यह कहानी फोर्सफुल मैरिज और बदले की है। वो मारता पीटता फिर जबरदस्ती इंटीमेट होता एक भाई की गलती की सज़ा उसकी मासूम बहन को मिलती है। और वही बहन, एक ताक़तवर आदमी की ज़िद और जुनून का शिकार बन जाती है। हीरो का नाम है नागेन्द्र सिंह राठौड़।... यह कहानी फोर्सफुल मैरिज और बदले की है। वो मारता पीटता फिर जबरदस्ती इंटीमेट होता एक भाई की गलती की सज़ा उसकी मासूम बहन को मिलती है। और वही बहन, एक ताक़तवर आदमी की ज़िद और जुनून का शिकार बन जाती है। हीरो का नाम है नागेन्द्र सिंह राठौड़। शहर का सबसे बड़ा बिलियनेयर बिज़नेसमैन। उसके पास दौलत, ताक़त और इतना खौफ़ है कि कोई उसकी बात टाल नहीं सकता। पर उसके दिल में सिर्फ़ आग जलती है—उस आग की, जो उसकी बहन की मौत और उसके परिवार की तबाही ने उसे दी थी। उसकी बहन को धोखा देने वाला कोई और नहीं, बल्कि यामी का बड़ा भाई था। और तभी नागेन्द्र ने कसम खाई थी कि अब वह उस धोखे का बदला उसी घर की बेटी से लेगा। हीरोइन का नाम है यामी मेहता। सिर्फ़ 19 साल की मासूम लड़की। एक कॉलेज गर्ल, जो फैशन डिज़ाइनिंग पढ़ रही थी, सपनों और उम्मीदों से भरी हुई। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि उसका भाई जो गुनाह कर चुका है, उसकी सज़ा अब उसे चुकानी पड़ेगी। उसकी मासूमियत और उसकी हँसी नागेन्द्र के लिए सिर्फ़ एक खेल बन गई। नागेन्द्र ने उसे जबरदस्ती अपने नाम से बाँध लिया। उसके लिए यह शादी कोई रिश्ता नहीं थी, बल्कि कैद और सज़ा थी। वह दिन में उसे ताने देता, अपमान करता, उसके आँसुओं का मज़ाक उड़ाता। और रात को अपने हक़ का दावा करके उसे तोड़ता। यह शादी यामी के लिए किसी नर्क से कम नहीं थी। लेकिन यामी सिर्फ़ रोने और टूटने के लिए पैदा नहीं हुई थी। उसके भीतर धीरे-धीरे हिम्मत और हौसला पनप रहा था। वह जानती थी कि नागेन्द्र ने उसे उसके भाई के गुनाहों की वजह से सज़ा दी है। पर उसके मन की गहराई में यह भी अहसास था कि अगर उसने हार मान ली, तो उसकी ज़िंदगी सच में नष्ट हो जाएगी। यह कहानी है नागेन्द्र और यामी की। एक तरफ़ नागेन्द्र का ज़िद्दी और बेरहम बदला, और दूसरी तरफ़ यामी की टूटी हुई मगर न हारने वाली आत्मा। क्या यह रिश्ता हमेशा नफ़रत और दर्द में डूबा रहेगा? या एक दिन यामी इस कैद से निकलकर अपनी सच्चाई और अपने हक़ के लिए लड़ पाएगी?
Page 1 of 1
कमरा अँधेरे में डूबा हुआ था। बाहर से आती हल्की पीली रोशनी खिड़की की सलाख़ों से होकर फ़र्श पर पड़ रही थी। हवा में भारीपन था—जैसे कोई तूफ़ान भीतर ही भीतर उठने वाला हो।
वह लड़की को खींचता हुआ कमरे में लाया। उसकी कलाई इतनी कसकर पकड़ रखी थी कि जैसे लोहे की जकड़ हो। लड़की बार-बार छुड़ाने की कोशिश करती रही, मगर उसकी ताक़त के सामने बेबस थी।
“छोड़ो मुझे…!” उसकी आवाज़ कांपी।
उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस दरवाज़ा ज़ोर से बंद किया और उसे दीवार से धक्का देकर टकरा दिया। उसका सिर हल्के से दीवार से लगा और वह दर्द से कराह उठी। आँखों से आँसू झरने लगे।
उसने उसके दोनों हाथ पकड़कर ऊपर की तरफ़ दबा दिए। उसकी साँसें तेज़ हो गईं।
“तुम सोचती हो भाग पाओगी मुझसे?” उसकी आवाज़ ठंडी और भारी थी।
वह काँप रही थी। उसका सीना तेज़ी से उठ-गिर रहा था।
अचानक उसने उसका गाल पकड़कर चेहरा अपनी तरफ़ घुमा लिया। उसकी उँगलियाँ इतनी कसकर धंसी थीं कि चेहरा लाल पड़ गया।
“देखो मेरी आँखों में!” उसने गरजकर कहा।
वह डर के मारे आँखें बंद करने लगी, मगर उसने झटके से उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। दर्द से उसकी चीख़ निकल गई।
“मत छुओ मुझे… प्लीज़…” वह रो पड़ी।
लेकिन उसकी विनती उसके कानों तक पहुँची ही नहीं। उसने उसका चेहरा और करीब ला दिया। उसकी साँसें उसके चेहरे पर उतर रही थीं। लड़की ने चेहरा मोड़ने की कोशिश की, मगर उसने ठोड़ी पकड़कर ज़बरदस्ती उसका चेहरा अपनी तरफ़ किया।
उसके होठ उसकी त्वचा को छूकर निकल गए। वह सिहर उठी। डर से उसका पूरा बदन कांप गया। उसने जितनी भी कोशिश की, उसका शरीर उस कैद से छूट न सका।
