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Shatranj the game of blood

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Md Zafar

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शतरंज - द गेम ऑफ ब्लड ​एक ऐसी रात जब खुशियाँ मातम में बदल गईं... एक ऐसा जन्मदिन, जिसने जिंदगी की कहानी ही बदल दी। ​सान्वी राजपूत की दुनिया रोशनी और प्यार से भरी थी। उसके वकील पिता, राजीव सिंह राजपूत, अपनी बेटी के 18वें जन्मदिन की खुशियों में डूबे...

Total Chapters (7)

Page 1 of 1

  • 1. Shatranj the game of blood - Chapter 1

    Words: 1514

    Estimated Reading Time: 10 min

    अध्याय 1: आग और आँसू

    ​सुबह की पहली किरण, खिड़की से छनकर, रेशमी चादर की तरह बिस्तर पर सोई हुई सांवी राजपूत के चेहरे पर पड़ रही थी। उसकी आँखें बंद थीं, लंबी पलकें किसी शांत झील की तरह दिख रही थीं। काले, घने बाल उसके कंधे और तकिए पर बिखरे हुए थे, और गुलाबी होंठों पर हल्की सी मुस्कान थी। वह आज अठारह साल की हो रही थी, और उसका चेहरा किसी देवी की तरह निर्मल और सुंदर था।

    ​तभी, कमरे का दरवाज़ा धीरे से खुला और उसकी माँ, देवयानी राजपूत, अंदर आईं। उनके चेहरे पर एक कोमल मुस्कान थी।

    ​"सांवी, बेटी… उठ जाओ," देवयानी ने प्यार से उसके माथे पर हाथ फेरा। "आज तुम्हारा जन्मदिन है, और तुम अभी तक सो रही हो?"

    ​सांवी ने करवट ली और अपनी माँ की आवाज़ सुनकर मुस्कुरा दी। "बस पाँच मिनट और, माँ।"

    ​"नहीं, मेरी राजकुमारी," देवयानी ने कहा, "आज का दिन बहुत खास है। तुम्हारे पापा और आरव भैया तुम्हारे लिए कुछ खास लेकर आए हैं।"

    ​आरव, सांवी का बड़ा भाई, जो खुद भी कानून की पढ़ाई कर रहा था, अपने पिता राजीव सिंह राजपूत की तरह एक वकील बनना चाहता था। राजीव, एक ऐसे वकील थे, जिनका नाम ईमानदारी और न्याय के लिए पूरे शहर में मशहूर था।

    ​सांवी तुरंत उठी और अपनी माँ को गले लगा लिया। "मैं जानती हूँ, माँ, आज का दिन सबसे अच्छा होगा।"

    ​लेकिन सांवी और उसका परिवार इस बात से अनजान था कि आज का दिन उनके लिए एक भयानक तूफान लेकर आने वाला था। राजीव ने हाल ही में एक बहुत ही संवेदनशील केस लिया था – शहर के सबसे प्रभावशाली मंत्री के बेटे, रोहन माथुर, के खिलाफ एक बलात्कार का मामला।

    ​शाम को, पूरा घर रोशनी से जगमगा रहा था। हॉल में गुब्बारे और रंग-बिरंगी सजावट थी। अन्या, सांवी की आठ साल की छोटी बहन, खुशी से चारों तरफ भाग रही थी।

    ​"सांवी दीदी, जल्दी आओ! केक कट करना है," अन्या ने चिल्लाया।

    ​सांवी अपनी नई ड्रेस में बेहद खूबसूरत लग रही थी। उसका चेहरा खुशी से चमक रहा था। केवल परिवार के सदस्य ही जन्मदिन मना रहे थे। सब मिलकर तालियाँ बजा रहे थे और "हैप्पी बर्थडे टू यू" गा रहे थे।

    ​जब सांवी ने केक काटने के लिए चाकू उठाया, तभी दरवाज़े की घंटी बजी। सबने एक-दूसरे की तरफ देखा। देवयानी दरवाज़ा खोलने गईं।

    ​जैसे ही उन्होंने दरवाज़ा खोला, सामने का नज़ारा देख उनकी आँखें डर से फैल गईं। दरवाज़े पर रोहन माथुर, वही क्रूर और घमंडी लड़का, अपने दो गुंडों के साथ खड़ा था। उसके चेहरे पर एक दुष्ट मुस्कान थी।

    ​"अरे, ये तो वकील साहब का घर है," रोहन ने व्यंग्य से कहा। "लगता है यहाँ कोई पार्टी चल रही है।"

    ​देवयानी पीछे हट गईं। राजीव तुरंत वहाँ आए। "तुम यहाँ क्या कर रहे हो?" उन्होंने सख्त आवाज़ में पूछा।

    ​"वकील साहब," रोहन ने कहा, "आपको पता है मैं यहाँ क्यों आया हूँ। उस लड़की का केस वापस ले लो।"

    ​"मैं सच्चाई का सौदा नहीं करता," राजीव ने जवाब दिया। "तुमने जो किया है, उसकी सज़ा तुम्हें ज़रूर मिलेगी।"

    ​रोहन की आँखें लाल हो गईं। "तुम अपनी बेटी का जन्मदिन मना रहे हो, और मैं तुम्हें तुम्हारे परिवार के साथ मौत दे रहा हूँ।"

    ​अगले ही पल, रोहन ने बंदूक निकाली और राजीव पर गोली चला दी। देवयानी ने चिल्लाते हुए उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन दूसरी गोली उनके सीने में लगी। आरव ने रोहन पर झपटने की कोशिश की, लेकिन तीसरी गोली ने उसे वहीं गिरा दिया। अन्या, जो यह सब देख रही थी, डर के मारे कोने में छिप गई थी, लेकिन रोहन ने उसे भी नहीं बख्शा। उसने अन्या के साथ बहुत बुरी तरीके से रेप किया वह रोती रही चिल्लाती रही संवि उसे बचाने की कोशिश करती रही पर स्वामी को गुंडे लोग पकड़े हुए थे। और जब अन्य अधमरी हालत में पहुंच गई तो रोहन ने उसे भी गोली मार दी और हंस कर बोला संवि से अब तेरी भी यही हालत होगी और उसे घसीटते हुए अपनी गाड़ी में बैठा लिया संवि चिल्लाती रही कि मुझे अपने पापा के पास जाने दो पर रोहन और उनके साथ ही लोग हंसते रहें और उसे एक सुनसान जंगल में लेकर पहुंच गए।

    जब वह लोग जंगल पहुंचे वह संवि को घसीटते हुए जंगल के बीचो-बीच लेकर गए। और उसे जमीन पर धकेल दिया संवि रोती रही कि मुझे यहां से जाने दो मुझे छोड़ दो पर रोहन लोग और उसके साथ ही लोग हंसते रहे और कहीं कि तू तो बड़ी अच्छी माल है। तेरे बाप ने एक लड़की का रेप केस लिया था अब देख उसकी दोनों बेटियों के साथ हम लोगों भी इस लड़की के तरह हालात करेंगे हम ।

    ​सांवी की आंखों से आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

    ​रोहन ने सांवी की तरफ देख कर एक क्रूर मुस्कान दी। "तुम्हारे पिता ने बहुत बहादुरी दिखाई, लेकिन अब देखो वह कहां है।

    ​ और बीच में हीजंगल ही में सब लोगों ने संवि का रेप किया। संवि रोती रही चिल्लाती रही कि मुझे छोड़ दो मुझे जाने दो पर उन लोगों के दिल में जरा सा भी रहम नहीं आया।

    ​"तुम्हारे परिवार ने मेरे रास्ते में आने की कोशिश की," रोहन ने हँसते हुए कहा। "अब तुम भी उनकी तरह खत्म हो जाओगी।"

    ​ तभी रोहन ने एक पेट्रोल का डिब्बा निकाला और सांवी के शरीर पर डाल दिया। "तुम जिंदा जलोगी, और कोई तुम्हारी मदद नहीं कर पाएगा।"

    ​उसने लाइटर जलाया और सांवी के शरीर पर फेंक दिया। आग की लपटें तुरंत सांवी के शरीर को निगलने लगीं। सांवी ने दर्द से चीखा, लेकिन कोई उसकी मदद के लिए नहीं था। और फिर रोहन और उसके साथ ही लोग संवि को वहीं छोड़कर चले गए संवि चिल्लाती रही सिखाती रही उसके दिल में जीने की चाहत थी। हुआ जीना चाहती थी और अपने परिवार की मौत कब बदला लेना चाहती थी उसके बाप का और उसका पूरा सल्तनत डूबा कर।

    ​अचानक, आसमान में काले बादल छा गए और तेज़ बारिश शुरू हो गई। बारिश की बूंदों ने आग की लपटों को धीरे-धीरे बुझा दिया, लेकिन तब तक सांवी का शरीर पूरी तरह से जल चुका था। उसकी त्वचा झुलस गई थी, लेकिन उसके चेहरे को कोई आंच नहीं आई थी।

    ​जब जंगल के आदिवासियों ने उसे उस हालत में देखा, तो वे डर गए, लेकिन फिर उन्होंने हिम्मत करके उसे उठाया और अस्पताल ले गए। सांवी को महीनों तक कोमा में रखा गया। जब वह होश में आई, तो उसकी आँखों में आंसू नहीं थे, बल्कि बदले की आग जल रही थी।

    ​उसे अपने परिवार की हत्या और अपने साथ हुई हैवानियत का हर पल याद था। उसका सुंदर शरीर अब जले हुए घावों से भरा हुआ था, लेकिन उसकी आत्मा अब और भी मजबूत हो गई थी। वह अब वह प्यारी, मासूम सांवी नहीं थी। वह अब एक ऐसी लड़की थी, जो अपने परिवार की मौत का बदला लेने के लिए कुछ भी कर सकती थी।

    ​Aariv राज सिंह शेखावत, एक ऐसा नाम जिसे सुनते ही बड़े-बड़े अपराधी भी कांप जाते हैं। वह सिर्फ एक इंसान नहीं, बल्कि एक चलती-फिरती मौत है। उसके पास न तो कोई परिवार है और न ही कोई पहचान। बचपन से ही सड़कों पर पला-बढ़ा, उसने गरीबी और अत्याचार को करीब से देखा था। यही कारण है कि उसके दिल में कोई दया नहीं बची थी।


    वह अंडरवर्ल्ड का सबसे बड़ा माफिया है। लोग उसे 'शैडो किंग' के नाम से जानते हैं। वह सुपारी लेकर हत्याएं करता है। उसके लिए किसी की जान लेना उतना ही आसान है, जितना साँस लेना। वह नशीली दवाओं और हथियारों का सबसे बड़ा डीलर है। वह खुद अपनी फैक्ट्री में हथियार बनाता है और उन्हें दुनिया भर में बेचता है।


    उसकी आँखें गहरी और खाली हैं, जैसे उनमें कोई भावना न हो। उसके चेहरे पर हमेशा एक अजीब सी शांति होती है, जो उसके अंदर के तूफान को छुपाती है। वह बहुत कम बोलता है, लेकिन जब बोलता है तो उसकी आवाज़ किसी धारदार तलवार की तरह होती है। आर्यन सिर्फ पैसे और ताकत के लिए जीता है, और जो कोई भी उसके रास्ते में आता है, वह उसे खत्म कर देता है। उसके लिए, दुनिया एक खेल का मैदान है, और वह इस खेल का सबसे खतरनाक खिलाड़ी है।


    सांवी के साथ जो कुछ हुआ, उसके बाद क्या आपको लगता है कि वह रोहन से बदला ले पाएगी? क्या बदले का रास्ता उसके लिए सही होगा या गलत?

    ​नमस्ते, मेरे प्यारे पाठकों!

