Novel Cover Image

His young little bride

User Avatar

Jahnavi Sharma

Comments

25

Views

529

Ratings

46

Read Now

Description

शिवांशा ठाकुर, जिसने अपने दादा की गलती की सजा उम्र भर चुकाई। पहले अपने परिवार से जुदा होकर तो फिर उस इंसान की नाम की पत्नी बनकर, जो उसे मारना चाहता है। वेद सिंह चौहान, जिसके माता पिता को उसकी आंखों के सामने देवराज ने मार डाला। बदले की आगे में वेद ने...

Characters

Character Image

वेद सिंह चौहान

Hero

Character Image

शिवांशा ठाकुर

Heroine

Total Chapters (12)

Page 1 of 1

  • 1. His young little bride - Chapter 1

    Words: 2207

    Estimated Reading Time: 14 min

    “मिस्टर चौहान, वो अपने आखिरी वक्त में आपसे मिलना चाहता है। मुझे नहीं लगता, उसके पास ज्यादा टाइम रहा है।” कॉल पर एक आदमी ने धीमी कड़क आवाज में कहा।

    वह आदमी इस वक़्त गवर्नमेंट हॉस्पिटल में खड़ा था। वह एक जेलर था। बोलते हुए उसने अपने सामने देखा, जहां एक लगभग 70 साल का बूढ़ा आदमी अपनी आख़िरी साँसें गिन रहा था।

    “वेद... वेद को बुलाओ। वेद सिंह चौहान... उसे बुलाओ। एक बार मिलना है बस... बुला दो।” बूढ़ा आदमी लड़खड़ाते हुए, धीमी आवाज़ में बोला। उसकी सांसे उखड़ रही थी।

    वो बूढ़ा आदमी कब से वेद सिंह चौहान को बुलाने के लिए गिड़गिड़ा रहा था, तो वही कॉल पर मौजूद वेद के कानों में उसकी आवाज पड़ी, तो उसने अपनी गहरी भूरी आंखों को कसकर बंद कर लिया। वो टाई बांध रहा था। उस आवाज को सुनकर उसके हाथ रुक गए थे और नसे तनने लगी थी।

    उसकी आंखों के सामने कुछ दृश्य तैरने लगे, जो खुशनुमा तो बिल्कुल नहीं थे। उन यादों में वो बूढ़ा आदमी, थोड़ा जवान लग रहा था। वो हाथ में एक तलवार लिए खड़ा था, तो वही जमीन पर दो लाशें पड़ी थी।

    वेद का ध्यान तब टूटा, जब जेलर ने एक बार फिर से पूछा, “मिस्टर चौहान आप आ रहे है?”

    वेद ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और कॉल कट कर दिया। कॉल कट हो जाने के बाद बूढ़े आदमी ने जेलर की तरफ देखकर पूछा, “आपने उन्हें सब बता दिया है ना? क्या जवाब दिया उसने? क्या वह यहां आ रहे हैं? ”

    “मैंने उन्हें कॉल कर दिया है। अब यह उन पर डिपेंड करता है कि वे यहाँ आते हैं या नहीं।” जेलर ने जवाब दिया।

    हॉस्पिटल बेड पर मौजूद आदमी कोई और नहीं, वेद सिंह चौहान के परिवार का किसी वक़्त का ख़ास विश्वासपात्र आदमी देवराज ठाकुर था। वह इस वक़्त जेल में इसलिए था क्योंकि उसने वेद सिंह चौहान के माता-पिता की हत्या कर दी थी।

    जेलर भी हैरान था, कि जिस इंसान की खुशियां देवराज ने खत्म कर दी, आखिर वो अपने आखिर समय में उसे ही क्यों याद कर रहा है। भला वेद उस आदमी से मिलने क्यों जाएगा, जिसने उसके मां पिता को इतनी बेरहमी से मार डाला था।

    उन सब से अलग, चौहान पैलेस में वेद इस वक़्त अपने कमरे में, बिना किसी भाव के, दीवार पर लगी तस्वीरों को देख रहा था। उन तस्वीरों में वह अपने माता-पिता और भाई-बहनों के साथ था। अपने पेरेंट्स की तस्वीर देखते हुए वेद की आंखों में एक खालीपन उतर आया था।

    बीस साल पहले हुए हादसे ने उनकी ज़िंदगी को पूरी तरह बदल कर रख दिया था। एक हंसते खेलते हुए परिवार को एक झटके में अनाथ में कर दिया था, देवराज ने।

    वेद का मोबाइल एक बार फिर बजा। जेलर उसे फिर से कॉल कर रहा था। इसी के साथ वेद का ध्यान टूटा और उसके चेहरे के भाव बेहद सर्द हो गए थे।

    “देवराज ठाकुर, खुशकिस्मत हो, जो जेल में हो और बच गए। वरना तुम्हारा भी वही हश्र तुम्हारा होता, जो तुम्हारे परिवार हुआ था।” वेद ने कोल्ड टोन में कहा।

    वेद सिंह चौहान कोई आम शख्शियत नहीं था, वो उदयपुर की रॉयल फैमिली से बिलॉन्ग करता था। इतनी आसानी से वेद उन लोगों को कैसे जाने दे सकता था, जिसने उसके हंसते खेलते घर को बर्बाद कर दिया था।

    “एक आखिरी बार, तुम्हे आखिरी सांस लेते देखकर शायद मेरे दिल को सुकून मिले। आज तुम्हारे अंत के साथ तुम्हारे खानदान का नामों निशान इस दुनिया से मिट जाएगा। अगर तुमने खुद को बचाने के लिए पुलिस का सहारा ना लिया होता, मैं तुम्हें तुम्हारे गुनाहों की सजा जरूर देता।” वेद ने गहरी सांस लेकर कहा।

    वेद ने अपना मोबाइल उठाया और नीचे जाने लगा।

    उसके चेहरे का औरा इस वक्त काफी ख़तरनाक लग रहा था। दिखने में बिल्कुल फ़िट एंड फ़ाइन, लगभग छह फीट हाइट, मस्कुलर बॉडी, शार्प फ़ेशियल फ़ीचर्स, चेहरे पर हल्की दाढ़ी, हल्का गोरा रंग। वह दिखने में लगभग 30 साल के आसपास लगता था। उसकी फ़िटनेस भले ही उसकी उम्र को छुपा देती थी, लेकिन वेद उम्र में लगभग 37 साल का था। उसने ब्लैक ब्रैंडेड सूट पहना था। उसने हाथ में एंटीक एक्सपेंसिव वॉच थी।

    वेद नीचे जा रहा था, तभी उसके क़दम रुक गए। उसके कानों में उसकी छोटी बहन नव्यांशी की आवाज़ पड़ी, जो उनके घर के बड़े से हॉल में, उसके छोटे भाई वंश की पत्नी आराध्या की तरफ़ बढ़ रही थी।

    “आप बेवजह इतनी मेहनत कर रही हो, आराध्या भाभी! आप जानती है, वो अपना बर्थडे सेलिब्रेट नहीं करते है।” नव्यांशी ने सख़्त और भारी आवाज़ में कहा।

    इसी के साथ केक तैयार कर रही आराध्या के हाथ रुक गए। उसने पलट कर उसकी तरफ़ देखते हुए कहा, “नवी, तुम बात करके देखो ना भाई से, वो किसी की बात भी टाल सकते हैं, पर तुम्हारी बात कभी नहीं टालते हैं। ऐसे कब तक वो अपने छोटे भाई-बहनों की खुशी के लिए खुद को नज़रअंदाज़ करते रहेंगे?”

    आराध्या की बात सुनकर नव्यांशी ने हाँ में सिर हिलाया। उसने केक उठाया और आराध्या को अपने पीछे आने का इशारा किया। उन दोनों के क़दम बाहर की तरफ़ बढ़ रहे थे। उनके बाहर निकलते ही, दो लड़के भी उनके साथ हो गए। वो दोनों वेद के छोटे भाई वंश और अक्षत थे।

    “आज तो हम बड़े भैया को मना ही लेंगे।” उनमें से एक लड़का खुश होकर बोला। वो अक्षत था, वेद का सबसे छोटा भाई, जो 23 साल का था।

    उसके साथ चल रहे लड़के के भाव सख़्त थे। वे सब वेद से बात करने जा रहे थे। उनका मक़सद एक ही था—अपने बड़े भाई वेद सिंह चौहान को उनका बर्थडे सेलिब्रेट करने के लिए मनाना।
    अचानक उनके क़दम वहीं पर रुक गए, क्योंकि सामने वेद हाथ बाँधकर, सख़्त अंदाज़ में खड़ा था। उसे देखते ही उनके मुँह से टूटा-फूटा एक शब्द तक नहीं निकल रहा था।

    नव्यांशी ने अपने हाथ में पकड़ा केक जल्दी से पीछे कर लिया। उनके इरादों को जानते हुए भी वेद ने उन्हें नज़रअंदाज़ किया और तेज क़दमों से चलकर जाने लगा।

    उसके बाहर क़दम रखते ही, वेद के सबसे छोटे भाई अक्षत ने कहा, “पीछे से हम लोग इतनी बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन उनके सामने आते ही पता नहीं क्या हो जाता है कि एक शब्द भी नहीं निकलता।”

    “हां सोचा था, आज भाई को मना लेंगे, पर हम तो अपने दिल की बात तक नहीं रख पाए।” वंश की पत्नी आराध्या ने बुझे स्वर में कहा।

    “यह बड़े भैया इतने सख़्त बनकर क्यों रहते हैं?” अक्षत ने मुंह बनाकर कहा।

    अक्षत की बात सुनकर वंश ने सिर हिलाकर कहा, “क्योंकि एक ढाल हमेशा सख़्त होती है। वेद सिंह चौहान इस चौहान फैमिली की ढाल है, जो हमें हर ख़तरों से बचा रही है। हम भले ही उनके सामने एक शब्द ना कह पाए, पर मत भूलो हमारे बिना कुछ कहे ही वो हम सबकी बात समझ जाते है।”

    हाँ, वेद सिंह चौहान उन सब की ढाल था, जिसने अपने भाई-बहनों की खुशियों के आगे खुद की भी परवाह नहीं की। यही वजह थी कि वेद 37 साल का हो गया था, फिर भी अब तक अनमैरिड था, जबकि उसके छोटे भाई वंश की शादी हो चुकी थी, नव्यांशी अभी बिजनेस में इंटरेस्ट ले रही थी, तो उसने इस बारे में सोचा नहीं था, जबकि अक्षत की स्ट्डीज चल रही थी।

    वेद उनके लिए उनका मां और पिता दोनों था। उनकी वो इज़्ज़त भी करते थे और बहुत ज्यादा प्यार भी। वही था, जिसने अपने भाई बहनों को हर खतरे से बचाया। वरना जिस तरह से उनके पेरेंट्स की मौत हुई थी, उससे साफ था कि खतरा तो उन पर भी आया था।

    वो सब उसे रोकने की कोशिश तक नहीं कर पाए, तो वही वेद तेज कदमों से चलते हुए बाहर जा रहा था। जैसे ही वेद बाहर निकला, एक 30 साल का आदमी उसके पीछे पीछे चलने लगा।

    “हॉस्पिटल जाना है प्रथम..।” वेद ने सीधे चलते हुए कहा।

    वो प्रथम शेखावत था, वेद का ममेरा छोटा भाई और पर्सनल सिक्योरटी मैनेजर। प्रथम उसके साथ ही रहता था।

    अगले ही पल वो दोनों एक लग्ज़रियस ब्लैक मर्सिडीज़ में थे। उसके आगे-पीछे गार्ड्स की एक-एक छोटी गाड़ी भी चल रही थी।

    लगभग 1 घंटे में वेद हॉस्पिटल पहुँच चुका था। वेद सिंह चौहान कोई आम शख़्सियत नहीं था; उसके रुतबे से हर कोई वाकिफ़ था। जैसे-जैसे वेद अस्पताल के अंदर आगे बढ़ रहा था, आसपास के लोग साइड हटने लगे। वेद सीधा देवराज ठाकुर के कमरे में पहुँचा और सबको इशारे से बाहर जाने को कहा। हां, बस प्रथम उसके साथ था।

    देवराज ने वेद की तरफ़ देखा और अपने हाथ जोड़ने की कोशिश करने लगा, तभी वेद ने उसे ठंडी आवाज़ में कहा, “अब माफ़ी माँगने या हाथ जोड़ने की कोई ज़रूरत नहीं है। कुछ गुनाहों की कोई सज़ा नहीं होती है।”

    “मैं मजबूर था।” देवराज ठाकुर ने धीमी आवाज़ में कहा। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

    वेद ने उसकी बात पर सिर हिलाकर, अपनी इंटेंस आवाज़ में कहा, “तुम मजबूर नहीं, धोखेबाज थे। तुम्हारे धोखे की सजा तुम्हारी फैमिली ने चुकाई। तुम अपने परिवार के आखिरी इंसान रहे हो, और आज तुम्हारी मौत के साथ मेरे मां पापा की आत्मा को सुकून मिलेगा।” वेद की नज़रें इस वक्त बेहद सर्द थी।

    “मैंने नहीं मारा।” अचानक देवराज बोला, “मैं बस कठपुतली था।”

    उसका कहा एक एक शब्द वेद के गुस्से में इजाफा कर रहा था। उसने अपनी दांत पीसते हुए कहा, “तो जिन्होंने भी तुम्हारी डोर खींची थी, मैं उन्हें भी ढूंढ लूंगा, और ट्रस्ट मी तुम्हारे परिवार की तरह उन्हें भी खत्म कर दूंगा।”

    देवराज बिल्कुल शांत था। वेद ने गहरी सांस लेकर अपने गुस्से को काबू करके पूछा, “नाम नहीं बताओगे?”

    देवराज की नज़रें नीची हो गई थीं।

    “जब कुछ बताना ही नहीं था, तो यहाँ क्यों बुलाया? तुम्हारे पास फालतू समय होगा, लेकिन वेद सिंह चौहान के वक़्त की बहुत क़ीमत है।” वेद ने सख्ती से कहा और फिर वहाँ से जाने लगा तभी देवराज ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की।

    “मुझे माफ कर दो।” देवराज ने रोते हुए, कमज़ोर शब्दों में कहा।

    वेद के क़दम वहीं पर रुक गए। वह उसकी तरफ़ पलटा और बोला, “कभी नहीं।”

    देवराज की आंखों में पछतावा जरूर था, पर साथ ही चेहरे पर एक सुकून भी। उसने आगे वेद को रोकने की कोशिश नहीं की। देवराज जैसा इंसान सिर्फ माफी मांगने के लिए वेद को नहीं बुलाने वाला था।

    जैसे ही वेद कमरे से बाहर गया, देवराज ने मन ही मन कहा, “इसे लगता है इसने मेरे पूरे खानदान को खत्म कर दिया, इसका मतलब ये आज तक उससे अनजान है। मेरे गुनाहों की सज़ा मेरे परिवार को मिली, लेकिन शुक्र है, जो वो मासूम बच गए। वेद सिंह चौहान को उनके बारे में पता नहीं है, इसका मतलब साफ है, उन्होंने अपना वादा निभाया। वह आज भी मेरे बच्चों की रक्षा कर रहे हैं।”

    देवराज अब सुकून से मर सकता था। वेद की नजरों में उसका खानदान भले ही खत्म हो गया हो लेकिन आज भी कोई जिंदा था, जिससे वह बहुत प्यार करता था और बचाना भी चाहता था। मरने से पहले देवराज यह सुनिश्चित करना चाहता था कि वेद को उनके बारे में पता है या नहीं। बस यही सोचकर उसने उसे यहां बुलाया था।
    देवराज आंखें बंद करके अपनी मौत का इंतजार करने लगा। वह जानता था कि अब उसके पास ज्यादा वक्त नहीं बचा है।

    “ईश्वर तुम्हें दुनिया की सारी खुशियां दे। और तुम पर कभी वेद सिंह चौहान की नजर ना पड़े मेरी बच्ची।” देवराज ने मन ही मन प्रार्थना की। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट थी।

    वही वेद ने जैसे ही कमरे से बाहर कदम रखा, एक कांस्टेबल उसके पास आया। उसने एक शादी का कार्ड और लेटर देते हुए कहा, “सुबह ही कोई यह शादी का कार्ड देकर गया था। उसके साथ में यह लेटर भी है।”

    “और यह तुम मुझे क्यों दे रहे हो? ” वेद में बिना किसी भाव के पूछा।

    देवराज पर नजर रखने के लिए वेद ने उस कांस्टेबल को लगा रखा था। उसे पहले ही शक था कि देवराज अकेले यह साजिश नहीं कर सकता था, पर इतने सालों में देवराज से मिलने कोई नहीं आया था।

    “क्योंकि आपका बदला अभी अधूरा है। मैंने यह लेटर पढ़ा था। जानते हैं यह किसकी शादी का कार्ड है? देवराज ठाकुर की पोती शिवांशा ठाकुर का। आपको लगता है कि आपने उसके पूरे परिवार को खत्म कर दिया जबकि अभी भी यह लड़की जिंदा है।” कांस्टेबल ने वेद को सब कुछ बताया।

    सारी बात जानकर वेद की आंखें सर्द होने लगी और वह समझ गया था कि देवराज ने उसे यहां क्यों बुलाया होगा। वेद ने कांस्टेबल को वहीं पर छोड़ा और जल्दी से वापस कमरे के अंदर गया। उसे फिर से अपने सामने देखकर देवराज के चेहरे पर घबराहट के भाव थे।

    “शिवांशा ठाकुर? यही नाम है ना उसका? डॉक्टर ने कहा कि तुम मरने वाले हो तो खुद को 24 घंटे रोक कर रखना, क्योंकि तुम्हारे मरने से पहले तुम्हारे खानदान के आखिरी अंश को भी खत्म करना बाकी है। कहा था ना, तुम्हारे घरवालों के अंतिम दर्शन तक नहीं नसीब नहीं होने दूंगा। ” वेद ने दांत पीसते हुए कहा और फिर वहां से चला गया।

    वही देवराज की आंखें डर से पथराने लगी थी। वेद को बुलाकर ये जानने की कोशिश करना कि वह शिवांशा के बारे में जानता है या नहीं, देवराज की जिंदगी की दूसरी बड़ी गलती साबित होने वाली थी।

    °°°°°°°°°°°°°°°°

  • 2. His young little bride - Chapter 2

    Words: 2229

    Estimated Reading Time: 14 min

    वेद सिंह चौहान, जो उदयपुर की रॉयल फैमिली का मुखिया था, उसे एक सुबह जेलर का कॉल आया। उसके माता-पिता का कातिल, देवराज ठाकुर, अपनी आखिरी साँसें गिन रहा था। उसने वेद को मिलने के लिए बुलाया था। वेद मिलने भी गया। अपने माता-पिता को मारने वाले शख्स के खानदान के हर व्यक्ति को उसने खत्म कर दिया था; बस बचा था देवराज। वेद उसे भी मरते हुए देखना चाहता था।

    देवराज भी कोई सीधा-सादा इंसान नहीं था। उसने वेद को इसलिए बुलाया था ताकि बातों-ही-बातों में पता कर सके कि वेद उसकी पोती के बारे में जानता है या नहीं। वेद को यही लगता था कि उसने देवराज के पूरे परिवार को खत्म कर दिया है। ये देखकर देवराज ने राहत की साँस ली; वह आसानी से मर सकता था।

    देवराज की खुशी चंद पलों की थी क्योंकि जब वेद बाहर आया, तो एक कांस्टेबल ने शादी का कार्ड दिया, जिसके साथ एक लेटर भी था। लेटर पढ़ने पर पता चला कि वह किसी और ने नहीं, बल्कि देवराज की पोती ने लिखा था। वेद वापस देवराज के पास गया और उसने उसकी पोती, शिवांशा को 24 घंटे में खत्म करने की धमकी दी।

    देवराज उसे रोकना चाहता था, पर रोक नहीं पाया। वहीं बाहर आकर, वेद ने प्रथम से सख्त आवाज़ में कहा, “वेडिंग कार्ड को अच्छे से पढ़ो और पता लगाओ कि शादी कहाँ हो रही है। यह शादी नहीं होनी चाहिए; उस घर से डोली नहीं, लड़की की अर्थी उठनी चाहिए।”

    “बिल्कुल यही होगा भाई। उन्होंने जो बुआ और फूफा जी सा के साथ किया, उसका सूद समेत बदला लेना बनता है। और जब तक वह लड़की ज़िंदा है, हमारा बदला अधूरा है।” प्रथम ने भी दाँत पीसते हुए कहा।

    सिर्फ़ प्रथम ही नहीं, पूरी चौहान फैमिली यही चाहती थी कि देवराज के परिवार के साथ यही हश्र हो। उसके माता पिता शोभा चौहान और भरत सिंह चौहान, काफ़ी नेकदिल इंसान थे; वे ऐसी मौत मरने के लायक नहीं थे।

    जब भी वेद उनके बारे में सोचता, उसका गुस्सा उसके काबू के बाहर हो जाता। वेद मन ही मन बड़बड़ाते हुए बोला, “काश उस वक़्त मैं तुम्हारे असली चेहरे को पहचान पाता! इतनी समझ होती, जो तुम जैसे घटिया इंसान को समझ पाता, तो कभी तुम्हें अपनी माँ-पापा के करीब भी नहीं जाने देता, देवराज ठाकुर।”

    वेद के क़दम अपनी गाड़ी की तरफ़ बढ़ रहे थे; उसके पीछे-पीछे प्रथम भी चल रहा था। गाड़ी में बैठने के अगले पाँच मिनट में प्रथम ने पूरा कार्ड पढ़ लिया था।

    प्रथम ने कार्ड पढ़ने के बाद वेद की तरफ़ देखकर शांत लहजे में कहा, “इस लड़की की शादी देवेश राजावत के छोटे बेटे से हो रही है। उसके दोनों बेटे दिल्ली में रहते हैं; बस शादी के लिए यहाँ आए हुए हैं।”

    “ठीक है, फिर वहीं चलते हैं। राजावत फैमिली से दुश्मनी निभाने का एक और मौक़ा मिल जाएगा।” वेद ने जवाब में कहा।

    “हाँ, वेन्यू उनके पुरानी हवेली में रखा गया है, तो जाने में भी टाइम लग जाएगा। उम्मीद है शादी होने से पहले तो हम पहुँच ही जाएँगे।” प्रथम ने जवाब दिया।

    वहीं दूसरी तरफ़, राजावत फैमिली में एक तरफ़ जहां शादी की खुशियों का माहौल चल रहा था, तो वहीं दूसरी तरफ़ एक बंद कमरे में काफ़ी गहमागहमी का माहौल था। अपने बड़े भाई, तेजेंद्र राजावत, की सारी बात मानने वाला देवेश राजावत इस वक़्त उनसे बहस कर रहा था। साथ ही कमरे में तेजेंद्र का बेटा, अंकुश, भी था।

    थोड़ी देर पहले ही अंकुश ने उन्हें देवराज के मरने की ख़बर सुनाई थी। उसे सुनने के बाद तेजेंद्र ने तेज आवाज़ में कहा, “अब हमें उसे लड़की को और झेलने की ज़रूरत नहीं है। हमारा वादा उसके दादा के ज़िंदा रहने तक ही था। गलती से भी अगर वेद सिंह चौहान को पता चल गया कि इस लड़की को हमने पनाह दे रखा है, तो वह हमसे भी अपनी दुश्मनी निकालने पर उतर आएगा। इसका बिज़नेस पर क्या असर हो सकता है, तुम समझ सकते हो।”

    देवेश इस बात से सहमत नहीं था। वो गिड़गिड़ाते हुए बोला, “किसी को पता नहीं चलेगा। वैसे भी शिवांशा हमेशा से अरमान और मनन के साथ दिल्ली में रहती आई है; सबको यही लगेगा कि वह मनन की पत्नी है। प्लीज़ ऐसा मत कीजिए भाई साहब।”

    अंकुश भी अपने पिता तेजेंद्र की बात से सहमत था। उसने कहा, “चाचू, मैं आपके इमोशन्स समझ सकता हूँ, लेकिन सच में वह लड़की यूज़लेस है। वैसे भी वेद और हमारे बीच पहले से कम राइवलरी नहीं है, और आप उसे एक और बड़ा मौक़ा देना चाहते हैं। मुझे उससे दुश्मनी निभाने में कोई डर नहीं है; मैं हर तरीके से उसे टक्कर देने के लिए तैयार हूँ, आज से नहीं, हमेशा से ही। पर यह मामला थोड़ा हटके है; बात उसके माँ-बाप के क़त्ल की है।”

    “और हाँ, हम बीच में बेवजह नहीं पिसना चाहते हैं। हम तो बस उस राज का थोड़ा-सा भागीदार थे; फिर हम क्यों सज़ा भुगतें?” तेजेंद्र ने पल्ला झाड़ते हुए कहा।

    अंकुश और तेजेंद्र शिवांशा को खत्म करने पर तुले हुए थे, लेकिन देवेश इसके सख्त ख़िलाफ़ था। उसने गिड़गिड़ाते हुए कहा, “मैंने कभी आपके किसी भी बात के लिए इंकार नहीं किया है। अपने परिवार से अलग आपके साथ रहता हूँ, पर प्लीज़, यह शादी मत रुकवाइए। इस मोमेंट पर शादी रुकने से बहुत बदनामी होगी; ऊपर से मैं मनन को क्या जवाब दूँगा?”