उसने उसके हाथों को और कसकर दीवार पर दबा दिया और उसके करीब झुक आया। उसके सीने से टकराती उसकी साँसें और नज़दीकी उसे घुटन देने लगीं।
उसकी आँखों से आँसू बहते रहे। वह लगातार विरोध करती रही, पाँव मारती रही, मगर उसकी पकड़ और भी सख़्त होती चली गई।
अचानक उसने उसके गाल पर थप्पड़ मारा। उसकी चीख़ गूँज गई कमरे में। वह हिल गई। चेहरा जलने लगा, मगर उसने हिम्मत करके फिर धक्का देने की कोशिश की।
“तुम्हारा ये विरोध मुझे और भड़काता है,” उसने उसके कान के पास झुककर कहा। उसकी आवाज़ ठंडी लेकिन ज़हरीली थी।
उसने उसे बिस्तर की तरफ़ धकेल दिया। वह गिरते-गिरते सँभली, मगर उसने तुरंत उसके ऊपर झुककर फिर पकड़ लिया। उसके बालों को खींचा, उसकी कलाई को इतनी ज़ोर से मरोड़ा कि उसकी आँखों से दर्द के आँसू बह निकले।
वह कराह उठी—“मत करो… प्लीज़…”
लेकिन उसकी आँखों में जैसे कोई दया बाकी ही नहीं थी। वह उसके करीब झुकता चला गया। उसके होठ उसके चेहरे को छूते गए, उसकी गर्दन को पकड़कर उसने और पास खींच लिया। लड़की पूरी ताक़त से धक्का देने लगी, मगर उसकी कोशिशें नाकाम होती रहीं।
उसका शरीर जैसे उसके बंधन में कैद हो गया था।
हर बार जब उसने विरोध किया, उसने और भी ज़ोर से पकड़ा। कभी कलाई कसकर दबाई, कभी कंधों को जोर से पकड़ा, कभी बाल खींचे। हर हरकत में दर्द था और साथ ही जबरदस्ती की नज़दीकी।
उसके चेहरे पर अब सिर्फ आँसू थे। आँखों में डर और असहायता साफ़ झलक रही थी। मगर उसके भीतर कहीं एक चिंगारी थी—कि यह सब सहने के बाद भी वह टूटी नहीं है।
वह उसके बेहद करीब आकर बोला, “याद रखना, चाहे तुम कितना भी विरोध करो… तुम मेरी हो और मेरी ही रहोगी।”
उसने आँखें कसकर बंद कर लीं। दिल में दर्द था, आत्मा रो रही थी। मगर उसके भीतर कहीं एक आवाज़ कह रही थी—ये लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है…
कमरा उस रात उसकी चीख़ों, उसके आँसुओं और उसके विरोध का गवाह बना रहा।
नागेन्द्र की उँगलियाँ यामी की कलाई पर और कस गईं।
उसकी आवाज़ भारी और ठंडी थी—
“चाहे जितना भी छटपटाओ, यामी… तुम मुझसे बच नहीं सकती।”
यामी काँप रही थी, होंठ काँप रहे थे, आँसू गालों पर बह रहे थे। उसने विरोध में खुद को छुड़ाने की कोशिश की, मगर नागेन्द्र ने उसे ज़बरदस्ती दीवार से दबा दिया।
अगले ही पल उसके होंठ जबरदस्ती यामी के होंठों पर उतर आए।
वह तड़प उठी, कराह निकली, मगर आवाज़ वहीं दब गई।
नागेन्द्र की आँखों में अजीब-सा पागलपन था।
यामी की आँखों में बेबसी और टूटन।
उसका विरोध, उसके आँसू, उसकी कराह… सब नागेन्द्र की ज़िद और दीवानगी के सामने बेअसर होते जा रहे थे।
जब उसने आखिरकार छोड़ा, यामी की साँसें टूटी-टूटी बाहर निकलीं।
मगर राहत का एक पल भी न देकर नागेन्द्र ने फिर उसे खींचकर अपने करीब कर लिया—
“याद रखो… जितना भी रो लो, जितना भी लड़ लो… मैं तुम्हें नहीं छोड़ूँगा।”
यामी की आँखें बंद हो गईं। आँसुओं के पीछे से एक आवाज़ उसके भीतर गूँज रही थी—
एक दिन यही ज़ुल्म, यही दीवानगी उसका अंत बनेगी।
यामी की आँखें आँसुओं से भीगी थीं। वह हाँफ रही थी, टूटी हुई थी। लेकिन नागेन्द्र के चेहरे पर ठंडी सख़्ती थी। उसकी आँखों में वह चमक थी जो सिर्फ़ बदले से पैदा होती है।
उसने यामी का चेहरा अपनी ओर मोड़ा और कहा—
“जानती हो, तुम क्यों यहाँ हो? क्यों मैं तुम्हें ऐसे बाँधकर रखे हुए हूँ?”
यामी काँपती आवाज़ में बोली—
“मैंने… मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, नागेन्द्र? तुम ऐसा क्यों कर रहे हो मेरे साथ?”
नागेन्द्र की हँसी ठंडी और कड़वी थी।
“तुम्हारा कसूर सीधा है, यामी। तुम्हारे भाई ने मेरी बहन की ज़िंदगी तबाह की थी। और अब उसका हिसाब तुम दोगी।”
यामी की साँसें रुक-सी गईं। उसने अविश्वास से उसकी ओर देखा।
“भाई? क्या… क्या कह रहे हो तुम? कौन-सी बात कर रहे हो?”
नागेन्द्र की आँखें पल भर को अंधेरी हो गईं। उसकी आवाज़ और गहरी हो गई।
“तुम्हारे उस प्यारे भाई ने… मेरी बहन को प्यार के नाम पर धोखा दिया। उसने उसे सपने दिखाए, कसमे खाईं, और फिर छोड़ दिया। और जानते हो यामी, उस धोखे का नतीजा क्या हुआ?”