    ​मैं आप सभी से यह कहना चाहती हूँ कि यह कहानी मैंने बहुत मेहनत और प्यार से लिखी है। मैं उम्मीद करती हूँ कि आप इसे पसंद कर रहे होंगे। आपकी पसंद ही मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा है।

    ​अगर आपको यह कहानी अच्छी लग रही है, तो कृपया इसे लाइक, शेयर और फॉलो करके मेरा हौसला बढ़ाएँ।

    ​आप सभी के लिए एक और खुशखबरी है! इस कहानी को मैंने अपने YouTube चैनल Nk Kousar audio story पर एक ऑडियोबुक के रूप में भी अपलोड किया है। आप वहाँ जाकर इसे बिल्कुल फ्री में सुन सकते हैं।

    ​तो देर किस बात की? अभी मेरे YouTube चैनल पर जाएँ, कहानी को सुनें और मुझे सब्सक्राइब, शेयर और लाइक करें।

    ​आपके समर्थन के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद! 🙏

  • 2. Shatranj the game of blood - Chapter 2

    Words: 2234

    Estimated Reading Time: 14 min

    अध्याय 2: राख और रंज

    ​सुबह की पहली किरण, खिड़की से छनकर, एक सफेद चादर की तरह अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी, जहाँ सांवी लेटी हुई थी। उसकी आँखें खुली थीं, लेकिन उनमें कोई चमक नहीं थी, बस एक खालीपन था। वह अपनी छत को लगातार एकटक देख रही थी, जैसे वहाँ कोई जवाब ढूंढ रही हो।

    ​"यह सब... कैसे हुआ?" उसके होंठों से फुसफुसाहट निकली।

    ​एक साल हो चुका था। पूरा एक साल। सांवी को यकीन नहीं हो रहा था कि यह सच है। उसके दिमाग में अभी भी पिछले साल का जन्मदिन घूम रहा था। वो केक, वो हँसी, वो उसके परिवार की आँखों में खुशी... और फिर, वो बंदूक की आवाज़, चीखें, और आग। सब कुछ एक भयानक सपने की तरह लग रहा था, एक ऐसा सपना जो कभी खत्म नहीं होगा।

    ​वह धीरे से अपना हाथ उठाने की कोशिश करती है, लेकिन दर्द की एक लहर उसके पूरे शरीर में दौड़ जाती है। वह अपने जले हुए हाथों को देखती है, जिन पर गहरे, भयानक निशान थे। उसका शरीर, जो कभी इतना सुंदर और निर्मल था, अब राख और घावों का ढेर बन चुका था। सिर्फ़ उसका चेहरा ही बचा था, जिस पर कोई निशान नहीं था। यह बात उसे और भी दर्द देती थी कि उसका चेहरा तो वैसा ही था, लेकिन उसके अंदर की आत्मा पूरी तरह से जलकर राख हो चुकी थी।

    ​सांवी की आँखों से आँसू बहने लगते हैं। वह अपना चेहरा तकिए में छिपा लेती है और सिसकना शुरू कर देती है। "भगवान... यह सब मेरे साथ ही क्यों हुआ? आपने मुझसे मेरा सबकुछ छीन लिया... मेरा परिवार, मेरी ज़िंदगी... सब कुछ। प्लीज़... मुझे वापस कर दो..."

    ​लेकिन कोई जवाब नहीं आया, सिवाए उसकी अपनी ही चीखों और सिसकियों के। वह रोती रही, जब तक उसके गले से आवाज़ निकलना बंद न हो गई। उसका दिल दुख और निराशा से भर चुका था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह यहाँ क्यों है और क्या कर रही है।

    ​रात का अँधेरा, मुंबई की रोशनी

    ​शाम के सात बजे थे। मुंबई का एक नाइट क्लब, जो शहर के सबसे अमीर और ताकतवर लोगों के लिए जाना जाता था, अपनी पूरी चमक में था। लोग हँस रहे थे, बातें कर रहे थे, और शराब पी रहे थे। लेकिन इस क्लब के ऊपर वाले फ्लोर पर, जहाँ सिर्फ़ खास लोगों की एंट्री थी, माहौल बिल्कुल अलग था।

    ​अरीव राज सिंह शेखावत एक केबिन में बैठा था। उसके सामने दो विदेशी क्लाइंट बैठे थे, जिनके चेहरे पर पसीना और डर साफ दिख रहा था। अरीव के चेहरे पर हमेशा की तरह एक अजीब सी शांति थी, लेकिन उसकी आँखों में एक तूफान छुपा हुआ था।

    ​"तो, मेरा ड्रग सप्लाई क्यों नहीं हुआ?" अरीव ने अपनी गहरी और शांत आवाज़ में पूछा। "तुम लोगों ने सोचा कि तुम मुझसे - कर पाओगे और मुझे पता भी नहीं चलेगा?"

    ​उनमें से एक क्लाइंट ने डरते हुए कहा, "नहीं, सर... हमें खेद है... कुछ तकनीकी समस्या थी..."

    ​इससे पहले कि वह कुछ और कह पाता, अरीव ने अपनी जेब से एक बंदूक निकाली। उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी, जो किसी शैतान की मुस्कान से कम नहीं थी। उसने बिना किसी हिचकिचाहट के, दोनों क्लाइंट को सीधे सिर में गोली मार दी। 'फटाक!' की दो आवाज़ों के साथ, वे दोनों ज़मीन पर ढेर हो गए।

    ​अरीव ने शांत होकर बंदूक वापस अपनी जेब में रखी और आराम से वापस सोफे पर बैठ गया। वह अपनी शराब का गिलास उठाकर उसमें से एक घूँट लेता है, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

    ​उसी समय, उसका असिस्टेंट और दोस्त, रोहित, कमरे में आया। वह अपने दोस्त की यह हरकत देखकर मन ही मन सोच रहा था, 'यह सनकी कभी शांत नहीं होता। हर काम बंदूक से ही करता है। क्या हम इन्हें धमकाकर भी काम नहीं करवा सकते थे?'

    ​चारों तरफ़ खड़े बॉडीगार्ड्स डरे हुए थे। उनमें से एक ने हिम्मत करके कहा, "सर... लाशें..."

    ​अरीव ने अपनी नज़र बिना उठाए, शांत आवाज़ में कहा, "कचरा साफ़ करो यहाँ से।"

    ​रोहित, अरीव के सामने वाले सोफे पर बैठ जाता है। "यह करने की ज़रूरत नहीं थी, अरीव।"

    ​"मुझे सिखाने की कोशिश मत कर," अरीव ने कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं था। "मैं जानता हूँ कि मैं क्या कर रहा हूँ।"

    ​रोहित ने सिर हिलाया। "हाँ-हाँ, ठीक है। कभी-कभी तो मुझे भी तुझसे डर लगता है।"

    ​अरीव ने एक हल्की सी मुस्कान दी। "अच्छी बात है।"

    ​वे दोनों चुपचाप बैठे रहे। कुछ देर बाद, अरीव उठ खड़ा हुआ। "चलो, अब यहाँ से चलते हैं।"

    ​बाहर निकलते ही, अरीव अपनी काली, शानदार कार की तरफ़ बढ़ता है। कार किसी जेट की तरह लग रही थी। वह अपनी सीट पर बैठता है और गाड़ी को स्टार्ट करता है। रोहित उसके बगल में बैठ जाता है।

    ​गाड़ी मुंबई की सड़कों पर भागने लगती है। अरीव अपने ब्लैक मेंशन की तरफ़ जा रहा था। मेंशन दूर से ही एक विशाल, काली छाया की तरह दिख रहा था। वह बिल्कुल अरीव की तरह था—अँधेरा, शक्तिशाली, और रहस्यमय। जैसे-जैसे गाड़ी आगे बढ़ रही थी, अरीव की आँखों में एक अजीब सी चमक आ रही थी, जैसे वह कुछ और ही सोच रहा हो। उसके लिए, यह दुनिया बस एक खेल थी, और वह इस खेल का सबसे बड़ा खिलाड़ी था।

