपर हाथ पैर चढ़ाकर सोते देखा, वो तुझे इस बेड से क्या, इस रूम से बाहर निकालकर फेंक देंगे।"

    वो बुदबुदाई, "अभी तो उन्होंने तेरी बुरी आदत का असली नमूना देखा ही नहीं है, इसलिए तुझे यहाँ अपने साथ सोने देते हैं। जिस दिन उन्हें पता चला कि तू नींद में उन्हें ही बिस्तर समझकर उनके ऊपर चढ़कर सो जाती है, वो तुझे अपने इर्द-गिर्द भी भटकने नहीं देंगे। और जैसे तेरी हरकतें हैं, वो दिन ज़्यादा दूर नहीं, इसलिए अभी भी वक़्त है सुधर जा, वरना तेरा इस बेड और इस रूम से बेदखल होना तो तय ही है।"

    आकृति ने खुद को समझाया भी, और डराया भी। खुद से बातें करते हुए, अचानक ही उसका ध्यान अंगद के चेहरे के तरफ़ चला गया, और जैसे ही निगाहें उसके हैंडसम से चेहरे पर पड़ीं, एक चुंबकीय प्रभाव को महसूस करते हुए आकृति उसके तरफ़ खींचती चली गई। उसने अपनी कोहनी को बेड से टिकाया, और हथेली पर अपना चेहरा टिकाकर एकटक अंगद के चेहरे को देखने लगी।

    वो हैंडसम तो था ही, पर इस वक़्त जब उसके काले सिल्की बाल उसके माथे पर फैले हुए थे, तब वो और ज़्यादा अट्रैक्टिव लग रहा था। कमाल के फ़ेशियल कट, उसपर सुकून भरे भाव, आकृति चाहकर भी उसपर से अपनी निगाहें न हटा सकी।

    आज पहली बार वो खुद को अंगद के तरफ़ खींचते हुए महसूस कर रही थी। दिल में कुछ अजीब से एहसास मचलने लगे थे, और आकृति एकटक उसके चेहरे को निहार रही थी। आज वो अंगद के आकर्षण जाल में खुद को फँसता हुआ महसूस कर रही थी। पहली बार उसका मन कर रहा था कि वक़्त इसी पल में ठहर जाए, और वो बस एकटक उसके चेहरे को यूँ ही निहारती रहे।

    अचानक ही उसकी दिल की धड़कनें बढ़ गईं। तो उसने घबराकर अंगद के चेहरे पर से निगाहें हटाईं, और अपनी हथेली को अपने सीने पर रखकर अपने दिल की बढ़ी धड़कनों को महसूस करने लगी। उसका दिल ऐसे धड़क रहा था, जैसे वो अभी मैराथन में दौड़कर आई हो।

    आकृति की आँखें हैरानी से बड़ी-बड़ी हो गईं। कुछ देर वो अपनी धड़कनों को महसूस करती रही, फिर उसकी उलझन भरी निगाहें अंगद के तरफ़ घूम गईं, जो हर बात से बेख़बर बड़े सुकून से सो रहा था।

    To be continued....

  • 20. The Forced Vows - Chapter 20

    Words: 1980

    Estimated Reading Time: 12 min

    पिछले अध्याय में आपने देखा कि अंगद और आकृति के बीच गलतफहमी हुई, जिसे आकृति ने सुलझाने की कोशिश की। फिर दोनों के बीच सहजता आने लगी। आकृति अंगद की देखभाल करती थी और अंगद को कहीं न कहीं यह अच्छा लगने लगा था। आकृति सुनंदा जी की चिंता करती थी और नौकरी करने की सोच रही थी, जबकि अंगद की तबीयत दवाइयों से कमजोर हो रही थी। अनु और नील को लंदन वापस जाना था, और आकृति और अंगद एक-दूसरे के करीब आ रहे थे।