यामी की आँखों से आँसू और तेज़ बह निकले। वह काँपते हुए बोली—
“नहीं… यह सच नहीं हो सकता…”
नागेन्द्र ने उसकी बात बीच में ही काट दी—
“सच यही है। मेरी बहन ने उस धोखे को सहन नहीं किया। उसने ज़िंदगी खत्म करने की कोशिश की। और जब वह अस्पताल में तड़प रही थी, तब मेरी आँखों के सामने उसका सबकुछ टूट रहा था। मैं कुछ कर नहीं पाया। और उसी सदमे में मेरे पिता भी चले गए। उनका दिल टूट गया था। मेरी माँ ने भी जीने की वजह खो दी। पूरा घर उजड़ गया। और इस सबका गुनहगार कौन था? तुम्हारा भाई।”
यामी ने सिसकते हुए सिर झुका लिया।
“लेकिन… मैं? मैंने तो कुछ नहीं किया…”
नागेन्द्र ने ज़ोर से कहा—
“हाँ, तुमने सीधे तौर पर कुछ नहीं किया। लेकिन उस धोखे की सज़ा मैं तुम्हें दूँगा। क्योंकि जिस दर्द से मेरी बहन और मेरे पिता गुज़रे हैं, वही दर्द अब तुम महसूस करोगी। तुम्हारे भाई ने हमें जीते जी मार दिया… और अब तुमसे मैं हिसाब लूँगा।”
यामी ने काँपते हुए कहा—
“ये… ये न्याय नहीं है, नागेन्द्र। यह तो और अन्याय है। अगर भाई ने गलती की, तो उसकी सज़ा मैं क्यों भुगतूँ? मैं तो उसकी बहन हूँ… उसकी परछाई नहीं।”
नागेन्द्र की आँखों में पागलपन की चमक थी।
“परछाई ही सही, मगर दर्द वही से आएगा। तुम्हें देखकर मुझे तुम्हारे भाई की याद आती है। तुम्हारा चेहरा, तुम्हारी मासूमियत… सब मुझे उस आदमी के धोखे की याद दिलाता है। तुम्हारे भाई ने मेरी बहन की आँखों से आख़िरी आँसू गिराए थे। अब वही आँसू मैं तुम्हारी आँखों से देखना चाहता हूँ, बार-बार। जब तक तुम टूट न जाओ।”
यामी ने गहरी साँस ली। उसकी आवाज़ काँप रही थी, मगर भीतर से एक दृढ़ता भी निकल रही थी।
“तुम जितना चाहे मुझे तोड़ लो, नागेन्द्र। आँसू बहवा लो। मुझे कैद कर लो। लेकिन सुन लो… मैं तुम्हें माफ़ नहीं करूँगी। और एक दिन… एक दिन मैं तुम्हें वही दर्द दूँगी जिसकी तुम हक़दार हो।”
नागेन्द्र ने ठंडी मुस्कान दी।
“माफ़ी? माफ़ी की बात मत करो, यामी। अब तो मुझे सिर्फ़ बदला चाहिए। तुम्हारा भाई मेरे हाथ नहीं आया। वरना आज उसकी साँसें मैं अपने पैरों तले रौंद चुका होता। लेकिन किस्मत ने तुम्हें मेरे सामने ला दिया। और अब… तुम्हीं मेरी सज़ा हो। तुम्हारी हर धड़कन मेरे गुस्से का बोझ उठाएगी।”
यामी की आँखों से आँसू बहते रहे। उसने धीरे से कहा—
“तुम्हारे भीतर का यह गुस्सा, यह पागलपन… यह तुम्हें भी जला देगा, नागेन्द्र। मेरी आत्मा टूटेगी, लेकिन तुम्हारा मन भी कभी चैन नहीं पाएगा।”
नागेन्द्र पल भर के लिए खामोश हो गया। उसकी साँसें भारी थीं। फिर उसने धीरे से कहा—
“चैन? मेरे लिए चैन नाम की चीज़ कब की मर चुकी है, यामी। जिस दिन मेरी बहन की आँखें बंद हुई थीं, उसी दिन मेरा चैन, मेरा सुकून, सब चला गया। अब बस बदला बचा है। और बदला तुम हो।”
यामी ने गुस्से और दर्द से भरी आवाज़ में कहा—
“तो फिर सुन लो नागेन्द्र… मैं तुम्हारे भाई की गुनहगार नहीं हूँ। अगर तुम समझते हो कि मुझे तोड़कर तुम्हें सुकून मिलेगा, तो ये तुम्हारी सबसे बड़ी भूल है। तुम मुझे तोड़ सकते हो, मगर मेरे भीतर की सच्चाई को नहीं। और एक दिन वही सच्चाई तुम्हें गिरा देगी।”
नागेन्द्र की आँखों में एक अजीब-सी चमक आई।
“तुम्हारा विरोध… तुम्हारे आँसू… यही तो मैं चाहता हूँ, यामी। यही मेरी जीत है। जितना तुम लड़ोगी, उतना ही मैं तुम्हें और दबाऊँगा। क्योंकि हर आँसू मुझे मेरी बहन की याद दिलाता है… और हर चीख़ मुझे मेरे पिता की आख़िरी साँस।”
यामी ने सिर झुका लिया। उसका पूरा शरीर थरथरा रहा था। मगर भीतर से उसने खुद से कहा—
“हाँ, आज मैं टूटी हूँ। आज मैं कैद हूँ। लेकिन मैं सिर्फ़ शिकार नहीं बनूँगी। एक दिन यही आँसू मेरी ताक़त बनेंगे। और उस दिन नागेन्द्र को मेरी खामोशी से डर लगेगा।”
नागेन्द्र ने यामी की ठोड़ी पकड़कर ऊपर उठाई।
उसकी उँगलियों की पकड़ इतनी मज़बूत थी कि यामी के होंठ काँप रहे थे।
नागेन्द्र धीमे मगर सख़्त लहजे में बोला—
“अब और मत छटपटाओ… जितना भागोगी, उतना ही मैं तुम्हें अपने क़रीब खींचूँगा।”
यामी ने काँपते हुए सिर झटक दिया।
“नहीं… मुझे छोड़ दो, नागेन्द्र। तुम्हारा हक़ नहीं है मुझ पर।”
नागेन्द्र की आँखों में अजीब-सा पागलपन था।
“हक़? मैं हक़ नहीं ढूँढ रहा, यामी। मैं हिसाब ले रहा हूँ। तुम्हारे भाई ने मेरी बहन से जो छीना, अब मैं तुमसे छीनूँगा।”
यामी की आँखें फैल गईं।
“ये पागलपन है! अगर भाई ने ग़लती की भी थी, तो उसकी सज़ा मैं क्यों दूँ? मैं उसका गुनाह नहीं हूँ!”