    आधी रात का सन्नाटा, और मुंबई की जगमगाती रोशनी में एक काली, विशाल इमारत खड़ी थी, जो किसी किले से कम नहीं थी। यही था अरीव राज सिंह शेखावत का मेंशन। जैसे ही गाड़ी मेंशन के गेट से अंदर दाखिल हुई, रोहित ने गहरी साँस ली। "फाइनली... अब थोड़ा सुकून मिलेगा।"
    अरीव ने बिना कोई जवाब दिए गाड़ी से बाहर क़दम रखा। उसकी चाल में वही शांति थी, जो उसके चेहरे पर हमेशा रहती थी। दोनों मेंशन के अंदर दाखिल हुए। अंदर का माहौल भी बाहर जैसा ही था—शक्तिशाली और रहस्यमय। अरीव सीधे सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ गया, बिना पीछे मुड़े।
    "तुम डिनर करोगे क्या?" रोहित ने पीछे से आवाज़ दी।
    "नहीं," अरीव ने एक शब्द में जवाब दिया, और ऊपर चला गया।
    अरीव अपने कमरे में गया। उसका कमरा उसकी शख्सियत का आईना था। चारों तरफ़ काला रंग हावी था, लेकिन उसमें एक शान थी। कमरे की दीवारें गहरे काले रंग की थीं, और फर्श पर काले और सुनहरे रंग की टाइलें बिछी थीं, जो मंद रोशनी में चमक रही थीं। खिड़कियों पर काले और सफेद रंग के भारी पर्दे लटके थे, जो पूरे कमरे को बाहर की दुनिया से अलग कर रहे थे। एक बड़ी सी किंग साइज़ बेड कमरे के बीच में रखी थी, जिस पर सिर्फ़ काली चादर और तकिए थे।
    अरीव ने अपने कपड़े उतारे और सीधे बाथरूम में चला गया। उसका बाथरूम भी उसके कमरे जैसा ही था, काले और सफेद संगमरमर की दीवारों के साथ। वह शॉवर के नीचे खड़ा हो गया। ठंडे पानी की बौछार उसके लंबे, काले बालों से होते हुए उसके मजबूत, गठीले शरीर पर गिर रही थी। उसकी चौड़ी छाती पर कुछ पुराने, धुंधले निशान थे, जो शायद बचपन के संघर्ष की निशानी थे। उसकी सिक्स-पैक एब्स, मजबूत हाथ और पैरों की मांसपेशियों से उसकी ताकत का अंदाज़ा लगाया जा सकता था। पानी की बूँदें उसके शरीर पर मोतियों की तरह चमक रही थीं। वह अपनी आँखें बंद करके बस पानी को महसूस कर रहा था, जैसे पानी उसके अंदर के तूफ़ान को शांत कर रहा हो।
    कुछ देर बाद, वह शॉवर से बाहर आया और अपनी काली रंग की तौलिया लपेटकर अपने विशाल वॉर्डरोब की तरफ़ बढ़ गया। वॉर्डरोब किसी छोटे कमरे की तरह था, जिसमें सिर्फ़ काले, सफेद और ग्रे रंग के कपड़े लटके थे। अरीव ने एक काली टी-शर्ट और एक काली ट्रैक पैंट निकाली और पहन ली। उसका चेहरा बिल्कुल शांत था, जैसे अभी-अभी उसने किसी का खून न किया हो।
    अरीव नीचे डाइनिंग हॉल में आया। डाइनिंग हॉल भी काले रंग का था, और बीच में एक लंबी, काली लकड़ी की मेज रखी थी। रोहित पहले से ही वहाँ बैठा हुआ था, मोबाइल पर कुछ देख रहा था।
    "अरीव, आज तो डिनर कर ले। कब तक बस शराब पर रहेगा?" रोहित ने उसे देखकर कहा।
    अरीव ने कोई जवाब नहीं दिया और अपनी जगह पर बैठ गया। तभी एक हाउस हेल्पर, एक युवा लड़की, खाने की ट्रे लेकर आई। वह धीरे-धीरे अरीव की तरफ़ बढ़ रही थी। जैसे ही वह अरीव के पास पहुँची, उसके पैर फिसल गए और पूरी खाने की ट्रे अरीव की गोद में गिर गई। वह लड़की जानबूझकर अरीव की गोद में गिर पड़ी, जैसे उसे यकीन हो कि अरीव उसे कुछ नहीं कहेगा।
    अरीव ने उसे तुरंत झटक दिया। उसके चेहरे पर जो शांति थी, वह ग़ायब हो गई और उसकी जगह गुस्सा आ गया। उसकी आँखें लाल हो गईं।
    "तुम... तुम पागल हो क्या?" अरीव ने दहाड़ते हुए कहा। "तुम्हारी इतनी हिम्मत कि तुम...?"
    रोहित भी हैरान था। उस लड़की के चेहरे पर डर की जगह एक मुस्कान थी, जो पल भर में ग़ायब हो गई।
    "इसे यहाँ से बाहर निकालो... अभी!" अरीव ने गुस्से से चिल्लाया।
    दो बॉडीगार्ड तुरंत आए और उस लड़की को घसीटते हुए बाहर ले गए। वह लड़की रोती रही, "नहीं... सर... मुझे माफ़ कर दो..."
    अरीव अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। उसकी भूख मर चुकी थी। वह गुस्से में वापस अपने कमरे की तरफ़ बढ़ गया।
    "अरे, अरीव... रुक तो सही। खाना तो खा ले," रोहित ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन अरीव ने उसकी बात अनसुनी कर दी।
    रोहित ने सिर पकड़ लिया। "हे भगवान! यह आदमी क्या है? थोड़ी देर पहले - किया, अब एक छोटी सी बात पर इतना गुस्सा हो गया। इसका दिमाग़ सही जगह पर नहीं है।"
    वह खुद से ही बड़बड़ाता रहा और फिर खाना खाने बैठ गया।
    नए सबेरे का दर्द
    अगली सुबह, अस्पताल के कमरे में सांवी को डिस्चार्ज मिलने की तैयारी हो रही थी। उसके पास न तो पैसे थे, न ही कोई ठिकाना। अस्पताल वालों ने उसे कुछ कपड़े दिए और बाहर छोड़ दिया। सांवी एक बार भी पीछे मुड़े बिना, बस चलती रही। उसके मन में सिर्फ़ एक ही जगह थी जहाँ वह जाना चाहती थी—उसका घर।
    वह कई घंटों तक चलती रही, उसके पैर दर्द कर रहे थे, लेकिन वह रुकी नहीं। जब वह अपनी गली में पहुँची, तो उसकी आँखें डर और दुख से चौड़ी हो गईं। उसका सुंदर घर, जो कभी हँसी और खुशी से भरा रहता था, अब सिर्फ़ राख का एक ढेर था। दीवारें काली हो चुकी थीं, और खिड़कियों से धुआँ निकल रहा था। उसका दिल दर्द से फट रहा था। वह चुपचाप खड़ी हो गई, उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन उसके होंठों पर कोई आवाज़ नहीं थी।
    "मेरा... घर..." उसने फुसफुसाते हुए कहा। "सब कुछ ख़त्म हो गया।"
    वह वहाँ से मुड़ी और धीरे-धीरे एक अपार्टमेंट की तरफ़ चली गई, जिसे उसके पापा ने उसके 18वें जन्मदिन पर उसे तोहफ़े में दिया था। यह उनका एक छोटा-सा सीक्रेट था। उनके पास बहुत पैसा था, लेकिन उनके पापा चाहते थे कि सांवी के पास अपनी एक जगह हो, जहाँ वह अकेले रह सके, जब उसे ज़रूरत हो।
    सांवी ने पुरानी चाबी निकाली और दरवाज़ा खोला। अपार्टमेंट खाली था, लेकिन साफ-सुथरा था। शायद उसके पापा ने इसे पहले से ही तैयार करवा रखा था। जैसे ही वह अंदर आई, वह दरवाज़ा बंद करके ज़मीन पर बैठ गई और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।
    "पापा... भइया... मम्मी... अन्या..." उसकी आवाज़ दर्द से भरी थी। "आप लोग मुझे छोड़ कर क्यों चले गए? मैंने क्या ग़लती की थी? प्लीज़... वापस आ जाओ... मैं अकेली हूँ... बहुत अकेली।"
    उसका दिल टूट चुका था। उसके पास अब कुछ नहीं बचा था, सिवाए उन भयानक यादों के और बदले की एक जलती हुई आग के।
    लंदन की उड़ान
    अगले दिन सुबह, अरीव और रोहित लंदन जाने के लिए प्राइवेट जेट में बैठे थे।
    रोहित ने अपनी सीट बेल्ट बाँधते हुए कहा, "भाई, एक बात बता। उस लड़की के साथ ऐसा क्या हुआ था जो तू इतना भड़क गया?"
    अरीव ने बिना उसकी तरफ़ देखे कहा, "कुछ नहीं।"
    "कुछ नहीं? तू तो उस पर ऐसे भड़का था जैसे वो तेरी गर्लफ्रेंड हो, और उसने किसी और के साथ डेट पर जाने की बात कर दी हो," रोहित ने हँसते हुए कहा।
    अरीव ने उसकी तरफ़ घूरकर देखा, "अपनी बकवास बंद कर।"
    "अरे! मैं तो बस मज़ाक़ कर रहा था," रोहित ने कहा। "पर सच में, तू लड़कियों से इतना दूर क्यों रहता है? मुझे तो लगता है तुझे 'लड़कियों से दूर रहने वाला बाबा' का ख़िताब दे देना चाहिए।"
    अरीव ने सिर हिलाया। "तू कभी सुधरेगा नहीं।"
    "और तू कभी बदलेगा नहीं," रोहित ने पलटकर कहा। "यार, हम लंदन जा रहे हैं। कुछ तो एक्साइटेड हो। वहाँ तो तुझे कुछ अच्छी-खासी लड़कियों से मिलने का मौक़ा मिलेगा।"
    अरीव ने अपनी आँखें बंद कर लीं। "काम पर ध्यान दे, रोहित। हम वहाँ गंस बेचने जा रहे हैं, लड़कियों से मिलने नहीं।"
    "अरे! काम के साथ थोड़ा मज़ा भी तो कर सकते हैं," रोहित ने कहा। "तू हमेशा इतना बोरिंग क्यों रहता है?"
    अरीव ने एक गहरी साँस ली। "कभी-कभी तुझे भी जान से मारने का मन करता है।"
    रोहित हँसने लगा। "यही तो हमारी दोस्ती है, भाई। तू मुझे - की धमकी देता है, और मैं उसे मज़ाक़ समझता हूँ।"
    जेट ने उड़ान भरी, और दोनों दोस्तों की यह अजीब और ख़तरनाक दोस्ती एक नए शहर की ओर बढ़ चली।
    क्या बदला लेने की यह आग सांवी को उसके लक्ष्य तक पहुँचा पाएगी, या वह रास्ते में ही जलकर ख़त्म हो जाएगी? और क्या अरीव का दिल कभी किसी के लिए धड़केगा, या वह हमेशा के लिए एक कठोर दिलवाले व्यक्ति की तरह ही रहेगा?.

  • 3. Shatranj the game of blood - Chapter 3

    Words: 1164

    Estimated Reading Time: 7 min

    अध्याय 3: बादलों के पार, आग की तलाश

    ​जेट की रफ़्तार से लंदन की ओर बढ़ते हुए, राहुल ने अरीव की तरफ़ देखा। बाहर चमकते तारे किसी अनगिनत हीरों की तरह लग रहे थे, लेकिन अरीव की आँखों में वही गहरा खालीपन था।

    ​"भाई," रोहित ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में छेड़ना शुरू किया, "तू लड़कियों से इतना दूर क्यों रहता है? अब तो 28 साल का हो गया है... शादी-वादी के बारे में भी तो सोच।"

    ​अरीव ने खिड़की से बाहर देखते हुए अनसुना कर दिया।

    ​"अरे यार, मेरी बात तो सुन," राहुल ने उसकी बाँह पकड़कर कहा। "अगर तू इस उम्र में शादी नहीं करेगा, तो तेरे बच्चे आगे चलकर तेरे को 'पापा जी' नहीं, 'दादा जी' ज़रूर कहेंगे!" राहुल अपनी बात पर ज़ोर से हँसा।

    ​अरीव ने धीरे से उसकी तरफ़ घुमा, उसकी आँखें ठंडी और चेतावनी भरी थीं। "मुँह बंद रख, वर्ना तुझे यहीं मार डालूँगा। बहुत ज़्यादा ज़ुबान चलने लगी है तेरी आजकल।" उसकी आवाज़ में हल्की सी गुर्राहट थी।

    ​रोहित, जो बीच में बैठा सब सुन रहा था, अपनी हँसी नहीं रोक पाया। "हाँ... हाँ... अब मुझे भी मार दे! तू तो आजकल मक्खियाँ भी तलवार से मारता है।"

    ​अरीव ने दोनों को बारी-बारी से घूरकर देखा। कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।

    ​"अच्छा बाबा... अब से नहीं कहूँगा," राहुल ने हाथ जोड़ते हुए कहा, उसकी हँसी अब दबी हुई थी।

    ​"हाँ... हाँ... माफ़ कर दो 'महाराज'," रोहित ने भी होंठों को भींचते हुए कहा।

    ​कुछ घंटे बाद, जेट लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे पर उतरा। बाहर लंबी काली कारों की कतार उनका इंतज़ार कर रही थी। अरीव और रोहित बीच वाली काली मर्सिडीज़ में बैठ गए।

    ​"सर, कहाँ जाना है?" ड्राइवर ने पूछा।

    ​"ऑफिस चलो," रोहित ने जवाब दिया।

    ​लंदन की सुबह धुंधली थी। शहर जाग रहा था, लेकिन अरीव की मौजूदगी में उसके दफ्तर में हमेशा एक अजीब सा खौफ पसरा रहता था। वह सिर्फ़ एक माफिया ही नहीं था, बल्कि दुनिया के टॉप बिजनेसमैन में से एक भी था। उसकी कंपनी अलग-अलग सेक्टर में फैली हुई थी और अपनी परफेक्शन और डेडलाइन के लिए जानी जाती थी। कर्मचारियों को अच्छी सैलरी मिलती थी, लेकिन गलती करने की कोई गुंजाइश नहीं थी।

    ​दूसरी तरफ़, मुंबई में सांवी एक अदद नौकरी की तलाश में भटक रही थी। जली हुई चमड़ी और डरे हुए चेहरे के साथ, उसे हर जगह निराशा ही हाथ लग रही थी। आखिरकार, एक छोटे से पिज़्ज़ा डिलीवरी शॉप के मालिक ने उस पर थोड़ी दया दिखाई। उसे हर दिन ₹500 मिलते थे, जो उसके गुज़ारे के लिए काफ़ी नहीं थे। बिना किसी आईडी या डॉक्यूमेंट के, और ऐसे शरीर के साथ, उसे कोई और काम देने को तैयार नहीं था।

    ​लंदन में अरीव का ऑफिस एक गगनचुंबी इमारत की 83वीं मंजिल पर था। प्राइवेट लिफ्ट से रोहित के साथ ऊपर पहुँचते ही, उन्हें कर्मचारियों की दबी हुई फुसफुसाहट सुनाई दी।

    ​"अब क्या करना है?" रोहित ने केबिन में बैठते ही पूछा। "ज़ेवियर से मिलना है क्या?"

