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तेरी मोहब्बत, मेरा जुनून"

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diksha

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**कहानी की नायिका है मासूम और ख़ूबसूरत Ishita. उसके चाँद जैसे चेहरे पर सजी हेज़ल ग्रीन आँखें और होंठों पर छोटा-सा तिल उसे भीड़ में सबसे अलग और अनोखा बनाते हैं। Ishita का दिल सपनों और छोटी-छोटी खुशियों से भरा है। उसे हँसना, दोस्तों के साथ वक़्त बिताना...

Total Chapters (9)

Page 1 of 1

  • 1. SAAYA- ek junooni ishq 👿 - Chapter 1

    Words: 1123

    Estimated Reading Time: 7 min

    सुबह की सुनहरी धूप खिड़की से छनकर कमरे में उतर रही थी। हल्की किरणें बिस्तर पर सोई उस नाज़ुक-सी लड़की के चेहरे पर पड़ रही थीं। गुलाबी होंठ, लंबी पलकें और मासूमियत से भरा चेहरा… नींद में भी वो इतनी प्यारी लग रही थी कि लगता था जैसे कोई गुड़िया सपनों में खोई हो।

    नीचे से माँ की आवाज़ गूंजी—

    “Ishu… उठ जा बेटा, आज तेरे कॉलेज का पहला दिन है। कब तक सोएगी?”

    लेकिन ऊपर कमरे में कोई हलचल न हुई।

    माँ ने फिर आवाज़ दी—

    “रोहन… बेटा, जा ज़रा अपनी बहन को जगा दे, कब तक सोती रहेगी।”

    सीढ़ियों पर चढ़ते हुए भाई ने शरारती मुस्कान के साथ कहा—

    “ठीक है मम्मा… मैं जगाता हूँ इसे।”

    रोहन के दिमाग़ में शैतानी सूझी। वो धीरे से बहन के कमरे में घुसा, मोबाइल स्पीकर से ज़ोर-ज़ोर का गाना कनेक्ट किया और कान के पास बजा दिया।

    “धड़ाम!”

    इशिता हड़बड़ा कर उठ बैठी, नींद से बोझिल आँखें मलते हुए चिल्लाई—

    “भैया! ये क्या है…? आप सब लोग मेरी नींद के दुश्मन हो!”

    रोहन हंसते-हंसते लोटपोट हो गया।

    “अरे पगली, कॉलेज का पहला दिन है… अब तो उठ जा राजकुमारी।”

    इशिता गुस्से और नखरे से भरी चेहरा बना कर तकिये से अपने भाई को मारने लगी।

    लेकिन सच ये था कि इशिता जितनी मासूम थी उतनी ही खूबसूरत भी।

    उसकी हेज़ल ग्रीन आँखें किसी को भी रोक कर देखने पर मजबूर कर देती थीं। होंठों के किनारे एक छोटा-सा तिल उसे और भी ख़ास बनाता था। गोरी-चिट्टी त्वचा, नाज़ुक हाथ, और इतनी कोमल कि लगता था जैसे कोई उसे छू भी ले तो लाल हो जाए।

    इशिता सच में ऐसी थी… जिसे देखकर कोई भी पागल हो सकता था।

    शायद… कोई पहले ही हो चुका था।

    रोहन मुस्कुराते हुए बोला—

    “चल मेरी मिर्ची, अब सोने का नाटक बंद कर। उठ और चमक धमक कर तैयार हो जा।”

    इशिता मुँह बना कर बोली—

    “आपको तो बस मुझे सताने में मज़ा आता है।”

    फिर धीरे-धीरे उठकर आईने में देखने लगी। धूप अब उसके चेहरे को और भी चमका रही थी… और शायद यहीं से उसकी नई कहानी शुरू होने वाली थी।

    इशिता धीरे-धीरे उठकर तैयार होने के लिए बाथरूम में चली गई।

    कुछ देर बाद बाहर आई तो उसके रूप का नज़ारा ही अलग था।

    उसने लाल रंग की नेट की लॉन्ग कुर्ती पहनी थी, जिसके कपड़े से उसकी पतली-सी कमर हल्की झलक रही थी। नीचे जीन्स, कानों में छोटे झुमके, होंठों पर हल्की-सी लिप बाम की चमक और आँखों में थोड़ा-सा काजल… बस इतना ही काफी था। उसे मेकअप की ज़रूरत ही कहाँ थी।

    आईने के सामने खड़ी होकर खुद को देखती हुई बोली—

    “हाय… कितनी सुंदर लग रही हूँ मैं!”

    फिर शरारती अंदाज़ में खुद को ही फ्लाइंग किस दे दी और हँस दी।

    बस्ता उठाकर जब नीचे आई तो रोहन ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और मज़ाक उड़ाते हुए बोला—

    “आज तो मेरी मिर्ची सच में मिर्ची लग रही है… वैसे तू कुछ भी पहन ले, लगेगी तो हमेशा बंदरिया ही।”

    इशिता ने मुँह फुलाकर कहा—

    “देखा ना मम्मा… भईया फिर से मुझे चिढ़ा रहे हैं।”

    इतने में उसकी माँ उर्वशी जी बाहर आईं, हल्की-सी साड़ी पहने, चेहरे पर ममता भरी मुस्कान। उन्होंने रोहन को कान पकड़ते हुए कहा—

    “बेटा, क्यों सारी दुनिया का काम छोड़कर अपनी बहन को ही तंग करता रहता है?”

    रोहन हँसते हुए बोला—

    “अरे मम्मा, यही तो मेरा काम है।”

    तभी उसके पापा, सत्याम मिश्रा, अख़बार हाथ में लिए बाहर आए और जैसे ही बेटी को देखा, उनकी आँखें चमक उठीं।

    “अरे मेरी बिटिया रानी तो आज बिल्कुल परी लग रही है।”

    इशिता दौड़कर पापा से लिपट गई और मासूमियत से मुस्कुराई—

    “आप ही सबसे अच्छे हो पापा…”

    उस पल घर का माहौल हंसी-खुशी से भर गया।

    लेकिन इशिता को कहाँ पता था कि घर के इस सुरक्षित दायरे से बाहर उसकी ज़िंदगी में कोई खामोश साया पहले से मौजूद है, जो आज से उसकी हर साँस पर नज़र रखने वाला था…

    रोहन दर्द से चिल्लाया—

    “अरे मम्मा छोड़ो ना कान, ऊँच… दर्द हो रहा है!”

    सत्याम जी हँसते हुए बोले—

    “इतना बड़ा हो गया है, फिर भी बहन को परेशान करता है… यही तेरी सज़ा है।”

    ये सुनकर इशिता खिलखिला कर हँस पड़ी और पापा भी उसके साथ हँसने लगे। दोनों बाप–बेटी की हँसी देख उर्वशी जी भी मुस्कुराए बिना न रह पाईं।

    उर्वशी जी ने आखिरकार उसका कान छोड़ते हुए कहा—

    “वैसे आज तेरा इंटरव्यू नहीं है?”

    रोहन ने अकड़ते हुए बालों में हाथ फेरा और थोड़ा attitude के साथ बोला—

    “हाँ मम्मा, Asia की top company VSR में है… tension मत लो, हो ही जाएगा।”

    जैसे ही ‘VSR’ का नाम इशिता के कानों में पड़ा, उसका चेहरा एकदम गंभीर हो गया। दिल की धड़कन जैसे थोड़ी तेज़ हो गई। उसे अचानक एक अजीब-सी बेचैनी ने घेर लिया…

    पर क्यों?

    वो खुद भी समझ नहीं पा रही थी।

    रोहन ने हाथ हिलाते हुए कहा—

    “अरे कहां खो गई मिर्ची? चल, नाश्ता करते हैं। मम्मा ने तेरे फेवरेट आलू के परांठे बनाए हैं।”

    कहते ही उसने इशिता का हाथ पकड़ा और खींचकर डायनिंग टेबल पर बिठा दिया।

    टेबल पर गर्मागर्म परांठों की खुशबू फैल गई, जिससे इशिता की मासूम आँखों में चमक आ गई।

    “वाह मम्मा… आज तो मज़ा आ जाएगा।” उसने मुस्कुराते हुए कहा और पहली बाइट मुँह में डाल ली।

    मासूम घर, हँसी–मज़ाक, प्यार से भरा माहौल…

    लेकिन शायद इशिता को नहीं पता था कि उसके घर के बाहर कोई और भी है, जो उसकी इस हँसी को अपने पागलपन की जकड़ में लेने के लिए तैयार बैठा है।

    नाश्ता खत्म होते ही रोहन ने जल्दी से कार की चाबी उठाई।

    “चल इशु, ready हो जा… नहीं तो first day pe ही late हो जाएगी।”

    इशिता ने अपने बैग का zip check किया और धीरे-धीरे पीछे की सीट पर बैठ गई।

    रोहन ड्राइविंग सीट पर था, सामने उसके पापा–मम्मा खड़े मुस्कुरा रहे थे।

    गाड़ी स्टार्ट होते ही घर से बाहर निकली…

    लेकिन किसी ने नहीं देखा कि उसी मोड़ पर, पेड़ की छाया में खड़ा कोई अनजान साया उनकी हर हरकत देख रहा था।

    उसकी नज़रें सिर्फ़ इशिता पर थीं।

    वो गाड़ी की खिड़की से झाँकती हुई उसकी मासूम आँखों और मुस्कुराते होंठों को देख रहा था।

    जैसे ही गाड़ी आगे बढ़ी… उसकी आँखों की पुतलियाँ हल्की-सी सिकुड़ गईं।

    “अब से… हर कदम पर, हर पल… मैं तुम्हारे साथ हूँ।”

    उसने बुदबुदाते हुए अपने होंठों पर हल्की मुस्कान रखी और पीछे-पीछे चल पड़ा।

    कुछ देर बाद गाड़ी कॉलेज के गेट पर रुकी।

    इशिता ने पहली बार अपने नए कॉलेज को देखा—

    ऊँची बिल्डिंग, हरे-भरे लॉन और चारों तरफ़ चहल-पहल।

    उसकी आँखें चमक उठीं, जैसे कोई बच्ची पहली बार मेले में पहुँची हो।

    “वाह… बिल्कुल फिल्मों जैसा लग रहा है…”

    उसने खिड़की से बाहर झाँकते हुए कहा।

    पर उसे कहाँ पता था कि ये film अब उसकी ज़िंदगी का सबसे खतरनाक chapter लिखने वाली थी।