    “आपको मनन को एक्सप्लेन करने की ज़रूरत ही क्या है? वैसे भी वह पागल…” अंकुश गुस्से में बोल रहा था।

    उसकी बात पूरी होने से पहले ही देवेश ने उसे काटते हुए कहा, “वह पागल नहीं है; ठीक हो रहा है। हाँ, समय के साथ उसका दिमाग इतना विकसित नहीं हुआ है, लेकिन शिवांशा के साथ रहता है तो उसका गुस्सा भी काबू में रहता है। वह उसे बहुत प्यार करता है। प्लीज़, मेरे बेटे के लिए उसे जाने दीजिए; मैं उसका ध्यान रखूँगा; पहले भी उसकी ज़िम्मेदारी अरमान संभाल रहा था।”

    “तुम हमें कितने भी बहाने बनाने की कोशिश क्यों ना करो, देवेश, इस लड़की के चक्कर में हम खुद को मुसीबत में नहीं डाल सकते। अंकुश, ऐसा करो कि तुम अपने आदमियों को लेकर जाओ और शादी होने से पहले ही उस लड़की को खत्म कर दो। हम मेहमानों को कह देंगे कि लड़की शादी से पहले किसी और के साथ भाग गई; वैसे भी लोगों को आसानी से यकीन हो जाएगा कि कौन एक पागल लड़के के साथ शादी करके अपनी ज़िंदगी बर्बाद करना चाहेगी।” तेजेंद्र ने अपनी मनमानी करते हुए अंकुश को ऑर्डर दे दिए थे।

    देवेश अंकुश को रोकना चाहता था, लेकिन उसने उसे अनसुना किया और एक ईविल स्माइल के साथ कमरे से बाहर निकल गया। वह तो कब से शिवांशा को रास्ते से हटाना चाहता था, पर देवेश के चलते वह कुछ नहीं कर पा रहा था।

    जैसे ही अंकुश ने दरवाज़ा खोला, देवेश उसके पीछे आ गया; वहीं दरवाज़े के बाहर खड़े मनन ने उनकी सारी बातें सुन ली थीं। मनन लगभग 25 साल का था और उसी की शादी शिवांशा के साथ होने वाली थी। उसका दिमाग अपनी उम्र के मुताबिक़ विकसित नहीं हुआ था, लेकिन हाँ, कमरे में जो बातें चल रही थीं, वह उन्हें अच्छे से समझ सकता था।

    “व… वो… वो मेरी शिवि को मारना चाहते हैं। नहीं, मेरी शिवि को कुछ नहीं हो सकता; मनन उसे बचाएगा। गंदे लोग! मेरी शिवि को मारना चाहते हैं।” मनन ने अपना चश्मा ऊपर करते हुए नाक सिकोड़कर कहा।

    वह जल्दी से ऊपर शिवांशा के कमरे में जाने लगा। मनन को सख्त हिदायत मिली थी कि शादी से पहले वह शिवांशा से ना मिले, लेकिन जब वह उसके कमरे की तरफ़ बढ़ने लगा, तो अंकुश की पत्नी, गीतिका, बीच में आ गई।

    गीतिका ने अंकुश को देखकर हल्का हँसते हुए कहा, “लगता है आप बड़े हो रहे हो देवर जी, लेकिन थोड़ा इंतज़ार कर लीजिए; आज रात शादी के बाद वह आपकी ही होने वाली है।”

    “लेकिन मुझे मेरी शिवि से मिलना है, और आप मुझे नहीं रोक सकतीं। आप गंदी हो; सब गंदे हैं।” मनन ने बच्चों की तरह कहा।

    गीतिका मनन को रोकना चाहती थी; अगर वह उसे जाने देती, तो रिश्तेदारों के नाम पर उसी की दो बातें सुनाई जातीं। इसलिए गीतिका ने मनन का हाथ पकड़ लिया। मनन ने अपना हाथ छुड़ाने के चक्कर में गीतिका को धक्का दे दिया, जिससे उसका हाथ बरामदे की रेलिंग पर लग गया।

    गीतिका ने गुस्से में चिल्लाकर कहा, “पागल हो तुम? मैं भी तुम्हें कह रही हूँ, पागल ही हो तुम! और वह लड़की बेवकूफ़, जो तुमसे शादी कर रही है! एक बार समझ नहीं आता क्या? उस कमरे में नहीं जाना चाहिए! खैर, तुम पागल हो, लेकिन…”

    गीतिका अपने गुस्से में मनन को भला-बुरा सुना रही थी, लेकिन अचानक बोलते हुए उसके शब्द गले में अटक गए। बोलते हुए उसकी नज़र मनन के बड़े भाई, अरमान राजावत पर गई, जो उसे ख़ौफ़ से भरी निगाहों से घूर रहा था।

    “वह मैं कब से इन्हें समझाने की कोशिश कर रही हूँ कि शिवांशा के कमरे में नहीं जाना है, लेकिन देखिए ना, बच्चों की तरह जिद कर रहे हैं! फिर आप मम्मी जी को जानते हैं; वह मुझ पर गुस्सा करेगी।” गीतिका ने अपनी सफ़ाई देने की कोशिश की।

    अरमान मनन के पास आया और उसके कपड़े सही करते हुए बोला, “गो हेल विद योर फैमिली! आगे से मेरे भाई को पागल कहने की हिम्मत मत करना, वरना पता चल जाएगा कौन पागल है, कौन सही।” इतना कहकर अरमान ने मनन का हाथ पकड़ा और उसे प्यार से कहा, “मेरे कमरे में चलो, बात करते हैं।”

    “लेकिन अरमान, वह गंदे लोग… मेरी शिवि…” मनन उसे सब कुछ बताने की कोशिश कर रहा था, लेकिन अरमान गुस्से में उसकी तरफ़ देखते हुए बस सिर हिलाया, तो मनन बिल्कुल चुप हो गया।

    अरमान मनन से उम्र में लगभग चार साल बड़ा था। सिर्फ़ अरमान ही था जिससे मनन थोड़ा डरता था; दूसरी शिवांशा, जो मनन को प्यार से हैंडल कर सकती थी। प्यार तो अरमान भी बहुत करता था अपने भाई से; यही वजह थी कि अपनी फैमिली से दूर वह मनन और शिवांशा से अलग दिल्ली में अपना अलग बिज़नेस करता था। उसे राजावत फैमिली से सख्त चिढ़ थी।

    उनसे अलग अपने कमरे में आते ही अरमान ने मनन को देखकर उसकी आँखों में देखते हुए इंटेंस वॉइस में कहा, “क्या हुआ मनन? इतना एग्रेसिव क्यों हो रहे हो?” वह अच्छे से जानता था कि मनन का यह गुस्सा बेवजह नहीं है।

    “वह… वह अरमान, मैंने उनकी बातें सुनी थीं। उन्होंने कहा कि वह शिवि को मार देंगे क्योंकि उसके दादाजी की मौत हो गई है। वह मेरी शिवि को आज मारने वाले हैं; शादी नहीं होगी; शिवि की मौत होगी! बचा लो उसे।” मनन ने रोते हुए बताया।

    मनन का दिमाग बच्चों की तरह था, पर ऐसा नहीं था कि अरमान ने उस पर यकीन नहीं किया; वह अपनी फैमिली को अच्छे से जानता था।

    “तुम चिंता मत करो; आज रात शादी होगी और तुम्हारी शिवि को कुछ नहीं होगा; यह वादा है मेरा। एक प्रॉमिस तुम भी करोगे; किसी से कुछ नहीं कहोगे।” अरमान ने कहा और अपना हाथ आगे कर दिया। अगर वह मनन से यह प्रॉमिस नहीं लेता और इस बारे में उसके घरवालों को भनक भी होती, तो वे उसे भी नुकसान पहुँचाने की कोशिश करते।

    मनन ने अपना हाथ अरमान के हाथ पर रखा और कहा, “पक्का प्रॉमिस।”

    इसी के साथ अरमान के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। उसका सख्त दिखने वाला चेहरा इस हल्की-सी मुस्कान के साथ खिल उठा था।

    मनन को वहीं पर छोड़कर अरमान कमरे से बाहर निकला। वह बात करने के लिए सीधे देवेश के पास जा रहा था; तो इस बीच अंकुश शिवांशा के कमरे में पहुँचा।

    शिवांशा इस वक़्त अपने रूम में अकेली थी। मेकअप आर्टिस्ट बस उसे तैयार करके ही गई। डार्क मैरून लहंगे के साथ हैवी ज्वेलरी पहने शिवांशा इस वक्त बिल्कुल किसी राजकुमारी की तरह सजी थी। वो लगभग 21 साल की थी। गोरा रंग, खूबसूरत छोटी आँखें, उभरे हुए बराबर होंठ और उस पर उसकी मासूमियत देखते ही बनती थी।

    शिवांशा ने एक नजर खुद को आईने में देखा। उसके चेहरे पर इस शादी की कोई खुशी नहीं थी। हां, अहसानों के बोझ तले दबी शिवांशा को एक मौका मिला था, राजावत फैमिली के एहसान चुकाने का, तो वो मना नहीं कर पाई। वैसे भी उसकी जिंदगी राजावत फैमिली के बदौलत ही थी।

    अचानक कमरे में अंधेरा हो गया, तो शिवांशा ने घबराकर पीछे की तरफ़ देखा; उसे किसी के आने की आहट महसूस हुई।

    “क… कौन है? गीतिका भाभी, आप आई हैं क्या?” शिवांशा ने घबराहट के साथ पूछा।

    अचानक किसी ने उसके मुँह पर हाथ रखा। वह अंकुश था। उसने शिवांशा को शांत करने के लिए अपना एक हाथ उसके मुंह पर रखा, तो दूसरे हाथ से उसने उसे बुरी तरह दबोच कर खुद के करीब कर लिया। शिवांशा तो मानों वही जड़ हो गई हो।

    शिवांशा कुछ समझ पाती, उससे पहले वह उसे दबोचते हुए वहाँ से कमरे के दूसरे दरवाज़े से ले जाने लगा। हवेली वैसे भी पुराने जमाने के हिसाब से बनी हुई थी, जिसमें एक कमरे में एक से ज़्यादा दरवाज़े थे।

    “क्या लगा था बेबी गर्ल, बचने का मौका मिल जाएगा। शादी तो आज रात तुम्हारी नहीं होगी, लेकिन वादा करता हूँ, बिना सुहागरात मनाए नहीं मरने दूँगा।” अंकुश ने शिवांशा के कान में धीरे से कहा। यह सुनकर उसकी आँखें डर के मारे फैल गई थीं।

    °°°°°°°°°°°°°°°°

    फिलहाल के लिए इतना ही, उम्मीद है आप कहानी के साथ कनेक्ट कर पा रहे हो। बाकी मैने इसे बहुत दिल से लिखा है। पढ़कर समीक्षा जरूर कीजियेगा।

  • 3. His young little bride - Chapter 3

    Words: 2168

    Estimated Reading Time: 14 min

    देवराज ठाकुर की पोती, शिवांशा ठाकुर की शादी राजावत परिवार के सबसे छोटे बेटे, मनन के साथ हो रही थी। मनन पच्चीस साल का होकर भी अपनी उम्र के हिसाब से मैच्योर नहीं था और बच्चों जैसा व्यवहार करता था। राजावत परिवार की मजबूरी थी कि जब तक देवराज जीवित था, तब तक उन्हें शिवांशा को चौहान फैमिली से प्रोटेक्ट करना था। जैसे ही उन्हें देवराज के मिलने की खबर मिली, राजावत परिवार के मुखिया, तेजेंद्र ने यह फैसला लिया कि शिवांशा को मार दिया जाए।

    हालांकि, मनन के डैड, मिस्टर देवेश राजावत, इसके खिलाफ थे, लेकिन तेजेंद्र ने उनकी एक नहीं सुनी। उन्होंने अपने बेटे, अंकुश को शिवांशा को मारने के लिए भेज दिया था।

    कुछ ही देर में शादी की रस्में शुरू होने वाली थीं। शिवांशा अपने कमरे में तैयार हो चुकी थी। अचानक, उसके कमरे की लाइट बंद हुई। अंकुश कमरे के अंदर आया और उसने शिवांशा का मुँह दबाकर पकड़ लिया। शिवांशा दिखने में बहुत खूबसूरत थी। अंकुश जैसे शख्स को जो चाहिए था, उसका मौका उसे आसानी से मिल गया था।

    “तुम्हारा दादा मर गया है। अब तक वेद सिंह चौहान तुमसे अनजान है। पापा नहीं चाहते तुम्हारे चक्कर में हम मुसीबत में आए; वेद को सच पता चलने से पहले तुम्हारा मरना ही ठीक रहेगा। वैसे भी, उसने तुम्हें ढूँढ लिया तो वह भी तुम्हारी जान ही लेगा।” अंकुश ने शिवांशा के कान के पास आकर धीमी आवाज़ में कहा।

    देवराज के मरने की खबर सुनकर शिवांशा को झटका लगा। उसकी आँखों से आँसू बह निकले। वैसे भी, परिवार के नाम पर उसका कोई नहीं था।

    “प्ल...प्लीज़ मुझे जाने दो।” शिवांशा ने अटकती हुई आवाज़ में कहा।

    “अभी नहीं, अभी तो तुम्हें बहुत कुछ करना है। यू नो व्हाट, तुम बड़ी होकर ओर भी खूबसूरत हो गई हो बेबी गर्ल.. मुझे छोड़ कर क्यों गई? हमारी फैमिली ने तुम्हारे लिए बहुत कुछ किए है; मरने से पहले उसका एहसान नहीं चुकाओगी।” अंकुश ने शिवांशा को पकड़ा और उसे पीछे के दरवाजे से खींचते हुए ले जाने लगा।

    शादी का माहौल होने की वजह से हवेली में रौनक थी, लेकिन अंकुश ने पहले ही उस साइड की लाइट बंद करवा दी थी। उसके लिए यह सब करना कोई मुश्किल काम नहीं था। सबकी नज़रों से छुपाकर वह शिवांशा को ले जाने लगा। उसने शिवांशा को गाड़ी के अंदर धकेला और ड्राइविंग सीट पर आकर बैठ गया।

    “मैं... मैं किसी को कुछ नहीं कहूँगी। आप लोग नहीं चाहते कि मैं मनन से शादी करूँ तो मैं चली जाऊँगी, पर प्लीज़ मुझे जाने दीजिए।” शिवांशा ने रोते हुए हाथ जोड़कर कहा।

    अंकुश पर उसका कोई असर नहीं हुआ। उसे तो बस अपनी दिल की ख्वाहिश पूरी करने की लगी थी। वह ड्राइव करते हुए शिवांशा को जंगलों की तरफ़ ले जा रहा था। इस वक्त उसके चेहरे पर एक इविल स्माइल थी।

    “पता है, तुम इस तरह रोती-गिड़गिड़ाती हुई बहुत अच्छी लग रही हो। लेकिन इन सब का कोई फायदा नहीं है। आज रात तुम मुझसे नहीं बच सकती, और ना ही अपनी मौत से...” अंकुश ने सख्त आवाज़ में कहा।

    ऐसा नहीं था कि शिवांशा राजावत परिवार के मर्दों से अनजान थी, खासकर अंकुश के इरादों से। यही वजह थी कि अरमान उसे और मनन को लेकर दिल्ली गया था। इस वक्त शिवांशा बहुत लाचार महसूस कर रही थी। वो गाड़ी में बैठकर आँसू बहा रही थी।

    शिवांशा अपनी किस्मत को कोस रही थी। वह लगभग 9 साल की थी, जब पहली बार राजावत परिवार में आई थी; डरी-सहमी सी। उसे तब भी अंकुश से बहुत डर लगता था। जब भी वह अकेली होती, अंकुश उसे अजीब तरीके से छूने की कोशिश करता; उसे बहुत बुरा लगता था, लेकिन उसकी सुनने वाला कोई नहीं था। एक बार अरमान ने अंकुश को ऐसा करते हुए देख लिया था, बस तभी किसी तरह से वो शिवांशा को उससे बचा रहा था।

    “अरमान भाई कहाँ हो आप? आप ही मुझे इससे बचा सकते हो।” शिवांशा ने सहमी हुई आवाज़ में बड़बड़ाकर कहा।

    वहीं दूसरी तरफ़, मनन के आगाह करने के बाद अरमान जल्दी से शिवांशा के कमरे की तरफ़ जाने लगा। उसे एक बार फिर अंकुश की पत्नी, गीतिका ने रोक लिया था।

    “अरमान भैया, मैं आप ही को ढूँढ रही थी।” गीतिका उसके पास आते हुए बोली, “शिवांशा तैयार हो चुकी है, और मनन भैया अभी भी ऐसे ही घूम रहे हैं। कुछ ही देर में शादी की रस्में शुरू होने वाली हैं; वह आपके अलावा किसी की नहीं सुनते। प्लीज़, आप उन्हें तैयार होने के लिए बोल दीजिए।”

    “ठीक है, बोल दूँगा, लेकिन पहले मुझे शिवांशा से बात करनी है।” अरमान ने सपाट लहजे में कहा।

    “शिवांशा आराम कर रही होगी; थोड़ी देर पहले ही मेकअप आर्टिस्ट उसे तैयार करके गई है। इतनी रस्मो में थक जाएगी।” गीतिका ने जवाब दिया।

    “मैं उससे बात करने जा रहा हूं, ना कि कोई मुश्किल काम देने, जो उसके आराम में खलल पड़ेगा। एंड प्लीज़, आगे से मेरा रास्ता मत रोकिएगा।” अरमान काफी बेरुखी से बोला और उसके रोकने के बावजूद शिवांशा के कमरे की तरफ़ बढ़ने लगा। वह मनन की बातों को ऐसे ही टाल नहीं सकता था।

    वहीं अरमान के बदतमीज़ी से बात करने पर गीतिका ने पैर पटकते हुए कहा, “ये दोनों भाई खुद को क्या समझते हैं जो मुझसे इस तरह बदतमीज़ी से बात कर रहे हैं? मैं अभी अंकुश को सब बताती हूँ। वैसे, अंकुश कहाँ है? काफी देर से दिखाई नहीं दे रहे।”

    गीतिका अंकुश को शिकायत करने के लिए चली गई, तो वहीं अरमान शिवांशा के कमरे में पहुँचा। कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद था, लेकिन अरमान दूसरे दरवाजे से अंदर चला गया। उसने लाइट ऑन करके देखा तो कमरे का सामान थोड़ा अस्त-व्यस्त था, और शिवांशा वहाँ पर नहीं थी। अरमान को समझने में देर नहीं लगी कि वहाँ क्या हुआ होगा।

    गुस्से में अरमान की मुट्ठी बंध गई थी। उसने दाँत पीसते हुए कहा, “आई स्वेयर, अंकुश राजावत, अगर तुमने इस बार शिवांशा के साथ कुछ भी गलत किया, तो मैं अपने हाथों से तुम्हारी जान ले लूँगा। घटिया आदमी!”

    अरमान तुरंत दौड़ते हुए बाहर पार्किंग एरिया में आया। उसने अपनी गाड़ी निकाली और अंकुश के पीछे जाने लगा। उसे अंकुश की लोकेशन का पता नहीं था, इसलिए उसने तुरंत अंकुश को कॉल किया।

    वहीं, अरमान का कॉल देखकर शिवांशा का ध्यान टूटा; उसके चेहरे पर उम्मीद की किरण नज़र आ रही थी, जिसे अंकुश ने भी नोटिस कर लिया था।

    अंकुश ने शिवांशा को धमकी देते हुए कहा, “अगर गलती से भी मुँह से एक शब्द भी निकाला, तो पता है ना मैं क्या कर सकता हूँ? तुम्हारी सबसे बड़ी कमज़ोरी मेरे पास है।”

    शिवांशा ने रोते हुए हाँ में सिर हिलाया। अंकुश ने इस बीच अरमान का कॉल रिसीव किया।

    “कहाँ हो तुम?” अरमान ने सीधे-सीधे पूछा।

    “सबसे पहले तमीज़ से बात करो; मैं तुमसे उम्र में बहुत बड़ा हूँ।” अंकुश गुस्से में बोला।

    “तुम जैसे लोग उम्र में कितने भी बड़े क्यों ना हो जाएँ, लेकिन हरकतें इतनी छोटी हैं कि तमीज़ से बात करने का दिल नहीं करता। मैं अभी बोल रहा हूँ, अगर शिवांशा के साथ कुछ भी ऐसा-वैसा किया, तो मैं तुम्हें ज़िंदा नहीं छोड़ूँगा।” अरमान गुस्से में चिल्लाकर बोला।

    “तो तुम्हें पता चल गया है कि वह लड़की मेरे साथ है? बहुत अच्छी बात है। मुझे इसे मारने के ऑर्डर्स मिले हैं, तो मैं उसी काम के लिए जा रहा हूँ। अगर तुम्हें इस मामले में किसी से सवाल-जवाब करने हैं, तो जाकर पापा से पूछो।” अंकुश ने बेपरवाही से जवाब दिया।

    उसे किसी का डर नहीं था। अंकुश की बेशर्मी देखकर अरमान को अफ़सोस हो रहा था। वह बोला, “अच्छा, तो तुम्हें उसे मारने के ऑर्डर्स मिले हैं? मैं अच्छे से जानता हूँ कि तुम उसे किस मक़सद से लेकर जा रहे हो। अपने गंदे हाथों से उसे छूने की कोशिश भी मत करना।”

    “तुम बहुत इंटेलिजेंट हो; इसी वजह से मुझे अच्छे लगते हो। जब तक तुम हमारे पास पहुँचोगे, तब तक वह ज़िंदा नहीं मिलेगी। फिर क्या फ़र्क पड़ता है, मरने से पहले उसने मुझे थोड़ा-बहुत खुश कर भी दिया? वैसे भी तुम्हारा वो पागल भाई कभी इसे पति का प्यार नहीं दे पाता। अब ये बेचारी भी कुछ एक्सपेक्ट करती होगी ना।” अंकुश ने सिर हिलाकर कहा।

    उसकी बात सुनकर शिवांशा और ज़ोर से रोने लगी। उसके रोने की आवाज़ अरमान के कानों में पड़ी, तो वह बोला, “मैं आ रहा हूँ शिवांशा, प्लीज़ तुम डरो मत; तुम्हें कोई कुछ नहीं कर सकता।”

    “मुझे... मुझे बहुत डर लग रहा है।” शिवांशा हिचकियाँ लेते हुए बोली।

    उसकी बात सुनकर अंकुश ने उसके गाल पर हाथ रखा। शिवांशा ने अपना मुँह दूसरी तरफ़ कर दिया, तो अंकुश ने उसका मुँह कसकर दबाते हुए कहा, “अच्छा, तो मेरी लिटिल बेबी को डर लग रहा है? उसे यह क्यों लगा कि बचपन में कोई उसे बचाकर दूर ले गया, तो मेरी लिटिल बेबी मुझे बच पाएगी? तुम उस पागल से भले ही शादी कर लो, लेकिन तुम्हें छूने का हक़ सिर्फ़ मेरा है।”

    “दूर रहो उससे।” अरमान ने तेज आवाज़ में कहा। वह जानबूझकर अंकुश को बातों में उलझाए हुए था।

    कॉल के ज़रिए वह अंकुश की लाइव लोकेशन निकालते हुए उसके पीछे जा रहा था। अंकुश आगे कुछ नहीं बोला और उसने कॉल डिस्कनेक्ट कर दी।

    वहीं, अंकुश शिवांशा को लेकर जंगल में पहुँच गया था। वहाँ पहुँचते ही उसने गाड़ी को ब्रेक लगाया। अंकुश शिवांशा को बहुत ही बुरी नज़रों से देख रहा था। उसकी नजरें ही शिवांशा को असहज करवाने के लिए काफी थी। उसने खुद को ढकते हुए अपने दोनों हाथ आगे रख लिए थे।

    “इन सब का कोई फ़ायदा नहीं है, लिटिल बेबी। बचपन में तुम कितनी अच्छी थीं; हर बात मान लेती थीं। चलो, अभी भी मेरी लिटिल बेबी बन जाओ; आओ मेरी गोद में आकर बैठो, जैसे बचपन में बैठती थीं।” अंकुश ने तिरछा मुस्कुराते हुए कहा।

    उसकी हर एक बात शिवांशा के दिमाग में बुरी यादें ताज़ा कर रही थीं। अंकुश बचपन में जानबूझकर उसे गोद में बिठाया करता था; उसके साथ गलत हरकत करने की कोशिश करता था। जब भी वह अंकुश को देखती तो डरकर छुप जाती थी, लेकिन जब अंकुश उसे ढूँढ लेता, तो वह कुछ मिनट उसकी ज़िन्दगी के सबसे बुरे मिनट होते थे। सपनों में शिवांशा आज भी उसे देखकर डर जाती थी।

    “अरमान और मनन के साथ रहते हुए बिलकुल उन्हीं की तरह ज़िद्दी हो गई हो; ऐसे नहीं मानोगी।” अंकुश ने हल्के गुस्से में कहा और फिर गाड़ी का दरवाज़ा खोलकर बाहर आ गया।

    उसके बाद अंकुश ने शिवांशा की तरफ़ का दरवाज़ा खोला और फिर उसे खींचते हुए बाहर निकाला। वह उसे पीछे की सीट पर धकेल रहा था; उससे पहले ही शिवांशा ने थोड़ी हिम्मत दिखाई और वह उसे धकेलकर भागने लगी। उसका लहँगा काफी भारी था; शिवांशा को भागने में दिक्कत हो रही थी, और वह थोड़े ही दूर जाने पर नीचे गिर गई। अंकुश तब तक उसके पास पहुँच गया था; अगले ही पल वह उसके ऊपर था।

    “प्लीज़, प्लीज़ मुझे जाने दो; प्लीज़, हाथ जोड़ती हूँ मैं तुम्हारे आगे।” शिवांशा काँपती हुई आवाज़ में बोली।

    “अब तुम मेरी मुश्किलें बढ़ा रही हो। तुम अच्छे से जानती हो ना कि जब मुझे गुस्सा आता है तो क्या होता है? मार खानी है तुम्हें बचपन की तरह?” अंकुश उसे घूरते हुए बोला।

    शिवांशा बिलकुल चुप हो गई थी। अंकुश के हाथ उसकी पीठ पर जा रहे थे। उसने शिवांशा के सिर पर लगा हुआ दुपट्टा निकालकर फेंका और फिर उसकी ब्लाउज़ के बटन खोलने लगा।

    “हाँ, बिलकुल ऐसे ही शांत रहना है, लिटिल बेबी।” अंकुश बोला और फिर अपने होठों को शिवांशा की गर्दन पर लगा दिया।

    शिवांशा को घबराहट महसूस हो रही थी। वह अपने हाथ-पैर मारकर उसे दूर करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन अंकुश इतना भारी-भरकम और मज़बूत आदमी था, और शिवांशा नाज़ुक-सी दुबली-पतली लड़की। अंकुश अपनी हवस में इतना पागल हो चुका था कि उसे यह तक ख़्याल नहीं था कि वह जंगल के बीच में शिवांशा के साथ बदसलूकी कर रहा था।

    इस बीच एक गाड़ी की तेज आवाज सुनाई दी। उसकी फ़्लैशलाइट से शिवांशा के अंदर कौन-सी हिम्मत आई कि उसने अंकुश को एक झटके में खुद से दूर कर दिया। वह दौड़ते हुए गाड़ी की तरफ़ भाग रही थी। वह जानती थी कि गाड़ी के आगे आने से उसका एक्सीडेंट भी हो सकता है या उसकी जान जा सकती है, पर अंकुश जैसे घटिया आदमी के हाथों गन्दा होने से अच्छा था कि वह अपनी जान दे दे।

    अंकुश भी उसके पीछे भाग रहा था। वह पीछे से चिल्लाकर बोला, “आज तुम्हें मुझसे कोई नहीं बचा पाएगा, खुद तुम्हारी मौत भी नहीं। जितना भागना है भाग लो; तुम्हें क्या लगता है इस शहर में किसी की इतनी औक़ात है जो अंकुश राजावत के सामने अपना मुँह खोल सके?”