    ​अरीव की आँखें ठंडी चमक उठीं। "उसने मेरे काम में घुसने की कोशिश की है। उसे मैं छोडूँगा नहीं... वो जान से मरेगा।"

    ​उसने अपने डेस्क पर पड़ी फ़ाइलों को उठाना शुरू कर दिया। हर रिपोर्ट, हर डेटा को बारीकी से देखने लगा।

    ​रात होते ही, अरीव अपने लंदन के मेंशन के लिए रवाना हो गया। यह मेंशन मुंबई वाले से बिल्कुल अलग था—शांत, सफेद रंग का, और आधुनिक कला से सजा हुआ। दोनों दोस्तों ने साथ में खाना खाया और सोने चले गए।

    ​लेकिन रात के 2:00 बजे, मेंशन पर अचानक हमला हो गया। गोलियों की आवाज़, धमाके... सब कुछ पल भर में तहस-नहस हो गया। यह हमला ज़ेवियर ने करवाया था।

    ​अरीव गुस्से से आगबबूला हो गया। उसने तुरंत अपने गार्ड्स को जवाबी कार्रवाई करने का आदेश दिया, लेकिन तब तक ज़ेवियर गायब हो चुका था, अंडरग्राउंड।

    ​"अब हमें चलना चाहिए," रोहित ने कहा, उसकी आवाज़ में चिंता थी। "हमारे असैसिन उसे ढूँढ लेंगे।" अरीव के पास भाड़े के हत्यारों की एक बहुत बड़ी फ़ौज थी, जिसे वह खुद कड़ी निगरानी में प्रशिक्षित करवाता था।

    ​"नहीं," अरीव ने कहा, उसकी आवाज में दृढ़ता थी। "मैं उसे खुद अपने हाथों से मारूँगा।"

    ​कुछ दिन बाद, अरीव ने ज़ेवियर को ढूँढ निकाला और उसे ऐसी मौत दी, जो शायद ही किसी ने सोची होगी। अपना हिसाब बराबर करने के बाद, वह भारत, मुंबई के लिए रवाना हो गया।

    ​मुंबई में, एक हफ़्ता बीत चुका था। सांवी को पिज़्ज़ा डिलीवरी की नौकरी से भी निकाल दिया गया था। मालिक और दूसरे कर्मचारी उसके जले हुए शरीर की वजह से असहज महसूस करते थे। उन्हें वह अनहाइजीनिक लगती थी।

    ​उधर, लंदन से अरीव की फ़्लाइट रात के 6:00 बजे मुंबई में लैंड हुई। एयरपोर्ट से सीधे वह अपने मेंशन के लिए रवाना हो गया।

    ​जैसे ही रोहित और अरीव मेंशन पहुँचे, रोहित ने ज़ोर से आवाज़ लगाई, "भाई, मुझे बहुत भूख लगी है! खाना लगाओ उन्हें जल्दी से... मैं नहा कर आता हूँ!"

    ​तभी एक गार्ड ने घबराते हुए कहा, "मालिक... हमारे यहाँ कोई मेड नहीं है खाना बनाने के लिए।"

    ​"क्या?" रोहित और अरीव दोनों एक साथ चौंक गए।

    ​"जी मालिक," गार्ड ने बताया, "उस दिन जब सर ने उस लड़की को भगा दिया था, उसके बाद से कोई मेड यहाँ काम नहीं करना चाहती।"

    ​रोहित ने अरीव की तरफ़ देखा, उसका मुँह खुला हुआ था। "तेरे वजह से अब मैं भूखा मरूँगा!" उसने मज़ाकिया लहजे में कहा, लेकिन उसकी आँखों में सच में भूख दिख रही थी।

    ​अरीव ने अपने गार्ड से कहा, "कोई ऐसी लड़की को ढूँढो, जो बिल्कुल खूबसूरत न हो और जिसे खाना अच्छा बनाना आता हो।"

    ​"ठीक है, सर," गार्ड कहकर चला गया।

    ​अगले दिन, अख़बार में एक विज्ञापन छपा: "शेखावत मेंशन में खाना बनाने के लिए मेड की आवश्यकता है। गैर-खूबसूरत महिला को प्राथमिकता।"

    ​सांवी ने वह विज्ञापन देखा। यह उसके लिए एक मौका था। वह हिम्मत करके इंटरव्यू के लिए पहुँच गई। मेंशन के गार्डन में, एक आदमी उसका इंतज़ार कर रहा था। जैसे ही उसने सांवी का चेहरा देखा, वह थोड़ा हिचकिचाया।

    ​"देखिए, मैं आपको यह नौकरी नहीं दे सकता," गार्ड ने कहा। "आप बहुत सुंदर हैं, और हमारे मालिक को सुंदर लड़कियाँ पसंद नहीं हैं। इश्तिहार में साफ़ तौर पर लिखा है कि जो लड़की खूबसूरत न हो, वही काम कर सकती है।"

    ​सांवी ने गहरी साँस ली और फिर अपने दुपट्टे को थोड़ा हटाया, अपना जला हुआ हाथ दिखाया। उसका चेहरा अब भी खूबसूरत था, लेकिन उसके हाथ और बाकी शरीर की झलक देखकर गार्ड की आँखें फैल गईं।

    ​"मेरा... मेरा शरीर..." सांवी ने धीमी आवाज़ में कहा।

    ​गार्ड ने कुछ पल उसे देखा और फिर कहा, "ठीक है। मैं आपको यह काम देता हूँ। आपको यहीं रहना होगा और तीनों टाइम का खाना बनाना होगा... दो लोगों का—रोहित सर का और अरीव सर का। आप अपना खाना भी बना सकती हैं।"

    ​अगला सवाल:

    ​क्या होगा जब अरीव और सांवी का पहली बार आमना-सामना होगा? क्या अरीव, जो सुंदर लड़कियों से नफ़रत करता है, सांवी के जले हुए शरीर और खूबसूरत चेहरे के विरोधाभास को समझ पाएगा? और क्या इस अजीबोगरीब माहौल में कोई रिश्ता पनप पाएगा?

  • 4. Shatranj the game of blood - Chapter 4

    Words: 1219

    Estimated Reading Time: 8 min

    अध्याय 4: नई शुरुआत और पुरानी यादें

    सुबह के धुँधलके में, जब आसमान में सूरज की हल्की-हल्की किरणें फैल रही थीं, सांवी पहली बार उस विशाल शेखावत मेंशन के सामने खड़ी थी। चारों तरफ़ ऊँची-ऊँची दीवारें, लोहे का भारी गेट और उसके ऊपर लगे सुनहरे शेर के चिन्ह ने उसे जैसे बता दिया था कि यह जगह उसकी दुनिया से बहुत अलग है।

    उसके मन में अजीब-सी घबराहट थी—उम्मीद भी थी कि शायद यहाँ से उसके जीवन की एक नई शुरुआत हो सके, और डर भी था कि कहीं उसके अतीत का दर्द और बदले की आग उसे फिर से न तोड़ दे।

    गार्ड ने उसे देखा और पास आने का इशारा किया।

    "मैं… मैं यहाँ काम करने आई हूँ," सांवी ने हिचकिचाते हुए कहा। उसके हाथों ने दुपट्टे को कसकर लपेट लिया, मानो वह अपने सारे जले हुए ज़ख्मों और दर्द को दुनिया से छुपाना चाहती हो।

    गार्ड ने उसकी आँखों में एक पल झाँका और फिर उसे हेड सर्वेंट के ऑफिस की तरफ़ ले गया।


    ---

    हेड सर्वेंट से पहली मुलाकात

    ऑफिस में एक मध्यम उम्र का आदमी बैठा हुआ था। उसकी आँखों में गंभीरता थी, पर चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान। वह कागज़ात देख रहा था, पर जैसे ही गार्ड ने दरवाज़ा खोला, उसने नज़रें उठाईं।

    "आ जाइए," उसने कहा। "मेरा नाम सुरेश है। मैं यहाँ का हेड सर्वेंट हूँ।"

    उसने हाथ के इशारे से सांवी को बैठने को कहा।

    सांवी धीरे-धीरे बैठ गई। उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं।

    "तो, आप ही नई मेड हैं?" सुरेश ने फाइल पलटते हुए कहा।
    "जी…" सांवी की आवाज़ धीमी थी।

    सुरेश ने कागज़ बंद किया और सीधे उसकी तरफ़ देखा।
    "आपको यहाँ रहकर अरीव सर और रोहित सर दोनों के लिए तीनों टाइम का खाना बनाना होगा।"

    "जी… ठीक है।"

    "एक बात और," सुरेश ने गला साफ़ किया। "हमारे सर्वेंट क्वार्टर में सिर्फ़ पुरुष कर्मचारी रहते हैं। इसलिए मैंने आपके लिए मेंशन के बेसमेंट वाला कमरा तैयार करवाया है। वहाँ आप आराम से रह सकती हैं।"

    सांवी ने सिर हिलाया। "मैं समझ गई।"

    सुरेश कुछ पल रुका, फिर धीरे से बोला—
    "देखिए, अरीव सर बहुत सख्त इंसान हैं। खासकर… उन्हें लड़कियों से ज़्यादा मेलजोल पसंद नहीं है। आप उनसे जितना दूर रह सकें, उतना अच्छा है।"

    सांवी के दिल में हल्की-सी टीस उठी। क्या हर जगह लड़कियों के लिए यही नियम होता है? पर उसने अपने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया।
    "मैं इस बात का ध्यान रखूँगी," उसने संयम से कहा।

    "अच्छा है," सुरेश ने मुस्कुराकर कहा। "वैसे अभी सर लोग ऑफिस गए हुए हैं, रात को ही लौटेंगे। आप चाहें तो डिनर की तैयारी कर लें। और अगर आपको भूख लगी हो, तो अपने लिए भी कुछ बना सकती हैं।"

    "नहीं… मुझे अभी भूख नहीं है।"

    "ठीक है, तो आप अपना सामान रख लीजिए।"

    उसने चाबी दी और गार्ड को इशारा किया कि सांवी को उसके कमरे तक छोड़ आए।


    ---

    नया कमरा और पुरानी यादें

    कमरा देखकर सांवी चकित रह गई। दीवारों पर नीला और सफेद पेंट, सुंदर कालीन, और बिस्तर पर सफेद पर्दों का घेरा। बालकनी में सफेद गुलाब खिले थे और एक लकड़ी का झूला भी रखा था।

    गार्ड के जाने के बाद वह चुपचाप जाकर झूले पर बैठ गई। ठंडी हवा उसके चेहरे को छू रही थी।

    अचानक उसे अपना बचपन याद आया—
    कैसे वह अपनी माँ की गोद में सर रखकर घर के झूले पर सो जाती थी।
    कैसे उसके पापा और भाई उसे हँसते-खेलते जगाते थे।
    कैसे पापा हर बार माँ को डाँटते थे—
    "मेरी बेटी से यह सब काम मत करवाओ, मेरी गुड़िया कहीं जल गई तो कितना दर्द होगा!"

    और अब… वही हाथ जले हुए थे, वही चेहरे पर गहरे ज़ख्म थे।

    उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े। उसने दबी आवाज़ में कहा—
    "मैं उन लोगों से कैसे बदला लूँगी…?"

    धीरे-धीरे वह रोते-रोते झूले पर ही सो गई।


    ---

    भयावह सपना

    उसकी नींद टूटी गोलियों की आवाज़ से। वह पसीने से तरबतर थी। उसके मन में वही पुरानी तस्वीर उभर आई—उसकी बहन के साथ हुई बर्बरता, उसकी असहायता, उसका रोना, उसका चिल्लाना।

    वह काँपते हुए उठी और शीशे में खुद को देखा।
    "चाहे कुछ भी हो… चाहे मुझे अपनी जान ही क्यों न देनी पड़े… मैं बदला ज़रूर लूँगी।"

    उसने दुपट्टे को कसकर लपेटा, ताकि उसके जले हुए निशान छुप जाएँ।


    ---

    किचन में पहली बार

    शाम के छह बजे वह किचन में पहुँची। वहाँ पहले से कुछ सर्वेंट मौजूद थे।

    "ये अरीव सर का डाइट प्लान है," एक कुक ने उसे दिया।
    "और रोहित सर के लिए…?"