    अब आगे

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    अचानक ही आकृति की दिल की धड़कनें बढ़ गईं। तो उसने घबराकर अंगद के चेहरे पर से निगाहें हटाईं, और अपनी हथेली को अपने सीने पर रखकर अपने दिल की बढ़ी धड़कनों को महसूस करने लगी। उसका दिल ऐसे धड़क रहा था, जैसे वो अभी मैराथन में दौड़कर आई हो।

    आकृति की आँखें हैरानी से बड़ी-बड़ी हो गईं। कुछ देर वो अपनी धड़कनों को महसूस करती रही, फिर उसकी उलझन भरी निगाहें अंगद के तरफ़ घूम गईं, जो हर बात से बेख़बर बड़े सुकून से सो रहा था।

    आकृति अब घबराकर झटके से उठकर बैठ गई, और अपने दिल को अपनी हथेली से धीरे-धीरे सहलाते हुए उसको शांत करने की कोशिश करने लगी। पहली बार उसके साथ ऐसा हुआ था, और वो इससे थोड़ी घबरा भी गई थी। कुछ देर बाद उसकी धड़कनें सामान्य हुईं, तो उसने एक नज़र सोते हुए अंगद को देखा, और उठकर बाथरूम के तरफ़ बढ़ गई।

    नहाकर रेडी होकर वो नीचे चली गई, पर उस दौरान उसने एक बार भी अंगद के तरफ़ नहीं देखा। उसको उसके तरफ़ निगाहें घुमाने से डर लग रहा था कि कहीं फिर से उसका दिल ज़ोरों से शोर करना नहीं शुरू कर दे।

    उसने आज भी पूजा की, उसके बाद रोज़ के तरफ़ आरती की थाल लेकर कमरे के तरफ़ बढ़ गई। जैसे-जैसे आकृति के क़दम उनके कमरे के नज़दीक बढ़ रहे थे, उसकी पायलों से आती छन-छन की आवाज़ भी तेज़ होती जा रही थी, और उनकी आवाज़ अंगद के कानों में पड़कर उसको एहसास करवा रही थी आकृति के आने का।

    अंगद कुछ सेकंड नींद में करवट बदलता रहा, फिर जैसे ही आकृति गेट के सामने पहुँची, अंगद ने झटके से अपनी आँखें खोल दीं।

    यहाँ आकृति ने दरवाज़ा खोलकर अंदर कदम रखा, और वहाँ अंगद ने उठने की कोशिश की, पर एकदम से वापिस बेड पर गिर गया, ये देखकर आकृति घबरा गई और अंगद के तरफ़ दौड़ गई।

    अंगद ने फिर से उठने की कोशिश की, पर उसके हाथ जैसे बेजान से लग रहे थे, वो उनके सहारे उठ नहीं पा रहा था। वो एक बार फिर बेड पर जा गिरा।

    आकृति अब वहाँ पहुँच चुकी थी, उसने झट से आरती की थाल साइड टेबल पर रखी, इसी दौरान अंगद ने पूरी हिम्मत जुटाकर फिर से उठने की कोशिश की, पर उसके हाथ उसका वज़न नहीं सँभाल सके, और वो जैसे ही फिर से बेड पर गिरने लगा, आकृति ने तुरंत आगे बढ़कर उसको संभाल लिया।

    अंगद की निगाहें अब आकृति के चेहरे के तरफ़ घूम गईं, जिसपर दुनिया भर की फ़िक्र झलक रही थी इस वक़्त। आकृति ने उसको सहारा देकर संभालकर बिठाया, फिर चिंता भरी निगाहों से उसको देखते हुए बोली, "आप ठीक तो हैं?"