    शिवांशा ने पीछे पलटकर भी नहीं देखा। अचानक सामने आ रही गाड़ी ने ब्रेक लगाया। शिवांशा को कुछ समझ नहीं आ रहा था। गाड़ी में से बाहर निकले शख्स के पास वह सीधे चिपक गई थी। आखिर इस घने सुनसान जंगल में कोई तो उसकी मदद करने के लिए वहाँ पर आया था।

    °°°°°°°°°°°°°°°°

    क्या लगता है कौन आया होगा? अरमान पहुँचा होगा या फिर कोई और? फिलहाल के लिए इतना ही; अगले चैप्टर पर मिलते हैं।

  • 4. His young little bride - Chapter 4

    Words: 2345

    Estimated Reading Time: 15 min

    अंकुश शिवांशा को किडनैप करके जंगल में ले गया था। तेजेंद्र ने उसे शिवांशा को मारने के लिए कहा था, लेकिन अंकुश के इरादे कुछ और थे। हमेशा से ही उसकी नियत शिवांशा को लेकर बुरी थी। जब वह छोटी थी और उनके घर आई थी, तब भी अंकुश को मौका मिलता, वह उसे गलत तरीके से छूने की कोशिश करता। आज तो अंकुश को खुला मौका मिल गया था, जब वह शिवांशा के साथ कुछ भी कर सकता था।

    अंकुश शिवांशा के साथ जबरदस्ती कर रहा था। अचानक वहाँ पर एक गाड़ी आई, जिसे देखकर शिवांशा मदद के लिए उसकी ओर भागने लगी। उसमें से एक शख्स निकला, जिसका चेहरा देखे बिना ही शिवांशा जाकर उसके गले लग गई थी।

    शिवांशा बुरी तरह रो रही थी। उसने सुबकते हुए कहा, “प्लीज... प्लीज मुझे बचा लो।”

    इस वक्त शिवांशा जिसके गले लगी हुई थी, वह कोई और नहीं, वेद था, जो उसे मारने के लिए आ रहा था। वेद के बाद गाड़ी से प्रथम बाहर निकला, जो शिवांशा को वेद के इस तरह गले लगे हुए देखकर हैरान था। वेद अलग टाइप का इंसान था; वह अपने फैमिली मेंबर्स तक को जल्दी से हग नहीं करता था और ना ही किसी को उसके इतने करीब आने की इजाजत तक थी, लेकिन शिवांशा वह पहली लड़की होगी, जो वेद के सीने से लगी हुई थी।

    उसकी इस हरकत पर वेद ने सर्द निगाहों से उसकी तरफ देखा और एक झटके में उसे खुद से अलग कर दिया था।

    इस बीच अंकुश भी वहाँ पर पहुँच गया था। अपने सामने वेद को देखकर अंकुश बुरी तरह हड़बड़ा गया था। ऊपर से शिवांशा अभी भी उसके पास खड़ी हुई थी।

    अंकुश इस बात से अनजान था कि वेद शिवांशा के बारे में जान चुका है। वह शिवांशा की तरफ देखकर तेज आवाज में बोला, “तुम वहाँ खड़ी क्या कर रही हो? जल्दी इधर आओ। वहाँ घर पर शादी के लिए सब तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं।”

    वेद का अचानक इस तरह जंगल में मिलना अंकुश को पूरी तरह इत्तेफाक लग रहा था। वहीं उसकी बातों से वेद समझ गया था कि शिवांशा ही देवराज ठाकुर की पोती है।

    वह भी शिवांशा को मारने के मकसद से आया था, लेकिन किस्मत ने ऐसा खेल खेला था कि वह इस वक्त उसके रक्षक के तौर पर वहाँ खड़ा था।

    वेद ने एक नज़र अंकुश को देखने के बाद शिवांशा की तरफ देखा। उसकी हालत ठीक नहीं लग रही थी; उसके हाथों पर खरोच के निशान थे और कपड़े और गहने अस्त-व्यस्त हो रखे थे। वह रो रही थी; उसे देखकर कोई भी कह सकता था कि इस वक्त वह बहुत ज़्यादा डरी हुई है।

    अंकुश के बुलाने के बाद भी शिवांशा ने कोई रिस्पांस नहीं दिया, तो वह उसके पास बढ़ते हुए बोला, “यह आजकल की लड़कियाँ भी ना, बहुत अजीब होती हैं। वहाँ घर पर सब शादी के लिए इंतज़ार कर रहे हैं, लेकिन इन्हें घूमना होता है।”

    “अच्छा? लेकिन इसे देखकर कहीं से नहीं लग रहा कि यह कही घूमकर आ रही है। वह तो काफ़ी डरी हुई लग रही है और रो भी रही है।” प्रथम ने उसे घूरते हुए कहा।

    अंकुश ने उसकी बात का जवाब देते हुए पूरे एटीट्यूड से कहा, “और तुम्हें हमारे घर के मामलों में बीच में बोलने का हक किसने दिया? बी इन योर लिमिट्स... कम शिवांशा, मनन वेट कर रहा होगा।” अपनी बात खत्म करके अंकुश शिवांशा का हाथ पकड़कर उसे वहाँ से लेकर जा ही रहा था कि तभी बीच में वेद आ गया।

    वेद की इस हरकत पर अंकुश ने गुस्से में चिल्लाकर कहा, “वेद सिंह चौहान, नाम का ही सही, लेकिन हमारे बीच एक रिश्ता है, उसकी मर्यादा को पार मत करो। मैं बर्दाश्त नहीं करूँगा जब कोई हमारे घर की इज़्ज़त के मामले में बीच में आएगा।”

    “ओह, रियली?” वेद ने भौंहें उठाकर कहा, “घर की इज़्ज़त? तो यह लड़की तुम्हारे घर की इज़्ज़त है, जिसकी तुम इज़्ज़त लूटने की कोशिश कर रहे थे? आयरनी देख रहे हो प्रथम।”

    वेद के चेहरे पर सार्कैस्टिक स्माइल थी। उसके शब्द सुनकर अंकुश के चेहरे का रंग उड़ गया था। वह कुछ कह पाता उससे पहले वेद ने आगे सख्त आवाज में कहा, “यह बड़ी-बड़ी बातें तुम उन लोगों के सामने करना जो तुम्हें ठीक से नहीं जानते हैं, अंकुश राजावत।”

    “तुम जानते भी नहीं हो यह लड़की कौन है, जिसे तुम बचाने की कोशिश कर रहे हो। अगर तुम्हें इसका सच पता चला, तो तुम खुद अपने हाथों से इसकी जान लोगे।” अंकुश भड़कते हुए बोला। वह खुद को सही साबित करने में इतना पागल हो गया था कि वेद के सामने शिवांशा का सच तक बताने को तैयार हो गया था।

    शिवांशा वहाँ डरी हुई हालत में खड़ी थी। वह नहीं जानती थी कि वेद कौन है और अचानक वहाँ क्यों आया है। बस उसे इतना पता था कि वह जो भी था, उसके लिए किसी फ़रिश्ते से कम नहीं था, जिसने आज उसे अंकुश जैसे शैतान से बचाया था। वहीं अंकुश की बातों का मतलब शिवांशा को समझ नहीं आया। वह बस चुपचाप खड़ी थी।

    अंकुश अपने मुँह से शिवांशा का राज बताने वाला था कि तभी वेद ने अपनी गहरी आवाज में कहा, “मैं अच्छे से जानता हूँ कि यह कौन है और मैं यहाँ इसे बचाने के लिए नहीं आया हूँ। मारूँगा तो मैं भी इसे, लेकिन हाँ, तुम्हारी तरह इज़्ज़त का नाम लेकर किसी के साथ रेप करने की कोशिश तो बिल्कुल नहीं करूँगा।”

    “यह... यह देवराज ठाकुर की पोती है, तुम्हारी दुश्मन। भूल गए तुम? इसके दादा ने तुम्हारे माँ-बाप को बेरहमी से मारा था और तुम्हारी जान भी लगभग लेने ही वाले थे।” अंकुश अपनी बातों से वेद को उकसाने की कोशिश कर रहा था ताकि उसका ध्यान उससे हटकर शिवांशा की तरफ चल जाए।

    अंकुश के मुँह से वह सब सुनने के बाद शिवांशा को पता चला कि वेद कौन था। इसी के साथ उसे यह भी समझ में आ गया था कि एक मुसीबत से निकलकर वह दूसरी मुसीबत में फँस चुकी थी।

    अंकुश की बातें सुनकर वेद का पारा हाई होने लगा था। उसने मुट्ठी कसते हुए कहा, “अगर तुम नहीं चाहते कि तुम्हें प्रथम तुम्हारे घर पर फेंक कर आए, तो अपने आप अपने घर चले जाओ।”

    अंकुश की भी मजबूरी थी कि वह बिना शिवांशा के वहाँ से नहीं जा सकता था। तेजेंद्र ने उसे शिवांशा को मारने के लिए कहा था। ऊपर से उसकी एक बेवकूफी की वजह से शिवांशा आज ज़िंदा थी और वेद को भी इस बारे में पता चल चुका था कि उनकी फैमिली ने ही शिवांशा को पनाह दे रखी थी। इन सब के अलावा अरमान भी उसे ढूँढ रहा था।

    अंकुश ने गहरी साँस लेकर छोड़ी और कहा, “ठीक है, मैं यहाँ बिना किसी तमाशे के चला जाऊँगा, लेकिन मुझे शिवांशा अपने साथ चाहिए। तुम उसे मार नहीं सकते हो।”

    “अच्छा। मुझे नहीं पता था कि तुमने मेरे असिस्टेंट का काम करना शुरू कर दिया है, जो यह बताता है मुझे कब क्या करना है। मैंने कहा ना, सस्ते में जाने दे रहा हूँ, तो निकाल लो, वरना महँगा पड़ेगा।” वेद ने अपने कदम अंकुश की ओर बढ़ाते हुए कहा।

    वेद की निगाहें इस वक्त बेहद सर्द थीं। उसने प्रतीक को इशारा किया तो प्रतीक ने अपने वेस्टबैंड से गन निकाल सीधे अंकुश की तरफ प्वाइंट कर दी थी। शिवांशा पहले से घबराई हुई थी, ऊपर से गन देखकर वो ओर डर गई।

    प्रतीत अंकुश को नुकसान पहुँचाने के इरादे से उसके करीब बढ़ रहा था। अंकुश ने एक नज़र शिवांशा की तरफ देखा और फिर बिना कुछ बोले वहाँ से चला गया।

    अंकुश अपनी गाड़ी में आकर बैठा और उसने इस वक्त अरमान को कॉल किया।

    “अरमान, बहुत बड़ी गलती हो गई है। तुम हमारी फैमिली के बारे में तो जानते ही हो। वेद सिंह चौहान को पता चल गया है कि शिवांशा कौन है और वह उसे लेकर चला गया।” अंकुश ने एक साँस में उसे सब कुछ बता दिया था। वह जानता था कि इस वक्त अरमान ही था, जो बिना सवाल किए उसकी मदद कर सकता था क्योंकि उसे शिवांशा की जान बचानी थी।

    “बेवकूफ़ समझते हो तुम मुझे? तुमने उसे मुसीबत में डाल दिया और अब जब घर वाले तुमसे सवाल करेंगे, तो मदद के लिए मुझे कॉल कर रहे हो। अगर तुम्हारी वजह से शिवांशा को कुछ भी हुआ, तो आई स्वर अंकुश, तुम्हारे कारनामे मैंने रिकॉर्ड कर रखे हैं और वह मैं पूरी फैमिली को सुना दूँगा।” अरमान ने गुस्से में कहा।

    “तुम्हें जो करना है कर लो, लेकिन हमारे पास इतना टाइम नहीं है। इससे पहले कि वह वेद उसकी जान ले, हमें शिवांशा को बचाना होगा।” अंकुश ने फ़ीकी आवाज़ में कहा।

    अरमान ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और कॉल काट दिया। इस वक्त अरमान की गाड़ी सीधे वेद सिंह चौहान के घर की तरफ़ बढ़ रही थी।

    रात के लगभग दस बजने को आए थे जब शिवांशा, वेद और प्रथम जंगल में खड़े हुए थे। वेद ने एक नज़र शिवांशा की तरफ़ देखा। वह उम्र में काफ़ी छोटी नज़र आ रही थी। शादी के जोड़े में सजी हुई, डरी-सहमी सी वहाँ खड़ी थी।

    “अपना हुलिया सही करो।” वेद ने उसे देखकर तेज आवाज़ में कहा।

    उसकी आवाज़ से शिवांशा डर से हड़बड़ा गई थी। वह उचकते हुए बोली, “क... क्या? क्या?”

    “सुनाई नहीं देता? अपने कपड़े सही करो।” वेद ने फिर कहा।

    शिवांशा ने उसके कहने पर खुद की तरफ़ ध्यान दिया। उसका एक दुपट्टा तो जंगल में ही गिर गया था, जबकि दूसरा दुपट्टा बुरी तरह उलझा हुआ था; उसके ब्लाउज़ की स्लीव एक कंधे से उतरकर नीचे झूल रही थी और ज्वेलरी भी इधर-उधर हो रही थी।

    शिवांशा ने जल्दी-जल्दी सब कुछ ठीक करना शुरू कर दिया था। लगभग 5 मिनट में वह अपने कपड़ों की मिट्टी झाड़कर सही कर चुकी थी।

    “गाड़ी के अंदर बैठो।” वेद ने आगे कहा।

    शिवांशा चुपचाप उसकी सारी बात मान रही थी। उसकी तो इतनी हिम्मत तक नहीं पड़ रही थी कि वह वेद की तरफ़ ठीक से देख भी सके। शिवांशा गाड़ी की बैक सीट पर जाकर बैठ गई थी।

    प्रथम गाड़ी ड्राइव कर रहा था, जबकि वेद शिवांशा के साथ पीछे की सीट पर आ गया था। उसने गाड़ी का पार्टीशन लगाया और शिवांशा की तरफ़ एक नज़र देखा।

    “कितने साल की हो तुम?” वेद ने बिना किसी भाव के पूछा।

    “आज मेरा बर्थडे है। मैं 21 साल की हुई हूँ।” शिवांशा ने हिचकिचाते हुए बिल्कुल धीमी आवाज़ में कहा।

    वेद का भी बर्थडे आज ही के दिन था। यह दिन उसके लिए कोई ख़ास मायने नहीं रखता था। वेद के हिसाब से जब उसे पैदा करने वाले माँ-बाप इस दुनिया में नहीं रहे, तो वह उसे क्यों सेलिब्रेट करे? बस आज के दिन वह शिवांशा की जान नहीं लेना चाहता था।

    वेद ने गहरी साँस ली और आगे पूछा, “और कौन-कौन है तुम्हारी फैमिली में?”

    वेद उससे नॉर्मल तरीके से बात कर रहा था और जानबूझकर उसकी फैमिली के बारे में सब जानना चाहता था। वह कोई चांस नहीं लेना चाहता था। पिछली बार भी शिवांशा बच गई थी; वह नहीं चाहता था कि अब ठाकुर फैमिली का कोई और सदस्य इस दुनिया में रहे।

    फैमिली के बारे में पूछने पर अचानक शिवांशा के चेहरे पर डर के भाव उभर आए थे। उसने वेद की तरफ़ देखा और गिड़गिड़ाते हुए कहा, “मुझे... मुझे यहाँ नहीं होना चाहिए। प्लीज़ आप मुझे वापस छोड़ दीजिए। मुझे राजावत फैमिली में जाना ही होगा।”

    “पागल हो गई हो तुम? वह आदमी तुम्हारे साथ रेप करना चाहता था; उसकी फैमिली ने तुम्हें मारने का काम दिया था और तुम वहीं पर जाना चाहती हो?” वेद ने हल्का हैरानी जताते हुए पूछा। वो जानना चाहता था कि शिवांशा की ऐसी कौन सी मजबूरी थी कि ऐसे हालातों में भी वह अभी भी राजावत फैमिली के पास जाना चाहती थी।

    “जान दे दूँगी तो चलेगा, लेकिन मुझे वहीं पर ही जाना होगा। आप समझते क्यों नहीं हैं? प्लीज़ मुझे वहाँ छोड़ दीजिए।” शिवांशा ने सिसकते हुए कहा। बोलते हुए उसने वेद के बाजू पर हल्का सा हाथ लगाया, जिस पर वह सर्द निगाहों से उसकी तरफ़ देखने लगा। शिवांशा ने तुरंत डरकर अपना हाथ साइड कर लिया था।

    “तुम कहीं नहीं जाओगी। मेरे साथ जा रही हो। मरने का इतना ही शौक है, तो अच्छी बात है। वैसे भी मुझे तुम्हारी पूजा नहीं करनी है, तुम्हारी जान ही लेनी है। बस मेरी मजबूरी यह है कि आज के दिन मैं तुम्हें नहीं मार सकता। बारह बजने में सिर्फ़ 1 घंटे का टाइम बचा है। 1 घंटे की ज़िंदगी एन्जॉय करो...” वेद ने काफ़ी बेरहमी से कहा। वह शिवांशा से कुछ छुपाने वाला नहीं था। वेद ने पहले ही क्लियर कर दिया कि वह भी उसकी जान लेगा।

    “आपके लिए 1 घंटे मायने नहीं रखते होंगे, लेकिन मेरे लिए बहुत रखते हैं। आप मुझे मारना चाहते हैं ना? बेशक मार दीजिएगा, कोई प्रॉब्लम नहीं है, लेकिन मरने से पहले मेरी एक आख़िरी इच्छा पूरी कर दीजिए। मुझे राजावत फैमिली में जाना है। मुझे वहाँ लेकर चलिए। मरना तो मुझे वैसे ही है, फिर क्या फ़र्क पड़ता है कि मुझे कोई भी मारे।” शिवांशा ने खुद को मज़बूत करके कहा।

    उसने पहली बार किसी के सामने अपने दिल की ख़्वाहिश रखी थी। ना जाने क्यों वह सच वेद को ही बता रही थी, जबकि वह जानती थी कि वेद और उसकी फैमिली के बीच क्या हुआ था।

    “अगर तुम्हारी आख़िरी इच्छा यही है, तो यही सही। यह मत समझना कि राजावत फैमिली तुम्हें मुझसे बचा पाएगी, क्योंकि इतनी उनकी औक़ात नहीं है। वह फ़िलहाल खुद को मुझसे बचा ले, वही उनके लिए काफ़ी होगा।” वेद ने ठंडे स्वर में कहा।

    शिवांशा की बात मानकर वेद ने प्रथम को मैसेज करके राजावत हाउस चलने के लिए कहा, यही उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी गलती साबित होने वाली थी।

    वहीं दूसरी तरफ़ अंकुश इस बात को अच्छे से जानता था कि शिवांशा मरने से पहले एक बार वहाँ पर ज़रूर आएगी क्योंकि उसके लिए सबसे कीमती चीज़ वहीं पर थी। यह अंकुश के पास अच्छा मौक़ा था जब वह वेद से शिवांशा को हासिल कर सकता था। इसके साथ वह उससे अपना बदला भी पूरा कर सकता था। राजावत हाउस से कुछ दूर पहले ही वह उनके लिए तैयार खड़ा था, अपना बदला लेने के लिए।

    °°°°°°°°°°°°°°°°

  • 5. His young little bride - Chapter 5

    Words: 2198

    Estimated Reading Time: 14 min

    जंगल में, अंकुश के शिवांशा के साथ कुछ बुरा करने से पहले ही वेद वहाँ पहुँच गया था। वेद के सामने, अंकुश की एक नहीं चली; उसे शिवांशा को वहीं वेद के पास छोड़कर जाना पड़ा। वेद भी शिवांशा को बचाने के इरादे से ही वहाँ आया था; वह उसे लेकर वहाँ से जाने लगा। आज वेद का जन्मदिन था, और वह आज के दिन किसी की जान नहीं लेना चाहता था। बारह बजने में थोड़ा ही समय बाकी था, तो शिवांशा ने अपनी आखिरी ख्वाहिश के तौर पर वेद को उसे राजावत हाउस ले जाने के लिए कहा।

    राजावत हाउस में ऐसा कुछ था, जिसके चलते शिवांशा वहाँ से जा नहीं सकती थी। वहीं दूसरी तरफ, अंकुश ने राजावत हाउस से थोड़ा पहले ही वेद से शिवांशा को फिर से हासिल करने का इंतज़ाम कर रखा था।

    जैसे ही वेद की गाड़ी राजावत हाउस से थोड़ा पहले पहुँची, उन्होंने देखा कि गाड़ी के सामने अचानक बहुत लोग आ गए थे। मजबूरी में, प्रतीक को ब्रेक लगाना पड़ा।

    वेद ने पार्टीशन हटाया और प्रतीक से पूछा, “क्या हुआ? गाड़ी क्यों रोकी?”

    “भाई, आगे मीडिया वाले खड़े हैं। हम यहाँ बिना गार्ड के आए थे। अचानक इनका सामने आना मुझे अजीब लग रहा है; यह लड़की भी हमारे साथ है।” प्रतीक ने चिंतित स्वर में कहा।

    वेद ने गहरी साँस ली और फिर कुछ पल रुककर कहा, “ऐसा करो, बाहर जाकर उनसे बात करके आओ। आज किसी तरह का मीडिया इंटरेक्शन नहीं होने वाला था; फिर ये लोग अचानक हमारे सामने क्यों आए हैं?”

    “मैं जाकर पता करता हूँ।” प्रतीक बोला और गाड़ी से बाहर आया।

    जैसे ही प्रतीक बाहर आया, उसने देखा कि मीडिया वालों के साथ अंकुश भी था। वह समझ गया था कि यह अंकुश की कोई चाल है। प्रतीक के बाहर आते ही, रिपोर्टर्स की भीड़ आगे बढ़ी और उसे घेर लिया।

    “मिस्टर राजपूत, हमें पता चला है कि वेद सिंह चौहान इस वक्त गाड़ी के अंदर है; उनके साथ एक लड़की है, जिन्हें उन्होंने किडनैप किया है।” एक रिपोर्टर आगे आकर बोला।

    प्रतीक ने सबकी तरफ़ देखा और जवाब में कहा, “आप जानते हैं ना कि आप किस पर क्या सवाल खड़े कर रहे हैं? वेद सिंह चौहान और किसी का किडनैप करेंगे? आर यू आउट ऑफ़ योर माइंड?”

    वेद सिंह चौहान कौन था, यह किसी से छुपा हुआ नहीं था। रिपोर्टर को तुरंत अपनी गलती का एहसास हुआ; उसने माफ़ी माँगते हुए कहा, “मेरे कहने का वह मतलब नहीं है। एक्चुअली, मुझे पता चला है कि मिस्टर चौहान किसी लड़की के साथ हैं। जहाँ तक हमें पता है, वह सिंगल हैं; फिर वह लड़की कौन है, जिसके साथ वह बिना सिक्योरिटी के इस तरह अकेले जा रहे हैं?”