नागेन्द्र झुककर उसके बेहद क़रीब आ गया।
उसकी साँसें यामी की साँसों से टकरा रही थीं।
“तुम गुनाह नहीं हो… लेकिन गुनाह की याद हो। और मैं चाहता हूँ कि हर बार जब तुम टूटो, हर बार जब तुम कराहो… मुझे मेरी बहन की चीख़ सुनाई दे। तभी मेरा बदला पूरा होगा।”
यामी ने ज़ोर से उसे धक्का दिया, मगर नागेन्द्र ने उसकी कलाई कसकर पकड़ ली और दीवार से दबा दिया।
“मुझे मत छुओ!” उसकी आवाज़ टूटी और काँपती हुई थी।
नागेन्द्र के होंठ उसके कान के पास झुके।
“तुम्हारा ‘मत छुओ’ कहना ही मुझे और छूने पर मजबूर करता है। तुम्हारे आँसू मुझे रोकते नहीं… उकसाते हैं।”
यामी रोते हुए बोली—
“तुम्हें इंसानियत का ज़रा भी एहसास नहीं है?”
नागेन्द्र हँस पड़ा।
“इंसानियत? मेरी इंसानियत उस दिन मर गई थी, जब मेरी बहन अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी थी और तुम्हारा भाई हँसता हुआ कहीं और नई ज़िंदगी बसा रहा था।”
यामी ने काँपते हुए सिर हिलाया।
“झूठ! सब झूठ! मेरा भाई ऐसा नहीं कर सकता। उसने धोखा नहीं दिया होगा।”
नागेन्द्र का चेहरा कस गया।
“मेरे सामने अपनी सफ़ाई मत दो। मुझे सच्चाई पता है। और सच्चाई ये है कि तुम्हारे भाई ने मेरी बहन की ज़िंदगी तबाह की। अब वही तबाही तुम्हारे हिस्से आएगी।”
उसने यामी का चेहरा पकड़कर अपने करीब खींचा।
यामी तड़प उठी।
“छोड़ो! पागल हो तुम… राक्षस हो!”
नागेन्द्र की पकड़ और मज़बूत हो गई।
“हाँ, राक्षस ही सही। अगर राक्षस बनकर मुझे सुकून मिलेगा, तो मैं वही बनूँगा।”
यामी की आँखों से आँसू बह रहे थे।
“तुम्हें सुकून कभी नहीं मिलेगा। चाहे जितना भी ज़ोर लगा लो, चाहे जितना भी मुझे तोड़ लो… तुम्हारी आत्मा हमेशा जलती रहेगी।”
नागेन्द्र एक पल को ठिठक गया, फिर ज़ोर से हँसा।
“तुम्हारी आत्मा? उसे भी मैं रौंद दूँगा। तुम्हारे आँसू, तुम्हारे विरोध, तुम्हारी कराह… सब मेरी जीत होगी।”
यामी काँपते हुए बोली—
“नहीं! मैं तुम्हें जीतने नहीं दूँगी। मेरे आँसू तुम्हारी जीत नहीं, मेरी ताक़त होंगे। और याद रखना, नागेन्द्र… यही आँसू एक दिन तुम्हें डुबो देंगे।”
नागेन्द्र ने उसकी कलाई छोड़कर उसके चेहरे को कसकर पकड़ लिया।
“तुम्हें डर है न? डर ही तुम्हारी सज़ा है। तुम जितना कहोगी ‘नहीं’, मैं उतना ही ‘हाँ’ करूँगा। यही मेरा बदला है।”
यामी ने ज़ोर से कहा—
“अगर यही तुम्हारा बदला है, तो सुन लो… मैं टूटूँगी नहीं। चाहे तुम हज़ार बार कोशिश करो, मैं अपने भीतर की आग बुझने नहीं दूँगी।”
नागेन्द्र की आँखों में एक अजीब चमक उभरी।
“तो फिर मैं उस आग को ही राख बना दूँगा।”
उसने यामी को और करीब खींच लिया।
यामी ने पूरी ताक़त से उसे धक्का देने की कोशिश की।
“मुझे मत छुओ, नागेन्द्र! यह तुम्हारा बदला नहीं, तुम्हारा पाप है!”
नागेन्द्र की साँसें भारी हो गईं।
“पाप? अगर ये पाप है, तो मैं हर दिन करूँगा। क्योंकि तुम्हारे आँसू देखकर मुझे मेरी बहन की याद आती है। और मैं चाहता हूँ कि तुम उसी तरह तड़पो, जैसे वो तड़पी थी।”
यामी ने आँसुओं से भीगी आवाज़ में कहा—
“तुम्हारी बहन निर्दोष थी, मैं भी निर्दोष हूँ। लेकिन तुम निर्दोषों को ही कुचल रहे हो। तुम कभी चैन नहीं पा सकोगे।”
नागेन्द्र कुछ पल चुप रहा।
उसकी पकड़ ढीली नहीं हुई, लेकिन आँखों में एक परछाईं-सी झलकी।
फिर वह बोला—
“चैन मेरे लिए मर चुका है। अब बस बदला है। और बदला तुम हो।”
यामी ने गहरी साँस ली। उसकी आँखों में आँसू थे, मगर शब्दों में हिम्मत थी।
“तो सुन लो, नागेन्द्र… मैं तुम्हें बदला लेने नहीं दूँगी। तुम मुझे कैद कर सकते हो, दबा सकते हो, ज़बरदस्ती कर सकते हो… लेकिन मेरे भीतर की सच्चाई और आत्मा कभी तुम्हारे सामने झुकेगी नहीं।”
नागेन्द्र ने ठंडी मुस्कान दी।
“देखते हैं, यामी। तुम्हारी ज़िद बड़ी प्यारी है। जितनी तुम लड़ोगी… उतना ही मज़ा आएगा तुम्हें तोड़ने में।”
यामी ने काँपते हुए मगर दृढ़ आवाज़ में कहा—
“और मैं जितना टूटूँगी… उतना ही मज़बूत होकर उठूँगी।”
नागेन्द्र उसकी आँखों में देखता रह गया।
पल भर के लिए उसके चेहरे पर सख़्ती और पागलपन के बीच एक झिझक-सी आई, मगर अगले ही पल उसने फिर यामी को अपने क़रीब खींच लिया।
उसकी आवाज़ भारी थी—
“तुम्हें तोड़ना ही मेरी ज़िंदगी का मक़सद है। और जब तक मैं तुम्हें पूरी तरह से रौंद न दूँ… मैं रुकूँगा नहीं।”