    अंगद, जो खुद अभी उलझा हुआ था कि अचानक उसे हुआ क्या, उसने जब आकृति के माथे पर चिंता की रेखाएँ, और चेहरे पर डर और घबराहट के भाव देखे, तो अपनी परेशानी को छुपाते हुए सहजता से बोला, "Hmm मैं ठीक हूँ।"

    उसने शांत लहज़े में जवाब दिया, ताकि आकृति शांत हो जाए, पर आकृति की आँखों के सामने अब वो सीन घूम रहा था, जब उसने रूम के अंदर कदम रखा था। उसने चिंता भरे स्वर में फिर से सवाल किया,

    "ये अचानक आपको क्या हो गया था? पता है, मेरी जान हलक में अटक गई थी, जब मैंने आपको गिरते देखा। आप सच में ठीक हैं न? मुझसे कुछ छुपा तो नहीं रहे? मुझे आप कुछ ठीक नहीं लग रहे, कहीं आपकी तबीयत तो ख़राब नहीं?"

    आकृति परेशान सी उससे सवाल पर सवाल किए जा रही थी, और अंगद उसकी आँखों में झलकते अपने लिए परवाह और डर को देख भी रहा था, और महसूस भी कर रहा था। उसने एक बार फिर शांत लहज़े में जवाब दिया, "तुम बेवजह इतना परेशान हो रही हो, सोने की वजह से हाथ सुन्न हो गया था, बस इसलिए उठ नहीं पाया। इतनी भी बड़ी बात नहीं है, तो तुम परेशान होना छोड़ो, और रिलैक्स हो जाओ, सब ठीक है।"

    अंगद ने पूरी कोशिश की थी आकृति को अपनी बात पर विश्वास दिलाकर उसको रिलैक्स करने की, पर आकृति के चेहरे पर अभी भी चिंता साफ़ झलक रही थी।

    अंगद ने अब उसकी हाथ थामकर उसको अपने पास बिठा लिया। आकृति अब भी परेशान घबराई निगाहों से उसको देख रही थी।

    अंगद ने उसकी हथेलियों को अपनी हथेली में थामते हुए उसको समझाते हुए बड़े प्यार से कहा, "आकृति, रिलैक्स, सब ठीक है। पिछले कुछ दिनों से मेरी तबीयत ठीक नहीं लग रही मुझे, शायद इसलिए आज ऐसा हुआ हो, पर चिंता वाली कोई बात नहीं है, कुछ देर में सब ठीक हो जाएगा।"

    आकृति, जो पहले ही परेशान थी, उसकी बात सुनकर और ज़्यादा परेशान हो गई, और घबराकर उसकी हथेली से अपनी हथेली खींच ली, फिर उसके माथे और गर्दन को छूते हुए बेचैनी से बोली,

    "आपकी तबीयत पिछले कुछ दिनों से ठीक नहीं, और आपने मुझे बताया तक नहीं? कहीं बुखार तो नहीं हो गया आपको? बदन तो ठंडा है, इंटरनल फीवर तो नहीं हो गया आपको? आप मुझे बताइये, क्या हो रहा है आपको? कमज़ोरी महसूस हो रही है? कहीं दर्द हो रहा है? मैं अभी नील भैया को बुलाकर लाती हूँ, वो डॉक्टर को बुला देंगे।"

    इतना कहकर उसने अपना हाथ पीछे किया, और जैसे ही जाने के लिए मुड़ी, अंगद ने हल्का झुककर उसकी कलाई थामकर उसको रोक लिया।

    आकृति ने मुड़कर उसको देखा, और बेचैनी से बोली, "छोड़िए न, मैं नील भैया को बुला लाऊँ, वो डॉक्टर को बुला लेंगे, डॉक्टर आकर आपको देख लेंगे, तो आप जल्दी ठीक हो जाएँगे।"

    जितनी बेचैनी आकृति को लग रही थी, अंगद उतना ही शांत नज़र आ रहा था। उसने एकदम शांत लहज़े में कहा, "बैठो।"

    आकृति अब भी परेशान सी उसको देखती रही, तो अंगद ने आँखों से उसको बैठने का इशारा कर दिया। आकृति परेशान सी उसके पास बैठ गई, तो अंगद ने आगे कहा, "Don't panic. Breath in. Breath out. Relax. Everything is fine. I am perfectly fine. So just relax."