    रिपोर्टर के तुरंत सवाल बदलने पर अंकुश को बहुत गुस्सा आया। उसने यही प्लान किया था कि वह सबके सामने यह साबित कर देगा कि वेद शिवांशा को किडनैप करके ले जा रहा है। ऐसे में, वेद को शिवांशा को उन्हें देना पड़ेगा, और साथ ही मीडिया के जरिए उसकी अच्छी खासी बेइज़्ज़ती भी हो जाएगी। वेद सिंह चौहान कैसा इंसान था, यह सब जानते थे; ऐसे में, किडनैपिंग जैसा इल्ज़ाम पूरी तरह बेबुनियाद लग रहा था।

    प्रतीक ने उसकी बात का जवाब देते हुए कहा, “आप क्या उनके रिश्तेदार हैं, जो वह आपको इस बात का जवाब देंगे कि उनकी गाड़ी में इस वक्त कौन है और वह उनकी क्या लगती है? मुझे समझ नहीं आता आप लोग ऐसे बीच में आकर हमारा रास्ता कैसे रोक सकते हैं। लगता है आप वेद सिंह चौहान को नहीं जानते हैं। बेहतर होगा कि आप यहाँ से चले जाएँ, वरना मुझे पुलिस को बुलाना पड़ेगा।”

    प्रतीक अपनी तरफ़ से मामला संभालने की पूरी कोशिश कर रहा था, ताकि वेद को किसी तरह की मुसीबत का सामना न करना पड़े। रिपोर्टर्स ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा और वहाँ से जाने में ही अपनी भलाई समझी। उनके पास कोई सबूत नहीं था; बस एक कॉल आया था, और उसके दम पर उन्होंने बेवजह वेद का रास्ता रोक दिया था।

    अंकुश का प्लान उल्टा पड़ता नज़र आ रहा था। वह जल्दी से आगे आया और उन सब से बोला, “मैं ही वह शख्स हूँ जिसने आपको कॉल किया था; मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ। इस वक्त वेद की गाड़ी में एक लड़की है, जो दुल्हन के वेश में है। वह उसे किडनैप करके ले जा रहा है; मैं बस उस लड़की को बचाना चाहता हूँ।”

    अंकुश की बात का जवाब देते हुए प्रतीक ने तेज आवाज़ में कहा, “अच्छा, तो रिपोर्टर्स अब पुलिस वाले हो गए हैं? अगर आपको इस तरह का कोई डाउट था, मिस्टर राजावत, तो आपको पुलिस को कॉल करना चाहिए था।”

    “वह... मैं पुलिस को कॉल नहीं कर पाया। हमने अपने घर की शादी के लिए मीडिया को बुलाया था, तो सोचा जल्दबाज़ी में जो मिले, वही सही।” अंकुश ने बहाना बनाया। वह इस मामले में किसी भी हाल में पुलिस की मदद नहीं ले सकता था।

    अगर गलती से भी तेजेंद्र को पता चलता कि अंकुश शिवांशा को मारने के बजाय उसका रेप करने की कोशिश कर रहा था, तो वह पहले उसकी जान ले लेता। ऊपर से, पुलिस के इंवॉल्वमेंट से वह मुसीबत में पड़ सकता था।

    प्रतीक को थोड़ा अफसोस हो रहा था। वो यही सोच रहा था कि थोड़ी देर पहले मौका मिलने पर उसे अंकुश को गोली मार देनी चाहिए थी, पर मीडिया के सामने वह कुछ भी ऐसा रिएक्ट नहीं कर सकता था जिसकी वजह से वह मुसीबत में आ जाए।

    प्रतीक ने जबरदस्ती मुस्कुराते हुए अंकुश से कहा, “लोग अगर आपकी थ्योरी के हिसाब से चलने लगे, तो आगे से कभी मर्डर या कोई क्राइम होगा, तो पुलिस से पहले मीडिया को बुलाया जाएगा? मिस्टर चौहान आप में से किसी भी इंसान के सवाल का जवाब देने के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं।”

    “अगर वह इतने ही सच्चे हैं, तो अपनी गाड़ी से बाहर क्यों नहीं आ जाते? मीडिया वालों को अपनी गाड़ी दिखा दें, फिर हम मान जाएँगे कि आपके मिस्टर वेद सिंह चौहान सच्चे हैं, और मैं झूठ बोल रहा हूँ।” अंकुश ने तिरछा मुस्कुराते हुए कहा।

    प्रतीक ने एक नज़र मीडिया वालों की तरफ़ देखा, जो सवालिया नज़रों से गाड़ी को घूर रहे थे। प्रतीक कॉल के ज़रिए वेद से जुड़ा हुआ था, और वह अंदर से बाहर की सारी बातें सुन रहा था।

    अंकुश जो भी कर रहा था, उसे देखकर शिवांशा के चेहरे पर घबराहट के भाव उभर आए थे। किस्मत ने उसके साथ अजीब खेल खेला था; वह वेद के साथ जाती, तब भी उसका मरना तय था, और अगर अंकुश के साथ जाती, तो वह उसे मारने से पहले अपनी हवस पूरी किए बिना बिल्कुल नहीं छोड़ता।

    प्रतीक उन्हें संभाल रहा था, तभी कुछ मीडिया वाले कैमरा लेकर गाड़ी के दरवाज़े के पास आ गए। उनमें से एक ने दरवाज़ा खटखटाते हुए कहा, “बाहर आइए, मिस्टर चौहान! क्या सच में आप किसी लड़की के साथ हैं? अगर ऐसा है, तो वह लड़की कौन है? क्या आपने इसे किडनैप किया है?”

    अंकुश ने जैसा प्लान किया था, वैसा ही हुआ था; मीडिया वाले वेद पर सवाल खड़े करने लगे थे। वहीं दूसरी तरफ़, अरमान पुलिस स्टेशन पहुँच चुका था।

    वहाँ पहुँचते ही, उसने नाइट ड्यूटी पर मौजूद सीनियर इंस्पेक्टर से कहा, “मुझे मिस्टर वेद सिंह चौहान के ख़िलाफ़ रिपोर्ट लिखानी है। उन्होंने मेरे भाई की होने वाली पत्नी को किडनैप किया है।”

    सीनियर इंस्पेक्टर ने एक नज़र उसकी तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाकर कहा, “आपका दिमाग तो ठीक है ना? आप यहाँ वेद सिंह चौहान का नाम ले रहे हैं; पूरा उदयपुर जानता है कि वह कौन है। एक बिज़नेसमैन होने के अलावा, एक इंसान के तौर पर भी सब उनके एग्ज़ैम्पल देते हैं, और आप उन पर किडनैपिंग का इल्ज़ाम लगा रहे हैं।”

    “मैं सच कह रहा हूँ। आपको मेरी बात पर यकीन नहीं है, तो आप उनके घर पर जाकर तलाशी ले सकते हैं; उन्हें कॉल कर सकते हैं। प्लीज़, उस लड़की को बचा लीजिए। वेद सिंह चौहान उसे मार देगा।” अरमान ने प्लीडिंग वॉइस में कहा।

    इंस्पेक्टर को लगा कि वह कोई ऐसा ही सिरफ़िरा आदमी है, जो वेद का दुश्मन होने की वजह से उस पर उल्टे-सीधे इल्ज़ाम लगा रहा है।

    इंस्पेक्टर उसे ऐसे ही जाने नहीं दे सकता था; उसने अरमान को बैठने का इशारा किया, लेकिन वह फिर भी खड़ा था।

    इंस्पेक्टर ने उससे पूछा, “तो आपकी होने वाली भाभी का किडनैप हुआ है, और आपको लगता है कि उसे वेद सिंह चौहान ने किडनैप किया है? उन्हें गायब हुए कितना समय हुआ है?”

    “यही कोई तीन से चार घंटे।” अरमान ने जवाब दिया।

    “24 घंटे से पहले हम रिपोर्ट नहीं लिख सकते हैं। हो सकता है कि वह आपके भाई से शादी करके खुश ना हो, इसलिए किसी और के साथ चली गई होगी। बाकी मुझे नहीं पता कि आप इस मामले में मिस्टर चौहान को क्यों घसीट रहे हैं।” इंस्पेक्टर ने बेपरवाही से जवाब दिया, जिस पर अरमान को गुस्सा आ गया।

    अरमान ने गुस्से में अपना हाथ टेबल पर पटकते हुए कहा, “कितने पैसे मिले हैं तुम्हें, इस केस को दबाने के लिए? उसके लिए काम करते हो ना तुम?”

    “देखिए, अब आप हम पर बेफ़िज़ूल के इल्ज़ाम लगा रहे हैं। क्या आपके पास कोई सबूत है कि मिस्टर चौहान ने ही आपकी भाभी को किडनैप किया है? आप ऐसे कैसे एक इज़्ज़तदार इंसान पर बिना सबूत के इल्ज़ाम लगा सकते हैं?” इंस्पेक्टर ने खड़े होकर तेज आवाज़ में कहा।

    “वही तो मैं कहना चाहता हूँ! जब तक आप जाकर पता नहीं लगाएँगे, तो सबूत कहाँ से मिलेगा? मुझे मेरे भाई का कॉल आया था; उसने खुद अपनी आँखों से मिस्टर चौहान को शिवांशा को ले जाते हुए देखा था।” अरमान ने अपने गुस्से को काबू करके कहा।

    “ऐसे में तो आपके भाई पर भी सवाल खड़े होते हैं कि उनकी आँखों के सामने उनके घर की होने वाली बहू को कोई उठाकर ले गया, और वह चुपचाप खड़े होकर देखते रहे। मुझे आपके भाई का स्टेटमेंट चाहिए। क्या मिस्टर चौहान ने उन्हें किसी तरह की चोट पहुँचाने की कोशिश की?” इंस्पेक्टर ने जवाब दिया।

    अरमान को समझ नहीं आ रहा था कि वह कैसे अपनी बात को समझाए। वह इंस्पेक्टर को पूरी बात भी नहीं बता सकता था कि अंकुश शिवांशा को मारने के लिए लेकर गया था। ऐसे में, वह एक बार के लिए खुद कंफ़्यूज़ हो गया कि वेद सिंह चौहान शिवांशा को बचाने वाला शख़्स है या फिर उसे मारने वाला।

    अरमान कंफ़्यूज़न में खड़ा हुआ था, तभी किसी ने पुलिस स्टेशन में टीवी की आवाज़ तेज की; इसी के साथ उन सब का ध्यान वहाँ चला गया।

    टीवी में वही न्यूज़ आ रही थी, जहाँ मीडिया वालों ने वेद की गाड़ी को रोका था। हेडलाइंस भी अंकुश की भाषा बोल रही थी; उन्हें तो टीआरपी से मतलब था, इसलिए वह यही दिखा रहे थे कि वेद ने किसी लड़की को किडनैप कर लिया है।

    न्यूज़ देखते ही अरमान ने इंस्पेक्टर की तरफ़ देखकर सिर हिलाकर कहा, “अब तो आपको मेरी बात पर यकीन आ गया होगा कि मैं हवा में किसी पर इल्ज़ाम नहीं लगा रहा हूँ। आप जैसे लोगों की वजह से ऐसे अमीर लोग गुनाह करके छुपे रहते हैं। क्या अभी भी आपको किसी तरह के सबूत की ज़रूरत है, इंस्पेक्टर? या मेरे साथ चलिए?”

    इंस्पेक्टर की नज़रें नीची हो गई थीं, तभी लाइव न्यूज़ में वेद शिवांशा के साथ गाड़ी से बाहर निकल कर आया। हर कोई देखकर हैरान था। वेद सिंह चौहान, जो हमेशा सब जगह अकेले दिखता था, वह आज किसी लड़की के साथ था। ऐसा नहीं था कि वेद को शादी के लिए प्रपोजल नहीं मिलते थे, या कोई लड़की उससे शादी करने के लिए तैयार नहीं थी; बस वेद को ही शादी में इंटरेस्ट नहीं था।

    एक पब्लिक फ़िगर होने की वजह से वेद के बारे में ज़्यादातर लोग जानते थे; उसे किसी लड़की के साथ देखकर वे हैरान रह गए। मीडिया वाले दौड़कर उनके आगे आ गए। शिवांशा की नज़रें झुकी हुई थीं, जबकि वेद ने मजबूरी में उसकी पीछे ऐसे हाथ रखा था, जिससे सबको वेद का हाथ शिवांशा की पीठ पर है, जबकि असल में वेद और शिवांशा के बीच एक उचित दूरी थी।

    वहीं उस जगह पर अंकुश शिवांशा को देखकर जल्दी से आगे आया और बोला, “यह वही लड़की है! देखो, मैं सच बोल रहा था; यह इसे किडनैप करके ले जा रहा है। पूछो इससे; यह लड़की कौन है और इसके साथ क्या कर रही है।”

    अंकुश खुद किसी मुसीबत में नहीं पड़ना चाहता था, इसलिए वह जानबूझकर अपना और शिवांशा का रिश्ता छुपा रहा था। वहीं उसका यह बर्ताव देखकर शिवांशा हैरान रह गई।

    मीडिया वाले वेद के सामने माइक लेकर खड़े थे; इस वक्त वे सारे एक साथ एक ही सवाल पूछ रहे थे कि आखिर शिवांशा कौन है, और वह दुल्हन के जोड़े में वेद के साथ क्या कर रही थी। क्या सच में वेद उसे किडनैप करके ले जा रहा था?

    मामला मीडिया के सामने आ गया था; ऐसे में वेद एक तरह से फँस गया था। अगर वह आज शिवांशा को जाने देता, तो वह कभी अंकुश तक नहीं पहुँच पाता, और उसका बदला अधूरा रह जाता।

    वेद ने गहरी साँस ली और सबको हाथ उठाकर शांत रहने का इशारा किया। फिर उसने एक नज़र शिवांशा की तरफ़ देखा और मीडिया वालों के सवाल का जवाब देते हुए गहरी आवाज में कहा, “यह मेरी पत्नी है, शिवांशा वेद सिंह चौहान।”

    °°°°°°°°°°°°°°°°

  • 6. His young little bride - Chapter 6

    Words: 2323

    Estimated Reading Time: 14 min

    वेद शिवांशा को अपने साथ लेकर जा रहा था। इस बीच, अंकुश मीडिया को लेकर उनके रास्ते में आ गया। अंकुश ने उन सबसे यही कहा, वेद किसी लड़की को किडनैप करके लेकर जा रहा है। मीडिया वाले इन सबकी लाइव कवरेज दिखाने लगे। वैसे भी, वेद सिंह चौहान कोई आम शख्सियत नहीं था। उससे जुड़ी हर खबर काफी चर्चा में रहती थी।

    वेद के मीडिया वालों के सामने न आने पर बात बढ़ने लगी। वेद इस तरह अपने नाम पर किसी तरह का दाग नहीं लगने दे सकता था। वो शिवांशा के साथ गाड़ी से बाहर निकला। वेद के साथ किसी लड़की को देखकर वो सब चौंक गए थे। ऊपर से, शिवांशा ने शादी का जोड़ा पहना था।

    वेद ने सबके सामने शिवांशा को अपनी पत्नी के तौर पर इंट्रोड्यूस किया, तो सब हैरानी से उसकी तरफ देखने लगे, यहाँ तक कि खुद शिवांशा भी। अंकुश को भी झटका-सा लगा। वो अच्छे से जानता था, वेद शिवांशा को मारने वाला था, फिर इस तरह सबके सामने उसे अपनी पत्नी बताकर उसी की मुश्किलें बढ़ने वाली थीं।

    वहीं, वेद का जवाब सुनकर मीडिया वाले हरकत में आ गए थे। ये उनके लिए एक बहुत बड़ी खबर साबित हो रही थी। सभी अपने कैमरे के साथ आगे आए और उनकी तस्वीरें लेने लगे। शिवांशा ने डर के मारे वेद का हाथ पकड़ लिया था। वेद चाहकर भी उसका हाथ इतने लोगों के सामने अलग नहीं कर सकता था। वहीं, मीडिया वालों के सवाल शुरू हो गए थे।

    “मिस्टर चौहान, क्या सच में ये लड़की आपकी वाइफ है? ये उम्र में आपसे काफी कम लग रही है?”

    “आपको इस तरह छुपकर शादी करने की क्या जरूरत पड़ गई, मिस्टर चौहान, जबकि आपके घर का छोटा-सा फंक्शन भी लाइमलाइट में रहता है?”

    “क्या आप इस तरह सबसे छुपकर शादी करने का कारण बता सकते हैं, मिस्टर चौहान? कहीं ऐसा इस वजह से तो नहीं, क्योंकि आपकी वाइफ उम्र में आपसे काफी कम नजर आ रही है?” बोलते हुए उस रिपोर्टर ने अपना माइक शिवांशा की तरफ करके आगे पूछा, “मिसेज चौहान, क्या आप बता सकती हैं, आप कितने साल की हैं?”

    शिवांशा ने इस तरह की सिचुएशन का सामना पहली बार किया था। वो तो हमेशा भीड़ से अलग अपने कामों में लगी रहती थी। वो डर के मारे खुद में सिमटने लगी। ऊपर से, वेद ने सबके सामने अचानक ही उसे अपनी पत्नी के तौर पर इंट्रोड्यूस कर दिया।

    शिवांशा ने एक नजर वेद की तरफ देखा। उसकी आँखों में कई सवाल थे। वेद जब उसे मारना चाहता था, तो फिर उसने शिवांशा को सबके सामने अपनी पत्नी क्यों बताया?

    “क्या हुआ, मिसेज चौहान, आपके चेहरे पर ये डर और घबराहट क्यों? कहीं सच में मिस्टर चौहान ने आपको किडनैप तो नहीं किया, जिसकी वजह से आप सबके सामने कुछ भी कहने से घबरा रही हैं? डरिए मत, हम लाइव हैं। आप अपने दिल की बात कह सकती हैं।” रिपोर्टर ने मामले को भुनाते हुए पूछा।

    अंकुश दूर खड़ा सब कुछ देख रहा था। वेद को इस तरह फंसते हुए देखकर उसे अपनी चाल कामयाब होती नजर आ रही थी।

    शिवांशा ने ना में सिर हिलाया और हड़बड़ाकर बोली, “न... न... नहीं।”

    वेद ने मामले को संभालते हुए तेज और सख्त आवाज में कहा, “हो गया आपका? मैंने आपके सवाल का जवाब दे दिया है। आगे मैं आपको कुछ भी बताना जरूरी नहीं समझता।”

    वेद ने शिवांशा के लिए गाड़ी का दरवाजा खोला और उसे गाड़ी में बैठाकर वहाँ से निकल गया। उसके जाने के बाद अंकुश पीछे से जोर से चिल्लाते हुए बोला, “ये झूठ बोल रहा है। ये लड़की कोई इसकी पत्नी नहीं। अरे, इसकी शादी तो राजावत फैमिली के बेटे से होने वाली थी। तुम लोग अंधे हो क्या, जो तुम लोगों को दिखाई नहीं देता, इस लड़की की माँग में न तो सिंदूर था और न ही गले में मंगलसूत्र। ये कैसी सुहागन हुई? उसने तुम्हें बेवकूफ बनाया और तुम्हारी आँखों के सामने एक लड़की को लेकर जा रहा है, और तुम लोग ऐसे ही खड़े होकर देख रहे हो।”

    अंकुश के तमाशे को देखकर एक रिपोर्टर ने सिर हिलाया और कहा, “सर, प्लीज झूठी कहानी बनाना बंद कीजिए। आपकी वजह से हम मुसीबत में आ सकते हैं। पहले भी आपने हमारा टाइम खराब कर दिया। शुक्र मनाइए कि वह हमारे खिलाफ कोई एक्शन नहीं ले रहे हैं, वरना आपकी वजह से हमने उनके ऊपर काफी सारे इल्ज़ाम लगाए हैं।”

    उन सब ने अंकुश की बात को पूरी तरह अनसुना कर दिया था। उनमें से एक रिपोर्टर बोला, “हमें यहाँ नहीं, वेद सिंह चौहान के घर के बाहर होना चाहिए। वह शादी करके आए हैं, इससे बड़ी खबर और क्या हो सकती है?”

    “इन दोनों की जोड़ी अच्छी लग रही थी, लेकिन लड़की मुझे उम्र में काफी कम लगी। जरूर उनकी लव मैरिज हुई होगी।” दूसरी रिपोर्टर ने जवाब दिया।

    उनकी बात पकड़ते हुए अंकुश ने फिर से कहा, “वह लड़की उस उम्र में छोटी लग रही है, क्योंकि वह सिर्फ 21 साल की है। उन दोनों का कोई मेल नहीं है। मैंने कहा ना, उसने आप लोगों को बेवकूफ बनाया है। कहाँ वेद सिंह चौहान 37 साल का, और कहाँ वह लड़की सिर्फ 21 साल की। वह अपने से इतनी छोटी उम्र की लड़की से शादी कभी नहीं करेगा।”

    रिपोर्टर्स ने अंकुश की बातों का कोई जवाब नहीं दिया और वहाँ से निकलकर जाने लगे। अंकुश वहाँ पर पैर पटकता रह गया। वहीं, पुलिस स्टेशन में जब अरमान ने न्यूज़ में देखा कि वेद ने सबके सामने शिवांशा को अपनी पत्नी बताया है, तो वह भी हैरान रह गया।

    पूरी न्यूज़ सुनने के बाद इंस्पेक्टर ने अंकुश से कहा, “उन रिपोर्टर्स की तरह आपको भी जवाब मिल गया होगा। वह मिस्टर चौहान की पत्नी है। प्लीज, चले जाइए। मैं कोई झूठी रिपोर्ट नहीं लिख सकता हूँ।”

    “वह झूठ बोल रहा है। उस लड़की की शादी मेरे छोटे भाई से होने वाली थी। मैंने आपको बताया तो था, फिर वह उसकी पत्नी कैसे हो सकती है?” अरमान ने हैरानी से सिर हिलाकर कहा।

    “तो आपको क्या लगता है, मिस्टर चौहान जैसे इज्जतदार इंसान इतने लोगों के सामने झूठ बोलेंगे? यह एक लाइव कवरेज थी। वह उन्हें भी दिख रहा था। ऐसे वह खुलेआम किसी भी लड़की को अपनी पत्नी नहीं बताएँगे। मान लेता हूं, अगर आपकी बात सच है, तो लड़की सबके सामने अपना स्टेटमेंट रख सकती थी।” इंस्पेक्टर ने जवाब दिया।

    “आपको दिख नहीं रहा, वह कितनी घबराई हुई थी? ऐसे में वह कैसे उसके खिलाफ कुछ भी बोल सकती थी?” अरमान बोला।

    “वह घबराई हुई थी, लेकिन उस वक्त कैमरा के सामने थी। वेद सिंह चौहान कोई उसे गन पॉइंट पर लेकर नहीं खड़े थे, जो वह डर जाएगी। हाँ, उसकी घबराहट मीडिया वालों की वजह से थी। दिखने में ही सीधी-सादी नजर आ रही थी। मतलब, उसने इन सब का सामना पहले नहीं किया। प्लीज, जब आप मेरा और अपना टाइम वेस्ट मत कीजिए। जाइए यहाँ से। इस मामले में आपके पास कोई ठोस सबूत हो, तभी आएँ।” पुलिस वाले ने अरमान को बाहर का रास्ता दिखा दिया था।

    अरमान भी आगे कुछ नहीं बोला और बाहर निकल आया। बाहर आते ही उसने तुरंत अंकुश को कॉल किया।

    अंकुश ने कॉल रिसीव करते ही कहा, “अरमान, बहुत बड़ी गड़बड़ हो गई है। वेद सिंह चौहान ने न सिर्फ शिवांशा को किडनैप किया, बल्कि सबके सामने उसे अपनी पत्नी बताया है। शिवांशा बहुत बड़ी मुसीबत में है।”

    “और उसकी इस मुसीबत की वजह तुम हो। ना तुम उसे शादी से लेकर जाते, और ना ही वह वेद सिंह चौहान के चंगुल में फँसती। यहाँ पुलिस वाले तक मेरी बात सुनने के लिए तैयार नहीं हैं। रिपोर्ट तक नहीं लिख रहे।” अरमान ने लाचारी से कहा।

    उसके पुलिस स्टेशन में होने की बात सुनकर अंकुश बौखला गया था। वह गुस्से में ऊपर चिल्लाकर बोला, “और तुम वहाँ क्या कर रहे हो? तुम्हें किसने कहा पुलिस को इन सब में इंवॉल्व करने के लिए? अगर पुलिस की हेल्प लेनी होती, तो मैं तुम्हें क्यों कॉल करता? अगर घर पर किसी को गलती से भी पता चल गया, तो मुसीबत खड़ी हो सकती है। कहीं तुमने उन्हें यह तो नहीं बताया कि तुम राजावत फैमिली से बिलॉन्ग करते हो?”