    "वो तो हर दिन बदलता है। आज पनीर के पराठे और खीर चाहिए।"

    फिर सब लोग चले गए, क्योंकि शाम के बाद सिर्फ़ कुक को रहने की अनुमति थी।

    सांवी ने काम शुरू किया। सब्ज़ियों को काटते-काटते उसे माँ की याद आ गई।
    "माँ, मुझे भी खाना बनाना सीखना है," वह बचपन में कहा करती थी।
    पर पापा हमेशा मना करते—
    "मेरी बेटी से यह सब काम मत करवाना।"

    सांवी ने अपने हाथों की ओर देखा। अब तो ये हाथ सचमुच जल चुके हैं।


    ---

    रोहित की भूख और कॉमेडी

    रात के साढ़े आठ बजे रोहित और अरीव घर लौटे।

    "भाई! खाना लगा दो, मैं तो भूख से मर रहा हूँ!" रोहित हॉल में चिल्लाया।

    सांवी चुपचाप खाना लगाती रही।

    रोहित टेबल पर बैठा और जैसे ही खुशबू आई, वह मुस्कुरा उठा।
    "वाह! ये खुशबू तो गजब है। देखने में भी बढ़िया लग रहा है। चलो अब खाकर देखते हैं।"

    अरीव अपने शांत अंदाज़ में चेयर पर बैठ गया।

    "भाई, अगर खाना अच्छा निकला तो मैं कुक को बोनस दूँगा," रोहित बोला।
    अरीव ने ठंडी नज़र से उसे देखा। "तू बोनस देगा?"
    "हाँ तो! मेरी भी कोई इज़्ज़त है इस घर में या नहीं?"
    "तेरी इज़्ज़त तेरे पेट से शुरू होकर पेट पर ही खत्म हो जाती है," अरीव ने सूखा ताना मारा।

    रोहित ने मुँह फुला लिया। "भाई, आप हमेशा मेरी टाँग खींचते हो।"

    सांवी किचन से सब सुन रही थी। उसके होंठों पर पहली बार हल्की-सी मुस्कान आई।


    ---

    रुद्राक्ष और उदय की चर्चा

    डिनर के दौरान अरीव ने कहा—
    "रुद्राक्ष और उदय कल इंडिया आ रहे हैं। उनके रूम क्लीन करवा देना।"

    रोहित की आँखें चमक उठीं। "क्या! रुद्राक्ष भैया आ रहे हैं? वाह!"
    फिर उसने थोड़ा नखरा किया। "पर उन्होंने मुझे कॉल क्यों नहीं किया?"

    "रुद्राक्ष के साथ उदय भी आ रहा है," अरीव ने जोड़ा।

    "हूँह!" रोहित ने मुँह बिचकाया। "उस उदय का क्या काम है यहाँ? हमेशा मुझे ही परेशान करता रहता है।"

    अरीव ने उसकी बात नज़रअंदाज़ कर दी।


    ---

    रात का सन्नाटा

    डिनर के बाद दोनों भाई अपने-अपने कमरे में चले गए।

    सांवी ने बर्तन धोए, फिर चुपचाप एक रोटी खाई। उसे ज़्यादा खाने का मन ही नहीं था। हादसे के बाद से ही उसका पेट जैसे भूख भूल चुका था।

    वह कमरे में लौटकर बिस्तर पर लेट गई। पर नींद उसे कहाँ आने वाली थी?
    उसके मन में अतीत की परछाइयाँ थीं, डर था, दर्द था और बदले की आग थी।

    उसने आँखें बंद कीं और दबी आवाज़ में कहा—
    "हे भगवान, मुझे हिम्मत देना… ताकि मैं अपने परिवार के साथ न्याय कर सकूँ।"

    बाहर हवाएँ चल रही थीं। सफेद गुलाबों की खुशबू कमरे में फैल रही थी।

    पर सांवी का दिल अब भी अंधेरे और तूफ़ान से भरा था।


    ---

    सवाल

    क्या सांवी अपने अतीत के दर्द को भुलाकर नई शुरुआत कर पाएगी?
    या फिर अरीव और उसके भाइयों की दुनिया में उसका आना एक नए तूफ़ान की शुरुआत होगी?

  • 5. Shatranj the game of blood - Chapter 5

    Words: 1326

    Estimated Reading Time: 8 min

    अध्याय 5: अरीव की पहली झलक
    ​सुबह के 4:30 बजे, साँवी की नींद टूट गई। यह उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया था। बाहर ठंडी हवा चल रही थी और कमरे में फैली सफेद गुलाबों की ख़ुशबू मन को थोड़ी शांति दे रही थी। वह बिस्तर से उठी, बालकनी में गई और अपने दुपट्टे से शरीर को अच्छी तरह से ढँक लिया, ताकि उसके जले हुए घाव और निशान किसी को दिखाई न दें। फिर वह नहाने के लिए चली गई।
    ​जब वह किचन में पहुँची, तो वहाँ पूरा सन्नाटा था। स्टाफ अभी तक नहीं आया था, और वे 8 बजे से पहले आते भी नहीं थे। साँवी ने फ्रिज पर लगा अरीव का डाइट प्लान देखा: "सुबह 5 बजे जिम में प्रोटीन शेक।" उसने बिना देर किए शेक बनाना शुरू कर दिया। उसे याद आया कि रोहित के लिए भी शेक ले जाना है। उसने दो ग्लास तैयार किए और जिम की तरफ़ चल दी। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। वह मन ही मन सोच रही थी कि यहाँ काम करना आसान नहीं है, खासकर तब, जब घर के नियम बहुत सख्त हों।
    ​जिम में पहली मुलाकात
    ​दरवाजे पर पहुँचकर उसने हल्की-सी दस्तक दी, लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया। उसने हिम्मत करके दरवाज़ा खोला और अंदर क़दम रखा।
    ​सामने का नज़ारा देखकर साँवी के क़दम रुक गए। अरीव शर्टलेस, सिर्फ़ बॉक्सर पहने हुए, खिड़की की तरफ पीठ करके खड़ा था। वह किसी से फ़ोन पर बात कर रहा था। उसकी मजबूत, चौड़ी पीठ पर उसकी मांसपेशियाँ साफ़ दिखाई दे रही थीं। उसके भीगे हुए बाल माथे पर बिखरे थे। वह फ़ोन पर कह रहा था, "रुद्राक्ष! मुझे तुम्हारी एक भी बात नहीं सुननी। तुम्हें इंडिया आना ही होगा, और उदय भी तुम्हारे साथ आएगा।"
    ​साँवी ने तुरंत अपनी नज़रें झुका लीं। तभी उसकी नज़र रोहित पर पड़ी, जो एक कोने में वर्कआउट कर रहा था। रोहित ने झुकी हुई नज़रों वाली साँवी को देखा और धीरे से मुस्कुराया। साँवी ने बिना एक शब्द कहे शेक के ग्लास टेबल पर रखे और तेज़ी से जिम रूम से बाहर निकल गई।
    ​वह किचन में भागी और अपने दिल पर हाथ रखकर गहरी साँस ली। उसका चेहरा पूरी तरह लाल हो गया था। उसे वही नज़ारा बार-बार याद आ रहा था। उसके दिमाग में बस एक ही ख़याल था: "यह सब तुम्हारे लिए नहीं है, साँवी। तुम इन सब चीज़ों के लायक नहीं हो। तुम्हें कोई नहीं अपनाएगा, कोई नहीं चाहेगा।"
    ​इन विचारों ने उसके दिल को चोट पहुँचाई। उसकी आँखों से एक आँसू की बूँद गाल पर लुढ़क गई। उसने जल्दी से आँसू पोंछे और खुद को समझाया कि उसे अपनी भावनाओं को काबू में रखना होगा। उसका मक़सद बदला लेना था, न कि किसी की ख़ूबसूरती देखकर दिल बहलाना। अगले ही पल, वह खाने की तैयारी में जुट गई।
    ​उसने अरीव के लिए सैंडविच, फ्रूट सैलेड और जूस बनाया। तभी उसने रोहित का एक नोट देखा जो फ्रिज पर चिपका हुआ था। "आज मुझे छोले भटूरे खाने हैं।"
    ​साँवी के चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान आ गई। यह शायद उसके जन्मदिन के बाद उसकी पहली मुस्कान थी। उसे दोनों भाइयों में एक अजीब-सा अंतर दिखा। एक एकदम शांत और बर्फ़ की तरह था, जबकि दूसरा नटखट और चुलबुला।
    ​अरीव का कमरा और उसका राज
    ​अरीव जिम से वापस आया और सीधे अपने कमरे की तरफ़ चला गया। उसकी एक आदत थी कि वर्कआउट के बाद वह हमेशा शावर लेता था और उसके तुरंत बाद उसे कॉफी चाहिए होती थी।
    ​साँवी ने कॉफी बनाई और उसे लेकर अरीव के कमरे की ओर चल दी। वह कमरे के दरवाज़े पर पहुँची और उसने धीरे से दस्तक दी, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। उसे लगा कि अरीव शावर ले रहा होगा। उसने दरवाज़ा खोला और अंदर चली गई।
    ​अंदर शावर की आवाज़ आ रही थी। साँवी ने पूरे कमरे पर एक नज़र डाली। कमरे का इंटीरियर काला, सुनहरा और सफ़ेद था, जो बहुत ही शानदार लग रहा था। लेकिन एक चीज़ ने उसकी नज़र खींच ली। बेड के ठीक ऊपर एक बड़ा-सा शीशा लगा हुआ था।
    ​"यह कैसा इंसान है जो अपने बेड के ऊपर शीशा लगाता है?" साँवी ने मन ही मन सोचा। तभी उसकी नज़र कमरे की दीवारों पर लगी तस्वीरों पर पड़ी। सब तस्वीरें अरीव की ही थीं, लेकिन एक तस्वीर ने उसे हिला दिया।
    ​तस्वीर में अरीव एक काले रंग की किंग साइज़ चेयर पर बैठा हुआ था, एकदम राजा की तरह। उसने सिर्फ़ काले रंग की पैंट पहनी हुई थी और उसका बायाँ कंधा खुला हुआ था जिस पर साँप का एक टैटू बना हुआ था। उसके बाल बिखरे हुए थे और उसके एक हाथ में एक काले रंग का साँप था जिसका मुँह उसने अपने हाथों से पकड़ा हुआ था। दूसरे हाथ में रेड वाइन का ग्लास था। पूरे कमरे में काले और लाल रंग का कॉम्बिनेशन था। तस्वीर को देखकर साँवी डर गई। "यह कैसा इंसान है जो साँप को अपने हाथ में लेता है?"
    ​तस्वीर को देखते ही साँवी के हाथों से कप गिरते-गिरते बचा। वह तुरंत कॉफी टेबल पर कप रखकर तेज़ी से कमरे से बाहर निकल गई।
    ​रोहित की उत्सुकता और साँवी का दर्द
    ​बाहर आकर साँवी ने गहरी साँस ली। उसका दिल अभी भी धड़क रहा था। तभी उसे नीचे से रोहित की आवाज़ आई, "मिस! मेरे लिए नाश्ता लगा दो।"
    ​साँवी तुरंत सीढ़ियों से नीचे भागी और डाइनिंग टेबल पर नाश्ता लगाने लगी। रोहित पहली बार साँवी को क़रीब से देख रहा था। उसने मुस्कुराते हुए पूछा, "आपका नाम क्या है?"
    ​साँवी ने बहुत धीरे से जवाब दिया, "साँवी।"
    ​"ओह," रोहित ने कहा और अपनी सीट पर बैठ गया। तभी वह उत्सुक होकर बोला, "एक बात पूछूँ? मेरा भाई तो ख़ूबसूरत लड़कियों को घर में काम पर रखना पसंद नहीं करता। तो आप यहाँ कैसे आ गईं?"
    ​साँवी यह सवाल सुनकर चौंक गई। उसके चेहरे पर डर की एक लहर दौड़ गई। उसने अपनी नज़रें झुका लीं और कोई जवाब नहीं दिया। रोहित ने साँवी के चेहरे को देखा, और फिर उसकी नज़रें उसके दुपट्टे से ढके हुए हाथों पर पड़ीं। उसे साँवी के जले हुए हाथ दिख गए।
    ​रोहित ने अपनी गलती महसूस की और तुरंत कहा, "सॉरी! मुझे आपसे यह सवाल नहीं पूछना चाहिए था। मुझे माफ़ कर दीजिएगा।" उसके चेहरे पर पछतावा साफ़ दिख रहा था।
    ​साँवी ने धीरे से सिर उठाया और कहा, "कोई बात नहीं।" उसने अपनी भावनाओं को छुपाया और चुपचाप किचन में चली गई।
    ​रुद्राक्ष और उदय का आगमन
    ​तभी अरीव नीचे हॉल में आया। वह पूरी तरह से काले सूट में था और कमर पर बंदूक लगाए हुए था। वह सीधे अपनी किंग-साइज़ कुर्सी पर बैठ गया।
    ​उसने रोहित से कहा, "आज रुद्राक्ष भाई और उदय इंडिया आ रहे हैं। तुम्हें उन्हें एयरपोर्ट से लाने जाना है।"
    ​रोहित की आँखें ख़ुशी से चमक उठीं। "सच में! रुद्राक्ष भैया आ रहे हैं! वाह! पर उन्होंने मुझे कॉल क्यों नहीं किया?"
    ​"रुद्राक्ष के साथ उदय भी आ रहा है," अरीव ने दोबारा कहा।
    ​"हूँह!" रोहित ने मुँह बिचकाया। "उस उदय का क्या काम है यहाँ? वह हमेशा मुझे ही परेशान करता रहता है।"
    ​अरीव ने रोहित की बात को नज़रअंदाज़ किया और नाश्ता करने लगा। दोनों भाई नाश्ता करके अपनी-अपनी काली BMW कार में बैठकर निकल गए—एक ऑफिस की ओर, दूसरा एयरपोर्ट की ओर।
    ​घर में अब सिर्फ़ साँवी थी और बाकी स्टाफ़, जो सुबह 8 बजे आ चुके थे। साँवी ने अपने जले हुए हाथ देखे और उसके दिल में एक टीस उठी। उसे अपने माँ-बाप और भाई की याद आई। वह अब कुछ भी खाने की इच्छा नहीं रखती थी। उसने सारे बर्तन धोए और चुपचाप अपने कमरे में चली गई।
    ​वह बालकनी में झूले पर बैठ गई। ठंडी हवा चल रही थी और सफ़ेद गुलाबों की महक उसके मन को शांति दे रही थी, पर उसका दिल अभी भी दर्द, ग़म और बदले की आग से जल रहा था। उसने आँखें बंद कीं और अपने परिवार को याद किया।
    ​क्या साँवी की ज़िंदगी में ये दोनों भाई उसके पुराने रिश्तों की तरह एक नई शुरुआत लेकर आएँगे? जानने के लिए पढ़ते रहिए अगला अध्याय...