यामी ने आँखें बंद कर लीं।
“रौंद लो… लेकिन याद रखना, तुम्हारी जीत भी एक दिन तुम्हारा सबसे बड़ा हार बनेगी।”
कमरा बंद था।
चारों ओर एक ऐसा सन्नाटा पसरा था जैसे दीवारें भी अपनी साँसें रोककर खड़ी हों। हवा भारी हो चुकी थी और भीतर जलता हुआ दिया काँपते-से उजाले के साथ हर कोने में डर की परछाइयाँ बिखेर रहा था।
यामी की आँखें डरी हुई थीं। उसके दिल की धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि खुद उसे लग रहा था मानो छाती फट जाएगी। उसने दरवाज़े की ओर देखा, एक उम्मीद के साथ कि कोई आएगा, कोई बचा लेगा। मगर वहाँ सिर्फ़ अंधेरा था।
तभी नागेन्द्र ने कदम बढ़ाए। उसका हाथ एक बक्से पर गया और वहाँ से उसने इंजेक्शन निकाला। चमचमाती सुई को देखकर यामी के शरीर में सिहरन दौड़ गई। वह काँपते हुए बोली—
“क…कृपया मत करो…”
लेकिन उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि नागेन्द्र के चेहरे पर बस एक ठंडी हँसी आई। उसने बेरहमी से उसकी गर्दन पकड़ ली और बिना एक पल रुके इंजेक्शन चुभा दिया।
यामी चीख पड़ी। उसकी आँखें भर आईं, साँसें टूटने लगीं। गर्दन पर जलन हुई, और अगले ही पल उसका शरीर भारी होने लगा। नशे की लहर ने उसके हाथ-पाँव की ताक़त खींच ली।
नागेन्द्र ने इंजेक्शन फेंका और धीमे कदमों से उसकी तरफ़ बढ़ा। यामी पीछे हटना चाहती थी, लेकिन पाँव जैसे ज़मीन में धँस गए हों।
“तुम… ऐसा क्यों कर रहे हो…” उसने हाँफते हुए कहा।
पर उसके शब्द अधूरे ही रह गए, क्योंकि नागेन्द्र झटके से उसके क़रीब आया और उसे बाँहों में जकड़ लिया।
उसके बाद सब कुछ तेज़ी से हुआ। यामी ने विरोध किया, हाथ मारे, धक्का दिया… लेकिन उसकी बाँहें कमजोर हो चुकी थीं।
नागेन्द्र ने उसे ज़बरदस्ती चूमा। उसके होंठ काँप उठे, आँसू बह निकले, मगर उसकी पकड़ ढीली नहीं हुई।
यामी कराह उठी। उसके भीतर एक ही सवाल गूंज रहा था—क्यों?
लेकिन नागेन्द्र सुनना ही नहीं चाहता था। उसके लिए यह बस अपनी ताक़त साबित करने का पल था।
और फिर… वह यामी के साथ फिजिकल हुआ।
यामी ने जितना विरोध कर सकती थी किया, मगर नशा उसकी नसों में उतर चुका था। उसके हाथ ढीले पड़ते गए, उसकी आवाज़ दबती चली गई।
कमरे की दीवारों ने सब देखा, लेकिन किसी ने कुछ कहा नहीं। यामी की आँखों से आँसू लगातार बहते रहे, और नागेन्द्र बार-बार उसे अपने क़ब्ज़े में लेता रहा।
वह पूरी रात उसके साथ इंटीमेट होता रहा।
हर बार यामी की आत्मा थोड़ी और टूटती रही।
वह चाहकर भी “ना” नहीं कह पाई। नशे और थकान ने उसे पंगु बना दिया था। उसकी हर सिसकी नागेन्द्र की बेरहमी में खो जाती थी।
उसकी देह पर उसका शिकंजा कसता गया। हर बार जब यामी ने नज़रें फेरनी चाहीं, नागेन्द्र ने उसका चेहरा पकड़कर उसे मजबूर किया कि उसकी आँखों में देखे। और उसकी आँखें… उन आँखों में कोई नरमी नहीं थी, सिर्फ़ क्रूरता थी।
रात बीतती रही।
पल-पल भारी होता गया।
यामी के लिए यह रात सबसे लंबी थी।
वह चाहती थी यह सब एक बुरा सपना हो, लेकिन हर स्पर्श, हर बेरहम पकड़ यह साबित कर रही थी कि यह उसकी सच्चाई है।
वह टूटी जा रही थी।
आत्मा की गहराई तक लहूलुहान।
और नागेन्द्र… वह रुकता नहीं था। वह बार-बार उसी पर अपनी जीत जताता रहा।
पूरी रात वह यामी के साथ इंटीमेट होता रहा।
बेरहमी से, जैसे कोई शिकारी अपने शिकार के साथ खेल रहा हो।
सुबह का उजाला खिड़की की सलाखों से भीतर आया।
यामी बिस्तर पर पड़ी थी। उसकी आँखें आधी खुली थीं, लेकिन उनमें अब कोई चमक नहीं थी। उसके होंठ सूजे हुए थे, गालों पर आँसुओं की लकीरें जम चुकी थीं। गर्दन पर इंजेक्शन का निशान अब भी जल रहा था।
उसकी साँसें बहुत धीमी थीं।
नागेन्द्र पास खड़ा था। उसके चेहरे पर कोई पछतावा नहीं था। बस एक ठंडी संतुष्टि थी, जैसे उसने अपनी ज़िद पूरी कर ली हो।
यामी ने टूटी हुई आवाज़ में कहा—
“तुमने… क्यों किया ये सब…?”
लेकिन वह आवाज़ इतनी धीमी थी कि नागेन्द्र तक पहुँची भी या नहीं, कहना मुश्किल था।
उसका मन अब भी उसी सवाल पर अटका था—
क्यों?
क्यों उसके भाइ ने कुछ भी किया जिसकी सजा उसे मिल रही थी, वो क्यों पता नहीं लगाया कि ऑफिस में जिस “प्यारी लड़की” की उसने बात की थी, वह दरअसल नागेन्द्र की बहन होगी?