    अंकुश की बात सुनकर अरमान को और गुस्सा आने लगा। वह कड़वाहट से बोला, “मुझे कोई शौक नहीं है खुद को राजावत फैमिली का मेंबर बताने का। और आप यह बहाना क्यों बना रहे हैं कि घर पर पता चला, तो मुसीबत खड़ी हो जाएगी? सीधे-सीधे कहिए न, अगर पुलिस आपसे सवाल-जवाब करती, तो आप फँस जाते। देखा जाए, तो अच्छा हुआ जो शिवांशा उसके साथ चली गई।”

    “कुछ अच्छा नहीं हुआ। वह भी उसे जान से मार डालेगा। कोई उसकी पूजा नहीं करेगा।” अंकुश ने जवाब दिया।

    “हाँ, आप सब लोगों की मेहरबानी, जो उस बेचारी बच्ची को इतना सब कुछ झेलना पड़ रहा है।” अरमान ने गुस्से में जवाब दिया और फिर कॉल कट कर दिया।

    अरमान की आँखों में मनन का चेहरा आ रहा था, जो शिवांशा से बहुत प्यार करता था। उसी ने शिवांशा को बचाने के लिए उसे भेजा था। सिर्फ मनन ही नहीं, अरमान को शिवांशा की भी फिक्र थी। वह उसे अपने बड़े भाई की तरह सम्मान देती थी।

    अरमान ने गहरी साँस लेकर कहा, “मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा। यह मेरा तुमसे वादा है, शिवांशा। चाहे इसके लिए मुझे वेद सिंह चौहान से भी क्यों न टकराना पड़े। मैं तुम्हें बचा कर लेकर आऊँगा। लेकिन इससे पहले राजावत फैमिली को मेरे सवालों के जवाब देने होंगे। आखिर वह इतने घटिया कैसे हो सकते हैं? उन्हें दूसरों की परवाह कभी नहीं थी, लेकिन कम से कम मनन का ही सोच लेते। वह उनका खून है।”

    अरमान अपनी गाड़ी के पास गया और सीधा राजावत हवेली जाने के लिए निकल गया था। वहीं, दूसरी तरफ चौहान पैलेस के अंदर सब एक साथ लिविंग रूम में बैठे थे। वेद का बर्थडे बीत चुका था। सुबह वह उससे केक नहीं कटवा पाए, ऊपर से पूरे दिन से वेद गायब था।

    अचानक नव्यांशी के मोबाइल पर कुछ फोटोज आईं, जिसे देखकर वह हैरान रह गई। उसने वंश, आराध्या और अक्षत की तरफ देखा, जो बिल्कुल नॉर्मल तरीके से बैठे हुए थे। हाँ, वह वेद को लेकर थोड़ा परेशान जरूर थे।

    नव्यांशी ने अपने मोबाइल की स्क्रीन उनकी तरफ करते हुए कहा, “मुझे नहीं पता इन फोटोज और इस खबर में कितनी सच्चाई है, लेकिन लोग कह रहे हैं कि भाई ने शादी कर ली है।”

    “क्या?” उसकी बात सुनकर वंश, आराध्या और अक्षत एक साथ बोले।

    वह तीनों जल्दी से उसके पास आए और उसका मोबाइल देखने लगे। सच में, वेद एक लड़की के साथ था, जो उम्र में उससे काफी कम भी लग रही थी। ऊपर से, वह शादी के जोड़े में थी। उसके साथ में एक वीडियो आया था, जिसमें वेद सबके सामने शिवांशा को अपनी पत्नी बता रहा था।

    “नहीं, यह नहीं हो सकता।” नव्यांशी ने सिर हिलाकर कहा, “भाई का शादी में कोई इंटरेस्ट नहीं है। अगर उन्हें शादी करनी ही होती, तो वह अपने से कम उम्र की लड़की से शादी क्यों करते, जबकि उनके सर्कल में काफी लड़कियां है, जो हर तरह से उनके लिए परफेक्ट है। वह तो भाई को पसंद तक करती है, और भाई इस बात को जानते हैं। मुझे दाल में कुछ काला लग रहा है।”

    “हाँ, यह लड़की किसी भी तरह से भाई के हिसाब से नहीं लग रही है। उन्हें कॉन्फिडेंट रखने वाले लोग पसंद हैं, जबकि इसे देखकर लग रहा है कि यह मीडिया देखकर बुरी तरह घबरा गई है।” वंश बोला। उसे भी नव्यांशी की तरह यकीन नहीं हो रहा था।

    अचानक वेद की जिंदगी में किसी नई लड़की का आना उन्हें हजम नहीं हो रहा था। वहीं, अक्षत और आराध्या ने एक-दूसरे की तरफ देखा। वह इसे काफी पॉजिटिवली ले रहे थे।

    आराध्या ने मुस्कुराकर कहा, “आप सब यह क्यों सोच रहे हैं कि यह लड़की भाई के लायक नहीं है, या फिर यह घबराई हुई लग रही है? क्या फर्क पड़ता है, इसकी उम्र जो भी है? लेकिन खुशी की बात यह है न कि पहली बार भाई ने अपने बारे में सोचा। उन्होंने शादी कर ली है।”

    “मैं भाभी की बात से सहमत हूँ।” अक्षत ने जवाब दिया, “हमें उनके वेलकम की तैयारी करनी चाहिए। मुझे ऐसे क्यों लग रहा है कि तुम दोनों को जलन हो रही है?”

    नव्यांशी ने उसे डाँटते हुए कहा, “हमें कोई जलन नहीं हो रही है। उल्टा, हम खुश हैं कि भाई आगे बढ़े हैं, लेकिन लड़की उनके मैच की होनी चाहिए न?”

    “नवी बिल्कुल ठीक कह रही है। जरूर भाई ने किसी मजबूरी में शादी की होगी। वह चेहरे से खुश नहीं लग रहे हैं।” वंश ने उसका साथ देते हुए कहा।

    अक्षत ने गहरी साँस ली और बोला, “आप दोनों क्यों डिटेक्टिव बने हुए हो? क्या आपने कभी भाई को मुस्कुराते हुए और खुश देखा है? उनके फेस के एक्सप्रेशंस हमेशा न्यूट्रल रहते हैं। हाँ, गुस्से में थोड़े और डार्क हो जाते हैं, लेकिन मैंने उन्हें रेयरली स्माइल करते हुए देखा है। दूसरी बात, भाई कोई बच्चे नहीं हैं, जो मीडिया के सामने अचानक ऐसे ही किसी लड़की को उठाकर अपनी वाइफ बता देंगे। आप सब जानते हैं, हमारी फैमिली रेप्युटेशन क्या है। हम रॉयल फैमिली से बिलॉन्ग करते हैं। ऊपर से, भाई का पॉलिटिक्स में भी अच्छा-खासा रोल रहता है। हमारी कंपनी इंडिया की टॉप कंपनी में से एक है।”

    अक्षत काफी लॉजिकली बात कर रहा था। मजबूरी में ही सही, उन लोगों को उसकी बात से सहमत होना पड़ा।

    “अगर ऐसा है, तो फिर सच में हमें उनके वेलकम की तैयारी करनी चाहिए। पहली बार भाई ने खुद को लेकर कोई बड़ा डिसीजन लिया है। हमें उनके फैसले की रिस्पेक्ट करनी चाहिए। हमने आज तक किसी फैसले पर सवाल नहीं उठाया, तो आज भी नहीं उठाएँगे।” नव्यांशी ने जवाब दिया।

    वह सब वेद और शिवांशा के वेलकम में लग गए थे। तो वहीं, दूसरी तरफ वेद इस वक्त बहुत ज्यादा गुस्से में था। उसने बीच रास्ते में प्रतीक को गाड़ी से उतारा और खुद शिवांशा को लेकर न जाने कहाँ जा रहा था। शिवांशा उसके पास पैसेंजर सीट पर बैठी हुई थी और इस वक्त वह डर से काँप रही थी।

    °°°°°°°°°°°°°°°°

  • 7. His young little bride - Chapter 7

    Words: 2557

    Estimated Reading Time: 16 min

    वेद ने सबके सामने यह ऐलान तो कर दिया था कि शिवांशा उसकी पत्नी है, लेकिन इसकी वजह से उसने अपने लिए एक मुसीबत खड़ी कर ली थी। उसे शिवांशा को जान से मारना था। अब वह चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकता था क्योंकि लोगों की नज़रों में शिवांशा उसकी पत्नी थी। ऐसे में उसे कुछ होता तो सारा शक वेद के ऊपर आता। वैसे भी जब रिपोर्टर्स ने उन्हें कवर करना शुरू किया था, तब उन्होंने वेद के ऊपर शिवांशा को किडनैप करने का इल्जाम लगाया था।

    इस वक्त वेद बहुत ज़्यादा गुस्से में था और वह शिवांशा को गाड़ी में लेकर कहीं जा रहा था। उसने प्रतीक को भी रास्ते में उतार दिया था। उसे इतने गुस्से में देखकर शिवांशा उसके पास बैठी सीट पर काँप रही थी।

    रात के लगभग 3 बजे के करीब वेद की गाड़ी एक पहाड़ी पर जाकर रुकी।

    वेद गाड़ी से बाहर निकला और तेज आवाज में बोला, “बाहर निकलो।”

    शिवांशा जल्दी से बाहर आ गई थी। इस वक्त वो एक पहाड़ी पर खड़े थे। वेद काफी गुस्से में था, जबकि शिवांशा उसके सामने नज़रें झुका कर खड़ी थी।

    वेद उस पर तेज आवाज में चिल्लाते हुए बोला, “तुम अच्छे से जानती थी ना कि वहाँ पर रिपोर्टर्स खड़े हुए हैं? वह तुम लोगों की शादी कवर करने के लिए वहाँ जा रहे थे, तभी तुमने अपनी आखिरी ख्वाहिश के तौर पर राजावत फ़ैमिली जाने की बात कही। यू नो व्हाट, गलती तुम्हारी नहीं है, मेरी है, जो यह जानते हुए भी कि तुम उन धोखेबाज़ लोगों का खून हो, फिर भी तुम पर यक़ीन किया।”

    उसकी बात सुनकर शिवांशा रोने लगी। वह वेद की तरफ़ देखकर ‘ना’ में सिर हिलाने लगी। उसने सुबकते हुए कहा, “मेरी... मेरी बात का यक़ीन कीजिए, मैंने किसी तरह का कोई जाल नहीं बिछाया। ट्रस्ट..”

    “एक बार जो गलती की थी, वह दोबारा नहीं करूँगा।” वेद ने उसकी बात बीच में काटते हुए सर्द आवाज़ में कहा।

    शिवांशा के पास अपनी सफ़ाई में कुछ नहीं था। उसने धीमी आवाज़ में कहा, “मैं आपको फँसाने की क्यों कोशिश करूँगी? मैं तो आपको जानती तक नहीं। हम पहली बार मिले हैं।”

    “हम पहली बार ज़रूर मिले हैं, लेकिन तुम अच्छे से जानती हो मैं कौन हूँ। जानती हो ना मैं कौन हूँ?” वेद ने तेज़ आवाज़ में चिल्लाकर पूछा।

    शिवांशा ने उसकी तरफ़ देखा और ‘हाँ’ में सिर हिला दिया था। वह वेद सिंह चौहान के बारे में पहले से जानती थी, हां, वो उससे मिल जरूर पहली बार रही थी। उसे वेद से नफ़रत थी क्योंकि उसकी वजह से उसे यह नियति मिली थी, जहाँ उसे इतना सब कुछ झेलना पड़ रहा था।

    वेद ने सारकास्टिकली सिर हिलाया और कहा, “चलो, कहीं तो सच बोला तुमने। अब मुझे बताओ कि मुझे राजावत फ़ैमिली क्यों लेकर जा रही थी? उन लोगों के साथ मुझे मारने का प्लान था ना तुम्हारा?”

    “नहीं, मेरा ऐसा कोई प्लान नहीं था। वह तो खुद मुझे मारना चाहते हैं।” शिवांशा ने अपनी सफ़ाई में कहा। उसने अभी भी नहीं बताया था कि वह वेद को लेकर राजावत हाउस क्यों जाना चाहती थी।

    शिवांशा को लगा कि वह बातों में वेद को टाल सकती है, लेकिन यह इतना आसान नहीं था। वेद उसके पास आया और उससे पीछे की तरफ़ धकेल दिया था। शिवांशा नहीं जानती थी कि इस वक्त वह पहाड़ी के किनारे पर खड़ी है। वह नीचे गिरती, उससे पहले वेद ने उसका हाथ पकड़कर उसे थाम लिया था।

    इस वक्त शिवांशा के चेहरे पर गहरे डर के भाव थे। अगर वेद उसका हाथ छोड़ देता तो अगले ही पल वह खाई में गिर जाती।

    “अब मुझे बताओ कि तुम राजावत हाउस मुझे क्यों लेकर जा रही थी? जिस तरह से तुम मुझे टालने की कोशिश कर रही हो ना, मैं कोई बेवकूफ़ नहीं हूँ जो मुझे समझ नहीं आएगा कि बात कुछ बड़ी है।” वेद ने शिवांशा की तरफ़ देखते हुए सर्द आवाज़ में कहा।

    शिवांशा की दिल की धड़कनें डर के मारे तेज़ हो गई थीं। वह जानती थी कि वेद के लिए उसका हाथ छोड़ना कोई आसान बात नहीं है। वैसे भी वह उसे मारना ही चाहता था। ऊपर से थोड़ी देर पहले उसने शिवांशा की किडनैपिंग को जिस तरह से हैंडल किया, उससे एक बात साफ़ थी कि शिवांशा की मौत का राज़ दबाना भी उसके लिए कोई मुश्किल काम नहीं था।

    शिवांशा रोते हुए बोली, “मेरा भाई... मेरा भाई उनके पास है। वह उसे मार देंगे। मुझे भी मारना चाहते हैं, बस उसे बचाने के लिए जा रही थी। प्लीज़ उसे कुछ मत कीजिएगा, वह सिर्फ़ 14 साल का है। ऊपर से वह चल भी नहीं सकता, बस उसी को बचाने जा रही थी। प्लीज़ छोड़ दीजिए।”

    शिवांशा के चेहरे की मासूमियत देखकर साफ़ था कि वह झूठ नहीं बोल रही थी। वेद ने उसे एक झटके में ऊपर खींच लिया था। शिवांशा जल्दी से नीचे बैठ गई और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।

    वेद बिल्कुल उसके पास खड़ा था। शिवांशा ने उसके पैर पकड़े और कहा, “आपके परिवार के साथ जो भी हुआ, उसकी सज़ा आपने मेरी फैमिली को दे दी है। आप चाहो तो मुझे मार दो, लेकिन मेरे भाई को कुछ मत करना। उसे बचा लीजिए, मिस्टर चौहान। वैसे भी वह हमारा खून नहीं है। मेरी माँ के भाई का बेटा है। उसके मम्मी-पापा की एक्सीडेंट में मौत हो गई थी तो मम्मी उसे हमारे घर ले आई थी।”

    शिवांशा उसके पैरों में बैठकर गिड़गिड़ा रही थी। वेद उससे कुछ कदम दूर हुआ और तेज़ आवाज़ में बोला, “गाड़ी में बैठो।”

    शिवांशा चुपचाप खड़ी हुई और उसके ऑर्डर्स फॉलो करते हुए गाड़ी के अंदर जाकर बैठ गई थी। वहीं वेद अभी तक बाहर था। उसने अपना सिर पकड़कर कहा, “एक बात समझ नहीं आ रही है। राजावत फ़ैमिली को देवराज ठाकुर की पोती को प्रोटेक्ट करने का काम मिला था तो उसके मरने के बाद वह उस लड़की को मारने क्यों जा रहे थे?”

    वेद कंफ्यूज ज़रूर था, लेकिन वह बहुत समझदार था। शिवांशा की मासूमियत उसकी आँखों से झलक रही थी। उसका कहा एक-एक शब्द उसे सच्चा लग रहा था।

    वेद ने तुरंत प्रतीक को कॉल किया और कहा, “यह लड़की कह रही है कि इसका कोई छोटा भाई भी है, कज़िन ब्रदर है जो राजावत फ़ैमिली के कब्ज़े में है। बच्चा 14 साल के करीब है, उसे ढूँढो। राजावत फ़ैमिली ने उसे किडनैप कर रखा है और मुझे पूरा शक अंकुश पर है।”

    “हाँ, मैं देख लूँगा, लेकिन आपने सोचा है कि घरवालों से क्या कहेंगे? आपने इस लड़की को अपनी पत्नी बताया है। ऐसे में उन्हें पता चला कि यह देवराज ठाकुर की पोती है तो सब इससे बहुत नफ़रत करेंगे। फ़िलहाल इसे कुछ भी करना सही नहीं रहेगा।” प्रतीक ने परेशान स्वर में कहा।

    “हाँ, जानता हूँ। मैं देखता हूँ इस मामले में क्या करना है। तुम बस शांत रहना और फ़िलहाल इस लड़की के बारे में किसी को कुछ मत बताना।” वेद ने जवाब दिया और फिर कॉल कट कर दिया था।

    वहीं दूसरी तरफ़ अंकुश और अरमान दोनों ही राजावत फ़ैमिली पहुँच चुके थे। वहाँ पर भी हड़कंप मचा हुआ था क्योंकि वेद से जुड़ी जो ख़बर आ रही थी, उस बारे में उन्हें भी पता चल चुका था। ऊपर से शिवांशा के अचानक ग़ायब होने की वजह से मनन ने अपना पूरा होश खो दिया था।

    देवेश जैसे-तैसे करके मनन को संभालने की कोशिश कर रहा था। शादी अटेंड करने आए गेस्ट बातें बनाते हुए वहाँ से चले गए थे। वहाँ राजावत फ़ैमिली के लोग बचे हुए थे, जो अंकुश के आने का इंतज़ार कर रहे थे।

    जैसे ही अंकुश और अरमान ने अंदर कदम रखा, मनन दौड़ते हुए अरमान के पास आया और उसका हाथ पकड़कर बोला, “अरमान, मेरी शिवि कहाँ है? तुमने... तुमने कहा था कि तुम उसे इन गंदे लोगों से बचा लोगे। मैंने टीवी में देखा वह एक आदमी के साथ थी। उसने उसका हाथ पकड़ रखा था और बोला कि वह मेरी पत्नी है। वह झूठ बोल रहा है ना? शिवि की शादी मुझसे होगी और जिसकी शादी होती है वही पति-पत्नी होते हैं। शिवि मेरी पत्नी बनेगी। उसने प्रोमिस किया था।”

    अरमान ने गहरी साँस ली और अंकुश का हाथ सहलाकर कहा, “शिवि तुम्हारी ही पत्नी बनेगी। बस वह किसी काम की वजह से बाहर गई हुई है। उसने कहा है कि तुम अपना ख़्याल रखना। वापस आकर वह तुमसे ही शादी करेगी।”

    “पक्का प्रॉमिस ना?” मनन ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा।

    पहली बार अरमान ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया। अरमान कभी मनन से झूठ नहीं बोलता था। उसने बिना कुछ कहे पलकें झपका दीं।

    अरमान फिर मनन के गाल पर हाथ रखकर कहा, “अच्छा मनन, हम बड़े लोग बातें कर रहे हैं तो तुम जाकर कमरे में आराम करो।”

    अरमान ने बहाने से मनन को वहाँ से भेज दिया था। उसके वहाँ से जाते ही अरमान ने गुस्से भरी निगाहों से तेजेंद्र और देवेश की तरफ़ देखा। वह उनकी तरफ़ बढ़ते हुए तेज़ आवाज़ में बोला, “आप लोग ऐसा कैसे कर सकते हैं? उस मासूम सी लड़की ने आपका क्या बिगाड़ा था जो आप उसे जान से मारना चाहते थे। और आपका यह महान बेटा उसके साथ...”

    अरमान की बात पूरी होने से पहले ही अंकुश बीच में बोल पड़ा। वह जल्दी से बोला, “अरमान, तुमने हमेशा इस घर के मैटर्स से ख़ुद को दूर रखा है तो अभी भी दूर रहो ना? तुम तो कुछ जानते भी नहीं हो।”

    “नहीं जानता, लेकिन एक बात तो साफ़ है कि गलती आप ही लोगों की रही होगी। आज आपकी वजह से शिवांशा मुश्किल में आ गई है। न जाने वह वेद सिंह चौहान उसके साथ क्या करेगा?” अरमान ने परेशान स्वर में कहा।

    “वही करेगा, जो हम करने जा रहे थे। देखा जाए तो अच्छा हुआ, जो हमारे ऊपर किसी तरह का इल्ज़ाम नहीं आएगा। वेद ने सबके सामने उस लड़की को अपनी पत्नी बताया है। ऐसे में वह अपना बदला पूरा करने के लिए उस लड़की को मारेगा भी तो उसी का ही नुक़सान है।” अंकुश ने बेपरवाही से कहा। उसने सबके सामने यही जाहिर किया कि शिवांशा के जाने से उनका फायदा ही हुआ है, ताकि कोई उस पर उंगली ना उठा सके।

    अंकुश की बात पूरी होते ही तेजेंद्र ने उसका गला पकड़ लिया। वह उस पर चिल्लाकर बोले, “बेवकूफ़ आदमी, मारने को हम उस लड़की को पहले भी मार सकते थे, लेकिन अब तक उसे सुरक्षित रखा, उसका कोई तो कारण रहा होगा। अगर उन लोगों को पता चला कि वह लड़की शिवांशा, वेद सिंह चौहान के हाथ लग गई है, तो ख़तरा हमारे ऊपर भी आएगा। कैसे भी करके उस लड़की को वापस लेकर आओ, वरना मैं अपने हाथों से तुम्हारी जान ले लूँगा।”

    तेजेंद्र की इस हरकत से अंकुश हड़बड़ा गया था। गीतिका भी वहीं पर खड़ी हुई थी। तेजेंद्र उसकी तरफ़ पलटा और कहा, “अपने मायके जाओ, गीतिका। यही सही मौक़ा है। सबको बोलो कि वेद और शिवांशा की शादी नहीं हुई है, बल्कि मनन और शिवांशा की शादी होने वाली थी। उस लड़की का सच पूरे परिवार के सामने बताओ और उसे कैसे भी करके यहाँ लेकर आओ।”

    “लेकिन पापा जी, मैं कैसे जा सकती हूँ? आप अच्छे से जानते हैं, वेद मेरा भाई ज़रूर है, लेकिन उसके पापा और मेरे पापा सौतेले भाई थे। ऊपर से हमारे बीच के रिश्ते ऐसे नहीं है कि मैं चौहान पैलेस में क़दम भी रख सकूँ।” गीतिका ने नज़र झुका कर कहा।

    “फिर भी अपने घर जाकर लोगों के मन में शक तो डाल ही सकती है।” तेजेंद्र ने कहा तो गीतिका ने ‘हाँ’ में सिर हिला दिया था।

    गीतिका वहाँ से जाने की तैयारी करने लगी। अंकुश भी उसी के साथ जा रहा था। अंकुश और गीतिका के वहाँ से हटते ही तेजेंद्र भी जब अपने कमरे में जाने को हुआ, तब अरमान ने पीछे से तेज़ आवाज़ में कहा, “अंकुश उसके साथ रेप करने की कोशिश कर रहा था। बहुत साल पहले मैंने आपको बताया था कि अंकुश शिवांशा को फ़िजिकल एसॉल्ट कर रहा है तब आपने हम सबको दिल्ली भेज दिया था। अब इस मामले में आप क्या करेंगे, मिस्टर राजावत?”

    तेजेंद्र अरमान की तरफ़ पलटा। उसकी भौंहें चढ़ी हुई थीं। वह अरमान से तेज़ आवाज़ में बोले, “बड़े पापा। इसी नाम से बुलाओ हमें। पिछली बार तुम्हारी बात मानकर हमने उस लड़की को तुम्हारे साथ भेजा था ना? वैसे भी सालों पहले राजा-महाराजाओं के यहाँ दासियाँ काम करती थीं। वह उन्हें हर तरीक़े से खुश करने की कोशिश करती थीं।”

    “शिवांशा इस घर की नौकरानी नहीं है और मुझे आपकी सोच पर शर्म आती है।” अरमान ने सख्ती से कहा।

    तेजेंद्र से बहस करने का कोई फ़ायदा नहीं था। जितनी उनकी लड़ाई बढ़ती, तेजेंद्र की घटिया सोच देखकर अरमान को उतनी ही घिन महसूस होती। यही सोचकर वह वहाँ से चला गया।

    दूसरी तरफ़ शिवांशा और वेद इस वक्त गाड़ी में थे। शिवांशा ने वेद को अपने भाई को बचाने के लिए कह तो दिया था, लेकिन वह नहीं जानती थी कि वेद इस मामले में क्या करने वाला है।

    वेद चुपचाप गाड़ी चला रहा था और शिवांशा उसके पास बैठी थी। गाड़ी के अंदर एक ख़ामोशी पसरी हुई थी। शिवांशा की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह वेद से कुछ भी पूछ सके।

    चौहान पैलेस आने से कुछ दूर पहले वेद ने गाड़ी रोकी तो शिवांशा के दिल की धड़कनें फिर से डर के मारे तेज़ हो गई थीं। पिछली बार जब वेद ने गाड़ी रोकी थी, तब वह उसे मारने के लिए पहाड़ी पर लेकर चला गया था। अब न जाने वह उसके साथ क्या करने वाला था। डर के मारे शिवांशा ख़ुद में ही सिमटने लगी थी।

    वेद ने उसकी तरफ़ देखा। उसके डर को समझते हुए उसने गहरी साँस लेकर कहा, “डरो मत, अभी नहीं मारूँगा, लेकिन बेफ़िक्र भी मत हो जाना कि कभी नहीं मारूँगा। मैंने लोगों के सामने झूठ बोला है कि तुम मेरी पत्नी हो। जब तक तुम इस ड्रामें को करती रहोगी तब तक तुम्हारी जान बची हुई है और गलती से भी मेरी फ़ैमिली के सामने अपनी पहचान मत बता देना, शिवांशा ठाकुर। वरना जो काम करने से पहले मैं दो बार सोचूँगा, वह एक मिनट नहीं लगाएँगे तुम्हारी जान लेने से पहले।”

    शिवांशा को उसकी बात समझ नहीं आई। वह उलझन भरी निगाहों से उसकी तरफ़ देख रही थी। वेद ने भी कुछ समझाना ज़रूरी नहीं समझा। वह गाड़ी से बाहर निकला और लगभग 10 मिनट बाद आया तो उसके हाथ में एक सिंदूर की डिब्बी थी। वो भी वेद पास ही के मंदिर से लाया था। सुबह का सूरज अभी निकला नहीं था, इतनी सुबह कोई शॉप खुली नहीं थी। इस वजह से वेद ने अपने गले में पहना हुआ गोल्ड का चेन निकाला, जिसके अंदर देवी माँ की मूर्ति थी। उसे देने से पहले वेद ने उस चैन पेंडेंट को गौर से देखा। फिर उसने उसे शिवांशा के हाथ में रख दिया था।

    “इसे पहन लो और सिंदूर लगा लो। नाम के लिए ही सही, लेकिन आज से तुम शिवांशा वेद सिंह चौहान हो।” वेद ने अपनी गहरी आवाज़ में कहा।

    उसके कहे एक-एक शब्द शिवांशा के कानों में गूँज रहे थे। बिना शादी किए ही वेद ने उसे अपनी पत्नी का दर्जा दे दिया था और अब उसे सीधे अपने घर लेकर जा रहा था।

    °°°°°°°°°°°°°°°°

    क्या सच में इतना रिश्ता इतना आसान रहने वाला है। आप सबका शुक्रिया, जो आप मेरे कहने पर समीक्षा का टारगेट पूरा करते हो। इस से मेरा भी लिखने का मन बना रहता है। आपको कहानी कैसी लग रही है, ये जरूर बताइएगा और कमेंट किए बिना मत जाना। ज्यादा टाइम नहीं, तो इमोजी छोड़ देना।