  • 6. Shatranj the game of blood - Chapter 6

    Words: 1699

    Estimated Reading Time: 11 min

    अध्याय 6: ख़ामोशी और एक नई परछाई

    दोपहर का वक़्त था। मेंशन की गलियों में हमेशा की तरह सन्नाटा पसरा हुआ था। अरीव और रोहित सुबह ही बाहर निकल गए थे—किसी मीटिंग और पुराने दोस्तों को एयरपोर्ट से लाने। स्टाफ अपनी-अपनी ड्यूटी में लगा हुआ था, लेकिन मेंशन का आकार इतना बड़ा था कि भीड़ होने पर भी अकेलापन महसूस होता था।

    किचन में काम करते हुए साँवी की नज़रें बार-बार बाहर खिंच रही थीं। बर्तन खनकते, भाप उठती, लेकिन उसका ध्यान जैसे कहीं और था। उसकी आँखों में अब भी रात का डर बैठा था—वही भयानक सपने, वही गोलियों की आवाज़ें, वही जलती हुई चीखें। उसने सिर झटककर खुद को सँभालने की कोशिश की।

    “आज का दिन शांत रहना चाहिए…” उसने खुद से बुदबुदाया।

    लेकिन तभी, बालकनी की ओर से एक अजीब-सी सरसराहट सुनाई दी। ऐसा लगा जैसे किसी भारी जानवर के कदमों से घास हिल रही हो। साँवी का दिल धक-धक करने लगा।

    वह धीरे-धीरे बाहर निकली और गार्डन की ओर बढ़ी। धूप हल्की पड़ चुकी थी, पेड़ों की छाँव में एक ठंडी नमी थी। तभी उसकी नज़र पड़ी—घास के बीच बैठा एक काला साया।

    वह पैंथर था। विशाल, चमचमाती काली खाल वाला। उसका नाम वही था, जिसे रात में उसने दूसरों की बातों में सुना था—अब्र।

    अब्र शांति से बैठा था, उसकी आँखें बंद थीं, मानो ध्यान में लीन हो। लेकिन उसके चेहरे पर एक गहरी उदासी की परत साफ झलक रही थी। साँवी वहीं ठिठक गई। उसके मन में डर भी था, लेकिन उसी डर के पीछे एक अजीब-सी खिंचाव भी।

    उसने एक पल को खुद को सँभाला और दबे पाँव उसकी ओर बढ़ी। उसका दुपट्टा हवा में हल्का-सा लहराया।

    “तुम यहाँ अकेले क्यों बैठे हो?” साँवी की आवाज़ फुसफुसाहट जैसी थी।

    अब्र ने अपनी काली पलकों को धीरे से उठाया। उसकी आँखें—गहरी, ठंडी, लेकिन अजीब तरह से समझदार—सीधे साँवी की आँखों में उतरीं। साँवी को लगा जैसे वह उसके दिल का सारा दर्द पढ़ रहा हो।

    उसने हिम्मत करके अपने दुपट्टे को सरकाया और अपने जले हुए हाथ आगे कर दिए।
    “देखो… ये जल गए हैं। बहुत दर्द होता है। लेकिन… हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए, है ना?”

    अब्र धीरे-धीरे उठा। उसकी विशाल देह घास पर लहराती-सी चली आई। साँवी का दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि उसे लगा जैसे वो सुनाई देगा। लेकिन डर की जगह भीतर एक अजीब-सी शांति उतर रही थी।

    अब्र ने उसके हाथों को सूँघा। साँवी की साँसें थम गईं। अगले ही पल, अब्र ने धीरे से उसकी हथेली को अपनी जीभ से छुआ। जैसे उसके ज़ख्मों को ढाँप लेना चाहता हो।

    साँवी की आँखों से आँसू बह निकले। उसे अपने भाई की याद आ गई—वो भाई जो हमेशा कहता था,
    “जानवरों से दोस्ती करो, वो इंसानों से ज्यादा वफ़ादार होते हैं।”

    साँवी घुटनों पर बैठ गई। उसके होंठ काँप रहे थे।
    “तुम्हें भी अकेलापन सताता है ना? मुझे भी… बहुत।”

    अब्र ने उसकी आँखों में देखा और एक हल्की-सी आवाज़ निकाली—न तो दहाड़, न गुर्राहट—बस एक उदास-सी ध्वनि, जैसे सहमति में सिर हिला रहा हो।

    उस पल, साँवी को लगा जैसे उसे एक खामोश साथी मिल गया हो।


    ---

    शाम का समय

    शाम ढलते ही मेंशन की रौनक लौट आई। सामने से दो कारें आकर रुकीं। पहली कार से रोहित और अरीव उतरे, दूसरी से दो और चेहरे बाहर आए—रुद्राक्ष और उदय।

    रोहित जैसे ही रुद्राक्ष को देखकर दौड़ा, उसकी आवाज़ गूँज उठी—
    “भाई!!!”

    दोनों ने गले लगाया। अरीव हल्की मुस्कान के साथ बगल में खड़ा रहा।

    उदय ने आते ही रोहित को छेड़ दिया—
    “अरे, तुम अभी भी इतने ही बच्चे हो क्या? ज़रा भी बड़े नहीं हुए!”

    रोहित ने तुरंत मुँह फुला लिया।
    “उदय! तुम अपनी बकवास बंद करो।”

    सब हँस पड़े। तभी हेड सर्वेंट सुरेश आया और बोला,
    “सर, आपके कमरे तैयार हैं।”

    रुद्राक्ष ने सिर हिलाकर कहा, “धन्यवाद, सुरेश।

    सुरेश झुककर चला गया।
    तभी अरीव कहता है। हमें अंदर चलना चाहिए भाई चलिए वहीं बैठकर बात करते हैं तभी रोहित कहता है अतीव सही कह रहा है भाई चलिए अंदर।

    उसी वक्त, डाइनिंग हॉल से नाश्ते की ट्रे लेकर साँवी आई। सफेद सलवार-कुर्ते में, सिर झुकाए हुए।

    रुद्राक्ष की नज़र उस पर ठहर गई।
    “अरे, ये कौन है?” उसने रोहित से पूछा।

    “यही तो हमारी नई कुक है, साँवी,” रोहित ने मुस्कुराकर कहा।

    साँवी ने सिर झुकाया और धीमे स्वर में बोली, “नमस्ते।”

    “नमस्ते,” रुद्राक्ष ने जवाब दिया। उसकी आँखें साँवी के शांत चेहरे पर टिक गईं।
    “तुम बहुत अच्छा खाना बनाती हो। रोहित ने हमें तुम्हारे खाने के बारे में रास्ते भर बहुत बताया है। हम भी तुम्हारे हाथ के खाने को जरूर खाना चाहेंगे।

    साँवी ने हल्की-सी मुस्कान दी, फिर नज़रें झुका लीं।

    रुद्राक्ष ने सहजता से पूछा,
    “कहाँ की रहने वाली हो?”

    “दिल्ली।”

    “ओह… और तुम्हारा परिवार?”

    सवाल सुनते ही साँवी का चेहरा उतर गया। उसकी आँखों में वही पुराना दर्द तैर गया। उसने तुरंत मुँह फेर लिया और ट्रे लगाने लगी।

    रुद्राक्ष को अपनी भूल का एहसास हुआ।
    “सॉरी, मुझे ये नहीं पूछना चाहिए था।”

    साँवी ने कुछ नहीं कहा। बस चुपचाप टेबल पर खाना सजाने लगी।

    अरीव ने इशारे से रुद्राक्ष को शांत किया। वह जानता था कि साँवी की खामोशी के पीछे कोई गहरी कहानी छिपी है। वह उससे बात नहीं करता था पर उसके पास इतना तजुर्बा था कि वह किसी को भी देखकर उसका अस्तित्व बता दे।

    इसी बीच रोहित फिर बीच में आ गया।
    संवि मैंने सुबह में फ्रिज में एक चैट लगाया था खाने का क्या वह सारे खान बने हैं आज।
    संवि कहती है हां मैंने सारे खाने बनाए हैं सर।

    साँवी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
    “टेबल पर हैं, सर।”

    रोहित उछल पड़ा।
    “वाह! तुम बहुत अच्छी हो। मैंने सोचा था तुम भी मेरे भाई की तरह बहुत गंभीर होगी।”

    उसकी मासूमियत पर साँवी के होंठों पर एक हल्की मुस्कान तैर गई। उसे अपने छोटे बहन की याद आ गई, जो हमेशा ऐसे ही उसे छेड़ती था।

    रुद्राक्ष ने गौर किया कि जहाँ उसके सवालों पर साँवी चुप्पी ओढ़ लेती थी, वहीं रोहित के सामने वह सहज हो जाती थी।

    रुद्राक्ष मन ही मन में सोचता है की रोहित उसके साथ हमेशा से रह रहा है इसीलिए वह उसके साथ सहज है।
    और यह बात सच भी थी जब वह पहले पहली बार यहां आई थी वह किसी के साथ सहज नहीं थी।

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    अब्र की मौजूदगी

    जैसे ही सब लोग बातों में लगे थे, तभी बाहर से एक भारी-सी आहट आई। गार्डन से सीधा डाइनिंग हॉल की खिड़की तक काली परछाई चली आई।

    सबके सिर मुड़े—वह अब्र था।

    वह शांत भाव से चलता हुआ सीधे साँवी के पीछे आकर खड़ा हो गया। उसकी काली आँखें कमरे के हर व्यक्ति को देख रही थीं, लेकिन उसका ध्यान सिर्फ साँवी पर था।

    उदय ने उसे देखते ही डरकर कुर्सी पीछे खिसकाई।
    “ये… ये यहां क्यों है भाई! इसे तो अब तक ब्लैक मेंशन में चले जाना चाहिए था? और ये इस लड़की के पीछे-पीछे क्यों घूम रहा है?”