यामी की आँखें फिर से भर आईं।
उसका दिल बेतहाशा रो रहा था।
नागेन्द्र अब भी उसे देख रहा था। लेकिन यामी के लिए वह अब कोई इंसान नहीं, बस एक अजनबी था—एक बेरहम अजनबी जिसने उसकी दुनिया की रौशनी छीन ली थी।
उसकी आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं। उसके भीतर की सारी ताक़त खत्म हो चुकी थी।
यह रात उसकी ज़िंदगी से सब कुछ छीन ले गई थी—
उसकी मासूमियत, उसकी हँसी, उसका विश्वास।
अब बस बची थी उसकी टूटी हुई आत्मा…
और उस आत्मा की खामोश चीखें, जिन्हें कोई सुन नहीं पाएगा।
अध्याय – टूटी हुई भोर
कमरे की खिड़की से झाँकती हल्की नीली रोशनी बता रही थी कि रात अब ढल चुकी थी। घड़ी की सुइयाँ धीरे-धीरे सुबह चार बजे का वक्त बता रही थीं।
लेकिन इस कमरे के भीतर ऐसा लग रहा था जैसे समय ठहर गया हो।
बिस्तर के एक कोने में यामी पड़ी थी—अधमरी-सी। उसकी आँखें आधी खुली थीं, मगर उनमें कोई चमक नहीं थी। चेहरा सूजा हुआ, होंठ फटे हुए, और बदन पर न जाने कितने निशान। चादर से ढका उसका शरीर काँप रहा था। वह चाहती थी आँखें बंद कर ले, ताकि कुछ भी न देखना पड़े… मगर नींद उससे कोसों दूर थी।
वह बार-बार रात की तस्वीरें याद कर रही थी—हर पल, हर बेरहम स्पर्श, हर चीख। और हर बार उसकी आत्मा सिहर उठती थी। आँसू बहते-बहते सूख चुके थे, अब बस आँखों के कोनों में जमी सफेद परतें बची थीं।
उसकी साँसें भारी थीं।
हर साँस उसे ऐसा एहसास करा रही थी कि उसका शरीर अब उसका नहीं रहा।
उसकी निगाहें दरवाज़े की ओर टिक गईं। वहाँ खड़ा था नागेन्द्र। वह अपने बिखरे कपड़े समेट रहा था। एक-एक करके उसने कमीज़ पहनी, बटन लगाए, बेल्ट कस ली। उसकी हर हरकत में अजीब-सी ठंडक थी—जैसे रातभर की क्रूरता उसके लिए बस एक खेल रही हो।
यामी ने खुद को बिस्तर पर समेट लिया और काँपते हुए चादर अपने ऊपर कसकर खींच ली। उसके लिए यह चादर ही अब ढाल थी—उसके टूटे हुए शरीर को दुनिया से छिपाने की आखिरी कोशिश।
नागेन्द्र ने एक बार उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में कोई ग्लानि नहीं थी, कोई पश्चाताप नहीं। बस वही जीत का अहंकार।
कमरे में सन्नाटा पसरा था। बाहर सुबह की ठंडी हवा खिड़की से भीतर आ रही थी, लेकिन यामी को उसमें भी सुकून नहीं मिल रहा था।
तभी नागेन्द्र का मोबाइल फोन बज उठा।
उसने जेब से निकालकर कॉल रिसीव किया।
“हाँ…” उसकी भारी आवाज़ कमरे में गूँजी।
कुछ देर तक वह सुनता रहा।
फिर धीरे-धीरे बोला—“ठीक है… मैं निकल रहा हूँ। मामला ज़रूरी है| जल्दी आ रहा हूँ”
उसके चेहरे पर गंभीरता थी, लेकिन अंदर कहीं कोई हड़बड़ाहट नहीं थी। जैसे उसके लिए यह सब सामान्य हो।
कॉल खत्म करते ही उसने जैकेट उठाई और पहन ली। फिर कदम बढ़ाकर दरवाज़े तक पहुँचा।
यामी का दिल धड़क उठा। वह चाहती थी चिल्ला उठे, रो पड़े, उसे रोक ले और पूछे—क्यों? लेकिन उसके होंठों से कोई आवाज़ नहीं निकली। उसके भीतर अब इतना साहस ही नहीं बचा था।
नागेन्द्र ने दरवाज़ा खोला। बाहर अंधेरे में एक नौकर खड़ा था—पुराना, थका-सा आदमी, जिसकी आँखों में हमेशा डर रहता था।
नागेन्द्र ने उसकी तरफ़ देखा और धीमी मगर ख़ौफ़नाक आवाज़ में कहा—
“सुनो… यह लड़की किसी भी हाल में यहाँ से बाहर नहीं निकलनी चाहिए। अगर निकली… तो समझ लेना, सबसे पहले तुम्हें मेरी गोलियों का शिकार बनना पड़ेगा।”
नौकर काँप उठा। उसने जल्दी-जल्दी सिर हिलाकर हामी भरी।
“जी मालिक… वो कहीं नहीं जाएगी… मैं देख लूँगा।”
नागेन्द्र ने उसे एक ठंडी नज़र से देखा, फिर आगे बढ़ गया।
सीढ़ियों से नीचे उतरते उसके जूते की आवाज़ पत्थर की फर्श पर गूँज रही थी। बाहर आकर उसने ड्राइवर को इशारा किया। काली कार उसके सामने खड़ी थी।
वह पिछली सीट पर बैठा और दरवाज़ा बंद कर लिया।
इंजन स्टार्ट होते ही गाड़ी की घरघराहट ने सुबह की खामोशी तोड़ दी।
कार धीरे-धीरे हवेली के मुख्य फाटक से बाहर निकल गई।
धुंधली सुबह की हवा में उसकी लाल रौशनी दूर तक दिखाई देती रही, जब तक कि वह पूरी तरह गायब नहीं हो गई।
कमरे में अब सिर्फ़ यामी और उसकी टूटी हुई साँसें बची थीं।
वह बिस्तर पर लेटी थी, शरीर चादर में लिपटा हुआ। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था, होंठ सूख गए थे। उसके दिल में सिर्फ़ एक सवाल गूंज रहा था—क्या यही उसकी ज़िंदगी है?