  • 8. His young little bride - Chapter 8

    Words: 2546

    Estimated Reading Time: 16 min

    वेद, शिवांशा को फिलहाल मार नहीं सकता था। वह साथ ही उसे अपनी आंखों से दूर नहीं होने देना चाहता था। बहुत से राज ऐसे थे, जो अभी भी उसकी नजरों से छुपे हुए थे। उनमें से एक यह था कि अगर अब तक राजावत फैमिली शिवांशा की रक्षा कर रही थी, तो अचानक क्या हो गया कि वह उसकी जान लेना चाहते थे? वैसे भी, वेद ने सबके सामने शिवांशा को अपनी पत्नी के तौर पर स्वीकार किया था। अब वह इस रिश्ते से मुंह नहीं मोड़ सकता था, भले ही उनकी शादी ना हुई हो। वेद, शिवांशा को लेकर चौहान पैलेस पहुंचा। अंदर जाने से पहले शिवांशा का शादीशुदा दिखना जरूरी था। सुबह होने की वजह से ज्यादा दुकानें नहीं खुली थीं, लेकिन फिर भी वेद उसके लिए मंदिर से सिंदूर की डिब्बी ले आया था। उसने शिवांशा को माथे पर सिंदूर लगाने को कहा। मंगलसूत्र नहीं होने की वजह से, वेद को मजबूरी में अपने गले में पहना चैन और पेंडेंट निकालकर शिवांशा को देना पड़ा।

    शिवांशा उन्हें पहनने के बजाय हैरानी से देख रही थी। तभी वेद ने इरिटेट होकर कहा, “किसका इंतजार कर रही हो? इन्हें लगाए बिना अंदर नहीं लेकर जाऊंगा। रात होने की वजह से कल लोगों ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन अब सबको दिख जाएगा कि तुम शादीशुदा नहीं लग रही हो।”

    शिवांशा ने उसे देखकर उसकी बात पर हामी भरी और फिर मिरर में देखते हुए खुद ही अपनी मांग में सिंदूर लगाया। फिर उसने वेद की दी हुई चैन और पेंडेंट की तरफ देखा।

    शिवांशा ने उसे वेद की तरफ बढ़ाते हुए धीमी आवाज में कहा, “मैं यह नहीं रख सकती। यह बहुत कीमती है। वैसे भी, इतनी सारी ज्वेलरी के अंदर नहीं दिखेगा कि मैंने मंगलसूत्र पहने हूँ या नहीं। आप यह अपने पास वापस रख लीजिए।”

    “मुझे भी कोई शौक नहीं चढ़ा है अपनी सबसे प्यारी चीज तुम्हें थमाने का। अफसोस होता है कि राजावत फैमिली ने अपनी होने वाली बहू को शादी में पहनने के लिए नकली गहने दिए। नाम के लिए भी सही, लेकिन तुम चौहान फैमिली की बहू हो। अब इसे पहनो और बाद में मुझे वापस लौटा देना। मेरे लिए ये तुम्हारी जान से कही ज्यादा कीमती है, तो अपनी जान से बढ़कर संभाल कर रखना।” वेद ने सख्त आवाज में कहा।

    वेद जिस तरह रिएक्ट कर रहा था, उससे साफ था कि वह देवी मां की मूर्ति उसके लिए मायने रखती थी। जरूर वह उसके लिए किसी की निशानी थी, क्योंकि वह दिखने में पुराने डिजाइन की लग रही थी। शिवांशा को पूछने का कोई हक नहीं था। इस वजह से उसने आगे कुछ नहीं कहा और चुपचाप उसे पहन लिया।

    उसके बाद, वेद ने फिर से गाड़ी ड्राइव की और चौहान पैलेस की तरफ जाने के लिए निकल गया। वहीं, चौहान पैलेस के बाहर पहले से ही मीडिया का अच्छा-खासा जमावड़ा इकट्ठा हो गया था। रात भर में ही नव्यांशी और आराध्या ने इवेंट मैनेजमेंट टीम को हायर करके पैलेस को बाहर से अच्छा-खासा डेकोरेट करवा दिया था। अंदर भी डेकोरेशन का काम हुआ था।

    वह सब तैयार होकर उनके आने का इंतजार कर रहे थे। आराध्या ने आरती की थाली ले रखी थी। उसने वंश से पूछा, “आपकी भाई से बात हुई? उनको आने में कितना टाइम लगेगा?”

    “वह कॉल रिसीव नहीं कर रहे हैं। मैंने प्रतीक से बात की थी, तो उन्होंने बताया कि वह घर आने के लिए ही निकले हैं।” वंश ने शांत लहजे में जवाब दिया।

    वहीं, अक्षत खिड़की के बाहर खड़ा मीडिया को देख रहा था। उसकी इस हरकत को नव्यांशी ने नोटिस किया, तो वह इरिटेट होकर तेज आवाज में बोली, “क्या कर रहे हो अक्षत वहां? अभी भी तुम्हारी हरकतें बहुत चाइल्डिश हैं।”

    “देखो, बाहर कितनी मीडिया आई है। हमने तो उन्हें इनवाइट नहीं किया।” अक्षत ने हैरानी से कहा।

    “हमें इनवाइट करने की जरूरत नहीं है। इन्हें खुद को टीआरपी चाहिए होगी। थैंक गॉड, जो कल रात हमने घर को डेकोरेट करवा लिया था, वरना सबको यही लगता कि हमें भाई की शादी के बारे में कोई खबर नहीं है।” नव्यांशी ने राहत की सांस लेकर कहा।

    यह उसी का फैसला था कि पैलेस को डेकोरेट किया जाए। वंश ने उसकी बात पर सहमति जताते हुए कहा, “हां, तुम हमेशा प्रैक्टिकल डिसीजन लेती हो, नवी। वरना हममें से किसी ने इस बारे में नहीं सोचा था। भाई हमेशा यही कहते हैं कि घर के अंदर चाहे कितनी भी खटपट क्यों न हो, लेकिन आपसी अनबन कभी बाहर वालों के सामने नहीं आनी चाहिए।”

    वह सब आपस में बात कर रहे थे, जबकि अक्षत की निगाहें अभी भी बाहर उलझी हुई थीं। इस बीच, उसने देखा कि वेद की गाड़ी गेट से इंटर करके अंदर की तरफ बढ़ रही थी। अक्षत के चेहरे पर स्माइल आ गई।

    अक्षत ने सबकी तरफ देखकर एक्साइटेड होकर कहा, “भाई और भाभी आ गए हैं। चलो, हम उनका वेलकम करते हैं।”

    नव्यांशी ने उसकी बात पर हामी भरी। वेद ने चाहे जैसे भी शादी की हो, लेकिन वह उसकी इस इतनी बड़ी खुशी में किसी तरह की कमी नहीं रखना चाहते थे। उन्हें पहली बार मौका मिला था वेद के लिए कुछ करने का। थोड़ी ही देर में, नव्यांशी ने इतने अच्छे अरेंजमेंट करवा लिए थे।

    वेद और शिवांशा के गाड़ी से बाहर निकलते ही, मीडिया वालों ने उन्हें घेरने की कोशिश की, लेकिन सिक्योरिटी गार्ड्स ने उन्हें साइड में कर दिया था। जब तक वेद की इजाजत नहीं होती, तब तक कोई उसके आसपास भी नहीं पहुंच सकता था।

    मीडिया वाले दूर से ही उन्हें कवर करने लगे।

    “जैसा कि आप देख सकते हैं, कल रात अचानक मिस्टर वेद सिंह चौहान की शादी सबके सामने रिवील हुई थी। शायद दोनों की एज में इतना डिफरेंस होने की वजह से वह सबके सामने शादी नहीं करना चाहते थे, लेकिन कहते हैं, प्यार कभी उम्र देखकर नहीं होता। आप सब देख सकते हैं कि मिसेज चौहान का वेलकम कितने ग्रैंड तरीके से किया जा रहा है, जैसा कि रॉयल फैमिली की परंपरा होती है।”

    उन सब की एक-एक बात वेद के कानों में पड़ रही थी। उसने गुस्से से अपनी मुट्ठियां बांध ली थीं। न जाने मीडिया वाले उसके बारे में क्या-क्या बातें बना रहे थे। उसने एक नजर शिवांशा की तरफ देखा, जो उम्र में उससे काफी छोटी थी।

    वेद ने मन ही मन कहा, “अजीब मुसीबत है। मुझे क्यों अपने ही दुश्मन की पोती से प्यार होगा, जो उम्र में मुझसे इतनी छोटी है? हमारा कोई मेल नहीं है। कल रात अगर अपने बर्थडे का नहीं सोचा होता, तो इस लड़की को वहीं पर मार देता, और शायद यही मेरे लिए सही रहता। गले की हड्डी बन गई है ये लड़की।”

    शिवांशा को इतने लोगों के बीच में घबराहट हो रही थी। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, तो उसने वेद का बाजू पकड़ लिया। उसकी इस हरकत पर वेद कुछ कह भी नहीं पाया।

    वहीं, बाकी की चौहान फैमिली शादी की आगे की रस्में और आरती की थाली लेकर उनके सामने आई। शिवांशा को देखकर आराध्या और अक्षत के चेहरे पर स्माइल आ गई। वह काफी मासूम-सी और छोटी-सी लगती थी।

    वहीं, अचानक नव्यांशी की नजर शिवांशा के गले पर गई। वेद का पेंडेंट शिवांशा के गले में देखकर, दिव्यांशी ने गुस्से में गहरी सांस ली। उसने एक नजर वेद की तरफ देखा, जिसके चेहरे पर खुशी जैसे कोई भाव नहीं थे।

    आराध्या ने उन दोनों की आरती उतारी और फिर शिवांशा से बोली, “आइए, भाभी। सबसे पहले आप आलते में अपना पैर रखकर अपनी छाप इस घर पर छोड़ दीजिए। फिर हम देवी मां के मंदिर में जाकर आप दोनों की शादी के लिए आशीर्वाद लेंगे।”

    कुछ भी करने से पहले, शिवांशा ने घबराहट भरी नजरों से वेद की तरफ देखा। वेद ने आराध्या से कहा, “यह सब करना जरूरी है क्या?”

    “हां, बिल्कुल जरूरी है, क्योंकि मेरा भी गृह प्रवेश ऐसा ही हुआ था, और इस घर में आने वाली हर बहू का गृह प्रवेश ऐसे ही होता है। आप हर बार रस्मों से बच नहीं सकते, भाई।” आराध्या ने मुस्कुराकर कहा।

    वेद ने गहरी सांस ली और शिवांशा से कहा, “ठीक है, कर लो यह जो भी बोल रहे हैं।”

    उन लोगों को भले ही ना समझ आए, लेकिन वेद शिवांशा को हर एक कदम के लिए गाइड कर रहा था। उसकी मर्जी के बिना तो शिवांशा एक कदम भी नहीं रख सकती थी। जैसे-जैसे आराध्या बताती गई, वेद और शिवांशा वैसे ही करते गए। पूरी रस्मों के साथ उनका गृह प्रवेश हुआ, और फिर वे घर के मंदिर में देवी मां की मूर्ति के सामने थे।

    मंदिर में माथा टेकने के बाद, आराध्या ने देवी मां की मूर्ति के सामने रखा सिंदूर उठाया और उसे वेद के हाथ में रखते हुए कहा, “आपको भाभी की मांग में यह सिंदूर भरना होगा।”

    “तुम्हें नहीं लगता कि तुम इन रीति-रिवाजों के नाम पर मुझसे कुछ भी करवा रही हो? तुम अच्छे से जानती हो कि मैं इन सब में विश्वास नहीं करता।” वेद ने सख्त आवाज में कहा।

    “लेकिन आज आप इन रीति-रिवाजों से बच नहीं सकते, भाई।” नव्यांशी ने आगे आकर कहा, लेकिन वेद ने ना में सिर हिला दिया।

    वेद के आगे भला कोई क्या बोल सकता था? शिवांशा ने महसूस किया कि वह सब उसकी मर्जी के खिलाफ कुछ नहीं कर रहे थे। वेद के मना करने पर, नव्यांशी ने तुरंत सिंदूर नीचे रख दिया।

    देवी मां के मंदिर से बाहर निकलने के बाद, आराध्या आगे की रस्मों के लिए कहने वाली थी, तभी वेद ने कहा, “मैं बहुत थक गया हूं। कल रात सोया नहीं था। दूसरी बात, मुझे यह सब नहीं करना है।”

    वेद गुस्से में लग रहा था। यह उसकी बातों से सबने महसूस कर लिया था। वेद के भाई-बहनों के चेहरे उतर गए थे। वह उसका दिल नहीं दुखाना चाहता था। वह यह भी जानता था कि इस वक्त उनके दिल में हजारों सवाल उठ रहे हैं। उसने कभी उन्हें नहीं बताया कि उसकी जिंदगी में कोई लड़की है। जब भी वे शादी की बात करते, वह कहता कि उसकी जिंदगी में उनके भाई-बहनों के अलावा किसी की जगह नहीं है। ऐसे में, अचानक उसका शादी करके आना उन्हें उलझन में डाल रहा था।

    वेद उन्हें किसी तरह की कंफ्यूजन में नहीं रखना चाहता था। उसने गहरी सांस ली और उनसे संजीदगी से कहा, “मैं जानता हूं कि इस वक्त तुम सबके दिमाग में बहुत सारे सवाल उठ रहे होंगे, और मैं उन सबका जवाब देने के लिए तैयार हूं। यही चल रहा है ना कि मैंने तुम लोगों को क्यों नहीं बताया कि मैं शादी करने जा रहा हूं, जबकि मेरी खुशी से मुझसे ज्यादा तुम लोगों को खुशी मिलती है?”

    हर बार की तरह, उनके बिना कुछ कहे ही वेद ने उनके दिल की बात जान ली थी। इससे पहले कि कोई कुछ कहता, नव्यांशी आगे आई और वेद से बोली, “हमारे दिल में कितने भी सवाल क्यों न हों, लेकिन वे सवाल आपकी खुशी से बढ़कर नहीं हैं। और हम कभी आप पर सवाल उठा ही नहीं सकते, भाई, क्योंकि आप कभी गलत नहीं करोगे। आज आपकी खुशी के लिए आपने कोई कदम उठाया है, तो हर बार की तरह हम आपके पीछे खड़े हैं।”

    शिवांशा उन सबको पहली बार देख रही थी। वह हैरान रह गई। किसी भाई-बहनों में इतना प्यार कैसे हो सकता है? अरमान और मनन में भी बहुत प्यार था, लेकिन अरमान, मनन को इतना टाइम नहीं दे पाता था। कई बार वह मनन से इरिटेट भी हो जाता था। लेकिन यहां तो वेद ने उन सबको बताए बिना इतना बड़ा कदम उठाया था, फिर भी उनमें से किसी के चेहरे पर कोई गुस्सा या सवाल नहीं था। एक बात तो वह समझ गई थी कि उन लोगों के बीच में काफी प्यार है, और वे वेद की बहुत इज्जत भी करते हैं।

    नव्यांशी की बात से सहमत होते हुए, वंश ने कहा, “नवी बिल्कुल ठीक कह रही है, भाई। हां, अगर आप ग्रैंड वेडिंग करते, तो हम बहुत खुश होते, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप इस तरह अचानक शादी करके आए हो, तो हमारी खुशी कम हो गई है। वी आर रियली हैप्पी फॉर यू। फाइनली, आपने खुद के बारे में सोचा तो सही।”

    वेद ने बिना कुछ कहे, सिर्फ हां में सिर हिलाया। उसने एक बार भी शिवांशा की तरफ नहीं देखा और सीधा अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। वहीं, शिवांशा उलझन में अभी भी उनके बीच खड़ी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। उसे तो यह तक पता नहीं था कि कहां जाना है या वेद का कमरा कौन-सा है।

    वेद के ऊपर जाते ही, वह चारों उसे घेरकर खड़े हो गए, और उनके चेहरों पर हल्की मुस्कुराहट थी।

    आराध्या उसके पास आते हुए बोली, “आप जानती हैं कि आप उम्र में इस घर में सबसे छोटी हैं, लेकिन ओहदे में हम सबसे बड़ी।”

    “और हमारे घर में यह बहुत ज्यादा मायने रखता है, फिर चाहे उम्र में आप हम सब से कितनी भी छोटी क्यों न हों। आप तो जानती तक नहीं कि आपने जिससे शादी की है, वह इंसान कितना खास और अच्छा है। अगर उन्होंने आपको सिलेक्ट किया है, तो आप भी खास हो जाती हैं, भाभी।” नव्यांशी ने कहा। हालांकि, उसके लिए यह सहन कर पाना थोड़ा मुश्किल था कि अब वेद की जिंदगी में अचानक कोई लड़की आ गई थी। अगर शादी नॉर्मल तरीके से हुई होती, तो उसे सब कुछ इतना सस्पीशियस नहीं लगता, लेकिन फिर भी वेद की खुशी के लिए वह शांत थी।

    शिवांशा को समझ नहीं आया कि वह क्या बोले। तभी अक्षत आगे आया और शरारती मुस्कुराहट के साथ बोला, “वैसे तो आपसे बहुत सारी बातें करनी हैं, डियर भाभी, लेकिन फिलहाल आपके पतिदेव थक गए हैं, और अगर हमने आपको थोड़ी देर और रोककर रखा, तो उनका गुस्सा कही हम पर न उतरे।”

    “हां, अब आपको उनके रूम में जाना चाहिए।” आराध्या ने हल्का मुस्कुराकर कहा।

    वंश उन लोगों की बातों में इतना इनवॉल्व नहीं हो रहा था, क्योंकि उसका बिहेवियर वेद की तरह मेच्योर था। वह उन लोगों को वहीं पर छोड़कर चला गया। वहीं, शिवांशा की आंखें डर से फैल गई थीं। वह किस बारे में बात कर रहे थे, शिवांशा को समझ आ रहा था।

    “अरे, आप घबरा क्यों रही हैं? हम जानते हैं, आप इस घर में नई हैं। चिंता मत कीजिए, हम आपको उनके कमरे तक छोड़ देंगे। यह बात अलग है कि भाई ने पैसे बचाने के लिए रस्में करने से मना कर दिया, वरना आपको उनके पास भेजने के बदले हम अच्छे खासे अमीर हो सकते थे।” अक्षत ने उसकी घबराहट देखते हुए हंसकर कहा।

    शिवांशा उन्हें कुछ कहकर रोक पाती, उससे पहले वह तीनों उसे लिफ्ट से वेद के कमरे में लेकर गए, जो थर्ड फ्लोर पर था।

    “ऑल द वेरी बेस्ट, भाभी।” आराध्या और अक्षत ने हंसकर कहा और शिवांशा को वेद के कमरे के अंदर धकेलकर कमरे का दरवाजा बंद कर दिया।

    वहीं, शिवांशा को इस वक्त ऐसी फीलिंग आ रही थी, जैसे किसी ने उसे शेर की गुफा में धकेल दिया हो। वेद तो पहले ही उससे इतनी नफरत करता था, और अब वह उसके साथ कमरे में अकेली थी। उसे डर लग रहा था कि न जाने वह उसके साथ कैसा सुलूक करेगा। कही वो भी अंकुश की तरह, उसके साथ जबरदस्ती ना करें।


    °°°°°°°°°°°°°°°°

    क्या लगता है, शिवांशा का डर सही साबित होगा और वेद भी उस से बदले के चलते हर हद पार कर जाएगा? वेद के कैरेक्टर से अब तक आपको क्या समझ आया? पढ़कर समीक्षा जरूर कीजियेगा।

  • 9. His young little bride - Chapter 9

    Words: 2447

    Estimated Reading Time: 15 min

    शिवांशा शादी करके चौहान पैलेस आ चुकी थी। वेद के परिवार में सभी उसका बहुत सम्मान करते थे, इसलिए उन्होंने बिना कोई सवाल किए शिवांशा को स्वीकार कर लिया था। उसका पूरे रीति-रिवाजों के साथ गृह प्रवेश भी करवाया गया। हालांकि, वेद की बेरुखी उन सब के मन में कई सवाल पैदा कर रही थी। फिर भी, उन्हें यह भी पता था कि वेद न तो किसी बात पर ओवर एक्साइटमेंट दिखाता था, न ही ज्यादा एक्सप्रेसिव था, जो अपने दिल की बात मुंह से बोलकर बता सके।

    वेद ने कुछ जरूरी रस्में निभाईं और फिर थकान का बहाना बनाकर अपने कमरे में चला गया। उसके जाने के बाद, बाकी परिवार वालों ने शिवांशा से कुछ देर बात की। वह काफी घबराई हुई थी, इसलिए ज्यादा कुछ बोल नहीं पा रही थी। फिर आराध्या, अक्षत, और नव्यांशी ने उसे जबरदस्ती वेद के कमरे में धकेल दिया।

    वेद अपने कमरे में कपड़े बदल रहा था और शर्टलेस था। दरवाजा बंद होने की आवाज सुनकर वह जल्दी से पलटा, तो सामने शिवांशा खड़ी थी। फिट होने की वजह से वेद अपनी उम्र से काफी छोटा दिखता था। उसके सिक्स पैक एब्स साफ नजर आ रहे थे। उसे शर्टलेस देखकर शिवांशा ने तुरंत अपनी नजरें दूसरी तरफ कर लीं।

    “क्या कर रही हो तुम यहां?” वेद ने उसे घूरते हुए पूछा और जल्दी से पास रखी शर्ट उठाकर पहनने लगा।

    “वो... वो... उन्होंने...” शिवांशा डरते हुए हकलाने लगी। वह ठीक से अपनी बात भी पूरी नहीं कर पा रही थी।

    “तुम स्टमरिंग करती हो?” वेद ने उसकी तरफ देखकर पूछा।

    शिवांशा ने नजरें उठाकर वेद की ओर देखा और ना में सिर हिला दिया।

    उसके मना करने पर वेद ने आंखें घुमाकर कहा, “तो जो कहना है, सीधे-सीधे कहो। मुझे तुम्हारी शक्ल देखकर ही इरिटेशन हो रही है, ऊपर से तुम बात करते वक्त और भी इरिटेट करती हो।”

    “मैं... मैं इस कमरे में खुद नहीं आई थी। उन सब ने मुझे अंदर भेजा था।” शिवांशा ने जैसे-तैसे अपनी बात पूरी की।

    शिवांशा दिखने में कितनी भी मासूम क्यों न हो, वेद यह कभी नहीं भूल सकता था कि देवराज ठाकुर ने उसे अनाथ कर दिया था। शिवांशा की वजह से ही वह इतनी बड़ी मुसीबत में फंस गया था। उसे एक ऐसी लड़की को सबके सामने अपनी पत्नी बताना पड़ रहा था, जिससे वो बेइंतहा नफरत करता था। ऊपर से, शिवांशा की वजह से उसे अपनी पूरी फैमिली से झूठ बोलना पड़ रहा था।

    वेद ने गहरी सांस ली और कहा, “कमरे तक तो आ गई हो, आगे कोई उम्मीद मत रखना। वो इतने प्यार से पेश आ रहे है, क्योंकि मेरे भाई-बहनों के सामने तुम्हारा असली चेहरा नहीं आया है। अपनी औकात मत भूलना। वक्त आने पर तुम्हारी जान मैं खुद अपने हाथों से लूंगा।”

    शिवांशा ने जवाब में कुछ नहीं कहा। उसकी नजर बेड की तरफ गई, तो उसके चेहरे पर फिर से घबराहट के भाव उभर आए। वेद ने उसकी नजरों को फॉलो करते हुए बेड की ओर देखा। कमरे में आते ही वह सीधे बाथरूम चला गया था, इसलिए उसका ध्यान बेड की तरफ नहीं गया था।

    नव्यांशी जानती थी कि वेद को ज्यादा तामझाम पसंद नहीं है। इसलिए, उसने सब कुछ काफी सादा रखवाया था। फिर भी कमरे को फर्स्ट वेडिंग नाइट के हिसाब से थोड़ा बहुत डेकोरेट किया हुआ था।

    वेद ने शिवांशा की तरफ देखकर कहा, “तुम डर क्यों रही हो? पहली बात, हमारी शादी नहीं हुई है। दूसरी बात, अगर गलती से शादी हो भी जाती, तो भी मैं तुम्हें हाथ तक नहीं लगाता। कमरे का कोई कोना पकड़ लो और सो जाओ। मुझे थोड़ी देर रेस्ट चाहिए। डिस्टर्ब मत करना।”

    शिवांशा ने बिना कुछ कहे उसकी बात पर हां में सिर हिला दिया। वह अपनी जगह से हिली तक नहीं। वहीं खड़ी-खड़ी वह कमरे को चारों तरफ देखने लगी। यह पैलेस काफी पुराना था, लेकिन उसका इंटीरियर और बाकी चीजों को बदलकर मॉडर्न कर दिया गया था। वेद के कमरे का इंटीरियर विंटेज स्टाइल में सेट किया गया था।

    लगभग दस मिनट बाद, शिवांशा को लगा कि वेद को नींद आ गई होगी, क्योंकि वह आंखें बंद करके लेटा हुआ था। वह धीरे-धीरे बाथरूम की तरफ बढ़ने लगी। उसके पायलों की खनक सुनकर वेद इरिटेट होकर उठ बैठा और तेज आवाज में चिल्लाया, “मैंने कहा न, मुझे अपने कमरे में बिल्कुल साइलेंस चाहिए। ऐसा लगना चाहिए कि यहां कोई इंसान नहीं रहता।”

    “मैं पायल खोल देती हूं।” शिवांशा ने धीरे से जवाब दिया और वहीं जमीन पर बैठकर अपने पैरों से पायल उतारने लगी।

    वेद वापस बिस्तर पर लेट गया। पायल उतारने के बाद, शिवांशा आगे बढ़ी और बाथरूम का दरवाजा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया। लेकिन उसकी चूड़ियों की खनखनाहट ने फिर से वेद की नींद डिस्टर्ब कर दी।