  • 2. SAAYA- ek junooni ishq 👿 - Chapter 2

    Words: 1082

    Estimated Reading Time: 7 min

    राेहन ने इशु को कॉलेज के गेट पर उतारा।

    “ऑल द बेस्ट, इंटरव्यू अच्छा से देना,” इशु मुस्कुराकर बोली।

    “थैंक यू, छोटी… और तुम भी ध्यान रखना। पहली बार कॉलेज जा रही हो न… किसी से ज़्यादा बातें मत करना,” रोहन ने हल्की सख़्त आवाज़ में कहा।

    इशु बस मुस्कुरा कर सिर हिला देती है।

    रोहन गाड़ी घुमाकर चला जाता है, और इशु वहीं खड़ी होकर कॉलेज के ऊँचे गेट्स और सुंदर बिल्डिंग्स को देखती रह जाती है। उसकी आँखों में चमक आ जाती है—जैसे कोई छोटी-सी परी पहली बार अपने पंख फैलाकर नई दुनिया को देखने जा रही हो।

    वो धीरे-धीरे कदम बढ़ाती है, लेकिन…

    दूसरी ओर सड़क पर खड़ी एक काली कार का शीशा थोड़ा-सा नीचे खिसकता है। किसी की निगाहें उसकी हर हरकत को चुपचाप कैद कर रही थीं।

    वो आदमी मुस्कुराता है—

    मेरी मासूम angel …”

    उसकी आँखों में एक अजीब-सी चमक थी।

    उसकी चुप्पी, उसका साया, अब इशु की हर राह का साथी बनने वाला था…

    जैसे ही इशिता कॉरिडोर से क्लास की तरफ बढ़ रही थी, अचानक सामने से एक लड़की आकर उससे टकरा गई।

    लड़की (हड़बड़ाकर): "Oh sorry sorry! Wo kya h na mere पीछे पागल कुत्ता पड़ गया था, भागते-भागते तुझसे टकरा गई।"

    इशिता हँस पड़ी, "कोई बात नहीं… तुम्हारा नाम?"

    लड़की (हाथ बढ़ाते हुए): "Riya Purohit. और तुम new admission?"

    इशिता हल्की मुस्कान के साथ, "Haan… Ishita Mishra. Art student."

    रिया (खुश होकर): "Are wah! Same class… nice to meet you!"

    फिर अचानक शरारत से रिया ने इशिता के गाल को pinch कर दिया, रिया हँसते-हँसते बोली –

    “तू तो बहुत क्यूट है यार…”

    इशा ने बाल झटकते हुए हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया –

    “हाँ, ये तो मुझे पता है… मेरी तारीफ़ तो रोज़ सुनने की आदत है।”

    फिर मज़ाकिया अंदाज़ में रिया की तरफ़ देखते हुए बोली –

    “लेकिन सच कहूँ, तू भी कम सुंदर नहीं है… पहली बार किसी ने मुझे इतनी सीधी-सादी तारीफ़ दी है।”

    रिया ने नाटकीय अंदाज़ में हाथ जोड़कर कहा –

    “अरे वाह! मतलब हम दोनों ही सुंदरियाँ एक ही क्लास में… अब तो कॉलेज के लड़कों का बुरा हाल होने वाला है।”

    दोनों ज़ोर से हँस पड़ीं, और उसी पल उनकी दोस्ती की नींव रखी गई।

    इशिता और रिया, दोनों कॉलेज के अंदर नई-नई दुनिया को बड़ी उत्सुकता से देख रही थीं। अभी-अभी एडमिशन लिया था तो हर चीज़ उनके लिए एकदम नई थी। दोनों आपस में हंसते-खिलखिलाते हुए क्लास ढूँढ ही रही थीं कि तभी अचानक एक लड़का सामने से आ गया।

    “हाय मिस, आप लोग कुछ ढूँढ रही हैं क्या?” उस लड़के की नज़रें सीधे इशिता पर ही टिक गईं। उसकी आँखों में वही चमक थी जो अक्सर लड़के पहली बार किसी खूबसूरत लड़की को देखकर दिखाते हैं।

    रिया ने उसकी आँखों का पीछा किया और तुरंत सब समझ गई। वो हल्की मुस्कान दबाते हुए बोली –

    “हाँ, ढूँढ तो रहे हैं… और तुम भी तो कुछ ढूँढ रहे हो शायद? रास्ता खाली करना है तो हट जाओ मिस्टर।”

    इतना कहकर रिया ज़ोर से कदम बढ़ाती है और जाते-जाते जानबूझकर उसके पैर पर अपना पैर रख देती है। लड़का जोर से चिल्ला उठा –

    “आआह्ह…!!”

    दोनों लड़कियाँ ठहाका मारकर हँसते हुए आगे बढ़ जाती हैं। इशिता हँसते-हँसते कहती है –

    “रिया! ये क्या किया तुमने? बेचारा दर्द से कराह रहा था।”

    रिया शरारती अंदाज़ में आँखें मटकाते हुए बोली –

    “अरे ऐसे छिछोरों को मैंने पहले भी बहुत सीधा किया है। अब तू मेरे साथ है तो तुझे प्रोटेक्ट करना मेरी ड्यूटी है न!”

    इशिता सिर हिलाते हुए बाल झटककर मुस्कराती है –

    “तू भी न रिया…!”

    दोनों बातों में मशगूल क्लास की तरफ बढ़ती हैं और आखिरकार अपनी क्लास मिल जाती है। अंदर कदम रखते ही लगभग हर लड़के की नज़रें इशिता पर टिक जाती हैं। उसके चेहरे की मासूमियत, बड़े-बड़े expressive नयन और उसकी सादगी भरी खूबसूरती ने सबका ध्यान खींच लिया था।

    क्लास के तीसरे रो में दोनों एक साथ जाकर बैठ जाती हैं। इशिता थोड़ी झिझक के साथ इधर-उधर देखती है तो नोटिस करती है कि कितनी जोड़ी आँखें बार-बार उसी की तरफ उठ रही हैं।

    वो धीमे स्वर में रिया से कहती है –

    “सब ऐसे क्यों देख रहे हैं यार…”

    रिया उसकी बात सुनकर शरारती मुस्कान देती है और कान में फुसफुसाती है –

    “क्योंकि तू है ही इतनी cute… और मानना पड़ेगा, entry तो तूने heroine जैसी मारी है।”

    इशिता हँसते हुए हल्का सा धक्का देती है –

    “पागल…”

    दोनों हँस पड़ती हैं और क्लास का पहला दिन उनकी दोस्ती की शुरुआत को और गहरा कर देता है।

    क्लासरूम में माहौल अभी-अभी जम रहा था। सारी नज़रें इधर-उधर घूम रही थीं, कुछ नई दोस्तियाँ बन रही थीं, तो कहीं फुसफुसाहट में पुराने स्कूल की बातें। तभी अचानक दरवाज़ा खुला और अंदर आए प्रोफ़ेसर शर्मा—गंभीर से चेहरे के साथ, हाथ में फाइल और ऐनक ठीक करते हुए।

    “गुड मॉर्निंग स्टूडेंट्स,” उन्होंने गहरी आवाज़ में कहा। पूरा क्लास एकदम चुप हो गया।

    सब छात्र खड़े हो गए और उन्होंने इशारे से बैठने को कहा।

    “मैं प्रोफ़ेसर शर्मा हूँ, इस सेमेस्टर आपका इंट्रोडक्टरी लेक्चर लूंगा। सबसे पहले तो आप सबका स्वागत है कॉलेज की इस नई जर्नी में।”

    रोल कॉल शुरू हुआ। एक-एक करके सबके नाम पुकारे जाने लगे। जब “इशिता वर्मा” बोला गया, तो पूरी क्लास की आधी नज़रें फिर उसकी ओर घूम गईं। उसकी नीली आँखें, मासूम मुस्कान और कॉन्फिडेंट अंदाज़… हर कोई बस देखता ही रह गया।

    पास बैठी रिया हल्का-सा मुस्कुराते हुए धीरे से बोली, “देखा, क्लास तो पहले ही दिन से तुझपे फिदा हो गया।”

    इशिता ने आँखें घुमाई और धीमे से फुसफुसाई, “तू भी न… बस चुप रह।”

    लेक्चर में आगे प्रोफ़ेसर ने कॉलेज की रूल्स और रूटीन समझाए—

    “क्लास अटेंडेंस 75% ज़रूरी है, और सबसे ज़रूरी… आप सबको आने वाले समय में डिसिप्लिन के साथ पढ़ाई करनी होगी। यहाँ सिर्फ नंबर नहीं, बल्कि आपके बिहेवियर पर भी नज़र रखी जाएगी।”

    स्टूडेंट्स बीच-बीच में हाँ में सिर हिलाते रहे।

    कुछ लड़के, जो बार-बार इशिता की ओर देख रहे थे, अब किताब खोलने का नाटक करने लगे।

    रिया ने धीरे से इशिता की कुहनी पर टोकते हुए कहा, “लगता है आने वाला सेमेस्टर तेरे लिए आसान नहीं होगा, सबकी निगाहें तो तुझपे ही अटकी हैं।”

    इशिता हल्के-से हँस दी, “अरे छोड़, मुझे किसी से कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं यहाँ पढ़ने आई हूँ।”

    लेक्चर खत्म होते ही प्रोफ़ेसर ने कहा, “अगली क्लास से सब अपना इंट्रोडक्शन तैयार करके लाएँगे। मैं देखना चाहता हूँ कि आप सबके गोल्स और सपने क्या हैं।”

    घंटी बजी और क्लास थोड़ी हलचल से भर गई। कुछ स्टूडेंट्स ग्रुप बनाने लगे, तो कुछ बस इधर-उधर टकटकी लगाकर देखते रहे।

  • 3. SAAYA- ek junooni ishq 👿 - Chapter 3

    Words: 1075

    Estimated Reading Time: 7 min

    पिछले अध्याय में आपने देखा कि रोहन ने इशु को कॉलेज के गेट पर उतारा और उसे ध्यान रखने को कहा। इशु कॉलेज की बिल्डिंग्स को देखती रह जाती है। सड़क पर खड़ी एक काली कार में बैठा आदमी उसे देखता है और मुस्कुराता है।

    इशिता कॉलेज में रिया से टकराती है और दोनों दोस्त बन जाती हैं। एक लड़का इशिता को देखकर आकर्षित होता है, जिसे रिया मज़ा चखाती है। क्लास में सब इशिता को देखते हैं, जिससे वह थोड़ा झिझकती है। प्रोफ़ेसर शर्मा क्लास लेते हैं और कॉलेज के रूल्स बताते हैं।