    उसने हँसते हुए जोड़ा,
    “मुझे तो लग रहा है, ये अभी हम सबको खा जाएगा। और ये लड़की कौन है जिसके पीछे ये ऐसे मंडरा रहा है?”
    उदय डरते हुए संवि से कहता है ।है देवी इसे मेरे पास से हटाइए।

    रोहित खिलखिलाकर हँसा।
    “अरे उदय, डरपोक कहीं के! ये अरीव का पालतू ब्लैक पैंथर है। अब तेरे कहने से इसे कोई घर से बाहर थोड़ी ना निकाल देगा। यह भी हमारे फैमिली मेंबर के जैसा है। और देखो, इसे साँवी बहुत पसंद आ गई है।”

    अरीव ने गहरी नज़र से अब्र को देखा। सचमुच, पैंथर का सारा ध्यान साँवी पर था। जैसे वह उसकी पहरेदारी कर रहा हो।

    साँवी थोड़ा घबराई, लेकिन उसकी आँखों में डर नहीं था। उसने धीरे से अब्र के सिर पर हाथ रखा।
    “अब्र, सब ठीक है… तुम जाओ।”

    लेकिन अब्र वहीं बैठ गया। उसकी भारी साँसों की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज रही थी।

    उदय अब भी काँपते हुए बोला,
    “भाई, मैं तो कह रहा हूँ, इसे बाँध दो कहीं। नहीं तो एक दिन किसी का हाथ-पाँव खा जाएगा।”

    अरीव ने सख्ती से कहा,
    “अब्र किसी को नुकसान नहीं पहुँचाता। जब तक वो चाहे।”

    साँवी ने हल्की आवाज़ में जोड़ा,
    “ये नुकसान नहीं करेगा।”

    कमरे में एक पल को खामोशी छा गई। सबके चेहरे पर हैरानी थी।

    रुद्राक्ष ने ध्यान से साँवी और अब्र को देखा। उसकी आँखों में गहरी सोच उतर आई—मानो वह समझ रहा हो कि इन दोनों के बीच कुछ ऐसा है, जिसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता।


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    रात की खामोशी

    रात को सब अपने-अपने कमरों में चले गए। लेकिन साँवी के कमरे के बाहर अब्र का साया मंडराता रहा।

    साँवी बिस्तर पर बैठी थी। उसके हाथों की जलन फिर से यादों को कुरेदने लगी। माँ की मुस्कान, भाई की शरारत, पापा का कहा—
    “मेरी गुड़िया से कभी ये सब काम मत करवाना, वरना उसके हाथ जल जाएँगे।”

    उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
    “पापा… देखिए, अब मेरे हाथ सचमुच जल चुके हैं। अब मुझे कोई अपनी बेटी नहीं कहेगा।”

    तभी उसने दरवाज़े के पास आहट सुनी। अब्र भीतर आ गया। उसकी काली आँखें सीधे साँवी की आँखों से मिलीं।

    साँवी पहले तो घबरा गई, लेकिन अब्र ने धीरे से उसके पास आकर उसके जले हुए हाथ को चाट लिया। आँसुओं से भीगी साँवी हौले से मुस्कुराई।

    “तुम… तुम मेरे साथ हो, ना?”

    अब्र ने हल्की दहाड़ जैसी आवाज़ निकाली, मानो कह रहा हो—“हाँ।”

    साँवी ने उसका सिर सहलाया और फूट-फूटकर रो पड़ी। अब्र फर्श पर लेट गया, उसकी साँसें कमरे में गूँज रही थीं।

    आधी रात को जब भयानक सपनों ने साँवी को फिर झकझोरा, अब्र उठ गया। उसने अपने पंजे से उसके कंधे को हल्का-सा छुआ, जैसे कह रहा हो—“डरो मत।”

    साँवी काँपते हुए उसके पास सिमट गई। उसने अब्र की गरम साँसों में खुद को छुपा लिया। पहली बार, उसे लगा कि वह अकेली नहीं है।


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    एक अनकहा रिश्ता

    सुबह जब वह जागी तो अब्र कमरे में नहीं था। लेकिन उसके दिल में अजीब-सी शांति थी।

    उसने खिड़की से बाहर देखा। घास पर ओस की बूंदें चमक रही थीं, और थोड़ी दूर अब्र आराम से लेटा था।

    साँवी के होंठों पर हल्की मुस्कान तैर गई।
    “मेरे घाव शायद कभी नहीं भरेंगे… लेकिन अब मैं अकेली नहीं हूँ।”


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    ✨ क्या अब्र की यह दोस्ती साँवी की ज़िंदगी में नया मोड़ लाएगी? और क्या रुद्राक्ष व उदय के आने से अरीव और साँवी के बीच अनजाना रिश्ता बदल जाएगा?

  • 7. Shatranj the game of blood - Chapter 7

    Words: 2083

    Estimated Reading Time: 13 min

    अध्याय 7: राख और प्रतिशोध की आहट

    रात का समय था। हवेली के डाइनिंग हॉल में असाधारण शांति पसरी हुई थी। ऊँचे-ऊँचे झूमरों से निकलती सुनहरी रोशनी पूरे हॉल को जगमगा रही थी। बाहर की ठंडी हवा और अँधेरा मानो इस सन्नाटे को और गहरा बना रहे थे।

    लंबी मेज़ पर पाँच लोग बैठे थे—अरीव, साँवी, रुद्राक्ष, रोहित और उदय। मेज़ पर तरह-तरह के व्यंजन सजाए हुए थे।

    रोहित ने खाने की प्लेट देखकर ठहाका लगाया—
    “भाई, ये चिकन इतना सख़्त क्यों है? मुझे लग रहा है जैसे रसोइए ने इसे डम्बल समझकर जिम कर लिया हो।”

    साँवी ज़ोर से हँस पड़ी। उसके होंठों पर खिली वह मासूम मुस्कान माहौल को अचानक हल्का कर गई। अरीव ने उसकी ओर देखा, और अनजाने ही उसकी आँखों में नरमी आ गई। उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान उभर आई।

    रुद्राक्ष चुपचाप बैठा था। उसकी आँखें जैसे किसी गहरी याद में खोई हुई थीं। उदय हमेशा की तरह चौकस निगाहों से चारों तरफ़ देख रहा था, मानो खतरे की आहट सूँघ रहा हो।

    यह सब किसी सामान्य पारिवारिक डिनर जैसा लग रहा था, लेकिन यह शांति तूफ़ान से पहले की खामोशी थी।


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    हमला

    अचानक बाहर से एक भयानक धमाका हुआ। पूरी हवेली की खिड़कियाँ हिल उठीं। काँच की खनखनाहट ने सबको चौंका दिया।

    उसके तुरंत बाद गोलियों की आवाज़ गूँजी। बाहर तैनात गार्ड्स चीखते हुए गिरने लगे।

    “क्या हो रहा है!” साँवी की चीख उभरी।

    इससे पहले कि कोई कुछ समझता, बिजली चली गई। हॉल घुप अँधेरे में डूब गया। भारी झूमर ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगा और कुछ ही पल बाद धड़ाम की आवाज़ के साथ टूटकर नीचे गिर पड़ा। टुकड़े चारों तरफ़ बिखर गए।

    दरवाज़े धड़ाम से खुले। नक़ाबपोश हमलावरों का झुंड अंदर घुस आया। उनके हाथों में बंदूकें चमक रही थीं। उनके बीच खड़ा उनका लीडर ज़रा आगे बढ़ा। ऊँचा कद, काले कपड़े, चेहरे पर नक़ाब—बस आँखें चमक रहीं थीं।

    उसकी आवाज़ ठंडी और गूँजदार थी—
    “आज तुम्हारे गुनाहों का हिसाब होगा।”


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    रुद्राक्ष पर इल्ज़ाम

    उसकी नज़र सीधी रुद्राक्ष पर टिक गई। उसने बंदूक की नली उसकी ओर करते हुए दहाड़ा—
    “मेरी बहन की मौत तुम्हारी वजह से हुई! तुमने उसे धोखा दिया और उसने अपनी जान ले ली!”

    साँवी ने सदमे से रुद्राक्ष की ओर देखा।
    “ये क्या कह रहा है…?”

    रुद्राक्ष का चेहरा सख़्त हो गया। उसने गहरी आवाज़ में कहा—
    “नहीं! उसकी मौत मेरी वजह से नहीं हुई। मैंने उसे धोखा नहीं दिया। मैंने… मैंने समझाने की बहुत कोशिश की थी। वो अपने ही हालातों से टूटी थी, मैं दोषी नहीं हूँ।”

    लीडर ने ठहाका मारा।
    “झूठ! तुम जैसे लोग हमेशा बहाने बनाते हो। मेरी बहन का खून तुम्हारे सर है।”

    रुद्राक्ष ने फिर ज़ोर देकर कहा—
    “नहीं! मैं कसम खाता हूँ, मैंने उसे कभी तकलीफ़ नहीं दी। उसकी मौत… मेरी वजह से नहीं थी!”

    उसकी आँखों में अपराधबोध नहीं, बल्कि सच्चाई की चमक थी। उसी क्षण अरीव, उदय और साँवी सब समझ गए कि यह इल्ज़ाम ग़लतफ़हमी है। रुद्राक्ष दोषी नहीं है।

    लेकिन लीडर सुनने को तैयार नहीं था। उसका चेहरा ग़ुस्से से तमतमा उठा।


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    लड़ाई की शुरुआत

    “गोली मारो इसे!” उसने चिल्लाया।

    बस इतना कहना था कि पूरा हॉल गोलियों की बौछार से गूँज उठा। गार्ड्स चीखते हुए गिरने लगे। हर तरफ़ गोलियों की आवाज़ और धुएँ की गंध भर गई।

    अरीव तुरंत हरकत में आ गया। उसने साँवी को एक तरफ़ धकेला और खुद ज़मीन पर लुढ़क गया। अंधेरे में उसने गन निकाली और निशाना साधा।

    धड़ाम! एक हमलावर गिर पड़ा।

    धम-धम-धम! बाकी हमलावर चारों ओर से फायरिंग करने लगे। मेज़, कुर्सियाँ और दीवारें गोलियों से छलनी हो रही थीं।

    अरीव ने साँवी को अपनी ओर खींचा।
    “झुको! सर झुकाकर रहो!”

    साँवी काँपते हुए उसके कंधे से चिपक गई।

    उदय भी मोर्चा संभाल चुका था। उसने अपनी पिस्तौल निकाली और गोलियों की गूँज के बीच लगातार फायर किया। रोहित डर से चीख रहा था, लेकिन बीच-बीच में उसकी घबराई हुई बातें माहौल को अजीब-सा हल्का कर देती थीं।

    “भाई… मैं तो मरने से पहले भी शादी नहीं कर पाया!” वह चिल्लाया, और गोली चलाते हुए उदय ने खीझकर कहा—
    “चुप कर, वरना सच में तेरी शादी कभी नहीं होगी!”


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    अरीव की चालाकी

    अंधेरे और धुएँ में अरीव ने जगह-जगह छुपते हुए लड़ाई लड़ी। वह कभी मेज़ के पीछे सरकता, कभी टूटे झूमर के पास से गोली चलाता। उसकी गन की हर गोली सटीक थी।

    एक-एक कर हमलावर गिरते गए। लेकिन उनकी संख्या इतनी ज़्यादा थी कि लड़ाई थमने का नाम नहीं ले रही थी।

    लीडर आग-बबूला हो चुका था। उसने चिल्लाकर कहा—
    “पूरी हवेली जला दो!”