    वेद ने इरिटेट होकर गहरी सांस ली। इससे पहले कि वह फिर से चिल्लाता, शिवांशा ने जल्दी-जल्दी अपनी चूड़ियां उतारनी शुरू कर दी थी।

    वह जल्दी से बाथरूम में दौड़कर चली गई। उसने खुद को आईने में देखा। रोने की वजह से उसकी आंखें हल्की लाल हो गई थीं। फिर उसकी नजर अपने माथे पर गई, जहां सिंदूर लगा हुआ था। वह सिंदूर वेद के नाम का था, लेकिन उनके बीच कोई रिश्ता नहीं था। अचानक शिवांशा की आंखों में फिर से आंसू छलक आए।

    “क्या मुझे हमेशा गुलामो की तरह जिंदगी बितानी पड़ेगी? पहले राजावत फैमिली में मुश्किल से अरमान भाई ने मुझे वहां से निकाला था। कुछ ही साल ठीक से बीते थे कि अब मैं यहां आ गई। इन्हें तो मेरे कदमों की आहट तक से दिक्कत है। फिर मैं यहां कैसे रहूंगी? मन तो कह रहा है कि जाकर कह दूं कि बाद में मारने से बेहतर है, अभी मार दो। बस, मेरे जाने के बाद मेरे भाई रोहन का ख्याल रखना।” शिवांशा ने सुबकते हुए कहा।

    उसकी जिंदगी ऐसी थी कि अब तो उसने शिकायत करना भी छोड़ दिया था। देवराज ठाकुर के जेल जाने के बाद, जब ठाकुर फैमिली पर मुसीबतों का पहाड़ टूटने लगा, तब शिवांशा और उसके भाई रोहन को राजावत फैमिली की देखरेख में छोड़ दिया गया था। ठाकुर फैमिली जान चुकी थी कि वेद उन्हें नहीं छोड़ेगा। और वही हुआ। राजावत फैमिली को शिवांशा और रोहन की देखभाल करनी थी, लेकिन वहां उसे नौकरानी से ज्यादा कुछ नहीं समझा जाता था। ऊपर से, अंकुश मौका मिलने पर उसके साथ गलत हरकत करने की कोशिश करता था। अरमान, जो मनन के साथ अपनी पढ़ाई के चलते दिल्ली में रहता था, ने एक बार शिवांशा का बुरा हाल देखा। उसने अंकुश को उसे गलत इरादों से देखते हुए पकड़ा, तो वह शिवांशा को अपने साथ दिल्ली ले गया। वहां उसे ज्यादा कुछ नहीं, लेकिन पढ़ने का मौका मिला, साथ ही उसे मनन की देखभाल भी करनी पड़ती थी।

    अपनी पुरानी जिंदगी के बारे में सोचकर शिवांशा के दिल में टीस-सी उठी। तभी उसे अपने पेट में गुड़गुड़ की आवाज सुनाई दी। उसने जल्दी से अपना हाथ पेट पर रख लिया।

    “भूख लगी है।” शिवांशा ने धीरे से कहा।

    उसने पिछले पूरे दिन से कुछ नहीं खाया था, क्योंकि उसका उपवास था। फेरों के बाद भी ही उसे कुछ खाना था। इसके बाद यह सब हो गया, तो उसे खाने का वक्त ही नहीं मिला। थकान के मारे वह बाहर आई और सीधे सोफे पर लेट गई। कुछ ही देर में उसे नींद आ गई।

    वेद भी नींद में था, लेकिन अचानक उसने अपना सिर पकड़ा और इरिटेट होकर उठ बैठा। उसने देखा कि शिवांशा सोफे पर सो रही थी और खर्राटे ले रही थी।

    “हां, बस अब यही बाकी रह गया था।” वेद ने झुंझलाकर कहा। उसके लिए एक दिन भी शिवांशा को झेलना मुश्किल हो रहा था। ना जाने वह उसके साथ एक कमरे में कैसे रहने वाला था।

    वेद उठा और शिवांशा के पास जाकर बोला, “उठो, अभी के अभी नींद से जागो।”

    वेद उसे ऑर्डर दे रहा था, लेकिन शिवांशा इतनी गहरी नींद में थी कि उसे कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा था। वेद ने उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन शिवांशा को छूने से पहले ही उसने अपना हाथ रोक लिया।

    “ये ऐसे ही स्नोरिंग करती रही, तो मेरा दिमाग फट जाएगा।” वेद ने बड़बड़ाते हुए कहा। फिर उसने एक नजर शिवांशा की तरफ देखा, जो सोते हुए और भी ज्यादा मासूम लग रही थी।

    शिवांशा की हालत कोई भी देखे या सुने, तो उसे उस पर दया आ जाती थी। वेद ने गहरी सांस ली और अपना मोबाइल निकालकर एक अजीब-सी रिंगटोन बजाई, ताकि शिवांशा की नींद टूट जाए। लेकिन वह फिर भी ऐसे सोई थी, जैसे दुनिया खत्म हो गई हो।

    “अब समझ नहीं आ रहा कि इसे कैसे जगाऊं। आगे से कहना पड़ेगा कि इतनी गहरी नींद में न सोए कि सामने वाला उठाते-उठाते पागल हो जाए। खुद आराम से सो रही है, और मेरी नींद हराम कर रखी है।” वेद ने गुस्से में पैर पटकते हुए कहा।

    आखिरकार, मजबूरी में उसे शिवांशा का कंधा झिंझोड़ना पड़ा, तभी शिवांशा हड़बड़ाकर उठ बैठी।

    अचानक उसके मुंह से निकला, “न...नहीं, प्लीज, छूना मत।”

    वेद ने देखा कि उसके माथे पर पसीने की बूंदें थीं और चेहरे पर डर के भाव। शिवांशा नींद में बुरा सपना देख रही थी, जिसमें अंकुश उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश कर रहा था।

    “तुम इतनी हैवी ड्रेस में इतना कंफर्टेबल होकर कैसे सो सकती हो?” वेद ने हल्की हैरानी जताते हुए पूछा। उसे तो आते ही कपड़े बदलने पड़े थे, ताकि वह आराम से सो सके।

    “नींद आ रही थी, ऊपर से मेरे पास दूसरे कपड़े भी नहीं थे।” शिवांशा ने धीरे से कहा।

    “हां, मैं तो भूल ही गया था कि अब तो रानी साहिबा की पूरी खातिरदारी करनी पड़ेगी।” वेद ने सार्कास्टिकली सिर हिलाकर कहा। शिवांशा मासूमियत से उसकी तरफ देखने लगी।

    उसने तो कुछ मांगा भी नहीं था, फिर भी वेद उसे रानी साहिबा कहकर बुला रहा था और ऐसे रिएक्ट कर रहा था, जैसे ना जाने उसके कितने नखरे हों।

    शिवांशा में इतनी हिम्मत तो थी नहीं कि वह वेद के मुंह पर कुछ बोल सके। उसने मन ही मन बड़बड़ाकर कहा, “मैंने तो कुछ कहा भी नहीं। खुद को राजा साहब की तरह पूरा कंफर्ट चाहिए, और उल्टा मुझे सुना रहे हैं।”

    “इस तरह मन में मुझे भला-बुरा कहने से कुछ नहीं होगा। जितना हो सके, मेरी नजरों से दूर रहना। क्योंकि जब भी तुम्हारी शक्ल देखता हूं, मुझे अपने मां-पापा का खून से सना चेहरा याद आता है।” वेद ने कड़वाहट भरे लहजे में कहा और कमरे से बाहर चला गया। वह जानता था कि शिवांशा के रहते उसका सोना नामुमकिन था।

    पहले भी उसे हर पल यह एहसास दिलाया जाता था कि देवराज की वजह से राजावत फैमिली को शिवांशा का बोझ ढोना पड़ रहा है। लेकिन वेद की बातें तो उनसे भी ज्यादा कड़वी थीं।

    “अगर मैं हु मुसीबत की जड़ हूं, तो सब मुझे अपने सिर पर क्यों रखना चाहते हैं? जैसे बाकी फैमिली को मारा, वैसे मुझे भी मार देते। कम से कम इतना अपमान तो नहीं सहना पड़ता। क्या मैंने इनके मां-बाप को मारा था? या मेरे दादाजी और घरवालों ने सब कुछ मेरे कहने पर किया था? फिर मुझे क्यों जिम्मेदार ठहराया जा रहा है?” शिवांशा ने धीरे से बड़बड़ाते हुए कहा।

    वेद अपने बेडरूम से स्टडी रूम में चला गया। वहां जाकर वह सोने की कोशिश करने लगा। उधर, शिवांशा को भी वापस नींद आ गई थी।

    शाम के लगभग छह बजे, आराध्या नव्यांशी के पास गई। पूरे दिन से वेद और शिवांशा ऊपर ही थे।

    आराध्या ने नव्यांशी से कहा, “क्या हम भाभी से पहली रसोई की रस्म करवाएं? भाई ने किसी भी रस्म के लिए मना किया है।”

    “सबसे पहले तो उन्हें भाभी बुलाना ही अजीब लग रहा है। आई मीन, वो हमसे छोटी हैं। मुझे अभी भी थोड़ा अजीब लग रहा है कि भाई को इतनी छोटी लड़की से प्यार हुआ।” नव्यांशी ने मुंह बनाकर कहा।

    “तो तुम उन्हें जज कर रही हो?” आराध्या ने हल्की हैरानी से पूछा।

    “बिल्कुल नहीं। चलिए, भाभी से रस्म कराते हैं। एक खीर ही तो बनानी है।” नव्यांशी ने सिर हिलाकर कहा।

    “हां, पर उससे पहले हमें उनके लिए कपड़े भेजने होंगे। वो बिना लगेज के आई थीं। पहली रसोई की रस्म के लिए मैंने मां की साड़ी पहनी थी। उनके लिए भी लेकर जाऊं?” आराध्या ने हिचकिचाते हुए पूछा।

    “हां, ऐसा करते हैं। उन्हें वो लाल वाली साड़ी दे देते हैं। मां ने वो साड़ी खास भाई की दुल्हन के लिए तैयार करवाई थी। उनके इमोशंस उससे जुड़े हैं। पहले मुझे लगा था कि भाई कभी शादी नहीं करेंगे, तो वो साड़ी ऐसे ही रखी रह जाएगी। साथ में वो हार भी भिजवा देना।” नव्यांशी ने हल्का मुस्कुराते हुए कहा।

    आराध्या ने सारा सामान तैयार किया और उनकी विश्वासपात्र हाउस हेल्पर के हाथों शिवांशा के कमरे में भेज दिया। वेद अभी भी स्टडी रूम में था। दरवाजा खटखटाने पर शिवांशा जल्दी से उठकर आई और उसने कमरे का दरवाजा खोला।

    “मैं रानी हूं।” हाउस हेल्पर ने हंसकर कहा। वह लगभग 23-24 साल की थी। उसने शिवांशा के हाथ में सारा सामान देते हुए कहा, “छोटी भाभी ने भिजवाया है, बड़ी भाभी। तैयार हो जाइएगा। कुछ ही देर में पहली रसोई की रस्म है।”

    शिवांशा ने सामान लेकर उसे देखा। हाउस हेल्पर अजीब तरीके से हंसते हुए चली गई। उसके जाने के बाद, जब शिवांशा ने खुद को आईने में देखा, तो उसकी आंखें हैरानी से बड़ी हो गईं। अब उसे समझ आया कि वह उसे देखकर क्यों हंस रही थी।

    सोने की वजह से उसके कपड़े और गहने इधर-उधर हो गए थे। शिवांशा ने अपना सिर पकड़ लिया।

    तभी वेद कमरे में आया। उसने शिवांशा को उस सामान के साथ देखा, तो उसकी आंखें सर्द हो गईं।

    शिवांशा आराध्या की भेजी हुई साड़ी को खोलकर देखने वाली थी कि वेद उसके पास आया और उसके हाथ से सामान छीनते हुए बोला, “अपने गंदे हाथों से मेरी मां की साड़ी छूने की कोशिश भी मत करना। तुम इसके लायक नहीं हो। दूसरी बात, तुम मेरी फैमिली से दूर रहोगी। उनके साथ किसी तरह का इमोशनल कनेक्शन बनाने की जरूरत नहीं है। चुपचाप इसी कमरे में कही पड़ी रहना।”

    शिवांशा अपनी जगह पर सुन्न हो गई। चौहान फैमिली उसे वेद की पत्नी के तौर पर इतना सम्मान और प्यार दे रही थी, लेकिन इस कमरे की सच्चाई कुछ और थी। वेद कोई मौका नहीं छोड़ रहा था शिवांशा को अपमानित करने का। वह उसके परिवार के एहसान के चलते ही वहां बची हुई थी।

    वेद ने शिवांशा को भेजा हुआ सामान अलमारी में रख दिया। उधर, नीचे सब शिवांशा के आने का इंतजार कर रहे थे। सामान दो घंटे पहले भेजा गया था, लेकिन शिवांशा अभी तक नीचे नहीं आई थी। वह ऊपर अपने कमरे में, उसी शादी के जोड़े में, आंसू बहा रही थी।

    °°°°°°°°°°°°°°°°

    क्या लगता है, इनका रिश्ता कौन-सा नया मोड़ लेगा? क्या वेद को कभी शिवांशा की मासूमियत दिखाई देगी, या सचमुच उसकी किस्मत में सिर्फ मौत लिखी है? पढ़कर अपनी समीक्षा जरूर दीजिएगा।

  • 10. His young little bride - Chapter 10

    Words: 2303

    Estimated Reading Time: 14 min

    चौहान फैमिली वेद की शादी को लेकर बहुत ही एक्साइटेड थी। वेद ने उन्हें शादी की रस्मों को करने से मना कर दिया था, इसके बावजूद आराध्या और नव्यांशी ने मिलकर शिवांशा की पहली रसोई की तैयारी की थी। उन्होंने शिवांशा के लिए वेद की माँ, शोभा जी, द्वारा तैयार करवाई गई साड़ी और गहने भिजवाए थे।

    वेद ने जैसे ही उस साड़ी को अपने कमरे में देखा, वह गुस्सा हो गया। इससे पहले कि शिवांशा उस साड़ी को ठीक से देख तक पाती, वेद ने उसे उसके हाथ से छीन लिया था। वेद के लिए गहनों का कोई मोल नहीं था, पर वह साड़ी शोभा जी ने खास वेद की दुल्हन के लिए बहुत दिल से तैयार करवाई थी। वेद ने उस साड़ी को अपनी अलमारी में रख दिया था।

    शिवांशा को कपड़े और गहने भिजवाए हुए लगभग दो घंटे बीत चुके थे, फिर भी वह नीचे नहीं आई थी। आराध्या और नव्यांशी रस्म के लिए उसका इंतज़ार कर रही थीं। नव्यांशी को किसी का इंतज़ार करने की आदत नहीं थी, इस वजह से उसे गुस्सा आ रहा था।

    नव्यांशी ने सिर हिलाकर कहा, “कहीं वह ऐसा जानबूझकर तो नहीं कर रही? उसे यह तो नहीं लग रहा ना कि हम वेद भैया की बात बिना किसी शिकायत के मानते हैं, तो उसकी मनमानियों को भी सहेंगे? अभी तो उसे आए हुए एक दिन भी नहीं हुआ है, और वह आते ही अपने नखरे दिखाने लगी।”

    “शांत हो जाओ, नवी। वह अभी इस घर में नई है, और इस घर के कायदे-कानून के बारे में उसे नहीं पता होगा। हमें अभी उसे जज नहीं करना चाहिए।” आराध्या ने उसे समझाते हुए कहा।

    फिर आराध्या ने रानी की तरफ देखा, जो किचन में ही व्यस्त थी। उसने रानी से कहा, “तुमने भाभी को सब बता तो दिया था ना कि हम पहली रसोई की रस्म करने वाले हैं? कहीं वह किसी गलतफहमी में तो नहीं है?”

    “मैंने बताया तो था, लेकिन उनकी हालत देखकर लग नहीं रहा कि वह नीचे खाना बनाने आ पाएगी। मतलब, वेद भैया उन्हें छोड़ेंगे, तो वह आएगी ना।” रानी ने हँसकर कहा, तो नव्यांशी उसकी तरफ गुस्से से देखने लगी।

    “अपने काम से मतलब रखो और आगे से भाई के फ्लोर पर मत जाना।” नव्यांशी ने रानी को डाँटा, तो रानी तुरंत चुप हो गई।

    नव्यांशी ने गहरी साँस ली और आराध्या से कहा, “ऐसा कीजिए, आप जाकर बात कर लीजिए। इसे वापस भेजना सही नहीं होगा। आप समझदार हैं, और यह अभी बच्ची है। बात ऐसे कीजिएगा कि उनकी प्राइवेसी इंटरेस्ट ना हो। मैं नहीं चाहती कि भाई कुछ भी गलत समझें।”

    आराध्या ने उसकी बात पर हामी भरी और वहाँ का थोड़ा काम समेटने के बाद ऊपर जाने का सोचा। वहीँ ऊपर कमरे में शिवांशा एक कोने में दुबककर बैठी थी। उसने अभी भी शादी का जोड़ा पहना हुआ था। वेद उसे फिर से अकेला छोड़कर चला गया था। आराध्या ऊपर आई और उसने दरवाजा खटखटाया, तो शिवांशा ने जल्दी से दरवाजा खोला। आराध्या उसे देखकर हैरान थी, क्योंकि वह अभी भी शादी के जोड़े में थी।

    “आपने चेंज नहीं किया, भाभी? रानी ने बताया नहीं कि हम पहली रसोई की रस्म करने वाले हैं?” आराध्या ने हैरानी जताते हुए हल्की तेज़ आवाज़ में कहा।

    एक पल के लिए आराध्या को नव्यांशी की बात कहीं ना कहीं सही लगने लगी। उसे लगा कि शिवांशा यह सोच रही होगी कि वेद सबसे बड़ा है, और उसके ओहदे के हिसाब से घर में बड़ा होने के कारण वह अपनी मनमानी करेगी।

    वहीं, आराध्या के तेज़ बोलने पर शिवांशा डर गई थी। उसने जल्दी से ना में सिर हिलाकर कहा, “नहीं, उसने मुझे सब बता दिया था।”

    “अगर ऐसा है, तो आप अब तक तैयार क्यों नहीं हुईं? क्या भाई की तरह आपके लिए भी हमारी इमोशंस कोई मायने नहीं रखते?” आराध्या ने हल्के गुस्से में कहा। शिवांशा सब जानती थी और फिर भी तैयार नहीं हुई, यह जानकर उसका गुस्सा और बढ़ गया था।

    शिवांशा यह भी नहीं बता सकती थी कि वेद ने उसके हाथ से साड़ी छीन ली थी। उसने नज़रें नीचे कीं और कहा, “वह साड़ी बहुत हैवी थी। ऊपर से मुझे साड़ी बाँधना भी नहीं आता। मैं नहीं चाहती थी कि मेरी वजह से वह साड़ी खराब हो जाए। मैं बस उसे संभालकर रखना चाहती थी।” बोलते हुए शिवांशा की आँखें नम होने लगीं, तो आराध्या को अब अपनी सख्ती पर थोड़ा पछतावा होने लगा।

    “आपने बिल्कुल सही किया जो उसे संभालकर रखा, क्योंकि वह वाकई बहुत कीमती है। आप मुझे पहले बता देतीं कि आपको साड़ी पहनना नहीं आता, मैं आपकी हेल्प करने आ जाती।” आराध्या ने थोड़ा नरमी से कहा।

    “मुझे नहीं पता कि आपका कमरा कहाँ है।” शिवांशा ने नज़रें नीचे करके जवाब दिया।

    शिवांशा के दिल की सच्चाई उसकी आँखों और चेहरे से झलकती थी। कोई भी उसके मासूम चेहरे और आवाज़ को सुनकर पिघल सकता था।

    आराध्या को भी अब समझ आ गया था कि वेद को शिवांशा जैसी सीधी-सादी लड़की से प्यार क्यों हुआ होगा। उसने गहरी साँस ली और कहा, “अच्छा, ठीक है। आप वेट कीजिए, मैं दूसरी नॉर्मल साड़ी लेकर आती हूँ।”

    इतना कहकर आराध्या जाने को हुई। अचानक वह रुकी और शिवांशा की तरफ पलटकर बोली, “आपको कुकिंग तो आती है ना? कहीं ऐसा ना हो कि फिर से आप कुछ बोलने में हिचकिचाएँ और हमारी रस्म अधूरी रह जाए।”

    “नहीं, ऐसा नहीं है। मुझे खाना बनाना आता है।” शिवांशा ने जवाब दिया।

    आराध्या ने उसकी बात पर हामी भरी और वहाँ से चली गई। अचानक वेद शिवांशा के सामने आ गया। वह पिलर के पीछे छुपकर उनकी बातें सुन रहा था।

    “झूठ बोलने में तो बहुत माहिर हो, बिल्कुल अपनी फैमिली की तरह।” वेद ने उस पर तंज कसते हुए कहा।

    “आपने कहा था कि किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि मैं कौन हूँ। ऐसे में अगर मैं सच बताती, तो आपके लिए प्रॉब्लम खड़ी हो सकती थी।” शिवांशा ने सफाई देते हुए कहा।

    “अच्छा, तो कुछ ही घंटों में तुम्हारी इतनी हिम्मत हो गई कि तुम मेरे सामने बिना डर के जवाब देने लगी? दूसरी बात, प्रॉब्लम मेरे लिए नहीं, तुम्हारे लिए खड़ी होने वाली है।” वेद ने उसे घूरते हुए कहा।

    शिवांशा अब चुप हो गई थी। उसका दिल कर रहा था कि वह वेद को कह दे कि वह उसे मार डाले या अपनी फैमिली को सब बता दे। इस तरह हर पल उसकी इंसल्ट सहने और पल-पल मरने से तो अच्छा ही था। शिवांशा और वेद कमरे के दरवाजे के पास खड़े बातें कर रहे थे। शिवांशा की नज़रें झुकी हुई थीं, तो वेद उसे एकटक देख रहा था।

    उन्हें साथ देखकर आराध्या तुरंत दूसरी तरफ पलट गई। वह बोली, “लगता है मैं गलत टाइम पर आ गई। ऐसा कीजिए, भाभी, आप यह साड़ी पहन लीजिए, और अगर आपको नहीं आता, तो आप भाई की हेल्प ले लीजिएगा।”

    “अरे, नहीं, ऐसा...” शिवांशा उसकी गलतफहमी दूर करना चाहती थी, लेकिन वेद ने तुरंत आँखों के इशारों से उसे चुप रहने को कहा।

    वेद ने बिल्कुल धीमी आवाज़ में कहा, “जाओ, जाकर साड़ी ले आओ।”

    शिवांशा ने चुपचाप, हर बार की तरह, उसकी बात मानी और आराध्या के पास गई। साड़ी लेकर वह वापस कमरे में आ गई थी।

    शिवांशा ने साड़ी को खोलकर देखा, तो इस बार आराध्या उसके लिए मैजेंटा पिंक कलर की बनारसी साड़ी लेकर आई थी। प्रॉब्लम यह थी कि शिवांशा को अभी भी साड़ी पहनना नहीं आता था। उसने वेद की तरफ देखा।

    “मेरी तरफ ऐसे मत देखो। मैं तुम्हारी किसी भी मामले में कोई हेल्प नहीं करने वाला।” वेद ने कंधे उचकाकर जवाब दिया।

    “अगर ऐसा था, तो आपने उन्हें जाने से रोका क्यों? वह मेरी हेल्प कर देती। अगर मैं टाइम से नहीं गई, तो वह फिर से मुझ पर गुस्सा करेंगे।” शिवांशा ने धीमी आवाज़ में जवाब दिया।

    “तुम्हें अभी भी समझ नहीं आया कि मैंने उसे क्यों भेजा था? मैं यही चाहता हूँ कि तुम्हारी प्रॉब्लम्स बढ़े। यह तो बस एक छोटी-सी प्रॉब्लम है। खुद ही निपटो और अगले 20 मिनट में नीचे पहुँच जाना।” वेद ने बेरुखी से कहा और फिर वहाँ से चला गया।

    वेद ऐसे ही हर थोड़ी-थोड़ी देर में आकर उसे कुछ ना कुछ कहकर टॉर्चर कर रहा था। फिलहाल शिवांशा के पास इतना टाइम नहीं था कि वह उसकी बातें सुनकर फिर से आँसू बहाए। उसने जल्दी से कपड़े लिए और बाथरूम में नहाने चली गई। शिवांशा ने जल्दी-जल्दी नहाकर ब्लाउज़ पहना, तो उसने नोटिस किया कि वह उसे लूज़ था। उसने जैसे-तैसे पिन लगाकर उसे फिक्स किया।

    एक तो वेद ने उसे 20 मिनट में नीचे जाने को कह दिया था, ऊपर से उसे साड़ी भी नहीं पहननी आती थी। शिवांशा ने जैसे-तैसे साड़ी को लपेटा और जल्दी से बाहर आई। वह सिंदूर तक लगाना भूल गई थी। उसने अभी भी गले में सिर्फ़ वेद का चेन और पेंडेंट पहना हुआ था, जो उसके मिड-चेस्ट तक आ रहा था। बिना किसी गहने, और उस उलझी साड़ी के साथ बालों को पीछे मैसी जुड़े में बांधने के बाद वो गिरने के डर से आड़े टेढ़े तरीके से चल रही थी।

    शिवांशा अपनी तरफ से तैयार होकर नीचे पहुँची, तो सब उसकी तरफ देख रहे थे। उसने चेहरे पर मेकअप के नाम पर कुछ भी नहीं लगाया था, ऊपर से जिस तरह उसने साड़ी को लपेटा था और बालों में मैसी बन बना रखा था, सब उसे अजीब नज़रों से घूर रहे थे। आसपास काम करने वाले हाउस हेल्पर्स के चेहरों पर भी मॉकिंग स्माइल थी।

    आराध्या ने उनके चेहरों को नोटिस किया, तो वह तेज़ और सख्त आवाज़ में बोली, “बस, बहुत हो गया। सब अपने काम पर ध्यान दीजिए।”

    फिर वह शिवांशा के पास आई और बोली, “लगता है वेद भैया को भी साड़ी बाँधनी नहीं आती।”

    “जी... जी, नहीं,” शिवांशा ने हड़बड़ाकर जवाब दिया, तो आराध्या हँसने लगी।

    “मेरे साथ चलिए, इससे पहले कि लोग आपको देखकर हँसने लगें।” आराध्या ने हँसकर कहा और फिर शिवांशा का हाथ पकड़कर उसे अपने कमरे में ले गई।

    आराध्या ने शिवांशा की साड़ी को सेट किया और उसके बालों को आगे से स्टाइल करके पीछे बन बना दिया, ताकि काम करते वक़्त बाल आगे न आएँ।

    “मेकअप करना चाहेंगी?” आराध्या ने पूछा, जिस पर शिवांशा ने ना में सिर हिला दिया।

    “थोड़ा करवा लीजिए, और अच्छी लगेंगी।” आराध्या ने उसे चेयर पर जबरदस्ती बैठाते हुए कहा।

    आराध्या के ज़्यादा इंसिस्ट करने पर शिवांशा ने पाउडर पिंक कलर की लिपस्टिक लगाई और चेहरे पर हल्का-फुल्का मेकअप करवा लिया।

    हालाँकि शिवांशा बिना किसी मेकअप के भी खूबसूरत लग रही थी, पर आराध्या नहीं चाहती थी कि किसी को भी यह बात करने का ज़रा-सा मौक़ा मिले कि चौहान खानदान की बड़ी बहू उनके क्लास के हिसाब से नहीं है।

    शिवांशा ने ऊपर से उसके दिए हुए गहने भी नहीं पहने थे। ना हाथ की चूड़ियाँ थीं, ना ही पैरों में पायल।

    आराध्या ने उसे चूड़ियाँ और पायल दी, तो अचानक शिवांशा के मुँह से निकला, “अरे, नहीं, मैं नहीं पहनूँगी। उन्हें अच्छा नहीं लगता, जब ये शोर करती हैं।”

    जब आराध्या उसकी बात सुनकर हँसने लगी, तो शिवांशा ने अपनी बात पर गौर किया। उसने तुरंत अपनी नज़रें नीचे कर लीं।

    आराध्या उसके पास आई और उसे परेशान करते हुए बोली, “कोई बात नहीं, मैं किसी से नहीं कहूँगी। अच्छा, और क्या नहीं पसंद है आपके उनको?”