    अब आगे

    टीचर सबसे पहले पहली बेंच से शुरू करते हैं।

    एक लड़का खड़ा हुआ, घबराते-घबराते बोला—

    “सर… मेरा नाम है राहुल, मुझे क्रिकेट खेलना पसंद है।”

    पूरी क्लास हँस पड़ी क्योंकि उसकी आवाज़ ऐसे काँप रही थी जैसे रिजल्ट सुनाने आया हो।

    रिया ताली बजाकर बोली—

    “वाह क्रिकेटर साहब, अगली बार हमारी टीम में भी खेलना।”

    सारी क्लास फिर से खिलखिलाकर हँस पड़ी।

    फिर बारी-बारी से सब अपने इंट्रो देते गए।

    जब एक लड़की खड़ी हुई और बोली, “मुझे गाने का बहुत शौक है,”

    तो पीछे से किसी लड़के ने मज़ाक किया—

    “तो हमें अभी सुना दो।”

    लड़की शरमा गई और बैठ गई।

    अब बारी आई रिया की।

    रिया पूरे कॉन्फिडेंस से खड़ी हुई, हाथ से बाल झटकते हुए बोली—

    “हाय, मैं हूँ रिया। मुझे मस्ती करना, लोगों की टांग खींचना और फ्रेंड्स को परेशान करना बहुत पसंद है।”

    क्लास ठहाके मारकर हँसने लगी।

    टीचर भी मुस्कुराते हुए बोले—

    “वाह, अच्छा है। लेकिन पढ़ाई का भी शौक रखना।”

    रिया शरारती अंदाज़ में बोली—

    “वो तो इशिता का शौक है सर, मेरा नहीं।”

    सारी क्लास हँस पड़ी और इशिता तुरंत उसे घूरने लगी।

    अब सबसे बड़ी बारी आई—इशिता की।

    पूरी क्लास चुप हो गई।

    लड़के बड़े ध्यान से देखने लगे।

    इशिता हल्के से खड़ी हुई, थोड़ा नर्वस होते हुए बोली—

    “मेरा नाम इशिता है, मुझे किताबें पढ़ना, पेंटिंग करना और… और…”

    रिया बीच में बोल पड़ी—

    “और सबकी नज़रों में छा जाना!”

    क्लास ज़ोर से हँसी।

    इशिता शर्म से लाल हो गई और धीरे से रिया को कोहनी मारी।

    “तू तो मुझे डुबा ही देगी,” वह फुसफुसाई।

    लेक्चर के बाद, जब क्लास खत्म हुई, तो इशिता और रिया बाहर निकलते हुए हँस रही थीं।

    रिया बोली—

    “देखा, मैंने कहा था न? सबकी नज़रें तुझ पर ही हैं।”

    इशिता ने नकली गुस्से से कहा—

    “तू चुप रहेगी या नहीं? वरना सच में तुझे क्लासरूम के बाहर छोड़ दूँगी।”

    दोनों फिर से खिलखिलाकर हँसने लगीं।

    Canteen में हंसी-मज़ाक का शोर गूंज रहा था। हर टेबल पर ग्रुप्स में स्टूडेंट्स बैठे बातें कर रहे थे। रिया और इशिता भी अपने ट्रे लेकर एक कोने की टेबल पर बैठ गईं।

    रिया मज़ाकिया अंदाज़ में बोली—

    “देख इशिता, ये तेरी entry का असर है… पूरी canteen तुझको ही घूर रही है। और मुझे तो ऐसा लग रहा है जैसे मैं तेरे bodyguard की तरह बैठी हूँ।”

    इशिता ने हंसते हुए उसके कंधे पर हल्की सी चपत मारी—

    “ओह hello! तू भी कम खूबसूरत नहीं है। बस तेरे confidence से लड़के डर जाते हैं। और तू protect करने का काम भी अच्छे से कर रही है।”

    दोनों हंस पड़ीं। तभी पास से तीन–चार लड़के गुजरते हुए उन्हें बार-बार देख रहे थे। उनमें से एक लड़का हिम्मत करके उनकी टेबल के पास रुक गया।

    वो थोड़ी हिचकिचाहट के साथ मुस्कुराया—

    “Uh… hi! मैं यहाँ बैठ सकता हूँ? Actually canteen में सारी seats almost भरी हैं…”

    रिया ने तुरंत उसकी आँखों में घूरते हुए कहा—

    “Excuse me? ये जगह reserved है, समझे? और हाँ, ज्यादा smart बनने की कोशिश मत करना।”

    लड़का थोड़ा हड़बड़ाया लेकिन फिर भी इशिता को देखकर बोला—

    “Actually… मैं बस दोस्ती करना चाहता था। Hi, I’m Kabir.”

    इशिता, जो थोड़ी simple और soft nature की थी, हल्की सी मुस्कुराई—

    “Hi Kabir.”

    रिया ने घूरते हुए उसकी तरफ चम्मच टकराया—

    “बस hi bol diya, ab nikal bhi. Dost banna है तो line में लग… पहले मैं हूँ, फिर teacher, फिर बाकी। समझ आया?”

    वो लड़का हंसते हुए बोला—

    “ठीक है ठीक है, मैं disturb नहीं करूंगा। बस सोचा था… नए session में friends बनाना अच्छा होता है।”

    वो हल्की सी awkward हंसी हंसते हुए वहां से चला गया।

    रिया ने इशिता की तरफ देखा—

    “देखा… यही problem है। सबको तू hi दिखाई देती है। और तू बेचारी sabko polite होकर reply करती रहती है।”

    इशिता ने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा—

    “Arey polite रहना बुरी बात है क्या? और फिर दोस्ती करने में क्या problem है?”

    रिया ने हाथ नचाते हुए कहा—

    “Problem यह है कि दोस्ती से शुरू होते-होते feelings तक पहुंचने में देर नहीं लगती। और फिर मुझे तेरे ऊपर पहरा देना पड़ेगा।”

    दोनों फिर से हंस पड़ीं और बातें करने लगीं।

    लेकिन उन्हें क्या पता… canteen के ठीक सामने, थोड़ी दूर वाले dark corner में कोई बैठा था। उसकी cold नज़रें लगातार इशिता पर टिकी थीं।

    वो ‘साया’।

    उसकी आँखों में अजीब सी चमक और गुस्सा था।

    उसके अंदर उथल-पुथल मची हुई थी—

    "वो… किसी और से बात क्यों कर रही है? मुस्कुरा क्यों रही है उसके लिए? वो मेरी है… सिर्फ मेरी।"

    उसने हाथ की मुट्ठियाँ कस लीं। सामने रखी table पर उसके nails धंस गए। गुस्से की वजह से उसकी साँसे तेज़ हो रही थीं।

    उसे अंदर से लग रहा था जैसे किसी ने उसकी चीज़ छीनने की कोशिश की हो।

    वो धीरे से बड़बड़ाया—

    “मुस्कुराना है तो सिर्फ मेरे लिए… किसी और के लिए नहीं।”

    -------- कॉलेज की घंटी बजते ही इशिता बाहर निकलती है। दूर से रोहन अपनी बाइक पर खड़ा उसे देखकर मुस्कुराता है।

    रोहन: “चल Mirchi, जल्दी बैठ जा… तो बताओ, कैसा रहा तेरा दिन?”

    इशिता पीछे सीट पर बैठते ही उत्साहित होकर बोलती है—

    इशिता: “भाई… आज का दिन बहुत अच्छा गया! सब कुछ मज़ेदार था और मेरी एक नई दोस्त बन गई—Riya। सच में, बड़ा मज़ा आया।”

    रोहन मुस्कुराते हुए सिर हिलाता है और पूछता है—

    रोहन: “अच्छा? तो बाकी सब कैसा रहा?”

    इशिता थोड़ी हँसते हुए कहती है—

    “सब बढ़िया था। classes smoothly चली और बहुत कुछ नया सीखने को मिला।”

    रोहन ध्यान से सुनते हुए मुस्कुराया—

    “ठीक है Mirchi, अच्छा लगा सुनकर। अब घर चलते हैं, और वहाँ जाकर आराम से सब बातें बताना।”

    इशिता भी मुस्कुराई और कार की सीट पर आराम से बैठ गई।

    इशिता: “हाँ भाई, घर पहुँचकर सब विस्तार से बताऊँगी… आज का दिन सच में यादगार था।”

    रोहन कार स्टार्ट करता है और धीरे-धीरे घर की ओर निकलते हैं। रास्ते में इशिता अपनी सारी छोटी-छोटी खुशियों और अनुभवों को share करती रही, और रोहन उसे ध्यान से सुनता रहा।

  • 4. SAAYA- ek junooni ishq 👿 - Chapter 4

    Words: 1143

    Estimated Reading Time: 7 min

    पिछले अध्याय में आपने देखा कि रोहन ने इशु को कॉलेज के गेट पर उतारा और उसे ध्यान रखने को कहा। इशु कॉलेज की बिल्डिंग्स को देखती रह जाती है। सड़क पर खड़ी एक काली कार में बैठा आदमी उसे देखता है और मुस्कुराता है।

    इशिता कॉलेज में रिया से टकराती है और दोनों दोस्त बन जाती हैं। एक लड़का इशिता को देखकर आकर्षित होता है, जिसे रिया मज़ा चखाती है। क्लास में सब इशिता को देखते हैं, जिससे वह थोड़ा झिझकती है। प्रोफ़ेसर शर्मा क्लास लेते हैं और कॉलेज के रूल्स बताते हैं।

    टीचर सबसे पहले पहली बेंच से शुरू करते हैं। राहुल, जो क्रिकेट खेलना पसंद करता है, घबराते हुए अपना परिचय देता है, जिससे क्लास में हँसी आ जाती है। एक और लड़की, जिसे गाने का शौक है, एक लड़के के मज़ाक का शिकार हो जाती है। रिया पूरे आत्मविश्वास से अपना परिचय देती है, जिससे टीचर भी मुस्कुराते हैं। इशिता थोड़ी झिझकते हुए अपना परिचय देती है, और रिया के मज़ाक से क्लास में फिर हँसी आ जाती है।

    क्लास खत्म होने के बाद, इशिता और रिया कैंटीन में जाती हैं। रिया इशिता को बताती है कि सब उस पर ध्यान दे रहे हैं। तभी कबीर नाम का एक लड़का उनकी टेबल पर बैठने की इजाज़त माँगता है, लेकिन रिया उसे भगा देती है। रिया इशिता को सलाह देती है कि वह लड़कों से ज़्यादा विनम्र न रहे, लेकिन इशिता को यह पसंद नहीं आता। इस बीच, एक "साया" नाम का व्यक्ति उन्हें दूर से देख रहा होता है, जो इशिता की किसी और से बात करने पर गुस्सा हो रहा है।

    कॉलेज की घंटी बजने पर इशिता बाहर निकलती है, जहाँ रोहन बाइक पर इंतज़ार कर रहा होता है। इशिता उसे अपने दिन के बारे में बताती है, कि उसे मज़ा आया और उसकी एक नई दोस्त, रिया, बन गई है। रोहन सुनकर खुश होता है और वे घर की ओर निकल जाते हैं, जहाँ इशिता बाकी बातें बताएगी।

    अब आगे
    रोहन और इशिता घर वापस आते हैं। जैसे ही वो अंदर कदम रखते हैं, सबकी नज़र उन पर चली जाती है।
    मम्मी सबसे पहले मुस्कुराते हुए पूछती हैं –
    "तो, कैसा रहा आज का दिन, इशु?"