    अंगद ने उसको शांत करवाने की पूरी कोशिश की। आकृति अब भी परेशान थी, पर अंगद के कहने पर उसने गहरी-गहरी साँसें लीं, तो वो कुछ शांत हो गई।

    अंगद ने जब उसको शांत देखा, तो उसकी हथेली को थामते हुए, उसने अब आगे कहा, "आकृति, मैं सच में बिल्कुल ठीक हूँ, कमज़ोरी होगी शायद, ठीक हो जाएगी, बेवजह खुद को परेशान करने की ज़रूरत नहीं है, और न ही ये बात बताकर बाकियों को टेंशन देने की कोई ज़रूरत है। मैं ठीक हूँ, तो तुम एकदम शांत हो जाओ। यूँ बात-बात पर पैनिक नहीं करते, छोटी सी बात है।"

    "नहीं, ये छोटी बात नहीं है। आपकी तबीयत ख़राब है, आज आप खुद से उठकर बैठ नहीं पा रहे थे, ये छोटी सी बात नहीं है मेरे लिए।"

    आकृति की आँखों में आँसू झिलमिलाने लगे थे। अंगद ने उसकी आँसुओं से भरी आँखें देखीं, तो उसका दिल तड़प उठा, उसने बिना कुछ सोचे-समझे उसे अपने सीने से लगा लिया।

    आकृति भी इस वक़्त काफ़ी भावुक और घबराई हुई थी, तो उसके सीने से लगकर रो पड़ी। उसके आँसू अंगद के सीने पर गिरने लगे, और उसकी टी-शर्ट को भिगाने लगे।

    अंगद को उसका रोना तकलीफ़ दे रहा था, पर ऐसा क्यों था, वो समझ नहीं पा रहा था। उसने खामोशी से आकृति का सर सहलाना शुरू कर दिया।

    कुछ देर वो खामोशी से उसके सर पर प्यार से हाथ फेरते हुए उसको शांत करवाने की कोशिश करता रहा, पर जब आकृति के आँसू नहीं थमे, तो उसने उसको खुद से अलग कर दिया।

    आकृति आँसुओं से भीगी पलकों को उठाकर उसको देखने लगी। अंगद ने आगे बढ़कर अपनी हथेली से उसके आँसुओं को पोंछते हुए कहना शुरू किया, "तुमने तो कहा था कि तुम ज़िंदगी भर मेरा साथ निभाओगी, जब-जब मैं कमज़ोर पड़ूँगा, तुम मेरी शक्ति बनकर मेरे साथ खड़ी रहोगी, मेरा सहारा बनकर मुझे संभालोगी, पर यहाँ तो तुम खुद इतनी कमज़ोर पड़ रही हो कि मुझे तुम्हें संभालना पड़ रहा है।

    तुम तो इतनी छोटी सी बात पर इतना डर गई, तो ज़िंदगी के इम्तिहानों को पास करने में मेरी मदद कैसे कर पाओगी? देखो खुद को, कैसे बच्चों की तरह रो रही हो, ऐसे दोगी तुम मेरा साथ? मुझे संभालने की जगह तुम खुद बिखर रही हो। ऐसे बनोगी तुम मेरी शक्ति, जब तुम खुद इतनी कमज़ोर पड़ रही हो। अभी बस थोड़ी सी तबीयत ख़राब हुई है, और तुम इतना डर गई, क्या पता आने वाली ज़िंदगी और कितनी मुश्किलों, परिस्थितियों को तुम्हारे सामने रखे, तब क्या करोगी?"