    “हमें देर हो रही है ना? चलिए, चलते हैं।” शिवांशा ने उसे टालने के लिए कहा। उसका सवाल सुनकर उसके चेहरे पर हल्के मायूसी के भाव उभर आए थे, और वह मन ही मन बोली, “उन्हें तो मैं भी नहीं पसंद हूँ।”

    कुछ ही देर में आराध्या शिवांशा को लेकर किचन में पहुँच चुकी थी। नव्यांशी भी वहाँ आ गई थी। एक बार फिर उसकी नज़र शिवांशा के गले में पड़े चेन और लॉकेट पर गई। न जाने क्यों उसे वह शिवांशा के गले में खल रहा था।

    नव्यांशी उसके पास आई और बोली, “वैसे तो सब कुछ हो गया है। मीठा भी मैं बनवाने ही वाली थी। मुझे लगा आप आएँगी ही नहीं। अगर आपको खीर बनानी आती है, तो आप बना लीजिए, वरना रानी बना देगी। आप बस हाथ लगा दीजिएगा।”

    “नहीं, मैं बना लूँगी।” शिवांशा ने जवाब दिया।

    “ठीक है। फिर सारा सामान यहाँ पर रखा हुआ है। कोई आपकी हेल्प नहीं करेगा। इस बड़े वाले बाउल में हम सबके लिए ले आएँगी, और इस छोटे बाउल में वेद भैया के लिए अलग से सर्व कर दीजिएगा। आपको पता है ना उनके बारे में सब?” नव्यांशी ने सब कुछ समझाने के बाद पूछा। सबको यही लगता था कि वेद और शिवांशा की लव मैरिज हुई है, तो शिवांशा वेद के बारे में हर छोटी चीज़ जानती होगी।

    शिवांशा के पास जवाब में कुछ नहीं था, तो उसने हाँ में सिर हिला दिया। शिवांशा को लगा कि वेद को ड्राई फ्रूट्स वगैरह खाने कम पसंद होंगे। इस वजह से उसने वेद की खीर में कम ड्राई फ्रूट्स डालकर उसे अलग से सजाया। फिर उसने बची हुए खीर में ज्यादा ड्राई फ्रूट्स डाल दिए।

    उसने सबके लिए एक ही खीर बनाई थी और वह बनने के बाद उसे बाहर लेकर जा रही थी। शिवांशा नहीं जानती थी कि नव्यांशी का इशारा इस तरफ था कि वेद को डायबिटीज है, और शुगर उसके लिए जानलेवा साबित हो सकती है। इन सबसे अंजान शिवांशा वेद के लिए भी वही चीनी वाली खीर लेकर जा रही थी। डाइनिंग टेबल पर सब उसी के आने का इंतज़ार कर रहे थे।

    वेद की बीमारी से अनजान शिवांशा ने उसके सामने खीर का बाउल रखा। सब उसी के पहले खाने का इंतज़ार कर रहे थे। वेद को भी सब नॉर्मल दिखाना था, तो उसने बिना कुछ कहे खीर का एक बाइट लिया। तभी उसे समझ आ गया था कि शिवांशा ने कितनी बड़ी गलती कर दी है, चाहे वह अनजाने में की हो या जानबूझकर। लेकिन बात वेद की जान पर बन आई थी। एक निवाला खाते ही, वेद को अपनी तबियत में होने वाले बदलाव तुरंत महसूस होने लगे थे।

    °°°°°°°°°°°°°°°°

    लगता है, शिवांशा ज्यादा दिनों तक अपना सच छुपा नहीं पाएगी? चलिए पढ़कर समीक्षा कर दीजिएगा।

  • 11. His young little bride - Chapter 11

    Words: 2493

    Estimated Reading Time: 15 min

    शिवांशा को पहली रसोई की रस्म के लिए आराध्या ने तैयार किया और उसे किचन में ले गई। नव्यांशी ने उसे खीर बनाने को कहा। उसने पहले ही वेद के हिसाब से खीर को अलग बाउल में सर्व करने को बताया था। चौहान फैमिली को यही लगता था कि शिवांशा और वेद की लव मैरिज हुई है, तो शिवांशा वेद के बारे में सब कुछ जानती होगी।

    उनकी बातों से अनजान, शिवांशा ने वेद के लिए अलग से खीर तो परोसी, लेकिन उसमें कम ड्राई फ्रूट्स डाल दिए। उसके हिसाब से, वेद की अलग खीर वही थी, जिसमें कम ड्राई फ्रूट्स थे।

    इधर, शिवांशा खीर लेकर डायनिंग एरिया में पहुंची। उसे देखकर अक्षत और आराध्या ने हल्की-सी स्माइल दी और फिर इशारे से वेद के सामने खीर का बाउल रखने को कहा।

    वेद को टाइप टू डायबिटीज था, और वह शुगर पूरी तरह इग्नोर करता था, क्योंकि चीनी उसके लिए जानलेवा साबित हो सकती थी। जैसे ही वेद ने खीर का एक बाइट लिया, वह समझ गया कि उसमें चीनी डाली गई है।

    “क्या यह इसने जानबूझकर किया गया है?” वेद ने शिवांशा की तरफ देखकर मन ही मन कहा।

    एक चम्मच खाने पर ही वेद के माथे पर पसीने की बूंदें उभर आईं, और उसका हाथ हल्का-हल्का कांपने लगा। उसे अपनी आंखों के सामने सब कुछ हिलता हुआ नजर आने लगा, और उसकी दिल की धड़कने तेज हो गई।

    उन सबकी निगाहें वेद पर टिकी हुई थी, जो बाहर से बेहद शांत था, लेकिन अंदर ही अंदर काफी कुछ झेल रहा था। नव्यांशी ने वेद की हालत देखी, तो वह जल्दी से उसके पास आई। उसने वेद के सामने रखे बोल को उठाया, और फिर खीर का एक बाइट लिया। उसमें नॉर्मल से थोड़ी ज्यादा ही चीनी थी। जैसे ही उसे मिठास का एहसास हुआ, वह शिवांशा की तरफ पलटकर जोर से चिल्लाई, “यह क्या किया तुमने? मेरे भाई को मारना चाहती हो? मैंने तुम्हें बताया था कि उनके लिए अलग से खीर बनानी है, फिर तुमने उन्हें यह चीनी वाली खीर क्यों दी?”

    जैसे ही नव्यांशी ने चीनी वाली खीर का जिक्र किया, सब खड़े होकर वेद के पास आ गए। वहीं, शिवांशा को समझ नहीं आया कि उसने ऐसी क्या गलती कर दी, जिसके लिए नव्यांशी उस पर इतने गुस्से से चिल्लाने लगी। उसने एक नजर वेद की तरफ देखा, जो लगातार पानी पी रहा था।

    इस बीच अक्षत दौड़कर गया और फर्स्ट एड बॉक्स के साथ नीचे आया। उसने ग्लूकोमीटर से वेद का ब्लड शुगर चेक किया, जो बहुत हाई था। वंश ने जल्दी से दवाइयां लाकर दी।

    “भाई... भाई, फिक्र मत कीजिए, कुछ नहीं होगा। मैं डॉक्टर को कॉल करती हूं।” नव्यांशी ने कांपती आवाज में कहा और अपना मोबाइल निकाला। लेकिन वेद ने उसका हाथ पकड़कर ना में सिर हिला दिया।

    अपने मां-बाप को खोने के बाद, वेद ही उन सबके लिए सब कुछ था। जो भी देवराज ने किया, उसके बाद से उनके घर की सिक्योरिटी काफी हाई थी, और वेद की डायबिटीज को लेकर सब ओवर प्रोटेक्टिव थे। हर चीज का ध्यान रखते थे, लेकिन आज यह गलती शिवांशा से हुई थी।

    “मैं ठीक हो जाऊंगा।” वेद ने बिल्कुल धीमी आवाज में कहा।

    लगभग 20 मिनट बाद, जब अक्षत ने फिर से ब्लड शुगर चेक किया और वह थोड़ा कम हुआ, तो सबने राहत की सांस ली।

    जब वेद को थोड़ा बेहतर महसूस हुआ, उसने नव्यांशी की तरफ देखकर धीमी आवाज में कहा, “मेरा खाना रानी के हाथ मेरे रूम में भिजवा देना। और प्लीज, चेक करके भिजवाना।”

    “सॉरी भाई, हमारी तरफ से लापरवाही हुई, जो हमने गैर पर भरोसा किया।” नव्यांशी ने जवाब दिया। बातों-बातों में वह शिवांशा को ताना मार रही थी।

    शिवांशा कोने में खड़ी थी। उसकी आंखों में आंसू थे। उसने मन ही मन कहा, “मुझे सच में नहीं पता था कि इन्हें डायबिटीज है। अब ये यही सोचेंगे कि मैं उनकी जान लेने की कोशिश कर रही थी। मैं सपने में भी किसी के साथ बुरा करने के बारे में नहीं सोच सकती। कैसे समझाऊं सबको, मैने कुछ भी जानबूझकर नहीं किया।”

    नव्यांशी ने जिस तरह थोड़ी देर पहले उसे चिल्लाकर बात की थी, उससे साफ था कि यह उसके गुस्से का सिर्फ एक छोटा-सा ट्रेलर था।

    वेद के जाने के बाद, नव्यांशी खुद उनके कमरे में खाना लेकर पहुंची। वेद की हालत खराब देखकर उसकी जान निकल गई थी। कमरे में आते ही वह नम आंखों से वेद के गले लग गई।

    “आप ठीक हो ना, भाई?” नव्यांशी ने नजर उठाकर उसकी तरफ देखते हुए पूछा।

    वेद ने हां में सिर हिलाया और नव्यांशी से अलग होकर बोला, “मैं बिल्कुल ठीक हूं। तुमने खुद ग्लूकोमीटर में मेरा शुगर लेवल चेक किया था। अब परेशान होना बंद करो।”

    नव्यांशी ने हां में सिर हिलाया। वह काफी कुछ कहना चाहती थी, लेकिन वेद ने कहा, “मुझे थोड़ी देर अकेले रहना है। भूख लगी है, तो बाद में बात करते हैं।”

    नव्यांशी बिना कुछ बोले कमरे से बाहर चली गई। इधर, नीचे एक अलग ही तमाशा शुरू हो गया था। जैसे ही वेद और नव्यांशी वहां से हटे, वंश गुस्से में शिवांशा के सामने आया।

    “सच में, उन्होंने तुमसे शादी की है ना? तुम किसी भी हिसाब से हमारे क्लास की नहीं लगती। हम फिर भी डाइजेस्ट करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि भाई तुमसे प्यार करते हैं। लेकिन तुमने उनकी जान लेने की कोशिश की। सच में प्यार करती हो, या पैसों के चलते अपने से बड़ी उम्र के आदमी के साथ शादी कर ली?” वंश गुस्से में शिवांशा पर चिल्लाते हुए बोला।

    शिवांशा की आंखों में आंसू थे। उसने जल्दी से ना में सिर हिलाकर घबराते हुए कहा, “मुझे... मुझे सच में नहीं पता था। मेरा... मेरा यकीन कीजिए। मैं उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाना चाहती।”

    इतने में नव्यांशी भी नीचे आ गई। शिवांशा की बात सुनकर वह उस पर चिल्लाकर बोली, “अच्छा, तो तुम उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाना चाहती? और हम तुम्हारी बात पर यकीन क्यों करें? थोड़ी देर पहले तुमने ही उन्हें जहर से भरा प्याला पकड़ाया था। जानती भी हो कि उनके लिए चीनी कितनी खतरनाक है? कैसा प्यार है तुम्हारा, जो अपने पति के बारे में यह भी नहीं जानती कि कौन-सी चीज उनके लिए फायदेमंद है और कौन-सी जानलेवा?”

    “हम सब भाई के सामने कुछ बोल नहीं सकते। उनसे कुछ पूछकर उनका दिल नहीं दुखाना चाहते। लेकिन मुझे यह लड़की उनके लिए बिल्कुल भी परफेक्ट मैच नहीं लग रही। ऊपर से, आज इसने जो हरकत की, अगर इसकी जगह कोई और होता, तो आई स्वेयर मैं उसकी जान ले लेता।” वंश ने गुस्से में दांत पीसते हुए कहा।

    नव्यांशी भी उसका साथ देते हुए बोली, “प्रॉब्लम यही है ना कि भाई ने इससे शादी की है, तो हम कुछ बोल भी नहीं सकते।” इतना कहकर उसने शिवांशा की तरफ देखा और सख्त आवाज में पूछा, “अपनी फैमिली के बारे में बताओ। आखिर कहां से आई हो तुम, और कौन हो, जो अचानक चौहान खानदान की बहू बन गई? कहीं तुमने भाई को किसी चीज के लिए ब्लैकमेल तो नहीं किया? अगर ऐसा हुआ, तो सच में मैं तुम्हारी जान ले लूंगी।”

    शिवांशा नजर झुकाकर खड़ी थी। उसकी आंखों में आंसू थे। उसके पास उनके सवालों का कोई जवाब नहीं था। आराध्या उसके बचाव में आगे आना चाहती थी, लेकिन वंश के सामने वह कुछ नहीं कह सकती थी।

    आराध्या ने अक्षत की तरफ इशारा किया। अक्षत शिवांशा के पास आकर बोला, “प्लीज, रोना बंद कीजिए और आगे से ध्यान रखिएगा। जाइए, अपने कमरे में।”

    भले ही आराध्या के कहने पर अक्षत शिवांशा को फिलहाल प्रोटेक्ट कर रहा था, पर उसकी आवाज में सख्ती थी। वेद की तबीयत खराब देखकर आराध्या को भी शिवांशा पर बहुत गुस्सा आया था, लेकिन साथ ही जिस तरह वंश और नव्यांशी ने उसे सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया था, उसे उस पर दया भी आ रही थी।

    “यह क्या कर रहे हो? तुम इसे प्रोटेक्ट कर रहे हो? पता है ना, इसने थोड़ी देर पहले क्या किया? अगर इसे बचाने के लिए भाई ने वह पूरी खीर खा ली होती, तो आज उनके साथ कुछ भी हो सकता था। ये मैं सोच भी नहीं सकती।” नव्यांशी अक्षत पर गुस्सा करते हुए बोली।

    शिवांशा अभी भी वहां खड़ी थी। अक्षत और आराध्या जानते थे कि जितनी देर शिवांशा वहां रहेगी, वंश और नव्यांशी का गुस्सा उसी पर निकलेगा।

    अक्षत ने तेज आवाज में शिवांशा से कहा, “मैंने कहा, अपने कमरे में जाइए।”

    शिवांशा साड़ी में ठीक से चल नहीं पा रही थी। वह लड़खड़ाते हुए सीढ़ियों के पास गई और तेजी से सीढ़ियां चढ़कर ऊपर जाने लगी।

    शिवांशा के जाने के बाद, नव्यांशी ने गुस्से में कहा, “तुमसे बात करना ही बेकार है। भाई ने तुम्हें सिर पर चढ़ा रखा है।”

    “तुमसे तो कम ही सिर पर चढ़ाया है।” अक्षत ने आंखें घुमाकर कहा।

    “जो भी हो, तुम्हें उसे यहां से भेजना नहीं चाहिए था। यही टाइम था, जब हम इस शादी का सच पता लगा सकते थे। वरना भाई से कुछ पूछेंगे, तो उन्हें बुरा लगेगा।” वंश ने भी नाराजगी जताते हुए कहा।

    अक्षत ने गहरी सांस छोड़ी और बोला, “उससे यह सब अनजाने में हुआ है। हो सकता है, भाई ने अपनी बीमारी के बारे में उसे पहले न बताया हो, या उन दोनों की मुलाकात रिसेंटली ही हुई हो। देखा नहीं, वह किस तरह डर गई थी?”

    “अक्षत बिल्कुल ठीक कह रहा है। मुझे शिवांशा भाभी की आंखों में सच्चाई नजर आ रही थी।” आराध्या ने धीमी आवाज में कहा।

    उसके भी शिवांशा के पक्ष में बोलने पर वंश गुस्सा हो गया। वह चिढ़कर बोला, “ओ प्लीज, आराध्या, अब इस लड़की को हमारी भाभी बुलाना बंद करो। पहले मेरे दिल में उसके लिए रिस्पेक्ट थी, लेकिन आज उसने जो किया, उसके बाद मैं उस पर कभी यकीन नहीं कर पाऊंगा। वैसे भी, इस घर में धोखेबाज लोग छुप रहते हैं। मैं नहीं चाहता कि सालों पहले जो मां-पापा के साथ हुआ, वह भाई के साथ हो। मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगा, ना ही हम में से कोई और।”

    “यह हमारे दिल की हालत नहीं समझेगी। आखिर यह भी उसी की तरह दूसरे घर से आई है।” नव्यांशी ने ताना मारते हुए कहा और गुस्से में वहां से चली गई।

    वंश ने एक नजर आराध्या की तरफ देखा और अपने कमरे में चला गया। नव्यांशी की बात सुनकर आराध्या की आंखों में आंसू आ गए।

    अक्षत तुरंत उसके पास आया और उसे शांत करते हुए बोला, “प्लीज, मत रोइए। मैं नहीं चाहता कि मेरी पहली भाभी के बाद दूसरी भाभी भी रोना शुरू कर दे। यह दोनों हमेशा से गुस्से में दूसरों का दिल दुखाते हैं। पहले इन्होंने शिवांशा भाभी को रुला दिया, अब आपको।”

    “जो भी हो, लेकिन शिवांशा ने गलती तो की थी, अक्षत। भाई की हालत देखकर मैं भी डर गई थी। लेकिन गलती अनजाने में भी हो सकती है ना? अब तक नव्यांशी और वंश अपना गुस्सा दबाकर बैठे थे। शिवांशा की इस हरकत के बाद, वे खुलेआम उस पर अपना गुस्सा जाहिर करेंगे।” आराध्या ने सुबकते हुए कहा।

    “तो फिर हम किस लिए हैं? हम उन्हें बचाएंगे।” अक्षत ने मुस्कुराकर कहा और आराध्या को भी स्माइल करने का इशारा किया।

    डायनिंग टेबल पर माहौल खराब होने के बाद किसी ने खाना तक नहीं खाया। यहां तक कि शिवांशा की बनाई खीर भी बाहर फेंक दी गई।

    वहीं, शिवांशा ऊपर पहुंची, तो उसे वेद के कमरे में जाने से डर लग रहा था। वह जानती थी कि भले ही गलती अनजाने में हुई हो, लेकिन उसे इसकी सजा जरूर मिलेगी। जब वेद के भाई-बहन उसके साथ ऐसा बर्ताव कर रहे थे, तो वेद, जो उसकी सच्चाई जानता था, उसे यही लगेगा कि उसे वेद को मारने के लिए भेजा गया है।

    शिवांशा की खुशकिस्मती थी कि उस फ्लोर पर लोग ज्यादा नहीं आते थे। वह कमरे में जाने के बजाय दूसरी तरफ बनी बालकनी में चली गई और कोने में दुबककर बैठ गई। उसे बहुत भूख लगी थी, और उसने पिछले दो दिन से कुछ नहीं खाया था।

    रोते हुए शिवांशा ने ऊपर आसमान की तरफ देखा। आसमान बिल्कुल काला था—न तारे टिमटिमा रहे थे, न चांद नजर आ रहा था, बस बादल छाए हुए थे।

    उसे यह काला आसमान अपनी जिंदगी की तरह लग रहा था, जहां अंधेरे के सिवा कुछ नहीं था।

    “समझ नहीं आ रहा कि कौन-सी जिंदगी अच्छी थी? वह, जहां हर पल अपनी इज्जत जाने का खतरा रहता था, या यह, जहां हर पल शक भरी नजरों से देखा जाता है। इससे अच्छा मैं मर ही जाती। अगर मुझे मारना है, तो अभी मार दे। मुझे डर लग रहा है, मम्मी-पापा।” शिवांशा रोते हुए बोली और खुद को अपनी बाहों में समेटकर हग कर लिया।

    जब भी वह अकेला महसूस करती थी, वह ऐसे ही खुद को अपनी बाहों में समेट लेती थी। कोई उसका दर्द बांटने वाला नहीं था।

    शिवांशा ऐसे ही बैठी रही, और कुछ देर में उसकी आंख लग गई। नींद में भी उसे मनन की धीमी आवाज सुनाई दे रही थी। जब भी वह ऐसे ही खुद को समेटकर सोती थी, मनन उसके पास आकर कहता था, “शिवि, रोना बंद करो। मैंने कहा ना, मैं अब बड़ा हो रहा हूं, तो मैं तुम्हें सबसे प्रोटेक्ट करूंगा।”

    उसकी मासूमियत देखकर शिवांशा मुस्कुरा देती थी। मनन, जिसे खुद प्रोटेक्शन और केयर की जरूरत थी, वह उसका ध्यान रखने की बात करता था। उसका मासूम दिल देखकर उसे बहुत खुशी मिलती थी, लेकिन आज तो मनन भी उसके साथ नहीं था।

    वहीं, वेद कमरे में अकेला कब से शिवांशा के आने का इंतजार कर रहा था। शिवांशा की हरकत ने उसे शक के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया था। वह यही जानना चाहता था कि क्या यह सब उसने जानबूझकर किया था। रात के लगभग दो बजने को आए थे, और शिवांशा अभी तक कमरे में नहीं आई थी। वेद को उसकी फिक्र सताने लगी। वह कमरे से बाहर निकला और शिवांशा को ढूंढने लगा।

    नीचे शिवांशा कहीं नहीं थी, और बाकी लोग सोने जा चुके थे। वह वापस अपने फ्लोर पर पहुंचा, तो घूमते हुए उसे बालकनी के गेट के पास शिवांशा की साड़ी का पल्लू दिखाई दिया। वह जल्दी से अंदर गया, तो शिवांशा वहां खुद में सिमटी हुई सो रही थी। उसके चेहरे पर आंसुओं के धब्बे बने हुए थे।

    उसका मासूम चेहरा देखकर वेद एक पल के लिए रुक गया। फिर उसे उठाने के लिए जैसे ही वेद ने उसे हाथ लगाया, हल्के से टच करते ही शिवांशा जल्दी से उठी और जोर से चिल्लाकर बोली, “नहीं, प्लीज, हाथ मत लगाना!”

    यह दूसरी बार था, जब नींद में वेद ने शिवांशा को उठाने की कोशिश की, और वह इसी तरह डरकर उठी। वेद हैरानी से उसकी तरफ देख रहा था, जबकि शिवांशा नींद से जागने के बाद जल्दी से खड़ी हो गई। वेद को अपने सामने देखकर उसे डर लग रहा था कि न जाने उसकी गलती की सजा वह उसे क्या देगा।

    °°°°°°°°°°°°°°°°

    क्या वेद की नफरत पर कभी शिवांशा की मासूमियत हावी हो पाएगी? क्या लगता है, वेद का क्या रिएक्शन होगा? वो इन सबके लिए उसे जिम्मेदार ठहराएगा, या सच का पता लगाने की कोशिश करेगा। पढ़कर समीक्षा कर दीजिएगा, एंड प्लीज मेरे कैरेक्टर्स को गिफ्ट देकर उनकी रैंक इम्प्रूव कीजिए। फ्री गिफ्ट आपको रोज लाइब्रेरी से मिल जायेगे।

  • 12. His young little bride - Chapter 12

    Words: 0

    Estimated Reading Time: 0 min