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बाप की छाया"🩷

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Sadia khanam

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"बाप की छाया 🩵" रफीक़ एक साधारण मज़दूर था। रोज़ सुबह सूरज निकलने से पहले उठता और देर रात घर लौटता। उसके कपड़ों पर मिट्टी, पसीना और मेहनत की लकीरें साफ़ दिखती थीं, मगर चेहरे पर हमेशा एक सुकून भरी मुस्कान रहती थी। उसकी सबसे बड़ी दौलत उसका बेटा आरिफ़ था...

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  • 1. बाप की छाया"🩷 - Chapter 1

    Words: 1065

    Estimated Reading Time: 7 min

    बाप की छाया"

    रफीक़ एक साधारण मज़दूर था। रोज़ सुबह सूरज निकलने से पहले उठता और देर रात घर लौटता। उसके कपड़ों पर मिट्टी, पसीना और मेहनत की लकीरें साफ़ दिखती थीं, मगर चेहरे पर हमेशा एक सुकून भरी मुस्कान रहती थी।

    उसकी सबसे बड़ी दौलत उसका बेटा आरिफ़ था। रफीक़ का सपना था कि उसका बेटा उस छत के नीचे न रहे जहाँ टपकती छतरी और अधूरी ख्वाहिशें हों, बल्कि पढ़-लिखकर एक ऊँचे मकान में, इज़्ज़त की ज़िंदगी जिए।

    आरिफ़ अक्सर पूछता—
    “अब्बू, आप इतनी मेहनत क्यों करते हो? आप तो कभी आराम नहीं करते।”

    रफीक़ हंसकर कह देता—
    “बेटा, बाप का आराम तो तब है जब उसके बच्चे चैन से जीते हैं। तुम मेरी दुआ भी हो और मेरी मेहनत की वजह भी।”

    दिन बीतते गए। रफीक़ की हथेलियों में छाले पड़ गए, पीठ झुक गई, मगर उसने कभी शिकायत नहीं की। उसने अपनी इच्छाएँ, अपनी ख्वाहिशें सब कुर्बान कर दीं—बस एक ख्वाब पूरा करने के लिए कि उसका बेटा पढ़-लिखकर काबिल बने।

    आरिफ़ ने भी अपने अब्बू की उम्मीदों को टूटने नहीं दिया। दिन-रात मेहनत की, पढ़ाई की और आखिरकार एक बड़ी नौकरी पा ली। जिस दिन उसे नौकरी मिली, वह ख़ुशी से दौड़ता हुआ घर आया और बोला—

    “अब्बू! आपकी मेहनत रंग लाई… आज से आप काम पर नहीं जाएंगे।”

    रफीक़ की आँखों में आँसू थे। उसने बेटे को सीने से लगाया और धीरे से कहा—
    “बेटा, आज सच में लग रहा है कि मेरी मेहनत सफल हो गई। अब मुझे आराम नहीं, बल्कि सुकून मिल गया।”

    उस दिन आरिफ़ ने पहली बार महसूस किया कि सच में बाप की शख्सियत एक पेड़ की तरह होती है—जो खुद धूप सहता है, मगर अपने बच्चों को हमेशा छाया देता है।

    सीख:
    बाप का प्यार अक्सर चुप्पी में छिपा होता है। वह अपनी मोहब्बत दिखाता नहीं, मगर उसकी हर सांस, हर मेहनत अपने बच्चों के लिए ही होती है।भाग 2)

    समय तेज़ी से बीतता गया। अब आरिफ़ बड़ी नौकरी में रम गया था। उसके पास गाड़ी थी, अपना मकान था और दुनिया की हर वो सुविधा, जिसका सपना उसके अब्बू ने कभी देखा था।

    लेकिन ज़िंदगी की रफ्तार इतनी तेज़ हो गई कि अब्बू और बेटे के बीच पहले जैसी बातें कम होने लगीं।

    रफीक़ अक्सर दरवाज़े पर बैठा रहता, इस इंतज़ार में कि बेटा ऑफिस से लौटकर उससे थोड़ी बातें कर लेगा। मगर आरिफ़ थकान, काम और दोस्तों की महफ़िल में इतना मशगूल हो गया कि अब्बू की तरफ़ का ध्यान कम होता गया।

    एक रात जब आरिफ़ घर लौटा, उसने देखा कि अब्बू पुराने बक्से से कुछ पुरानी कॉपियाँ निकालकर देख रहे हैं। उन कॉपियों के पन्नों पर आरिफ़ की बचपन की लिखाई थी। रफीक़ ने बेटे को देखा और मुस्कुराते हुए कहा—

    “याद है बेटा, जब तुम पहली बार ‘अब्बू’ लिख पाए थे… मैंने उस दिन सोचा था कि मेरा बेटा ज़रूर आगे बढ़ेगा।”

    आरिफ़ के गले में जैसे कांटा अटक गया। वह सोचने लगा कि आज जिस मुकाम पर वह है, वह सिर्फ़ अपने अब्बू की मेहनत और दुआओं से है। लेकिन उसने कब से अब्बू को यूं अकेला छोड़ दिया था?