    उसके आदमियों ने पेट्रोल फेंकना शुरू कर दिया। मोटे परदे, लकड़ी की दीवारें और फर्नीचर पल भर में आग पकड़ने लगे।


    यह सब देखकर संवि बहुत डर गई और उसे अपना पास्ट याद आने लगा। वह पसीने से तरबतर हो रही थी।

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    हवेली जलती है

    लपटें आसमान छूने लगीं। धुआँ चारों ओर फैल गया। गार्ड्स की चीखें गूँजने लगीं।

    अरीव ने साँवी का हाथ कसकर पकड़ा।
    “यहाँ से निकलना होगा, अभी!”

    उदय, रोहित और रुद्राक्ष भी पास आ गए। सबने पीछे का रास्ता पकड़ा। लेकिन आग और गोलियों के बीच रास्ता आसान नहीं था।

    भागते हुए अरीव ने कई और गोलियाँ चलाईं। धुएँ में उसकी आँखें लाल हो गई थीं, लेकिन उसका निशाना अब भी सही था।

    लीडर जाते-जाते पीछे मुड़ा और दहाड़ा—
    “यह तो बस शुरुआत है! हर दिन तुम्हें मेरी बहन की मौत की याद दिलाऊँगा।”

    इसके बाद वह अपने आदमियों के साथ रात की अँधेरी छाया में गुम हो गया।


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    क्लिफहैंगर

    पीछे पूरी हवेली जलकर राख में बदल रही थी। भारी दरवाज़े गिर रहे थे, दीवारें ढह रही थीं।

    साँवी ने डरते-डरते जलती हवेली की ओर देखा। उसकी आँखों में आँसू थे।

    अरीव ने उसका हाथ कसकर पकड़ा।
    “अब हमें जंगल की तरफ़ जाना होगा… यही एक रास्ता है।”

    पाँचों लोग भागते हुए हवेली के पीछे फैले अँधेरे जंगल में घुस गए।

    पीछे रह गई सिर्फ़ राख, धुआँ और प्रतिशोध की आहट।

    "जंगल की ठंडी रात और अनकहा सहारा""

    हवेली की दीवारों पर गूंजती गोलियों की आवाज़ अब भी उनके कानों में पड़ी हुई थी। धुएँ की हल्की गंध, टूटी खिड़कियों से उड़ती धूल और पीछे छूटते कदमों की आहट—सब मानो पीछा कर रही हो। साँवी, अरीव, रुद्राक्ष, रोहित और उदय, पाँचों अपनी साँसों को काबू में रखते हुए भागते-भागते आखिरकार जंगल के भीतर तक आ पहुँचे।

    पेड़ों की लम्बी कतारें, चारों तरफ़ फैला अंधेरा और ठंडी हवा—सब मिलकर उन्हें डरा भी रहे थे और राहत भी दे रहे थे। डर इसलिए कि अब सामने क्या आने वाला है, किसी को नहीं पता… और राहत इसलिए कि कम से कम जान बचाकर निकल तो आए।

    साँवी हाँफती हुई एक पेड़ के पास रुकी। उसका सीना तेज़ी से उठ-गिर रहा था। उसने चारों ओर देखा और धीरे से बुदबुदाई—
    “हम… सच में बच गए…”

    अरीव, जो सबसे आगे चल रहा था, अचानक ठहर गया। उसने पलटकर सबको देखा। उसका चेहरा अभी भी कठोर और गंभीर था, लेकिन उसकी आँखों में हल्की-सी नमी छिपी थी, जिसे किसी ने नोटिस नहीं किया।
    “सब ठीक हो?” उसने संक्षेप में पूछा।

    “ठीक तो हैं,” रुद्राक्ष ने थकी-थकी हँसी के साथ कहा, “लेकिन हवेली छोड़कर अब हम टार्ज़न बन गए हैं। बस बेल पकड़कर झूलना बाकी है।”

    रोहित हँस पड़ा, “हाँ और तू टार्ज़न नहीं, चिम्पांज़ी लगेगा।”

    थकान से टूटी साँसों के बीच भी सबके होंठों पर मुस्कान आ गई। डर और तनाव के बीच यह छोटी-सी हँसी किसी मरहम जैसी लगी।


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    जंगल का पहला पड़ाव

    कुछ देर बाद सबने एक खुली जगह देखी। पेड़ों के बीच घिरा छोटा-सा मैदान, चारों तरफ़ झाड़ियों की सरसराहट और ऊपर आसमान में झिलमिलाते तारे।

    “यहीं रुकते हैं,” अरीव ने धीमे लेकिन ठोस स्वर में कहा।

    सब वहीं बैठ गए। थके हुए शरीर अब और आगे बढ़ने की ताक़त नहीं रखते थे। उदय ने ज़मीन से कुछ सूखी लकड़ियाँ खींचीं, और आग जलाने की कोशिश करने लगा।

    रुद्राक्ष वहीं घास पर लेटकर आसमान को देख रहा था। उसने हँसते हुए कहा,
    “भाई, हवेली का AC और रजाई छोड़कर अब यहाँ झींगुर और मच्छरों के बीच सोना पड़ेगा। सच में, हमारी किस्मत देखो।”

    रोहित ने मज़ाक में कहा,
    “क्यों? तू तो कहता था ना, adventure चाहिए… अब मिल रहा है adventure।”

    साँवी मुस्कुरा तो दी, लेकिन उसके चेहरे पर अब भी चिंता साफ़ झलक रही थी। उसने धीरे से अरीव की तरफ़ देखा, जो पेड़ों के बीच लगातार चौकन्ना होकर खड़ा था।

    “हम कब तक यहाँ रहेंगे?” उसने धीमी आवाज़ में पूछा।

    अरीव ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में वह ठंडी गंभीरता थी, जिससे साँवी अक्सर घबरा जाती थी, लेकिन आज उसी गंभीरता ने उसे भरोसा दिया।
    “जब तक मेरा असिस्टेंट बाकी बॉडीगार्ड्स के साथ हमें लेने नहीं आता।”

    साँवी ने सिर हिलाया। उसके मन में डर कम तो नहीं हुआ, लेकिन यह जानकर सुकून मिला कि कोई इंतज़ाम ज़रूर होगा।


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    अचानक साँवी का दर्द

    जैसे-जैसे रात गहराने लगी, ठंडी हवा ने सबको कंपा दिया। आग की हल्की आँच से ही कुछ राहत मिल रही थी।

    तभी साँवी का चेहरा अचानक बदल गया। उसके माथे पर पसीना आ गया और पेट के निचले हिस्से में तेज़ दर्द उठने लगा। उसने अपनी साँस रोककर दर्द छुपाने की कोशिश की।

    “सब ठीक है?” रोहित ने उसे देखा।

    “हाँ… मैं ठीक हूँ,” साँवी ने तुरंत जवाब दिया, लेकिन उसकी आवाज़ काँप रही थी।

    अरीव, जो अब तक सबकुछ चुपचाप देख रहा था, उसकी तरफ़ बढ़ा। उसकी तेज़ निगाहें सबकुछ भांप चुकी थीं।
    “तुम्हें दर्द हो रहा है,” उसने ठंडे स्वर में कहा।

    साँवी की आँखें झुक गईं। वह कुछ कह नहीं पाई। उसके लिए यह पहली बार था होश में आने के बाद… और उसके भीतर डर भी था और झिझक भी।


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    अरीव की देखभाल

    अरीव ने बिना कुछ और पूछे ज़मीन पर बैठकर उसे सहारा दिया।
    “लेट जाओ,” उसने संक्षेप में कहा।

    साँवी हिचकिचाई, लेकिन दर्द इतना बढ़ चुका था कि वह विरोध न कर सकी। धीरे-धीरे लेट गई।

    अरीव ने अपनी जैकेट उतारी और घास पर बिछा दी। फिर उसका सिर अपनी गोद में रख दिया। उसकी उँगलियाँ हल्के-से उसके बालों को छू रही थीं—न देखभाल का इज़हार, न कोई कोमल शब्द, बस ठंडी चुप्पी में छिपी हुई गर्माहट।

    “पानी लाओ,” उसने उदय से कहा।

    रोहित तुरंत उठकर पास की थैली से बोतल निकाल लाया। अरीव ने बोतल उसके होठों से लगाई।
    “थोड़ा-थोड़ा पीओ,” उसने सख़्त लेकिन धीमी आवाज़ में कहा।

    फिर उसने आग के पास जाकर कुछ सूखे कपड़े और पत्ते जुटाए, ताकि जगह थोड़ी आरामदायक बन सके।

    साँवी की आँखों में आँसू आ गए। यह वही अरीव था, जो हमेशा ठंडी, निष्ठुर नज़रों से देखता था… लेकिन आज उसके हाथों में अनकही कोमलता थी।


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    भाइयों जैसा सहारा

    रुद्राक्ष पास बैठा था। उसने धीरे से कहा,
    “साँवी, ये कोई शर्म की बात नहीं। हर लड़की को ये झेलना पड़ता है। तू अकेली नहीं है।”

    साँवी ने उसे आँसुओं से भीगी नज़र से देखा।

    उदय ने भी सहारा देते हुए कहा,
    “हाँ, और तू समझे कि तू हमारी बहन जैसी है। हम सब यहीं हैं तेरे साथ।”

    रोहित ने माहौल हल्का करने की कोशिश की।
    “और अगर भगवान ने हमें लड़कियों की जगह बनाया होता, तो हमें भी यही सब झेलना पड़ता। सच कहूँ तो, भगवान ने हमें बड़ी मुश्किल से बचा लिया।”

    यह सुनकर सब हँस पड़े। हँसी हल्की थी, लेकिन उस तनाव और दर्द को कुछ पल के लिए दूर ले गई।

    साँवी भी हँस पड़ी—आँसुओं के बीच आई यह हँसी उसकी थकान को तोड़ गई।


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    रात का सन्नाटा और डर

    धीरे-धीरे आग की लपटें कम होने लगीं। चारों तरफ़ जंगल का सन्नाटा छा गया। झींगुरों की लगातार आवाज़, उल्लू की हूट और पत्तों की सरसराहट—सब मिलकर माहौल और डरावना बना रहे थे।

    साँवी अब अरीव की गोद में लेटी थी। दर्द थोड़ा कम हुआ था, लेकिन थकान से उसकी आँखें भारी हो रही थीं। अरीव चुपचाप उसकी ओर देख रहा था। उसके चेहरे पर वही ठंडी गंभीरता थी, लेकिन अंदर कहीं उसकी साँसें तेज़ थीं।

    बाकी तीनों आग के पास बैठे बातचीत कर रहे थे, लेकिन उनकी आवाज़ें धीरे-धीरे नींद में डूबती चली गईं।


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    क्लिफहैंगर

    अचानक पेड़ों के पीछे से हल्की सरसराहट हुई।

    अरीव की आँखें तुरंत चौकन्नी हो गईं। उसने धीरे से साँवी का सिर नीचे रखा और खड़ा हो गया।

    पेड़ों के बीच से एक धुंधली परछाई हिलती-डुलती दिखी। रुद्राक्ष ने भी देख लिया।
    “भाई… कुछ तो है वहाँ।”

    उदय और रोहित ने हथियार संभाले। सबकी साँसें थम गईं।

    अंधेरे में एक काली आकृति पेड़ों के बीच ठहर गई। दूर से उसकी आँखों में अजीब-सी चमक दिख रही थी।

    अरीव के चेहरे पर अब ठंडक नहीं, बल्कि कठोर क्रोध था।

    उसने धीरे से फुसफुसाया—
    “समर राणा के आदमी…”

    साँवी की आँखें डर से फैल गईं। सबको एहसास हो गया—
    “खतरा अभी टला नहीं है…”