उसने आँखें बंद कीं, मगर हर बार वही रात याद आ जाती। उसकी चीखें, उसका विरोध, उसकी बेबसी। और हर याद उसके भीतर नश्तर की तरह चुभ जाती।
उसने चादर कसकर अपने चेहरे तक खींच ली।
जैसे वह दुनिया से खुद को छिपाना चाहती हो।
बाहर सुबह का उजाला पूरी तरह फैल चुका था।
पक्षियों की आवाज़ें गूँजने लगी थीं।
लेकिन इस कमरे के भीतर अंधेरा अब भी वैसा ही था।
यामी जानती थी—अब उसकी ज़िंदगी कभी पहले जैसी नहीं होगी।
अध्याय – बंद दरवाज़ों के भीतर
हवेली के कमरे में सन्नाटा पसरा हुआ था।
भोर की रौशनी खिड़की से भीतर उतर आई थी, मगर कमरे के कोनों में अब भी अँधेरा जमा हुआ था।
यामी बिस्तर पर पड़ी थी—चादर में लिपटी, टूटी और बेहाल। उसकी साँसें धीमी हो चुकी थीं। बदन बुख़ार की तरह तप रहा था। आँखें खुली थीं पर उनमें बेहोशी उतर आई थी।
पिछली रात की बेरहमी, पिछले दो दिन की भूख—सब मिलकर उसकी हड्डियों तक को थका चुके थे। होंठों पर पपड़ी जम गई थी, गला सूख चुका था। वह चाहकर भी उठ नहीं पा रही थी।
धीरे-धीरे उसका सिर एक ओर लुढ़क गया और शरीर बिस्तर पर निढाल गिर पड़ा। उसके होंठों से बस एक हल्की-सी सिसकी निकली और फिर वह गहरी बेहोशी में चली गई।
कमरे के बाहर वही बूढ़ा नौकर था। नागेन्द्र ने जो आदेश दिया था, उसकी गूँज अब भी उसके कानों में थी—
“लड़की बाहर न निकले… और अभी उसे खाने को कुछ मत देना।”
नौकर अपने डर और मालिक की परछाई से दबा हुआ था। हवेली के बाकी कामों में वह उलझा रहा। झाड़ू, बर्तन, आँगन की सफाई—सब कुछ।
किसी ने सोचा भी नहीं कि उस कमरे में एक ज़िंदा इंसान पड़ा है, जिसे पिछले दो दिन से अन्न का एक दाना तक नसीब नहीं हुआ।
कमरे में घड़ी की टिक-टिक गूँजती रही।
समय आगे बढ़ रहा था, लेकिन यामी की ज़िंदगी वहीं थमी हुई थी।
इधर, हवेली से मीलों दूर नागेन्द्र की काली कार धुएँ की लकीर छोड़ती हुई शहर की ओर बढ़ रही थी।
कुछ देर बाद कार एक बड़े लेकिन सलीकेदार घर के सामने आकर रुकी।
यह कोई विशाल हवेली नहीं थी, पर उतना बड़ा और भव्य ज़रूर था कि लोगों की नज़र रुक जाए। सफ़ेद दीवारों पर सुनहरा पेंट झिलमिला रहा था। सामने छोटे-छोटे बगीचे में तरह-तरह के गुलाब खिले थे—लाल, गुलाबी, पीले और नीले। चारों तरफ़ उनकी ख़ुशबू फैली हुई थी।
गेट से भीतर प्रवेश करते ही ऐसा लगा जैसे हवा भी सुगंध से भर गई हो।
नागेन्द्र ने कार से उतरकर चारों ओर देखा। उसकी आँखों में एक पल के लिए हैरानी झलक गई।
गुलाबों के इतने गुच्छे, इतनी सजीव सुंदरता उसने शायद ही कहीं और देखी हो।
और फिर…
उसकी नज़र उस आँगन के बीच खड़ी एक लड़की पर पड़ी।
वह लड़की हल्की हवा में खड़ी थी, जैसे फूलों के बीच कोई स्वप्न साकार हो गया हो।
उसने जॉर्जेट की साड़ी पहन रखी थी—रंग ऐसा, जैसे आसमान में ढलती शाम की हल्की बैंगनी आभा। कपड़े की महीन परत उसके तन से लिपटी थी और हर हवा के झोंके के साथ हल्का-हल्का लहराती जा रही थी।
उसके बाल खुले थे—काले, घने और रेशमी, जो कंधों से होते हुए कमर तक गिर रहे थे। हर झोंके के साथ वे उड़ते और चेहरे पर आकर अटक जाते, मानो उसकी सुंदरता को और बढ़ाने के लिए ही प्रकृति ने उन्हें भेजा हो।
चेहरा बेहद नाज़ुक था—गोरे रंग पर हल्की गुलाबी आभा। नाक छोटी और तीखी, होंठ गहरे गुलाबी। बड़ी-बड़ी आँखें, जिनमें एक अजीब-सी मासूमियत और रहस्य दोनों झलकते थे।
वह फूलों के बीच खड़ी थी, हाथों में पानी की छोटी-सी बाल्टी पकड़े, जैसे गुलाबों को सींच रही हो।
सूरज की हल्की किरणें उसके चेहरे पर पड़ रही थीं, और उसमें से झिलमिल करती चमक निकल रही थी।
नागेन्द्र का दिल एक पल के लिए थम गया।
उसकी ठंडी, निर्दयी आँखें जैसे पहली बार किसी अनजानी रौशनी से छू गईं।
वह वहीं खड़ा रह गया—जैसे किसी स्वर्ग से उतरी अप्सरा को देख रहा हो।
उसके भीतर की सारी ठंडक, सारा अहंकार उस पल ठहर-सा गया।
वह लड़की बिल्कुल साधारण नहीं थी।
उसकी आभा में कुछ ऐसा था जो नागेन्द्र जैसे पत्थर-से आदमी को भी रोक ले।
वह उसे देखता रहा… बिना पलक झपकाए।
जैसे समय वहीं रुक गया हो।
उसके मन में अजीब-सी हलचल उठी।
कहीं यह लड़की उसकी अधूरी दुनिया में कोई नया रंग तो नहीं भर देगी?