    उसकी बातें सुनकर आकृति के आँसू तो थम गए, पर उसकी सिसकियाँ शुरू हो चुकी थीं। आकृति आगे बढ़कर उसके सीने से लग गई, और सुबकते हुए बोली, "मैं डर गई थी, अगर आपको कुछ हो गया तो मेरा क्या होगा? मैं डर गई थी।"

    "कुछ नहीं हुआ है मुझे। शांत हो जाओ, सब ठीक है, कहीं नहीं जा रहा तुम्हें छोड़कर, तुम्हें डरने की बिल्कुल ज़रूरत है।"

    अंगद ने उसको समझाया, और उसकी पीठ सहलाने लगा। कुछ देर बाद आकृति कुछ शांत हुई, और उससे दूर हटते हुए बोली, "अब मैं ठीक हूँ, अब मैं कमज़ोर नहीं पड़ूँगी। मैं आपका साथ निभाऊँगी। आपकी कमज़ोरी नहीं, ताक़त बनूँगी।"

    आकृति भीगी निगाहों से उसको देखने लगी। अंगद ने उसके आँसुओं को साफ़ करके, उसको मुस्कुराने का इशारा किया, आकृति फीकी मुस्कान के साथ उसको देखते हुए बोली, "चलिए, मैं आपकी मदद कर देती हूँ।"

    उसने उसके दोनों पैर को बेड से नीचे किया, फिर व्हीलचेयर को बेड के पास ले आई। अंगद सच में बहुत कमज़ोर महसूस कर रहा था। पहले खुद से ही चेयर पर बैठ जाता था, पर आज उठ भी नहीं पा रहा था।

    आकृति ने उसकी बाँह को अपने कंधे पर रखा, फिर उसको संभालकर व्हीलचेयर पर बिठाया। आज उसको ज़्यादा प्रॉब्लम का सामना करना पड़ा था, पर उसके माथे पर शिकन की एक रेखा तक नहीं थी।

    अंगद बाथरूम चला गया, तो आकृति ने अपने हाथों को जोड़कर मन ही मन प्रार्थना की, फिर उसके कपड़े निकालने चली गई।

    कुछ देर बाद वो नीचे किचन में चली आई। उसने ख़ास अंगद के लिए पौष्टिक खाना बनाया। कुछ देर बाद सभी ब्रेकफ़ास्ट के लिए इकट्ठे थे। आकृति के चेहरे पर अजीब सी उदासी छाई हुई थी, जिसकी वजह अंगद के अलावा कोई समझ नहीं पा रहा था, तो उन्होंने अपने में ही अंदाज़ा लगा लिया कि आकृति नील और अनु के जाने के वजह से उदास है।

    खामोशी से सबने ब्रेकफ़ास्ट किया, उसके बाद अनु और नील को निकलना था। दोनों ने अंगद और ममता जी को वापिस आने का कहकर बाय किया, फिर आकृति को भी गले लगकर बाय किया। जाते-जाते नील ने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा था 'जब कभी ज़रूरत हो, तो बेझिझक अपने इस भाई को याद कर लेना। मैं कहीं भी रहूँ, जल्दी से जल्दी आपके पास पहुँच जाऊँगा।'

    उसकी बात सुनकर आकृति ने मुस्कुराकर हामी भर दी। दोनों के वहाँ से निकलने के बाद आकृति अंगद को आराम करने के लिए वापिस कमरे में ले गई।

    अंगद ने इनकार करना चाहा, पर आकृति का परेशान चेहरा देखकर वो खामोश रह गया। ममता जी को उन्होंने कह दिया था कि अंगद के सर में दर्द है, तो वो निश्चिंत हो गई। आकृति ने अंगद को लेजाकर रूम में बेड पर बिठा दिया।

    अंगद के बहुत कहने पर आकृति ने स्टडी रूम से उसका लैपटॉप लाकर उसको दे दिया। पर साथ ही ये भी कह दिया कि बस एक घंटा, उसके बाद वो आराम करेगा। अंगद ने बिना उससे बहस किए उसकी बात मान ली।

    To be continued....