    इशिता तुरंत ही सोफे पर उछलते हुए बैठ जाती है, चेहरे पर मासूम सी मुस्कान के साथ –
    "मम्मा, आज का दिन तो बहुत अच्छा गया! सब लोग बहुत प्यारे थे… और सुनिए, मेरी एक नई दोस्त भी बन गई है, बिल्कुल मेरी ही तरह क्यूट।"
    फिर अचानक थोड़ी देर रुककर भौंहें सिकोड़ती है –
    "वैसे भैया, आज आपका इंटरव्यू था ना? कैसा गया?"

    रोहन हल्का सा सिर झुका लेता है, चेहरा गंभीर बनाकर जैसे बहुत उदास हो। सब लोग चौंककर उसकी तरफ़ देखते हैं। इशिता बेचैन होकर बोल पड़ती है –
    "भैया… हुआ क्या? सिलेक्शन नहीं हुआ क्या?"

    तभी रोहन अचानक से मुस्कुरा उठता है और शरारत भरी आवाज़ में बोलता है –
    "अरे पगली, सिलेक्शन हो गया! पता नहीं शायद मेरी किस्मत ही इतनी अच्छी है कि इतनी बड़ी कंपनी में मुझे जॉब मिल गई!"

    सब लोग खुशी से झूम उठते हैं। मम्मी तो तुरंत कह उठती हैं –
    "आज तो मिठाई बनेगी!"

    इशिता उत्साह से चिल्लाती है –
    "हाँ मम्मा, गाजर का हलवा!"

    दोनों भाई-बहन हँसते हुए एक-दूसरे को हाई-फाइव कर देते हैं। घर में एक पल के लिए जश्न सा माहौल हो जाता है। मगर किसी को पता नहीं था कि इस नौकरी के पीछे किसका हाथ है… किसकी कंपनी है…

    थोड़ी देर बाद इशिता अपने कमरे में चली जाती है। कपड़े बदलकर जब वो नीचे आती है, तभी अचानक गेट की घंटी बजती है।
    वो झट से दरवाज़ा खोलती है, पर बाहर कोई नहीं होता। बस एक खूबसूरती से पैक किया हुआ गिफ्ट रखा था, जिस पर एक छोटा सा नोट चिपका हुआ था।

    इशिता चौंककर चारों तरफ देखती है, पर सड़क सुनसान थी। उसने गिफ्ट उठाया और जल्दी से अपने कमरे में ले आई।
    दिल की धड़कन तेज़ होने लगी थी। उसने पैकेट खोला… अंदर एक छोटा सा टेडी था और वही अजीब सा नोट—

    "Angel,
    आज तुम्हारा कॉलेज का पहला दिन था, इसलिए माफ किया।
    लेकिन याद रखना…
    आज के बाद अगर तुम लड़कों से दूर नहीं रही, तो सज़ा मिलेगी।
    – तुम्हारा दीवाना"
    इशिता ने नोट पढ़ा और उसका चेहरा एकदम बदल गया।
    हाथ काँप रहे थे, दिल की धड़कन जैसे छाती से बाहर निकलने को तैयार हो।

    वो धीरे-धीरे खिड़की की तरफ बढ़ी और परदा हटाकर बाहर झाँका।
    धूप ढल रही थी, शाम का वक़्त था। आसमान नारंगी और सुनहरी रोशनी में नहा रहा था।
    बाहर सड़क पर कुछ बच्चे खेल रहे थे, इक्का-दुक्का लोग अपने काम से गुज़र रहे थे।

    सब कुछ बिल्कुल सामान्य था… लेकिन इशिता का मन कह रहा था कि सब सामान्य नहीं है।
    जैसे कोई है… जो दूर कहीं से उसकी हर हरकत देख रहा है।

    उसने धीरे से फुसफुसाकर कहा –
    "नहीं… ये सब मेरा वहम है शायद…"

    इतना कहकर वो खिड़की से हटने ही लगी थी कि अचानक उसकी नज़र सामने वाले पेड़ के पीछे पड़ी।
    ऐसा लगा मानो कोई काली परछाईं वहाँ खड़ी है।
    बस कुछ सेकंड के लिए… फिर जैसे गायब हो गई।

    इशिता का गला सूख गया। उसने जल्दी से परदा गिराया और कमरे में आकर बिस्तर पर बैठ गई।
    हाथों से अब भी वो नोट कसकर पकड़े हुए थी।

    उसके दिल की धड़कन तेज़ थी और दिमाग में बार-बार वही सवाल घूम रहा था –
    "कौन है ये… जो मुझे रोज़ ऐसे गिफ्ट और नोट्स भेजता है? क्यों मुझे लड़कों से दूर रहने की धमकी देता है?"
    इशिता अब भी नोट को कसकर पकड़े बैठी थी, उसका चेहरा डर और बेचैनी से लाल हो चुका था। तभी अचानक दरवाज़े पर दस्तक हुई।

    "इशु… अंदर हो?" – ये रोहन की आवाज़ थी।

    इशिता एकदम चौंकी। उसने तुरंत गिफ्ट और नोट दोनों को तकिए के नीचे छिपा दिया और चेहरे पर बनावटी मुस्कान लाकर बोली –
    "ह…हाँ भैया, आ जाइए।"

    रोहन अंदर आया और हँसते हुए बोला –
    "अरे, तुम तो ऐसे बैठी हो जैसे किसी ने चोरी पकड़ ली हो। सब ठीक है ना?"

    इशिता ने जल्दी से नज़रें झुका लीं –
    "हाँ भैया, सब ठीक है… बस थोड़ी थकान है।"

    रोहन उसके पास बैठ गया और हल्के से उसके बालों को सहलाकर बोला –
    "अच्छा सुनो, मम्मा ने कहा है नीचे आकर हेल्प करो। गाजर का हलवा बन रहा है, और तुम तो जानती हो, तुम्हारे बिना अधूरा रहता है।"

    इशिता ने ज़बरदस्ती मुस्कुराकर सिर हिला दिया –
    "आ… आती हूँ भैया।"

    रोहन संतुष्ट होकर कमरे से बाहर चला गया।
    जैसे ही उसका कदम बाहर पड़ा, इशिता ने झट से तकिए के नीचे से नोट निकाला और उसे देर तक घूरती रही।

    उसके होठों से हल्की सी फुसफुसाहट निकली –
    "तुम कौन हो… और क्यों मुझे हर रोज़ देख रहे हो?"

    उसकी आँखों में डर साफ़ झलक रहा था, मगर कहीं न कहीं एक अनजाना अहसास भी था…
    जैसे वो सचमुच किसी अदृश्य नज़र के जाल में फँस चुकी हो।

    --------

  • 5. SAAYA- ek junooni ishq 👿 - Chapter 5

    Words: 1064

    Estimated Reading Time: 7 min

    पिछले अध्याय में आपने देखा कि इशिता कॉलेज में नई दोस्त बनाती है और घर वापस आती है। घर पर रोहन अपने इंटरव्यू में सफल होने की खबर सुनाता है, जिससे सब खुश हो जाते हैं। बाद में, इशिता को एक गुमनाम गिफ्ट और धमकी भरा नोट मिलता है, जिससे वह डर जाती है। वह उस व्यक्ति के बारे में सोचने लगती है जो उसे लगातार नोट भेज रहा है और उसे लड़कों से दूर रहने की चेतावनी दे रहा है। रोहन के पूछने पर वह अपनी बेचैनी छुपा लेती है।

    अब आगे

    रोहन और इशिता घर वापस आते हैं, जहाँ उनकी माँ इशिता के दिन के बारे में पूछती हैं। इशिता खुशी-खुशी बताती है कि उसका दिन अच्छा बीता और उसकी एक नई दोस्त, रिया, बन गई है। फिर वह रोहन से उसके इंटरव्यू के बारे में पूछती है। रोहन पहले तो उदास होने का नाटक करता है, फिर बताता है कि उसका सिलेक्शन हो गया है। सब बहुत खुश होते हैं और जश्न मनाने का फैसला करते हैं। इशिता अपने कमरे में जाती है और कपड़े बदलकर नीचे आती है, तभी दरवाज़े की घंटी बजती है। वहां कोई नहीं होता, सिवाय एक खूबसूरती से पैक किए हुए गिफ्ट और एक नोट के। नोट में लिखा होता है कि यह उसका पहला दिन था इसलिए उसे माफ किया जा रहा है, लेकिन अगर उसने लड़कों से दूरी नहीं बनाई तो उसे सज़ा मिलेगी। इशिता डर जाती है और खिड़की से बाहर देखती है, जहां सब सामान्य लगता है, पर उसे शक होता है कि कोई उसे देख रहा है। वह एक पेड़ के पीछे एक काली परछाई देखती है। इशिता घबराकर कमरे में वापस आती है और रोहन के आने पर गिफ्ट और नोट छिपा देती है। रोहन उसे नीचे चलकर गाजर का हलवा बनाने में मदद करने के लिए कहता है। रोहन के जाने के बाद इशिता नोट को देखकर सोचती है कि वह कौन है और उसे क्यों देख रहा है।

    --------

    डाइनिंग टेबल पर सब इकट्ठा थे। मम्मी ने गरमा-गरम गाजर का हलवा परोसा, पापा अख़बार एक तरफ़ रखकर मुस्कुराते हुए बच्चों की तरफ़ देख रहे थे।

    रोहन हलवा खाते हुए बोला –
    "मम्मा, ये तो लाजवाब बना है! सच कहूँ तो सिलेक्शन से ज़्यादा खुशी इस हलवे की है।"

    सब हँस पड़े।
    माहौल हँसी-खुशी से भरा हुआ था… लेकिन इशिता उस हँसी का हिस्सा नहीं बन पा रही थी।

    उसके हाथ में चम्मच था, लेकिन हलवे को बार-बार बस घुमाए जा रही थी।
    दिल अब भी धड़क रहा था तेज़ी से।
    हर थोड़ी देर में उसकी नज़र खिड़की की तरफ़ उठ जाती।

    उसे लग रहा था जैसे कोई बाहर पेड़ के पीछे छिपकर अभी भी उसे देख रहा हो।
    भले ही वहाँ अब सिर्फ़ अँधेरा और पेड़ की हल्की हिलती शाखाएँ नज़र आ रही थीं, पर इशिता का मन कह रहा था — वो नज़रें अब भी उस पर टिकी हुई हैं।

    मम्मी ने गौर किया और बोलीं –
    "इशु बेटा, तुमने खाना ढंग से खाया ही नहीं… सब ठीक तो है?"