    उस रात नींद आरिफ़ की आँखों से गायब थी। उसने फैसला किया कि चाहे काम कितना भी हो, अब वह अब्बू को कभी अकेला महसूस नहीं होने देगा।

    अगली सुबह जब रफीक़ नमाज़ पढ़कर चुपचाप आँगन में बैठे थे, तभी आरिफ़ उनके पास आकर बैठ गया। उसने अब्बू का हाथ पकड़कर कहा—

    “अब्बू, आप मेरे लिए छाया बने रहे… अब आपकी बारी है कि आप आराम करें। मैं अब आपकी छाया बनूंगा।”

    रफीक़ की आँखें भर आईं। उसने बेटे के सिर पर हाथ रखकर दुआ दी—
    “खुश रहो बेटा… यही तो हर बाप की तमन्ना होती है।”

    सीख:
    माँ की ममता और बाप की छाया—दोनों ही अनमोल हैं। माँ बिना जताए रो देती है, और बाप भाग 3)

    आरिफ़ ने अब अपने अब्बू को अकेला महसूस न होने देने की ठान ली थी। अब ऑफिस से लौटते ही सबसे पहले अब्बू के पास बैठना उसकी आदत बन गई।

    रफीक़ भी जैसे फिर से खिल उठे थे। वह अपने बेटे से छोटी-छोटी बातें करते, पुरानी यादें सुनाते और कभी अपने बचपन की कहानियाँ बताते।

    एक दिन अब्बू ने कहा—
    “बेटा, ज़िंदगी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है। सबसे बड़ा सबक ये कि इन्सान को हमेशा मेहनत करनी चाहिए, लेकिन अपने अपनों को कभी नहीं भूलना चाहिए। दौलत तो आती-जाती रहती है, मगर अपनों का साथ ही असली दौलत है।”

    आरिफ़ ये सुनकर सोच में पड़ गया। सचमुच, उसने दौलत तो बहुत कमा ली थी, मगर अपने अब्बू को लगभग खो ही दिया था। शुक्र था कि वक़्त रहते उसे अपनी गलती का एहसास हो गया।

    कुछ महीनों बाद, आरिफ़ ने अब्बू का सपना पूरा किया। उसने गाँव में एक बड़ा मकान बनवाया। जब रफीक़ उस घर में दाख़िल हुए, तो उनकी आँखों में खुशी के आँसू थे। उन्होंने बेटे से कहा—
    “बेटा, मैंने छत के लिए मेहनत की थी, और तूने मुझे आसमान दे दिया।”

    उस दिन पूरे गाँव में खुशियाँ थीं। सब कहते थे—
    “देखो, बाप की छाया कैसी होती है… जो बेटों को बड़ा करती है,
    भाग 4 – अंतिम)

    गाँव का नया मकान अब रफ़ीक़ की ज़िंदगी की सबसे बड़ी खुशी बन गया था। लोग आते, दुआएँ देते और कहते—
    “रफ़ीक़ भाई, तुम्हारी मेहनत रंग लाई। सच है, बाप की छाया ही बच्चों की असली ताक़त होती है।”

    रफ़ीक़ का दिल अब सुकून से भर गया था। वह अक्सर आँगन में बैठकर बच्चों की किलकारियाँ सुनते, पड़ोसियों से बातें करते और कभी-कभी चुपचाप आसमान की तरफ़ देखते, जैसे अल्लाह का शुक्र अदा कर रहे हों।

    एक रात जब आरिफ़ उनके पास बैठा था, रफ़ीक़ ने धीमी आवाज़ में कहा—
    “बेटा, अब मुझे कोई फ़िक्र नहीं। मैंने अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी कर दीं। तू मेरे लिए आसमान से भी बड़ी दौलत है। याद रखना, अगर कभी ज़िंदगी तुझ पर बोझ बने… तो बाप की दी हुई दुआ हमेशा तेरे सिरहाने होगी।”

    आरिफ़ की आँखें भर आईं। उसने अब्बू का हाथ पकड़कर कहा—
    “अब्बू, आपने हमेशा मुझे छाया दी। अब मैं वादा करता हूँ कि ज़िंदगी के हर मोड़ पर, मैं आपको कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।”

    उस रात चाँदनी बहुत प्यारी थी। जैसे खुद आसमान भी इस बाप-बेटे के रिश्ते को सलाम कर रहा हो।

    सीख:
    बाप की मोहब्बत अक्सर खामोशी में छिपी होती है। वह शायद कभी खुलकर नहीं कहता, मगर उसकी हर साँस, हर मेहनत, हर दुआ अपने बच्चों के लिए ही होती है।
    सच है—
    “माँ जन्नत का रास्ता है, और बाप उसकी ठंडी छाया।”