कार का दरवाज़ा अब भी खुला था, हवा फूलों की ख़ुशबू लिए बह रही थी।
और नागेन्द्र… अपने जीवन में पहली बार किसी को यूँ अपलक देख रहा था।
अध्याय यहीं थम जाता है—
उस नज़र पर, उस ठहरे हुए पल पर।
अध्याय – आईने के सामने
बगीचे में खिले गुलाबों के बीच खड़े नागेन्द्र की आँखें उस लड़की पर टिक चुकी थीं।
वह जैसे किसी अलग ही लोक से उतरी हुई थी। उसकी आभा, उसकी नर्म-सी मुस्कान, और उसकी मासूम आँखों ने नागेन्द्र के भीतर हलचल मचा दी थी।
कुछ क्षण तक वह बस उसे देखता रहा।
फिर जैसे उसके होंठों से खुद-ब-खुद एक नाम निकल पड़ा—
“मिताली…”
लड़की ने पलटकर उसकी ओर देखा। उसके चेहरे पर आश्चर्य नहीं, बल्कि एक अपनापन झलक रहा था, मानो वह उसे लंबे समय से जानती हो।
“आख़िर आ ही गए…” मिताली ने धीमे स्वर में कहा।
नागेन्द्र कुछ कहना चाहता था, मगर शब्द उसके गले में अटक गए।
उसके भीतर का निर्दयी चेहरा जैसे इस पल कहीं पीछे छूट गया हो।
मिताली ने बिना समय गंवाए आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया।
उसकी उँगलियाँ नरम और गर्म थीं, और उनका स्पर्श नागेन्द्र को भीतर तक छू गया।
“चलो, मेरे साथ।”
वह उसे खींचते हुए घर के भीतर ले गई।
नागेन्द्र चुपचाप उसके पीछे चलता रहा।
घर का अंदरूनी हिस्सा फूलों की ख़ुशबू और हल्के रंगों से सजा था। दीवारों पर हल्की क्रीम पेंटिंग, फर्श पर सजीव कालीनें, और कोनों में रखे छोटे-छोटे शोपीस—सब कुछ ऐसा था, जैसा नागेन्द्र ने अपने अंधेरे, ठंडे कमरों में कभी नहीं देखा था।
मिताली ने उसे सीधे एक बड़े कमरे में ले जाकर रोक दिया।
कमरे की एक दीवार पर विशाल आईना टँगा हुआ था।
वह नागेन्द्र को वहाँ खड़ा करती है और खुद उसके ठीक सामने आ खड़ी होती है।
“देखो ज़रा खुद को…” मिताली ने हल्के डाँटने वाले अंदाज़ में कहा।
नागेन्द्र ने आईने में देखा।
चेहरा थका हुआ, बाल बिखरे और अस्त-व्यस्त। आँखों के नीचे हल्के काले घेरे। उसकी शर्ट भी सलवटों से भरी हुई थी।
“यह क्या हाल बना रखा है तुमने?”
मिताली ने भौंहें चढ़ाते हुए कहा।
“बाल देखो ज़रा… न जाने कितने दिनों से सही से सँवारे तक नहीं।”
वह आगे बढ़ी और उसके माथे पर गिरे बालों को उँगलियों से ठीक किया।
फिर हल्के से मुस्कराकर बोली—
“तुम्हें पता है, कल मैं पूरे दिन तुम्हारा इंतज़ार करती रही। और तुम आए ही नहीं। अब आए हो, तो इस हालत में… जैसे नहाना-धोना तुम्हें आता ही नहीं।”
उसके स्वर में शिकायत थी, मगर उसमें छिपा अपनापन नागेन्द्र को चुप करवा देता था।
नागेन्द्र कुछ कहना चाहता था—
“मैं…”
लेकिन उससे पहले ही मिताली ने उसकी बात काट दी—
“चुप रहो। मुझे पता है, तुम बहाने बनाओगे। लेकिन बहानों से काम नहीं चलेगा।”
वह उसके करीब आई और उसकी शर्ट के कॉलर को ठीक करने लगी।
“देखो, यह बटन ठीक से लगाना भी भूल गए… सच में, तुम पर ध्यान देना पड़ेगा।”
नागेन्द्र उसकी आँखों में देखता रहा।
उसकी उँगलियों का हल्का-सा स्पर्श, उसकी मासूम झुंझलाहट… यह सब उसके भीतर कोई अनकही कसक जगा रहे थे।
“अब जाओ, पहले नहा-धोकर फ्रेश हो जाओ। मैंने तुम्हारे लिए कपड़े रख दिए हैं।”
उसने बगल के सोफ़े पर पड़े एक सेट की ओर इशारा किया—एक सजीव सफ़ेद शर्ट और गहरे नीले रंग की ट्राउज़र्स।
नागेन्द्र बिना कुछ कहे उस कमरे से बाथरूम की ओर बढ़ गया।
कुछ देर बाद जब वह लौटा, तो बिल्कुल अलग दिख रहा था।
उसके चेहरे से थकान जैसे उतर चुकी थी। बाल सँवरे हुए, शर्ट करीने से पहनी हुई, और चाल में वही पुराना आत्मविश्वास लौट आया था।
मिताली ने उसकी ओर देखा और हल्के से मुस्करा दी।
“अब ठीक लग रहे हो। पहले तो लग रहा था जैसे किसी लड़ाई से लौटे हो।”
नागेन्द्र ने पहली बार मुस्कराने की कोशिश की, लेकिन वह मुस्कान पूरी नहीं हो पाई।
मिताली ने अलमारी से एक गिलास निकाला और उसमें ताज़ा संतरे का जूस भरकर लाई।
“लो, यह पियो। तुम्हें ताक़त की ज़रूरत है।”
उसने गिलास नागेन्द्र के हाथ में थमाया।
नागेन्द्र ने धीरे-धीरे घूँट भरा। जूस की ठंडक उसके गले से उतरती चली गई, जैसे भीतर के जलते खालीपन को शांत कर रही हो।
मिताली उसकी ओर देखती रही—
“अब ठीक है। वैसे, अगली बार बिना बताए मत ग़ायब होना। समझे?”
नागेन्द्र ने गिलास मेज़ पर रखा और उसकी आँखों में देखने लगा।
लेकिन इस बार भी उसके होंठ कुछ कहने से पहले ही रुक गए।
कमरे में अब सिर्फ़ फूलों की ख़ुशबू, ताज़ा जूस की ठंडक और उस अधूरे संवाद की खामोशी थी।
नागेन्द्र के मौन और मिताली की सख़्त मगर कोमल देखभाल