    इशिता चौंक गई और जल्दी से बनावटी मुस्कान लाई –
    "हाँ मम्मा… सब ठीक है, बस थोड़ी थकान है।"

    रोहन मजाक में बोला –
    "नयी दोस्त मिली है कॉलेज में, अब भैया की याद कहाँ रहेगी।"

    सब फिर से हँस पड़े, मगर इशिता ने बस हल्की सी मुस्कान दी।
    उसके भीतर डर का साया गहराता जा रहा था।
    उसने चुपके से अपने हाथ में रखे नैपकिन को कसकर पकड़ा और मन ही मन दोहराया –
    "अगर ये सब मेरा वहम नहीं है… तो आखिर कौन है, जो मुझे इतनी नज़दीकी से देख रहा है?"
    डिनर खत्म होते ही सब लोग अपने-अपने काम में लग गए। रोहन मोबाइल पर दोस्तों से बातें करने लगा, पापा टी.वी. पर न्यूज़ देखने लगे और मम्मी किचन समेटने में व्यस्त हो गईं।

    इशिता चुपचाप अपने कमरे की ओर चली गई।
    कमरे का दरवाज़ा बंद करते ही उसने राहत की साँस ली। लेकिन राहत बस एक पल की थी… अगले ही सेकंड उसका मन फिर उसी खिड़की की तरफ़ खिंच गया।

    धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई वो खिड़की के पास पहुँची।
    परदा हटाया और बाहर झाँककर देखने लगी।

    बाहर चारों तरफ़ सन्नाटा था। स्ट्रीट लाइट की हल्की पीली रोशनी और दूर जाती गाड़ियों की आवाज़ें ही माहौल में थीं।
    कुछ देर तक उसने ध्यान से इधर-उधर देखा, जैसे सचमुच किसी को पकड़ ही लेगी।

    तभी अचानक…
    हवा में हल्की सी सीटी (whistle) की आवाज़ गूँजी।

    इशिता का दिल उछल पड़ा।
    उसने घबराकर चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई, लेकिन कोई नहीं दिखा।
    वो आवाज़ जैसे खास उसी के लिए थी… बस उसके कानों तक पहुँचने के लिए।

    उसके होंठ काँपते हुए फुसफुसाए –
    "क…कौन हो तुम…?"

    डर की लहर उसके पूरे जिस्म में दौड़ गई।
    उसने तुरंत खिड़की बंद की, परदे गिरा दिए और बिस्तर पर आकर बैठ गई।

    तकिए में चेहरा छिपाकर लेट गई, जैसे इन आवाज़ों और नज़रों से खुद को बचा लेगी।
    आँखें बंद करते ही भी वही सवाल उसे सताता रहा –
    "ये कौन है… जो मुझे हर वक़्त देखता है?"

    धीरे-धीरे थकान और डर के बीच उसकी आँख लग गई…
    पर बाहर कहीं अंधेरे में… किसी की नज़रें अब भी उसी पर टिकी हुई थीं।?
    इशिता ने खिड़की बंद कर दी थी, पर हवा की हल्की सरसराहट से परदा हिल रहा था। रात का सन्नाटा कमरे में गहरा चुका था।
    वो अपने तकिए से चिपककर गहरी नींद में थी—मिनी कुंभकर्ण की तरह।

    कुछ देर बाद…
    खिड़की का लैच धीरे से क्लिक की आवाज़ के साथ खुला।
    परदा हिला और अंधेरे में एक लंबी परछाईं अंदर दाख़िल हुई।

    वो बेहद धीमे कदमों से बिस्तर के पास आया।
    साँसें थमी हुईं, आँखें बस उसी पर टिकीं।
    नींद में इशिता मासूम-सी लग रही थी—बाल बिखरे हुए, होंठों पर हल्की सी मुस्कान और चेहरा चाँदनी में और भी नाज़ुक।

    वो परछाईं कुछ पल वहीं खड़ा होकर बस उसे देखता रहा… जैसे किसी ख़ज़ाने पर नज़रें जमाए बैठा हो।
    फिर धीरे से झुककर उसका चेहरा अपनी हथेली से हल्के-से छुआ और बहुत नर्म अंदाज़ में उसके माथे पर किस कर दिया।

    इशिता हल्की-सी करवट बदली, होंठों से नींद में बुदबुदाई –
    "मम्मा… सोने दो न…"

    पर उसकी नींद टूटी नहीं।
    वो मिनी कुंभकर्ण की तरह गहरी नींद में खोई रही।

    वो परछाईं ठंडी मुस्कान लिए धीरे से फुसफुसाया –
    "सो जाओ Angel… अभी तो बस शुरुआत है।"

    और फिर उतनी ही ख़ामोशी से वापस खिड़की से बाहर चला गया।
    कमरा फिर से शांत हो गया… लेकिन हवा में अब भी उसकी मौजूदगी का एहसास बाकी था।

  • 6. SAAYA- ek junooni ishq 👿 - Chapter 6

    Words: 1002

    Estimated Reading Time: 7 min

    पिछले अध्याय में आपने देखा कि इशिता कॉलेज में नई दोस्त बनाती है और रोहन के इंटरव्यू में सफल होने की खबर से घर में खुशी का माहौल होता है। इशिता को एक गुमनाम गिफ्ट और धमकी भरा नोट मिलता है।

    रोहन के इंटरव्यू में सफल होने की खुशी में परिवार जश्न मनाता है। इशिता को एक और गिफ्ट और नोट मिलता है, जिसमें उसे लड़कों से दूर रहने की चेतावनी दी जाती है। वह डर जाती है और महसूस करती है कि कोई उसे देख रहा है। उसे एक सीटी की आवाज़ भी सुनाई देती है, जिससे उसका डर और बढ़ जाता है। बाद में, एक परछाईं इशिता के कमरे में घुसती है, उसे किस करती है और फुसफुसाती है, "सो जाओ Angel… अभी तो बस शुरुआत है।"

    अब आगे

    --------
    सुबह की हल्की धूप परदों से छनकर कमरे में आ रही थी।
    अलार्म लगातार बज रहा था, पर मिनी कुंभकर्ण इशिता तो वैसे ही बिस्तर से चिपकी पड़ी थी।

    आख़िरकार मम्मी की तेज़ आवाज़ आई –
    "इशु! कॉलेज नहीं जाना क्या? उठ जाओ अब!"

    करवट बदलते हुए इशिता ने मुँह बिचकाया –
    "बस पाँच मिनट और…"

    लेकिन थोड़ी देर बाद जब ज़बरदस्ती उठी, तो उसे अजीब सा एहसास हुआ।
    जैसे नींद तो खुल गई थी, पर दिमाग में हल्का-सा बोझ और बेचैनी थी।

    वो चेहरे पर हाथ फेरते हुए बुदबुदाई –
    "पता नहीं… नींद तो गहरी आई थी, लेकिन लग रहा है जैसे कोई… कोई मेरे पास था…"

    आईने के सामने खड़े होकर उसने बाल सँवारे, पर अचानक रुक गई।
    माथे पर हाथ फेरते हुए उसे कुछ अजीब-सा लगा, जैसे किसी ने बहुत हल्के से छुआ हो।

    उसने जल्दी से सिर झटक दिया और हँसते हुए खुद से कहा –
    "पागल हो गई हूँ मैं… रात में सपना देखा होगा।"

    लेकिन अंदर कहीं न कहीं उसका दिल मानने को तैयार नहीं था।
    कपड़े बदलते वक्त भी बार-बार उसकी नज़र खिड़की पर जा रही थी।
    जैसे खिड़की अब उसके कमरे की सबसे डरावनी चीज़ बन चुकी हो।
    नींद से उठकर तैयार होने के बाद इशिता नीचे आई।
    मम्मी पहले से ही नाश्ते की प्लेट टेबल पर लगा रही थीं।

    "आ गई महारानी! कॉलेज का पहला हफ़्ता है, टाइम से जाना चाहिए ना?" – मम्मी ने प्यार से टोका।

    रोहन अख़बार पढ़ते हुए हँस पड़ा –
    "अरे मम्मा, इसे टाइम का कहाँ पता चलता है? ये तो सोने की इंटरनेशनल क्वीन है।"

    इशिता ने भौंहें सिकोड़ते हुए भाई की तरफ़ देखा और शरारती अंदाज़ में बोली –
    "भैया, आप तो जलते हो मुझसे।"

    रोहन हँसते हुए बोला –
    "हाँ हाँ, तेरी नींद से जलूँगा मैं! सच में, तेरे लिए अलार्म भी हार मान लेता है।"

    सबके बीच हल्की-फुल्की हँसी का माहौल बना रहा।
    पापा ने टिफ़िन का डिब्बा पकड़ा और इशिता की तरफ़ बढ़ाया –
    "लो बेटा, कॉलेज में कुछ मत छोड़ना, सब खाना।"

    इशिता ने सिर हिलाया, पर उसकी नज़रें बार-बार खिड़की की तरफ़ खिंच रही थीं।
    वो खामोश-सी बैठी, प्लेट में रखा नाश्ता उठाकर बस mechanically खाने लगी।

    मम्मी ने गौर किया और प्यार से पूछा –
    "क्या हुआ इशु? इतनी चुप क्यों हो? कल तो बहुत बातें कर रही थी।"

    इशिता ने हल्की मुस्कान लाकर कहा –
    "कुछ नहीं मम्मा… बस थोड़ा थकी हुई हूँ।"

    रोहन ने तुरंत छेड़ा –
    "थकी हुई? या फिर रात भर किसी से गपशप कर रही थी?"

    इशिता ने तुरंत सिर झुका लिया।
    दिल की धड़कन अनजाने डर से तेज़ हो गई।
    वो जानती थी… रात में उसने किसी से बात नहीं की थी, लेकिन कोई… कोई तो था जो उसके पास आया था।
    माँ: "रोहन, रुक बेटा… ऑफिस का पहला दिन है न तेरा, ज़रा दही-शक्कर खा ले।"

    रोहन मुस्कुराते हुए मम्मी की ओर बढ़ा।
    रोहन: "ठीक है माँ, ले आइए।"

    माँ ने अपने हाथ से उसे दही-शक्कर खिलाया और ढेर सारा आशीर्वाद दिया।
    तभी रोहन ने हँसते हुए कहा—
    रोहन: "चल अब, मिर्ची… तुझे कॉलेज छोड़ देता हूँ।"

    सोफ़े पर बैठी इशिता तुरंत चिढ़ते हुए बोली—
    इशिता: "कभी तो नाम से बुला लिया करो, हर वक्त मिर्ची… मिर्ची…"

    रोहन ने हँसते हुए आगे बढ़कर उसकी नाक दबा दी और प्यार से कहा—
    रोहन: "अरे, तू मेरी मिर्ची है… तो मिर्ची ही बोलूँगा न!"

    इशिता हल्का सा मुँह फुलाकर रह गई, मगर अंदर ही अंदर मुस्कान दबा न पाई।

    रोहन सीधा पापा के पास जाता है और झुककर उनके पैर छूता है,
    “आशीर्वाद दीजिए पापा।”

    पापा मुस्कुराते हुए उसके सिर पर हाथ रखते हैं,
    “खुश रहो बेटा, पहला दिन है ऑफिस का… मेहनत से काम करना।”

    फिर इशिता भी धीरे से आगे बढ़कर पापा के पैर छूती है,
    “आशीर्वाद पापा।”

    पापा उसकी मासूमियत देख मुस्कुरा उठते हैं,
    “हमारी गुड़िया को भी हमेशा खुश रहना चाहिए।”

    इशिता शर्म से हल्की सी मुस्कान देती है। तभी रोहन हँसते हुए उसकी ओर देखता है,
    “चलो Mirchi… नहीं तो लेट हो जाएगी।”

    दोनों दरवाजे की ओर बढ़ते हैं। इशिता मुड़कर एक नज़र पापा और मम्मी की ओर डालती है, फिर जल्दी से निकल जाती है।

    बाहर कार तैयार खड़ी थी। रोहन ने दरवाज़ा खोला और इशिता को बैठाया।
    “पहले तुझे कॉलेज छोड़ दूँगा, फिर ऑफिस निकल जाऊँगा,” उसने गाड़ी स्टार्ट करते हुए कहा।
    गाड़ी से उतरकर Ishita ने अपने बालों को ठीक किया और बैग कंधे पर टाँग लिया। Rohan ने हॉर्न देकर इशारा किया—
    "Ja mirchi, apna dhyaan rakhna. Main nikalta hoon office ke liye."
    Ishita मुस्कुराते हुए बोली—"Haan, jao… aur meri tension mat lena."

    गाड़ी जैसे ही मोड़ी, Ishita कॉलेज के गेट से अंदर बढ़ी। पहली बार का माहौल अब थोड़ा जाना-पहचाना लग रहा था। कैंपस की हलचल, इधर-उधर भागते स्टूडेंट्स, और चारों ओर की चहक उसे और भी एक्साइट कर रही थी।

    तभी उसकी नज़र सामने पड़ी—Riya!
    कल ही क्लास में मिली थी और झट से दोस्त बन गई थी। Riya भी नए एडमिशन से आई थी, तो दोनों के बीच एक अपनापन-सा जुड़ गया था।

    Ishita ने हाथ हिलाया—"Hey Riya!"
    Riya भी भागते हुए उसके पास आई और बोली—
    "Thank God tum aa gayi! Mujhe laga main akeli hi bore ho jaaungi aaj."

    Ishita हँसते हुए बोली—
    "Pagal, main tumhe aise akela thodi chhodne wali hoon."
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  • 7. तेरी मोहब्बत, मेरा जुनून" - Chapter 7

    Words: 1001

    Estimated Reading Time: 7 min

    पिछले अध्याय में आपने देखा कि इशिता को एक गुमनाम गिफ्ट और धमकी भरा नोट मिलता है। परिवार रोहन के इंटरव्यू में सफल होने का जश्न मनाता है, और इशिता को एक और उपहार और चेतावनी मिलती है। रात में, एक परछाई इशिता के कमरे में घुसती है और उसे छूती है।

    सुबह, इशिता को रात की घटना के बारे में बेचैनी महसूस होती है। परिवार के साथ नाश्ता करते समय वह गुमसुम रहती है। रोहन उसे कॉलेज ले जाता है। कॉलेज में, उसे अपनी नई दोस्त रिया मिलती है।

    अब आगे

    --------

    दूसरा दिन था इशिता का कॉलेज में। सुबह-सुबह वो और उसकी दोस्त रिया साथ में क्लास की ओर जा रही थीं। कल का डर और घबराहट कहीं पीछे छूट चुकी थी, आज उसके चेहरे पर थोड़ी ताजगी और हल्की-सी मुस्कान थी।

    क्लासरूम के अंदर जाते ही, सबकी नज़र एक पल को उस पर टिक गई। इशिता की सादगी और मासूमियत में एक अलग ही आकर्षण था। कुछ लड़के उसकी टेबल के पास आकर casually बात करने लगे।

    “हाय, तुम न्यू स्टूडेंट हो न? मैं अजय हूँ… अगर किसी नोट्स की ज़रूरत हो तो बता देना।”

    इशिता हल्की-सी झेंप गई, “थ…थैंक यू…”

    उससे पहले कि कोई और कुछ कहे, एक दूसरा लड़का बोला –
    “वैसे आज के लेक्चर थोड़े tough होते हैं, अगर समझ न आए तो हम help कर देंगे।”

    रिया तुरंत बीच में बोल पड़ी, थोड़ा attitude से –
    “Thanks, but हम manage कर लेंगे।”

    लड़के हँसते हुए चले गए लेकिन इशिता की मासूम आँखों में ये सब नया था। उसे ये छोटा-सा attention अच्छा भी लगा और अजीब भी।

    लेकिन क्लास के कोने में कोई एक मास्क पहने लड़का बैठा था। लंबा-सा कद, गहरी आँखें और खामोश सा चेहरा। वो इशिता को बस घूर रहा था, उसकी हर हरकत पर नज़र गड़ाए। जब उसने इशिता को लड़कों से बात करते देखा, तो उसके चेहरे पर हल्का-सा गुस्सा और कसाव आ गया। उसकी मुट्ठियाँ धीरे-धीरे भींच गईं।

    लेक्चर खत्म होने के बाद, इशिता washroom जाने के लिए बाहर निकली। रिया उसे पीछे से बोल पड़ी –
    “जल्दी आना, मैं यहीं wait कर रही हूँ।”

    इशिता जैसे ही खाली कॉरिडोर में मुड़ी, अचानक पीछे से किसी ने उसका हाथ ज़ोर से पकड़ा और खींचकर एक खाली क्लासरूम में घसीट लिया।

    “आहh… कौन हो tum? छोड़ो मुझे!” इशिता घबराकर चीख पड़ी।

    दरवाज़ा जोर से बंद हुआ। सामने वही मास्क पहना हुआ लंबा लड़का खड़ा था। उसकी आवाज़ भारी और गुस्से से भरी थी –
    “बहुत शौक है न तुम्हें लड़कों से हँसने-बोलने का, angel?”

    इशिता की धड़कनें बेकाबू थीं। उसकी आँखें डर से फैल गईं।
    “क…क्या बकवास कर रहे हो tum? मैं किसी को जानती भी नहीं…”

    वो लड़का और पास आ गया, उसके और इशिता के बीच की दूरी बेहद कम रह गई।
    “अब से सिर्फ मेरी नज़र में रहोगी… समझीं tum?”
    उसने Ishita को दीवार से सटा दिया। उसकी साँसें Ishita के चेहरे पर गरम लग रही थीं।
    “Tum samajhti kyun nahi, Angel?” उसकी भारी आवाज़ में ग़ुस्सा भी था और दर्द भी।
    “Jab tum un ladko ke saath hasti ho, baat karti ho, mujhe kuch andhar se tod deta hai. Tum sirf meri ho… sirf meri.”

    Ishita ने तेज़ी से सिर हिलाया,
    “Mujhe jaane do, ye sab pagalpan hai—”

    लेकिन Mystery man का control अब टूट चुका था। उसने Ishita का चेहरा पकड़कर उसे और पास खींच लिया। Ishita का दिल तेज़ धड़क रहा था, उसकी साँसें अटक गईं।

    उसकी आँखों में जलती हुई चाहत थी। अगले ही पल उसने Ishita के होंठों पर अपने होंठ रख दिए।

    पहले वो हल्का-सा स्पर्श था, लेकिन अगले ही पल वो गहरा और possessive lip kiss बन गया। Ishita हैरान रह गई, उसकी पलकों से आँसू फूट पड़े। वो छुड़ाने की कोशिश कर रही थी, मगर Mystery man ने उसकी कमर कसकर पकड़ रखी थी।

    “Main tumse door nahi reh sakta, Angel…” उसने उसके होंठों के बीच बुदबुदाया।
    “Ab tum meri ho… hamesha ke liye.”

    Ishita की साँसें टूट चुकी थीं, उसकी आँखें बंद हो गईं। उसका दिमाग़ डर और confusion से भर चुका था—ये लड़का कौन है? और उसकी आँखों में इतना पागलपन क्यों है?इशिता डर के मारे काँप उठी।
    "क…कौन हो तुम? मुझे क्यों बार-बार पीछा करते हो?" उसने धीरे से कहा।

    वो एक कदम और करीब आया, उसकी नज़रों में पागलपन और तड़प साफ झलक रही थी।
    "Angel…" उसने बहुत धीमी लेकिन ठंडी आवाज़ में कहा, "tumhe samajh kyu nahi aata… tum sirf meri ho."

    इशिता का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसने खुद को छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन वो उसके और भी करीब आ गया। उसकी साँसें उसके गाल को छूने लगीं।

    और फिर… अचानक उसने उसका चेहरा थाम लिया और उसके नाज़ुक गाल पर एक जबरन किस रख दी।

    इशिता की आँखें हैरानी और डर से फैल गईं। वो उसे धक्का देकर पीछे हट गई, आँसू भर आए थे उसकी आँखों में।
    "Pagal ho tum… mujhe akela chhodo!" उसने काँपती आवाज़ में कहा।

    लेकिन वो हल्की सी मुस्कान के साथ बोला, "Chahe tum ro lo, gussa ho jao… par tum meri ho, aur main tumhe kisi aur ke paas jaane nahi dunga."उसकी पकड़ इतनी मज़बूत थी कि Ishita छुड़ा भी नहीं पा रही थी।
    “Angel… tumhe lagta hai main tumhe kisi aur ke saath baatein karne dunga?” उसकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन उसमें खतरनाक कसक थी।

    Ishita काँप उठी। “Mujhe… mujhe chhod do please… meri dost Riya mujhe dhund rahi hogi…” उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े।

    वो हल्की हँसी के साथ और झुक आया, उसका चेहरा Ishita के बेहद करीब था। “Tum samajh kyu nahi paati? Main tumhe chhod hi nahi sakta… aur na chhodunga…”
    Ishita ने आँखें भींच लीं, उसके आँसू उसकी शर्ट पर गिर रहे थे। वो डर और बेबसी के बीच काँप रही थी, जबकि वो उसे अपनी बाहों में और कसता जा रहा था, जैसे उसे दुनिया से छुपाकर हमेशा अपने पास कैद करना चाहता हो।

    sorry mene chapter late dala h but mai sath me do novel muskil se likh pati hu or ho sakta h abse daily ek chapter publish kru
    thank you for support..

  • 8. तेरी मोहब्बत, मेरा जुनून" - Chapter 8

    Words: 1183

    Estimated Reading Time: 8 min

    पिछले अध्याय में आपने देखा कि इशिता को एक अज्ञात उपहार और धमकी भरा नोट मिलता है, परिवार रोहन की सफलता का जश्न मनाता है, और इशिता को एक और उपहार और चेतावनी मिलती है। रात में, एक छाया इशिता के कमरे में प्रवेश करती है। सुबह इशिता बेचैन रहती है, फिर कॉलेज जाती है जहाँ उसकी मुलाकात रिया से होती है।

    दूसरे दिन इशिता कॉलेज जाती है और उसके दोस्त बनते हैं। उसे कुछ अवांछित ध्यान मिलता है। एक मुखौटाधारी व्यक्ति उसे पकड़ता है और एक कमरे में ले जाता है। वह इशिता को बताता है कि वह केवल उसकी है और उसे चूमता है। इशिता डर जाती है और भागने की कोशिश करती है, लेकिन वह उस पर और नियंत्रण कर लेता है।

    अब आगे
    Ishita (रोते हुए, दबी आवाज़ में): “Please… mujhe chor do… meri dost intezaar kar rahi hogi…”

    लेकिन mask वाला उसके और भी करीब आया, उसके आँसू अपनी उँगलियों से पोंछते हुए, मानो उसकी रुलाई भी उसे रोक नहीं पा रही थी।

    उसी वक़्त बाहर से Riya की आवाज़ सुनाई दी—
    Riya: “Ishitaaa! Kaha ho tum?!”

    Ishita अचानक डर से और ज़्यादा कांप गई। Mask वाला उसे एक झटके में दीवार से हटाकर परछाइयों में ग़ायब हो गया। Ishita सांसें फूलते हुए नीचे बैठ गई, उसके होंठ अभी भी काँप रहे थे।

    कुछ देर बाद Riya वहाँ पहुँची। Ishita ने जल्दी से चेहरा दूसरी तरफ कर लिया ताकि उसकी हालत नज़र न आए।

    Riya (गुस्से में, हाथ पकड़कर): “Yaha kya kar rahi thi? Main tumhe dhoond dhoond ke pagal ho gayi!”

    Ishita ने हिम्मत जुटाई, आँसू छुपाते हुए बोली—
    Ishita (बहुत धीमे स्वर में): “Kuch nahi… बस… tabiyat kharab ho gayi… ghar jana hai mujhe.”

    Riya ने शक की नज़र से उसे देखा लेकिन Ishita का डर इतना साफ़ था कि उसने उस पल और कुछ पूछना ठीक नहीं समझा।
    रिया उसे लेकर बाहर आ गई। जल्दीबाज़ी में इशिता बिना किसी को कुछ बताए सीधे घर पहुँच गई।

    घर वाले उसे अचानक चुप और डरी-सहमी देखकर परेशान हो गए, लेकिन उसने कुछ भी नहीं बताया।

    अपने कमरे में जाकर वो सीधे वॉशरूम में गई, शॉवर ऑन किया और ज़मीन पर बैठ गई। पानी उसके पूरे जिस्म पर गिर रहा था और उसके साथ उसकी आँखों से आँसू लगातार बहते रहे।

    वो घंटों वहीं बैठी रही, कांपती रही, रोती रही… उसके होंठ अब भी काँप रहे थे, जैसे उस अजनबी का स्पर्श मिट ही नहीं रहा था।
    --------
    और उधर कुर्सी पर बैठते हुए सोचना शुरू किया—
    “कौन था वो…? यहाँ पहले कभी देखा नहीं… लेकिन उस नज़र में कुछ तो था।”

    उसके दिल की धड़कनें अब भी तेज़ थीं।

    कियारा ने इंटरकॉम उठाया और अपने असिस्टेंट से बोली—
    “अभी-अभी जो लड़का यहाँ से गुज़रा था, उसके बारे में पता करो। किस डिपार्टमेंट से है, कब जॉइन हुआ। मुझे सब जानकारी चाहिए।”

    उसकी आवाज़ प्रोफेशनल थी, पर उसके दिल की बेचैनी छुपी नहीं रह पा रही थी।
    ऑफिस का लंच टाइम था, सब लोग जल्दी-जल्दी अपने-अपने काम निपटा रहे थे। रोहन कॉरिडोर से फाइलें लिए तेज़ी से निकल रहा था, तभी अचानक उसकी टक्कर एक लड़की से हो गई।

    लड़की का हाथ में रखा पर्स गिर गया और उसकी फाइलें ज़मीन पर बिखर गईं। वो हल्के से झुकी उन्हें उठाने लगी। रोहन भी तुरंत झुक गया और दोनों के हाथ एक ही फाइल पर एक साथ आ गए।

    लड़की ने ऊपर देखा—गहरी काली आँखें, चेहरे पर मासूमियत और हल्की सी हैरानी। उसने मिनी स्कर्ट और सफेद शर्ट पहनी थी, पैरों में हाई हील्स थीं। उसकी खूबसूरती देखने लायक थी।

    कुछ पल के लिए दोनों की नज़रें टकरा कर रुक सी गईं। लड़की मानो रोहन में खो गई हो। उसका दिल धड़कनों से तेज़ चलने लगा।

    रोहन ने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा,
    “सॉरी, मिस।”

    उसके बाद उसने फाइलें उसके हाथ में दीं और सीधा आगे बढ़ गया।

    लड़की वहीं खड़ी रह गई, उसकी आँखें रोहन को जाते हुए देखती रहीं। उसके होंठों पर एक हल्की मुस्कान थी, जैसे उसे पहली नज़र में कुछ खास महसूस हुआ हो।ऑफिस के कॉरिडोर में हुई उस हल्की-सी टक्कर ने उस लड़की का दिल जैसे थाम लिया था। रोहन की गहरी आँखें और ठंडी-सी “सॉरी मिस…” कहते हुए उसके यूँ गुजर जाना, उसकी रूह तक उतर गया।

    लड़की धीरे-धीरे अपने केबिन में वापस आयी, जहाँ बड़ी-सी ग्लास वाली खिड़की से धूप अंदर आ रही थी। वह मैनेजर थी— एवाना। नाम जितना अनोखा, उसकी शख़्सियत उतनी ही आकर्षक। मिनी स्कर्ट और सफेद शर्ट के साथ हाई हील्स ने उसके कॉन्फिडेंस को और निखारा था, पर इस वक्त उसका सारा ध्यान एक अजनबी चेहरे पर अटका हुआ था।

    अपनी घूमने वाली कुर्सी पर बैठकर वह फाइल खोलने की कोशिश करती, पर पन्नों के अक्षर धुंधले हो जाते। उसकी सोच बस वहीं अटक गयी थी—
    "वो कौन था? इतना रफ़ लेकिन कितना खिंचाव था उसकी नज़रों में…"मैम, वो मिस्टर रोहन हैं। दो दिन पहले ही हमारी कंपनी में जॉइन किया है। सीनियर एनालिस्ट के तौर पर।”

    एवाना ने भौंहें उठाई, “रोहन?” नाम ज़ुबान पर लेते ही एक अजीब-सा खिंचाव महसूस हुआ।
    “कैसा है वो?”

    असिस्टेंट मुस्कराया,
    “काफी खुशमिज़ाज और फ्रेंडली नेचर है उनका। सबसे जल्दी घुलमिल जाते हैं। स्टाफ भी कह रहा था कि बंदा मज़ाक भी अच्छे करता है, और काम में भी तेज़ है।”

    एवाना चुप हो गई। उसकी आँखों में हल्की-सी चमक थी, जैसे किसी ने उसके दिन की थकान चुरा ली हो। वो सोचने लगी—
    “ये रोहन... इतना अलग क्यों लगा मुझे?”

    वो अपनी कुर्सी पर पीछे टिक गई, लेकिन उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान तैर आई थी।
    थोड़ी देर सोचने के बाद उसने इंटरकॉम उठाया और अपने असिस्टेंट से बोली,
    "Mr. Rohan को मेरे केबिन में भेज दीजिए, मुझे उनसे एक रिपोर्ट डिस्कस करनी है।"

    कुछ ही देर में दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई।
    "May I come in, Ma’am?" Rohan ने अंदर आते हुए कहा।

    एवाना ने चेयर से उठकर उसकी ओर देखा, चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी।
    "Yes, please come in," उसने अपनी ही स्टाइल में कहा।

    Rohan जैसे ही अंदर आया, उसे थोड़ी हैरानी हुई—
    "ओह... आप यहाँ मैनेजर हैं?" उसके लहज़े में आश्चर्य और थोड़ी संकोच झलक रही थी।

    एवाना ने शांति से उसकी ओर देखते हुए कुर्सी पर बैठते हुए कहा,
    "Exactly, मैं ही इस डिपार्टमेंट की मैनेजर हूँ।"

    Rohan झट से थोड़ा गंभीर होते हुए बोला—
    "मुझे सच में माफ़ कर दीजिए, उस दिन जो टकराव हुआ... मैंने सोचा भी नहीं था कि आप मेरी मैनेजर होंगी।"

    एवाना उसकी साफ़गोई और सच्चे एक्सप्रेशन देखकर मुस्कुरा दी।
    "चिंता मत कीजिए, मिस्टर Rohan... मुझे भी कभी-कभी अचानक मुलाक़ातें याद रह जाती हैं।"

    Rohan ने अपनी वही ख़ुशमिज़ाज अदा में कहा—
    "तो फिर अच्छी बात है, मेरी वजह से आपको याद रखने लायक एक पल तो मिला।"

    एवाना हँसी दबाने की कोशिश करती रही लेकिन उसकी आँखों में एक अलग ही चमक आ गई थी।
    उसने फ़ाइल खोलते हुए कहा—
    "अब काम की बात करें, Mr. Rohan... देखते हैं आपकी रिपोर्ट्स कितनी impressive हैं।"

    Rohan हल्की मुस्कान के साथ बोला—
    "Impress करना तो मेरा फ़ितरत में है, Ma’am।"

    एवाना उसकी frankness पर चुपचाप नज़रें झुका लेती है, लेकिन उसके दिल में अब भी वही सवाल था—क्या ये मुलाक़ात महज़ इत्तेफ़ाक़ थी या किसी नए किस्से की शुरुआत?

  • 9. तेरी मोहब्बत, मेरा जुनून" - Chapter 9

    Words: 1095

    Estimated Reading Time: 7 min

    पिछले अध्याय में आपने देखा कि इशिता पर एक अज्ञात व्यक्ति द्वारा हमला किया गया था और रिया द्वारा बचाया गया था। इशिता सदमे में है और घर वापस चली जाती है, जबकि कियारा उस व्यक्ति की पहचान जानने की कोशिश करती है जिसने इशिता पर हमला किया था। इस बीच, रोहन ऑफिस में एवाना से मिलता है और वे एक दूसरे को पसंद करते हैं।

    अब आगे
    कमरे में सिर्फ़ एक टेबल लैंप की हल्की पीली रोशनी जल रही थी। चारों तरफ़ अंधेरा पसरा था, इतना कि बाहर की हल्की सी आवाज़ भी दिल की धड़कनों को और तेज़ कर दे। कमरे की दीवारें पुरानी और नमी से भरी हुई थीं, मानो बरसों से किसी ने इन्हें छुआ तक न हो।

    टेबल पर एक बड़ा कैनवास रखा था। उस पर ब्रश की धीमी–धीमी चाल चल रही थी। ब्रश पकड़ने वाला आदमी लम्बा था, काले कपड़ों में ढका हुआ, चेहरा छाया में छिपा हुआ। उसकी आँखें सिर्फ़ कैनवास पर टिकी थीं, जहाँ धीरे–धीरे एक लड़की का चेहरा उभर रहा था।

    वह लड़की कोई और नहीं, बल्कि इशिता थी। उसकी मासूम आँखें, उसके होंठों की हल्की मुस्कान, हर रेखा में वही उतर रही थी। ऐसा लग रहा था मानो उस आदमी के हर स्ट्रोक के साथ इशिता की आत्मा इस कैनवास में क़ैद होती जा रही हो।

    उसने ब्रश रोका, पेंटिंग को गहराई से देखा और होंठों पर एक धीमी, डरावनी मुस्कान खिंच गई। उसके स्वर में एक अजीब–सी मोहब्बत और सनक झलक रही थी। वह धीरे से बोला—

    “Angel…”

    आवाज़ इतनी गहरी थी कि दीवारों में गूँज गई।
    “तुम नहीं जानती, पर तुम मेरी हो। हमेशा से मेरी।”

    वह उंगलियों से पेंटिंग के होंठों को छूता है, मानो सचमुच इशिता को छू रहा हो।
    फिर हौले से बुदबुदाया—

    “जल्द ही, Angel… तुम्हें मेरे पास आना ही होगा। कोई नहीं रोक सकता।”

    अचानक हवा का एक झोंका खिड़की से आया और लैंप की लौ डगमगा गई। रोशनी कुछ पल के लिए बुझी और जैसे ही लौ दोबारा जल उठी, पेंटिंग की आँखें और ज़्यादा जीवित सी लगने लगीं—मानो इशिता वहीं से उसे देख रही हो।

    वो आदमी फिर से हँसा… एक पागलपन भरी हँसी के साथ।
    और कमरे की ख़ामोशी और भी भारी हो गई।

    रोहन जैसे ही ऑफिस से घर लौटा, थका हुआ सा दरवाज़े पर बैग रखकर सीधा मम्मी से बोला,
    “मम्मी, इशु कहाँ है? अभी तक नीचे नहीं आई?”

    मम्मी किचन से बाहर आईं और थोड़ा परेशान से बोलीं,
    “पता नहीं बेटा, जबसे कॉलेज से लौटी है, अपने कमरे से बाहर ही नहीं निकली। मैंने दो–तीन बार आवाज़ भी दी, खाने को बुलाया, पर उसने बहाना बना दिया। कह रही थी कि भूख नहीं है।”

    रोहन ने माथे पर शिकन डालते हुए कहा,
    “क्या? हमारी इशु और खाना मना कर दे, ये तो गड़बड़ है मम्मी। ज़रूर कुछ हुआ है।”

    मम्मी ने लंबी सांस लेकर कहा,
    “हाँ बेटा, मैंने भी बहुत कोशिश की उससे बात करने की, पर उसने दरवाज़ा तक नहीं खोला। अब तू ही जा और देख ले, शायद तुझसे कुछ कह दे।”

    रोहन बिना वक्त गँवाए सीढ़ियाँ चढ़कर सीधा इशिता के कमरे की ओर बढ़ा। दरवाज़ा हल्का सा बंद था। उसने धीरे से खटखटाया,
    “इशु… दरवाज़ा खोलो, मैं हूँ।”

    भीतर से धीमी और थकी हुई आवाज़ आई,
    “भैया… मैं बस आराम कर रही हूँ। कुछ नहीं हुआ।”

    रोहन का दिल धक् से रह गया। उसकी बहन की आवाज़ में कमजोरी साफ झलक रही थी। उसने थोड़ा ज़ोर देकर कहा,
    “दरवाज़ा खोलो इशु, वरना मैं तोड़ दूँगा।”

    आख़िरकार दरवाज़ा खुला। सामने खड़ी इशिता के चेहरे पर पीलापन था, आँखें सुर्ख़ थीं और माथे पर हल्का पसीना चमक रहा था।

    रोहन तुरंत उसके पास जाकर बोला,
    “अरे इशु, ये तेरी हालत क्या है? तूने पहले क्यों नहीं बताया कि तबीयत खराब है?”

    इशिता ने नज़रें झुका लीं और हल्की सी मुस्कान जबरदस्ती खींचते हुए बोली,
    “कुछ नहीं भैया, बस ज़रा बुखार है… कॉलेज से लौटी तो थोड़ी कमजोरी लगी, इसलिए कमरे में आकर लेट गई।”

    रोहन ने उसका हाथ पकड़कर चौंकते हुए कहा,
    “हाथ तो जल रहा है तेरा… सच में तेज़ बुखार है इशु। तू झूठ क्यों बोल रही थी? भूखी भी है न?”

    इशिता चुप रही, उसकी आँखों में हल्की नमी तैर गई। शायद कॉलेज में कुछ ऐसा हुआ था जो वो बताना नहीं चाह रही थी।

    रोहन ने उसका माथा सहलाते हुए प्यार से कहा,
    “तू पगली है क्या? हम सब तेरे अपने हैं, तू अकेली क्यों सह रही है? चल, पहले दवा खा और कुछ हल्का सा खा ले। बाकी बात बाद में करेंगे।”

    इशिता ने अनमने ढंग से सिर हिलाया और बिस्तर पर बैठ गई। रोहन ने नीचे जाकर मम्मी को आवाज़ दी,
    “मम्मी, दवा और हल्का खाना लेकर आइए, इशु को तेज़ बुखार है।”

    मम्मी भी जल्दी से ऊपर आईं और इशु के सिर पर हाथ रखते हुए बोलीं,
    “देखा बेटा, कह रही थी ना कुछ गड़बड़ है। तू तो छुपा रही थी।”

    इशु बस धीमी आवाज़ में बोली,
    “माफ़ करना मम्मी… सच में भूख नहीं थी।”

    रोहन ने उसकी तरफ़ देखते हुए कहा,
    “अब बहाने नहीं। दवा खाएगी और आराम करेगी। मैं यहीं हूँ तेरे पासदवाई और सूप खाकर इशिता आखिरकार बिस्तर पर लेट गई थी। रोहन उसके माथे पर हाथ रखकर देखता रहा — सचमुच हल्का बुखार था।

    रोहन ने धीरे से उसके बाल सहलाए, "सो जा इशु… सुबह तक सब ठीक हो जाएगा।"
    उसकी मम्मी दरवाज़े पर खड़ी होकर बोलीं, "ध्यान रखना इसका, बड़ी नाज़ुक है।"
    रोहन ने सिर हिलाया और उसके ऊपर कंबल ओढ़ा दिया। फिर कमरे की बत्ती धीमी करके बाहर निकल गया।

    रात गहरी हो चुकी थी। घर के सब लोग गहरी नींद में थे। लेकिन उस कमरे की खिड़की से ठंडी हवा के साथ किसी अजनबी की परछाई भीतर सरक आई। वही लंबा कद वाला रहस्यमयी आदमी, जो अंधेरे में ही घुल जाता था।

    वो इशिता के सिरहाने खड़ा हो गया। उसके चेहरे पर नज़र डालते ही होंठों पर एक अजीब-सी मुस्कान फैल गई।
    उसने झुककर धीरे से उसके माथे को छुआ — गर्म था।

    वो फुसफुसाया,
    "तो… मेरी एंजल बीमार हो गई? बस… एक छोटी-सी किस से इतना असर? तब क्या होगा, जब मैं पूरे जहान की तरह तुम्हारी रग-रग में उतर जाऊँगा?"

    उसकी आवाज़ इतनी गहरी थी कि अगर इशिता जाग रही होती तो कांप जाती। लेकिन बुखार की थकान ने उसे बेहोशी जैसी नींद में रखा।

    वो आदमी पलभर उसके चेहरे को देखता रहा, फिर धीरे से उसकी पलकों पर झुक गया… उसके कानों के पास सिहरन-सी भरी सांस छोड़ी और बोला,
    "सो जाओ एंजल… अभी वक़्त नहीं आया… मगर बहुत जल्द… तुम्हें मेरा होना सीखना पड़ेगा।"

    उसके कदमों की आहट उतनी ही रहस्यमयी थी जितनी उसकी मौजूदगी। जैसे वो कभी आया ही नहीं था।
    --------